महामानव तथागत गौतम बुद्ध भगवान कैसे हैं, आईये जाने क्या है महामानव और भगवान शब्द की व्याख्या ….डॉ कौशल कुमार


Buddha26आज के लिए नमो बुद्धाय ||  भवतु सब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता सब्ब बुद्धानुभावेन सदा सोत्थि भवन्तु ‘ते ||

महामानव कौन हैं आपकी नजर में क्या आप उन सभी को महामानव नहीं कहते जो भी वैज्ञानिक हैं चिकित्सा विज्ञान के जिन्होंने मनुष्य और अन्य जीवों को उनके शारीरिक दुखों से छुटकारा दिलाने के लिए  modern medical science में इतनी खोजें कर डाली और क्या वे भी महामानव नहीं हैं जिन्होने  physics , chemistry और जगत को इतना कुछ संसाधन दिया की वो आज पैदल चलने से बाख सके और घर बैठे -२ अपने परिवार जनों से बातें कर सके | तो  सभी वे महामानव हैं पर ना ही तो वे बुद्ध है और बुद्ध तो क्या पच्चेक बुद्ध और बोधिसत्व की श्रेणी में में भी नहीं आ सकते क्योंकि बोधिसत्व ,  पच्चेक बुद्ध और बुद्ध अपने लिए कुछ भी संग्रह नहीं करते वो तो पूरा जीवन समाज और अन्य जीवों पर करुणा कर उनका उद्धार करने में ही बिता देते हैं |तो एल्बर्ट आइन्स्टीन ,गैलीलियो ,मैकमिलन,जेम्सवाट,कैप्लर,हिप्पोक्रेट्स  और आज के दशक के जाने  कितने ही वैज्ञानिक हैं जो महामानव हैं पर वे बोधिसत्व, पच्चेक, बुद्ध और बुद्ध नहीं हो सकते |

तो गौतम बुद्ध ही ऐसे हैं जिन्हें सर्वप्रथम भगवान् कहा गया था ,क्योंकि उन्होंने जब बोधि प्राप्त कर ली थी अर्हतावस्था से गुजरते हुए कि निब्बान (नि= नहीं +बान=बनना= पैदा होना ) की खोज की थी एवं यह पता लगाया था कि क्यों जीव जगत दुखों के भव संसार  में फंसा है और इससे निकलने का मार्ग उन्होंने खोजा था तो इस लिए तथागत कहे जाते हैं और fully enlightened  हैं तो इसलिए बुद्ध कहे जाते हैं क्योंकि उनका अपनी बुद्धि पर पूर्णतः command(=नियंत्रण) हैं , इसीलिये पालि में कहा भी गया है कि ” भग्ग रागों  भग्ग भग्ग दोसो भग्ग मोहो इतपि सो भगवा अरहं सम्मा सम्बुद्धस्स || ” तो मुझे ये समझ नहीं आता कि भगवान् शब्द यदि बुद्ध के पूर्व लगाया जाता है तो उसमें बुराई क्या है ?
और देखिये कि जो अपने को बौद्ध धर्मवादी बने हैं संस्थाएं चला रहे हैं तो वे क्या प्रयास कर रहे हैं जो लोग उनका बौद्ध धर्म  sc /st/ obc वाले भी नहीं अपना रहे कमीं कहां है ? ज़रा समझें | आज जबकि इस्लाम इतना कट्टर सम्प्रदाय है तो भी  आगरा में ६० मुस्लिम परिवार ३८७ सदस्य , जिन्होंने धर्म जागरण और बजरंग दल के सदस्यों द्वारा उकसाए जाने पर हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया और यज्ञ हवन में  अपनी टोपियों की आहुति दे कर जनेऊ धारण कर लिया क्योंकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के धर्म जागरण प्रकोष्ठ और बजरंग दल के कार्यकर्ता 3 महीने से इनके बीच सक्रिय थे |   तो क्यों आप के द्वारा रोज-२ अम्बेडकर अम्बेडकर चिल्लाने के बावजूद भी नीच जातियों के लोग भी बौद्ध धर्म नहीं पना रहे हैं | आपको इसका उत्तर नहीं सूझ रहा ना शायद कभी सूझेगा क्योंकि आपने बुद्ध को नास्तिक बना दिया है और  नास्तिकवाद से भारतीय जनता कोशों दूर भागती है , इसीलिये तो उन मुस्लिम परिवारों ने इस्लाम छोड़कर हिन्दू धर्म अपना लिया , क्योंकि उन्हें लगा कि इसको अपनाने से एक तो यह फायदा होगा कि  BJP और RSS के चहेते बन जायेंगे तथा उनकी दरिद्रता दूर हो जायेगी | बौद्ध सम्प्रदाय का कोई ऐसा संघ नहीं और ना ही नीच जातियों का कोई ऐसा संघ है जो किसी व्यक्ति के धर्मांतरण पर उनकी मदद करे , सब बस अपना पेट  भरने हेतु राजनीति कर रहे हैं वो भी अपने लोगों के साथ ही | तो क्यों लोग आयेंगे बौद्ध धरम में और ऊपर से नास्तिक विचार वो क्यों स्वीकार करें क्योंकि वो ठहरे बड़े वाले धार्मिक वो भी अंधे |

