पुनर्जन्म की बात—ओशो

hUMAN LIFE CYCLE REINCARNATIONपुनर्जन् की बातओशो
प्रश्न—कुछ धर्म पुनर्जन्म में विश्वास करते है और कुछ नहीं करते। आप अपने बारे में कैसे जान सकते है कि आपने भी जीवन जिया है और पुन: जीएंगे?
ओशो—सिद्धांतों में मेरा विश्वास नहीं हे। मैं एक साधारण आदमी हूं कोई सिद्धांतवादी नहीं। सिद्धांतवादी तो महान विचारक होते है। वह यथार्थ के बारे में कुछ भी नहीं जानते, मगर वह इसके बारे में सिद्धांत गढ़ता रहते है। उसकी पूरा जीवन घूमता ही रहता है। और सत्य, यर्थाथ तो बस केंद्र में ही रह जाता है। किंतु सिद्धांतवादी इधर-उधर की हांकने में माहिर होता है।

जिस क्षण तुम किसी दूसरे पर भरोसा करने लगते हो, तो अपनी व्यक्तिगत खोज बंद कर देते हो। और मैं नहीं चाहूंगा। कि तुम अपनी व्यक्तिगत खोज बंद करों। हजारों वर्ष से व्यक्ति को इसी तरह छला गया और उसका शोषण किया गया है। मैं इस पूरी रणनीति को समूल नष्ट कर देना चाहता हूं। केवल अपने अनुभव पर भरोसा रखो। मैं हां कहूं या न, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। अंतर इस बात से पड़ता है कि तुमने इसका अनुभव किया या नहीं। वहीं निर्णायक होगा। उससे तुम्हारे जीवन में निश्चय ही परिवर्तन आ जाएगा।

      तीन धर्म है—यहूदी, ईसाइयत, इसलाम, जिनका पूनर्जन्म के सिद्धांत पर नकारात्मक रूख रहा है। वे कहते है कि यह सच नहीं है। यह एक नकारात्मक विश्वास है। इन तीनों धर्मों के समानांतर—हिंदू, बौद्ध और जैन, तीन धर्म है जिनका सकारात्मक दृष्टिकोण है। वे कहते है, पुनर्जन्म एक वास्तविकता है। किंतु वह भी एक विश्वास है; एक सकारात्मक विश्वास।
      मेरी मान्यता तीसरी है, जिसे अभी आजमाया नहीं गया है। मैं कहता हूं, इस सिद्धांत को परिकल्पना मान कर स्वीकार करो, न तो हां कहो और न ना। परिकल्पना मान कर स्वीकार करने का अर्थ है: ‘’मैं इसके बारे में किसी सकारात्मक अथवा नकारात्मक पूर्वाग्रह के बिना इसी जांच-पड़ताल करने के लिए तैयार हूं। मैं इसकी सच्चाई जानने के लिए किसी पूर्व कल्पित विचार के बिना इसकी गहराई में जाऊँगा।
      धर्मों ने परिकल्पना शब्द का प्रयोग किया ही नहीं है। तुम या तो विश्वास करे या अविश्वास। अविश्वासी भी विश्वासी होता है। केवल नकारात्मक ढंग से। उनमें कोई गुणात्मक भिन्नता नहीं है। वे एक तरह के लोग है। जब तुम्हारा कोई नकारात्मक विश्वास या कोई सकारात्मक विश्वास होता है, तो तुम्हारे मन ने यह निर्णय कर लिया होता है कि सच्चाई क्या है। इसे मैं अप्रामाणिक, बेईमान कहता हूं। और तुम किसी वस्तु को नकारात्मक अथवा सकारात्मक दृष्टि से स्वीकार कर लेते हो। तो मन की यह क्षमता है कि वह उस तरह का भ्रम पैदा कर देता है।
      इसलाम में, ईसाइयों में, यहूदियों में तुम्हें ऐसे बच्चे नहीं मिलेंगे जिन्हें अपने पूर्वजन्म की याद हो। किंतु हिंदू, बौद्ध, और जैन धर्मों में लगभग प्रत्येक दिन कहीं ने कहीं किसी बच्चे को अपने पूर्व जन्मों की याद आती है। लोगों ने यह समझने का प्रयत्न किया है कह उसकी स्मृति में कोई तथ्य होता है या यह मात्र कल्पना होती है। और ऐसे बहुत से मामले मिले है जिनमे तथ्य इसका स्पष्ट रूप से समर्थन करते है।
      भारत में तो ऐसा हर दिन होता रहता है—एक स्थान में, दूसरे स्थान में, किसी ने किसी बच्चे को इसकी स्मृति होती है। और हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म कोई भी इसकी जांच-पड़ताल नहीं करता। क्योंकि वे इस बात से भयभीत होते है कि उनका सिद्धांत गलत न सिद्ध हो जाये। मगर तुम किसी ईसाई देश में, यहूदी समुदाय में, किसी इस्लामिक भूमि में ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि उन्होंने इस बात को स्वीकार कर लिया है कि इस तरह की चीज पूर्ण रूप से असत्य है।
      जहां तक मेरा संबंध है, पुनर्जन्म एक सच्चाई है। यह मेरा अपना अनुभव है। किंतु जो मेरे लिए सत्य है, तुम्हारे लिए वह सिद्धांत हो जाता है। और मैं अपने सत्य को तुम्हारा सिद्धांत नहीं बनाना चाहता। इसीलिए मैंने कहा: ‘’मेरा सिद्धांतों में, विश्वासों से कुछ लेना-देना नहीं है। सत्य मेरा व्यवसाय है।‘’
ओशो
फ्रॉम पर्सनैलिटी टु इंडीवीजुअलटी
प्रश्न--आप पुनर्जन्म की बात करते है। मुझे तो इसका अनुभव नहीं है और जिसका मुझे अनुभव नहीं होता है, ऐसी किसी वस्तु में मैं विश्वास नहीं करना चाहता। मुझे क्या करना चाहिए?
ओशो—पुनर्जन्म में विश्वास करने के लिए तुम्हें कौन कह रहा है? और तुम इसके बारे में कुछ करने के लिए चिंतित क्यों हो? लगता है तुम्हारे भीतर कहीं पडा हुआ विश्वास है। यदि तुम पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते हो तो वही पूर्ण विराम है। कुछ करने की चिंता क्यों करते हो?
      पुनर्जन्म में विश्वास मत करो, बस यह जन्म जीओं, और तुम्हें अनुभव होगा कि पुनर्जन्म कोई सिद्धांत नहीं; यह एक सच्चाई है। क्या तुम इस जन्म में  विश्वास करते हो। या नहीं करते? पुनर्जन्म या तो अतीत में है अथवा भविष्य में, किंतु तुम यहां हो, जीवित, तुममें जीवन का स्पंदन हो रहा है।
      मैं जानता हूं कि पूनर्जन्म सत्य है। किंतु मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम इसमें इसलिए विश्वास करो क्योंकि मैं ऐसा कह रहा हूं। किसी दूसरे के अनुभव पर कभी विश्वास न करो। यह एक बाधा है। मैं तुम से केवल यही कह सकता हूं कि बस, इसी जन्म को ही जीते रहो। उससे द्वार खुलेगा और तुम पीछे की और देखने में समर्थ हो सकोगे, तुम इसमें इसमे विश्वास करो या न करो। फिर ये तुम्हारे उपर निर्भर है। तब तुम इस पर विश्वास कर सकते हो। या नहीं कर सकते। इसे एक अनुभव बन जाने दो।
      सभी धर्म विश्वास पद्धतियों पर ही आधारित होते है। में तुम्हें खोज करने की, संदेह करने की पूर्ण स्वतंत्रता देता हूं क्योंकि तुम्हारे अनुभव-अनुभव लेने का यही एकमात्र तरीका है। स्वयं अनुभव लो। विश्वास करने का कोई महत्व नहीं है।
      तुम मुझे प्रेम करते हो। स्वाभाविक ही, यदि मैं कहता हूं कि पुनर्जन्म होता है। वह एक सत्य है। तुम्हारे प्रेम के कारण तुम मुझ पर विश्वास करोगे। तुम कैसे कल्पना कर सकते हो कि मैं तुमसे कुछ झूठ बोलूगा। तुम मुझ पर भरोसा करते हो….ओर इसी भरोसे का लाखों वर्षों से शोषण हो रहा है। प्रत्येक धर्म द्वारा इस प्रेम का शोषण हो रहा है। मैं किसी तरह से शोषण तो नहीं करने जा रहा हूं, जो कुछ भी मुझे ज्ञात है इसके बारे में मैं अपना ह्रदय तुम्हारे सामने खोल सकता हूं, किंतु याद रखो, विश्वास के जाल में न गिरना। प्रेम अच्छा  है, भरोसा अच्छा है—किंतु विश्वास जहर है।
      मैं चाहता हूं कि तुम जानने वाले बनो। यदि तुम मुझे प्रेम करते हो और मुझ पर भरोसा करते हो, तब तो जांच-पड़ताल करते रहो, खोज-ढूंढ करते रहो। जब तक तुम्हें निष्कर्ष नहीं मिल जाता। कभी विश्वास न करना। मैं यह इतना निश्चय पूर्वक कह सकता हूं क्योंकि में जानता हूं कि यदि तुम जांच पड़ताल करोगे तो तुम्हें यह मिल जाएगा। यह वही है। मेरे एक भी शब्द पर विश्वास न किया जाए। किंतु अनुभव किया जाए। मैं तुम्हें इसका अनुभव लेने की विधि दे रहा हूं, अधिक ध्यानस्थ हो जाओ। पुनर्जन्म और परमात्मा, स्वर्ग-नरक से कोई अंतर नहीं पड़ता। जिससे अंतर पड़ता है, वह तुम्हारा सजग हो जाना है। ध्यान से तुम जाग्रत हो जाते हो। तुम्हें आंखे मिल जाती है। तब तो तुम जो कुछ भी देखते हो, तुम अस्वीकार नहीं कर सकते।
      जहां तक मेरा संबंध है, पुनर्जन्म एक सत्य है। क्योंकि आस्तित्व में कुछ भी मरता नहीं। चिकित्सक भी कहेंगे कि कुछ भी मरता नहीं है। तुम हिरोशिमा और नागासाकी को नष्ट कर सकते हो। विज्ञान ने चिंपाजी राजनीतिज्ञों को इतनी शक्ति दे दी है—किंतु तुम पानी की एक बूंद भी नष्ट नहीं कर सकते।
      तुम नष्ट नहीं कर सकते हो। चिकित्सक लोग इस असंभावना के प्रति सावधान हो गये है। तुम जो कुछ भी करते हो। केवल रूप परिवर्तित हो जाता है। तुम ओस की एक बूंद मिटा नहीं सकते। और वहां हाइड्रोजन व आक्सीजन है; वे इसके घटक है। तुम हाइड्रोजन व आक्सीजन को नष्ट नी कर सकते हो। यदि तुम प्रयत्न भी करते हो, तो तुम अणुओं से परमाणु तक आ जाते हो। यदि तुम परमाणु को नष्ट करते हो, तो तुम इलेक्ट्रॉन के पास आ जाते हो। हम अभी तक तो नहीं जानते कि हम इलेक्ट्रॉन को भी नष्ट कर सकते है। या तो तुम इसे नष्ट कर सकते …यह वास्तविकता का चरम वस्तुपरक घटक है। या यदि तुम इसे नष्ट कर सकते हो, तब तो तुम्हें कुछ और मिल जायेगा। किंतु इस वस्तुपरक जगत में कुछ भी नष्ट नहीं हो सकता।
      यही जीवन चेतना के, जीवन के जगत के बारे में सत्य है। वहां कोई मृत्यु नहीं है। मृत्यु  तो एक आकार से दूसरे आकार में एक परिवर्तन मात्र है। और अंतत: आकार एक प्रकार की कारा है। जब तक तुम आकारहीन नहीं हो जाते, तब तक तुम दुःख, ईर्ष्या, क्रोध, धृणा, लोभ, भय से मुक्त नहीं हो सकते। क्योंकि ये तुम्हारे आकार से संबंधित है। जब तुम आकार हीन हो जाते हो तब हानि पहुंचाने के लिए तुम्हारे पास कुछ नहीं होता। और अब खोने के लिए कुछ भी नहीं है तुम्हारे पास। ऐसा कुछ भी नहीं होता जो तुम्हारे पास बढ़ सके। तुम चरम अनुभूति तक पहूंच जाते हो। वहां कुछ भी नहीं है, मात्र एक होना है।
      अस्तित्व प्रत्येक स्तर पर जीवित होता है। कुछ भी मृत नहीं है। एक पत्थर भी…जिसे तुम पूर्ण रूप से मृत समझते हो। वह मृत नहीं है। तुम देख नहीं सकते, किंतु वे सब सजीव होते है। इलैक्ट्रा तुम्हारी तरह ही सजीव होते है। संपूर्ण अस्तित्व जीवन का ही पर्याय होता है। वस्तुएं एक आकार से दूसरे आकार में तब तक परिवर्तित होती रहती है जब तक वे पर्याप्त रूप से परिपक्व नहीं हो जाती। जिससे उन्हें पुन: स्कूल जाने की आवश्यकता नहीं होती। तब वे आकारहीन जीवन की और चलती है; तब वे स्वयं महासागर में एकाकार हो जाती है।
ओशो
फ्रॉम पर्सनैलिटी टू इंडीवीजुअलटी
पिछले जन्मों का क्या महत्व होता है, उसकी क्या उपयोगिता है?
क्या उन्हें याद करना लाभ दायी होगा?
ओशो—इस जन्म का भी तो कोई महत्व नहीं है; और वे बीते हुए जन्म भी एक ही चीज की बार-बार पुनरावृति के आलावा और कुछ नहीं था। उनका क्या महत्व हो सकता है। इस जीवन के स्वप्न को देख लो, तो तुमने वे सारे स्वप्न देख लिए जिन्हें तुमने पहले जीया है। स्वप्नों का कोई महत्व नहीं होता।
      पाश्चात्य मनोविश्लेषण का बड़ा आग्रह है कि स्वप्नों का महत्व होता है। पूरब के देशों में, हम कहते है कि स्वप्नों को कोई महत्व नहीं होता। केवल स्वप्न द्रष्टा महत्वपूर्ण है। स्वप्न विषय है, उन्हें देखने वाला तुम्हारी आत्म परकता है। स्वप्न परिवर्तित होते रहे है। स्वप्न द्रष्टा वहीं रहता है। विज्ञान परिवर्तित होता रहता है। किंतु दृष्टा वहीं रहता है। दृष्टा का महत्व है। यही पर पाश्चात्य मनोविज्ञान और पूर्वीय मनोविज्ञान में भेद। पूरब के रहस्यवादी के लिए वे सारे खोल जो मनोविश्लेषण, उनकी शाखाएं वे उनके संस्थापक खेलते है, मात्र पहेली है। मनोविश्लेषण एक सुंदर खेल है। तुम खेलते रह सकते हो, मगर तुम पूर्ण रूप से वही रहते हो।osho36
      वास्तविक चीज तो परिवर्तन है, चेतना को स्वप्न से हटा कर स्वप्न द्रष्टा में ले जाना है। पूरे गेस्टाल्ट का परिवर्तन—वस्तु की और नहीं देखना बल्कि देखने वाले को देखना है। तब फिर सब कुछ सपना हो जाता है।
      पुनर्जन्म, जन्म, और मृत्यु, अच्छा और बुरा। तुम सम्राट हो या भिखारी, तुम हत्यारे हो या महात्मा—सब कुछ सपना है।
      लेकिन एक बात तय है कि सपने के लिए साक्षी की जरूरत नहीं है। साक्षित्व सत्य है। उस साक्षित्व को जान लेना अपने बुद्ध स्वभाव को जान लेनाहै
ओशो
टेक इट ईजी 

