दलितों (मूलनिवासी/बौद्ध/SC/ST/OBC) को इतिहास में कोई जगह नहीं दी है,आज भी मीडिया में कवरेज नहीं है .सब कुछ बहुत चालाकी से किया जाता है…..ध्रुवा पुरकैत (हिंदुस्तान टाइम्स)


ध्रुवा पुरकैत का ये आर्टिकल हिंदुस्तान टाइम्स में अंग्रेजी में छपा है, प्रस्तुत है उसका हिंदी अनुवाद

varn vyastahजाति के साथ मेरा पहला वास्ता तब पड़ा जब मैं स्कूल शिक्षा पूरी करने वाला था। मेरे सरकारी स्कूल में, लोगों को आरक्षण प्रणाली के ‘लाभ’ प्राप्त करने के बारे में छात्रों में दबी जबान में चर्चा चलती थी; दूसरे मेरिट या योग्यता का रोना रो रहे थे।

मैं कॉलेज और उसके बाद विश्वविद्यालय के लिए चला गया, पर जातिवाद में कहीं कोई बदलाव नहीं आया। जातिगत-उपनाम  के अलावा, सवर्ण इसके साथ साथ लगभग जादुई तरीके से समाज को जाति-मुक्त कहते तो  हैं पर जादू देखिये की यही लोग खुद को अभी तक सवर्ण समूहों तक ही सीमित रखते हैं।

यहाँ तक की प्रतिशील विचारों वाले विद्वानों और जगहों में भी दलितों (मूलनिवासी/बौद्ध) की बात उनके पीट पीछे होती हैं, दलितों (मूलनिवासी/बौद्ध) की बात या उनका पक्ष भी यही लोग अपने आप ही रख देते हैं\ (इसीलिए असल पक्ष सामने नहीं आ पता)

ये कोई इत्तेफाक नहीं है की ये प्रगतिशील भारतीय सवर्ण जो जाती आधारित समूहों में ही चलते हैं, जाती आधारित समूहों में ही रहते हैं|  इन्हीं सवर्ण समूह में ही प्रेम/शादी सम्बन्ध विकसित होते हैं, और अपनी ही जाती के अध्यापकों द्वारा पढ़ाए व् बढ़ाए जाते हैं, अपनी ही जाती के दोस्त होते हैं, और उन ऑफिसों में काम करते हैं जहाँ  इनकी ही सवर्ण जाती को जबरदस्त बढ़ावा मिलता है|

दलितों (मूलनिवासी/बौद्ध) को इतिहास में कोई जगह नहीं दी है यहाँ तक की इतिहास की बड़ी से बड़ी घटनाओं में जैसे  स्वतंत्रता आंदोलन या शिक्षा आंदोलन, ये सब केवल सवर्णों के ही  परियोजना बन जाती है|

मीडिया भी इस परियोजना में उनका साथ देता है | इस मीडिया ने डॉ आंबेडकर महान को संविधान के रचनाकार तक ही सीमित कर दिया है, हिन्दू जातिवाद का उनका को पुरजोर विरोध और सुधार (बौद्ध धम्म मार्ग द्वारा) की कोशिश की हिंदुत्व के पटल से गायब ही कर दिया है| ये काम बहुत चतुराई से  किया जाता है, पहले तो इनकी पहचान को जातिगत घृणा तक सीमित करते हैं फिर उनके काम को आधुनिक भारतीय मूल्यों के साथ असंगत और गैरजरूरी बताते हैं

हालांकि ब्राह्मण, जानसंख्यानुसार मामूली है, पर राजनीती, ताकत और शिक्षा में जिस स्तर तक मजबूत हैं वो अन्याय लगता है

ब्राह्मणो के सत्ता और शक्ति पर एकाधिकार के कारन जब आरक्षण 50% स्पर्श  कर गया  तब यह तिरस्कारी लगता है| कोई भी ये प्रश्न क्यों नहीं उठता की जिनकी जनसँख्या प्रतिशत एक आंकिए मात्र है वो कैसे राज्ये के हर कोने में पचास प्रतिशत से भी ज्यादा पदों पर बैठे हैं|

सवर्ण के लिए सरकारी आवंटन या उठाने की कोशिश विकास कहा जाता है, लेकिन दलित (मूलनिवासी/बौद्ध) को उठाने वाली परियोजनाओं हमेशा बुराई के रूप में देखा जाता है। जातिविहीन होना एक मिथ्या या झूट है, लक्सरी केवल सवर्णों को ही उपलब्ध है जो इस सामाजिक सीधी के ऊपरी सिरे पर बैठे हैं| इन्होने अपने सदियों पुराने जातिवाद से फायदे को  आधुनिक धन लड़भ में बदल लिया है|, जबकि , केवल दलित (मूलनिवासी/बौद्ध) पर उसके दलित (मूलनिवासी/बौद्ध) होने की पहचान लाद दी गयी है|

