उठो जागो आज (27th March 2015) सम्राट अशोक की जयंती है अशोक ने बौद्ध धम्म को विश्व धम्म बनाया जिस सम्राट के शाशन काल जनता खुशहाल और भेदभाव रहित थी|…सोनी कुशवाह


ashoka the great100px-AshokaAshok Ashtami is observed on 8th day of Shukla paksha in the Chaita Masa. It usually falls in the month of March / April.

अशोक का धम्म………….
• संसार के इतिहास में अशोक इसलिए विख्यात है कि उसने निरन्तर मानव की नैतिक उन्नति के लिए प्रयास किया। जिन सिद्धांतों के पालन से यह नैतिक उत्थान सम्भव था, अशोक के लेखों में उन्हें ‘धम्म’ कहा गया है। दूसरे तथा सातवें स्तंभ-लेखों में अशोक ने धम्म की व्याख्या इस प्रकार की है, “धम्म है साधुता, बहुत से कल्याणकारी अच्छे कार्य करना, पापरहित होना, मृदुता, दूसरों के प्रति व्यवहार में मधुरता, दया-दान तथा शुचिता।” आगे कहा गया है कि, “प्राणियों का वध न करना, जीवहिंसा न करना, माता-पिता तथा बड़ों की आज्ञा मानना, गुरुजनों के प्रति आदर, मित्र, परिचितों, सम्बन्धियों तथा श्रवणों के प्रति दानशीलता तथा उचित व्यवहार और दास तथा भृत्यों के प्रति उचित व्यवहार।”

• ब्रह्मगिरि शिलालेख में इन गुणों के अतिरिक्त शिष्य द्वारा गुरु का आदर भी धम्म के अंतर्गत माना गया है। अशोक के अनुसार यह पुरानी परम्परा[1] है।
तीसरे शिलालेख में अशोक ने अल्प व्यय तथा अल्प संग्रह का भी धम्म माना है। अशोक ने न केवल धम्म की व्याख्या की है, वरन् उसने धम्म की प्रगति में बाधक पाप की भी व्याख्या की है – चंडता, निष्ठुरता, क्रोध, मान और ईर्ष्या पाप के लक्षण हैं। प्रत्येक व्यक्ति को इनसे बचना चाहिए।
• अशोक ने नित्य आत्म-परीक्षण पर बल दिया है। मनुष्य हमेशा अपने द्वारा किए गए अच्छे कार्यों को ही देखता है, यह कभी नहीं देखता कि मैंने क्या पाप किया है। व्यक्ति को देखना चाहिए कि ये मनोवेग – चंडता, निष्ठुरता, क्रोध, ईर्ष्या, मान—व्यक्ति को पाप की ओर न ले जाएँ और उसे भ्रष्ट न करें।
• कलिंग युद्ध के बाद ही अशोक अपने शिलालेखों के अनुसार धम्म में प्रवृत्त हुआ। शीघ्र ही बौद्ध धम्म का अनुयायी बन गऐ। बौद्ध होने के बाद अशोक के व्यक्तित्व एकदम बदल गया। आठवें शिलालेख में जो सम्भवत: कलिंग विजय के चार वर्ष बाद तैयार किया गया था, अशोक ने घोषणा की- ‘कलिंग देश में जितने आदमी मारे गये, हज़ारवें हिस्से बहूत दु:ख है।’ उसने आगे युद्ध ना करने का निर्णय लिया और बाद के 31 वर्ष अपने शासनकाल में उसने मृत्युपर्यंत कोई लड़ाई नहीं ठानी। उन्होंने अपने उत्तराधिकारियों को भी परामर्श दिया कि वे शस्त्रों द्वारा विजय प्राप्त करने का मार्ग छोड़ दें और धम्म द्वारा विजय को वास्तविक विजय समझें।

 

•उठो जागो आज सम्राट अशोक की जयंती है अशोक ने बौद्ध धम्म को विश्व धम्म बनाया जिस सम्राट के शाशन काल जनता खुशहाल और भेदभाव रहित थी|
• जिस सम्राट के शाशन काल जी टी रोड जैसे कई हाईवे रोड बने,पूरे रोड पर पेड़ लगाये गए, सराय बनायीं गईं इंसान तो इंसान जानवरों के लिए भी हॉस्पिटल खोले गए, जानवरों को मरना बंद कर दिया गया|

