5-MAR-2015 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: सवर्णों का संगर्ष आपके संगर्ष से ज्यादा और सही दिशा में है, सावधान अब आपकी गुलामी ज्यादा दूर नहीं…समयबुद्धा


rich-and-poorआज कॉरपोरेट आपको लूट रहा है, (कॉरपोरेट वही है जिसे पहले हम लाला,सामंत,जमीन्दार आदि के नाम से जानते थे)| देश की पूँजी सिमट कर कॉर्पोरेट की तिजोरियों में जा रहा है परिणाम ये है जनता सारा दिन जी तोड़ मेहनत कर के भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दिल सकता,बीमार का इलाज़ नहीं करा सकता, मन मर्जी से खाना पीना गुमना फिरना तो दूर की बात है | इस पर सारा पांडा पुरोहित और सत्संग गुरु जनता को दिन रात समझा रहे हैं की सब ईश्वर कर रहा है, सब कर्मों के फल है आदि आदि, और कमाल की बात है की जनता इस बात को खूब अच्छी तरह समझ जाती है| जब भी बौद्ध उनको समझाता है की आपकी समस्या राजनैतिक है उसका हल भी राजनीती से ही होगा तो ऐसे लोगों को सामाजिक रूप से बहिष्कार और घृणा का शिकार बनाकर दलित और अछूत घोषित कर किनारे कर दिया जाता है| और फिर वही लूटेरे और लूटती जनता अपना खेल शुरू कर देते हैं और मिलकर जगाने वाले बौद्धों को दलित कहकर/बनाकर घृणा करते हैं|घृणा फ़ैलाने से ये होता है की इन तथाकथित दलितों को कहीं भी अपनी प्रतिभा दिखने का मौका ही मिलता| राजनीती और चुनाव में इनके अपने लोग भी इनका साथ नहीं देते|

अधिकतर बहुजन केवल नौकरी करते हैं, नौकरी शब्द पर ध्यान दो – इसका संधि विच्छेद करें तो हम पाते हैं -नौकर + करी , अर्थात नौकर यानि हम में से अधिकतर आज भी नौकर ही हैं| आप जिस कम्पनु में जिस बाजार या मॉल में, जिस फार्म में काम करते हैं क्या आप कबि ये नहीं सोचते की – काश ऐसी फर्म मेरी हो ! मैं नौकर नहीं मालिक होऊं! सोचने में क्या बुराई है पर अगर आप नहीं सोचते तो इसका मतलब पप अपने मन में ये मान कर बैठे हैं की आप केवल नौकर बनने को पैदा हुए हैं मालिक नहीं बनना, साथियों इसी को तो ‘मानसिक गुलामी’ कहते हैं|

वैसे नौकरी करने में कोई बुराई नहीं है अगर आपके समय और परिश्रम का उचित मुआवजा (तनखा) सम्मान के साथ मिले |संसार को चलने के लिए अच्छे उद्यमी और अच्छे वर्कर दोनों की जरूरत है| सभी तो मालिक नहीं बन सकते ये बात मानता हूँ पर मैं ये नहीं मान सकता की बहुजन जिनकी आबादी अस्सी से नब्बे प्रतिशत है, उनमे से मालिक बनने की क़ाबलियत और गुड़ किसी में नहीं| ऐसा क्यों की मालिक सिर्फ सवर्ण ही होते हैं, कभी सोचा आपने?

अगर नहीं सोचा तो आपको सोचना चाहिए, अगर नहीं सोचोगे तो ज्यादा दिन आज़ाद नहीं रह पाओगे, जिस गति से प्राइवेटजेशन या निजीकरण द्वारा सवर्ण हावी होते जा रहे हैं, आप ज्यादा दिनों तक अपना जीवन अपने मन के हिसाब से नहीं गुज़र पाओगे,आप गुलामी की तरफ बढ़ रहे हो|अंग्रेजों की मध्यस्ता में डॉ आंबेडकर संविधान को लागू हुए अभी सिर्फ पैसठ साल ही गुजरे हैं, हज़ारों सालों की गुलामी के बाद ये पैसठ साल की आज़ादी क्या आपको अच्छी नहीं लग रही, आज आब अपनी मर्जी से अपनी बेटी की शादी कर प् रहे हैं, अपनी मर्जी से काम धंधा कर प् रहे हैं, अपनी मर्जी से घर बार धन सपत्ति बना प् रहे हैं, कोई आपसे जोर जबरदस्ती से कर नहीं वसूलता| फिर भी आप अपनी आज़ादी का मूल्य क्यों नहीं समझ रहे इसे बचने को क्यों नहीं संगर्ष करते, जबकि सवर्ण मालिक बनने को जबरदस्त संगर्ष कर रहे हैं|जीवन सूत्र बहुत ही सीधा है “जो संगर्ष करेगा वो पायेगा” |शायद अब आज़ादी और गुलामी का मतलब समझाना पड़ेगा|