भंगी जातियों के बाल्मिकीकरण/हिन्दुकरण से सजग और डॉ आंबेडकर आन्दोलन के सक्रिय सहयोगी -भगवान दास जी (23 अप्रैल, 1927- 18 नवम्बर, 2010) का योगिंदर सिकंद द्वारा लिया गया साक्षात्कार,यह साक्षात्कार आज 23 अप्रैल को उनके जन्म दिन के अवसर पर स्मृति के तौर पर प्रकाशित किया जा रहा है. ….Email by S R Darapuri

bhagwan dasभगवान दास जी का योगिंदर सिकंद द्वारा लिया गया साक्षात्कार

(भगवान दास (23 अप्रैल, 1927- 18 नवम्बर, 2010) जी का यह साक्षात्कार उनके परिनिर्वाण से काफी पहले लिया गया था. इस साक्षात्कार में भगवान दास जी ने दलित आन्दोलन से अपने जुड़ने, दलित आन्दोलन की कमजोरियों, जातिभेद के विनाश के लिए बाबा साहेब के बौद्ध धर्म आन्दोलन की प्रासंगिकता, भंगी जातियों के बाल्मिकीकरण और दलित आन्दोलन के भविष्य की संभावनाएं एवं उसकी सही दिशा के बारे में काफी सारगर्भित तथा बेबाक टिप्पणियाँ की हैं. सब से पहले यह साक्षात्कार अंग्रेजी में इन्टरनेट पर छपा था जिसे बाद में सिकंद जी ने “धर्म और राजनीति” नामिक पुस्तिका में हिंदी में भी प्रकाशित किया था. यह साक्षात्कार आज 23 अप्रैल को उनके जन्म दिन के अवसर पर स्मृति के तौर पर प्रकाशित किया जा रहा है.)

प्र०: आप दलित आन्दोलन में किस प्रकार आये?

उ०: मेरा जन्म हिमाचल प्रदेश में एक अछूत परिवार में हुआ. मेरे पिता एक पोस्ट आफिस में सफाई-कर्मचारी थे. मेरी माँ अर्द्ध-मुस्लिम परिवार से थी. मुझे डॉ. आंबेडकर से मिलने का अनुभव कुछ अवसरों पर हुआ. सब से पहले मैं उन को बम्बई में1943 में मिला. वायु सेना नौकरी करते समय मेरी पोस्टिंग हुयी तो उनको मिलने के लिए हफ्ते में तीन बार ज़रूर जाता था, मैं कुछ पेपर वर्क करता था जैसे पेपर क्लिपिंग इत्यादि जो वह मुझे देते थे, टाइपिंग और अन्य कार्य जो मुझे सूचना के तौर पर इकठ्ठा करने होते थे. इस प्रकार मैं दलित आन्दोलन में आया. डॉ. आंबेडकर ने 1956 में बौद्ध धर्म अपनाया, मैंने भी 1957 में अपने परिवार सहित बौद्ध धर्म अपना लिया.

प्र०: आंबेडकर ने बौद्ध धर्म क्यों अपनाया?

उ०: अवर्ण होने के कारण दलित कभी भी हिन्दू नहीं रहे थे, वे चार वर्णों से बाहर थे. डॉ. आंबेडकर के अनुसार बौद्ध धर्म दलितों का मूल धर्म था. यह आज़ादी और मुक्ति का धर्म है. डॉ. आंबेडकर मानते थे कि सभी राजनैतिक क्रांतियों से पहले सामाजिकऔर धार्मिक क्रांतियाँ हुयीं, अतः धर्मपरिवर्तन दलित संघर्ष की मूलभूत आवश्यकता थी.

