सम्राट अशोक का साम्राज्य साधारण साम्राज्य नही था बल्कि वह दुनिया का सबसे बडा, सबसे शक्तिशाली, अमिर, जातीविहीन-चरित्रवान प्रबुध्द भारत का विशाल भवन था।….SBMT Delhi


bahujan baudh samrat ASHOKA The Greatसम्राट अशोक का साम्राज्य साधारण साम्राज्य नही था बल्कि वह दुनिया का सबसे बडा, सबसे शक्तिशाली, अमिर, जातीविहीन-चरित्रवान प्रबुध्द भारत का विशाल भवन था। इसलिए वैदिकब्राम्हणों नें सर्वप्रथम सम्राट अशोक के समतामुलक प्रबुध्द भारत कि ऐतिहासीक पहचान को मिटाने का प्रबल अपना कर्तव्य माना उसके समतामुलक प्रबुध्द भारत को मिटाये बैगर वह अपने वर्णाश्रम कि व्यवस्था में ब्राम्हणवर्ण का प्रभुत्व जनता पर थोपने में कामयाब नही होते एंव उस समतामुलक स्वर्णिम भारत को भुलाना भी महत्वपुर्ण था क्योंकि लोग

जान ही न पाये कि भारत के इतिहास में कभी समतामुलक सामाजिक-आर्थिक विकास हुऑ था। इसलिये वैदिक ब्राम्हणों ने सर्वप्रथम अपनि संपूर्ण शक्ति सम्राट अशोक के स्वर्णिम प्रबुध्द भारत को मिटाने में लगाना ही उचित समझा। वर्तमान मे वैदिकब्राम्ह्ण अगर किसी डरते है तो वह मात्र सम्राट अशोक के समतामुलक प्रबुध्द भारत से अन्य किसी से नही यह हमारा अनुभव है…….

 

सम्राट अशोक का साम्राज्य वास्तविक समतामुलक सामाजिक-आर्थिक विकास का स्वर्णिम प्रबुध्द भारत था।

दुनियाकी प्रथम प्राद्दोगिक क्रांती सम्राट अशोक के समय में हुई तथा मौर्यकाल में जनता जातीयों में बटी नही थी। अर्थात जातीया नही थी सम्प्रदाय थे वह भी चार उसका उल्लेलख सम्राट अशोक ने अपने शिलालेख में किया है। और नाही उस समय किसी ब्रह्म, विष्णु, महेश, राम, कृष्ण गौरी, गणपति, इश्वर नाम कि धारणा थी, बुद्ध विष्णु का अवतार हैं इस प्रकार कि मान्यता नही थी, श्राद्ध पक्ष भी नही हुऑ करते थे और नाही पिंडदान, बुध्द के शिक्षा के विरूद्ध कोई भी आचरण नही करते थे। ब्राह्मणों के हाथ से क्रियाकर्म नही करते थे, सभी मनुष्य मात्र समान है ऐसा मानते थे, सभी समता स्थापित करने का प्रयास करते थे। तथागत गौतम बुद्ध के बताये हुए अष्टांग मार्ग का पूर्ण पालन करते थे।

 

तथागत बुद्ध के बताई दस पारमिताओं का पूर्ण पालन करना अपना कर्तव्य मानते थे, सभी प्राणिमात्रों पर दया करके

उनका लालन पालन करते थे, हत्या , चोरी, व्यभिचार, झूठ, शराब मदिरा आदि का सेवन नही करते थे, प्रज्ञा, शील, करुणा इन तीन तत्वों का मेल करके अपना जीवन व्यतीत करते थे, मनुष्य मात्र को हानिकारक होने वाले कृत्य नही करते थे जैसे आज हिन्दु्त्व कि सामाजिक बुराईयों में दिखाई देते है, विश्व कि बहुसंख्य लोग बुद्ध के धम्म कि शरण में आ चुके थे, बुद्ध का धम्म सधम्म है इस पर उनका विश्वास हो चुका था, जो कोई बुध्द के धर्म कि शरण में आता था वह समझता था कि उसका नया जन्म हुआ है, और बुद्ध की शिक्षा के अनुसार आचरण करते थे। डॉ. बी.आर.अंबेडकर, कि 22 प्रतिज्ञायों का स्त्रोत सम्राट अशोक के प्रबुध्द भारत से आता है……

