जिन भारतीय लोगों को दलित बोलकर तिरस्कार किया जा रहा है , जब उनको मौका मिला तो उन्होंने भारत को विश्व गुरु बनाया था, देखिये और समझिए भारत के मूलनिवासिओं की संसार को एक अप्रतिम देन नालंदा विश्वविद्यालय-[बिहार] Buddhist Nalanda University


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नालंदा विश्वविद्यालय-[बिहार]

बिहार का ऐतिहासिक नाम …मगध है,बिहार का नाम ‘बौद्ध विहारों’शब्द का विकृत रूप माना जाता है,इस की राजधानी पटना है जिसका पुराना नाम पाटलीपुत्र था.!
आज आप को एक ऐसे दर्शनीय जगह लिए चलते हैं जिसके बारे में बहुत लोग जानते हैं.-

बिहार में एक जिला है नालंदा…संस्कृत में नालंदा का अर्थ होता है “ज्ञान देने वाला” (नालम = कमल, जो ज्ञान का प्रतीक है; दा = देना).

कहते हैं कि इस की स्थापना ४७० ई./४५० ई.[?] में गुप्त साम्राज्य के राजा कुमारगुप्त ने की थी। यह विश्व के प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक था जहां १०,००० छात्र और २,००० शिक्षक रहते थे।

भारत में दुनिया के सबसे पहले विश्वविद्यालय तक्षशिला विश्वविद्यालय की स्थापना सातवीं शताब्दी ईसापूर्व यानी नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना से करीब १२०० साल पहले ही हो गई थी। यह नालंदा भारत का दूसरा प्राचीन विश्वविद्यालय है, जिसका पुनर्निर्मा…ण किया जा रहा है। विश्वविद्यालय की स्थापना से काफी पहले यानी करीब १००० साल पहले गौतम बुद्ध के समय (५०० ईसापूर्व ) से ही नालंदा प्रमुख गतिविधियों का केंद्र रहा है।
तमाम बौद्ध साक्ष्यों में उल्लेख है कि गौतमबुद्ध नालंदा में कई बार आए थे। वहां एक आम के बगीचे में धम्म के संदर्भ में विचार विमर्श किया था। आखिरी बार गौतम बुद्ध नालंदा आए तो मगध के सारिपुत्त ने बौद्ध धर्म में अपनी आस्था जताई। यह भगवान बुद्ध का दाहिना हाथ और सबसे प्रिय शिष्यों में एक था। केवत्तसुत्त में वर्णित है कि गौतम बुद्ध के समय नालंदा काफी प्रभावशाली व संपन्न इलाका था। शिक्षा का बड़ाकेंद्र बनने तक यह घनी आबादी वाला जगह बन गया था। विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद दुनिया के सबसे लोकप्रिय जगहों में शुमार हो गया। बौद्ध ग्रंथ संयुक्त निकाय में यहां अकाल पड़ने का भी उल्लेख है। गौतम बुद्ध का शिष्य सारिपुत्त तो नालंदा में ही पैदा हुआ और यहीं इसका निधन भी हुआ ( सारिपुत्त के निधन की जगह नालका की पहचान की इतिहासकारो ने नालंदा से की है।
बौद्ध अनुयायी सम्राट अशोक ( २५०ईसापूर्व ) ने तो सारिपुत्त की याद में यहां बौद्ध स्तूप बनवायाथा। नालंदा तब भी कितना महत्वपूर्ण केंद्र था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह जैन धर्मावलंबियों के लिए भी महत्वपूर्ण केंद्र था। जैन तीर्थंकर महावीर ने जिस पावापुरी में मोक्ष प्राप्त किया था, वह नालंदा में ही था। नालंदा पाचवीं शताब्दी में आकर शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र में तब्दील हो गया।
अब पुनः अपनी स्थापना से करीब १५०० साल बाद विश्वप्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय के फिर से दुनिया का वृहद शिक्षाकेंद्र बनाने की नींव पड़ गई है। आज राज्यसभा ने इससे संबंधित विधेयक को मंजूरी दे दी। गुप्तराजाओं के उत्तराधिकारी औरपराक्रमी शासक कुमारगुप्त ने पांचवीं शताब्दी में इस विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। गुप्तों के बाद इसे महान सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। इस विश्वविद्यालय की नौवीं शती से बारहवीं शती तक अंतरर्राष्ट्रीयख्याति रही थी। सातवीं शती में जब ह्वेनसांग आया था उस समय १०००० विद्यार्थी और १५१० आचार्य नालंदा विश्वविद्यालय में थे। इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे।