तो आपको कोई  हक नहीं है बुद्ध को महामानव मात्र सिद्ध करने का मुझे कोई भी अम्बेडकरवादी आज तक ऐसा नहीं दिखा जो केवल अपना हित ना देखता हो और अज्ञानी तो इतने की बस दुनिया को केवल एक ही विषय के आधार पर हांकना चाहते है | वो लोग आपका धर्म नहीं मानते क्योंकि वे नास्तिक नहीं हैं वे मूर्ख और अंधे हैं आरक्षण मिल रहा है आराम से रोजी रोटी मिल रही है और अब समाज  में वो  untouchability  भी नहीं रही है |

और फिर human सायकोलोजी है परम सत्ता तो किसी ना किसी को मानेंगे ही लोग चाहे वो बुद्ध ही क्यों ना हों | जब कृष्ण जैसे धूर्त व्यक्ति को लोग ईश्वर का साकार रूप मान लेते हैं क्योंकि पुरोहित जानता है कि लोगों को थोड़ी छूट मिले अपने तरीके से सुप्रीम पावर को मानने की तो वे आराम से हमारी बातें स्वीकार कर लेते हैं | अभी तो वे लोग जो अपने को पढ़ा लोखा कहते नहीं अघाते वे ही
इतने मूर्ख हैं कि उन्हें भी कोई तो परम सत्ता चाहिए ही , तो नीची जातियों के जो लोग कभी बौद्ध थे गौतम बुद्ध के भी पूर्व सिन्धु सभ्यता से पता चलता है और हमारे भारत के अनपढ़ गरीब जो नीची जातियों के लोग हैं कम से कम वे लोग तो अपने सारे संस्कार उसी पुरातन रीति से करते हैं , पूजा की वही पुरानी सिन्धु की पद्धती और वही भाषा , तो वे लोग डायरेक्ट बोलते हैं कौन हो भाई तो खट से अपनी जाति बता
देते हैं कभी हिन्दू नहीं कहते क्योंकि स्वभावतः वे वैदिक या हिन्दू धर्म को नहीं मानते हैं  |
तो महामानव तो कोई भीतर से क्रूर और स्वार्थी  व्यक्ति भी हो सकता है और कितने ही मनुष्य अब तक महामानव की श्रेणी में आ चुके हैं पर क्या आपने  कभी सूना दुनिया में किसी ने कहा हो  कि मैं बुद्ध हूँ, (=क्या बाबा साहेब ही ने कहा कि मैं बुद्ध से भी ज्यादा हूँ , क्योंकि वे बोधिसत्व हैं , उन्हें पता था  कि बुद्धत्व अवस्था प्राप्ती के बाद तो कोई दुक्ख रहता ही नहीं उसे जो भगवान्
हो गया है , अर्हत हो गया है और जो सम्यक है, सम है , बुद्ध है )  क्योंकि बुद्ध स्वयं को बुद्ध नहीं कहते हैं वे तो स्वयं को सिद्ध कर देते हैं कि बुद्ध आ चुके हैं दुनिया वालों , सभी सम्प्रदाय वालों और धर्म को बदनाम करने वालों लो मैं आ गया अब | तो बुद्ध महामानव मात्र नहीं वे हैं वास्तविक भगवान  और वे ईश्वरों के भी अराध्य देव हैं क्योंकी वे ही वास्तविक मुक्ति का रास्ता बताते हैं और …
निष्कलंक हैं , तो भगवान् कहे जाते हैं , इसलिए ईश्वर नहीं कहे जाते , और भगवान् तो अर्हत भी होते हैं पर वे बुद्ध नहीं होते तो इसीलिये भगवां =भगवान् कहा जाता है |
||   भवतु सब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता सब्ब बुद्धानुभावेन सदा सोत्थि भवन्तु ‘ते ||

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5 thoughts on “महामानव तथागत गौतम बुद्ध भगवान कैसे हैं, आईये जाने क्या है महामानव और भगवान शब्द की व्याख्या ….डॉ कौशल कुमार

  1. आपका विचार अच्छा है पर भगवान बुद्ध को ईश्वर मानना हमारे धर्म खिलाफ होगा. उनको ईश्वर मानके हम उनके अनात्मवाद और अनिश्ववाद को न मानके खिलाफ होगा.
    रहि बात भगवान शब्द कि, ओ एक पालि शब्द है जो पहले बौद्धोने ईस्तेमाल किया जो बुद्ध के लिए हि है पर उसका अर्थ ईश्वर नहि हैँ और बुद्ध को ईश्वर बनाने कि जरुरत नहि है क्युकि हर बौद्ध धर्म माननेवाला जानता है कि वे ईश्वर नहि है, लेकिन ईश्वर से कम भी नहि है .वे ईश्वर नहि ईसलिए हि लोग बौद्ध अपनाते है

