महाबोधि विहार गया बिहार (काश इसपर अम्बेडकरवादी बौद्धों का भी हक़ होता)

baudh gayaमहाबोधि विहार :

यह विहार मुख्‍य विहार के नाम से भी जाना जाता है। इस विहार की बनावट सम्राट अशोक द्वारा स्‍थापित स्‍तूप के समान हे। इस विहार में बुद्ध की एक बहुत बड़ी मूर्त्ति स्‍थापित है। यह मूर्त्ति पदमासन की मुद्रा में है। यहां यह अनुश्रुति प्रचिलत है कि यह मूर्त्ति उसी जगह स्‍थापित है जहां बुद्ध को ज्ञान निर्वाण (ज्ञान) प्राप्‍त हुआ था। विहार के चारों ओर पत्‍थर की नक्‍काशीदार रेलिंग बनी हुई है। ये रेलिंग ही बोधगया में प्राप्‍त सबसे पुराना अवशेष है। इस विहार परिसर के दक्षिण-पूर्व दिशा में प्रा‍कृतिक दृश्‍यों से समृद्ध एक पार्क है जहां बौद्ध भिक्षु ध्‍यान साधना करते हैं। आम लोग इस पार्क में विहार प्रशासन की अनुमति लेकर ही प्रवेश कर सकते हैं।

इस विहार परिसर में उन सात स्‍थानों को भी चिन्हित किया गया है जहां बुद्ध ने ज्ञान प्राप्‍ित के बाद सात सप्‍ताह व्‍यतीत किया था। जातक कथाओं में उल्‍लेखित बोधि वृक्ष भी यहां है। यह एक विशाल पीपल का वृक्ष है जो मुख्‍य विहार के पीछे स्थित है। कहा जाता बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्‍त हुआ था। वर्तमान में जो बोधि वृक्ष वह उस बोधि वृक्ष की पांचवीं पीढी है। मंदिर समूह में सुबह के समय घण्‍टों की आवाज मन को एक अजीब सी शांति प्रदान करती है।

मुख्‍य विहार के पीछे बुद्ध की लाल बलुए पत्‍थर की 7 फीट ऊंची एक मूर्त्ति है। यह मूर्त्ति विजरासन मुद्रा में है। इस मूर्त्ति के चारों ओर विभिन्‍न रंगों के पताके लगे हुए हैं जो इस मूर्त्ति को एक विशिष्‍ट आकर्षण प्रदान करते हैं। कहा जाता है कि तीसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व में इसी स्‍थान पर सम्राट अशोक ने हीरों से बना राजसिहांसन लगवाया था और इसे पृथ्‍वी का नाभि केंद्र कहा था। इस मूर्त्ति की आगे भूरे बलुए पत्‍थर पर बुद्ध के विशाल पदचिन्‍ह बने हुए हैं। बुद्ध के इन पदचिन्‍हों को धर्मचक्र प्रर्वतन का प्रतीक माना जाता है।

बुद्ध ने ज्ञान प्राप्‍ित के बाद दूसरा सप्‍ताह इसी बोधि वृक्ष के आगे खड़ा अवस्‍था में बिताया था। यहां पर बुद्ध की इस अवस्‍था में एक मूर्त्ति बनी हुई है। इस मूर्त्ति को अनिमेश लोचन कहा जाता है। मुख्‍य विहार के उत्तर पूर्व में अनिमेश लोचन चैत्‍य बना हुआ है।

महामानव गौतम बुद्ध के बताये मार्ग को जनसामान्य तक कैसे पहुंचाएं….डॉ कौशल कुमार

dharm nahin karm acchasamaybuddha.wordpress.com पर ज्ञानवर्धक एवं विश्लेशानात्मक लेख पढ़कर अत्यंत हर्ष भी होता है । परन्तु एक बात जिस पर भारतीय बुद्ध सम्प्रदाय को बड़ा ही गहन मंथन करना चाहिए कि कम से कम ये लोग जो निचले तबके हैं उनमें एक यह भाव जगाना कितना महत्वपूर्ण होगा कि वे समझें इस बात को कि धर्म को जानना कितना महत्वपूर्ण है । क्योकि धर्म को जाने बिना तो मनुष्य दूसरों की अध्यात्मिक (=मानसिक ) गुलामी ही
करने पर मजबूर रहता है और उसकी आनेवाली संतानों में भी उन्नति की कोई अभिलाषा उत्पन्न नहीं होने पाती । मैंने ये अनुभव किया कि व्यक्ति यदि नास्तिक विचार वाला है या हो गया है तो वह इस भौतिक जगत में उन्नति कर सकता है परन्तु इस बात की भी अत्यधिक संभावना है कि उसकी आने वाली पीढियां उसके विचारों पर ना चल पायें और फिर सत्काय दृष्टि वाली मान्यता में फंस जाएँ तथा अन्धविश्वासी हो
अपनी उन्नति को आत्मा-परमात्मा के सिद्धांत वाली दृष्टि में फंसकर भाग्यवादी बन जाएँ । तो विषय ये महत्पूर्ण है कि इन अंधश्रद्धा में फंसी जनता को निकालने का क्या उपाय है हमारे देश भारत में । काफी मंथन के बाद मैंने ये पाया कि इनके भीतर शिक्षा के साथ -२ अध्यात्मिक शिक्षा भी देने की जरूरत है इसका एक तरीका ज्यादा बेहतर ये ही हो सकता है कि लोगों को कर्म और कर्मफल के सिद्धांत को
बताया जाए और धर्म को धार्मिक कथाओं द्वारा लोगों को समझाएं जैसा कि स्वयं भगवान् बुद्ध किया करते थे । बुद्ध ने अपने विचारों को मनवाने के लिए उपाय कौशल्य का प्रयोग करते हुए तीन प्रकार से धर्म की व्याख्या किया करते थे १-कथा सूत्रों द्वारा २-सूत्रों की व्याख्या को धार्मिक कहानी में परिष्कृत करके ३-धर्म के गूढ़ विषय को बिल्कुल खोलकर सूक्ष्म व्याख्या द्वारा । ऐसा उन्होंने
इसलिए किया क्योंकि संसार में तीन प्रकार की समझ वाले लोग सामान्यतया हैं १-जो समझना नहीं चाहते बस अध्यात्मिक गुरु के मूह से जो शब्द निकल गए वो उनके लिए पूजनीय बन जाते हैं । २-कुछ जो उन सूत्तों को सामान्य व्यवहार जो समाज में प्रचलित हैं उनसे मिलान करके ही मानेंगे । ३-तीसरे वे जो धर्म की वास्तविकता को समझना चाहते है उसके गूढ़ तथ्यों को जाने बिना वे नहीं रह सकते । तो जैसा उपासक
की प्रकृति हो उसको उसी रूप में मार्ग देना चाहिए । किसी नएव्यक्ति को अपने विचार तो बताएं पर उसकी पूर्व श्रद्धा पर एकदम चोट ना करें उसके विचारों को अपने विचारों में लपेट लें और उसे विश्वास दिला दें कि आप जो कह रहे हैं उसका अनुभव किया आपने तो ही कह रहे हैं । तो वो आपकी बात माने उसके लिए एक शांत ,ज्ञानी और अध्यात्म को गहराई से जानने और समझाने वाले गुरु की सहायता तो चाहिए ही
क्योंकि भारत के लोगों में जो सदियों-२ के लम्बे सफ़र के कारण धार्मिक अंधविश्वास के बीज हैं उनको नास्तिक वाद या केवल विज्ञान के बल पर नहीं मिटाया जा सकेगा । और बहुजन ऐसे ही इस पुरोहितवाद के चक्कर में फंसा रहेगा ।  ।। भवतु सब्ब मंगलं ।।