हम दलित कभी भी हिन्दू नहीं थे. असल में ब्राह्मणवादी परम्पराओं और विश्वासों से अलग हमारी अपनी मान्यताएं थीं. मेरी अपनी भंगी जाति को ही ले लीजिये. वे न हिन्दू थे, न मुसलमान. हमें इनमें कहीं भी रखना मुश्किल था क्योंकि हम किसी हिन्दू भगवान की पूजा नहीं करते थे, न ही हम मस्जिद में नमाज़ पढ़ने जाते थे. हमारे अपने महापुरुष थे जिन की हम पूजा करते थे लेकिन वो रीति रिवाज़ अब भुला दिए गए हैं क्योंकि हिन्दू संस्थाएं हमें हिंदू बनाने पर तुली हुई हैं.

हम भंगियों के अपने महात्मा हुए हैं जिनका नाम लालबेग था लेकिन बाद के आर्यसमाजियों ने हमें हिन्दू बना दिया कि हम बाल्मीकि के शिष्य हैं जिन्होंने बाल्मीकि रामायण लिखी. मैंने इस मिथ को कभी नहीं स्वीकारा.

प्र०: लालबेग कौन था?

उ०: कुछ लोग कहते हैं कि लालबेग वास्तव में भिक्षु था जो एक बौद्ध संत हो सकता है. यदि उत्तर भारत की भंगी जातियों की लालबेग को समर्पित प्रार्थनाएं सुनेंगे तो आप को कुछ मज़ेदार बातें पता चलेंगी. इन प्रार्थनाओं को कुर्सीनामा कहते हैं. यंगस्टन ने इन्हें इकठ्ठा किया और अपनी पुस्तक एंटीक्वेरीज़ आफ इंडिया में प्रकाशित किया. ये ओल्ड टेस्टामेंट के जेनेसिस की तरह हैं. कुर्सीनामा बताती है कि हम न हिन्दू हैं न मुसलमान. कहीं पर हिन्दू भगवान राम और कृष्ण का ज़िक्र नहीं है. लेकिन मज़ेदार बात यह है कि कुर्सीनामा की शुरुआत “बिस्मिल्लाह-इरर्रह्मान इर्ररहीम” से होती है जो कि कुरआन की आयत है जिसे शुरुआत में पढ़ा जाता है और अंत में वे सभी चिल्लाते हैं “बोलो मोमिनों वोही एक है.” ( ओ! भक्तो वो ही एकमात्र सत्य है). कुर्सीनामा में कई जगह पर बालाशाह और लालबेग का नाम एक दुसरे के लिए इस्तेमाल किया गया है. बलाशाह एक प्रसिद्ध पंजाबी संत थे. पंजाबी साहित्य में अपने समय की महान रचना “हीर” में पंजाबी सूफी कवि वारिसशाह कहते हैं कि बलाशाह दो निम्न जातियों चूहड़े और पासियों के पीर थे.

प्र०: क्या भंगी अभी भी इस बात से परिचित हैं?

उ०: दुर्भाग्यवश बहुत कम लोग इस बारे में जानते हैं. वह परम्परा लुप्त होती जा रही है. एक कारण तो यह है कि हिन्दू संस्थाएं अपनी संख्या बढ़ाने के चक्कर में भंगियों को हिन्दू बना रही हैं क्योंकि उन्हें खतरा है कि भंगी अगर ईसाई बन जायेंगे जैसा कि 1873 में हुआ और 1931 तक चलता रहा. अतः उन्होंने धर्मान्तरण  रोकने के लिए सभी हथकंडे अपनाये. दूसरी ओर उन्होंने यह कहानी बेचनी शुरू कर दी कि भंगी वास्तव में वाल्मीकि के वंशज हैं. उन का यह भी कहना है कि बालाशाह जो कि लालबेग का दूसरा नाम था, वाल्मीकि का अपभ्रंश रूप था.

प्र०: लेकिन यह कैसे संभव है जब बाल्मीकि रामायण में जाति व्यवस्था को उचित ठहराते हैं? वह हमें बताते हैं कि राम ने शम्बूक की गर्दन इसलिए उड़ा दी थी क्योंकि वह स्वर्ग जाने लिए समाधि (ध्यान) लगा रहा था.

उ०: यह एक मिथ है. समस्या यह है कि वे किस बाल्मीकि की बात कर रहे हैं: वो ब्राह्मणवादी बाल्मीकि जो ब्राह्मण है और वरुण के दसवें पुत्र होने का दावा करता है? या वह बाल्मीकि जिसे पुरानों में डाकू बताया गया है? जिस बाल्मीकि ने रामायण लिखी वह जाति व्यवस्था का समर्थन करता है. अतः वह भंगी कैसे हो सकता है. वह वास्तव में ब्राह्मण था. बाल्मीकि और भंगी जाति के संबंधों में एक समस्या है कि जब चमार रविदास को अपना मानते हैं तो दोनों के मध्य एक सम्बन्ध बनता है, जैसे जुलाहा और बुनकर कबीर को अपना कहते हैं लेकिन रामायण के बाल्मीकि और भंगियों में कोई सम्बन्ध नहीं है.

प्र०: क्या भंगियों के इस संस्कृतिकरण से उनकी सामाजिक स्थिति में कोई सुधार आया है?

उ०: नहीं, बिलकुल नहीं. मैं इसे संस्कृतिकरण नहीं कहूँगा. वास्तव में यह ब्राह्मणी रीती रिवाजों का सस्ता  अनुकरण है. संस्कृतिकरण के कारण भंगियों की सामाजिक गतिशीलता नहीं बढ़ी है. जाति के मामले में मुश्किल यह है कि अगर आप इसे दरवाजे से बाहर फेंकना चाहें तो वह पिछले दर्वाज़े या खिड़की से फिर अन्दर आ जाती है. दलितों के ईसाई धर्म, सिख धर्म और इस्लाम में धर्मांतरण का यही हाल हुआ है जबकि ये धर्म सिद्धांत रूप में समतावादी हैं परन्तु हिन्दू धर्म में ऐसा नहीं हैं. जहाँ तक मैं समझाता हूँ संस्कृतिकरण के नाम पर रीति-रिवाजों में कुछ बाहरी परिवर्तन तो हो सकते हैं लेकिन इससे दलितों के प्रति ऊँची जाति वालों का रवैया नहीं बदलता. भंगियों का यही तजुर्बा रहा है जो बाल्मीकि होने का दावा करते हैं. इसलिए अगर एक भंगी अपने आप को बाल्मीकि या चमार या रविदासी या आधर्मी या बढ़ई कहने लगता है, इससे दलितों के प्रति हिंदुयों के रवैये में कोई बदलाव नहीं आता.

प्र०: आपके हिसाब से दलित मुक्ति संघर्ष में संस्कृतिकरण का क्या प्रभाव पड़ेगा?

उ०: मेरे हिसाब से दलितों को हिन्दू बनाने का ही दूसरा नाम संस्कृतिकरण है. दलित मुक्ति पर इस का बुरा असर पड़ा है. यह दलितों को बांटता है. चमारों में जो उत्तर भारत में संख्या में सबसे ज्यादा हैं संस्कृतिकरण की वजह से वे 67 उप-जातियों में बंट गए हैं. इनमें से कोई भी दूसरी जाति में शादी नहीं करता है. उत्तर प्रदेश में भंगी 7 सजातीय समूहों में बंटे हैं. संस्कृतिकरण से उन लोगों के रूख  में कोई परिवर्तन नहीं आया है जो सदियों से दलितों के प्रति छुआछूत कर रहे थे. तौर तारीके बदल सकते हैं लेकिन नफरत बरक़रार है.

दलितों के हिन्दुकरण से उनके अन्दर चेतना का आना बहुत मुश्किल हो जाता है क्योंकि हिन्दू बन गयी दलित जातियां उन समूहों से नफरत करने लगती हैं जो कम हिन्दू हैं. यदि आप एक बाल्मीकि पुरुष से एक धानुक या बांसफोड़ महिला से शादी करने को कहें तो वह साफ़ तौर पर इनकार कर देगा क्योंकि धानुक और बांसफोड़  बाल्मिकियों के मुकाबले कम हिन्दू हैं.

प्र०: दलित जातियों और उनके मुक्ति संघर्ष पर हिंदुत्व के एजंडा का क्या असर है?

उ०: मेरी दृष्टि में हिंदुत्व संगठन दलितों को जो हिन्दू नहीं हैं हिन्दू धर्म में लाना चाहते हैं और सब से नीचे रखना चाहेंगे. ऐसा गाँधी जी ने भी किया. वे दलितों को बताते थे कि भगवान ने दलितों को सिर्फ इसलिए बनाया है कि वे सवर्णों की सेवा कर सकें और उन्हें इस उम्मीद से अपने जातीय धंधे करते रहना चाहिए ताकि अगले जन्म में उन का जन्म ऊँची जाति में हो सके. हिंदुत्व का पूरा प्रोजेक्ट यही है. इसलिए हिंदुत्व का बढ़ना दलितों के विचार से बहुत खतरनाक है. यदि आप इस जातीय ढांचे में मूलभूत परिवर्तन लाने के विषय में गंभीर हैं तो आप को जातीय व्यवस्था और उसे पैदा करने वाली धार्मिक विचारधारा पर जम कर हमला करना होगा. लेकिन हिंदुत्व के संगठन न तो ऐसा करेंगे और न ही वे ऐसा कर सकते हैं.

प्र०: हिंदुत्व की आदर्श व्यवस्था की क्या स्थिति होगी?