नालंदा विश्वविद्यालय में विद्यार्थी विज्ञान, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, तर्कशास्त्र, गणित, दर्शन, तथा हिन्दु और बौद्ध धर्मों का अध्ययन करते थे। चौथी से सातवीं ईसवी सदी के बीच नालंदा का उत्कर्ष हुआ।

अध्ययन करने के लिए चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत, इंडोनेशिया, इरान और तुर्की आदि देशो से विद्यार्थी आते थे। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन्सांग ने भी ईस्वी सन् ६२९ से ६४५ तक यहां अध्ययन किया था तथा अपनी यात्रा वृतान्तों में उसने इसका विस्तृत वर्णन किया है। सन् ६७२ ईस्वी में चीनी इत्सिंग ने यहाँ शिक्षा प्राप्त की।कहा जाता है कि नालंदा विश्वविध्यालय में चालीस हजार पांडुलिपियों सहित अन्य हजारों दुर्लभ हस्त लिखित पुस्तकें थी !

खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था। एक प्राचीन श्लोक के अनुसार आर्यभट नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे। आर्यभट के लिखे तीन ग्रंथों की जानकारी आज भी उपलब्ध है। दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र।

यहाँ के तीन बड़े बड़े पुस्तकालय के नाम थे -:

1. रत्न सागर 2. विढ्ध्यासागर 3. ग्रंथागार

बौद्ध धर्म असल में ब्राहमणवादी गलत कर्म कंडों और जातिगत बटवारे की खिलाफत के रूप में फल फूला और स्वीकार किया गया | समानता और समरसता, ऊच नीच फ़ैलाने वाले ये बात ब्राह्मणों को कतई बर्दास्त नहीं हो रही थी ,परिणाम स्वरुप  ब्राह्मणों द्वारा षडीयन्त्र ही  मौर्या साम्राज्य  के पतन का मुख्य कारण था|  मौर्या साम्राज्य  के पतन के बाद बौद्ध धर्म का कोई सरक्षक नहीं बचा और तब कट्टर हिन्दुओं ने सभी बौद्ध विहार,  बौद्ध मूर्ती,विश्विद्यालय,साहित्य एव ईतिहास को नस्ट करना शुरू किया| इसी कड़ी में नालंदा विश्वविद्यालय की ऐसी दुर्गति करके भारत देश में से समानता और शिक्षा को बंद करके हिन्दू धर्म को थोपने के लिए मनुवादी संविधान लागू किया गया |

 नालंदा विश्वविद्यालय को इन महास्वार्थी लोगों ने तहस नहस कर दिया और पुस्तकालय में आग लगा दी, कहते हैं यह ६ माह तक जलती रही और आक्रांता इस अग्नि में नहाने का पानी गर्म करते थे.

ये कहा जाता है की बौद्ध भिक्षुओं द्वारा किये सभी शोध इन पुस्तकालयों में सुरक्षित थी जो आज हम टेक्नोलोजी देख रहे है वो पहले है बन चुकी थी ! आज भी पुष्पक विमान बन सकता है जिसकी सरचना रावण संहिता में दिया गयी है ! और सभी चिकित्सा के शोध भी !

आप अंदाज लगा सकते है कि जब आग लगाई गयी तो ६ महीनो तक जलती रही तो कितनी शोध और ग्रन्थ जले होंगे !

