गुलामी की चरम और उसके खिलाफ संगर्ष और जीत की अनोखी कहानी “स्तन ढकने का अधिकार पाने के लिए केरल में महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह”….चौधरी अशोक

स्तन ढकने का अधिकार पाने के लिए केरल में महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह

केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी। अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा।इस कुरूप परंपरा की kerela top nudewomens चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया। नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं। उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे। नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं। लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था।

नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था। सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी। पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी। एक घटना बताई जाती है जिसमें एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला।इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं। 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए। बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं। धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया। इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं।
यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे। जो भी इस नियम की अवहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता। अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते। यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें।
लेकिन उस समय अंग्रेजों का राजकाज में भी असर बढ़ रहा था। 1814 में त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं। लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ। उच्च वर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे। आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया। एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश। और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए। इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया। एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा। उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े। तभी वे भीतर जा पाईं। संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी।

सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था। क्यों न होता। आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें। उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे। आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती। अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया। अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई। सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं।

इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है। विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों और उनके दुकानों के सामान को लूटना शुरू कर दिया। राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई। दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया।
मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है। अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं। 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया। कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक भी छीन कर लिया।

चौधरी अशोक

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ये कैसा धर्म है जिसके नाम पर हर गलत सही हो जाता है – एक कविता… गोपाल सिंह

dharm kamjoorधर्म के नाम पर होते हैं चमत्कार ।
धर्म माफ़ करवा देता है बलात्कार ।।
धर्म हो तो नशा भी लगता है प्रसाद ।
धर्म के नाम पर लोग होते हैं बर्बाद ।।
धर्म के नाम पर पशुओं का मलमूत्र भी है स्वीकार ।
वो ही धर्म इंसानों का करता है बहिष्कार ।।
धर्म के नाम पर पूज्य हो जाते हैं नंगे ।
धर्म के नाम पर मौज उड़ाते है भिखमंगे ।।
दया धर्म का मूल है ।
लेकिन यही धर्म इंसानियत पर शूल है ।।
धर्म सिखाता है आपस में करना प्यार ।
सबसे ज्यादा धर्म ही करता है नफरत का प्रसार ।।lohiya
धर्म के नाम पर कितना ही अन्न होता है बर्बाद ।
भूख से मरते हजारों लोगो किसी को नही आते याद ।।
धर्म के नाम पर पैदल चलते हैं मील हजार ।
किसी अंधे को कोई कराता नही सड़क पार ।।
धर्म के नाम पर खिलाते है पत्थरों को भोग ।
नही दिलवाता कोई उसको दवा जिसको है कोई रोग
।।
धर्म के नाम पर बाँटते हैं गीता कुरान और बाइबिल ।
नही बाँटता कोई स्कूल की किताब जिससे ज्ञान
जाता मिल ।।
धर्म के नाम पर पत्थरों से भी करते प्यार ।dharm ki rajniti
नही पूजते उन माँ बाप को जिन्होंने जीवन
का दिया उपहार ।।
धर्म के नाम पर पशु भी बन जाती माता ।
लेकिन बेटी को कोख में ही मार दिया जाता ।।
.एक मुलनिवासी योद्धा

भविष्य का धर्म एक ‘कॉस्मिक रिलिजन’ होगा। ये दुनियाभर के व्यक्तिगत ईश्वरों की जगह ले लेगा और बिना तर्क के धार्मिक विश्वासों और तमाम धार्मिक क्रिया-कलापों, कर्म-कांडों को बेमानी कर देगा।अगर कोई ऐसा धर्म है जो भविष्य में आधुनिक वैज्ञानिक जरूरतों के साथ कदम से कदम मिला कर चल सकता है, तो वो बौद्ध धर्म ही होगा।…-महान वैज्ञानिक, अल्बर्ट आइंस्टीइन

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भविष्य का धर्म एक ‘कॉस्मिक रिलिजन’ बौद्ध धर्म ही होगा।
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नैतिकता सर्वोच्च प्राथमिकता की चीज है… लेकिन केवल हमारे लिए, ईश्वर के लिए नहीं।

आखिर ये दुनिया कैसे बनी, ये सवाल हमारे जेहन में अक्सहर घूमता रहता है। इसी सवाल पर दुनिया के विभिन्ना धर्मों ने ही नहीं,वैज्ञानिकों ने भी मंथन किया है। मशहूर वैज्ञानिक आइंसटाइन को भी यह सवाल मथता रहा है। उनके इस बारे में निम्न विचार रहे हैं-
मैं ये जानना चाहता हूं कि ये दुनिया आखिर भगवान ने कैसे बनाई। मेरी रुचि किसी इस या उस धार्मिक ग्रंथ में लिखी बातों पर आधारित किसी ऐसी या वैसी अदभुत और चमत्कारिक घटनाओं को समझने में नहीं है। मैं भगवान के विचार समझना चाहता हूं

(1) किसी व्यक्तिगत भगवान का आइडिया एक एंथ्रोपोलॉजिकल कॉन्सेप्ट है, जिसे मैं गंभीरता से नहीं लेता।

(2) अगर लोग केवल इसलिए भद्र हैं, क्योंकि वो सजा से डरते हैं, और उन्हें अपनी भलाई के बदले किसी दैवी ईनाम की उम्मीद है, तो ये जानकर मुझे बेहद निराशा होगी कि मानव सभ्यता में दुनियाभर के धर्मों का बस यही योगदान रहा है। मैं ऐसे किसी व्यक्तिगत ईश्वर की कल्पना भी नहीं कर पाता तो किसी व्यक्ति के जीवन और उसके रोजमर्रा के कामकाज को निर्देशित करता हो, या फिर वो, जो सुप्रीम न्यायाधीश की तरह किसी स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हो और अपने ही हाथों रचे गए प्राणियों के बारे में फैसले लेता हो। मैं ऐसा इस सच्चाई के बावजूद नहीं कर पाता कि आधुनिक विज्ञान के कार्य-कारण के मशीनी सिद्धांत को काफी हद तक शक का फायदा मिला हुआ है ( आइंस्टीन यहां क्वांटम मैकेनिक्स और ढहते नियतिवाद के बारे में कह रहे हैं)। मेरी धार्मिकता, उस अनंत उत्साह की विनम्र प्रशंसा में है, जो हमारी कमजोर और क्षणभंगुर समझ के बावजूद थोड़ा-बहुत हम सबमें मौजूद है। नैतिकता सर्वोच्च प्राथमिकता की चीज है…लेकिन केवल हमारे लिए, भगवान के लिए नहीं।

(3) ऐसी कोई चीज ईश्वर कैसे हो सकती है, जो अपनी ही रचना को पुरस्कृत करे या फिर उसके विनाश पर उतारू हो जाए। मैं ऐसे ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकता जिसके उद्देश्य में हम अपनी कामनाओं के प्रतिरूप तलाशते हैं, संक्षेप में ईश्वर कुछ और नहीं, बल्कि छुद्र मानवीय इच्छाओं का ही प्रतिबिंब है। मैं ये भी नहीं मानता कि कोई अपने शरीर की मृत्यु के बाद भी बचा रहता है, हालांकि दूसरों के प्रति नफरत जताने वाले कुछ गर्व से भरे डरावने धार्मिक विचार आत्माओं के वजूद को साबित करने में पूरी ताकत लगा देते हैं