 

वास्तव में मैंने ये देखा अभी तक कि आज के समय में हमारे देश में जो भी ज्यादातर बौद्ध धम्म को मानने वाले लोग हैं वे अधिक्तर नास्तिकवाद की बातें करते हैं | सदैव ही inferiorty काम्प्लेक्स से ग्रसित देखे जाते हैं | सदैव ही धम्म मार्ग को बताने की शुरुवात हिन्दू धम्म सम्प्रदाय अथवा ईश्वरवाद की बुराइयों से करते हैं |

 

अपनी ऊर्जा बिना वजह ही वेदिक विचारधारा को पुनः-२ बतानें में लगाते रहते हैं , सदा ही ब्राह्मण की बुराई करते फिरते हैं और ये भी नहीं समझ पाते की उनमें खुद कितना ब्राह्मणवाद भरा पड़ा है |आपने देखा होगा कि भारत वर्ष क्या दुनिया में कहीं भी लोग अपने नाम के आगे ब्राह्मण शब्द को सर नेम के रूप में प्रयुक्त नहीं करते हैं क्योंकि आपको पता होना चाहिए कि ब्राहमण कोई जाति भी नहीं है वह तो एक अवस्था है और मुझे नहीं लगता कि ब्राह्मण अवस्था को प्राप्त मनुष्य भी यहाँ भारत में कोई है अरहत अवस्था का तो क्या होगा ?और सम्प्रदाय तो सारे के सारे ही मुझे पाखण्डवाद का अड्डा दिखाई देते हैं परन्तु फिर भी मनुष्य को किसी ना किसी सम्प्रदाय में तो रहना ही पड़ता है / जीना है | तो मान लिया कि यदि आप बुद्ध में श्रृद्धावान हो गए हैं तो बौद्ध सम्प्रदाय में चले गए होंगे परन्तु यदि आप बौद्ध सम्प्रदाय की भी सभी बातों पर श्रृद्धावान नहीं हैं तो बुद्ध धम्म को तो बिलकुल भी समझने की चेष्टा कर ही नहीं रहे | यदि किसी को लगे कि यह मार्ग अच्छा है और इससे मेरा भला हो रहा है और में इसे दूसरों को भी बताऊँ तो सोच तो अच्छी है पर यदि बताने का और समझाने में आपके उपायकौशल्य (acceptable representation) नहीं है तो सारी ऊर्जा व्यर्थ ही गवा रहे हो कि आपकी बात को लोग समझ ही नहीं रहे |

महामानव गौतम कहते हैं कि दूसरे क्या गलत मान्यता रखते हैं उस पर बिना वजह बिना किसी के पूछे क्रश भाषा में व्याख्यान नहीं करना चाहिए क्योंकि आपकी बात को पूर्ण रूप से जिसने अभी स्वीकार भी नहीं किया है तो वह अपनी पूर्व श्रृद्धा के प्रति कैसे आपके द्वारा बतायी बुराई स्वीकार करेगा | तो लोगों को उनके अंधविश्वास से बाहर निकालने के लिए सर्वप्रथम अपनी बात को अध्यात्मिक वाक्य से ही शुरू करें तो वो आपकी बातों पर attention जरूर देगा | बहुत सारे लोग जो अपने को बौद्ध कहते फिरते हैं उन लोगों को मुझे नहीं लगता कि बुद्ध में कोई श्रृद्धा है वे तो बस अपनी हीनता वाले भाव को छिपाने के लिए अपनेआप को बौद्ध कहते फिर रहे हैं | और सीधे-२ कटुवाणी हिंदु मूर्तियों पर निकालकर करते हैं |

उन्हें पता नहीं कि ये जो मूर्तियाँ आज दिख रही हैं भारत में तो ये शुरुवात सर्वप्रथम बौद्ध सम्प्रदाय ने ही शुरू की थी | मूर्ती वास्तव में है क्या पहले ये तो पता करें और देखिये पुरोहित वर्ग को कि वो किस प्रकार दूसरों के बनाए महल पर चढ़कर उसे अपना बताने लगता हैं यह भी एक चातुर्य है भाई कि आप लोग तो अपना भी खो देते हो और दुसरे तुम्हारा पैतृक / पुरातन संपदा को अपना बताकर आम जनता को भ्रमित करके उनके गुरु बन जाते हैं क्योंकि वे लोग जानते हैं कि कैसे इस भौतिक संसार में लोगों पर राज किया जाता है उनके मनो को अपना गुलाम बनाकर | जातिवादी परम्परा में पुरोहित को ये पता है कि संख्या मायने नहीं रखती बल्कि ज्ञान मायने रखता है | और किसी सम्प्रदाय के लिए कोई व्यक्ति नहीं महत्वपूर्ण होता है विचार महत्वपूर्ण होता है तो वो लोग कभी भी नहीं बोलते कि क्यों नमस्कार शब्द बोल रहे हो या राम-राम शब्द बोल रहे हो अथवा गुड मॉर्निंग शब्द बोल रहे हो क्योंकि उन्हें पता है कि ये एक persional psychological विषय है अरे कुच्छ भी बोलता फिरे पर अध्यात्मिक राह पर चले तो जैसा हम कहें वैसा ही करे , इसके लिए हमारे देश में पुरोहित वर्ग के कितने ही बुद्धिजीवी अपना पूर्ण जीवन तक समर्पित कर देते हैं |