अधिक जानकारी के लिए प्रसिद्ध इतिहासकार “राहुल सनस्क्रतीयान” की किताब “TIBET MAIN BODH DHARAM ” पेज संख्या 312 से 318 देखे उसके कुछ अंश इस प्रकार है -बिहार का ऐतिहासिक नाम मगध है,बिहार का नाम बौद्ध विहारों’शब्द का विकृत रूप माना जाता है,इस की राजधानी पटना है जिसका पुराना नाम पाटलीपुत्र था.!

आज आप को एक ऐसे दर्शनीय जगह लिए चलते हैं जिसके बारे में बहुत लोग जानते हैं.-

 

बिहार में एक जिला है नालंदा…स…ंस्कृत में नालंदा का अर्थ होता है ज्ञान देने वाला (नालम = कमल, जो ज्ञान का प्रतीक है; दा = देना).

 

कहते हैं कि इस की स्थापना ४७० ई./४५० ई.[?] में गुप्त साम्राज्य के राजा कुमारगुप्त ने की थी। यह विश्व के प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक था जहां १०,००० छात्र और २,००० शिक्षक रहते थे।

भारत में दुनिया के सबसे पहले विश्वविद्यालय तक्षशिला विश्वविद्यालय की स्थापना सातवीं शताब्दी ईसापूर्व यानी नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना से करीब १२०० साल पहले ही हो गई थी। यह नालंदा भारत का दूसरा प्राचीन विश्वविद्यालय है, जिसका पुनर्निर्मा…ण किया जा रहा है। विश्वविद्यालय की स्थापना से काफी पहले यानी करीब १००० साल पहले गौतम बुद्ध के समय (५०० ईसापूर्व ) से ही नालंदा प्रमुख गतिविधियों का केंद्र रहा है।

तमाम बौद्ध साक्ष्यों में उल्लेख है कि गौतमबुद्ध नालंदा में कई बार आए थे। वहां एक आम के बगीचे में धम्म के संदर्भ में विचार विमर्श किया था। आखिरी बार गौतम बुद्ध नालंदा आए तो मगध के सारिपुत्त ने बौद्ध धर्म में अपनी आस्था जताई। यह भगवान बुद्ध का दाहिना हाथ और सबसे प्रिय शिष्यों में एक था। केवत्तसुत्त में वर्णित है कि गौतम बुद्ध के समय नालंदा काफी प्रभावशाली व संपन्न इलाका था। शिक्षा का बड़ाकेंद्र बनने तक यह घनी आबादी वाला जगह बन गया था। विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद दुनिया के सबसे लोकप्रिय जगहों में शुमार हो गया। बौद्ध ग्रंथ संयुक्त निकाय में यहां अकाल पड़ने का भी उल्लेख है। गौतम बुद्ध का शिष्य सारिपुत्त तो नालंदा में ही पैदा हुआ और यहीं इसका निधन भी हुआ ( सारिपुत्त के निधन की जगह नालका की पहचान की इतिहासकारो ने नालंदा से की है।

बौद्ध अनुयायी सम्राट अशोक ( २५०ईसापूर्व ) ने तो सारिपुत्त की याद में यहां बौद्ध स्तूप बनवायाथा। नालंदा तब भी कितना महत्वपूर्ण केंद्र था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह जैन धर्मावलंबियों के लिए भी महत्वपूर्ण केंद्र था। जैन तीर्थंकर महावीर ने जिस पावापुरी में मोक्ष प्राप्त किया था, वह नालंदा में ही था। नालंदा पाचवीं शताब्दी में आकर शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र में तब्दील हो गया।

अब पुनः अपनी स्थापना से करीब १५०० साल बाद विश्वप्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय के फिर से दुनिया का वृहद शिक्षाकेंद्र बनाने की नींव पड़ गई है। आज राज्यसभा ने इससे संबंधित विधेयक को मंजूरी दे दी। गुप्तराजाओं के उत्तराधिकारी औरपराक्रमी शासक कुमारगुप्त ने पांचवीं शताब्दी में इस विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। गुप्तों के बाद इसे महान सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। इस विश्वविद्यालय की नौवीं शती से बारहवीं शती तक अंतरर्राष्ट्रीयख्याति रही थी। सातवीं शती में जब ह्वेनसांग आया था उस समय १०००० विद्यार्थी और १५१० आचार्य नालंदा विश्वविद्यालय में थे। इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे।