(4)। मैं ऐसे ईश्वर को तवज्जो नहीं दे सकता जो हम मानवों जैसी ही अनुभूतियों और क्रोध-अहंकार-नफरत जैसी तमाम बुराइयों से भरा हो। मैं आत्मा के विचार को कभी नहीं मान सकता और न ही मैं ये मानना चाहूंगा कि अपनी भौतिक मृत्यु को बाद भी कोई वजूद में है। कोई अपने वाहियात अभिमान या किसी धार्मिक डर की वजह से अगर ऐसा नहीं मानना चाहता, तो न माने। मैं तो मानवीय चेतना, जीवन के चिरंतन रहस्य और वर्तमान विश्व जैसा भी है, उसकी विविधता और संरचना से ही खुश हूं। ये सृष्टि एक मिलीजुली कोशिश का नतीजा है, सूक्ष्म से सूक्ष्म कण ने भी नियमबद्ध होकर बेहद तार्किक ढंग से एकसाथ सम्मिलित होकर इस अनंत सृष्टि को रचने में अपना पुरजोर योगदान दिया है। ये दुनिया-ये ब्रह्मांड इसी मिलीजुली कोशिश और कुछ प्राकृतिक नियमों का उदघोष भर है, जिसे आप हर दिन अपने आस-पास बिल्कुल साफ देख और छूकर महसूस करसकते हैं

(5)। वैज्ञानिक शोध इस विचार पर आधारित होते हैं कि हमारे आस-पास और इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी घटता है उसके लिए प्रकृति के नियमही जिम्मेदार होते हैं। यहां तक कि हमारे क्रियाकलाप भी इन्हीं नियमों से तय होते हैं। इसलिए, एक रिसर्च साइंटिस्ट शायद ही कभी ये यकीन करने को तैयार हो कि हमारे आस-पास की रोजमर्रा की जिंदगी में घटनेवाली घटनाएं किसी प्रार्थना या फिर किसी सर्वशक्तिमान की इच्छा से प्रभावित होती हैं

(6)। सच्चाई तो ये है कि मेरे धार्मिक विश्वासों के बारे में आप जो कुछ भी पढ़ते हैं, वो एक झूठ के अलावा कुछ और नहीं। एक ऐसा झूठ जिसे बार-बार योजनाबद्ध तरीके से दोहराया जाता है। मैं दुनिया के किसी पंथ या समूह के व्यक्तिगत ईश्वर पर विश्वास नहीं करता और मैंने कभी इससे इनकार नहीं किया, बल्कि हर बार और भी जोरदार तरीके से इसकी घोषणा की है। अगर मुझमें धार्मिकता का कोई भी अंश है, तो वो इस दुनिया के लिए असीमित प्रेम और सम्मान है, जिसके कुछ रहस्यों को विज्ञान अब तक समझने में सफल रहा है

(7)। ‘कॉस्मिक रिलिजन’ का ये एहसास किसी ऐसे व्यक्ति को करवाना बेहद मुश्किल है जो दुनियावी धर्मों के दलदल में गले तक धंसा हो और जो पीढ़ियों पुराने अपने धार्मिक विश्वास को छोड़, कुछ और सुनने तक को तैयार न हो। ऐसी ही धार्मिक अडिगता, हर युग के शिखर धर्म-पुरुषों की पहचान रही है, जिनके विश्वास तर्क आधारित नहीं होते, वो अपने आस-पास घटनेवाली घटनाओं के लिए कारण नहीं तलाशते, यहां तक कि कई धर्म-नेताओं को तो ऐसा ईश्वर भी स्वीकार्य नहीं होता जिसका आकार मानव जैसा हो। हम सब प्रकृति की संतानें हैं, जिनका जन्म प्रकृति के ही कुछ नियमों के तहत हुआ है, लेकिन अब हम प्रकृति के उन नियमों को ही अपना ईमान नहीं बनाना चाहते। कोई भी चर्च ऐसा नहीं है, जिनके आधारभूत उपदेशों में इन नियमों की बात की गई हो। मेरे विचार से इस सृष्टि को रचनेवाले प्राकृतिक नियमों के प्रति लोगों में सम्मान की भावना उत्पन्न करना और इसे आनेवाली पीढ़ियों तक प्रसारित करना ही कला और विज्ञान की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है

(8)। मैं एक पैटर्न देखता हूं तो उसकी खूबसूरती में खो जाता हूं, मैं उस पैटर्न के रचयिता की तस्वीर की कल्पना नहीं कर सकता। इसी तरह रोज ये जानने के लिए मैं अपनी घड़ी देखता हूं कि, इस वक्त क्या बजा है? लेकिन रोज ऐसा करने के दौरान एक बार भी मेरे ख्यालों में उस घड़ीसाज की तस्वीर नहीं उभरती जिसने फैक्ट्री में मेरी घड़ी बनाई होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि मानव मस्तिष्क फोर डायमेंशन्स (चार विमाएं – लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई या गहराई और समय) को एकसाथ समझने में सक्षम नहीं है, इसलिए वो ईश्वर का अनुभव कैसे कर सकता है, जिसके समक्ष हजारों साल और हजारों डायमेंशन्स एक में सिमट जाते हैं

(9)। इतनी तरक्की और इतने आधुनिक ज्ञान के बाद भी हम ब्रह्मांड के बारे में कुछ भी नहीं जानते। मानव विकासवाद की शुरुआत से लेकर अब तक अर्जित हमारा सारा ज्ञान किसी स्कूल के बच्चे जैसा ही है। संभवत: भविष्य में इसमें कुछ और इजाफा हो, हम कई नई बातें जान जाएं, लेकिन फिर भी चीजों की असली प्रकृति, कुछ ऐसा रहस्य है, जिसे हम शायद कभी नहीं जान सकेंगे, कभी नहीं

(10)। मैं बार-बार कहता रहा हूं कि मेरे विचार से व्यक्तिगत ईश्वर की अवधारणा बिल्कुल बचकानी है। लेकिन मैं व्यावसायिक नास्तिकों के उस दिग्विजयकारी उत्साह में भागीदारी नहीं करना चाहता जो अपनी बात मनवाने के जुनून में भरकर नौजवानो से उनके धार्मिक विश्वासों को छुड़वाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। बल्कि, प्रकृति को समझने में अपनी बौद्धिक और मानवीय कमियों के साथ मैं विनम्रता भरे व्यवहार को प्राथमिकता दूंगा।
भविष्य का धर्म एक ‘कॉस्मिक रिलिजन’ होगा। ये दुनियाभर के व्यक्तिगत ईश्वरों की जगह ले लेगा और बिना तर्क के धार्मिक विश्वासों और तमाम धार्मिक क्रिया-कलापों, कर्म-कांडों को बेमानी कर देगा। ये प्राकृतिक भी होगा और आध्यात्मिक भी, ये उन अनुभवों से बने तर्कों पर आधारित होगा कि सभी प्राकृतिक और आध्यात्मिक चीजें इस तरह एक हैं जिनका समझा जा सकने वाला एक अर्थ है। ये जो कुछ भी मैं कह रहा हूं, इसका जवाब बौद्ध धर्म में है। अगर कोई ऐसा धर्म है जो भविष्य में आधुनिक वैज्ञानिक जरूरतों के साथ कदम से कदम मिला कर चल सकता है, तो वो बौद्ध धर्म ही होगा।

-महान वैज्ञानिक, अल्बर्ट आइंस्टीइन

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर रहे और अपनी आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ से ख़ास पहचान बनाने वाले तुलसी राम का शुक्रवार13-feb-2015 को देहांत हो गया (पढ़ेंः कौन थे प्रोफ़ेसर तुलसी राम)…BBC

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर रहे और अपनी आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ से ख़ास पहचान बनाने वाले तुलसी राम का शुक्रवार को देहांत हो गया.

