बहुजन विचरचरा या बौद्ध धम्म की विचाधारा – “ईश्वर और धर्म मुक्त नया युक्त समाज” के विषय को उठाती बॉलीवुड फिल्म ‘PK’ में उठाये गए दो सवालों पर एक समीक्षा ….Bharat Aman


pk amirफिल्म PK में तपस्वी महाराज (सौरभ शुक्ला) क्लाइमेक्स में PK से दो बहुत ही जबरदस्त सवाल पूछता हैं-

1. अगर किसी व्यक्ति को भगवान (इश्वर) को मानने से ( माथा टेकने से, टिका लगाने से या धागा बांध लेने से ) जीने की उम्मीद मिलती है तो तुम कौन होते हो उसकी इस उम्मीद को छिनने वाले ?

 

2. अगर लोगों से तुम उसका भगवान छिन लेना चाहते हो तो यह बताओ उसके बदले में तुम उन्हें क्या दोगे ??

 

PK इस सवाल का जवाब नास्तिकता से खुद को बिलकुल अलग रखते हुए निराकार एकेश्वरवाद से देता है और प्रचलित मानव निर्मित इश्वरीय स्वरुपो को झूठा क़रार देता है। पर इस सवाल के जरिए धर्म अपने सबसे सकारात्मक और मजबूत पक्ष को आपके सामने लाता है। मेरे विचार से इस सवाल का जवाब हर नास्तिक को देना चाहिय।

मेरा यह मानना है कि प्रश्न कर्ता ने अपने प्रश्न में खुद ही ईश्वर को मानने की बड़ी वजह मनुष्य की दुर्बलता को बताया है। प्रश्न जब जीने का हो या यु कहे की Survival का हो तो प्रकृति का बड़ा सीधा सा नियम है वो सबकुछ आजमाओ जिससे तुम्हारी या तुम्हारे कुनबे की जान बच सकती हैं वो हर चीज़ उचित है जो तुम्हारे या तुम्हारे कुनबे की जान बचा सकती है और अनुचित वो हर चीज़ है जो तुम्हारे Survival के chances कम करती हो। अगर किसी के अन्दर Survive करने की उम्मीद अपने आँगन में खड़े पेड़ को देखने से बढती है या गाँव के पहाड़ी के सामने हाँथ जोड़ने से या किसी ईश्वर के मंदिर में माथा टेकने से बढती है तो यह सारे माध्यम भी अनुचित नहीं दिखाई पड़ते। तो फिर किसी कल्पना पर विश्वास करना कब अनुचित बन जाता है। इस प्रश्न का उत्तर भी प्रकृति देती है- जब किसी कल्पना पर विश्वास आपके Survival के chances को कम करने लगता है या यु कहे की आपके और आपके कुनबे के उतोरोत्तर विकास में बाधक बन जाता है तब उस कल्पना पर विश्वास करना आपके और आपके कुनबे के लिए अनुचित बन जाता है। यह बिलकुल कुछ ऐसा है की झूठ आपको थोड़े समय के लिए सहारा तो दे सकता है परन्तु उसे ही सत्य मान लेना आपको सही रास्ते से दूर ले जाता है जिससे आपका उतोरोत्तर विकास रुक सकता है। इसलिए कब किसी चीज़ से उम्मीद करनी चाहिए और कब छोड़ देनी चाहिय इसका उत्तर इस प्रकार दिया जा सकता है और एक इंशान होने के नाते मेरा फ़र्ज़ है की मैं लोगो को यह बात बताऊ।