उ०: हिंदुत्व की योजनाओं के अनुसार सबसे आदर्श युग जिसे स्वर्णिम युग कहते हैं, वह युग वेदों, रामायण, गीता और मनुस्मृति का युग है. तब उस समय दलितों और शूद्रों की क्या स्थिति थी? हम लोगों के साथ गुलामों से भी बदतर व्यवहार किया जाता था और उसे इन ब्राह्मणवादी शास्त्रों में धार्मिक मान्यता प्रदान की गयी थी जिसे हिंदुत्व के प्रहरी आज प्रचारित कर रहे हैं. हिंदुत्व के संगठन वर्ण-व्यवस्था को अलग अलग तरीकों से लागू करना चाहते हैं और यह हमारे लिए सबसे खतरनाक प्रभाव है. अभी मैं आर.एस.एस. के प्रमुख गोलवलकर की पुस्तक पढ़ रहा था जिसमे उन्होंने कहा है कि जाति-व्यवस्था ने कोई नुक्सान नहीं पहुँचाया है. जाति-व्यवस्था का गुणगान उनके लिए अच्छा हो सकता है परन्तु हमारे लिए कदापि नहीं. हमारी दृष्टि से हिंदुत्व का बढ़ना किसी भी कीमत पर बढ़ती दलित-चेतना को रोकना है जो दलित मुक्ति का एक मात्र रास्ता है और इसके लिए हिंदुत्व की शक्तियां उनका ध्यान बांटने के लिए मुसलामानों और ईसाईयों को अपना निशाना बना रही हैं.

प्र०: धर्म का विस्तृत संघर्ष में क्या रोल है?

ऊ०: मैं समझाता हूँ कि एक समाज के चलाने के लिए तीन बातें आवश्यक हैं: पहला विवाह, दूसरा सरकार और तीसरा धर्म जो को एक नैतिक आधार देता है और जोड़ता है. इस सवाल ने डॉ. अम्बेडकर को उस वक्त बहुत उद्देलित किया था जब उन्होंने हिन्दू धर्म छोड़ा,जिस के साथ ऐतहासिक रूप से बहुत कम लोग जुड़े थे. अतः उन्होंने बौद्ध धर्म की नयी परिभाषा दी जो दक्षिणी अमेरिका के कैथोलिकों की लिबरेशन थियोलोजी से मिलती जुलती थी. उनका पहला सवाल होता था कि धर्म का समाज में क्या रोल है? उन्होंने जोर देकर कहा कि धर्म एक अछी नर्स है परंतु खराब रखैल है क्योंकि धर्म ने बहुत अच्छा और तोड़क रोल भी खेलें हैं.

प्र०: बहुत से महायानी और हीनयानी बौद्ध कहते हैं कि आंबेडकर की बौद्ध धर्म की परिभाषा बौद्ध धर्म के मूलभूत सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है?

उ०: यह बात सही है कि आंबेडकर द्वारा दी गयी बौद्ध धर्म की परिभाषा महायान और हीनयान दोनों से कई महत्वपूर्ण मामलों में भिन्न है. लेकिन शुरू से ही बुद्ध की मौत तक बौद्ध धर्म में आन्तरिक विविधताएँ रही हैं. उदाहरणार्थ जापान में 1260 विभिन्न समुदाय हैं.

प्र०: क्या दलित बौद्ध आन्दोलन और आजकल के ईसाई समुदय में दृश्य दलित ईसाई दह्र्म में कोई सम्बन्ध है?

उ०: दलित क्रिश्चियन थिओलोजी पिछले दस साल में उभर कर आई है जो कि दलितों की चेतना में आ रही वृद्धि के फलस्वरूप है. मेरा यह व्यक्तिगत विचार है कि यह चर्च के भीतर वर्णवाद और सवर्ण प्रभुत्ववाद के विरुद्ध एक चुनौती है. मैंने दलित क्रिश्चियन थिओलाजी का असर अन्य गैर-ईसाई दलितों पर पड़ते नहीं देखा. कई गैर ईसाई चर्च के अचानक दलित सवाल को उठाने को संशय की दृष्टि से देखते हैं. मैं समझता हूँ कि चर्च के लोग इस बात से परेशान हैं कि ईसाईयों की संख्या घट रही है क्योंकि कई दलित ईसाई आरक्षण का फायदा उठाने के लिए चर्च छोड़ रहे हैं. कानून के अनुसार आरक्षण क्रिश्चियन दलितों को नहीं है. शायद दलित क्रिश्चियन थिओलाजी इसे रोकने का ही एक हिस्सा है.

प्र०: क्या आप यह कहेंगे कि दलितों में आज धर्मान्तरण मुख्यत: बौद्ध धर्म की और है न कि ईसाई धर्म की ओर?

उ०: हाँ मुझे तो ऐसा ही दिखता है. बौद्ध धर्म से उन्हें गर्व और पहचान का अनुभव होता है और यह उन्हें पुराने स्वार्णिम काल से जोड़ता है. लेकिन बौद्ध धर्म आन्दोलन उतनी तेजी से नहीं चल रहा है जितना कि हम चाहते हैं. एक कारण तो यह है कि भिक्खुओं की ट्रेनिंग की कोई व्यवस्था नहीं है, हालाँकि डॉ. अम्बेडकर ने इस के लिए कहा था. उन्होंने कहा था कि भिक्खुओं के प्रशिक्षण के लिए स्कूल होने चाहिए जैसे प्राचीन बौद्धों  ने बनाए थे. नालंदा और तक्षिला के विश्वविद्यालय इस का एक उदाहरण हैं. शुरुआत के लिए हम ने कोशिश की. अपने भिक्खुओं को प्रशिक्षण के लिए थाईलैंड भेजा. उनमें से कई लोग प्रशिक्षण पूरा करने के बाद पच्छिम की ओर चले गए और वे भारत में सेवा करने के लिए वापस नहीं आये. यह हमारे लिए एक बड़ी समस्या है. लेकिन इस साल हम इस समस्या को हल करने के लिए कोशिश कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में भिक्षुओं के प्रशिक्षण के लिए एक शिक्षणालय खोलने की योजना है जिस में बौद्ध धर्म-शास्त्रों की शिक्षा दी जाएगी. आंबेडकर के दर्शन और अन्य समकालीन धर्मों के बारे में भी पढ़ाया जायेगा.

प्र०: बौद्ध धर्म में धर्म-परिवर्तन से महाराष्ट्र के महारों पर, जिस जाति से डॉ. अम्बेडकर थे, क्या प्रभाव पड़ा है?

उ०: मेरे हिसाब से धर्म बदलने से केवल रीति-रिवाजों में परिवर्तन आया है. सामाजिक स्तर पर कोई खास बदलाव नहीं आया है. लेकिन धर्म बदलने से कई लोगों ने शराब पीना छोड़ दिया और हिन्दू देवी देवताओं जैसे राम और कृष्ण की पूजा करना भी छोड़ दी है. आज महाराष्ट्र में बौद्ध धर्म मुख्यतः महारों तक ही सीमित है और उनके प्रति दूसरों का रवैया हकीकत में नहीं बदला है. लेकिन कम से कम धर्म बदलने से उनको एक नयी पहचान तो मिली है और उनके अन्दर आत्म-सम्मान की भावना आई है.

प्र०: क्या बौद्ध धर्म की मदद से जाति-व्यवस्था कमज़ोर पड़ सकती है?

उ०: आज ऐसा  ही हो रहा है हालाँकि इस की रफ़्तार धीमी है. मिसाल के तौर पर आंबेडकर मिशन सोसाइटी जिस से मैं जुड़ा हूँ के सभी सदस्य बौद्ध हैं. हम इस बात पर जोर दे रहे हैं कि परिवार का एक सदस्य अपनी जाति से बाहर शादी करे. जाति-व्यवस्था को ख़त्म करने का यही एक तरीका है. यदि अलग-अलग जातियों वाले दलित बौद्ध धर्म में आ जाएँ और अंतरजातीय विवाह शुरू करें तो ऐतहासिक तौर रूप से दलितों को कमज़ोर करने के लिए इन के बीच जो मतभेद पैदा किये गए हैं वह धीरे धीरे समाप्त हो जायेंगे. उन्हें इकट्ठा होने का अवसर मिलेगा.  इससे उनको एक पहचान मिलेगी और वे गर्व महसूस करेंगे. अगर वे धर्म परिवर्तन नहीं करते तो वे कई सौ जाति-समूहों में बंटे रहेंगे और उनकी कोई पहचान भी नहीं बन पायेगी.

 

नोट: भंगी शब्त कदाचित भंग शब्द से बना है जिसको हम बौद्ध काल की उस सेना से जोड़ सकते हैं जिसका काम हिंसक और प्रकृति विरोधी वैदिक यज्ञों को भंग करना था

[Mr Bhagwan Das is one of the most reputed scholar on Ambedkarism and the issue of Human Rights of Scheduled Castes. Widely traveled, Mr Bhagwan Das has spoken at various national & international platforms on the conditions of Dalits in India and what is the best way of their emancipation. In freewheeling conversation with Vidya Bhushan Rawat, he speak of the state of Dalit movement as well as political parties in India.–Vidya Bhushan Rawat.]

