3-Feb-2015 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: डॉ अम्बेडकर ने कहा था “जिसे अपना जीवन बदलना है उसे लड़ना होगा और जिसे लड़ना है उसे पढ़ना होगा ” पर सवाल ये है की ब्राह्मणवादी सिलेबस के क्या पढ़ा लिखा बहुजन सही मायने में जागरूक है अगर नहीं तो क्यों? इसके लिए क्या करें?


avidhya fooleकिसी भी व्यक्ति या कौम की दुर्दशा होने की शुरुआत उसी क्षण से होती है जब वो तथ्यों या ज्ञान की बातों को ‘नज़रअंदाज और अनसुना’ करना शुरू करता है|आप खुद ये बात नोट करना की जो नाकामयाब व्यक्ति होगा वो ज्ञान की बात को पूरा सुनने से पहले ही ख़ारिज कर देगा,जबकी कामयाब आदमी हर बात को पहले सुनता है, सोचता है फिर उसे अपनाता या ख़ारिज करता है|संसार में सब कुछ है, ये हमपर है हम क्या चुनते हैं, चुनाव के लिए ज्ञान होना जरूरी है, ज्ञान के लिए जानना जरूरी है और जानने के लिए धैर्य से सुनना और समझना जरूरी है, समझने के लिए ध्यान देना जरूरी है|सोचो की स्कूल में एक से अध्यापक और शिक्षा के बावजूद कुछ कामयाब और कुछ नाकामयाब क्यों हो जाते हैं,जवाब वही है जो ध्यान देना या न देना|देखो अपने आस पास जो भी  गुलाम मानसिकता का व्यक्ति होगा वो अपने खाली समय में भी बजाये दिमाग पर जोर देने,सोचने, सुसंगति ढूंढने, पढ़ने,ज्ञान चर्चा आदि में शामिल होने के, वो गाना बजाने, बेफ़िजूत की बातों और धार्मिक बाबाओं या स्थलों के चक्कर काटने में अपना समय बर्बाद करेगा|ऐसे लोगों को समझाने की कोशिश करने वाले को दुखी और निराश, और कई बार जान से भी हाथ धोना पड़ता है क्योंकि मूर्ख से बड़ा और कोई दुश्मन नहीं|सदा ध्यान रहे की हमारा ‘नज़रअंदाज और अनसुना करना और ढीलमढाल रव्वैया हमारी दुर्दशा का मूल कारण है|संसार में दो ही तह के लोग है एक वो जो जीवन को अपने हिसाब से चलाते हैं, ये शाशक बनते हैं जो गुलामों के भाग्य का फैसला करते हैं |दुसरे वो जो ‘नज़रअंदाज और अनसुना’ करके जीवन के हिसाब से चलते हैं ये ही गुलाम हैं,आप सोचिये आप किनमे से हैं?

हिन्दू दलितों को जब कोई जागरूक अम्बेडकरवादी बौद्ध उसकी गुलामी का कारन और निवारण समझाता है तो वो अपने को उससे बचने लगता है, अपनी हिंदुत्व की गुलामी की रक्षा के लिए या तो लड़ने लगता है या कट के ऐसे अलग निकल जाता है जैसे कोई गलत बात कर दी गयी हो|बिरसा मुंडा ने ठीक कहा था की “जो लोग ब्राह्मणों के ब्राह्मण धर्म की गुलामी करते हैं ब्राह्मण ऐसे गुलामों को हिन्दू कहते हैं”| अगर ये लोग सोये हुए है और इनको गुलामी इतनी ही पसंद है तो फिर लगता है मायावती ने ठीक ही किया जो ब्राह्मणों के साथ मिलकर कुछ कर तो लिया, पा तो लिया| अगर इन गुलामों के जागने का इंतज़ार करती रहती तो कभी कुछ भी हासिल नहीं कर पाती| एक वक्त था जब अम्बेडकरवादियों की राजनैतिक संगर्ष को सवर्ण मजाक समझते थे, और व्यंग करते थे की ये लोग कभी सरकार बना भी पाएंगे|  आज बसपा की कामयाबी के बाद सवर्णों के दिमाग ने ये बात मान ली है की कोई अम्बेडकरवादी बौद्ध भी मुख्यमंत्री बन सकता है| अब बहुजन समाज ने कम से कम अम्बेडकरवादी का अपने दम पर मुख्ये मंत्री बनने को साबित करके मुख्ये मंत्री बनने का सदा के लिए रास्ता  खोल दिया| ये बहुजन संगर्ष का मील का पत्थर है|…