(पढ़ेंः कौन थे प्रोफ़ेसर तुलसी राम)

इनकी आत्मकथा ने पाठकों को बहुत क़रीब से छुआ और हिंदी पट्टी के उस सामाजिक ताने बाने को सबके सामने ला दिया जिसमें दलित का जीवन बहुत ही कठिन होता है.

अपने गांव से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और फिर दिल्ली और यहां जेएनयू में अध्यापन तक का उनका जीवन बहुत संघर्षपूर्ण रहा.

पढ़ें विस्तार से

जेएनयू

वे लंबे समय तक स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में प्रोफेसर रहे. लेकिन कभी उस फर्मे में फ़िट नहीं बैठे जिसमें सगर्व समा जाने के बाद जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के ज़्यादातर अध्यापक चमकीले प्लास्टिक के बने ज्ञानी लगने लगते हैं.

उन्हें देखकर हमेशा मुझे उस धातु की महीन झंकार सुनाई देती थी जिसके कारण भुखमरी, जातीय प्रताड़ना का शिकार, सामंती पुरबिया समाज में दुर्भाग्य का प्रतीक वह चेचकरू, डेढ़ आंख वाला दलित लड़का घर से भागकर न जाने कैसे अकादमियों में तराश कर जड़ों से काट दिए गए प्रोफेसरों की दुनिया में चला आया था.

अपमान से कुंठित होने के बजाय पानी की तरह चलते जाने का जज़्बा उन्हें बहुतों के दिलों में उतार गया था.

मुझे इसका अंदाज़ा पिछले साल एक शाम चंडीगढ़ में एक पार्क की बेंच पर हुआ जब कवयित्री प्रो. मोनिका कुमार ने कहा था, “मैं उनको प्यार करती हूं. उनसे उन सब चीजों के लिए माफी मांगने का मन करता है जो उन्हें दलित होने के नाते जिंदगी में सहनी पड़ीं.”

आजमगढ़ के चिरइयाकोट में तुलसी राम का गांव धरमपुर मेरे अपने गांव से थोड़ी ही दूरी पर है, लेकिन उनसे मुलाक़ात उनकी आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ के पन्नों पर हुई.

उन्होंने मेरे गांव के दक्खिन टोले की वह दुनिया दिखाई जो मैं उसी हवा में पलने के बावजूद नहीं देख पाया था.

लड़ने की परंपरा

तुलसी राम

दलित आत्मकथाएं बहुत लिखीं गई हैं, लेकिन उनमें से ज़्यादातर छुआछूत और उत्पीड़न की सिर्फ शिकायत करती हैं.

हद से हद प्रतिशोध में इस क़दर फुफकारती हैं कि जेल जाने की नौबत आने पर बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा अक्सर बोले जाने वाले ‘दलित की बेटी’ वाले जुमले की याद आ जाती है.

तुलसी राम ने दिखाया कि दलित सिर्फ बिसूरते नहीं हैं, उनकी भी आत्मसम्मान की रक्षा के लिए लड़ने की परंपरा है, अपने हथियार हैं.

प्रो. तुलसी राम

जब पानी सिर के ऊपर चला जाता है तो मुर्दहिया की दलित औरतें सवर्ण जमींदारों और ब्राह्मणों को बम की तरह हंड़िया (जिनमें औरतों की जचगी के बाद का जैविक कचरा भरा होता था) और तलवारों की तरह जानवरों की ठठरियां लेकर दौड़ाती थीं और वे अपवित्र हो जाने के डर से भागते थे.

ऐसी हड्डी की तलवारें मैने दलितों के घरों में देखी जरूर थीं, लेकिन उनका इस्तेमाल देखने का मौका शहर और गांव की आवाजाही के बीच नहीं लग पाया था.

प्रताड़ना और सदाशयता

तुलसी राम

घनघोर प्रताड़ना के बावजूद उन्होंने आत्मकथा में उन सदाशय सर्वणों को भी याद रखा जिन्होंने एक वक़्त खाना खिलाया, फीस भरी या चुपचाप चलते रहने का हौसला दिया.

मुझे इन्हीं दो बातों के बीच वो विज़न दिखाई देता है, जिससे दलित आंदोलन अंबेडकर की अंधपूजा करते हुए गांधी, मुंशी प्रेमचंद, लोहिया और कम्युनिस्टों को गाली देते हुए सत्ता के लिए निहायत अवसरवादी गठजोड़ बनाकर अवरुद्ध हो जाने से छूटकर आगे कामयाबी की ओर जा सकता है.

इन दिनों दलित नेताओं, नौकरशाहों, कारोबारियों के बीच धनी हो कर शहरों में स्थापित होने के बाद नई मनमाफ़िक बीवी लाने और नया अतीत बनाने का चलन है.

लेकिन तुलसीराम ने अपनी जड़ों को जिस सरलता से याद किया और अपनी पक्षधरता को बेधड़क लिखा वह दुर्लभ है.

जब तक समानता सिर्फ स्वप्न है पूरा भारत मुर्दहिया है, जिसमें तुलसी राम की धातु की झंकार जब भी कोई कोशिश करेगा सुनाई देगी. उन्हें सलाम.

समाज के जिम्मेदार लोगों से बाबा साहब की एक अपील (बाबा साहब डाँ. अम्बेडकर का ऐतिहासिक भाषण आगरा, 18 मार्च 1956 समता सैनिक दल) …..S.C. Bhaoorjar

समाज के जिम्मेदार लोगों से बाबा साहब की एक अपील बाबा साहब डाँ. अम्बेडकर का ऐतिहासिक भाषण  आगरा, 18 मार्च 1956

जन समूह से –

पिछले तीस वर्षों से तुम लोगों को राजनैतिक अधिकार के लिये मै संघर्ष कर रहा हूँ। मैने तुम्हें संसद और राज्यों की विधान सभाओं में सीटों का आरक्षण दिलवाया। मैंने तुम्हारे बच्चों की शिक्षा के लिये उचित प्रावधान करवाये। आज, हम प्रगित कर सकते है। अब यह तुम्हारा कर्त्तव्य है कि शैक्षणिक, आथिर्क और सामाजिक गैर बराबरी को दूर करने हेतु एक जुट होकर इस संघर्ष को जारी रखें। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये तुम्हें हर प्रकार की कुर्बानियों के लिये तैयार रहना होगा, यहाँ तक कि खून बहाने के लिये भी।

नेताओ से-

यदि कोई तुम्हें अपने महल में बुलाता है तो स्वेच्छा से जाओ। लेकिन अपनी झौपड़ी में आग लगाकर नहीं। यदि वह राजा किसी दिन आपसे झगड़ता है और आपको अपने महल से बाहर धकेल देता है, उस समय तुम कहां जाओगे? यदि तुम अपने आपको बेचना चाहते हो तो बेचो, लेकिन किसी भी हालत में अपने संगठन को बर्बाद होने की कीमत पर नहीं। मुझे दूसरों से कोई खतरा नहीं है, लेकिन मै अपने लोगों से ही खतरा महसूस कर रहा हूँ।

