जानिये भगवान् बुद्ध कैसे अनात्म वादी और विभज्यवादी हैं…डॉ कौशल कुमार


|| नमो बुद्धाय ||   भवतु सब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता सब्ब बुद्धानुभावेन सदासोत्थि भवन्तु’ते ||     भवतु सब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता सब्ब धम्मानुभावेन सदासोत्थि भवन्तु’ते ||  भवतु सब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता सब्ब संघानुभावेन सदासोत्थि भवन्तु’ते ||

 

जम्मुद्वीप (प्राचीन भारत ) की सबसे पुरातन सभ्यता अभी तक जो खोजी गयी है वह सिन्धु घाटी की सभ्यता है | सिन्धु घाटी  सभ्यता में बहुत सारी सामग्री प्राप्त हुई है जैसे की मिट्टीके बर्तन , पीपल के पत्ते की चित्रकारी , हाथी ,सांड, टाइगर ,गैंडा आदि पशुओं की seals प्राप्त हुई हैं | एक चित्रकारी में योगिक मुद्रा में एक पुरुष बैठा है उसके चारो ओर ये चार पशु दिखाए गए हैं , उस समय की सभ्यता में जो पुरुष दिखाया गया है वो कोई शिव की मूर्ती नहीं है बल्कि बुद्ध की मूर्ती है , अब आप कहेंगे कि गोतम बुद्ध तो  सिन्धु सभ्यता के भी २००० से २५०० वर्ष हुए तो कैसे ये बुद्ध हैं |तो पढ़िए बुद्ध वचन सुत्त पीटक का एक ग्रन्थ दीघनिकाय उसमें भगवान् गोतम बुद्ध ने साफ़-२ कहा है कि मुझसे पूर्व कितने ही बुद्ध हो चुके हैं जिनमें ६ बुद्धों की जीवनी तो स्वयं गोतम बुद्ध ने बतायी है , पढ़ें महापदान सुत्त हिंदी एडिशन २०१० पेज १७६ – २२ वें बुद्ध विपस्सी ,२३ वें सिखी..,वेस्सभू ,ककुसंध ,कोणागमन ,कस्सप ,एवं  २८ वाँ मैं स्वयं गोतम बुद्ध | इसमें ९१ कल्प पूर्व विपस्सी बुद्ध हुए थे ऐसा भगवान् ने बताया है | और सिन्धु सभ्यता में सतिया की दो सील हैं १-जो आज प्रचलित है और २ सरी उसकी उल्टी जैसी की जर्मनी के फ्लैग पर है |

सतिया शब्द पुरातन प्राकृत भाषा का है जिसे बाद में भगवान् के मुख से सुव्यवस्थित रूप में सुत्तों के रूप में जब कहा गया तो प्राकृत भाषा को पालि कहा गया क्योंकि पालि का अर्थही होता है सूत्र | इसी सभ्यता में एक मूर्ती में एक स्त्री ने एक हाथ में चूड़ियाँ ऊपर तक पहनी हैं और एक हाथ में केवल दो , जो कि आज भी निम्न वर्ग की स्त्रियाँ राजस्थान में ऐसे ही चूड़ियाँ पहनती हैं जबकि उच्च जातियों की स्त्रियाँ दोनों हाथों में केवल दो-२ या अधिक पर कोहनी के नीचे तक ही पहनती हैं | इससे भी पता चलता है कि ब्राह्मण लोग सिन्धु सभ्यता को नष्ट करके प्राचीन भारत में आये  थे और वे इतने असभ्य थे कि उन्हें ठीक से साज श्रृंगार भी नहीं आता था , जब वे इस देश में वास करने लगे तो हमारी सभ्यता का तो असर आना स्वाभाविक था उनमें भी | वो लोग अग्निपूजक थे और हम सम्मा दृष्टि वाले थे तो अंगारी पर पानी डालकर पूजा करते थे ना कि हवन , जो आज भी हमारे देश में गाम -२ में प्रचलित है | तो भगवान् बुद्ध की ये बात कितनी सटीक है कि उनके पूर्व कितने ही बुद्ध हो चुके हैं | अब बात  आती है कि बुद्ध नास्तिक हैं , या अनीश्वरवादी :- तो देखिये पहले आप जानिये कि बुद्ध ना तो नास्तिक्वादी हैं ना ही अनीश्वरवादी बुद्ध हैं अनात्मवादी और विभाज्यवादी वे कहते हैं कि इस संसार(universe) में ३१ आयतन हैं और इन ३१ आयतनों में ३१ वाँ आयतन “न संज्ञा न असंज्ञा आयतन ” कहा जाता है जो materialistic नहीं है यही निराकार अनंत आयतन की लास्ट अवस्था है | भगवान् इससे आगे की अवस्था निब्बान की शिक्षा  भी देते हैं जिसे प्राप्त कर योगी अर्हत बन जाता है , फिर उसका कभी जन्म नहीं होता है – सभी दुखों से मुक्त अवस्था है यह |