जातिवाद का जहर खत्म नहीं हुआ है, ये जीवन के हर पहलु में ज्यों का त्यों लगा रहता है| जातिगत हिंसा ही वो चाबी है  जिससे सवर्ण वो दलितों (मूलनिवासी/बौद्ध) को दलित (मूलनिवासी/बौद्ध) बनाये रखते हैं,  लक्ष्मणपुर नरसंघार एक उदाहरण है|

डॉ आंबेडकर की १२४ जयंती पर राजनैतिक पार्टियां डॉ आंबेडकर की विरासत का श्रेय लेने को मरी जा रही हैं , पर उनकी स्वार्थी नज़रें केवल दलित (मूलनिवासी/बौद्ध) वोटों पर ही है | पर डॉ आंबेडकर की सच्ची विरासत एव उत्तराधिकारी वही होगा जो जाती व्यस्था के खत्म से काम कुछ भी स्वीकार न करे|

सवर्ण जातियों के संगठन को अपनी अपनी जाती में काम करना होगा ताकि वो जातिवादी मानसिकता का मुकाबला कर सकें , वो भी इन सवालों के साथ की :

– क्यों हमारी इतिहास की पुस्तकों में दलित (मूलनिवासी/बौद्ध) महापुरुषों का नाम तक नहीं लिया जाता

– क्यों अंतर्जातीय विवाह इतने कम होते हैं (जो की जाती मिटने का सबसे सटीक उपाए है)

HT dalit shut out of history

dalit tyago
My first brush with caste was when I was about to pass out of school. In my government school, people spoke in hushed tones about students receiving the ‘benefits’ of the reservation system; others bemoaned the death of ‘merit’.
As I went to college and then university, things didn’t change. In addition to surname-dropping, people seem to simultaneously, almost magically, call society casteless and yet restricted themselves to upper-caste groupings.
Even in more progressive spaces, Dalit discourses would be carried out in their absence, as more privileged scholars conveniently filled in their voices with their own.
It isn’t by accident that ‘progressive’ Indians move in caste-exclusive groups, fall in love with people of their same upper sub-caste, are taught by teachers of the same caste, have friends of the same caste and work in offices that are overwhelming upper caste.
Dalits are shut out of history with landmark events — such as the freedom movement or the education movement — becoming exclusive upper-caste projects.
The media buys into this project too: It reduces BR Ambedkar to the framer of our Constitution, erasing his emphatic rejection of caste Hindus and all tropes of Hinduism. This is cleverly done, making identity a dirty one and incompatible with modern Indian values.
Brahmins, though numerically minuscule, are loath to give up on hold on power and education and so any move to level the queered-pitch is shown to be unfair.
Therefore, when reservations touch 50% it seems blasphemous, but no one questions why a section of the population that is in single digits in some states corner more than 50% of the seats in the first place.
Upper-caste allocations are called development but Dalit projects are always seen as handouts. Being caste-less is a misnomer, a luxury allowed only to the upper castes, who can sit atop the social chain, having converted their centuries-old caste gains into modern capital, while only the Dalits are now saddled with the identity.
But caste isn’t gone. It is present in every facet of our lives, though if we look at a string of recent acquittals in caste violence, such as Laxmanpur Bethe, violence is key in the upper-caste design of keeping the Dalit in place.
The 124th Ambedkar Jayanti was marked by political wrangling over the legend’s legacy — their cynical eyes on the Dalit vote-bank — but any true heir to the leader’s work will never be satisfied without annihilation of caste.
Well-meaning upper-caste allies have to work within their communities to rid of the prejudice, beginning with the question why our history books don’t mention the multiple Dalit luminaries and why inter-caste marriages are so few in number.

 

2 thoughts on “दलितों (मूलनिवासी/बौद्ध/SC/ST/OBC) को इतिहास में कोई जगह नहीं दी है,आज भी मीडिया में कवरेज नहीं है .सब कुछ बहुत चालाकी से किया जाता है…..ध्रुवा पुरकैत (हिंदुस्तान टाइम्स)

  1. मुझे यह जानकर बहुत खुशी हो रही कि हम लोग भारत के मूल निवासी हैं ! Jai Bheem

  2. इतिहासमें अस्पृस्य जतियोंको दलित कौन कहते थे?कबसे कहने लगे?
    अस्पृस्य जातियोंको संविधानिक शब्द अनुसुचित जाती दिया गया है, फिर भी दलित क्यों कहते है?
    दलित नही कहना चाहिये. दलित कहना अपमानजनक है|

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