दिल्ली संसद पर डॉ आंबेडकर जयंती के मेले को कवर करने के लिए रविश जी का हार्दिक धन्यवाद, हम सब आभारी हैं| “मीडिया में अंबेडकर जयंती की कवरेज़ क्यों नहीं है” – रवीश कुमार NDTV News

ambedkar jayanti1 ambedkar jayanti2 ambedkar jayanti3 ambedkar jayanti4 girls making ashok chakraमीडिया में अंबेडकर जयंती की कवरेज़ क्यों नहीं है – रवीश कुमार

नई दिल्ली : शैनन। ऐसा कुछ नाम सुनाई दिया, भीड़ को चीरती मुस्कुराती हुई मेरे पास आ गई। फर्राटेदार बढ़िया अंग्रेज़ी में पूछने लगी कि आज अंबेडकर जयंती है। गांधी, नेहरू और पटेल जयंती के दिन अखबारों में कितना कुछ होता है, अंबेडकर पर क्यों कुछ नहीं है। क्यों नहीं यहां के मेले को दिखाया जाता है।

शैनन ने वही सवाल किया, जो सारे कर रहे थे। जवाब तो था मगर बात बढ़ाने के लिए पत्रकारिता की छात्रा शैनेन से एक सवाल पूछ लिया, अंबेडकर आपके लिए क्यों इतना मैटर करते हैं। वो बोल तो रही थी हंसते हुए, मगर उसकी आंखें छलक गईं। सर आज अंबेडकर नहीं होते तो हम यहां नहीं होते। मैं ऐसे नहीं होती। मेरे हाथ में ये आईफोन नहीं होता। हमारा कैमरा उसकी आंखों में नहीं झांक सका, लेकिन मैं नज़दीक खड़ा देख रहा था कि अंबेडकर के बारे में कृतज्ञता जताते हुए उसकी आंखों से आंसू की धार बह रही थी। शैनन ने इस धार को अपनी हंसी से छिपा तो लिया, मगर उसका सवाल काफी था दूसरे को मजबूर करने के लिए।

जिस अंबेडकर के कारण शैनन के पास आज सबकुछ है, उस अंबेडकर को जब शैनन अखबारों या टीवी में ढूंढती है, तो नहीं मिलते हैं। अनुपात के लिहाज़ उसकी बातों पर बहस हो सकती है, मगर कुछ तो आधार होगा, तभी तो शैनन के अलावा संसद मार्ग पर मिलने वाले हर शख्स ने यह सवाल किया। लोग पूछ रहे थे, सुना रहे थे और बोले जा रहे थे। आप पहले हैं, जो यहां शूटिंग के लिए आए हैं। यहां प्रेस का कोई नहीं आता। देखिये यहां कितनी भीड़ है, लेकिन कोई कवरेज नहीं होती। मैं यहां तीस साल से आ रहा हूं। बच्चा था, मगर अब दादा बन गया हूं, लेकिन आज तक किसी अखबार में यहां की कवरेज़ नहीं देखी। आप आज तक क्यों नहीं आए। मैं इन सवालों को सुनता हुआ भीड़ से गुज़रता जा रहा था। ये सवाल उनके भी थे, जो मेरे साथ सेल्फी खिंचाना चाहते थे और उनके भी जो इस बात से खुश थे कि कोई टीवी वाला यहां आया है।

इस सवाल की तल्ख़ी का कोई तो वजूद होगा, जिसके कारण हर दूसरा आदमी अंबेडकर जयंती के जश्न को छोड़ मुझे सुनाकर जा रहा था। मुझे नहीं मालूम कि नई दिल्ली के संसद मार्ग पर लगने वाला यह मेला अगले दिन के अखबारों में कभी छपा है या नहीं। दावे से नहीं बता सकता, मगर सरसरी तौर पर कह सकता हूं कि याद नहीं आता है। मेरे पास यह कहने का कोई भी प्रमाण नहीं है कि अंबेडकर जयंती की कवरेज न्यूज़ चैनलों पर नहीं हुआ होगा। लेकिन इतने लोगों का सवाल जब सवाल की जगह पीड़ा बन जाए, तब यह सोचना पड़ता है या सोचना चाहिए कि कोई यह बात क्यों कह रहा है।

नई दिल्ली के संसद मार्ग के बारे में कौन नहीं जानता होगा। आकाशवाणी है, भारतीय रिज़र्व बैंक, नीति आयोग का मुख्यालय है, पार्लियामेंट एनेक्सी है। जब से दिल्ली आया हूं, तब से सुनता आ रहा हूं कि वहां 14 अप्रैल के रोज़ बहुत बड़ा मेला लगता है। एक दिन पहले से ही तरह तरह के स्टॉल बनकर तैयार हो जाते हैं और हज़ारों की संख्या में लोग घंटों कतार में खड़े अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे होते हैं कि कब उनकी बारी आएगी और वे संसद के भीतर डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा पर फूल चढ़ा सकें। कई साल पहले जब 14 अप्रैल के दिन संसद मार्ग पर गया, तब रिपोर्टिंग नया-नया सीख रहा था। उसके बाद से इस दिन वहां तो नहीं, मगर कहीं और ज़रूर गया। आज भी नहीं जाता, मगर आगरा में लगने वाली भीम नगरी के आयोजन के समय के कारण संसद मार्ग का ही विकल्प बच गया था।

संसद मार्ग पर मेले का नज़ारा था। हज़ारों की भीड़ आ जा रही थी। आने वाले लोग बाराती की तरह सज धज कर आए थे। कोई दिल्ली के बाहर से था, तो कोई दिल्ली के गांवों से। इस भीड़ में डॉक्टर, राजस्व अधिकारी, पुलिस अधिकारी, वकील, बैंक कर्मचारी सहित वो सारा तबका था, जो अपनी इस ज़िंदगी के लिए डॉक्टर अंबेडकर का शुक्रगुज़ार है। उनकी पूजा करता है और प्यार करता है। इसीलिए कई लोगों ने कहा कि अगर आप डॉक्टर अंबेडकर की जगह बाबा साहब कहेंगे, तो हमें अच्छा लगेगा। हम बाबा साहब से बहुत प्यार करते हैं। यह बात करते करते न जाने कितनों की आंखें छलक आईं।

भंडारा और लंगर की भरमार थी, तो बाबा साहेब की मूर्तियां खूब बिक रही थीं। संविधान निर्माता की भूमिका में उनकी तस्वीर के खरीदार खूब नज़र आए। इस मेले में कई तरह के सामाजिक आंदोलन के स्टॉल लगे थे। एक स्टॉल पर बेटी बचाओ और बाल मज़दूरी मिटाने के लिए लोग नारे लगा रहे थे। किसी मंच पर कोई अंबेडकर के विचारों को लेकर तकरीरें कर रहा था। कहीं किताबों की भरमार थी। मनुस्मृति क्यों जलाई गई से लेकर मनु स्मृति की किताब भी। मैंने पूछा कि दोनों ही बेच रहे हैं। जवाब मिला कि हां जलाने से पहले पढ़ना ज़रूरी है, कि क्यों यह जला देने के लायक है।

14 अप्रैल के दिन अंबडेकर को लेकर असंख्य सेमिनार, सम्मेलन और मेले लगते हैं। शहर से लेकर गांव तक में। अंबेडकर को चाहने वाले की शिकायत है कि मीडिया उनकी कवरेज़ नहीं करता। अगर किसी भी तरीके से यह शिकायत सही है तो मीडिया को सोचना चाहिए। यह सवाल कोई पहली बार नहीं पूछा गया है। कुछ ही दिन पहले आईआईटी दिल्ली में एक नौजवान छात्र ने यही सवाल किया था। पता नहीं क्यों लगा कि यह सवाल पूछने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। व्यक्तिगत स्तर पर बहुत खुश हूं। एक उपभोक्ता के नाते भी पाठक, दर्शक का अधिकार तो बनता ही है, वो पूछें कि क्यों इस जयंती को दरकिनार कर दिया जाता है।

दरअसल दरकिनार नहीं किया जाता। अंबेडकर जयंती के दिन के उत्सवों को हमारे राजनीतिक दल हाई जैक कर लेते हैं। उनके बयान और दावों के बीच ही बाबा साहब की प्रासंगिकता का विवेचन होकर रह जाता है। तरह-तरह के नाम वाले दलों की रैलियों और दौड़ों के पीछ भागते कैमरे कभी देख ही नहीं पाते हैं कि अंबेडकर की जयंती लोग भी मनाते हैं। चैनलों पर अब पहले से कहीं ज्यादा अंबेडकर जयंती को लेकर कार्यक्रम हो जाते हैं, मगर यह हो सकता है कि नई राजनीतिक दावेदारियों की प्रतिक्रिया में ऐसा किया जाता हो।

हमने सार्वजनिक माध्यमों में अंबेडकर की मौजूदगी को इतना कृत्रिम और अवसरवादी राजनीतिक बना दिया है कि भूल जाते हैं ravish-kumarकि बाबा साहब को याद करते हुए कोई रो भी देता है, कोई हंस भी देता है और कोई शुक्रगुज़ार हो नारे लगाने लगता है जैसे उनकी ज़िंदगी में कोई दूत आ गया हो। लोक उत्सव में अंबेडकर या अंबेडकर का लोकरूप तो कहीं नहीं दिखता। क्यों नहीं दिखता, यही तो सवाल पूछा है मुझसे शैनन ने।

 

दलितों (मूलनिवासी/बौद्ध/SC/ST/OBC) को इतिहास में कोई जगह नहीं दी है,आज भी मीडिया में कवरेज नहीं है .सब कुछ बहुत चालाकी से किया जाता है…..ध्रुवा पुरकैत (हिंदुस्तान टाइम्स)

ध्रुवा पुरकैत का ये आर्टिकल हिंदुस्तान टाइम्स में अंग्रेजी में छपा है, प्रस्तुत है उसका हिंदी अनुवाद

varn vyastahजाति के साथ मेरा पहला वास्ता तब पड़ा जब मैं स्कूल शिक्षा पूरी करने वाला था। मेरे सरकारी स्कूल में, लोगों को आरक्षण प्रणाली के ‘लाभ’ प्राप्त करने के बारे में छात्रों में दबी जबान में चर्चा चलती थी; दूसरे मेरिट या योग्यता का रोना रो रहे थे।

मैं कॉलेज और उसके बाद विश्वविद्यालय के लिए चला गया, पर जातिवाद में कहीं कोई बदलाव नहीं आया। जातिगत-उपनाम  के अलावा, सवर्ण इसके साथ साथ लगभग जादुई तरीके से समाज को जाति-मुक्त कहते तो  हैं पर जादू देखिये की यही लोग खुद को अभी तक सवर्ण समूहों तक ही सीमित रखते हैं।