  2. प्रत्येक व्यक्ति को एक परफेक्ट सत्ता को मानना ही पड़ता है और ये तो पूरा नास्तिकवाद है कि आप लोग बुद्ध को महात्मा महामानव आदि संज्ञाओं से नवाज़ते फिरते हैं , शब्दों में बड़ी ताकत होती है तभी तो देखिये भारत के जनमानस के मन मस्तिष्क में वो ही बस जाता है जो पुरोहितवादी ब्राह्मण चाहता है | और आप लोग बुद्ध को भी केवल एक सामान्य सा मनुष्य सिद्ध करने में लग जाते हो क्योंकि हीन भावना आप लोगों के मानों में कूट कूट कर भरी है और उस हीन भावना का त्याग आप कर नहीं पा रहे हैं | शब्दों कि केवल व्याख्या नहीं होती है उनका एक वास्तविक अर्थ होता है | बुद्द एक फाइनल डेस्टिनेशन अर्थात वास्तविक अनुभूतियों की अंतिम अवस्था का नाम है | बुद्धत्व की अवस्था प्राप्त होने के बाद कोई किसी प्रकार का संशय i.e. delirium रहता ही नहीं और जिसने बुद्धत्व प्राप्त कर लिया है वह सर्वोत्तम है सभी प्रकार के लोक लोकांतर में , अब जो लोग अपनी गुलामी की बेड़ियाँ तो तोड़ना चाहते हैं पर अपने भीतर से हीन भावना को त्यागना ही नहीं चाहते हैं तो उनका क्या करे कोई | अभी ऊपर आपने कहा कि बुद्ध ईश्वर नहीं पर किसी ईश्वर से कम भी नहीं , तो भाई साहब जरा अपने आगे पीछे का मिलान करके कुछ कहना चाहिए नहीं तो व्यक्ति हंसी का पात्र ही बनता है | बुद्ध ही वास्तव में भगवान् हैं अन्य तो केवल ईश्वर हो सकते हैं अर्थात मालिक किसी विशेष व्यवस्था या देश या लोक के और वे भी कोई स्थायी पद नहीं हैं इसका विवरण भगवान् बुद्ध कि वाणी यानी तिपिटक के सुत्त ग्रंथों में भरा पड़ा है | बुद्ध अपनी बात को शुरू ही इस वाक्य से करते हैं कि भिक्खुओं ! तथागत दो अतियों १-तपन = ईश्वरवाद २-भोग=नास्तिकवाद का त्याग कर धम्म अर्थात धर्म को मध्य (=अर्थात नास्तिक और आस्तिक दोनों के जानकार होकर ) से उपदेशते हैं | यानी व्यक्ति या तो नास्तिक अर्थात कुछ नहीं है केवल जो भौतिक जगत दिख रहा है वो ही जगत है , परन्तु भिक्कुओं ! तथागत इस बात को वास्तविक रूप से जानते हैं कि केवल ये जो दिखाई देने वाला भौतिक जगत है वो तो बहुत ही कम है इससे अत्यधिक जगत तो न दिखाई देने वाला ही है |
    इस बात का प्रमाण आज मॉडर्न साइंस ने दे दिया है कि जो स्थूल जगत है उससे ज्यादा तो अस्थूल जगत है | पूर्व में साइंस भी आकाश को केवल vacuum ही कह रही थी पर आज एस्ट्रोफिजिक्स ने इस बात को सिद्ध कर दिया है कि जो आकाश हमें दिख रहा है वो भी एक प्रकार पदार्थ ही है परन्तु उसकी प्रवृत्ति स्थूल पदार्थ के विपरीत है |
    तो अनभिग्य पुरुष को क्या और कैसे समझ आये ये बात कि बुद्धों कि वाणी कभी झूंठ नहीं होती है , क्योंकि वो वास्तविकता के दर्शन से अभिभूत हो गए रहते हैं | आज साइंस ये बात मानने को तैयार नहीं कि कोई भी पदार्थ के अतिरिक्त अपदार्थ नहीं इस संसार में , जैसे मॉडर्न मेडिसिन जीवित शरीर को केवल एक पदार्थों से बना शरीर मानती है जिसमें जीवन्तता अर्थात जीवन इन पदार्थों के एक साम्य में एकत्र होने के कारण उत्पन्न होता है | वह यह मानना ही नहीं चाहती है कि मन जैसी कोई चीज़ इस जीवित शरीर में होती है , जबकि भगवान् बुद्ध ने इसे बिलकुल स्पष्ट कर दिया है कि जो यह शरीर या संसार है यह केवल ६ धातुओं से मिलकर बना है १-अग्नि i.e. hotness २-वायु = air ३-आपो =तरल= liquid ४- पृथ्वी i.e. solid ५-आकाश i.e. vacumm ६- विज्ञान i.e. consciousness भिक्खुओं ! मैं इस संसार में केवल ये धातुएं ही देखता हूँ इन ६ धातुओं के अतिरिक्त अन्य कोई धातु इस जगत में नहीं जो कुछ भी दृश्यमान और अदृश्य है वो सभी कुछ इन ६ धातुओं से ही निर्मित है
    देखें-प्रथम निपात , अंगुत्तर निकाय
    और अभिधम्म पिटक में तो भगवान् बुद्ध ने बिलकुल और भी स्पष्ट किया है कि किस प्रकार का यह जगत है |
    भिक्खुओं ! यह जगत इन ६ धातुओं से निर्मित है और ये ६ की ६ धातुओं को निर्माण करने वाली जो चीज़ है वह है अट्ठकलाप जिसे सुद्धअट्ठक भी कहा है भगवान् ने , अर्थात वह मूल इकाई जो अपने भीतर आठ गुण धारण करता है |
    १-उतु= bond energy -२-वर्ण=colour
    ३-वायो=air-४-गंध=smell
    ५–आपो=liquid-६-रस=wetness
    ७-पृथ्वी=mass-८-ओज = स्थूलता=solidity
    चूंकि यह आठ गुण रखता है इसी कारण भगवान् ने इसे अट्ठकलाप कहा है | और ये चार जोड़ों के रूप में हैं | यह अट्ठकलाप जब अपनी अवस्थाओं को बदलता है तब बीच- बीच में आकाश धातु उत्पन्न होती है जो कि अनंत आयतन को घेर रही है इस सतसह्स्र चक्कवाल वाले संसार को अर्थात ब्रह्माण्ड को |
    अन्य धातु जिसे भगवान् विज्ञान कहते हैं वह इस अट्ठकलाप के अतिरिक्त ६ वीं धातु है जिसके कारण जगत में जीव हैं यदि विज्ञान निकल गया किसी शरीर में से तो वह चार महाभूत से निर्मित शरीर निर्जीव हो जाएगा | परन्तु भगवान् ने इस विज्ञान को भी अस्थिर स्वभाव का कहा अर्थात यह विज्ञान धातु भी नित्य नहीं | इसी कारण भगवान् के वाद को अर्थात धम्म को अर्थात दर्शन को अनिच्च दस्सन (=अनित्य दर्शन ) कहा जाता है | अर्थात सभी कुछ unstable है, यही है अनात्म वाद जो बुद्ध ने बताया अर्थात इस शरीर में से कुछ ऐसी चीज़ जो दूसरे शरीर में प्रवेश करे नए जनम में , अर्थात निर्विकारी आत्मा जिसमें कोई भी परिवर्तन किसी भी प्रकार नहीं हो जैसा कि आत्मवादी ईश्वर वादी मानते हैं |
    पुनर्जन्म तो भगवान् बुद्ध ने भी बताया है , यह तो उनके द्वारा प्रतिपादित प्रतीत्यसमुत्पाद के नियम और उनके सुत्तपिटक के वचनों में बड़े ही विस्तार से कहा गया है | तो भगवान् बुद्ध को नास्तिक वादी मत कहो , केवल महामानव मत कहो , महात्मा मत कहो और स्वयं को पहले धम्म में परिपक्व करो और अगर नास्तिकवाद अपनाना चाहते हो तो अपनाओ कोई मना नहीं करता पूव का चार्वाक दर्शन और आज का साम्य दर्शन है नास्तिक्वादियों के लिए , भगवान् बुद्ध का नाम नास्तिकवाद के साथ मत जोड़ो |\

