यह कैसे हो सकता है कि 29 वर्ष की आयु तक सिद्धार्थ ने कभी किसी बूढ़े, रोगी तथा मृत व्यक्ति को देखा ही न हो? इस तरह की घटनाएँ रोज ही घटती रहती हैं और सिद्धार्थ ने भी 29 वर्ष की आयु होने से पहले भी इन्हें देखा ही होगा. इस परम्परागत मान्यता को स्वीकार करना असम्भव है |कलम जिनके हाथ में थी उन्होंने सब कुछ अपने हिसाब से लिखा,पर हम अब समझ सकते हैं …Team SBMT


9aकलम जिनके हाथ में थी उन्होंने सब कुछ अपने हिसाब से लिखा. हम उनका लिखा इतिहास ही अब तक पढ़ते रहे हैं. उन्होंने लिखा और हमने पढ़ लिया. भारत के इतिहास में सबसे अधिक तोड़ने मरोड़ने का काम बुद्ध और उनकी परंपरा के साथ किया गया. बुद्ध को लेकर अनेक कहानियां गढ़ी गईं जिनके माध्यम से बुद्ध की श्रमण परम्परा न सिर्फ नष्ट की गई बल्कि इसके विपरीत बातें जनमानस में भरी गईं.
कहा जाता है कि सिद्धार्थ गौतम वृद्ध, रोगी और मृतक को देसखकर विचलित हो गए और एक दिन अपनी पत्नी और बेटे को रात्रि में सोता हुआ छोड़कर ज्ञान प्राप्ति हेतु निकल गए थे. सवाल उठता है कि सिद्धार्थ जैसा जागरूक व्यक्ति परिवार-विमुख कैसे हो सकता है ? हकीकत तो यह है कि वह परिवार के सदस्यों को धोखा देकर घर छोड़ ही नहीं सकते थे. इस तरह के विश्वासघात की अपेक्षा उनसे नहीं की जा सकती थी. कोई भी व्यक्ति, जो परिवार-विमुख है, वह समाज-विमुख भी होगा, ऐसा व्यक्ति समाज-उन्मुख नहीं हो सकता.

जिस समय सिद्धार्थ गौतम ने प्रव्रज्या ग्रहण की, अर्थात् गृह त्याग किया उस समय उनकी आयु 29 वर्ष की थी. यदि सिद्धार्थ ने वृद्ध, रोगी और मृतक को देखकर प्रव्रज्या ग्रहण की, तो यह कैसे हो सकता है कि 29 वर्ष की आयु तक सिद्धार्थ ने कभी किसी बूढ़े, रोगी तथा मृत व्यक्ति को देखा ही न हो? इस तरह की घटनाएँ रोज ही घटती रहती हैं और सिद्धार्थ ने भी 29 वर्ष की आयु होने से पहले भी इन्हें देखा ही होगा. इस परम्परागत मान्यता को स्वीकार करना असम्भव है कि 29 वर्ष की आयु होने तक सिद्धार्थ ने एक भी बूढ़े, रोगी और मृत व्यक्ति को देखा ही नहीं था और 29 वर्ष की आयु होने पर ही प्रथम बार देखा. यह व्याख्या तर्क की कसौटी पर कसने पर खरी उतरती प्रतीत नहीं होती. त्रिपिटक के किसी भी ग्रन्थ में भी गृहत्याग के इस कथानक का कहीं उल्लेख तक नहीं है.

इस सम्बन्ध में बाबा साहब डॉ आंबेडकर का मत है कि शाक्यों और कोलियों में रोहिणी नदी के पानी को लेकर झगड़े होते थे. शाक्य संघ ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध का प्रस्ताव पारित किया, जिसका सिद्धार्थ गौतम ने विरोध किया. शाक्य संघ, जो गणतंत्र था, के नियम के अनुसार बहुमत के विरुद्ध जाने पर दण्ड का प्रावधान था. संघ ने तीन विकल्प रखे-

1. सिद्धार्थ सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लें,
2. मृत्यु दण्ड या देश छोड़कर जाने का दण्ड स्वीकार करें
3. अपने परिवार के लोगों का सामाजिक बहिष्कार और उनके खेतों की जब्ती के लिये राजी हों.