क्या आप लोगों को याद है की अभी ८०-९० साल पहले तक हमारे देश में सामंतवाद/ब्राह्मणवाद/ प्राइवेटजेशन/पूँजीवाद/मनुवाद आदि अस्तित्व में थे और बहुजन लोगों का खूब जम कर शोषण हो रहा था| एक गाव होता था जिसमे एक जमींदार बाबू होते थे, जिनके पास गाव की सारी जमीन होती थे, फिर ब्याज पे पैसे देने वाला बनिया होता था और होते थे इन दोनों के लठैत और बन्दूकची| बाकि गाव की सारी जनता जातिओं में बाटी होती थी और अपनी अपनी जाती के हिसाब से काम करते थे कोई अपनी जाती के काम के आलावा कुछ और बनने की करने की सोचता तक नहीं था| और क्या होता था- और क्योंकि बहुजनों के पास कमाने खाने को न ही नौकरी होती थी न ही जमीन तो वो सभी जमींदार के यहाँ मजदूरी करने को मजबूर होते थे| मजदूरी करेंगे तो खाएंगे नहीं तो भूके मर जायेंगे, मजदूरी कब कहाँ क्या करनी है ये आप नहीं जमींदार बाबू तय करते थे, इतना ही नहीं अगर आप सुन्दर लड़की के बाप है तब तो आप अंदाज़ा लगा सकते हो की क्या होता होगा | शिक्षा,मेडिकल सुविधाएँ, मनोरंजन,धन संपत्ति अधि तो बस सपने मात्र थे| पानी पीने तक को आप सवर्णों पर निर्भर थे, दिन रात यही तो कोशिश चलती है की सारे संसाधनों पर कब्ज़ा कर के आपको अपने ऊपर निर्भर बनाया जाए और फिर एक लोटा पानी में एक मुट्ठी अनाज में आपसे वो ले लिया जाए तो आप देना भी नहीं चाहते थे, इसी को कहते हैं गुलामी| अपनी दुर्दशा पर ज्यादा जानकारी के लिए थोड़ा सा अपना इतिहास ही पढ़ लो, राम कृष्ण,सत्यनारायण,गौरी,गणपति,माता मय्या तो बहुत सुन-पढ़ लिए| एक झलक देखने को प्रेमचंद की एक कहानी है “ठाकुर का कुआँ” इसे ही पढ़ कर देख लो, यहाँ उपलब्ध है लिंक इस प्रकार है:

https://samaybuddha.wordpress.com/2014/02/13/storey-thakur-ka-kuan-by-munshi-premchand/

https://samaybuddha.wordpress.com/2015/02/28/women-in-kerela-agitated-and-won-right-to-cover-their-brest/

अब जो आज हो रहा है उसे समझने को कोशिश करते हैं, इस देश में बहजनों या आम जनता का एक ही सरक्षक है “भारत का संविधान” अगर इसको हटा दो तो आप बताओ कौन है जो आपको नोच कर नहीं खा जाना चाहते चाहे वो नेता हो,उद्योगपति हो, सवर्ण दबंग हो आदि आदि| आज भी पहले जैसा माहौल बन रहा है बस गाव बहुत बड़ा हो गया है अब केट बड़ी बही कम्पनियाँ हो गयीं हैं और उनके मकील पहले के जमींदार बाबू हो गए हैं| पहले के सूदखोर बनिए अब बड़े बड़े प्राइवेट बैंक खोलके वही काम कर रहे हैं औए इनके लठैत और बन्दूकची आज भी उसी मुस्तैदी से इनकी रक्षा करते हैं ,शोषित जनता के गुस्से से बचने में कर रहे हैं|आज निजीकरण या प्राइवेटजेशन या निजीकरण से फिर सारे संसाधनों पर कब्ज़ा कर के आपको अपने ऊपर निर्भर बनाया जा रहा है| आज संवैधानी संस्थयन् जिसे सरकारी स्कूल कालेज, सरकारी अस्पताल, आदि सब महत्वहीन करते जा रहे हैं और इनके मुकाबले में प्राइवेट संस्थाएं अपना सर उठा रही हैं | अब आपका बच्चा इन्हीं के अस्पताल में पैदा होगा इन्हीं के स्कूल कालेज में पड़ेगा और इन्हि की कमपनी में नौकरी करगा| मतलब आपकी स्तिथि पहले जैसे ही हो गयी है की गाव में रहना है जीना है तो सवर्णों की खिलाफत नहीं कर सकते, उनकी गुलामी करनी ही पड़ेगी|आब भी वाही स्तिथि बनती जा रही है|