    नमो बुद्धाय ||
    भवतु सब्ब मंगलं ||

  3. भगवान् बुद्ध के १० अव्याकृत (3)

    || नमो बुद्धाय ||
    भवतु सब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता सब्ब बुद्धानुभावेन सदासोत्थि भवन्तु’ते ||
    भवतु सब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता सब्ब धम्मानुभावेन सदासोत्थि भवन्तु’ते ||
    भवतु सब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता सब्ब संघानुभावेन सदासोत्थि भवन्तु’ते ||

    जम्मुद्वीप (प्राचीन भारत ) की सबसे पुरातन सभ्यता अभी तक जो खोजी गयी है वह सिन्धु घाटी की सभ्यता है | सिन्धु घाटी
    सभ्यता में बहुत सारी सामग्री प्राप्त हुई है जैसे की मिट्टीके बर्तन , पीपल के पत्ते की चित्रकारी , हाथी ,सांड, टाइगर ,गैंडा आदि पशुओं की seals प्राप्त हुई हैं | एक चित्रकारी में योगिक मुद्रा में एक पुरुष बैठा है उसके चारो ओर ये चार पशु दिखाए गए हैं , उस समय की सभ्यता में जो पुरुष दिखाया गया है वो कोई शिव की मूर्ती नहीं है बल्कि बुद्ध की मूर्ती है , अब आप कहेंगे कि गोतम बुद्ध तो
    सिन्धु सभ्यता के भी २००० से २५०० वर्ष हुए तो कैसे ये बुद्ध हैं |तो पढ़िए बुद्ध वचन सुत्त पीटक का एक ग्रन्थ दीघनिकाय उसमें भगवान् गोतम बुद्ध ने साफ़-२ कहा है कि मुझसे पूर्व कितने ही बुद्ध हो चुके हैं जिनमें ६ बुद्धों की जीवनी तो स्वयं गोतम बुद्ध ने बतायी है , पढ़ें महापदान सुत्त हिंदी एडिशन २०१० पेज १७६ – २२ वें बुद्ध विपस्सी ,२३ वें सिखी..,वेस्सभू ,ककुसंध ,कोणागमन ,कस्सप ,एवं
    २८ वाँ मैं स्वयं गोतम बुद्ध | इसमें ९१ कल्प पूर्व विपस्सी बुद्ध हुए थे ऐसा भगवान् ने बताया है | और सिन्धु सभ्यता में सतिया की दो सील हैं १-जो आज प्रचलित है और २ सरी उसकी उल्टी जैसी की जर्मनी के फ्लैग पर है | सतिया शब्द पुरातन प्राकृत भाषा का है जिसे बाद में भगवान् के मुख से सुव्यवस्थित रूप में सुत्तों के रूप में जब कहा गया तो प्राकृत भाषा को पालि कहा गया क्योंकि पालि का अर्थ
    ही होता है सूत्र | इसी सभ्यता में एक मूर्ती में एक स्त्री ने एक हाथ में चूड़ियाँ ऊपर तक पहनी हैं और एक हाथ में केवल दो , जो कि आज भी निम्न वर्ग की स्त्रियाँ राजस्थान में ऐसे ही चूड़ियाँ पहनती हैं जबकि उच्च जातियों की स्त्रियाँ दोनों हाथों में केवल दो-२ या अधिक पर कोहनी के नीचे तक ही पहनती हैं | इससे भी पता चलता है कि ब्राह्मण लोग सिन्धु सभ्यता को नष्ट करके प्राचीन भारत में आये
    थे और वे इतने असभ्य थे कि उन्हें ठीक से साज श्रृंगार भी नहीं आता था , जब वे इस देश में वास करने लगे तो हमारी सभ्यता का तो असर आना स्वाभाविक था उनमें भी | वो लोग अग्निपूजक थे और हम सम्मा दृष्टि वाले थे तो अंगारी पर पानी डालकर पूजा करते थे ना कि हवन , जो आज भी हमारे देश में गाम -२ में प्रचलित है | तो भगवान् बुद्ध की ये बात कितनी सटीक है कि उनके पूर्व कितने ही बुद्ध हो चुके हैं | अब बात
    आती है कि बुद्ध नास्तिक हैं , या अनीश्वरवादी :- तो देखिये पहले आप जानिये कि बुद्ध ना तो नास्तिक्वादी हैं ना ही अनीश्वरवादी बुद्ध हैं अनात्मवादी और विभाज्यवादी वे कहते हैं कि इस संसार(universe) में ३१ आयतन हैं और इन ३१ आयतनों में ३१ वाँ आयतन “न संज्ञा न असंज्ञा आयतन ” कहा जाता है जो materialistic नहीं है यही निराकार अनंत आयतन की लास्ट अवस्था है | भगवान् इससे आगे की अवस्था निब्बान की शिक्षा
    भी देते हैं जिसे प्राप्त कर योगी अर्हत बन जाता है , फिर उसका कभी जन्म नहीं होता है – सभी दुखों से मुक्त अवस्था है यह | बुद्ध ने कहा पौस्करसाती ब्राह्मण से कि तु क्या जानना चाहता है तो उसने कहा भगवान् मुझे तो आप बस ब्रह्म मार्ग ही बता दीजिये क्योंकि वह हमें पसंद भी है और पैतृक भी , तो भगवान् ने कहा कि पौस्करसाती क्या तूने कभी ब्रह्मा को देखा है या तेरे पुराने किसी ऋषि जैसे