यहाँ तक की प्रतिशील विचारों वाले विद्वानों और जगहों में भी दलितों (मूलनिवासी/बौद्ध) की बात उनके पीट पीछे होती हैं, दलितों (मूलनिवासी/बौद्ध) की बात या उनका पक्ष भी यही लोग अपने आप ही रख देते हैं\ (इसीलिए असल पक्ष सामने नहीं आ पता)

ये कोई इत्तेफाक नहीं है की ये प्रगतिशील भारतीय सवर्ण जो जाती आधारित समूहों में ही चलते हैं, जाती आधारित समूहों में ही रहते हैं|  इन्हीं सवर्ण समूह में ही प्रेम/शादी सम्बन्ध विकसित होते हैं, और अपनी ही जाती के अध्यापकों द्वारा पढ़ाए व् बढ़ाए जाते हैं, अपनी ही जाती के दोस्त होते हैं, और उन ऑफिसों में काम करते हैं जहाँ  इनकी ही सवर्ण जाती को जबरदस्त बढ़ावा मिलता है|

दलितों (मूलनिवासी/बौद्ध) को इतिहास में कोई जगह नहीं दी है यहाँ तक की इतिहास की बड़ी से बड़ी घटनाओं में जैसे  स्वतंत्रता आंदोलन या शिक्षा आंदोलन, ये सब केवल सवर्णों के ही  परियोजना बन जाती है|

मीडिया भी इस परियोजना में उनका साथ देता है | इस मीडिया ने डॉ आंबेडकर महान को संविधान के रचनाकार तक ही सीमित कर दिया है, हिन्दू जातिवाद का उनका को पुरजोर विरोध और सुधार (बौद्ध धम्म मार्ग द्वारा) की कोशिश की हिंदुत्व के पटल से गायब ही कर दिया है| ये काम बहुत चतुराई से  किया जाता है, पहले तो इनकी पहचान को जातिगत घृणा तक सीमित करते हैं फिर उनके काम को आधुनिक भारतीय मूल्यों के साथ असंगत और गैरजरूरी बताते हैं

हालांकि ब्राह्मण, जानसंख्यानुसार मामूली है, पर राजनीती, ताकत और शिक्षा में जिस स्तर तक मजबूत हैं वो अन्याय लगता है

ब्राह्मणो के सत्ता और शक्ति पर एकाधिकार के कारन जब आरक्षण 50% स्पर्श  कर गया  तब यह तिरस्कारी लगता है| कोई भी ये प्रश्न क्यों नहीं उठता की जिनकी जनसँख्या प्रतिशत एक आंकिए मात्र है वो कैसे राज्ये के हर कोने में पचास प्रतिशत से भी ज्यादा पदों पर बैठे हैं|

सवर्ण के लिए सरकारी आवंटन या उठाने की कोशिश विकास कहा जाता है, लेकिन दलित (मूलनिवासी/बौद्ध) को उठाने वाली परियोजनाओं हमेशा बुराई के रूप में देखा जाता है। जातिविहीन होना एक मिथ्या या झूट है, लक्सरी केवल सवर्णों को ही उपलब्ध है जो इस सामाजिक सीधी के ऊपरी सिरे पर बैठे हैं| इन्होने अपने सदियों पुराने जातिवाद से फायदे को  आधुनिक धन लड़भ में बदल लिया है|, जबकि , केवल दलित (मूलनिवासी/बौद्ध) पर उसके दलित (मूलनिवासी/बौद्ध) होने की पहचान लाद दी गयी है|

जातिवाद का जहर खत्म नहीं हुआ है, ये जीवन के हर पहलु में ज्यों का त्यों लगा रहता है| जातिगत हिंसा ही वो चाबी है  जिससे सवर्ण वो दलितों (मूलनिवासी/बौद्ध) को दलित (मूलनिवासी/बौद्ध) बनाये रखते हैं,  लक्ष्मणपुर नरसंघार एक उदाहरण है|

डॉ आंबेडकर की १२४ जयंती पर राजनैतिक पार्टियां डॉ आंबेडकर की विरासत का श्रेय लेने को मरी जा रही हैं , पर उनकी स्वार्थी नज़रें केवल दलित (मूलनिवासी/बौद्ध) वोटों पर ही है | पर डॉ आंबेडकर की सच्ची विरासत एव उत्तराधिकारी वही होगा जो जाती व्यस्था के खत्म से काम कुछ भी स्वीकार न करे|

सवर्ण जातियों के संगठन को अपनी अपनी जाती में काम करना होगा ताकि वो जातिवादी मानसिकता का मुकाबला कर सकें , वो भी इन सवालों के साथ की :

– क्यों हमारी इतिहास की पुस्तकों में दलित (मूलनिवासी/बौद्ध) महापुरुषों का नाम तक नहीं लिया जाता

– क्यों अंतर्जातीय विवाह इतने कम होते हैं (जो की जाती मिटने का सबसे सटीक उपाए है)

HT dalit shut out of history

dalit tyago
My first brush with caste was when I was about to pass out of school. In my government school, people spoke in hushed tones about students receiving the ‘benefits’ of the reservation system; others bemoaned the death of ‘merit’.
As I went to college and then university, things didn’t change. In addition to surname-dropping, people seem to simultaneously, almost magically, call society casteless and yet restricted themselves to upper-caste groupings.
Even in more progressive spaces, Dalit discourses would be carried out in their absence, as more privileged scholars conveniently filled in their voices with their own.
It isn’t by accident that ‘progressive’ Indians move in caste-exclusive groups, fall in love with people of their same upper sub-caste, are taught by teachers of the same caste, have friends of the same caste and work in offices that are overwhelming upper caste.
Dalits are shut out of history with landmark events — such as the freedom movement or the education movement — becoming exclusive upper-caste projects.
The media buys into this project too: It reduces BR Ambedkar to the framer of our Constitution, erasing his emphatic rejection of caste Hindus and all tropes of Hinduism. This is cleverly done, making identity a dirty one and incompatible with modern Indian values.
Brahmins, though numerically minuscule, are loath to give up on hold on power and education and so any move to level the queered-pitch is shown to be unfair.
Therefore, when reservations touch 50% it seems blasphemous, but no one questions why a section of the population that is in single digits in some states corner more than 50% of the seats in the first place.
Upper-caste allocations are called development but Dalit projects are always seen as handouts. Being caste-less is a misnomer, a luxury allowed only to the upper castes, who can sit atop the social chain, having converted their centuries-old caste gains into modern capital, while only the Dalits are now saddled with the identity.
But caste isn’t gone. It is present in every facet of our lives, though if we look at a string of recent acquittals in caste violence, such as Laxmanpur Bethe, violence is key in the upper-caste design of keeping the Dalit in place.
The 124th Ambedkar Jayanti was marked by political wrangling over the legend’s legacy — their cynical eyes on the Dalit vote-bank — but any true heir to the leader’s work will never be satisfied without annihilation of caste.
Well-meaning upper-caste allies have to work within their communities to rid of the prejudice, beginning with the question why our history books don’t mention the multiple Dalit luminaries and why inter-caste marriages are so few in number.

 

डॉ अम्बेडकर जयंती १४ अप्रैल की पूर्व संध्या पर विशेष “डॉ. आंबेडकर : आधुनिक भारत के निर्माता”….-एस.आर. दारापुरी आई.पी.एस.(से.नि.)

dr Ambedkar imageडॉ. आंबेडकर : आधुनिक भारत के निर्माता …-एस.आर. दारापुरी आई.पी.एस.(से.नि.)

डॉ. बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर एक अछूत परिवार में पैदा हुए थे जो सभी प्रकार के सामाजिक, शैक्षिक, धार्मिक व राजनीतिक अधिकारों से वंचित वर्ग था. इसके बावजूद भी उनकी गिनती दुनिया के सबसे अधिक शिक्षित लोगों में की जाती है. उनके पास अमेरिका, इंग्लैण्ड तथा जर्मनी की उच्च डिग्रियां थीं. इतना शिक्षित होते हुए भी उन्हें समाज में घोर अपमान का सामना करना पड़ा. जब वे महाराजा बड़ोदा के दरबार में सैनिक सलाहकार के उच्च पद पर नियुक्त हुए तो उन्हें इतना अपमानित होना पड़ा कि उन्हें यह नौकरी छोड़नी पड़ी. जाति अपमान से तंग आ कर उन्होंने कभी भी नौकरी न करने का निर्णय लिया तथा इंग्लैण्ड से वकालत पास कर स्वतंत्र रूप से बम्बई में वकालत शुरू कर दी.

डॉ. आंबेडकर  इस्राईल के लोगों के मुक्तिदाता मोजिज़ की तरह अपने लोगों को जगाने, संगठित करने, अपनी शक्ति से परिचित कराने तथा अपने अधिकारों का प्रयोग सम्मानसहित करने के लिए प्रेरित कर रहे थे. उन्होंने दलितों को “शिक्षित हो, संघर्ष करो और संगठित हो” का नारा देकर मुक्ति का रास्ता दिखाया.