निजीकरण तो होना ही था क्योंकि सरकारी संस्थाओं की आज़ादी और आराम का दुरूपयोग कर के लोग कामचोरी करते हों परिणाम ये सरकारी संस्थाएं क्वालिटी नहीं दे पातीं तो प्राइवेट संस्थाएं तो बनानी ही पड़ेंगी, जहाँ लोग अपनी नौकरी जाने के दर से काम तो करते हैं|उधर नेता भी किस तरह सरकारी |संस्थाओं की जगह निजीकरण की तरफदारी करते हैं सब जानते हैं गलत निजीकरण नहीं है बल्कि गलत है केवल एक वर्ग विशेष का ही मालिक बनना और इन प्राइवेट संस्थाओं में आम जनता का प्रतिनिधित्व और हकों की रक्षा का इंतज़ाम न होना|यहाँ एक उदहारण देना चाहूँगा की भले की सरकारी कानून हों पर प्राइवेट फर्म वाले जब भी किसी को नौकरी पर रखते हैं तब नौकरी पर रखने से पहले ही उस व्यक्ति से उॅका त्यागपत्र लिखवा कर रख लेते हैं जिसमे तरीक सवर्ण मालिक अपनी मर्जी और सहूलियत से भरते हैं, मतलब आप नौकरी अपने मालिक की मर्जी से करते हो| खेर मेरा प्रशन यही है की क्या केवल सवर्ण ही मालिक बनेंगे हमारे लोग मालिक क्यों नहीं बनेंगे|

 

ये बहुत बड़ा सवाल है क्या केवल सवर्ण ही मालिक बनेंगे भारतवासी लोग मालिक क्यों नहीं बनेंगे| इसपर बहुत सोचा , इसके कई कारन है :

१. सबसे पहला कारन है सवर्णों की सदियों से चल रही वर्णव्यस्था और जातिवाद की नीति जिसका मकसद ही सवर्णों को मालिक बनायें रखना और भरतवसिओं का शोषण करना है | जातिवाद और वर्णव्यस्था को ब्राह्मणवादी कर्मकांड जैसे मन्दिरबाजी, कथा,भागवत, व्रत, त्यौहार,मीडिया कंट्रोल विचारधारा, और राजनैतिक सरक्षण द्वारा बरक़रार रखा जा रहा है| एक बहुजन को अपना मालिक स्वीकार नहीं कर सकते सवर्ण वही बहुजन जब इसे या मुस्लमान बन जाये तब उसे अपना मालिक स्वीकार कर लेते हैं|खेर ये एक अलग विषय है पूरा, मुद्दे पर लौटते हैं
२. दूसरा कारन है सही ज्ञान और विकसित बूढी न होना| शिक्षा प्रणाली में दो धाराएं होना एक प्राइवेट एक सरकारी,खुद से सवाल करो की हम अपनी बुद्धि का विकास कैसे करें जब शिक्षा तो अब प्राइवेट स्कूल में धन से आती है सरकारी स्कूल तो बस मजदूर बनाने का काम कर रहे हैं|
३. किसी तरह बहुजन लोग पढ़ लिख कर कुछ थोड़ा बहुत कामयाब भी हो जाते हैं तो इन से कई अपना इतिहास अपना संगर्ष ही नहीं जानते, और अनजाने में खुद को हिन्दू समझ कर ब्राह्मणवादी कर्मकांड करते हुए अपने हाथों से ही सवर्णों को अपना मालिक बनाते रहते हैं
४. चौथ और सबसे बड़ा कारन है की हमारे लोग मिलजुलकर संगर्ष करना नहीं सीख प् रहे, एक दुसरे पर विश्वास ही नहीं कर पा रहे|आज हमारे समाज में तीन तरह के लोग है-
४.१. अशिक्षित एव असक्षम वर्ग
४.२. शिक्षित वर्ग पर बहुजन संगर्ष से अपरिचित
४.३. शिक्षित,ज्ञानी,सक्षम और संगर्ष शील वर्ग
-इनमे से जो पहला वर्ग है वो जनसँख्या दबाव या भीड़ के रूप में सबसे ज्यादा संगर्ष को आगे ले जा रहा है |
-दूसरा वर्ग किसी काम का नहीं उल्टा ये विभीषण हैं |
-तीसरा वर्ग संगर्ष की अगुवाई करता है पर इन नए नए हुए ज्ञानियों में अपने आप को श्रेष्ट समझने और अन्य को हीन समझने का रोग लग गया है परिणाम मकसद एक होने के बावजूद ये लोग एक मंच पर नहीं आ पाते| “ये जिन्दगी का नियम है की ज्ञानी बोलता पहले है पर समझदार पहले सुनता है, तोलता है फिर बोलता है| ज्ञानी होना काफी नहीं है समझदार होना जरूरी है अन्यथा हमारा संगर्ष कहीं नहीं पहुचेगा”