अब रहा दूसरा प्रश्न तो मेरा मानना है की ईश्वर की अवधारणा मात्र एक आकार या निराकार परिकल्पना नहीं है बल्कि एक वस्तृत दर्शन का अंग होता है। यह दर्शन आपके अनसुलझे प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करता है। आप के लिय एक संस्कृति का निर्माण भी करता है और बतलाता है की आपके जीवन जीने का ढंग कैसा होना चाहिए। इस इश्वरीय दर्शन जिसे धर्म भी कहते है ने आरंभिक काल में मानव सभ्यता के विकास में अपनी भूमिका भी अवश्य निभाई होगी। परन्तु वर्तमान समय में क्या यह दर्शन मानव सभ्यता के विकास की असीम संभावनाओ मूर्त रूप दे सकता है ?? क्या इसमे ऐसी क्षमता दिखती है ??
जब हम इन प्रश्नों का विश्लेषण करते है तो पाते है इस दर्शन ने मध्यकाल से लेकर वर्तमान समय तक अनेको जाने ले ली है। इतना ही नहीं आज हम देखते है विश्व में वे समाज या देश ही मानव सभ्यता को नई उचाईयो तक ले जा रहे है जिन्होंने खुद को धार्मिक मामलो में सबसे ज्यादा उदार और सहिशुष्ण रखा है और जो देश या समाज इन मामलों में सबसे ज्यादा कट्टरपंथी है वहां सभ्यता का विकास रुक सा गया है और कही-कही तो विपरीत दिशा में जा रहा है जिसकी सबसे बड़ी वजह है झूठ की बुनियाद से चिपके रहना। अतः इस दर्शन को मानवता जो मनुष्य होने का सबसे बड़ा दर्शन है से replace कर देना चाहिए । मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए मनुष्य का नैतिक प्रयास ही काफी है किसी ईश्वर की जरुरत नहीं है अतः मानवतावादी संस्कृति में नैतिकता का वही स्थान होता है जो ईश्वर का धर्मो में होता है।

मैंने उत्तर खोजने की पूरी कोशिश की है पर शायद इन प्रश्नों का और भी बेहतर ढंग से जवाब दिया जा सकता है। ‪#‎PK‬

https://www.facebook.com/atulya.bharat.165/posts/390266184471669

==================================================================================================

1. अगर किसी व्यक्ति को भगवान (इश्वर) को मानने से ( माथा टेकने से, टिका लगाने से या धागा बांध लेने से ) जीने की उम्मीद मिलती है तो तुम कौन होते हो उसकी इस उम्मीद को छिनने वाले ?

(न्याय की उम्मीद ही असली उम्मीद है जब न्याय नहीं मिलता तब ईश्वर की तरफ इंसान बढ़ता है .ठीक है करो जो करना है पर धम्म के राज में धर्म एक व्यक्तिगत मामला होगा सार्वजानिक नहीं, कोई भीड़ कोई पूजाघर कोई शोरशराबा नहीं चाइये सिर्फ न्याय व्यस्था चाहिए\ठीक है आप संबैधानिक न्याय और ईश्वर में से एक को चुनने के लिए आज़ाद हो, अगर ईश्वर चुनोगे तो आपको कोई भी संवेधानिक सरक्षण नहीं मिलेगा जो भी लेना है अपने ईश्वर से लो  )

2. अगर लोगों से तुम उसका भगवान छिन लेना चाहते हो तो यह बताओ उसके बदले में तुम उन्हें क्या दोगे ??

(हम देंगे धम्म या संविधान )

ईश्वर है या नहीं इस सवाल पर सदियों से चर्चा और लड़ाइयां हो रही हैं, ईश्वर अभी तक तो नहीं मिला| हाँ  इस विवाद में कई इंसानों और जीवों ने अतः दुःख भोग है , क़त्ल किये गए हैं| जब तक ईश्वर नहीं मिलता तब तक हमें मिल जुल कर अपनी समस्याओं का समाधान करते हुए अच्छा जीवन बिताना चाहिए यही है इन सवालों का जवाब| किसी के घर में आग लगी हो तो वो पहले आग बुझाएगा या उस आग  लगाने वाले को ढूंढेगा, इसी तरह मानवता को बहुत से दुःख हैं तो हमें उन दुखों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए न की  इन दुखो के तथाकथित करता धर्ता ईश्वर को खोजने में निकलना चाहिए| इतनी सदियों से नहीं मिला तो अब क्या मिलेगा| दुनियां  के धर्म कहते हैं की ईश्वर ने दुनिया को बनाया पर बौद्ध धम्म में हम जानते और तब मानते हैं की इंसान की बुद्धि ने ईश्वर को बनाया और कमल  की बात  देखिये  ध्यान रहे “जिन्होंने ईश्वर को बनाया है उनका ईश्वर भी बिल्कुम उनके जैसा है वे अन्यायी हैं तो उनका ईश्वर भी अन्यायी है वे मजलूम जैन तो उनका ईश्वर भी मजलूम है ”