भारत में कितने ही संघ अहिं जो रात दिन इसी बात पर मंथन करते रहते हैं कि ये जो लोग पुरोहित वर्ग के नहीं हैं ये किसी और सम्प्रदाय में ना चले जाएँ और नए-२ अंधविश्वास apply करते रहते हैं जिससे लोग उनके वाद को आराम से मानते रहें , और पुरोहित वर्ग का हित सधता रहे | वो कभी नहीं कहते ऐसे शब्द जिन शब्दों से जनसामान्य में उनके प्रति विरोध की भावना भड़क जाए – ये समय के अनुसार व्यवहार करते हैं जैसा काल वैसा वास इस सिद्धांत को समझते हैं| ये तो बात ठीक है कि आप जय भीम बोलें और बाबा साहेब की पूजा भी करें परन्तु बौद्ध अभिवादन में तो केवल नमो बुद्धाय ही बोलें क्योंकि अगर बौद्ध धम्म सम्प्रदाय को बढ़ावा यदि भारत में बाबा साहेब ने दिया और आप लोग उनके द्वारा प्रेरित हो बौद्ध धम्म सम्प्रदाय में चले गए हैं तो अच्छी बात है , तो इस प्रकार तो महाराज अशोक को भी नमो बुद्धाय से पूर्व जय अशोक या महाराज अशोक बोलना चाहिए क्योंकि उन्होंने तो अपने पुत्र-पुत्रियों तक को भी धम्म के प्रचार में लगा दिया था | तो psychology को समझो कि अध्यात्मिक गुरु/ महामानव गौतम के साथ आप कुछ बी ना लगाएं ना आगे ना पीछे , फिर आप देखना कि लोग आपके अध्यात्म को जरूर मानने लगेंगे आपकी जाति क्या/ धम्म क्या / अन्य जातियों के लोग भी |

तो महामानव गौतम बुद्ध ने बताया कि धम्म तो सबका एक है पर सम्प्रदाय अलग-२ हैं क्योंकि अविधा है ( unknownness) है | पहले जाने कि ये जीव -जगत है क्या ? ये संसार है क्या ? ये कैसे चल रहा है ? महामानव गौतम ने कहा है कि ये संसार छः धातुओं से निर्मित है (१)अग्नि(२)वायु(३)आपो=तरल(४)पृथ्वी(५)आकाश(६)विज्ञान= consciousness | ref- अंगुत्तर निकाय |

तो अपने सम्प्रदाय को पहल स्वयं जाने और परिपक्व होकर दूसरों को बताएं उल्टा-सीधा धम्म की व्याख्या करने से और सम्प्रदायों की बुराई करने से कोई आपको appreciate नहीं करेगा |

डॉ कौशल

drkaushal96@yahoo.com

http://dharmindia.wordpress.com/2014/12/02/%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8D-%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AC%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%87-%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D/

बोधिसत्व, भारत- रत्न, बाबा साहब डा. भीम राव अम्बेडकर के ५९वें महापरिनिर्वाण दिवस पर: “अगर एक पल के लिए ‘धम्म’ हाथ में ले लेते”… ( रामबाबू गौतम, न्यू जर्सी )

 चैत्य- भूमि पर.   ५९वें महापरिनिर्वाण (Dec. 6th, 1956) दिवस पर,
 बोधिसत्व, भारत- रत्न, बाबा साहब डा. भीम राव अम्बेडकर 
                    को शत- शत नमन के साथ- 
अगर एक पल के लिए ‘धम्म’ हाथ में ले लेते,
दीक्षा- भूमि और बाबा साहब को समझ लेते |
गये कब हम उस जगह पर जहां लाखों खड़े थे,
ज़िंदगी में कभी तो वह ‘दीक्षा-भूमि’ देख लेते |
                      पल जो हमारे उनकी गुलामी में कटते रहे थे,
                      अधिकार क्या वो बाबा साहब के बिन ले लेते? |
                      गुरुकुलों तक सीमित थे शिक्षा के स्कूल सारे,
                      संविधान के बिना क्या हम डा.-इंजी. बन लेते |
भूमिका लिखी धम्म की आखिरी वक्त ‘गौतम’,
भूमिका में क्या है लिखा? उस बात को पढ़ लेते |
 आज़ भी वक्त है उठो- समझो नारी को उठाओ,
 घूंघट- सिंदूर भरने से अपनी नारी को बचा लेते |
                        दे दिया है भीम ने तुमको इतना सोचने के लिए ,
                        धम्म हाथ लेके डा. अम्बेडकर को नमन कर लेते |
                         दादर, चैत्य- भूमि पर जब मैंने अपने पग धरे थे,
                         निकलते इन आँसुओं को हम वहां कैसे रोक लेते? |
                                        ————–
             ( रामबाबू गौतम, न्यू जर्सी )
   ( दिसम्बर ५, २०१४ )

6-Dec-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना:डॉ अम्बेडकर 85 प्रतिशत बहुजन के मसिहा और तारणहार हैं पर उनको केवल एक वर्ग विशेष तक सीमित करना मनुवादी साजिश है, इतना ही नहीं आज भारत जिस अमन के साथ एक झंडे के नीचे संगठित है और तरक्की कर रहा है उसकी नीव भी बाबा साहब ने रखी है, सोच कर देखो अगर संविधान न होता तब जाती और धर्मों में बंटे इस देश का क्या हाल होता ?

इसका दूरगामी परिणाम ये होना है की ब्राह्मणवाद के सताए दोनों बहुजन और मुसलमान (विशेषकर बहुजन से मुसलमाान बने लोग) आपमे सामने होंगे, जबकि दोनों की तकलीफों का कारन एक ही है
डॉ आंबेडकर महान के विचारों की वजह से ही बौद्ध धम्म आधारित संविधान भारत को मिला, जिसमे बाबा साहब ने समानता और न्याय के राज को स्थापित किया| ब्राह्मणवाद की बहुत बड़ी नीति है की जिसका विरोध करना हो उससे घृणा का दिखावा करके घृणा को प्रचारित करो, इससे धीरे धीरे व्यक्ति और विचारधारा खत्म हो जाती है| बाबा साहब को जिनके व्यक्तित्व में भारत के सबसे बड़े प्रतीक होने की न केवल पूर्ण संभावनाएं हैं बल्कि वास्तविक रूप में भी बाबा साहब ही भारत के भाग्य विधाता हैं| ऐसे महान व्यक्तित्व को शेडूल-कास्ट का नेता और उसमे भी सिर्फ महारों और चमारों के नेता के रूप में मीडिया में प्रचारी किया जा रहा है| कमल है जो देश का नेता है वो वर्ग विशेष का नेता और जो वाकई अपनी कौम के लिए ही काम करता है ऐसे ब्राह्मणवादी हो जाते हैं देश के नेता| मीडिया ने भारत के मूलनिवासी पर एक और शब्द टॉप दिया है “दलित” इसका परनाम ये है की सरे संसार में बहुजन लोग अकेले पद गए हैं| अगर बौद्ध हो गए होते जैसा की बाबा साहब चाहते थे तो आज भारत में मेजोरिटी में ताहि लोग होते| परनाम स्वरुप हर क्षेत्र में इनको न्याय मिलता| काश अब ही ये लोग समझ जाएँ|