बुद्ध ने कहा पौस्करसाती ब्राह्मण से कि तु क्या जानना चाहता है तो उसने कहा भगवान् मुझे तो आप बस ब्रह्म मार्ग ही बता दीजिये क्योंकि वह हमें पसंद भी है और पैतृक भी , तो भगवान् ने कहा कि पौस्करसाती क्या तूने कभी ब्रह्मा को देखा है या तेरे पुराने किसी ऋषि जैसे अष्टक , वामक, वामदेव , अंगिरा, भरद्वाज, वशिष्ठ , विश्वामित्र आदि ने देखने का वर्णन किया हो | पौस्करसाती कहता है कि नहीं — तो गोतम कहते हैं कि पौस्करसाती मैंने ब्रह्मा को अपनी आंख से देखा है और उस तक पहुँचने का म,आर्ग भी मैं जनता हूँ पर मैं उससे भी ऊपर के लोकों को भी जनता हूँ , पौस्करसाती कहता है बस आप मुझे ब्रह्म मार्ग ही बता दीजिये | तो सुन कह भगवान् कहते हैं कि ब्रह्म लोक को
पहुंचाने वाले ४ मार्ग हैं (१) मैत्री (२) करुणा(३) मुदिता(४) उपेक्खा | जब कोई मानुष या देव इन चार मार्गों को सिद्ध कर लेता है तो वह मृत्यु हो ब्रह्म लोक में उत्पन्न होता है ऐसा कहा भगवान् ने |

अब जानिये भगवान् कैसे अनात्म वादी और विभज्यवादी हैं — भगवान् कहते हैं यह संसार ६ धातुओं से मिलकर बना है (१) अग्नि(२) वायु(३) आपो(४)पृथ्वी(५) आकास (६) विज्ञान (=sense=consciousness) , हे भिक्खुओं मैं इस संसार  में इनके अतिरिक्त अन्य कोई धातु नहीं देखता | ref. अंगुत्तर निकाय | ये सारे के सारे धर्म (=धातु) अनित्य हैं (=unstable i.e. they change always there is no stay for a little bit time ) सभी रूप चाहे अदृश्य या दृश्य हों एक fundamental unit = अट्टकलाप से निर्मित हैं इसे ही अभिधम्म में आठ विनिब्भोग रूप कहा गया है | भगवान् जीवित प्राणी को नामरूप कहते हैं , रूप=अग्नि+वायु+जल+पृथ्वी का संयोग है आकाश धातु में और नाम कहा क्योंकि अनात्म वादी हैं i.e.  नाम=not+self=वेदना संज्ञा संस्कार विज्ञान |

 