•अशोक शिलालेख के लेखों में ‘धम्म’ कहा गया है। दूसरे तथा सातवें स्तंभ-लेखों में अशोक ने धम्म की व्याख्या इस प्रकार की है, “धम्म है साधुता, बहुत से कल्याणकारी अच्छे कार्य करना, पापरहित होना, मृदुता, दूसरों के प्रति व्यवहार में मधुरता, दया-दान तथा शुचिता।” आगे कहा गया है कि, “प्राणियों का वध न करना, जीवहिंसा न करना, माता-पिता तथा बड़ों की आज्ञा मानना, गुरुजनों के प्रति आदर, मित्र, परिचितों, सम्बन्धियों के प्रति दानशीलता तथा उचित व्यवहार ।”
ब्रह्मगिरि शिलालेख में अशोक ने केवल धम्म की व्याख्या की है चंडता, निष्ठुरता, क्रोध, मान और ईर्ष्या पाप के लक्षण हैं। प्रत्येक व्यक्ति को इनसे बचना चाहिए।
•अशोक ने नित्य आत्म-परीक्षण पर बल दिया है। मनुष्य हमेशा अपने द्वारा किए गए अच्छे कार्यों को ही देखना है, यह कभी नहीं देखता कि मैंने क्या पाप किया है। व्यक्ति को नही करना चाहिए चंडता, निष्ठुरता, क्रोध, ईर्ष्या, मान—व्यक्ति को पाप की ओर न ले जाएँ और उसे भ्रष्ट न करें।
अशोक ने मनुष्यों और पशुओं के लिए चिकित्सालय खुलवाए। जहाँ मनुष्यों और पशुओं के लिए उपयोगी औषधियाँ उपलब्ध नहीं थी वहाँ बाहर से मँगाकर उन्हें लगाया जाता। कंदमूल और फल भी जहाँ कभी नहीं थे, वहाँ बाहर से मँगाकर लगवाए गए। सड़क के किनारे पर पेड़ लगाए गए ताकि मनुष्यों और पशुओं को छाया मिल सके। आठ कोस या 9 मील के फ़ासले पर जगह-जगह कुएँ खुदवाए गए। इसके अलावा अनेक प्याऊ स्थापित किए गए। इस प्रकार अशोक की धर्मपरायणता ने उसे अनेक प्रकार के कल्याणकारी कार्यों के लिए प्रेरित है।

 

अशोक का धम्म………….
• संसार के इतिहास में अशोक इसलिए विख्यात है कि उसने निरन्तर मानव की नैतिक उन्नति के लिए प्रयास किया। जिन सिद्धांतों के पालन से यह नैतिक उत्थान सम्भव था, अशोक के लेखों में उन्हें ‘धम्म’ कहा गया है। दूसरे तथा सातवें स्तंभ-लेखों में अशोक ने धम्म की व्याख्या इस प्रकार की है, “धम्म है साधुता, बहुत से कल्याणकारी अच्छे कार्य करना, पापरहित होना, मृदुता, दूसरों के प्रति व्यवहार में मधुरता, दया-दान तथा शुचिता।” आगे कहा गया है कि, “प्राणियों का वध न करना, जीवहिंसा न करना, माता-पिता तथा बड़ों की आज्ञा मानना, गुरुजनों के प्रति आदर, मित्र, परिचितों, सम्बन्धियों तथा श्रवणों के प्रति दानशीलता तथा उचित व्यवहार और दास तथा भृत्यों के प्रति उचित व्यवहार।”