 

हाल ही में एक कार्यक्रम मे गया इस कार्यक्रम में सभी वर्ग के लोग अपने अपने संघटन के माध्यम से कार्यक्रम मे सम्मलित होकर कार्य करते है। इस कार्यक्रम में विभिन्न सम्प्रदाय के लोग मिले तब परिचय देते हुये कुछ जयभिम, जयज्योती, जयमल्लहार, जयगुरूदेव, जयरामदास, जयतुकोबा, जयशाहु, जयअशोक इत्या्दी अपने आदर्श पुरूषो कि ‘जय’ करते हुये परिचय दे रहे थे। मै मात्र उन्हे ‘नमोबुध्दाय’ कह रहा था। विभिन्नय  सम्प्रयदाय के लोग जब वह अपने आदर्श पुरूषो कि जय करते हुये मिल रहे थे तब सोच रहा था कि इनके ‘जय’ में

वैदिकब्राम्हण जाती व्यवस्था कि पहचान दिखाई दे रही थी। जाती-तोडो समाज जोडो का नारा सबसे जादा ‘जय’ करने वाले ही लगाते है। और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक आंदोलन भी किये लेकिन जाती टूटी नही और समाज जुडा नही, आंदोलन असफल और शक्ति बरबाद, इन आंदोलनकारीयों ने कभी गंभिरता से अध्ययन

नही किया कि इतना बडा आंदोलन करने के बावजूद समाज जुडा नही जातीया टूटी नही, क्योंकि भारत कि जनता जाती को भी धार्मिक दृष्टीसे देखती है इसलिए यह बहुसंख्यक जनता अपने अपने आदर्श पुरूषो को लेकर ‘जय’ के

करते रहती है…. जाती-तोडो समाज जोडो क्यों असफल रहा ? और जो इस प्रकार के आंदोलन करेंगे वे भी असफल ही रहेंगे? क्यों कि इनके आंदोलन व्यवहारीक नही होते इन्हें आध्यात्मीक ज्ञान नही होता इनका उद्देश मात्र राजनितीक होता है सामाजिक बलदाव का नही यह वास्तविक्ता है बुध्द के समय सामाजिक बुराई थी बुध्द ने अपने

आध्यात्मीक ज्ञान से उन बुराईयों समाप्त करने के लिए लोगों को नैतिक शिक्षा का पाठ पडाया, राजनेताओं

को सामाजिक-आर्थिक नितीयों का ज्ञान दिया जिससे उस समय संपूर्ण जम्बुद्वीप बुध्द के कदम-कदम से चलने लगा। उद्दघोषना देकर बदलान करने कि मानसिकता में अध्यात्मीक दृष्टी से बदलाव होना चाहीये। बुध्द के पास

उच्चकोटी का आध्यात्मीक ज्ञान था इसलिए वह मानवकल्याण करने सफल रहे और उन्ही के ज्ञान और विवेक से मानवकल्याण हो रहा है एंव सम्राट अशोक ने बुध्द के आध्यात्मीक शिक्षा को विश्वजगत में संचारित नही किया होता तो वह भी चक्रर्वर्ती सम्राट नही होता और बुध्द कि शरण में डॉ. अंबेडकर नही गये होते तो वह भी आधुनिक जगत में बुध्द का सर्वश्रेष्ट प्रबल अनुयायि नही कहलाते और नाही उनकि पहचान वैश्विक होती, बुध्द के आध्यात्मीक शिक्षा को सामाजिक- आर्थिक विकास के लिए प्रबल आधार बनाना अर्थात वैश्विक मानवकल्याण का विकास करणा होता है, उठाकर पड लेना प्राचिन भारत के बौध्द कालखंडो का इतिहास…

 

https://akhilbharatiyamauryamahasangh.wordpress.com/2014/12/21/%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9F-%E0%A4%85%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%95-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%AF/

 

 

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  1. Thanks  साभार -बी॰एल॰ राव  उप मण्डल अभियन्ता (दूरसंचार), विपणन अनुभाग बीएसएनएल, कार्यालय मुख्य महाप्रबंधक दूरसंचार, लखनऊ-1  मोबाइल – 9415335868, लैंड्लाइन -0522-2230210 

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