भूमिहीन मजदूरों से –

मै गाँव में रहने वाले भूमिहीन मजदूरों के लिये काफी चिंतित हूँ। मै उनके लिये ज्यादा कुछ नहीं कर पाया हूँ। मै उनकी दुख तकलीफों को नजरन्दाज नहीं कर पा रहा हूँ। उनकी तबाहियों का मुख्य कारण उनका भूमिहीन होना है। इसलिए वे अत्याचार और अपमान के शिकार होते रहते हैं और वे अपना उत्थान नहीं कर पाते। मै इसके लिये संघर्ष करूंगा। यदि सरकार इस कार्य में कोई बाधा उत्पन्न करती है तो मै इन लोगों का नेतृत्व करूंगा और इनकी वैधानिक लड़ाई लडूँगा। लेकिन किसी भी हालात में भूमिहीन लोगों को जमीन दिलवाले का प्रयास करूंगा।

अपने समर्थकों से-

बहुत जल्दी ही मै तथागत बुद्ध के धर्म को अंगीकार कर लूंगा। यह प्रगतिवादी धर्म है। यह समानता, स्वतंत्रता एवं बंधुत्व पर आधारित है। मै इस धर्म को बहुत सालों के प्रयासों के बाद खोज पाया हूँ। अब मै जल्दी ही बुद्धिस्ट बन जाऊंगा। तब एक अछूत के रूप में मै आपके बीच नहीं रह पाऊँगा, लेकिन एक सच्चे बुद्धिस्ट के रूप में तुम लोगों के कल्याण के लिये संघर्ष जारी रखूंगा। मै तुम्हें अपने साथ बुद्धिस्ट बनने के लिये नहीं कहूंगा, क्योंकि मै आपको अंधभक्त नहीं बनाना चाहता परन्तु जिन्हें इस महान धर्म की शरण में आने की तमन्ना है वे बौद्ध धर्म अंगीकार कर सकते है, जिससे वे इस धर्म में दृढ़ विश्वास के साथ रहें और बौद्धाचरण का अनुसरण करें।

बौद्ध भिक्षुओं से-

बौद्ध धम्म महान धर्म है। इस धर्म संस्थापक तथागत बुद्ध ने इस धर्म का प्रसार किया और अपनी अच्छाईयों के कारण यह धर्म भारत में दूर-दूर तक गली-कूचों में पहुंच सका। लेकिन महान उत्कर्ष पर पहुंचने के बाद यह धर्म 1213 ई. में भारत से विलुप्त हो गया जिसके कई कारण हो सकते हैं। एक प्रमुख कारण यह भी है की बौद्ध भिक्षु विलासतापूर्ण एवं आरामतलब जिदंगी जीने के आदी हो गय थे। धर्म प्रचार हेतु स्थान-स्थान पर जाने की बजाय उन्होंने विहारों में आराम करना शुरू कर दिया तथा रजबाड़ो की प्रशंसा में पुस्तकें लिखना शुरू कर दिया। अब इस धर्म की पुनर्स्थापना हेतु उन्हें कड़ी मेहनत करनी पडेगी। उन्हें दरवाजे-दरवाजे जाना पडेगा। मुझे समाज में ऐसे बहुत कम भिक्षु दिखाई देते हैं, इसलिये जन साधारण में से अच्छे लोगों को भी इस धर्म प्रसार हेतु आगे आना चाहिये और इनके संस्कारों को ग्रहण करना चाहिये।

शासकीय कर्मचारियों से –

हमारे समाज की शिक्षा में कुछ प्रगति हुई है। शिक्षा प्राप्त करके कुछ लोग उच्च पदों पर पहूँच गये हैं परन्तु इन पढ़े लिखे लोगों ने मुझे धोखा दिया है। मै आशा कर रहा था कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे समाज की सेवा करेंगे, किन्तु मै देख रहा हूँ कि छोटे और बडे क्लर्कों की एक भीड़ एकत्रित हो गई है, जो अपनी तौदें (पेट) भरने में व्यस्त हैं। मेरा आग्रह है कि जो लोग शासकीय सेवाओं में नियोजित हैं, उनका कर्तव्य है कि वे अपने वेतन का 20 वां भाग (5%) स्वेच्छा से समाज सेवा के कार्य हेतु दें। तभी समग्र समाज प्रगति कर सकेगा अन्यथा केवल चन्द लोगों का ही सुधार होता रहेगा। कोई बालक जब गांव में शिक्षा प्राप्त करने जाता है तो संपूर्ण समाज की आशायें उस पर टिक जाती हैं। एक शिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता  समाज के लिये वरदान साबित हो सकता है।samta sainik dal

छात्रों एवं युवाओं से-

मेरी छात्रों से अपील है की शिक्षा प्राप्त करने के बाद किसी प्रकार कि क्लर्की करने के बजाय उसे अपने गांव की अथवा आस-पास के लोगों की सेवा करना चाहिये। जिससे अज्ञानता से उत्पन्न शोषण एवं अन्याय को रोका जा सके। आपका उत्थान समाज के उत्थान में ही निहित है।

“आज मेरी स्थिति एक बड़े खंभे की तरह है, जो विशाल टेंटों को संभाल रही है। मै उस समय के लिये चिंतित हूँ कि जब यह खंभा अपनी जगह पर नहीं रहेगा। मेरा स्वास्थ ठीक नहीं रहता है। मै नहीं जानता, कि मै कब आप लोगों के बीच से चला जाऊँ। मै किसी एक ऐसे नवयुवक को नहीं ढूंढ पा रहा हूँ, जो इन करोड़ों असहाय और निराश लोगों के हितों की रक्षा करने की जिम्मेदारी ले सके। यदि कोई नौजवान इस जिम्मेदारी को लेने के लिये आगे आता है, तो मै चैन से मर सकूंगा।”

(संदर्भ- सलेक्टेड ऑफ डाँ अम्बेडकर – लेखक डी.सी. अहीर पृष्ठ क्रमांक 110 से 112 तक के भाषण का हिन्दी अनुवाद)

बुद्धिजीवी साथियों से विनम्र निवेदन है कि इस ऐतिहासिक भाषण की प्रतियाँ छपवाकर समाज में वितरित करें, यह एक सामाजिक जागृति का महान दयित्व है।
(समाज हित में जारी)

समता सैनिक दल.

(Head Quarter, Deekshabhoomi, Nagpur)
www.ssdindia.org

दुनिया को धर्म ने ही दूषित किया हुआ है धर्म बीमारी है तो धम्म इस व्याधि का इलाज है धार्मिकता दुखों को पैदा करती है धम्म उन दुखों का निवारण बताता है ! ….बोधिसत्व भाई एस० प्रेम अनार्ये

 

पूर्व प्रचिलित धार्मिक मान्यतायों के विरुद्ध विद्रोह और उस विद्रोह की पृष्ठभूमि ही आगे एक नए धर्म में परिवर्तित हो कर मानवता को व्यथित करने लगती है और फिर इस नव व्यथा को तोड़ने हेतु फिर नव धर्म का निर्माण करना पड़ता है !

इस प्रकार धर्मों की भीड़ बढती चली जाती है

आज पृथ्वी पर लगभग 300 से भी अधिक धर्मों का आस्तित्व है अतीत के सभी धर्म जनांदोलन से उत्पन्न हुए थे इस प्रकार के सभी जनांदोलनो में समानता यह है की यह इश्वर केन्द्रितऔर परलौकिक है इसलिए ये धर्म है !

इस्वरवाद एवं परलौकिक मान्यताये कभी भी मानव का भला नहींlohiya कर सकती यह भी एक वैज्ञानिक एवं सार्वभौमिक सच्चाई है !

बुद्धिज्म भी पूर्व्प्रचिलित धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध एक जनांदोलन है लेकिन यह अनीश्वरवादी है यह परलौकिकता से परे मानव के वास्तविक दुखों के कारणों को ढूंढ़ कर उनका वैज्ञानिक निवारण बतलाता है इसलिए यह धर्म हो कर भी धर्म नहीं है यह धम्म है ! और मानव का भला भी इसी में है !