उन्होंने चालू शिक्षा पद्धति के बारे में महात्मा गणाधी, सी. राजगोपालचारी, रविन्द्रनाथ टैगोर, डॉ. जाकिर हुसैन तथा अन्य की तरह मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा की आलोचना नहीं की और न ही वे नए सिदधान्त गढ़ने में लगे रहे. इस के विपरीत डॉ. आंबेडकर ने अपने बच्चों को स्कूल तथा कालेज भेज कर पढ़ाने की प्रेरणा दी. उनका शिक्षा प्रचार का कार्यक्रम केवल दलितों तक ही सीमित नहीं था बल्कि उन्होंने सभी वर्गों के लिए उच्च शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास किया. डॉ. आंबेडकर ने इस हेतु “पीपल्ज़ एजुकेशन सोसायटी” के माध्यम से बबई में कालेज स्थापित किये जिनमें बिना किसी भेदभाव के सभी को शिक्षा उपलब्ध करायी और जनसाधारण की समस्यायों को सामने रख कर उनमें प्रातः तथा सायंकाल पढ़ाई की व्यवस्था की. इससे हजारों नवयुकों और महिलायों ने लाभ उठाया. बाबा साहेब ने दलित वर्ग के पढ़े लिखे युवकों के लिए सरकारी नौकरियों में मुसलामानों तथा अन्य अल्पसंख्यक वर्गों की तरह आरक्षण की मांग उठाई.

बाबा साहेब ने केवल अछूतों की मुक्ति के लिए ही संघर्ष नहीं किय बल्कि उन्होंने राष्ट्र के निर्माण एवं भारतीय समाज के पुनरनिर्माण में कई तरीकों से महत्वपूर्ण योगदान दिया. वे अपने देश के लोगों को बहुत प्यार करते थे तथा उन्होंने उनकी मुक्ति और खुशहाली के लिए बहुत काम किया.

भारत के भावी संविधान के निर्माण के सम्बन्ध में 1930 तथा 1932 में इंग्लैण्ड में गोलमेज़ कांफ्रेंस बुलाई गयी जिसमें उन्हें डिप्रेस्ड क्लासेज़ के प्रतिनिधि के रूप में आमंत्रित किया गया तो इसका गांधी जी ने बहुत विरोध किया. डॉ. आंबेडकर ने अपने भाषण में अँग्रेज़ सरकार की तीखी आलोचना करते हुए कहा, “अँग्रेज़ सरकार ने हमारे उद्धार के लिए कुछ भी नहीं किया है. हम इस से पहले भी अछूत थे और अब भी अछूत हैं. यह सरकार दलित हितों की विरोधी है तथा उनकी मुक्ति और अपेक्षायों के प्रति उदासीन है. यह सरकार  ऐसा जानबूझ कर कर रही है. केवल लोगों की सरकार, लोगों के लिए सरकार और लोगों द्वारा सरकार स्थापित होने पर ही उनका भला हो सकता है. अतः हमारी पहली मांग है – स्वराज.” इस संक्षिप्त उद्धरण से बाबा साहेब की देश प्रेम और स्वंत्रता की चाह का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

बाबा साहेब को केवल दलित हितों को बढ़ाने तथा शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए ही याद नहीं किया जाता है बल्कि उन्हें राष्ट्र निर्माण एवं उसके आधुनिकीकरण में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए भी याद किया जाता है. इसके कुछ प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं:-

  1. भारत सरकार अधिनियम 1935 लागू होने पर प्रान्तों में विधान सभाएं स्थापित करने एवं स्वराज की पद्धति लागू करने का निर्णय लिया गया तो बाबा साहेब ने राजनीतिक क्षेत्र में दलितों की हिस्सेदारी करने के ध्येय से स्वतंत्र मजदूर पार्टी (Independent Labour Party) की स्थापना की तथा उसके झंडे तले 1937 का पहला चुनाव लड़ा. इसमें उन्हें बहुत अच्छी सफलता मिली. इस पार्टी में दलितों के हितों के साथ साथ मजदूर हितों की वकालत भी की गयी थी तथा कई प्रस्ताव रखे गए थे. बाबा साहेब चाहते थे कि मजदूरों को केवल बेहतर कार्य स्थिति से ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए बल्कि उन्हें राजनीति में भाग लेकर राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी प्राप्त करनी चाहिए.
  2. बाबा साहेब जानते थे कि भारत की निरंतर बढ़ती आबादी भी उस के पिछड़ेपन का कारण है. इसी लिए उन्होंने 1940 में बम्बई एसेम्बली में परिवार नियोजन योजना लागू करने का बिल प्रस्तुत किया था. इससे भी उनके देश प्रेम की झलक मिलती है.
  3. उन्होंने 1942 में स्वतंत्र मजदूर पार्टी भंग करके “शैड्युल्ड कास्ट्स फेडरेशन” नाम की पार्टी की स्थापना की तथा दलित वर्ग की अखिल भारतीय स्तर की कांफ्रेंस की. उन्होंने दलित महिलायों का भी सम्मलेन किया. वे चाहते थे कि महिलायों को अपनी मुक्ति और अधिकारों के लिए स्वयं लड़ना चाहिए. उन्होंने महिलायों को शराब बंदी लागू करने के लिए संघर्ष करने के लिए भी प्रेरित किया. उन्होंने महिलायों को सलाह दी कि यदि उनका पति शराब पीकर घर आये तो वे उसे खाना न दें. इस से बाबा साहेब की महिलायों की मुक्ति सम्बन्धी चिंता का आभास मिलता है.
  4. सन 1932 में साम्प्रदायिक पंचाट के अनुसार दलितों को सरकारी नौकरियों में एवं विधान सभायों में आरक्षण की सुविधा मिली थी जिस का महात्मा गाँधी द्वारा मरण व्रत रख कर विरोध किया गया.  अंत में बाबा साहेब को गाँधी जी की जान बचाने के लिए दलितों के पूना पैकट करके राजनीतिक अधिकारों की बलि देनी पड़ी तथा अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने के अधिकार को छोड़ना पड़ा जिस का खमियाज़ा दलित वर्ग आज तक भुगत रहा है.
  5. यह देखा गया था कि कांग्रेस के लोग दलित वर्ग की मीटिंगों में गड़बड़ी फैलाकर अशांति फैला देते थे. अतः इसे रोकने के लिए बाबा साहेब ने स्वयं सेवक संघ की तरज पर दलित नवयुवकों का “समता सैनिक दल’ बनाया. सन 1942 में उन्होंने इस का बड़ा सम्मलेन भी किया. बाबा साहेब इस के माध्यम से दलित नवयुवकों में अनुशासन, आत्म रक्षा एवं अपने नेताओं की रक्षा करने तथा अत्याचार का विरोध करने की भावना पैदा करना चाहते थे.
  6. यह सर्वविदित है कि स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण में बाबा साहेब का महत्वपूर्ण योगदान है. परन्तु फिर भी कुछ लोग इस को बहुत कम करके दिखाने की कोशिश करते रहते हैं. इस से कोई भी इनकार नहीं कर सकता कि आज भारत में यदि लोकतंत्र जीवित है तो वह इस संविधान के कारण ही है. भारत में संसदीय लोकतंत्र और सरकारी समाजवाद की स्थापना में बाबा साहेब का अद्वितीय योगदान है.
  7. बाबा साहेब अछूतों के साथ-साथ महिलायों के भी शुद्र होने की स्थिति के कारण व्याप्त दुर्दशा एवं अधोगति से बहुत दुखी थे. अतः वे महिलायों को भी कानूनी अधिकार दिलाना चाहते थे. 1952 में जब वे भारत के कानून मंत्री बने तो उन्होंने अथक परिश्रम करके हिन्दू कोड बिल तैयार किया और उसे पास करने हेतु संसद में पेश किया. परन्तु जब कट्टरपंथी हिंदुयों द्वारा उस बिल का विरोध किया गया और तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु भी कमजोरी दिखाने लगे तो डॉ. आंबेडकर ने खिन्न हो कर विरोध स्वरूप अपने पद से इस्तीफा दे दिया. बाद में वही बिल हिन्दू विवाह एक्ट, हिन्दू उतराधिकार एक्ट, हिन्दु स्पेशल मैरेज एक्ट आदि के रूप में 1956 में पास हुआ. इससे स्पष्ट है कि भारतीय, खास करके हिन्दू नारी के उत्थान में डॉ. आंबेडकर का महान योगदान है. इतना ही नहीं डॉ. आंबेडकर समान नागरिक संहिता ( Common Civil Code) के भी पक्षधर थे.

उपरोक्त के अतिरिकित डॉ. आंबेडकर का बहुत बड़ा योगदान भारत के औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण की नींव डालने का रहा है. दुर्भाग्यवश  उनके इस क्षेत्र में दिए गए योगदान को लोगों के सामने प्रकट नहीं किया गया. इस क्षेत्र में उन का प्रमुख योगदान मजदूर वर्ग का कल्याण, बाढ़ नियंत्रण, बिजली उत्पादन, कृषि सिंचाई एवं जल यातायात सम्बंधी योजनाएं तैयार करना था. इसके फलस्वरूप ही बाद में भारत में औद्योगीकरण एवं बहुउद्देशीय नदी जल योजनायें बन सकीं.

सन 1942 में जब बाबा साहेब वायसराय की कार्यकारिणी समिति के सदस्य बने थे तो उन के पास श्रम विभाग था जिस में श्रम, श्रम कानून, कोयले की खदानें, प्रकाशन एवं लोक निर्माण विभाग थे.

बाबा साहेब लम्बे अरसे तक मजदूरों की बस्ती में रहे थे. अतः वे मजदूरों की समस्यायों से पूरी तरह परिचित थे. अतः श्रम मंत्री के रूप में उन्होंने मजदूरों के कल्याण के लिए बहुत से कानून बनाये जिन में प्रमुख इंडियन ट्रेड यूनियन एक्ट, औद्योगिक विवाद अधिनियम, मुयावज़ा, काम के घंटे तथा प्रसूतिलाभ आदि प्रमुख हैं. अंग्रेजों के विरोध के बावजूद भी उन्होंने महिलायों के गहरी खदानों में काम करने पर प्रतिबंध लगाया. उन्होंने मजदूरों को राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी प्राप्त करने हेतु भी प्रेरित किया. वास्तव में वर्तमान में जितने भी श्रम कानून हैं उनमें से अधिकतर बाबा साहेब के ही बनाये हुए हैं जिस के भारत का मजदूर वर्ग उनका सदैव ऋणी रहेगा.

