भारत में मूर्ती पूजा का इतिहास …लाला बौद्ध

buddhaप्राचीन अवैदिक मानव पहले आकाश, समुद्र, पहाड़, बादल, बारिश, तूफान, जल, अग्नि, वायु, नाग, सिंह आदि प्राकृतिक शक्तियों की शक्ति से परिचित था और वह जानता था कि यह मानव शक्ति से कहीं ज्यादा शक्तिशाली है, इसलिए वह इनकी प्रार्थना करता था. बाद में धीरे-धीरे इसमें बदलाव आने लगा. वह मानने लगा कि कोई एक ऐसी शक्ति है, जो इन सभी को संचालित करती है.

पूर्व वैदिक काल में वैदिक समाज जन इकट्ठा होकर एक ही वेदी पर खड़े रहकर ब्रह्म (ईश्वर) के प्रति अपना समर्पण भाव व्यक्त करते थे. वे यज्ञ द्वारा भी ईश्वर और प्रकृति तत्वों का आह्वान और प्रार्थना करते थे.

वेद काल में न तो मंदिर थे और न ही मूर्ति. इन्द्र और वरुण आदि देवताओं की स्तुतियां जरूर होती है, लेकिन उनकी मूर्तिपूजा नहीं होती थीं.
भारत में वैदिक काल के पतन और अनीश्वरवादी धर्म के उत्थान के बाद मूर्तिपूजा का प्रचलन शुरू हुआ.

अथर्ववेद की रचना के बाद वेदों में ईश्वर उपासना के दो रूप प्रचलित हो गए- साकार तथा निराकार. निराकारवादी प्रायः साकार उपासना या मूर्तिपूजा का विरोध करते हैं, पर वे यह भूल जाते हैं कि ऋषि-मनीषियों ने दोनों उपासना पद्धतियों का निर्माण मनुष्य के बौद्धिक स्तर की अनुकूलता के अनुरूप किया था.

बौद्धकाल में बुद्ध और महावीर की मूर्ति‍यों को अपार जन-समर्थन मि‍लने के कारण विष्णु, राम और कृष्ण की मूर्तियां बनाई जाने लगीं.
शिवलिंग की पूजा का प्रचलन पुराणों की देन है. शिवलिंग पूजन के बाद धीरे-धीरे नाग और यक्षों की पूजा का प्रचलन हिन्दू-जैन धर्म में बढ़ने लगा.

मूर्तियां तीन तरह के लोगों ने बनाईं-
(1) जो वास्तु और खगोल विज्ञान के जानकार थे, उन्होंने तारों और नक्षत्रों के मंदिर बनाए. ऐसे दुनियाभर में सात मंदिर थे.
(2) उन्होंने जो अपने पूर्वजों या प्रॉफेट के मरने के बाद उनकी याद में मूर्ति बनाते थे.
(3) जिन्होंने अपने-अपने देवता गढ़ लिए थे. हर कबीले का एक देवता होता था. कुलदेवता और कुलदेवी भी होती थी.

शोधकर्ताओं के अनुसार अरब में मक्का में पहले बुद्ध की मूर्तियां रखी हुई थी और संपूर्ण अरब ही मूर्तिपूजकों का स्थान था. तुर्किस्तान पहले नागवंशियों का गढ़ था. यहां नागपूजा का प्रचलन था. उत्तरी तुर्किस्तान को पुराणों में काम्बोज कहा गया है. तुर्क कश्यप गोत्रिय नागवंशी हैं. भारत में तुर्कों ने राज किया है.

कृष्ण के काल में लोग इन्द्र नामक देवता से जरूर डरते थे. कृष्ण ने ही उक्त देवी-देवताओं के डर को लोगों के मन से निकाला था.

हिन्दू धर्म के धर्मग्रंथ वेद, उपनिषद और गीता भी मूर्ति पूजा को नहीं मानते हैं तो हिन्दू क्यों मूर्ति या पत्थर की पूजा करते हैं और इस पूजा का प्रचलन आखिर कैसे, क्यों और कब हुआ?

बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद मूर्तिपूजा का प्रचलन बढ़ा और हजारों की संख्या में संपूर्ण देश में बौद्ध विहार बनने लगे. जिसमें बुद्ध की मूर्तियां रखकर उनकी पूजा होने लगी. इन मंदिरों में हिन्दू भी बड़ी संख्या में जाने लगा जिसके चलते बाद में राम और कृष्ण के मंदिर बनाए जाने लगे और इस तरह भारत में मूर्ति आधारित मंदिरों का विस्तार हुआ.

मनमाने मंदिरों से मनमानी पूजा-आरती आदि कर्मकांडों का जन्म हुआ, जो वेदसम्मत नहीं कहे जा सकते. इनको ब्राह्मण पुरोहितों ने अपने स्वार्थ में गढ़वाये हैं. परिणाम आपके सामने है. भारत में सबसे अधिक मूर्तियां हैं, मंदिर हैं, भारत के लोग सबसे ज्यादा अंधश्रद्धालु हैं, सबसे ज्यादा अंधविश्वासी हैं, सबसे ज्यादा अज्ञानी और निर्धन हैं.

वैदिक धर्मी, कब सनातनी बन गये? कब हिन्दू बन गये? आपको इसका कहीं भी स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता. क्योंकि ये एक छलावा है, षड़यंत्र है. सबसे पहले देश में बुद्ध की मूर्तियां और बुद्ध-विहार अस्तित्व में आये. पुष्यमित्र शुंग के शासन में आने के बाद बुद्धविहारों को मंदिरों में तथा बुद्ध की मूर्तियों को विष्णु, राम आदि की मूर्तियों में बदला गया, तथा नये-नये मंदिरों का असीमित निर्माण शुरू हुआ जो आज भी जारी है.

lala baudhजय भीम

लाला बौद्ध