दुनिया को धर्म ने ही दूषित किया हुआ है धर्म बीमारी है तो धम्म इस व्याधि का इलाज है धार्मिकता दुखों को पैदा करती है धम्म उन दुखों का निवारण बताता है !

तो आओ चले धम्म को स्वीकार करते है और धार्मिकता को छोड़ते है

बुध्द ने ऐसे धम्मं को जन्म दिया, जिसमे ईश्वर की कोई जगह नहीं है। जिसमे परमात्मा को कोई स्थान नहीं है। बुध्द ने संदेह से शुरू की यात्रा और शून्य पर पूर्ण की। संदेह और शून्य के बिच में बुध्द का सारा बोध है। संदेह को धम्मं का आधार बनाया और शून्य को धम्मं की उपलब्धि। बाकी सब धर्म विश्वास को आधार बनाते है और पूर्ण को उपलब्धि। बुध्द धम्मं को समझने के लिए जिज्ञासा चाहिए। बुद्ध कहते है, माननेसे नहीं चलेगा। गहरी खोज करनी पड़ेगी। दूसरे धर्म कहते है की, पहला कदम बस तुम्हारे भरोसे की बात है, उठा लो, इससे ज्यादा आपको कुछ करने की जरुरत नहीं है। लेकिन बुध्द का धम्मं तो तुमसे पहले कदम पर पहुचने के लिए भी बड़ी लंबी यात्रा की मांग करता है। वह कहता है, संदेह की प्रगाढ़ अग्नि में जलना होगा, क्योकि तुम जो भरोसा करोगे. वह तुम्हारे बुध्दी पर का भरोसा होगा।  अगर बुध्दी  में ही रोग है तो उस रोग से जन्मा हुवा विश्वास भी बिमार होगा।

DHAMMA or DHARMA

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मंदिर अंधेरे मे ही नहीं पड़े है वे अँधेरे की सुरक्षा स्थल है। आस्था के नाम सब तरह के पाप वहां चलते है। विश्वास के नीछे सब तरह का झूठ चलता है।  धर्म पाखण्ड है क्योकि शुरुवात में ही चूक हो जाती है।  क्योकि पहले कदम पर ही तुम कमजोर पड जाते हो। तुम्हारा विश्वास तुम्हे पार न ले जा सकेगा. इसीलिए बुध्द ने कहा तोडो विश्वास, छोडो विश्वास. सब धारणाए गिरा देनी है। संदेह की अग्नि में उतरना है। दुस्साहसी चाहिए, खोजी चाहिए, अन्वेषक चाहिए, चुनौती स्वीकार करने का साहस निर्माण होना चाहिए.
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बुध्द कहते है, आश्वासन कोई भी नहीं है । क्योकि कोण तुम्हे आश्वासन देगा? यहाँ कोई भी नहीं है जो तुम्हारा हाथ पकडे। अकेले ही जाना है मरते वक्त तक।  बुध्द ने कहा अप्प दीप भव ! अपने ही दीए बनो। मै मरा तो रो मत।  मै कोण हू? मै आपको ज्यादा से ज्यादा दिशा दे सकता हू। चलना तुम्हे है।  मै रहू तो भी चलना तुम्हे है, अगर न रहू तो भी चलना तुम्हे है। झुको मत, सहारा लेना मत, क्योकि सब सहारे अंत:ता लंगड़ा बना देते है। सब सहारे तुम्हे अंधा बना देते है। सहारे धीर धीरे तुम्हे कमजोर कर देते है। बैसाखिया धीर धीरे तुम्हारे पैरों की परिपूर्ति कर देती है।  फिर तुम पैरों की फ़िक्र ही छोड़ देते हो।
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बुध्द कहते है, संदेह करो, बुध्द का धम्मं वैज्ञानिक है। संदेह विज्ञान प्राथमिक चरण है। इसीलिए भविष्य में जैसे जैसे लोकमानस वैज्ञानिक होता जाएगा, वैसे वैसे समय बुध्द के अनुकूल होता जाएगा।  जैसे जैसे लोग सोचने और विचारने की गहनता में उतरेंगे और उधार और बासे विश्वास न करेंगे, हर किसी बात को मान लेने को राजी न होंगे, बगावत बढ़ेगी, लोग हिम्मती होंगे, विद्रोही होंगे, वैसे वैसे बुध्द की बात लोगो के करीब आने लगेगी।
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जगत में बुध्द का आदर बढ़ रहा है।  जो भी विचारक है, चिन्तक है, वैज्ञानिक है, उनके मन में बुध्द का आदर रोज बढ़ रहा है। बुध्द बिना लड़े जित रहे है।  क्योकि बुध्द कहते है, हम तुमसे मानने को नहीं कहते, खोजने को कहते है। जब खोज लोंगे तो मानेंगे, बिना खोजे कैसे मान लोंगे. यह विज्ञान का सूत्र है।
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सत्य इतना सस्ता नहीं है, की वह बिना खोजे मिल जाए। सत्य कोई संपति नहीं है, जैसे पिता की वसीयत मरने के बाद पुत्र को मिल जाती है।  बुद्ध कहते है, सत्य को खोजना पड़ेगा. भ्रम जाल तथा माया को भुलाकर उसे ढूंढना होगा और तुम्हारे भीतर भी कमजोरिया बहुत है। थक जाते तो कही भी भरोसा करके रुक सकते हो, किसी भी मंदिर के सामने, थके हारे सर झुका सकते हो, इसीलिए नहीं की तुम्हे कोई जगह मिल गयी, जहा सर झुकाने का मुकाम आ गया था, बस सिर्फ इसीलिए की अब तुम थक गए, अब और नहीं खोजा जाता. बुध्द तुम्हे कोई जगह नहीं देते, तुम्हारे कमजोरी के लिए वह कोई जगा नहीं होती।  बुध्द कहते है, ज्ञान तो मिलाता है, आत्म परिष्कार से, शास्त्र से नहीं, सत्य कोई धारना नहीं है। सत्य कोई सिध्दांत नहीं है। सत्य तो जीवन का निखार है। सत्य तो ऐसा है, जैसे सोने को कोई आग में डालता है तो निखरता है, जलाता है, पिघलता है, तड़पाता है।  व्यर्थ जल जाता है, सार्थक बचाता है।  सत्य तो तुममे है, कूड़े करकट में दबा है और जबतक तुम आग से न गुजरो, तुम उस सत्य को कैसे खोज पाओगे.?
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बुध्द कहते है, जल्दी मत करना भरोसे करने की, भरोसा तभी करना जब संदेह करने की जगह ही न रह जाए, लेकिन दूसरे धर्म संदेह के विपरीत केवल भरोसा करनेकी सलाह देते है।  संदेह के विपरीत श्रध्दा करनेकी सलाह देते है।  लेकिन बुध्द संदेह करने की पूरी छूट देते है। इतना संदेह करो की, आखिर में तुम्हारा संदेह नष्ट हो जाए और केवल परिणाम बच जाए, जिसे तुम ढूढ रहे हो।  बुध्द कहते है, दबे हुए सड़े को बाहर निकालो, उससे छुटकारा पाने का एक ही उपाय है, उसे रोशनी में लाओ।
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बुध्द ने संदेह को जन्म दिया है। बुध्द का युग कभी भी बुद्धिवादी नहीं था।  केवल बुध्द ही बुध्दिवादी थे।  उन्होंने लंबे और कठिन मार्ग से यात्रा की थी। शार्टकट मार्ग की कोइ गुंजाइश नहीं थी।  तुम जिसे श्रध्दा मानते हो, वह शार्टकट का रास्ता है। तुम बिना गए, बिना कही पहुचे, बिना कुछ किये श्रध्दा कर लेते हो।  ऐसी श्रध्दा नपुसकता  के सिवा कुछ नहीं है। तुम्हारे शास्त्र लिखते है, नास्तिकोकी बाते मत सुनना, नास्तिक कुछ कहे तो कान में उंगलिया डाल देना।  यह तो भयभितता है।  डरपोकता के सिवा कुछ नहीं है। ऐसे धर्म के शास्त्र कमजोरी सिखाते है, जो आस्था इतनी डरपोक है की नास्तिक की बात सुनाने से कापती हो।  इससे तो नास्तिक बेहतर है, कम से कम उनके शास्त्र में कही नहीं लिखा की आस्तिक की बात सुनने ने से डरना है। नास्तिक कभी डरता नहीं है, लेकिन आस्तिक हमेशा डरते है।
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बुध्द ने संदेह को जन्म दिया है, संदेह करते करते तूम संदेह से मुक्ति पा लेते हो।  जहा संदेह खत्म होता है वहा सूरज उगता है। परमात्मा असहाय अवस्था की पुकार होती है। जिसको तुमने झुकना समझा है, वह कही तुम्हारे कांपते और भयभीत पैरों की कमजोरी तो नहीं है। जिसको तुमने समर्पण समझा है, वह तुम्हारी कायरता तो नहीं?