• ब्रह्मगिरि शिलालेख में इन गुणों के अतिरिक्त शिष्य द्वारा गुरु का आदर भी धम्म के अंतर्गत माना गया है। अशोक के अनुसार यह पुरानी परम्परा[1] है।
तीसरे शिलालेख में अशोक ने अल्प व्यय तथा अल्प संग्रह का भी धम्म माना है। अशोक ने न केवल धम्म की व्याख्या की है, वरन् उसने धम्म की प्रगति में बाधक पाप की भी व्याख्या की है – चंडता, निष्ठुरता, क्रोध, मान और ईर्ष्या पाप के लक्षण हैं। प्रत्येक व्यक्ति को इनसे बचना चाहिए।
• अशोक ने नित्य आत्म-परीक्षण पर बल दिया है। मनुष्य हमेशा अपने द्वारा किए गए अच्छे कार्यों को ही देखता है, यह कभी नहीं देखता कि मैंने क्या पाप किया है। व्यक्ति को देखना चाहिए कि ये मनोवेग – चंडता, निष्ठुरता, क्रोध, ईर्ष्या, मान—व्यक्ति को पाप की ओर न ले जाएँ और उसे भ्रष्ट न करें।
• कलिंग युद्ध के बाद ही अशोक अपने शिलालेखों के अनुसार धम्म में प्रवृत्त हुआ। शीघ्र ही बौद्ध धम्म का अनुयायी बन गऐ। बौद्ध होने के बाद अशोक के व्यक्तित्व एकदम बदल गया। आठवें शिलालेख में जो सम्भवत: कलिंग विजय के चार वर्ष बाद तैयार किया गया था, अशोक ने घोषणा की- ‘कलिंग देश में जितने आदमी मारे गये, हज़ारवें हिस्से बहूत दु:ख है।’ उसने आगे युद्ध ना करने का निर्णय लिया और बाद के 31 वर्ष अपने शासनकाल में उसने मृत्युपर्यंत कोई लड़ाई नहीं ठानी। उन्होंने अपने उत्तराधिकारियों को भी परामर्श दिया कि वे शस्त्रों द्वारा विजय प्राप्त करने का मार्ग छोड़ दें और धम्म द्वारा विजय को वास्तविक विजय समझें।

 

• अशोक शिलालेख संख्या -१३

• अशोक अपनी शिलालेखों में सम्राट ने कई अन्य समुदाय वंश तथा यूनानी समुदाय का ज़िक्र भी किया है। जो उनके राज्य की सीमाओं के अन्दर रहते थे।
• बहुत से यूनानी मूल के और यूनानी संस्कृति से प्रभावित लोग मौर्य राज्य के उत्तर पश्चिमी इलाक़े में बसे हुए थे। जिसमें आधुनिक पाकिस्तान का ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा प्रांत और दक्षिणी अफ़्ग़ानिस्तान आते हैं। इनकी कुछ रीति-रिवाजों पर भी शिलालेख में टिप्पणी मिलती है।
• सम्राट के राज्य में यूनानी, कम्बोज, नाभक, नाभ्पंकित, पितिनिक, आंध्र और पुलिंद, अशोक के राज्य में बसी हुई अन्य वंश थीं।
• कम्बोज या कम्बोह एक मध्य एशिया से आया समुदाय था जो पहले दक्षिणी अफ़्ग़ानिस्तान और फिर सिंध, पंजाब और गुजरात के क्षेत्रों में आ बसे थे।

नोट- • आधुनिक युग में उस- समुदाय के लोग इस्लाम तथा हिन्दू धर्म के अनुयायियों में बंटे हुए हैं।

• बौद्ध धर्म फैलाने के लिए अशोक ने भारत के सभी लोगों में और यूनानी राजाओं को भूमध्य सागर तक दूत भेजे थे। उनके स्तंभों पर उनके यूनान से उत्तर अफ़्रीका तक के बहुत से समकालीन यूनानी शासकों के सही नाम लिखें हैं।जिस से ज्ञात होता है कि वे भारत से हज़ारों मील दूर की राजनैतिक परिस्थितियों पर अशोक नज़र रखे हुए थे।