पढा-लिखा होना और जागृत होना दोनो में अंतर है । किताबों को पढ लेने से,या डिग्रियां हासील कर लेने से कोइ जागृत नहीं कहा जा सकता । हर शिक्षित व्यक्ति जागृत ही हो,एसा नहीं है ।

जागृति का प्रथम सिद्धांत है÷ अपने दोस्त की पेहचान होना ।

जागृति का दुसरा सिद्धांत है÷ अपने दुश्मन की पेहचान होना ।

जाग्ति का तिसरा सिद्धांत है÷ अपनी ताकत और कमजोरी मालुम होना ।

जागृति का चौथा सिद्धांत है÷ दुश्मन की ताकत और कमजोरी मालुम होना ।

और जागृति का पांचवां सिद्धांत है÷ अपने महापुरुषों का इतिहास मालुम होना ।

यह पांच बातें अगर आपको मालुम है,और आप अनपढ भी हो,फिर भी आप जागृत कहे जा सकते हो । और अगर आप को ये पांच बातें नहीं मालुंम है,और आप
शिक्षित भी हो,फिर भी आप जागृत नहीं हो । आप डॉक्टर, वकील इंजिनियर,प्रोफेसर,IPS,IAS,हो सकते हो । मगर आप जागृत नहीं कहे जा सकते।

 

डॉ आंबेडकर ने कहा है “जिसे अपने दुखों से मुक्ति चाहिए उसे लड़ना होगा और जिसे लड़ना है उसे पहले पढ़ना होगा क्योंकि ज्ञान के बिना लड़ने गए तो हार निश्चित है|” पढाई भी दो प्रकार की होती है एक वो जससे आप शिक्षित होते है जैसे स्कूल या कॉलेज की शिक्षा और दूसरी अपना इतिहास की| डॉ आंबेडकर ने कहा है “जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती वो अपना भविष्य नहीं सुधार सकती” | अपने इतिहास का जानकारी न होने की ही वजह से भारत को विश्वगुरु विश्वविजेता बनाने वाले बौद्ध लोग आज खुद को शूद्र समझकर शोषण सह रहे हैं, जब भी लड़ते हैं तो हारते हैं|अपने आस पास देखो,यहाँ या काम पढ़े गुलाम और मजदूर मानसिकता के शूद्र हैं जीमे से कुछ समझने को ही तैयार नहीं दुसरे वो हैं जो केवल स्कूल या कॉलेज की शिक्षा तक सीमित रहने वाले| दुसरे वाले जाने अनजाने ब्राह्मणवादी कठपुतली बन रहे हैं, चाहे वो नौकरी हो या शादी या राजनीति या धर्म आदि |इसपर डॉ आंबेडकर ने कहा है “मेरी नज़र में शिक्षित वही है जो अपने दुश्मन को पहचानता है”| आपका दुश्मन हर बार रूप और नाम बदल कर आपको नोचता रहता है  आप हर बार धोका खा जाते हो, कभी देवता के नाम पर कभी धर्म के नाम पर कभी कानून के नाम पर कभी पाप पुण्ये के नाम पर तो कभी देश के नाम पर, एक बाद इसकी जड़ ही समझ लो न| कोई भी आपको नहीं समझा सकता न आपको आज़ादी दिल सकता है जब तक आप खुद समझकर आज़ाद न होना चाहे, इसीलिए गौतम बुद्ध ने कहा है “अत्त दीपो भव” अपना दीपक खुद बनो| खुद जानो परखो फिर मनो और आगे बड़ो|डॉ आंबेडकर और गौतम बुद्ध की तस्वीर से आपको कुछ न मिलगा चाहे दिन रात एक कर दो अगर मिलेगा तो उनकी शिक्षा में, जो इतनी जबरदस्त है की डर के मारे ब्राह्मणवादी इस का प्रचार नहीं होने देते|इनकी एक एक बात आँखे खोलने वाली है, बस इनसे घृणा छोड़ो,अपने जागने की चाहत और समझ विकसित करो, कल्याण निश्चित है|….