 

नालंदा विश्वविद्यालय में विद्यार्थी विज्ञान, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, तर्कशास्त्र, गणित, दर्शन, तथा हिन्दु और बौद्ध धर्मों का अध्ययन करते थे। चौथी से सातवीं ईसवी सदी के बीच नालंदा का उत्कर्ष हुआ।

 अध्ययन करने के लिए चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत, इंडोनेशिया, इरान और तुर्की आदि देशो से विद्यार्थी आते थे। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन्सांग ने भी ईस्वी सन् ६२९ से ६४५ तक यहां अध्ययन किया था तथा अपनी यात्रा वृतान्तों में उसने इसका विस्तृत वर्णन किया है। सन् ६७२ ईस्वी में चीनी इत्सिंग ने यहाँ शिक्षा प्राप्त की।कहा जाता है कि नालंदा विश्वविध्यालय में चालीस हजार पांडुलिपियों सहित अन्य हजारों दुर्लभ हस्त लिखित पुस्तकें थी !

 खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था। एक प्राचीन श्लोक के अनुसार आर्यभट नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे। आर्यभट के लिखे तीन ग्रंथों की जानकारी आज भी उपलब्ध है। दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र।

 यहाँ के तीन बड़े बड़े पुस्तकालय के नाम थे -:

 

1. रत्न सागर 2. विढ्ध्यासागर 3. ग्रंथागार

बौद्ध धर्म असल में   गलत कर्म कंडों और जातिगत बटवारे की खिलाफत के रूप में फल फूला और स्वीकार किया गया | समानता और समरसता, ऊच नीच फ़ैलाने वाले लोगों को  कतई बर्दास्त नहीं हो रही थी ,परिणाम स्वरुप इन लोगों  द्वारा षडीयन्त्र ही मौर्या साम्राज्य के पतन का मुख्य कारण था| मौर्या साम्राज्य के पतन के बाद बौद्ध धर्म का कोई सरक्षक नहीं बचा और तब इन कट्टर जाती समर्थक लोगों ने सभी बौद्ध विहार, बौद्ध मूर्ती,विश्विद्यालय,साहित्य एव ईतिहास को नस्ट करना शुरू किया| इसी कड़ी में नालंदा विश्वविद्यालय की ऐसी दुर्गति करके भारत देश में से समानता और शिक्षा को बंद करके हिन्दू धर्म को थोपने के लिए मनुवादी संविधान लागू किया गया |

 भारत के हिन्दुओं को छोड़कर बाकि सारी दुनिया जानती है की भारत के अच्छे दिन केवल सम्राट अशोक महान और अकबर महान के काल में ही आये थे, बाकि के वक़्त तो एक जाती को ऊपर बनाये रखने हेतु केवल राजनैतिक और धार्मिक षडियंत्र ही होते रहे

3 thoughts on “जिन भारतीय लोगों को दलित बोलकर तिरस्कार किया जा रहा है , जब उनको मौका मिला तो उन्होंने भारत को विश्व गुरु बनाया था, देखिये और समझिए भारत के मूलनिवासिओं की संसार को एक अप्रतिम देन नालंदा विश्वविद्यालय-[बिहार] Buddhist Nalanda University

  1. Apart from Adi Shankaracharya’s Hinduism phillosophy the major destruction of Buddhism in Nalanda was carried out by the fanatic Bakhtiyar Khilji, a Turk . In 1193, the Nalanda University was sacked by the fanatic Bakhtiyar Khilji & this event is seen by scholars as a late milestone in the decline of Buddhism in India.The Persian historian Minhaj-i-Siraj, in his chronicle the Tabaquat-I-Nasiri, reported that thousands of monks were burned alive and thousands beheaded as Khilji tried his best to uproot Buddhism and plant Islam by the sword, the burning of the library continued for several months and “smoke from the burning manuscripts hung for days like a dark pall over the low hills.
    http://en.wikipedia.org/wiki/Nalanda