संघ का बहुमत सिद्धार्थ के विरुद्ध था. शांतिप्रिय और करुणामय होने के नाते सिद्धार्थ के लिये सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लेने की बात को स्वीकार करना असम्भव था. अपने परिवार के सामाजिक बहिष्कार पर भी वह विचार नहीं कर सकते थे. अतः वे स्वेच्छा से देश त्याग कर जाने के लिये तैयार हो गये. सिद्धार्थ गौतम ने अपने पिता शुद्धोधन, अपनी माता प्रजापति गौतमी और पत्नी यशोधरा से सहमति और अनुमति लेकर घर से अभिनिष्क्रमण किया था. जब सिद्धार्थ ने कपिलवस्तु छोड़ा तो अनोमा नदी तक जनता उनके पीछे-पीछे आई थी, जिसमें उनके पिता शुद्धोधन और उनकी माता प्रजापति गौतमी भी थे.

 

comments of Dr Prabhat Tandon ….

डा. भदन्त आनन्द कौसात्यायन के अनुसार त्रिपिटक के किसी भी ग्रन्थ में गृहत्याग के इस कथानक का कहीं उल्लेख नहीं है। फ़िर यह उल्लेख बार –२ क्युं पाया जाता रहा है । डा. कौसात्यायन का मत है कि वृद्ध, रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर गृहत्याग की मान्यता ‘‘वे अट्टकथाएँ हैं, जिन्हें बुद्धघोष तथा अन्य आचार्यों ने भगवान बुद्ध के एक हजार वर्ष बाद परम्परागत सिंहल अट्टकथाओं का आश्रय ग्रहण कर पाली भाषा में लिखा।”
फ़िर सच क्या है ? आखिर बुद्ध ने गृह त्याग क्यूँ किया ? डा. आंबेडकर ने ’ बुद्ध और उनका धम्म ’ मे इसके बारे मे चर्चा की है ।डा. अम्बेडकर ने परम्परागत मान्यता के विरुद्ध ‘खुद्दक निकाय’ के ‘सुत्तनिपात’ के अट्ठकवग्ग में अत्तदण्डसुत्त की इन गाथाओं को बुद्ध के गृहत्याग का आधार बनाया है जो अधिक प्रतीत लगता है ।
अत्त्द्ण्डा भवं जातं , जनं पस्सच मेषकं।
संवेनं कित्त्यिस्सामि यथा संविजितं मया ॥ १ ॥
फ़न्दमानं पजं दिस्वा मच्छे अप्पोदके यथा ।
अज्जमज्जेहि व्यारुद्धे दिस्वा मं भयमाविसि ॥२॥
समन्तसरो लोको, दिसा सब्बा समेरिता ।
इच्छं भवन्मत्तनो नाद्द्सासिं अनोसितं ।
ओसाने त्वेव व्यारुद्धे दिस्वा अरति अहु ॥३॥
अर्थ :‘‘शस्त्र धारण भयावह लगा। मुझमें वैराग्य उत्पन्न हुआ, यह मैं बताता हूँ। अपर्याप्त पानी मैं जैसे मछलियां छटपटाती हैं, वैसे एक-दूसरे से विरोध करके छटपटाने वाली प्रजा को देखकर मेरे मन में भय उत्पन्न हुआ। चारों ओर का जगत असार दिखायी देने लगा, सब दिशाएं काँप रही हैं, ऐसा लगा और उसमें आश्रय का स्थान खोजने पर निर्भय स्थान नहीं मिला, क्योंकि अन्त तक सारी जनता को परस्पर विरुद्ध हुए देखकर मेरा जी ऊब गया।’’

यह भी देखें :
http://preachingsofbuddha.blogspot.in/2014/03/thetruthbehindbuddhaleavingthehome.html