५. पांचवी बात है की हमारे लोग आज भी बौद्ध(समझदार) नहीं बने हैं आज भी इनकी दलित मानसिकता है|दलित) का उद्धार करना बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि इसके लिए उन्हें उनकी कमियों का अहसास करके सुधरने को प्रेरित करना होता है|किसी को भी उसकी कमी बताओ तो वो बुरा मान कर अपने सुधारक की ही खिलाफत करता है| उधर दूसरी तरफ ऐसा सुधारक शोषक की नजरों में भी खटक जाता है परिणाम शोषित और शोषक दोनों का दुश्मन हो जाता है|

मैं मूल भारतवासियों या बहुजनों के इतिहास की जितनी समीक्षा करता हूँ उतना ही ये तथ्य साबित होता है की दलित ही वास्तव में दलित का दुश्मन है|सारा इतिहास उठा कर देख लो मौकापरस्त मनुवादियों में कभी इतनी हिम्मत नहीं हुई की वो बहुजन शक्ति से सीधी टक्कर ले सकें,हमेश षडियन्त्र का सहारा लिया|जैसे लोहे सबसे जीत जाता है पर अपनी ही जंग से हार जाता है उसी तरह हर हार में अपने ही बहुजन साथी का निकम्मापन या दगाबाजी मिलेगी|इसीलिए मनुवादी हमेशा कहते हैं की ये लोग बलवान तो हो सकते हैं पर कभी स्थाई नहीं होंगे| हजारों साल की गुलामी के बाद भी क्या हम इतिहास से कुछ सीखेंगे?

महामौकापरस्त बहुजन विरोधी कौम का सबसे बड़ा हथियार ये है की जब उनकी निति की पोल खुल जाती है तब बहुजन के साथ मिल कर उसकी खिलाफत करते हैं पर साथ ही नई निति भी बना लेते हैं| हमारे लोग उनके झांसे में आ जाते हैं और स्तिथि जस की तस रह जाती है|ये सदियों से होता आया है कि हमारे संगर्ष के परिणाम में केवल चेहरा और नाम बदल जाता है पर शोषण निति जारी रहता है|

समस्यां ही समस्यां , बहुत नकारात्मकता हो गयी न, आखिर इस सब का समाधान क्या है इसपर भी चर्चा करना चाहिए|

हमारे लोगों में जब तक निति समझने, बनाने और चलाने की क्षमता नहीं आ जाती स्तिथि नहीं बदलेगी इसलिए निति क्षमता बढ़ने पर केन्द्रित रहो| हमें निति ज्ञान का माहिर होना होगा, निति समझना,बनाना और सामूहिक रूप से लागू करना सीखना होगा|इसके बिना संगर्ष करने से फिर वही होगा जो होता आया है-निति ज्ञान संपन्न कौम संगर्ष से प्राप्त सुख भोगेगी और संगर्ष करने वाले हाथ मलता रह जायेंगे|उदाहरण के लिए भक्ति काल से चल रहे रविदास,कबीर अदि बहुजन संतों के संगर्ष और क़ुरबानी के फल स्वरुप जनता पाखंड को कुछ कुछ समझी थी|पर आज उन्हीं बहुजन संतों की वाणी को आधार बनाकर नयी निति “सत्संग” की आड़ में वही सब फिर चालू हो गया| निति ज्ञान से बहुजन क्षमता बढ़ाना ही समयबुद्धा मिशन है, आओ इसे आगे बढायें.

वैसे आपको कामयाब करने के लिए बाबा साहव डॉ आंबेडकर सारे समाज को बाइस प्रतिज्ञा देकर गए हैं, समाधान है पर इसपर चलना तो हमें ही पड़ेगा न, इन बाइस प्रतियों को हमारे लोग कहीं न कहीं सुन तो लेते हैं पर भूल जाते हैं| हमें इन्हें दोहराना और इनपर अमल करना होगा वार्ना हम पिछड़ जायेंगे और गुलामी से कोई नहीं बचा पायेगा खासकर आपके वो देवीदेवता तो बिलकुल भी नहीं जो आप पिछले हज़ारों सालों से आपको लुटे पीटते मरते देखता रहा, तब कुछ नहीं किया तो अब क्या कर पायेगा|

ध्यान रहे जुल्म करने वालों से जुल्म सहने वाला ज्यादा गुनहगार होता है| गुलाम नहीं बनना चाहते तो बाबा साहब डॉ आंबेडकर की दिलाई बाइस प्रतिज्ञाओं पर पर अमल करना होगा, इन प्रतिज्ञाओं का लिंक इस प्रकार है:

https://samaybuddha.wordpress.com/dr-ambedkar-dwara-dilai-gayi-22-pratigyayen/

….समयबुद्धा

बहुजन हिताए बहुजन सुखाये

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