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बुध्द ने तुमसे परमात्मा नहीं छिना, उन्होंने तुमसे तुम्हारी बेचारगी छिनी है। बुध्द ने तुमसे मंदिर नहीं छीने, तुम्हारे कमजोरी के शरणस्थल छीने है। बुध्द ने कहा, तुम्हे खुद ही चलना है, बुध्द ने तुम्हारे पैरों को सदियों सदियों के बाद फिर से खून दिया है। तुम्हे अपने पैरों पर खड़े होने की हिम्मत दी है।  बुध्द उसी को सदधर्म कहते है, जो तुम्हे तुम्हारे भीतर छिपे हुए सत्य से परिचित कराए। झूठी आस्थाओ में नहीं, धारानाओ में नहीं, शास्त्रों में नहीं, व्यर्थ के शब्दजालो में नहीं।
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बुध्द ने आत्मा के स्वरूप को शून्य कहा है। उन्होंने आत्मा शब्द में खतरा देखा. क्योकि उन्हें लगा तुम किसी चीज के तलाश में हो, जो भीतर रखी है। जब तुम कहते हो तुम्हारे भीतर आत्मा है, जैसे की तुम्हारे घर में कुर्सी रखी हो, तुम्हारे भीतर आत्मा रखी है, आत्मा कोई वस्तु है की गए भीतर और पा गए। बुध्द ने आत्मा शब्द का शब्दप्रयोग नहीं किया क्योकि आत्मा से जडता का पता लगता है। आत्मा शब्द का मतलब यह हुवा की कुछ तुम्हारे भीतर ठहरा हुवा है, रुका हुवा है, कुछ तुम्हारे भीतर मौजूद है।  तो जो मौजूद ही ही है, वह जड है।
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बुध्द ने कहा था, तुम ही तुम्हारे शास्ता हो, तूम ही तुम्हारे गुरु हो, तुम ही तुम्हारे शास्त्र हो और तुम्हारे चैतन्य के शिवाय और कोई नहीं है।

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Best Comment:

कॉपोरेट आपको लूट रहा है देश की पूँजी सिमट कर कॉर्पोरेट की तिजोरियों में जा रहा है परिणाम ये है जनता सारा दिन जी तोड़ मेहनत कर के भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दिल सकता,बीमार का इलाज़ नहीं करा सकता, मन मर्जी से खाना पीना गुमना फिरना तो दूर की बात है | इस पर सारा पांडा पुरोहित और सत्संग गुरु जनता को दिन रात समझा रहे हैं की सब ईश्वर कर रहा है, सब कर्मों के फल है आदि आदि, और कमाल की बात है की जनता इस बात को खूब अच्छी तरह समझ जाती है| जब भी बौद्ध उनको समझाता है की आपकी समस्या राजनैतिक है उसका हल भी राजनीती से ही होगा तो ऐसे लोगों को सामाजिक रूप से बहिष्कार और घृणा का शिकार बनाकर दलित और अछूत घोषित कर किनारे कर दिया जाता है| और फिर वही लूटेरे और लूटती जनता अपना खेक शुरू कर देते हैं और मिलकर जगाने वाले बौद्धों को दलित कहकर/बनाकर घृणा करते हैं

3-Feb-2015 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: डॉ अम्बेडकर ने कहा था “जिसे अपना जीवन बदलना है उसे लड़ना होगा और जिसे लड़ना है उसे पढ़ना होगा ” पर सवाल ये है की ब्राह्मणवादी सिलेबस के क्या पढ़ा लिखा बहुजन सही मायने में जागरूक है अगर नहीं तो क्यों? इसके लिए क्या करें?

avidhya fooleकिसी भी व्यक्ति या कौम की दुर्दशा होने की शुरुआत उसी क्षण से होती है जब वो तथ्यों या ज्ञान की बातों को ‘नज़रअंदाज और अनसुना’ करना शुरू करता है|आप खुद ये बात नोट करना की जो नाकामयाब व्यक्ति होगा वो ज्ञान की बात को पूरा सुनने से पहले ही ख़ारिज कर देगा,जबकी कामयाब आदमी हर बात को पहले सुनता है, सोचता है फिर उसे अपनाता या ख़ारिज करता है|संसार में सब कुछ है, ये हमपर है हम क्या चुनते हैं, चुनाव के लिए ज्ञान होना जरूरी है, ज्ञान के लिए जानना जरूरी है और जानने के लिए धैर्य से सुनना और समझना जरूरी है, समझने के लिए ध्यान देना जरूरी है|सोचो की स्कूल में एक से अध्यापक और शिक्षा के बावजूद कुछ कामयाब और कुछ नाकामयाब क्यों हो जाते हैं,जवाब वही है जो ध्यान देना या न देना|देखो अपने आस पास जो भी  गुलाम मानसिकता का व्यक्ति होगा वो अपने खाली समय में भी बजाये दिमाग पर जोर देने,सोचने, सुसंगति ढूंढने, पढ़ने,ज्ञान चर्चा आदि में शामिल होने के, वो गाना बजाने, बेफ़िजूत की बातों और धार्मिक बाबाओं या स्थलों के चक्कर काटने में अपना समय बर्बाद करेगा|ऐसे लोगों को समझाने की कोशिश करने वाले को दुखी और निराश, और कई बार जान से भी हाथ धोना पड़ता है क्योंकि मूर्ख से बड़ा और कोई दुश्मन नहीं|सदा ध्यान रहे की हमारा ‘नज़रअंदाज और अनसुना करना और ढीलमढाल रव्वैया हमारी दुर्दशा का मूल कारण है|संसार में दो ही तह के लोग है एक वो जो जीवन को अपने हिसाब से चलाते हैं, ये शाशक बनते हैं जो गुलामों के भाग्य का फैसला करते हैं |दुसरे वो जो ‘नज़रअंदाज और अनसुना’ करके जीवन के हिसाब से चलते हैं ये ही गुलाम हैं,आप सोचिये आप किनमे से हैं?