    अष्टक , वामक, वामदेव , अंगिरा, भरद्वाज, वशिष्ठ , विश्वामित्र आदि ने देखने का वर्णन किया हो | पौस्करसाती कहता है कि नहीं — तो गोतम कहते हैं कि पौस्करसाती मैंने ब्रह्मा को अपनी आंख से देखा है और उस तक पहुँचने का म,आर्ग भी मैं जनता हूँ पर मैं उससे भी ऊपर के लोकों को भी जनता हूँ , पौस्करसाती कहता है बस आप मुझे ब्रह्म मार्ग ही बता दीजिये | तो सुन कह भगवान् कहते हैं कि ब्रह्म लोक को
    पहुंचाने वाले ४ मार्ग हैं (१) मैत्री (२) करुणा(३) मुदिता(४) उपेक्खा | जब कोई मानुष या देव इन चार मार्गों को सिद्ध कर लेता है तो वह मृत्यु हो ब्रह्म लोक में उत्पन्न होता है ऐसा कहा भगवान् ने | अब जानिये भगवान् कैसे अनात्म वादी और विभज्यवादी हैं — भगवान् कहते हैं यह संसार ६ धातुओं से मिलकर बना है (१) अग्नि(२) वायु(३) आपो(४)पृथ्वी(५) आकास (६) विज्ञान (=sense=consciousness) , हे भिक्खुओं मैं इस संसार
    में इनके अतिरिक्त अन्य कोई धातु नहीं देखता | ref. अंगुत्तर निकाय |
    ये सारे के सारे धर्म (=धातु) अनित्य हैं (=unstable i.e. they change always there is no stay for a little bit time ) सभी रूप चाहे अदृश्य या दृश्य हों एक fundamental unit = अट्ठकलाप से निर्मित हैं इसे ही अभिधम्म में आठ अविनिब्भोग रूप कहा गया है |
    भगवान् जीवित प्राणी को नामरूप कहते हैं , रूप=अग्नि+वायु+जल+पृथ्वी का संयोग है आकाश धातु में और नाम कहा क्योंकि अनात्म वादी हैं i.e.नाम (=not+self=) वेदना संज्ञा संस्कार विज्ञान | और ये आठ के आठ ही सदा परिवर्तनशील हैं इसलिए भगवान् को अनित्यवादी कहा जाता है और रूप तथा विज्ञान को भी उसके न्यूनतम अवस्थाओं में explain करते हैं इसलिए विभज्यवादी कहा जाता है | तो भाईयों क्यों भगवान् की निंदा करते हो उन्हें नास्तिक वादी कहकर या अनीश्वर वादी कहकर |
    अब आपका कहना है कि लोगों को बौध धर्म धर्म के रूप में नहीं मानना चाहिए ambedkarism
    के रूप में मानना चाहिए तो भैया कौन से लोक से आये हैं आप और कौन सी दुनिया में रहते हैं कि जो आप इतने मोह ( delirium=मूढ़ता ) से भरे हैं , ये भी नहीं जानते कि बुद्ध ने nonsectorian relegion(=धम्म=धर्म ) बताया है ना कि सम्प्रदाय (= relegion) | भाषाओं के बदल जाने से किसी वस्तु का धर्म(=character=गुण ) थोड़े ही बदल जाता है | तो धम्म कहो या धर्म एक ही बात है , हाँ ये बात और कि आजकल लोग धर्म को सम्प्रदाय और सम्प्रदाय को ही धर्म कहने लगे हैं
    क्योंकि किसी भी सम्प्रदाय में ज्यादातर लोग मोह-मूढ़ता से भरे हैं और अपने-२ सम्प्रदायों की रूढ़ियों में बंधे हैं बेचारे हैं क्या करें | पर एक बात और धर्म का भी कोई तो सम्प्रदाय बनाना पडेगा ही नहीं तो सारे फूल अलग-२ होंगे और जब कभी भी हवा का झोंखा या आंधी आएगी तो ये मोती बिखर जायेंगे और गर्त में चले जायेंगे , पर जब एक माला में होंगे तो बिखरेंगे नहीं जहां जायेंगे साथ ही जायेंगे और servive करते रहेंगे खुशबू फैलाते रहेंगे |
    अब लो मूर्ती क्या है ? मूर्ती है अभिव्यक्ति का तीसरा प्रकार –(१) वाणी (२) लिपि(३) चित्रकला=मूर्तिकला | तो भैया जरा देखिये बुद्ध द्वारा प्रतिपादित ध्यान साधना :- ध्यान के पाँच अंग हैं (१)वितक्क(२) विचार(३) पीति (४)वेदना(५) एकग्गता | और ध्यान को प्राप्त करने के दो मार्ग भगवान् ने बताये हैं १-समथ यानिक- जो समथ भावना के मार्ग पर चलकर २सरी – विपस्सना भावना द्वारा अभिज्ञा (=supernormal knowledge = लोक लोकांतर और निब्बान) को प्राप्त करता है | १ली में कसिण साधना की जाती है जब साधक कसिण साधना में पूर्णता प्राप्त कर लेता है तो विपस्सना साधना द्वारा वह रुपावचर (साकार ब्रह्म) अवस्था —अरूपावचर (अरूप ब्रह्म) अवस्था — लोकुत्तर चित्तावस्था(अर्हत) को प्राप्त करता है one bye one .