बाबा साहेब सफाई मजदूरों का कल्याण और उन्हें संगठित करने के लिए भी बहुत प्रयासरत थे जबकि गाँधी जी उन्हें भंगी बने रहने की शिक्षा देते थे तथा उन की हड़ताल को अनैतिक कार्य मानते थे. बाबा साहेब ने सर्वप्रथम बम्बई नगर महापालिका के सफाई मजदूरों को संगठित करके उनकी ट्रेड यूनियन बनवाई. वे इसी प्रकार के संगठन की स्थापना देश के अन्य भागों में भी करना चाहते थे और उसे अखिल भारतीय स्वरूप देना चाहते थे. उन्होंने इसी उद्देश्य से दो सदस्यी समिति भी बनायी तथा उसे विभिन्न प्रान्तों में जाकर सफाई मजदूरों की स्थिति एवं लागू कानूनों का अध्ययन कर रिपोर्ट देने को कहा. इस से स्पष्ट है कि बाबा साहेब सफाई मजदूरों को न्याय दिलाने तथा उन्हें अन्य ट्रेड यूनियनों की तर्ज़ पर संगठित करने में कितने प्रयासरत थे.

बाबा साहेब भारत की बढ़ती आबादी के कारण उपजी गरीबी, बेरोज़गारी, भुखमरी आदि समस्यायों के बारे में बहुत चिंतित थे. अतः वे खेती को अधिक उन्नत करना चाहते थे. वास्तव में वे इसे उद्योग का दर्जा देना चाहते थे. अतः उन्होंने सम्पूर्ण कृषि भूमि का राष्ट्रीयकरण करके रूस की भांति सामूहिक खेती का प्रस्ताव रखा ताकि कृषि का मशीनीकरण हो सके. इस के लिए वे नदी सिंचाई की  योजनाओं को लागू करना चाहते थे. उन्होंने नदियों पर बाँध बना कर उनसे नहरें निकलने तथा बिजली पैदा करने की योजनायें बनायीं थीं. इस प्रकार वे नदियों की बाढ़ से होने वाली तबाही को खुशहाली के साधन बनाना चाहते थे. इसी उद्देश्य से उन्होंने भारत में सर्वप्रथम “दामोदर नदी घाटी” की योजना बनायी जो अमेरिका की “टेनिस वेली अथारिटी” की तरह की थी. इसी प्रकार उन्होंने भारत की अन्य नदियों के जल का उपयोग करने की योजनायें भी बनायीं. बाबा साहेब कृषि की छोटी जोतों को ख़त्म  करके उसे लाभकारी बनाना चाहते थे. वे खेती से बेशी मजदूरों को अधिक औद्योगीकरण करके उत्पादिक श्रम में बदलना चाहते थे.

बाबा साहेब नदी यातायात को भी बहुत बढ़ावा देना चाहते थे क्योंकि यह काफी सस्ता है. इसी उद्देश्य से उन्होंने सेंट्रल वाटरवेज़, इर्रीगेशन एंड नेवीगेशन कमीशन (CWINC)की स्थापना भी की थी. वर्तमान मोदी सरकार इसी का अनुसरण कर रही है. बाबा साहेब नदियों में मिटटी भराव के कारण आने वाली बाढ़ को रोकने हेतु अधिक गहरा करने के लिए छोटी एटमी शक्ति का प्रयोग करने के भी पक्षधर थे. इस से हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कृषि, सिंचाई तथा नदी जल के सदुपयोग के बारे में बाबा साहेब की सोच कितनी आधुनिक एवं प्रगतिशील थी.

बाबा साहेब का यह निश्चित मत था कि औद्योगीकरण के बिना भारत की बेरोज़गारी, गरीबी एवं उपभोक्ता वस्तुओं की कमी दूर नहीं की जा सकती. इसके विपरीत गांधी जी मशीनों के प्रयोग और औद्योगीकरण के कट्टर विरोधी थे. बाबा साहेब यह भी जानते थे कि बिजली के बिना औद्योगीकरण संभव नहीं है. अतः उनका विचार था कि हमें सस्ती बिजली बनानी चाहिए. बाबा साहेब नदियों पर बांध बांधकर बिजली पैदा करना चाहते थे. इसी उद्देश्य से उन्होंने दामोदर घाटी योजना बनायी तथा सेंट्रल वाटरवेज़, इर्रीगेशन एंड नेवीगेशन कमीशन की स्थापना की. इसका तथा कमीशन का मुख्य काम प्रान्तों को कृषि, सिंचाई एवं बिजली उत्पादन सम्बन्धी परामर्श देना था. इनके सहयोग से बाद में कई बड़ी बहुउद्देशीय नदी योजनायें बनायीं गयीं जिनसे बिजली के उत्पादन के साथ साथ कृषि सिंचाई एवं बाढ़ नियंतरण में सहायता मिली. बाबा साहेब ने ही बिजली के उत्पादन एवं सुचारू वितरण के लिए केन्द्रीय तथा राज्य बिजली बोर्डों की स्थापना भी की थी. वास्तव में बाबा साहेब ने बिजली उत्पादन, बाढ़ नियंतरण, कृषि सिंचाई एवं बहुद्देशीय नदी योजनायें बनाकर भारत के औद्योगीकरण की नींव रखी थी.S R DARAPURI

उपरोक्त संक्षिप्त विवरण से स्पष्ट है कि बाबा साहेब भारत के नव निर्माण,औद्योगीकरण, कृषि विकास एवं सिंचाई, बाढ़ नियंतरण, नदी यातायात तथा बिजली उत्पादन बढ़ाने के लिए विशेष तौर पर प्रयासरत थे जिससे उन्होंने भारत के आधुनिकीकरण की नींव रखी. उन्होंने वायसराय की कार्यकारिणी के श्रम सदस्य के रूप में भारत के औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण में जो महान योगदान दिया है उस के लिए भारत उनका हमेशा ऋणी रहेगा.

एस.आर. दारापुरी आई.पी.एस.(से.नि.)

srdarapuri@gmail.com

बहुजन जनता की शिक्षा और ज्ञान के लिए संगर्ष करने वाले महात्मा ज्योतिराव फुले जी के जन्म दिवस ’11 अप्रैल’ पर हार्दिक शुभकामनाए -डॉ. पुरुषोत्तम मीणा

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महात्मा ज्योतिराव फुले जी के जन्म दिवस 11 अप्रैल पर हार्दिक शुभकामनाए
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आज सामाजिक न्याय के अनेक नेता और विचारक हैं, लेकिन इस सामाजिक न्याय की लड़ाई की शुरूआत करने वाले महानायक महात्मा ज्योतिराव फुले जी का आज जन्मदिन है। अनेक लोग उनको अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए, उनकी जयन्ती मना रहे हैं, लेकिन उनको सच्चे अर्थों में श्रद्धा सुमन अर्पित करना तब ही सार्थक है, जबकि हम उनकी ओर से प्रदर्शित मार्ग का हकीकत में अनुशरण करें!

महात्मा ज्योतिराव फुले जी के बारे में कुछ संकलित जानकारी:-

1. ज्योतिबा फुले जी ने 1848 मेँ भारत का प्रथम स्कूल खोला, तब तक तो बॉम्बे हाई स्कूल भी नहीँ खुला था। उन्होंने लड़कियोँ को पढाने के लिये कुल तीन स्कूल खोले!

2. ज्योतिबा फुले जी को अपने स्कूल में जब लड़कियोँ को पढाने के लिये महिला टीचर (शिक्षिका) तक नहीँ मिली, तब उन्होनेँ अपनी पत्नि सावित्री बाई को शिक्षण के लिये तैयार किया।

3. शिक्षा के प्रचार-प्रसार के अपराध में मनुवादियों ने महात्मा ज्योतिराव फुले जी के परिवार और जाति के लोगों को इस तरह से भड़काया कि उनको अपने ही घर से निकलवा दिया गया और जाति से बहिष्कृत करवा दिया गया।

4. 1853 में महात्मा ज्योतिराव फुले जी और उनकी पत्नी सावित्री बाई ने अपने मकान में प्रौढ़ों के लिए रात्रि पाठशाला खोली।
5. महात्मा ज्योतिबा ने आज से 150 साल पहले ‘कृषि विद्यालय’ की बात उठायी। ये वो समय था, जबकि किसानोँ की दुर्दशा पर कोई समाज सुधारक बोलते नहीँ थे!!

6. शिक्षा के असली प्रचारक ज्योतिराव फूले जी थे। और प्रथम महिला शिक्षा का विद्यालय की स्थापना फुले साहब की ही देन है।

7. आज महिलाएं शिक्षित हैं, पर ये कोई नहीं जानता की महिलाओं की शिक्षा और आजादी में फुले साहब का कितना बड़ा योगदान रहा है!

8. फुले साहब भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर जी के गुरु थे और डॉ. भीमराव अंबेडकरजी ने ही महात्मा ज्योतिराव फुले जी को महात्मा की उपाधि दी थी। लेकिन मनुवादी राजनीति के कारण बहरूपिये मोहनदास कर्मचन्द गांधी को महात्मा बना दिया गया।

9. इस देश के राष्ट्रपिता कहलाने का यदि किसी एक व्यक्ति को नैतिक हक है तो वो केवल महात्मा ज्योतिराव फुले जी को है, लेकिन जातिवाद के कट्टर समर्थक गांधी को राष्ट्रपिता बना दिया गया!

10. शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग करने वाले सबसे पहले व्यक्ति महा मानव महात्मा ज्योतिराव फुले ही थे!

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल,

11.04.15,  14.16 बजे!