😳गुलामी की बेड़िया😳

😩 जब लिंकन ने अश्वेतों की बेडियां कटवायी तो हाथ  पैर सुन्न होने के कारण अश्वेतों को महीनों नींद नहीं आई और वे दहाड़े मारकर लिंकन को कोसते रहे कि हमारे जन्म जन्म gulami dharm ishwarके गहने छीन लिए , क्योंकि वे जन्म जन्मान्तर उसी के आदि हो चुके थे ।
😩 यही हाल आज हमारे शुद्र (obc) अतिशूद्र(sc/st)समाज का है । जब भी कोई व्यक्ति हमारे इस समाज को हिन्दू(ब्राह्मण) देवी देवताओं के प्रपन्च से मुक्त होकर अपने गुरुओं, महापुरुषों बुद्ध,कबीर, फूले, शाहू, पेरियार, अम्बेडकर, कांसीराम आदि को मानने जानने की बात कहता है तो वे पलटकर बुरा भला कहते हैं ।
😱क्योंकि हमारा बहुजन समाज हिन्दुत्व के जंजाल में बुरी तरह जकड़ चुका है और उन्होंने इस गुलामी को पूर्ण रूपेण आत्मसात कर लिया है ,जिसे वह हजारों वर्षों से ढोते चले आ रहे हैं।
😌अश्वेतों को तो शारीरिक गुलामी मिली हुई थी जिन्होंने उसके छुटकारे पर लिंकन को बुरी तरह कोसा था, परन्तु हमारे समाज को तो ब्राह्मणों ने चमत्कार, पाखण्ड, अन्धविश्वास, ज्योतिष के जाल में फंसाकर मानसिक गुलाम बनाया हुआ है और अब वह इसी का आदि हो चुकने के कारण अपनी अज्ञानतावश इसका रसास्वादन छोड़ने काे तैयार नहीं है ।
😛शारीरिक गुलामी की बेड़ियों को गहना तथा मानसिक गुलामी की बेड़ियों को धर्म समझ कर गुलाम अपनी गुलामी पर गर्व करता है,  जागरूकता के अभाव के कारण समझाने पर कुतर्क के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है , इसलिए गुलामों को गुलामी का एहसास कराये बगैर वे अपनी बेड़ियां तोड़ने को तैयार नहीं होंगे ।
😜जो शिक्षित हैं वह अपना इतिहास जानना नहीं चाहते , जो थोड़ा बहुत जान गये हैं वह अपने व अपने परिवार में लीन हैं ।
👍 जो इतिहास के जानकार प्रबुद्ध लोग समाज को जगाने , समझाने और इस गुलामी से बाहर निकालने हेतु मिशन से जुड़े हैं वह अथक प्रयासरत हैं , परन्तु वह अपेक्षाकृत संख्या में कम हैं ।
👏अतः अधिक से अधिक वाट्स एप ग्रुप बनाकर पढ़े लिखे समाज को  अभियान चलाकर मिशन से जोड़ने हेतु कोशिश किये जाने की जरूरत है ।

 

हम बिखरे होए लोगों को सबसे ज्यादा जरूरत है ज्यादा से ज्यादा एक जगह संगठित होकर एक दूसरे और समाज के प्रति जागरूक और सहयोगी बनने की| मैं देख रहा हूँ की अब हम पहले के मुकाबले अधिक संगठित हैं और परिणाम समाज में हमारा वर्चस्व बढ़ रहा है, राजनीती में दखल बढ़ रहा है,हमारी आर्थिक समृद्धि बढ़ रही है, सवर्णों के जुल्म कम हो रहे हैं, हमारे लोग संगठन  का महत्व समझ गए हैं| आप खुद देखिये की इस्लाम में हर शुकरवार को नमाज के नाम पर संगठित होकर सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है, जाटों में हुक्का चौपाल और पंचायत के नाम पर संगठित होकर अपनी समस्याओं का समाधान खोज जाता है, ब्राह्मण मंदिर नामक संस्थान के जरिये अपने अजेंडे को संगठित होकर समाज पर लागू करते हैं|परिणाम आप समाज सकते हैं की इन तीनो प्रकार के लोगों पर अत्याचार सहने की खबरे कभी सुनाई नहीं पड़ती| शायद अब आप समझ सकते हैं की लोग क्यों मंदिर मस्जिद, चौपाल, धर्मशाला आदि बनाते हैं, हम लोग भी अपने बौद्ध विहार बनाने लगे हैं| अब हमारे लोग भी आंबेडकर जयंती,गौतम बुद्ध जयंती, राजनैतिक रैलियां, बैठकें, आदि के नाम पर समाज में अपना संगठन साबित करते जा रहे हैं और इससे हमारा सामाजिक वर्चस्व बढ़ा रहा है| हमारा वर्चस्व इतना बढ़ा की राष्ट्रीय स्वेव सेवक संघ ने २०१४ में चमार जाती को शूद्र से निकाल कर क्षत्रिये ही घोषित कर दिया, पर क्षत्रिये बने रहने पर भी हम हिंदुत्व के गुलाम ही रहेंगे| पर अगर हम अपने बौद्ध धम्म को बढ़ा पाये तो हम ब्राह्मणों के बराबर बैठेंगे इतना ही नहीं इससे कहीं आगे बढ़कर हम अपना हक़ भी पा लेंगे| संगठन के इतने ज्यादा फायदे हैं की अगर लिस्ट बनायीं जाए तो हज़ार से भी ज्यादा ऐसे फायदे होंगे तो आम जनता के जीवन को सीधे फायदा पहुचाते है, और अपरोक्ष और दूरगामी फायदे तो और भी बहुत ज्यादा हैं| ध्यान रहे की आप मेहनत करते हो तो आपको संसाधन जैसे घर.गाड़ी,शिक्षा,दवाई आदि मिलते हैं पर अगर आपका समाज संगठित होकर मेहनत करता है  तो आपकी मेहनत की सुरक्षा होती है और आपसे आपकी कमाई कोई नहीं छीन सकता कोई आपपर जुलम नहीं कर सकता| हम कितना ऊपर पहुचेंगे ये इस बात पर तय होती है की हमारा समाज कितना सशक्त है| आप खुद परखें आप अपने समाज के और सवर्णों के दसवी फेल की दशा आज देखो और फिर ५ साल बाद देखना , बहुत फर्क मिलेगा|  कोई देवी देवता कोई धर्म हमारा भला नहीं कर सकता, अगर कर सकते तो दो हज़ार सालों तक हर जुल्म की आह में हमारे समाज ने इन्हीं देवी देवता और भगवानों को पुकारा पर डॉ आंबेडकर के आने तक कुछ न हुआ, जुल्म बदस्तूर चालू रहे|डॉ आंबेडकर सूत्र “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संगर्ष करो” ही है जिससे हमारा भला हो पाया है और होता रहेगा|