    अतः बाद में ध्यान को सरल बनाने हेतु कुछ भिक्खुओं ने कसिण साधना को धर्म कि तीसरी प्रकार वाली व्याख्या (चित्रकला=मूर्ती) पर ध्यान लगवाकर अल्पबुद्धि मानुषों के लिए भी मार्ग प्रशस्त किया था | इसमें भगवान् के मार्ग को दोष देना या उन भिक्खुओं को जो करुणा वश जगत का भला ही कर रहे थे बिल्कुल अपवित्र और गलत है | अब लोग मार्ग पर ना चलें अन्धविश्वासी होकर आरती उतारने लगें मूर्ती की तो कोई भी गुरु या भगवान् क्या करे ? जरा भगवान् बुद्ध के वचनों को जानिए पहले कि वो क्या कहते हैं , भगवान् बुद्ध ईश्वर के बारे में चुप नहीं हैं ।
    भगवान बुद्ध के १० अव्याकृत हैं अर्थात जिन्हें वाणी से या अन्य पंचिन्द्रियों से नहीं व्यक्त किया जा सकता इसलिए अव्याकृत हैं क्योंकि इन्द्रियातीत अवस्था में इन दस अव्याकृतो को जाना जा सकता है और वह अवस्था एक अर्हत ही प्राप्त कर सकता है।
    ये दस अव्याकृत हैं-
    १- लोक नित्य है
    २-लोक अनित्य है
    ३- लोक शांत है
    ४- लोक अनंत है
    ५-जीवऔर शरीर एक हैं
    ६- जीव और शरीर अलग अलग हैं
    ७- तथागत मरने के बाद रहते हैं
    ८- तथागत मरने के बाद नहीं रहते हैं
    ९- तथागत मरने के बाद रहते भी हैं नहीं भी रहते हैं
    १०- तथागत मरने के बाद न रहते हैं न नहीं रहते हैं ।
    तो ये तथागत के १० अव्याकृत अर्थात भगवान् ने भिक्खुओं को बताया कि इन्हें समझने हेतु इन्द्रियातीत अवस्था की समाधि को प्राप्त करके ही समझा जा सकता है और किसी भी इंद्री से इन दस को
    व्यक्त नहीं किया जा सकता ,क्योंकि जब इनको जाना तो उस समय पंचिन्द्रिय कार्यरूप में थीं ही नहीं तो जब पंचिन्द्रिय से जाना नहीं तो इन्हें कैसे व्यक्त किया जाए उन पांच इन्द्रियों से , यह तो ठीक वैसे ही है जैसे यदि कोई किसी विशेष प्रकार के रस को न चखे और केवल उसका विवरण ही पढ़े तो कैसे जानेगा उस रस की वास्तविकता ।
    यहाँ ईश्वर आदि के बारे में भगवान् मौन नहीं है बल्कि स्पष्ट कहा है भगवान् ने पढ़ें संखारुप्पत्ति सुत्त मज्झिम निकाय और पढ़ें अभिधम्म पिटक कि भगवान् ने बताया है यह लोक ८- नरक लोक १- मनुष्य लोक ६- देव लोक १६-रूप लोक (= ब्रह्म लोक साकार वाले) और ४-अरूप लोक (= निराकार ब्रह्म अनंत आयतन ) वाला है।
    और जो मैं धर्म बताता हूँ वह इन सभी मरणशील लोक और इनमे रहने वाले नश्वर प्राणियों से भी ऊपर
    की अजर- अमर अवस्था अर्थात निब्बान को समझाने वाला और पहुंचाने वाला धर्म है । वह मार्ग मैंने स्वयं खोजा है । यह संसार ६ धातुओं से मिलकर बना है १-अग्नि २-वायु ३-जल ४- पृथ्वी ५-आकाश ६- विज्ञान । और जीवित शरीर बना है रूपनाम से रूप बना है अग्नि वायु जल पृथ्वी से और नाम बना है वेदना संज्ञा संस्कार विज्ञान से मिलकर । रूप की सबसे छोटी इकाई है अट्टकलाप । तो भगवान् ने कहा है कि जगत कर्ता कोई नहीं और ये लोकपाल (ईश्वर=देव) भी मरणशील हैं, अपने-२ कर्म फल भोगकर मर जाते हैं । सबसे बड़ा है मन पर मन भी मरणशील है अर्थात परिवर्तनशील so everything is unstable in this universe, always all things become changing without any stay a little bit .
    अतः भगवान कहते हैं तुम्हारे बदले न कोई कर्म करता है और न कोई फल भोगता है । तभी तो धम्मपद में कहा भगवां ने
    ” मनोपुब्बंगमा धम्मा मनोसेट्ठा मनोमया ”
    और जरा ये भी जान लें तो अच्छा होगा कि भगवान और ईश्वर एक ही बातें नहीं हैं भगवान् कहे जाते हैं क्योंकि उन्होंने राग दोस मोह को सदा के लिए भग्न कर दिया है । इसीलिए कहा भी है पालि में —
    ” भग्ग रागो भग्ग दोसो भग्ग मोहो इतपि सो भगवां अरहं सम्मा सम्बुद्धस्स ” ।।
    एवं ईश्वर अर्थात किसी लोक का स्वामी / राजा / सबसे बड़ा अधिकारी । और भगवान् के धर्म में सर्वशक्ति मान है मन this is the lord of all in this world whatever appears first that appears in firstly in मन और मन पर समय का भी
    कोई वश नहीं चलता अभी यहाँ और अभी चन्द्रमा पर ; तो देखिये दोनों ही बातो करने में मन को बराबर वक़्त लगता है क्योंकि मन से तेज़ संसार में कुच्छ भी नहीं । ओर इससे सुस्त भी कोई नहीं चाहे तो शून्य हो जाये