हिन्दू दलितों को जब कोई जागरूक अम्बेडकरवादी बौद्ध उसकी गुलामी का कारन और निवारण समझाता है तो वो अपने को उससे बचने लगता है, अपनी हिंदुत्व की गुलामी की रक्षा के लिए या तो लड़ने लगता है या कट के ऐसे अलग निकल जाता है जैसे कोई गलत बात कर दी गयी हो|बिरसा मुंडा ने ठीक कहा था की “जो लोग ब्राह्मणों के ब्राह्मण धर्म की गुलामी करते हैं ब्राह्मण ऐसे गुलामों को हिन्दू कहते हैं”| अगर ये लोग सोये हुए है और इनको गुलामी इतनी ही पसंद है तो फिर लगता है मायावती ने ठीक ही किया जो ब्राह्मणों के साथ मिलकर कुछ कर तो लिया, पा तो लिया| अगर इन गुलामों के जागने का इंतज़ार करती रहती तो कभी कुछ भी हासिल नहीं कर पाती| एक वक्त था जब अम्बेडकरवादियों की राजनैतिक संगर्ष को सवर्ण मजाक समझते थे, और व्यंग करते थे की ये लोग कभी सरकार बना भी पाएंगे|  आज बसपा की कामयाबी के बाद सवर्णों के दिमाग ने ये बात मान ली है की कोई अम्बेडकरवादी बौद्ध भी मुख्यमंत्री बन सकता है| अब बहुजन समाज ने कम से कम अम्बेडकरवादी का अपने दम पर मुख्ये मंत्री बनने को साबित करके मुख्ये मंत्री बनने का सदा के लिए रास्ता  खोल दिया| ये बहुजन संगर्ष का मील का पत्थर है|…

पढा-लिखा होना और जागृत होना दोनो में अंतर है । किताबों को पढ लेने से,या डिग्रियां हासील कर लेने से कोइ जागृत नहीं कहा जा सकता । हर शिक्षित व्यक्ति जागृत ही हो,एसा नहीं है ।

जागृति का प्रथम सिद्धांत है÷ अपने दोस्त की पेहचान होना ।

जागृति का दुसरा सिद्धांत है÷ अपने दुश्मन की पेहचान होना ।

जाग्ति का तिसरा सिद्धांत है÷ अपनी ताकत और कमजोरी मालुम होना ।

जागृति का चौथा सिद्धांत है÷ दुश्मन की ताकत और कमजोरी मालुम होना ।

और जागृति का पांचवां सिद्धांत है÷ अपने महापुरुषों का इतिहास मालुम होना ।

यह पांच बातें अगर आपको मालुम है,और आप अनपढ भी हो,फिर भी आप जागृत कहे जा सकते हो । और अगर आप को ये पांच बातें नहीं मालुंम है,और आप
शिक्षित भी हो,फिर भी आप जागृत नहीं हो । आप डॉक्टर, वकील इंजिनियर,प्रोफेसर,IPS,IAS,हो सकते हो । मगर आप जागृत नहीं कहे जा सकते।

 

डॉ आंबेडकर ने कहा है “जिसे अपने दुखों से मुक्ति चाहिए उसे लड़ना होगा और जिसे लड़ना है उसे पहले पढ़ना होगा क्योंकि ज्ञान के बिना लड़ने गए तो हार निश्चित है|” पढाई भी दो प्रकार की होती है एक वो जससे आप शिक्षित होते है जैसे स्कूल या कॉलेज की शिक्षा और दूसरी अपना इतिहास की| डॉ आंबेडकर ने कहा है “जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती वो अपना भविष्य नहीं सुधार सकती” | अपने इतिहास का जानकारी न होने की ही वजह से भारत को विश्वगुरु विश्वविजेता बनाने वाले बौद्ध लोग आज खुद को शूद्र समझकर शोषण सह रहे हैं, जब भी लड़ते हैं तो हारते हैं|अपने आस पास देखो,यहाँ या काम पढ़े गुलाम और मजदूर मानसिकता के शूद्र हैं जीमे से कुछ समझने को ही तैयार नहीं दुसरे वो हैं जो केवल स्कूल या कॉलेज की शिक्षा तक सीमित रहने वाले| दुसरे वाले जाने अनजाने ब्राह्मणवादी कठपुतली बन रहे हैं, चाहे वो नौकरी हो या शादी या राजनीति या धर्म आदि |इसपर डॉ आंबेडकर ने कहा है “मेरी नज़र में शिक्षित वही है जो अपने दुश्मन को पहचानता है”| आपका दुश्मन हर बार रूप और नाम बदल कर आपको नोचता रहता है  आप हर बार धोका खा जाते हो, कभी देवता के नाम पर कभी धर्म के नाम पर कभी कानून के नाम पर कभी पाप पुण्ये के नाम पर तो कभी देश के नाम पर, एक बाद इसकी जड़ ही समझ लो न| कोई भी आपको नहीं समझा सकता न आपको आज़ादी दिल सकता है जब तक आप खुद समझकर आज़ाद न होना चाहे, इसीलिए गौतम बुद्ध ने कहा है “अत्त दीपो भव” अपना दीपक खुद बनो| खुद जानो परखो फिर मनो और आगे बड़ो|डॉ आंबेडकर और गौतम बुद्ध की तस्वीर से आपको कुछ न मिलगा चाहे दिन रात एक कर दो अगर मिलेगा तो उनकी शिक्षा में, जो इतनी जबरदस्त है की डर के मारे ब्राह्मणवादी इस का प्रचार नहीं होने देते|इनकी एक एक बात आँखे खोलने वाली है, बस इनसे घृणा छोड़ो,अपने जागने की चाहत और समझ विकसित करो, कल्याण निश्चित है|….

जनता जिस भी चीज़ को प्रेम करती है , ब्राह्मणवादी उसी के नाम पर उसके पीछे छुप कर बहुजन जनता का शोषण करते हैं, कभी ईश्वर के पीछे छुप कर कभी धर्म के और आजकल देश प्रेम के पीछे छुपकर| यही कारण हैं की मेरे भोले भाले नासमझ बहुजन समझ ही नहीं पाते की आखिर उनका शोषण कौन कर रहा है| उसकी दुर्दशा गलत ब्राह्मणवादी नीतिओं की वजह से होती है और वो कभी धर्म को तो कभी ईश्वर को तो कभी वर्तमान सरकार को दोषी ठहराकर असल शोषक तक पहुंच ही नहीं पाते| उल्टा असल शोषक को तो वो बड़े सम्मान के साथ अपने सर माथे पर बैठता है|अगर कोई बहुजन नेता जनता को समझाने में सफल भी हो जाता है तो ये अपना या अपनी संस्था का नाम बदल लेते है, नए नाम और रूप से बहुजन फिर धोखा खा जाते हैं,जनता ज्यादा जागरूक हो जाती है तो ये किसी मूर्ख बहुजन को ढूंढ़कर उसी को राजा बनाकर शोषण करते हैं|बहुजनों की नासमझी और ब्राह्मणवादियों की अति चतुराई, इनका तो कोई मुकाबला ही नहीं ये जंग तो एक तरफ़ा हैं जहाँ जीतने वाला और हारने वाला तो सदियों से पहले ही तय है,कमाल है !!..|इसीलिए इस जंग में बुद्ध से लेकर कबीर,नानक,रविदास, डॉ आंबेडकर आदि तक सभी ने बुद्धि विकसित करने पर जोर दिया, इसीलिए डॉ आंबेडकर ने बौद्ध धम्म में वापस लौटना चुना न की किसी वर्तमान धर्म को चुना| आप समझ सकते हो की अगर वो किसी वर्तमान धर्म को चुनते तो लोगों का धर्म तो बदल जाता गुलामी वहीँ की वहीँ रहती| बुद्धि का विकास ही मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य है और याद रहे जब तक आपने अपनी बुद्धि को ज्ञान से विकसित नहीं करेंगे  दुनिया की कोई राजनीतिज्ञ,राजा, देव, देवी,ईश्वर, धर्म या महापुरुष और कर्मकांड आपको मुक्ति नहीं दिला सकता| ध्यान रहे पढ़ो और ज्ञान बढ़ाओ, बेहतर जिंदगी का रास्ता बेहतर किताबों से होकर गुज़रता है| अप्प दीपो भव अर्थात अपना मार्गदर्शक स्वेव बनो