भारत में जिस तरह से ब्राह्मणवाद/ पूँजीवाद के काले बदल छाते जा रहे हैं ऐसे में आम जनता के सबसे बड़े सरक्षक बाबा साहब और उनका संविधान ही है| क्या आप भूल गए हो की सदियों से ब्राह्मणवादियों ने आम जनता को न्याय नहीं दिया, आज भी जहाँ तक इनकी चलती है तो आम भारतीय को नया नहीं मिलता| ऐसा इसलिए क्योंकि ये लोग संविधान का सही से पालन नहीं करते|ध्यान रहे संविधान की रक्षा करना हम सब का कर्तव्ये है वार्ना देश में फिर से ब्राह्मणवाद हावी हो जायेगा परिणाम स्वरुप ८५% मूलनिवासी जो कई जाती धर्मों में बनते हैं उनको गुलामी का जीवन बिताना पड़ेगा|

क्या आपने कभी नोट किया की अगर कोई ब्राह्मणवादी नेता बनता है तो उसे देश का नेता कहा जाता है पर अगर कोई    बहुजन-SC/ST/OBC/Minorities  में से नेता बनता है तो उसे उसकी जाती का नेता कहकर उसकी जाती तक ही सीमित कर दिया जाता है| डॉ अम्बेडकर 85 प्रतिशत बहुजन SC/ST/OBC/Minorities  के मसिहा और तारणहार हैं पर उनको केवल एक वर्ग विशेष तक सीमित करना मनुवादी साजिश है|

बाबा साहेब  डॉ. आम्बेडकर द्वारा किये गए संगर्ष का जो लोग SC/ST/OBC/Minorities लाभ उठा रहे हैं वे अपने मसीहा को दलित के रूप में देखने और नकारने  को मजबूर हैं| आज भी ओबीसी के बुद्धिजिवियो और शिक्षितों को ये पता नहीं है कि बाबा साहेब ने ओबीसी समुदाय के लिए क्या किया है ? बात चली है तो थोडा सा तो लिखना पड़ेगा ,बाबा साहेब ने ओबीसी समुदाय, जो देश में 52% से भी अधिक है उसके उत्थान के लिए:

(१) १९२८ में बोम्बे सरकार ने स्टार्ट कमिटी नियुक्त कि थी जिसमे डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर ने Other backward caste यानि कि OBC शब्द का उपयोग किया था.स्टार्ट कमिटी में बाबा साहेब ने कहा था कि, जो जातिया अपर कास्ट और बेकवर्ड के बिच में आती है ऐसी जातियां अन्य पिछड़ी जाति यानी कि ओबीसी है|

(२) देश की संविधान सभा में सिर्फ ६ ही ओबीसी सदस्य थे. जिसकी आवाज दबा कर रख दी थी लेकिन डॉ. बाबा साहेब के कारण ही कलम ३४० का प्रावधान करना पडा और जिनके फलस्वरूप “काका कालेलकर आयोग” (१९५३-५५) तथा “मंडल आयोग” (१९७८-८०) की रचना केन्द्र सरकार को करनी पड़ी थी. दोनों आयोग ओबीसी के लिए थे लेकिन अफसोसजनक है की ओबीसी समुदाय के 99% शिक्षितों को इसके बारे में पता नहीं है|

(३) १९५१ में अपने कानून मंत्री पद से इस्तीफा देते हुवे पत्र में बाबा साहेब ने इस्तीफा का दूसरा कारण ओबीसी जातियों के लिए आयोग की नियुक्ति नहीं करना और ओबीसी की उपेक्षा करना बताया था. क्या ओबीसी के संवैधानिक अधिकारों को लागु करने के लिए १९४७ से २०११ तक राज्य या केन्द्र सरकार के कोई मंत्री ने इस्तीफा दिया है ?
डॉ. बाबा साहेब आम्बेडकर के इस्तीफा के कारण ही दबाव में आकर सरकार को ओबीसी के लिए “काका कालेलकर आयोग” की रचना करनी पड़ी थी. १९५२ की लोकसभा में ५२% से ज्यादा ओबीसी-समुदाय के सांसदों सिर्फ ४.३९% ही थे. बाबासाहेब ही थे जिन्होंने ओबीसी, एससी-एसटी(अति शुद्र) और महिलाओं के उत्थान के किया आजीवन संघर्ष किया था,

उनको दलितो के उद्धारक के रूप में सिमित कर देना क्या एक षड्यंत्र नहीं है ?

बाबा साहेब का निम्न कथन उनका हमारे लिए अंतिम था:

‘‘मेरे लोगों से कह देना, नानक चन्द! मैं उनके लिए जो कुछ भी हासिल कर पाया हूँ, वह मैंने अकेले ही किया है और यह मैंने विध्वंसक दुखों और अन्तहीन परेशानियों से गुजरते हुए, चारों ओर, विशेषकर हिन्दू अखबारों की ओर से मुझ पर की गई गालियों की बौछारों के बीच किया है, मैं सारा जीवन अपने विरोधियों और अपने ही उन मुट्ठी भर लोगों से लड़ता रहा हूँ, जिन्होंने अपने स्वार्थी उद्देश्यों के लिए मुझे धेखा दे दिया। मैं बड़ी कठिनाइयों से कारवाँ को वहाँ तक लेकर आया हूँ, जहाँ यह आज दिखाई देता है। कारवाँ को इसकी राह में आने वाली बाधओं, अप्रत्याशित विपत्तियों और कठिनाइयों के बावजूद चलते रहना चाहिए। अगर वे एक सम्मानजनक और प्रतिष्ठित जीवन जीना चाहते हैं, तो उन्हे इस अवसर पर अपनी क्षमता दिखानी ही होगी। यदि मेरे लोग, मेरे साथी कारवाँ को आगे ले जाने के योग्य नहीं हैं, तो उन्हें इसे वहीं छोड़ देना चाहिए, जहाँ यह आज दिखाई दे रहा हैं, लेकिन उन्हें किसी भी रूप में इस कारवाँ को पीछे नहीं हटने देना चाहिए। मैं पूरी गम्भीरता में यह सन्देश दे रहा हूँ, जो शायद मेरा अन्तिम सन्देश है और मेरा विश्वास है कि यह व्यर्थ नहीं जाएगा। जाओ जाकर उनसे कह दो जाओ जाकर उनसे कह दो.. जाओ जाकर उनसे कह दो,’’