  4. सन्देश सूत्र:ध्यान रहे दलित वही है जो संगठित होकर काम न करें और वक्त पड़ने पर धोखा दे दे, अगर ये दोनों कमिया ठीक हो जाएँ तो दलित दलित नहीं रहता वो राजा बन जाता है| उदाहरण के लिए इस देश में अगर हम दलितों की संख्या २० करोड़ मानें और ये मानें की हम खुद अपना भला अपने बल बूते पर करेंगे तो हिसाब लगा लो की, अगर सभी एक दिन का एक रुपया निकले तो १ दिन में बीस करोड़ और एक महीने में ६०० करोड़ बनता है और एक साल में ७२०० करोड़| अब हिसाब लगाओ की कुल ३० राज्ये हैं और हम तीस साल तक ऐसा करें और हर साल एक ही राज्ये में ७२०० करोड़ रुपया दलितों की दशा सुधरने में लगाएं तो केवल तीस साल में ही वो फर्क आ जायेगा जो पिछली कई सदियों में नहीं आया| गरीब से गरीब भी एक दिन का एक रुपया दे सकता है| आपकी दशा सुधारने कोई नहीं आएगा अगर आपने अपनी दशा सुधार की ठान ली तो केवल आधी सदी में ही आप दलित से राजा बन जाओगे| रुपया की भी छोड़ दो ये लोग अपना फ्री का वोट भी एक ही जगह पहले ही तय करके डालें तो हमारे दुश्मन ही हमारे वोट के लिए हमारे काम करने को भागे भागे फिरेंगे| संगठित होकर मेहनत करो सफल जरूर हो जाओगे|
    आपका ये विचार सुसंगत और भविष्य वर्धक है पर क्या आपने कभी सोचा है कि इस विचार को practically कैसे सिद्ध किया जाए , इस प्रकार पैसे को collect करने का केवल विचार करने से कुछ होता नहीं इसको अमली जामा पहनाने के लिए आपने क्या सोचा है | ज़रा तथागत बुद्ध के द्वारा प्रतिपादित समाज निर्माण और दान प्रक्रिया को समझें जिसका प्रयोग पुरोहित ब्राह्मण ने बड़े सुन्दर ढंग से किया है और आज भी कर रहा है वो पुरोहित अपने समाज को सदैव उच्च पराकाष्ठा में प्रतिस्थापित करने हेतु त्याग भी बहुत ही करता है | देखो पुरोहित कैसे अपने बच्चों को अपनी शिक्षा को देता जाता है और उनके कितने ही बच्चे भगवा वस्त्र पहन लेते हैं उनके दर्शन के नाम पर , तो आप ज़रा सोचो कैसे १ – १ रुपये का दान प्रतिदिन ही नहीं दिन में कई बार लिया जाता है , उसका आधार है भारत में धर्म और केवल अध्यात्म |