  2. कहते हैं परिवर्तन संसार का नियम है। और जो खुदको नहीं बदलता है उसका विनाश निश्चित होता है। लेकिन हिन्दू धर्म एक मात्र ऐसा धर्म है जिसमें लोगों ने अपनी सुविधानुसार नियम बनाये और तोड़े। जैसे सती प्रथा, महिलाओं को शिक्षा , बाल विवाह और जातिवाद।
    यदि कोई सोचता है कि सनातन धर्म को कोई नही मिटा सकता, मै उन्हें
    मुर्ख और बेवकूफ ही समझता हूँ क्योंकि या तो वो अज्ञानी है या अहंकारी।
    जरा इतिहास पर एक नजर डालो।
    अफगानीस्तान से हिंदू क्यों मिट गया? काबुल जो भगवान राम के पुत्र कुश का बनाया शहर था, आज वहाँ एक भी मंदिर नही बचा ! गांधार जिसका विवरण महाभारत मे है, जहां की रानी गांधारी थी, आज उसका नाम कंधार हो चूका है, और वहाँ आज एक भी हिंदू नही बचा ! कम्बोडिया जहां राजा सूर्य देव बर्मन ने
    दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर अंकोरवाट बनाया, आज वहाँ भी हिंदू नही है ! बाली द्वीप मे 20 साल पहले तक 90% हिंदू थे, आज सिर्फ 20% बचे है ! कश्मीर घाटी मे सिर्फ 20 साल पहले 50% हिंदू थे, आज 1% भी हिंदू नही बचा ! केरल मे 10 साल पहले तक 60% जनसंख्या हिन्दुओ की थी, आज सिर्फ 10% हिंदू केरल मे है !
    नोर्थ ईस्ट जैसे सिक्किम, नागालैंड, आसाम आदि मे हिंदू और हिंदी भाषियों को कत्लेआम किया जाता है ,या उनका धर्मपरिवर्तन हो रहा है ! दोस्तों 1569 तक ईरान का नाम पारस या पर्शिया होता था और वहाँ एक भी मुस्लिम नही था, सिर्फ पारसी रहते थे.. जब पारस पर मुस्लिमो का आक्रमण होता था, तब पारसी बूढ़े-बुजुर्ग अपने नौजवान को यही सिखाते थे की हमे कोई मिटा नही सकता, लेकिन ईरान से सारे के सारे पारसी मिटा दिये गए.धीरे-धीरे उनका कत्लेआम और धर्म परिवर्तन होता रहा. एक नाव मे बैठकर 21 पारसी किसी तरह गुजरात के नवसारी जिले के उद्वावाडा गांव मे पहुचे और आज पारसी सिर्फ भारत मे
    ही गिनती की संख्या मे बचे है.

    ईसाईयों के 80 देश और मुस्लिमो के 56 देश है, और हिन्दुओं का एकमात्र देश भारत वहां भी जातियों की वजह से खिन्न भिन्न हो चूका है। जैसा कि मैं अपनी पिछली पोस्ट में कह चूका हूँ कि उत्तराखंड और हिमाचल में 50 % अनुसूचित जाति की आबादी हिन्दुओं के बड़ी जातियों के खौफ से धर्म परिवर्तन कर चुकी है। बाकी 50% प्रतिशत भी परेशान जरूर है। यदि यही हाल रहा तो वो समय दूर नहीं जब हिन्दू अल्पसंख्यक कहलायेगा सिर्फ अपनी संकुचित मानसिकता की वजह से।
    यही नहीं अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इराक -ईरान, तिब्बत और भूटान, नेपाल कजाखिस्तान इत्यादि देश भी भारत का ही हिस्सा माने जाते हैं जो समय समय पर भारत से विभाजित हुए हैं। आज नेपाल को छोड़कर किसी भी देश में हिन्दू नाम का प्राणी नहीं पाया जाता है सिर्फ जातिवाद की मानसिकता की वजह से। क्योंकि सबको आत्म सम्मान सर्वप्रिय है ये सबके सोचने का विषय है।
    – आर पी विशाल।

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