जनता जिस भी चीज़ को प्रेम करती है , ब्राह्मणवादी उसी के नाम पर उसके पीछे छुप कर बहुजन जनता का शोषण करते हैं, कभी ईश्वर के पीछे छुप कर कभी धर्म के और आजकल देश प्रेम के पीछे छुपकर| यही कारण हैं की मेरे भोले भाले नासमझ बहुजन समझ ही नहीं पाते की आखिर उनका शोषण कौन कर रहा है| उसकी दुर्दशा गलत ब्राह्मणवादी नीतिओं की वजह से होती है और वो कभी धर्म को तो कभी ईश्वर को तो कभी वर्तमान सरकार को दोषी ठहराकर असल शोषक तक पहुंच ही नहीं पाते| उल्टा असल शोषक को तो वो बड़े सम्मान के साथ अपने सर माथे पर बैठता है|अगर कोई बहुजन नेता जनता को समझाने में सफल भी हो जाता है तो ये अपना या अपनी संस्था का नाम बदल लेते है, नए नाम और रूप से बहुजन फिर धोखा खा जाते हैं,जनता ज्यादा जागरूक हो जाती है तो ये किसी मूर्ख बहुजन को ढूंढ़कर उसी को राजा बनाकर शोषण करते हैं|बहुजनों की नासमझी और ब्राह्मणवादियों की अति चतुराई, इनका तो कोई मुकाबला ही नहीं ये जंग तो एक तरफ़ा हैं जहाँ जीतने वाला और हारने वाला तो सदियों से पहले ही तय है,कमाल है !!..|इसीलिए इस जंग में बुद्ध से लेकर कबीर,नानक,रविदास, डॉ आंबेडकर आदि तक सभी ने बुद्धि विकसित करने पर जोर दिया, इसीलिए डॉ आंबेडकर ने बौद्ध धम्म में वापस लौटना चुना न की किसी वर्तमान धर्म को चुना| आप समझ सकते हो की अगर वो किसी वर्तमान धर्म को चुनते तो लोगों का धर्म तो बदल जाता गुलामी वहीँ की वहीँ रहती| बुद्धि का विकास ही मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य है और याद रहे जब तक आपने अपनी बुद्धि को ज्ञान से विकसित नहीं करेंगे  दुनिया की कोई राजनीतिज्ञ,राजा, देव, देवी,ईश्वर, धर्म या महापुरुष और कर्मकांड आपको मुक्ति नहीं दिला सकता| ध्यान रहे पढ़ो और ज्ञान बढ़ाओ, बेहतर जिंदगी का रास्ता बेहतर किताबों से होकर गुज़रता है| अप्प दीपो भव अर्थात अपना मार्गदर्शक स्वेव बनो

ब्राह्मणवाद के पक्ष में लोग ज्यादा इसलिए रहते हैं क्योंकि वो ब्राह्मणवाद की कहानियों को जानते है और उससे जुड़े त्योहारों में खूब मस्ती करते हैं, ये और बात है की इनको मस्ती के आलावा कुछ नहीं मिलता,जबकि ब्राह्मणवादी न केवल कमाते हैं बल्कि उनकी कमाई का ब्रांड “धर्म और ईश्वर” के झंडे का प्रचार प्रसार हो जाता है| बौद्ध धम्म को जो जानते हैं वो अक्सर सोचते हैं की धम्म में मनुष्यों की कितनी भलाई  है फिर भी ये ब्राह्मणवाद की गुलामी में खुश है,सोचने वाली बात है ऐसा क्यों? इस बात का जवाब ऐसे समझो की जब हम बच्चे थे तो क्या पसंद करते थे- टीवी पर गाना बजाना या स्कूल की किताब?निश्चित रूप से हमें किताब नहीं टीवी पसंद था जबकि हमारे अध्यापक और माता पिता अच्छी तरह जानते थे की हमारा भला टीवी में नहीं किताब में हैं| तो वहां तो माता पिता जबरदस्ती टीवी बंद करके पढाई पर जोर देते थे और अध्यापक भी पढता था| पर बौद्ध धम्म में जोर नहीं दिया जा सकता क्योंकि इसमें ऐसा ही चलन है, बस मार्ग बताओ मानना न मानना सामने वाले पर है| दूसरी बात न ही इसमें चकाचौंध है, न ही गाना बजाना, न ही चमत्कार|तो हम समझ सकते है की भले की बौद्ध धम्म कितना भी अच्छा हो पर आम जनता ब्राह्मण धर्म को ही पसंद करेगी क्योंकि केवल दर प्रतिशत जनता ही बुद्धिजीवी और जागरूक जीवन बिताती है बाकि की नब्बे प्रतिशत आम जनता बुद्धि पर ज्यादा जोर नहीं देना चाहती उसे मस्ती चाहिए, ज्ञान नहीं | कहाँ एक तरफ डॉल्बी डिजिटल सराउंड साउंड  रंगीन स्क्रीन पर रंगीन नाच गाना और कहाँ दूसरी तरफ सफ़ेद पन्ने पर काले अक्षर, हद तो ये है की कोई चित्र भी नहीं| पर बौद्ध भी क्या करें सत्य बदसूरत और कड़वा ही होता है और ये निश्चित है की जिसे मुक्ति चाहिए उसे लड़ना होगा और जिसे लड़ना है उसे पढ़ना होगा|उसका जीवंत उदारहण है की आम जनता ईश्वर के भरोसे रहती हैं जबकि ब्राह्मण बुद्ध से घृणा का दिखावा तो करते हैं, पर असल में वो खुद हर बात मानते हैं और जनता को ईश्वर और धर्म पकड़ा देते है|देखो जब भारत में डॉ आंबेडकर ने राजतन्त्र की जगह लोकतंत्र को चुना तब अल्पसंख्यक ब्राह्मण को लगा की अब उसकी सत्ता गई ऐसे में उसने ईश्वर का नहीं बुद्ध का सहारा लिया और ‘बुद्द की बात पर ‘अत्त दीपो भव ‘ की तर्ज पर स्वेव सेवक संघ बनाया  सिर्फ सत्तर साल गुज़रे हैं, आज वो सत्ता पर हैं और बुद्धि की जगह ईश्वर को मायने वाले देख लो कहाँ है