for further reading on buddhism point of view…

https://samaybuddha.wordpress.com/2014/08/27/buddhism-is-not-to-answer-paranormal-question-it-is-reserch-to-end-human-sorrows-osho/

https://samaybuddha.wordpress.com/where-was-your-god-before-ambedkar-constitution-protection/

2 thoughts on “बहुजन विचरचरा या बौद्ध धम्म की विचाधारा – “ईश्वर और धर्म मुक्त नया युक्त समाज” के विषय को उठाती बॉलीवुड फिल्म ‘PK’ में उठाये गए दो सवालों पर एक समीक्षा ….Bharat Aman

  1. 1.jhoothi ummid insaan ko ishwar k rup me kyu de rahe ho??kisi bhi baat ka aadhar ager jhooth hai toh us se insaaniyat ka nuksaan hi hoga.bhale abhi lage ki fayeda hai but aage manavata ka nuksaan hai is jhoothi ummid se.
    2.ishwar k badle me hum naitik rup se shshakt free insaan de sakte hai jo naitikta aur manavata k saayh hoga.insaan ko aap free toh chhod k dekhe.abhi bhi insaan ne apni budhhi ka pura istemaal nahi kiya hai aur insaan ki swatantrata me sabse bada badhak god,ishwar ,allah hi gai.

    • एलियन ‪#‎पीके‬ तर्क करके बुद्धि का उपयोग करता है इसीलिए उसके पीछे सभी धर्मो के ठेकेदार पड़े हुए है. लेकिन आपने देखा होगा एक सीन में पीके को बौद्ध भिक्षु के साथ सफर करते हुए दिखाया है. इसका मतलब यही हुआ कि मात्र धम्म पे चलने वाले लोग ही पीके का समर्थन कर रहे है…….
      अगर यह स्पष्ट रूप के दिखाया होता तो सारे धर्म के ठेकेदारो की पोल खुल गई होती और सब नंगे हो गए होते ‪#‎PK‬ पर बौद्धिजम का प्रचार करने का आरोप लगा होता……
      भगवान का अस्तित्व दिखाना यह डायरेक्टर की मज़बूरी है. क्योंकि भगवान की संकल्पना को मानाने वाले मुस्लिम,
      हिन्दू, ईसाई, जैन, सिक्ख सब है……
      लेकिन मात्र बौद्ध के अनुयाई ही भगवन की संकल्पना को नहीं मानते और हर चीज़ को विज्ञान की कसौटी पर तौलते है, ये बात इस मूवी से स्पस्ट होती है और इसे सभी ने माना. आज एक बार फिर ये साबित हुवा “सत्यमेव जयते” इसका अर्थ है : सत्य ही जीतता है । सत्य की ही जीत होती है । 250 ई.पू. में सम्राट अशोक द्वारा बनवाये गए सिंह स्तम्भ के शिखर से लिया गया यह वाक्य साबित करता है की धम्म ही सत्य है.
      और अगर तुम्हे सत्य के मार्ग पर चलना है, तो PK जैसे ही हर किसी को धम्म पर चलने वाले बौद्ध भिक्षु के साथ सफर करना होगा….
      जय भीम, नमो बुद्धाय…………:):):):):)

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s