उन्होंने तीन बार कहा। यह कह कर वह सिसकने लगे, देखते ही देखते उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

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बाबासाहेब के महापरिनिर्वाण दिवस मीडिया की कवरेज और जनता में चेतना न होने के कारन यही दिन बाबरी विध्वंस  के लिए चुना|इसका दूरगामी परिणाम ये होना है की ब्राह्मणवाद के सताए दोनों बहुजन और मुसलमान (विशेषकर बहुजन से मुसलमाान बने लोग) आपमे सामने होंगे, जबकि दोनों की तकलीफों  का कारन एक ही है |
अधिक जानकारी के  लिए निम्न आर्टिकल पढ़ें

 

http://ambedkaractions.blogspot.in/2014/12/blog-post_5.html

21 दिसंबर 2014 को तालकटोरा स्टेडियम दिल्ली में “सम्यक बौद्ध सम्मलेन” में लिए आप सादर आमंत्रित हैं (TIME -1.00 PM TO 10 PM )…Team SBMT

TALKATORA STADIUM, 21 DEC 2014  TIME -1.00 PM TO 10 PM CONTACT….HARI BHARTI 09717454430 SUDHIR BHASKAR 09717878086 SUNDEEP BAUDDH 09810249452 KAPIL SWAROOP BAUDDH 09818390161 SHANTI SWAROOP BAUDDH 09810161823

 


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भारत का लोकतंत्र खतरे में है क्योंकि इलेक्टॉनिक वोटिंग मशीन विश्वसनीय नहीं ऐसा सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के बीच केस चल रहा है| जब जापान अमेरिका जर्मनी जैसे उन्नत देश इ वि एम का इस्तेमाल बंद करके कागज इस्तेमाल करते हैं तो भारत क्यों इ वि एम इस्तेमाल करते है| सुनिए क्या है सारी कहानी इस वीडियो में

 

http://indiaevm.org/media.html

प्रस्तुत कविता “ये शोषितों की बस्ती है” में कवि ने बहुजनों की दुर्दशा और उसके कारणों का बेहद सटीक चित्रण प्रस्तुत किया है

सारा शहर बुहारा करते, आर्यसमाजी इसी बस्ती में,
अपना ही घर गंदा रखते। वेदों का प्रचार करें
शिक्षा से रहें कोसों दूर, लाल चुनरिया ओढ़े,
दारू पीते रहते चूर।। पंथी वर्णभेद पर बात करें
चुप्पी साधे वर्णभेद पर,
बोतल महँगी है तो क्या हुआ, आधी सदी गुजरती है।
थैली खूब सस्ती है। ये शोषितों की बस्ती है ।
ये शोषितों की बस्ती है ।
शुक्रवार को चौंसर बढ़ती,
यहाँ जन्मते हर बालक को, पकड़ा देते हैं झाडू। सोमवार को मुखलहरी।
वो बैठा, अबे, साले, विलियम पीती मंगलवार को,
परे हट, कहते हैं लालू। शनिवार को नित जह़री।।
नौ दुर्गे में इसी बस्ती में,
गोविंदा और मिथुन बनकर, घर घर ढोलक बजती है।
खोल रहे हैं नाली। ये शोषितों की बस्ती है ।
दूजा काम इन्हें ना भाता इसी काम में मस्ती है।।
ये शोषितों की बस्ती है । नकली बौद्धों की भी सुनलो,
कथनी करनी में अंतर।
सूअर घूमते घर आंगन में, बात करें बौद्ध धम्म की,
झबरा कुत्ता घर द्वारे घर में पढ़ें वेद मंतर।।
वह पीता वह पीती, बाबा साहेब की तस्वीर लगाते,
पीकर डमरू बाजे इनकी मैया मरती है।
भूत उतारें रातभर, ये शोषितों की बस्ती है ।
बस रात ऐसे ही कटती है।
ये शोषितों की बस्ती है । औरों के त्यौहार मनाकर,
व्यर्थ खुशी मनाते हैं।
ब्रह्मा विष्णु इनके घर में, हत्यारों को ईश मानकर,
कदम कदम पर जय श्रीराम। गीत उन्हीं के गाते है।।
रात जगाते शेरोंवाली का, चौदह अप्रैल बुद्ध जयंती,
करते कथा सत्यनारान।। याद ना इनको रहती है।
पुरखों को जिसने मारा ये शोषितों की बस्ती है ।
उसकी ही कैसिट बजती है।
ये शोषितों की बस्ती है । डोरीवाला इसी बस्ती का,
झौंपे से अफसर बन बैठा।
यहाँ बरात बलि चढ़ाते, उसको इनकी क्या पड़ी अब,
मुर्गा घेंटा और बकरा वह दूजों में जा बैठा।।
बेटी का जब नेग करें, बेटा पढ़ लिखकर शर्माजी,
तो माल पकाते देग भरा बेटी बनी अवस्थी है।
जितना ज्यादा देग बनाये ये शोषितों की बस्ती है ।
उसकी उतनी हस्ती है।
ये शोषितों की बस्ती है । भूल गए अपने पुरखों को,
महामही इन्हें याद नहीं।
तू चूहड़ा और मैं चमार हूँ, अम्बेडकर बिरसा बुद्ध,
ये खटीक और कोली। वीर ऊदल की याद नहीं।
एक तो हम कभी बन ना पाये, झलकारी को ये क्या जानें,
बन गई जगह जगह टोली।। इनकी वह क्या लगती है।
अपना मुक्तिदाता भूले, ये शोषितों की बस्ती है ।
गैरों की झांकी सजती है।
ये शोषितों की बस्ती है ।। आत्मकथा चरित्र इतना ही पढ़ते,
ना अपने पिंजरे की चाह।
हर महीने वृंदावन दौड़े, दफ़ा 302 की भांति,
माता वैष्णो छ: छ: बार। वर्दी वाला गुण्डा
गुडगाँवा की जात लगाता, सोमनाथ को अब तैयार।। गुलशन नंदा की सीरीज,
बेटी इसकी चार साल से, ये तो रातदिन पढ़ती है।
दसवीं में ही पढ़ती है। ये शोषितों की बस्ती है ।
ये शोषितों की बस्ती है ।
मैं भी लिखना सीख गया हूँ,
बेटा बजरंगी दल में है, गीत कहानी और कविता।
बाप बना भगवाधारी भैया हिन्दू इनके दु:ख दर्द की बातें, मैं
परिषद में है, बीजेपी में महतारी। भी भला कहाँ लिखता था।।
मंदिर मस्जिद में गोली, कैसे समझाऊँ अपने लोगों को मैं,
इनके कंधे चलती है। चिंता यही खटकती है।
ये शोषितों की बस्ती है । अमित ये शोषितों की बस्ती है।।
      💐जय भीम जय प्रबुद्ध भारत 💐