और ये आठ के आठ ही सदा परिवर्तनशील हैं इसलिए भगवान् को अनित्यवादी कहा जाता है और रूप तथा विज्ञान को भी उसके न्यूनतम अवस्थाओं में explain करते हैं इसलिए विभाज्य्वादी कहा जाता है | तो भाईयों क्यों भगवान् की निंदा करते हो उन्हें नास्तिक वादी कहकर या अनीश्वर वादी कहकर | अब आपका कहना है कि लोगों को बौध धर्म धर्म के रूप में नहीं मानना चाहिए ambedkarism  के रूप में मानना चाहिए तो भैया कौन से लोक से आये हैं आप और कौन सी दुनिया में रहते हैं कि जो आप इतने मोह से भरे हैं , ये भी नहीं जानते कि बुद्ध ने nonsectorian relegion(=धम्म=धर्म ) बताया है ना कि सम्प्रदाय (= relegion) | भाषाओं के बदल जाने से किसी वस्तु का धर्म(=character=गुण ) थोड़े ही बदल जाता है | तो धम्म कहो या धर्म एक ही बात है , हाँ ये बात और कि आजकल लोग धर्म को सम्प्रदाय और सम्प्रदाय को ही धर्म कहने लगे हैं  क्योंकि किसी भी सम्प्रदाय में ज्यादातर लोग मोह-मूढ़ता से भरे हैं और अपने-२ सम्प्रदायों की रूढ़ियों में बंधे हैं बेचारे हैं क्या करें | पर एक बात और धर्म का भी कोई तो सम्प्रदाय बनाना पडेगा ही नहीं तो सारे फूल अलग-२ होंगे और जब कभी भी हवा का झोंखा या आंधी आएगी तो ये मोती बिखर जायेंगे और गर्त में चले जायेंगे , पर जब एक माला में होंगे तो बिखरेंगे नहीं जहां जायेंगे साथ ही जायेंगे  और servive करते रहेंगे खुशबू फैलाते रहेंगे | अब लो मूर्ती क्या है ? मूर्ती है अभिव्यक्ति का तीसरा प्रकार –(१) वाणी (२) लिपि(३) चित्रकला=मूर्तिकला |

तो भैया जरा देखिये बुद्ध द्वारा प्रतिपादित ध्यान साधना :- ध्यान के पाँच अंग हैं (१)वितक्क(२) विचार(३) पीति (४)वेदना(५) एकग्गता | और ध्यान को प्राप्त करने दो मार्ग भगवान् ने बताये हैं १-समथ यानिक- जो समथ भावना के मार्ग पर चलकर २सरी – विपस्सना  भावना द्वारा अभिज्ञा को प्राप्त करता है | १ली में कसिण साधना की जाती है जब साधक कसिण साधना में पूर्णता प्राप्त कर लेता है तो वह विपस्सना साधना द्वारा वह रुपावचर (साकार ब्रह्म) अवस्था —अरूपावचर (अरूप ब्रह्म) अवस्था — लोकुत्तर चित्तावस्था(अर्हत) को प्राप्त करता है one bye one . अतः बाद में ध्यान को सरल बनाने हेतु कुछ भिक्खुओं ने कसिण साधना को धर्म कि तीसरी प्रकार वाली व्याख्या
(चित्रकला=मूर्ती) पर ध्यान लगवाकर अल्पबुद्धि मानुषों के लिए भी मार्ग प्रशस्त किया था | इसमें भगवान् के मार्ग को दोष देना या उन भिक्खुओं को जो करुणा वश जगत का भला ही कर रहे थे | अब लोग मार्ग पर ना चलें अन्धविश्वासी होकर आरती उतारने लगें मूर्ती की तो कोई भी गुरु या भगवान् क्या करे |