ब्राह्मणवाद के पक्ष में लोग ज्यादा इसलिए रहते हैं क्योंकि वो ब्राह्मणवाद की कहानियों को जानते है और उससे जुड़े त्योहारों में खूब मस्ती करते हैं, ये और बात है की इनको मस्ती के आलावा कुछ नहीं मिलता,जबकि ब्राह्मणवादी न केवल कमाते हैं बल्कि उनकी कमाई का ब्रांड “धर्म और ईश्वर” के झंडे का प्रचार प्रसार हो जाता है| बौद्ध धम्म को जो जानते हैं वो अक्सर सोचते हैं की धम्म में मनुष्यों की कितनी भलाई  है फिर भी ये ब्राह्मणवाद की गुलामी में खुश है,सोचने वाली बात है ऐसा क्यों? इस बात का जवाब ऐसे समझो की जब हम बच्चे थे तो क्या पसंद करते थे- टीवी पर गाना बजाना या स्कूल की किताब?निश्चित रूप से हमें किताब नहीं टीवी पसंद था जबकि हमारे अध्यापक और माता पिता अच्छी तरह जानते थे की हमारा भला टीवी में नहीं किताब में हैं| तो वहां तो माता पिता जबरदस्ती टीवी बंद करके पढाई पर जोर देते थे और अध्यापक भी पढता था| पर बौद्ध धम्म में जोर नहीं दिया जा सकता क्योंकि इसमें ऐसा ही चलन है, बस मार्ग बताओ मानना न मानना सामने वाले पर है| दूसरी बात न ही इसमें चकाचौंध है, न ही गाना बजाना, न ही चमत्कार|तो हम समझ सकते है की भले की बौद्ध धम्म कितना भी अच्छा हो पर आम जनता ब्राह्मण धर्म को ही पसंद करेगी क्योंकि केवल दर प्रतिशत जनता ही बुद्धिजीवी और जागरूक जीवन बिताती है बाकि की नब्बे प्रतिशत आम जनता बुद्धि पर ज्यादा जोर नहीं देना चाहती उसे मस्ती चाहिए, ज्ञान नहीं | कहाँ एक तरफ डॉल्बी डिजिटल सराउंड साउंड  रंगीन स्क्रीन पर रंगीन नाच गाना और कहाँ दूसरी तरफ सफ़ेद पन्ने पर काले अक्षर, हद तो ये है की कोई चित्र भी नहीं| पर बौद्ध भी क्या करें सत्य बदसूरत और कड़वा ही होता है और ये निश्चित है की जिसे मुक्ति चाहिए उसे लड़ना होगा और जिसे लड़ना है उसे पढ़ना होगा|उसका जीवंत उदारहण है की आम जनता ईश्वर के भरोसे रहती हैं जबकि ब्राह्मण बुद्ध से घृणा का दिखावा तो करते हैं, पर असल में वो खुद हर बात मानते हैं और जनता को ईश्वर और धर्म पकड़ा देते है|देखो जब भारत में डॉ आंबेडकर ने राजतन्त्र की जगह लोकतंत्र को चुना तब अल्पसंख्यक ब्राह्मण को लगा की अब उसकी सत्ता गई ऐसे में उसने ईश्वर का नहीं बुद्ध का सहारा लिया और ‘बुद्द की बात पर ‘अत्त दीपो भव ‘ की तर्ज पर स्वेव सेवक संघ बनाया  सिर्फ सत्तर साल गुज़रे हैं, आज वो सत्ता पर हैं और बुद्धि की जगह ईश्वर को मायने वाले देख लो कहाँ है

महाराष्ट्र सरकार ने डॉ आंबेडकर के समस्त लेखन और भाषणों को 22 वॉल्यूम में प्रकाशित किया है| इसके अंदर बाबा साहब आंबेडकर ने जो भी कहा है या लिखा है जैसे बौद्ध धम्म पर, राजनीति पर, ब्राह्मणवाद विरोध पर आदि  सब कुछ संकलित है| बाबा साहब की किताबें अगर आप अलग से खरीदें तो एक किताब लगभग 200 से 300 की मिलती है |अगर वॉल्यूम के हिसाब से ही मान ले तो 22  वॉल्यूम  200 रूपए के हिसाब से Rs 44000 के पड़ेंगे| पर महाराष्ट्र सरकार में न्यूनतम लागत मूल्ये पर प्रकाशित और वितरित किये हैं ये हिंदी और अंग्रेजी दोनों में बहुत सस्ते में उपलब्ध है|इसका एक पैकेट आता है जिसमे 22 मोटी किताबें होतीं हैं इसका वजन लगभग दस किलो तो होगा, बड़ा पैकेट है| ये पैकेट लगभग 750  से एक हज़ार रुपये के बीच में मिल जाता है|पूरे भारत में कहीं भी पाने के लिए  इसके लिए निखिल सबलानिया से 8527533051 इस नंबर पर संपर्क करें या गोलमार्केट कनॉट पैलेस से केवल 750 रुपये में खुद खरीद कर ले आएं| हम लोग शादियों में अपने लोगों को महंगे महंगे गिफ्ट देते हैं, मैं समझता हूँ 1 हज़ार रुपये से ऊपर के तो होते ही हैं वो गिफ्ट बहुजनों में आंबेडकर मिशन की वजह से अब इतनी औकात तो पा ही ली है, ये और बात है की वो इसका श्रेय किसी माता  या देवता या भगवान को दें| खेर अब मैं आपको एक गिफ्ट आईडिया देना चाहता हूँ|  डॉ आंबेडकर के समस्त लेखन और भाषणों को २२ वॉल्यूम के इस बड़े दस किलो के पैकेट को चमकीली पिन्नी में लपेटकर शादी में गिफ्ट कर दो, आपके सिर्फ 750 रूपए खर्र्च होंगे और इतना बड़ा गिफ्ट भी हो जायेगा| इसमें सबसे बड़ी बात ये है की आप मिशन का काम कर रहे हो बहुजन विचारधारा को प्रचारित कर रहे हो, हमारे लोग पढ़ना और जानना तो चाहते हैं पर ये किताबे खुली मार्किट में उपलब्ध न होने और अन्य व्यक्तिगत और ब्राह्मणवादी कारणों से इनकी पहुंच इस विचारधारा तक नहीं बन पाती| जब ब्राह्मणवादी अपने वर्चस्व को बचाने के लिए करोड़ों रुपये के यज्ञ,भजन संध्या, मन्दिरबाजी, जागरण आदि करते हैं (ब्राह्मणवादी ही नहीं हमारे अपने लोग भी ब्राह्मणवाद को बढ़ने में खूब धन खर्च करते हैं), तो हम लोग भी अपने वर्चस्व को बचाने के लिए कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं|…समयबुद्धा