महायान बौद्ध धर्म की शाखा नहीं….लाला बौद्ध (बुद्ध शिक्षाएं धर्म के रूप में बहुजनों का भला नहीं कर पाएंगी अगर इससे अपना भला चाहते हो तो अम्बेडकरवादी धम्म के रूप में ही स्वीकारों क्योंकि भारत में बौद्ध धर्म को मार डाला गया है| बौद्ध बनने के मार्ग में धम्म और धर्म में फर्क समझना सबसे पहला पाठ है)

महायान बौद्ध धर्म की शाखा नहीं.   (भाग-एक)mayayaan vs heenyaan

महायान बौद्ध धर्म की शाखा नहीं है. महायान बौद्ध धर्म के साथ विश्वासघात है. महायान ने बौद्ध धर्म को दरकिनार किया. महायान ने बौद्ध धर्म को प्रदूषित किया. महायान ने कालांतर में ब्राह्मण धर्म के साथ तालमेल बैठाया. महायान ने बुद्ध को ईश्वर बनाकर पेश किया. महायान ने बुद्ध की पूजा शुरू करवायी. महायान ने बुद्ध की मूर्ति की पूजा प्रारंभ की. बुद्ध को गुण-प्रदाता के रूप में पूजा जाने लगा. बुद्ध से मन्नतें मांगी जाने लगीं. महायान ने मानव बुद्ध को हिन्दू देवता बना दिया. महायान ने बुद्ध के ऐतिहासिक महत्व को धोकर उन्हें दैवीय और अलौकिक बना दिया. महायान बौद्ध धर्म की शाखा है ये सत्य नहीं है बल्कि महायान हिन्दू धर्म का एक पंथ है. महायान वैदिक धर्म का एक पंथ है. वी.डी.सावरकर तथा दलाई लामा बुद्ध-धम्म को हिन्दू धर्म की शाखा मानते हैं, जबकि बुद्ध-धम्म हिन्दू धर्म की शाखा नहीं है, ये शाखा महायान है. येसा होने से बड़ा भ्रम पैदा हुआ है. आदि-बुद्ध, मूल बुद्ध थेरवादी, श्रावकवादी बुद्ध कहे जाने लगे.
मूल बुद्ध-धम्म का हत्यारा, महायान, कहाँ से आया? महायान की पृष्ठभूमि क्या है? महायान उत्तरोत्तर शक्तिशाली कैसे हुआ? आइये इस विषय पर मनन करें.
बुद्ध इस धरती पर अस्सी साल रहे. बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में तथा महापरिनिर्वाण 483 ई.पू. में हुआ था. उन्होंने स्वयं अपने धम्म का 45 साल तक प्रचार-प्रसार किया. करीब आधी शताब्दी, उन्होंने भ्रमण कर-कर के लोगों को अपने धम्म की रौशनी दी. बुद्ध धम्म के कारण अंध-विश्वास, असमानता, अज्ञान, हीनता कई शताब्दियों तक यहाँ से दूर रहे. बुद्ध ने ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म में कभी विश्वास नहीं किया. लेकिन उन्होंने समाज को योजनाबद्ध तरीके से समझाया कि दुःख से कैसे मुक्ति पाई जा सकती है. उन्होंने लोगों को संगठित किया, जो छिन्न-भिन्न पड़े हुए थे. बुद्ध ने वैज्ञानिक, आधिकारिक, वास्तविक और तार्किक ढंग से लोगों को समझाया कि वे कैसे दुःख से मुक्ति पाकर प्रसन्न और शांतिपूर्ण जीवन जी सकते हैं. इसके लिए उन्होंने कभी स्वयं को मोक्षदाता, पैगम्बर, ईश्वर या देवता नहीं कहा. उन्होंने कभी निरर्थक प्रदर्शन या विज्ञापन नहीं किया.
बुद्ध ने इस बात पर जोर दिया कि किस तरह मानव दुःख के खतरों से दूर रह सकता है. उन्होंने हमेशा मनुष्य की तरह शिक्षा दी, और दुखों को दूर करने के लिए मानवीय तरीकों को इस्तेमाल किया. उन्होंने दुःख को समूल नष्ट करने का मार्ग बताया. समझदार, बुद्धिमान, तर्कशील व्यक्ति की तरह उन्होंने बताया कि धम्म के मार्ग पर चलकर आदमी कैसे तेजस्वी और भद्रपुरुष बन सकता है. विशुद्ध दार्शनिक की तरह सत्य के मार्ग पर उनका प्रवचन, उनका आत्मविश्वास इतना परम था कि लोग उनके बताये धम्म को मानने और धम्म-मार्ग पर चलने के लिए विवश हो जाते थे. सत्य स्वयं शक्तिवान होता है, इसको किसी पैगम्बर, ईश्वर या किसी देवदूत की आवश्यकता नहीं होती. सत्य को किसी ईश्वर या पैगम्बर की सिफारिश की जरूरत नहीं होती. सत्य अपने पैरों पर स्वयं चलता है. सत्य को किसी के सहारे की जरूरत नहीं होती. बुद्ध ने लोगों को उनके जीवन में आने वाले दुखों को दूर करने के उपाय बताये. उनके प्रवचनों में कोई अलौकिक या गूढ़ता नहीं थी, बुद्ध ने जीवन की वास्तविक कठिनाइयों और उनके समाधान को बड़े पारदर्शी और भरोसेमंद तरीके से रखा. उन्होंने “जन-कल्याण” तथा “अत्त दीप भव” पर लोगों को व्यवहारिक ज्ञान दिया.
बुद्ध की बताई बातें लोग पूरी तरह समझते थे. बहुत लोगों ने वर्णभेद के कारण उत्पन्न अपनी जिन्दगी के तमाम दुखों से छुटकारा पा लिया था. बुद्ध की वजह से उन्हें सम्मानपूर्वक जीवन जीने का मौक़ा मिला था. लोग वैदिक धर्म के वर्णाश्रम के विपरीत बग़ावत पर उतर आये. लोगों ने महसूस किया कि बुद्ध के कारण मिले, इस स्वतंत्र वातावरण में उनके काम करने के हुनर में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है. बुद्ध के कारण लोगों में आत्म-स्वाभिमान बढ़ा. बहुत से लोगों ने वैदिक धर्म द्वारा बताये अपने परम्परागत कार्य को छोड़ दिया. बहुत से लोगों की जिन्दागी उनके सतत और कठोर उद्यम / चेष्टा से प्रकाशित हो उठी. बहुत से लोगों ने जाति के बोझ को उतार फेंका. एक नृत्यांगना “शीलवती” का पुत्र “जीवक” प्रसिद्ध और निपुण वैद्य बन गया, स्वच्छक सुनीत, उपाली नाई, अछूत सोपक और सुप्रिया, निम्नजाति सुमंगल, कुष्ठ-रोग प्रभावित सुप्रबुब्भा तथा और भी बहुत से लोगों ने धम्म अंगीकार कर लिया. बुद्ध ने डाकू अंगुलिमाल, बहुत से अनाथ और अवर्ण लोगों को धम्म-दीक्षित किया. इन सभी का जीवन बुद्ध के कारण प्रकाशित हो उठा.
ये वैदिक धर्म की मान्यताओं के विरुद्ध न्याय, सत्य, मानवता का धम्म-युद्ध था. धम्म के फैलने से असमानता को अपना आदर्श मानने वाले वैदिक लोग छिन्न-भिन्न होने लगे. इन लोगों ने अपने परम्परागत वैदिक जीवनशैली को नहीं छोड़ा. इन लोगों को ये महसूस हुआ कि बुद्ध और धम्म उनके लिए खतरनाक हैं. फलस्वरूप बुद्ध के जीवनकाल में ही उनके कई शत्रु बन गए. छंदा तथा उपनंदा बुद्ध के प्रति सदा शत्रुतापूर्ण रहे. देवदत्त बुद्ध की ख्याति को देखकर बुद्ध के प्रति और अधिक ईर्ष्यालु हो गया. बिम्बिसार के पुत्र अजातशत्रु की मदद से देवदत्त ने बुद्ध को मरवाने के कई असफल प्रयास किये. लेकिन देवदत्त भिक्खु संघ को विभाजित करने में सफल हुआ. बुद्ध ने लोगों को नैतिक मूल्यों पर चलने के लिए हमेशा जोर दिया. नैतिक मूल्यों पर चलना कई लोगों को कठिन लगा. नैतिक मूल्यों पर चलना कई लोगों को सजा की तरह लगा. कई लोगों को नैतिक मूल्यों पर चलना अपनी आज़ादी में बाधक लगा. ईश्वर और आत्मा में विश्वास न करने की वजह से कुछ लोगों को धम्म रास नहीं आया. सुभद्र उनमें से एक था जिसे बुद्ध की मृत्यु से प्रसन्नता मिली.