  5. बुद्धिस्ट योग है और बौद्ध भिक्खुओं के साथ सभी उन देशों में गायी जिन्होनें बौद्ध धर्म अपनाकर बौद्ध देश कहलाते हैं और जो योगासन पतंजलि ने बताये वो तो बहुत ही कम संख्या में हैं भगवान् बुद्ध ने इस विद्या को बिन्नोट अर्थात बिना किसी हथियार के सहारे जिस विद्या से आक्रमणकारी को परास्त किया जा सके । चीन में kung fu कहा गया जिसका अर्थ है कुंग अर्थात work or achievement of man और फु जो एक suffix है जिसका अर्थ है तीव्रता or intensity और जो आप लोग पतंजलि जो कि पुष्यमित्र शुंग का पुरोहित बना पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य वंश के अंतिम शासक बृहद्रथ मौर्य को धोखे से हत्या की और यहां तक की सम्राट बृहद्रथ के स्वामिभक्त अपने पोते का भी क़त्ल किया था पतंजलि के कहने पर कि धर्म की स्थापना हेतु ये आवश्यक है कि बौद्ध धर्म को उखाड़ फेंकने के लिए और पुरोहितवाद वैदिक सम्प्रदाय की स्थापना हेतु जबकि पतंजलि पहले बौद्धों का शिष्य बना और उनसे योग की कुछ कलाएं सीख कर बौद्धों का ही दुश्मन बन गया और फिर सिलसिला शुरू हुआ भिक्खुओं के कत्ले आम का एक बौद्ध के सिर की कीमत पुष्यमित्र शुंग ने एक स्वर्ण मुद्रा रक्खी उसके इस कत्ले आम के कारण बौद्ध राजा मिलिंद जिसका राज्य पंजाब हरियाणा अफगानिस्तान आज का पकिस्तान कश्मीर आदि थे और राजधानी पेशावर थी ने पुष्यमित्र शुंग पर आक्रमण कर दिया और मगध की जनता ने मिलिंद के आक्रमण को सुनकर पुष्यमित्र शुंग के खिलाफ विद्रोह भी कर दिया । पुष्यमित्रशुंग भागकर उज्जैन में जैन राजा की शरण ली और जब मामला शांत हुआ तब साकेत को अपनी राजधानी बनाया जिसे अयोद्धया कहा गया क्योंकि बिना किसी युद्ध किये उसे अपनी राजधानी बनाया ।।
    पतंजलि ने जो योग सूत्र नामक योग के बारे में लिखा वो आधा अधूरा है और वो खुद्द और आज के पुरोहित भी सति शब्द का वास्तविक अर्थ नहीं समझ पाये क्योंकि सति शब्द पालि भाषा का है और तथागत बुद्ध ने सति पट्ठान सुत्त में बड़े विस्तार से सति को समझाया है और उसका प्रैक्टिकल रूप भी समझाया ।
    इसीकारण बौद्धों के देशों में पतंजलि की बकवास को कोई सुनता नहीं क्योंकि बुद्धिस्ट आसन और ध्यान की सच्ची पद्यति जानते हैं ।

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