महाराष्ट्र सरकार ने डॉ आंबेडकर के समस्त लेखन और भाषणों को 22 वॉल्यूम में प्रकाशित किया है| इसके अंदर बाबा साहब आंबेडकर ने जो भी कहा है या लिखा है जैसे बौद्ध धम्म पर, राजनीति पर, ब्राह्मणवाद विरोध पर आदि  सब कुछ संकलित है| बाबा साहब की किताबें अगर आप अलग से खरीदें तो एक किताब लगभग 200 से 300 की मिलती है |अगर वॉल्यूम के हिसाब से ही मान ले तो 22  वॉल्यूम  200 रूपए के हिसाब से Rs 44000 के पड़ेंगे| पर महाराष्ट्र सरकार में न्यूनतम लागत मूल्ये पर प्रकाशित और वितरित किये हैं ये हिंदी और अंग्रेजी दोनों में बहुत सस्ते में उपलब्ध है|इसका एक पैकेट आता है जिसमे 22 मोटी किताबें होतीं हैं इसका वजन लगभग दस किलो तो होगा, बड़ा पैकेट है| ये पैकेट लगभग 750  से एक हज़ार रुपये के बीच में मिल जाता है|पूरे भारत में कहीं भी पाने के लिए  इसके लिए निखिल सबलानिया से 8527533051 इस नंबर पर संपर्क करें या गोलमार्केट कनॉट पैलेस से केवल 750 रुपये में खुद खरीद कर ले आएं| हम लोग शादियों में अपने लोगों को महंगे महंगे गिफ्ट देते हैं, मैं समझता हूँ 1 हज़ार रुपये से ऊपर के तो होते ही हैं वो गिफ्ट बहुजनों में आंबेडकर मिशन की वजह से अब इतनी औकात तो पा ही ली है, ये और बात है की वो इसका श्रेय किसी माता  या देवता या भगवान को दें| खेर अब मैं आपको एक गिफ्ट आईडिया देना चाहता हूँ|  डॉ आंबेडकर के समस्त लेखन और भाषणों को २२ वॉल्यूम के इस बड़े दस किलो के पैकेट को चमकीली पिन्नी में लपेटकर शादी में गिफ्ट कर दो, आपके सिर्फ 750 रूपए खर्र्च होंगे और इतना बड़ा गिफ्ट भी हो जायेगा| इसमें सबसे बड़ी बात ये है की आप मिशन का काम कर रहे हो बहुजन विचारधारा को प्रचारित कर रहे हो, हमारे लोग पढ़ना और जानना तो चाहते हैं पर ये किताबे खुली मार्किट में उपलब्ध न होने और अन्य व्यक्तिगत और ब्राह्मणवादी कारणों से इनकी पहुंच इस विचारधारा तक नहीं बन पाती| जब ब्राह्मणवादी अपने वर्चस्व को बचाने के लिए करोड़ों रुपये के यज्ञ,भजन संध्या, मन्दिरबाजी, जागरण आदि करते हैं (ब्राह्मणवादी ही नहीं हमारे अपने लोग भी ब्राह्मणवाद को बढ़ने में खूब धन खर्च करते हैं), तो हम लोग भी अपने वर्चस्व को बचाने के लिए कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं|…समयबुद्धा

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