अब वे लोग संगठित होने लगे, जिन्हें धम्म पसंद नहीं आया था. उन्होंने मूल धम्म त्यागकर “महासांघिक पंथ” बना लिया. “महासांघिक पंथ” को “महायान पंथ” में बदल दिया गया. ये कार्य बुद्ध के महापरिनिर्वाण के करीब 100 वर्ष बाद इन लोगों द्वारा वैशाली में आयोजित दूसरे बौद्ध अधिवेशन में किया गया. महायान उन लोगों ने पैदा किया जिन्हें बौद्ध धम्म रास नहीं आया. महायानियों द्वारा बुद्ध के मूल मिशन को एक तरफ रख दिया गया. महायानियों ने त्रिपिटक की पाली की मूल इबारत को संस्कृत में अनुवादित करके आम लोगों को अपठनीय बना दिया. इस तरह धीरे-धीरे पाली साहित्य नष्ट करके इन लोगों ने पाली भाषा को निर्बल बनाकर धम्म को विकृत किया.
बुद्ध ने लोगों को बताया कि वे इंसान हैं अतः उन्हें ईश्वर, पैगम्बर या देवदूत न मानें. लेकिन महायानियों ने उन्हें भगवान बना दिया. महायानियों ने बुद्ध को नास्तिक बुद्ध से आस्तिक बुद्ध बना दिया. बुद्ध पूजा और उपासना के विरुद्ध थे, लेकिन महायानियों ने उनकी पूजा उपासना प्रारंभ कर दी. दूसरी शताब्दी में एक ब्राह्मण नागार्जुन ने महायान अपनाया और बुद्ध का एक विशाल स्मारक बनवाया. तीसरी शताब्दी में पेशावर के एक ब्राह्मण पुत्र असंग ने महायान अपनाया और महायान को योगविद्या से जोड़ दिया. महायान का जन्म हालाँकि आन्ध्र प्रदेश में हुआ लेकिन वह शीघ्र ही पंजाब, अफगानिस्तान, मध्य एशिया, तिब्बत, चीन, कोरिया, जापान, सिक्किम, भूटान, ताइवान, नेपाल में फैल गया, जहाँ मूर्तिपूजा, ध्यान, तंत्र साधना महायान का हिस्सा बन गए. शून्यवाद जो बाद में हिन्दुवाद का अद्वैतवाद बना, (ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है, नागार्जुन की देन है. महायानियों ने न सिर्फ बुद्ध को ईश्वर माना बल्कि हिन्दुओं के ब्रह्मा, विष्णु, महेश, कार्तिके, चामुंडा, गणपति, महाकाल आदि देवों की पूजा भी जारी रखी. महायानियों ने हिन्दुओं के नौग्रह, यक्ष, गंधर्व, विद्याधर आदि की पूजा भी शुरू कर दी. इस तरह महायान को दैविक और चमत्कारिक विश्वासों में फंसा दिया गया.

बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद जातक कथाएं लिखी गयीं. यह कहानियाँ बुद्ध के पिछले जन्मों की कहानियां हैं. बुद्ध ने अपने पिछले जन्मों की सारी कहानियाँ बता रहे हैं. उन्हीं का संकलन जातक-कथायें कहा जाता है. जातक कथा के अंतर्गत राजा दशरथ, राम, सीता, युधिष्ठिर, विदुर, कृष्ण आदि पात्र रामायण और महाभारत के भी हैं. जातक कथा ईसवी दूसरी शताब्दी में लिखी गयीं थीं. बुद्ध के मूल अऩीश्वरवाद, अनात्मावाद को महासांघिकों और महायानियों द्वारा निकाल दिया गया. बोधिसत्व की अवधारणा महायान पंथ से आयी और जातक कथायें केवल बोधिसत्व की हैं. जातक कथायें बुद्ध के मूल शिक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं. बुद्ध आत्मा में विश्वास नहीं करते थे. तो फिर वे क्यों पुनर्जन्म में विश्वास करने लगे? और जातक कथायें हिंदू धर्म के पुनर्जन्म के सिद्धांत को प्रतिस्थापित करती हैं. बुद्ध से पहले ब्राह्मण धर्म का काफी प्रभाव था. इसी प्रभाव को पूर्णतः खत्म किया जाना ही बुद्ध धम्म क्रांति का आदर्श वाक्य था. ऊंची जाति के लोग जिन्होंने बौद्ध धर्म को गले लगा लिया था, वे बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद बुद्ध की मूल शिक्षाओं पर नहीं चल सके. नतीजन उन्होंने जातक कथायें बनायीं. वृक्ष, देवता, यक्ष, भगवान की पूजा को अधिक महत्व और दर्जा मिला. अवदंशातक और दिव्यावदान पुस्तकों में बुद्ध के पिछले जन्मों की कहानियाँ हैं. ललितवित्सर, जातक कथा, बुद्धचरित और सद्धम्मापुन्डारिक महायान के ग्रंथ हैं.
में सुमेध ब्राह्मण को स्वयं बुद्ध बताया गया. मोक्ष प्राप्ति के लिये वह तपस्या करने हिमालय गया. हवा में उड़ते समय, वह अमरावती कस्बा पहुंचा जहां उसे दीपांकर बुद्ध के दर्शन हुये. दीपांकर ने उन्हें आशीर्वाद दिया और इस आशीर्वाद से सुमेध ब्राह्मण बोधिसत्व हुआ. कई जन्मों के बाद उन्हें अततः महामाया और शुद्धोधन के माध्यम से जन्म लेने का अवसर मिला. वह गौतम बुद्ध हैं. कुछ कहानी ये शो करने के लिये पैदा की गयीं कि प्रसिद्ध व्यक्ति सिर्फ ब्राह्मण समुदाय से ही पैदा हो सकते हैं. (ब्राह्मण समुदाय द्वारा ये फूहड़ प्रयास भी किया गया कि डी. के. कुलकर्णी शिवाजी के जैविक पिता थे) ब्राह्मणों ने शिवाजी को ब्राह्मण बनाना चाहा था, लेकिन शिवाजी के अनुयाइयों की सतर्कता से वे येसा न कर सके. इसी तरह प्राचीन काल में महायान पंथियों ने बुद्ध को भी ब्राह्मण बना दिया और ब्राह्मणों को सर्वोच्च बताया. उस समय कोई विरोध न कर सका क्योंकि शिक्षा के सारे अधिकार ब्राह्मणों के पास थे, अतः इस षड्यंत्र का किसी को पता नहीं चला.

जातक कथाओं के सभी प्रमेय बुद्ध के मूल उपदेशों से भिन्न हैं. जातक कथायें विज्ञान विरोधी और बुद्ध विरोधी हैं. जातक कथाओं को ब्राह्मण धर्म के प्रभाव और मूल्यों को पुनःस्थापित करने के लिये लिखा गया है. जातक कथाओं की उत्पत्ति महासांघिक लोगों द्वारा की गयी. जातक कथाओं को तब तक लिखा जाता रहा जब तक महासांघिक शक्तिशाली नहीं हो गये. महासांघिकों ने बुद्ध के मूल नास्तिक और अनीश्वरवादी सिद्धान्त के विनाश की आवश्यकता को समझा. बुद्ध के मूल शिष्य संसार को हकीकत समझ रहे थे. जबकि महायानियों ने संसार के अस्तित्व को नकार दिया. उन्होंने कहा आध्यात्मिक ज्ञान के हिसाब से विश्व और उसके सारे भौतिक पदार्थ अस्तित्वहीन हैं, ये संसार वृहद् शून्य है. संसार काल्पनिक और व्यर्थ है. महायान पंथ ने एक जातक कथा में ये दर्शाया है कि ब्राह्मण कैसे बौद्धों से उच्च हैं.

एक जातक कथा में सुमेध ब्राह्मण को स्वयं बुद्ध बताया गया. मोक्ष प्राप्ति के लिये वह तपस्या करने हिमालय गया. हवा में उड़ते समय, वह अमरावती कस्बा पहुंचा जहां उसे दीपांकर बुद्ध के दर्शन हुये. दीपांकर ने उन्हें आशीर्वाद दिया और इस आशीर्वाद से सुमेध ब्राह्मण बोधिसत्व हुआ. कई जन्मों के बाद उन्हें अततः महामाया और शुद्धोधन के माध्यम से जन्म लेने का अवसर मिला. वह गौतम बुद्ध हैं. कुछ कहानी ये शो करने के लिये पैदा की गयीं कि प्रसिद्ध व्यक्ति सिर्फ ब्राह्मण समुदाय से ही पैदा हो सकते हैं. (ब्राह्मण समुदाय द्वारा ये फूहड़ प्रयास भी किया गया कि डी. के. कुलकर्णी शिवाजी के जैविक पिता थे) ब्राह्मणों ने शिवाजी को ब्राह्मण बनाना चाहा था, लेकिन शिवाजी के अनुयाइयों की सतर्कता से वे येसा न कर सके. इसी तरह प्राचीन काल में महायान पंथियों ने बुद्ध को भी ब्राह्मण बना दिया और ब्राह्मणों को सर्वोच्च बताया. उस समय कोई विरोध न कर सका क्योंकि शिक्षा के सारे अधिकार ब्राह्मणों के पास थे, अतः इस षड्यंत्र का किसी को पता नहीं चला

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https://samaybuddha.wordpress.com/2013/08/08/mahayaan-vs-heenyaan/

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