3 thoughts on “यह कैसे हो सकता है कि 29 वर्ष की आयु तक सिद्धार्थ ने कभी किसी बूढ़े, रोगी तथा मृत व्यक्ति को देखा ही न हो? इस तरह की घटनाएँ रोज ही घटती रहती हैं और सिद्धार्थ ने भी 29 वर्ष की आयु होने से पहले भी इन्हें देखा ही होगा. इस परम्परागत मान्यता को स्वीकार करना असम्भव है |कलम जिनके हाथ में थी उन्होंने सब कुछ अपने हिसाब से लिखा,पर हम अब समझ सकते हैं …Team SBMT

  1. डा. भदन्त आनन्द कौसात्यायन के अनुसार त्रिपिटक के किसी भी ग्रन्थ में गृहत्याग के इस कथानक का कहीं उल्लेख नहीं है। फ़िर यह उल्लेख बार –२ क्युं पाया जाता रहा है । डा. कौसात्यायन का मत है कि वृद्ध, रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर गृहत्याग की मान्यता ‘‘वे अट्टकथाएँ हैं, जिन्हें बुद्धघोष तथा अन्य आचार्यों ने भगवान बुद्ध के एक हजार वर्ष बाद परम्परागत सिंहल अट्टकथाओं का आश्रय ग्रहण कर पाली भाषा में लिखा।”
    फ़िर सच क्या है ? आखिर बुद्ध ने गृह त्याग क्यूँ किया ? डा. आंबेडकर ने ’ बुद्ध और उनका धम्म ’ मे इसके बारे मे चर्चा की है ।डा. अम्बेडकर ने परम्परागत मान्यता के विरुद्ध ‘खुद्दक निकाय’ के ‘सुत्तनिपात’ के अट्ठकवग्ग में अत्तदण्डसुत्त की इन गाथाओं को बुद्ध के गृहत्याग का आधार बनाया है जो अधिक प्रतीत लगता है ।
    अत्त्द्ण्डा भवं जातं , जनं पस्सच मेषकं।
    संवेनं कित्त्यिस्सामि यथा संविजितं मया ॥ १ ॥
    फ़न्दमानं पजं दिस्वा मच्छे अप्पोदके यथा ।
    अज्जमज्जेहि व्यारुद्धे दिस्वा मं भयमाविसि ॥२॥
    समन्तसरो लोको, दिसा सब्बा समेरिता ।
    इच्छं भवन्मत्तनो नाद्द्सासिं अनोसितं ।
    ओसाने त्वेव व्यारुद्धे दिस्वा अरति अहु ॥३॥
    अर्थ :‘‘शस्त्र धारण भयावह लगा। मुझमें वैराग्य उत्पन्न हुआ, यह मैं बताता हूँ। अपर्याप्त पानी मैं जैसे मछलियां छटपटाती हैं, वैसे एक-दूसरे से विरोध करके छटपटाने वाली प्रजा को देखकर मेरे मन में भय उत्पन्न हुआ। चारों ओर का जगत असार दिखायी देने लगा, सब दिशाएं काँप रही हैं, ऐसा लगा और उसमें आश्रय का स्थान खोजने पर निर्भय स्थान नहीं मिला, क्योंकि अन्त तक सारी जनता को परस्पर विरुद्ध हुए देखकर मेरा जी ऊब गया।’’

  2. इस सम्बन्ध में बाबा साहब डॉ आंबेडकर का मत है कि शाक्यों और कोलियों में रोहिणी नदी के पानी को लेकर झगड़े होते थे. शाक्य संघ ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध का प्रस्ताव पारित किया, जिसका सिद्धार्थ गौतम ने विरोध किया. शाक्य संघ, जो गणतंत्र था, के नियम के अनुसार बहुमत के विरुद्ध जाने पर दण्ड का प्रावधान था. संघ ने तीन विकल्प रखे-

    1. मृत्यु दण्ड. (fasi)
    2. देश छोड़कर जाने का दण्ड स्वीकार करें
    3. अपने परिवार के लोगों का सामाजिक बहिष्कार और उनके खेतों की जब्ती के लिये राजी हों.

    yehi satya hai…

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