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• संघमित्रा……………..
• संघमित्रा – महान मौर्य सम्राट अशोक की पुत्री थी। जिसे अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र के साथ श्रीलंका (सिंहलद्वीप तथा ताम्रपर्णी के नाम से भी ज्ञात) में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भेजे थे।
• दोनों सन्तानें बड़े प्रतिभाशाली और तेजस्वी थे। जिस समय महेन्द्र की आयु 20 वर्ष और संघमित्रा की 18 वर्ष थी, सम्राट अशोक ने महेन्द्र को युवराज घोषित कर दिऐ थे।
• कलिंग विजय के बाद अशोक पूर्णत: बौद्ध धम्म को समर्पित हो गये थे। बौद्ध धम्म धम्म कार्यके लिए अपने पुत्र और पुत्री को समर्पित करना चाहते थे। सम्राट अशोक ने अपने पुत्र और पुत्री की इच्छा पूछी। दोनों ने इसे अपना अहोभाग्य समझा और भाई-बहिन दोनों बौद्ध धम्म में दीक्षित हो गए। महेन्द्र का नाम ‘धम्मपाल पड़ा और संघमित्रा ‘आयुपाली’ कहलाई। धम्म प्रचार करने के लिए सिंहल द्वीप (श्रीलंका) की यात्रा की। उसके प्रभाव से राजा ‘तिष्य’ सहित बड़ी संख्या में लोगों ने बौद्ध धम्म को ग्रहण किया।
• यद्यपि सिंहली ग्रन्थों और अनुश्रुतियों में संघमित्रा और महेन्द्र भाई-बहिन अशोक और शाक्य रानी देवी से उत्पन्न कहे गये हैं।
• सिंहली ग्रन्थों के अनुसार महेन्द्र और संघमित्रा बौद्ध भिक्षुओं के एक दल का नेतृत्व करते हुऐ श्रीलंका गये और वहाँ के सभी निवासियों को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया। संघमित्रा भी महेन्द्र के साथ बौद्ध धम्म के प्रचार धम्मकार्य में सहयोग देने के लिए श्रीलंका गई थी। उसने भी वहाँ के राजा तिष्य से समस्त परिवार के साथ ही अन्य स्त्रियों को बौद्ध धम्म की दीक्षा दी। आज भी श्रीलंका में उसका नाम बड़े आदर के साथ लिऐ जाते है।

 

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