जरा भगवान् बुद्ध के वचनों को जानिए पहले  कि वो क्या कहते हैं भगवान् बुद्ध ईश्वर के बारे में चुप नहीं हैं । भगवान् के 10 अव्याकृत हैं अर्थात जिन्हें वाणी से या अन्य पंचिन्द्रियों से नहीं व्यक्त किया जा सकता इसलिए अव्याकृत हैं क्योंकि इन्द्रियातीत अवस्था में इन दस अव्याकृतो को जाना जा सकता है और वह अवस्था एक अर्हत ही प्राप्त कर सकता है। ये दस अव्याकृत हैं- 1 लोक नित्य है 2लोक अनित्य है 3 लोक शांत है 4 लोक अनंत है 5जीव  और शरीर एक हैं 6 जीव और शरीर अलग अलग हैं 7 तथागत मरने के बाद रहते हैं 8 तथागत मरने के बाद नहीं रहते हैं 9 तथागत मरने के बाद रहते भी हैं नहीं भी रहते हैं 10 तथागत मरने के बाद न रहते हैं न नहीं रहते हैं । तो ये तथागत के 10 अव्याकृत अर्थात भगवान् ने भिक्खुओं को बताया कि इन्हें समझने हेतु इन्द्रियातीत अवस्था की समाधि को प्राप्त करके ही समझा जा सकता है और किसी भी इंद्री से इन दस को
व्यक्त नहीं किया जा सकता । यहाँ ईश्वर आदि के बारे में भगवान् मौन नहीं है बल्कि स्पष्ट कहा है भगवान् ने पढ़ें संखारुप्पत्ति सुत्त मज्झिम निकाय और पढ़ें अभिधम्म पिटक कि भगवान् ने बताया है यह लोक 8 नरक लोक 1 मनुष्य लोक 6 देव लोक 16 ब्रह्म लोक साकार वाले and 4 निराकार ब्रह्म अनंत आयतन वाला है। और जो मैं धर्म बताता हूँ वह इन सभी मरणशील लोक और इनमे रहने वाले नश्वर प्राणियों से भी ऊपर  की अजर अमर अवस्था को समझाने वाला और पहुंचाने वाला धर्म है । वह मार्ग मैंने स्वयं खोजा है । यह संसार ६ धातुओं से मिलकर बना है १-अग्नि २-वायु ३-जल ४- पृथ्वी ५-आकाश ६- विज्ञान । और जीवित शरीर बना है रूपनाम से रूप बना है अग्नि वायु जल पृथ्वी से और नाम बना है वेदना संज्ञा संस्कार विज्ञान से मिलकर । रूप की सबसे छोटी इकाई है अट्टकलाप । तो भगवान् ने कहा है कि जगत करता कोई नहीं और ये  लोकपाल (ईश्वर=देव) भी मरणशील हैं। अपने-२ कर्म फल भोगकर मर जाते हैं । सबसे बड़ा है मन पर मन भी मरणशील है अर्थात परिवर्तनशील so everything is unstable in this universe always all things become change without any stay a little bit . अतः भगवान कहते हैं तुम्हारे बदले न कोई कर्म करता है और न कोई फल भोगता है ।

तभी तो धम्मपद में कहा भगवां ने

” मनोपुब्बंगमा धम्मा मनोसेट्ठा मनोमया ”  ।।भवतु सब्ब मंगलं ||

और जरा ये भी जान लें तो अच्छा होगा कि  भगवान और इश्वर एक ही बातें नहीं हैं भगवान् कहे जाते हैं क्योंकि उन्होंने राग दोस मोह को सदा के लिए भग्न कर दिया है । इसीलिए कहा भी है पालि में — भग्ग रागो भग्ग दोसो भग्ग मोहो इतपि सो भगवां अरहं सम्मा सम्बुद्धस्स ।। एवं इश्वर अर्थात किसी लोक का स्वामी / राजा / सबसे बड़ा अधिकारी । और भगवान् के धर्म में सर्वशक्ति मान है मन this is the lord of all in this world whatever appears first that appears in firstly in मन और मन पर समय का भी

कोई वश नहीं चलता अभी यहाँ और अभी चन्द्रमा पर ; तो देखिये दोनों ही बातो करने में मन को बराबर वक़्त लगता है क्योंकि मन से तेज़ संसार में कुच्छ भी नहीं । ओर इससे सुस्त भी कोई नहीं चाहे तो शून्य हो जाये ।

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