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साईं बाबा के नगरी शिरडी में एक युवक की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई, क्योंकि उसके मोबाईल फोन में बाबासाहेब भीम राव अंबेडकर का रिंगटोन बजने लगा। दलित युवक को हत्यारों ने बाइक से कुचककर मार डाला।

dalit killed for ambedkar ring toneशिरडी।मंदिरों के शहर शिरडी में एक दलित युवक पर बेरहमी से हमला कर उसकी हत्या कर दी गई।कहा जा रहा है कि इस युवक की हत्या उसके मोबाइल के रिंगटोन की वजह से की गई।उसका रिंगटोन डॉ. भीमराम आंबेडकर पर एक गाना था।चार हमलावरों को अरेस्ट कर लिया गया है और बाकी चार फरार हो गए हैं।नर्सिंग स्टूडेंट सागर शेजवाल विवाह समारोह में शामिल होने शिरडी आया था। 16 मई को दोपहर बाद करीब डेढ़ बजे वह लोकल बियर शॉप पर अपने दो चचेरे भाइयों के साथ गया था।डेप्युटी सूपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस विवेक पाटील ने कहा कि सागर पर उसके रिंगटोन को लेकर 8 युवकों ने हमला बोला था। पाटील ने कहा, ‘आठ युवक बियर शॉप के पास एक टेबल पर बैठे थे।जब सागर का मोबाइल बजा तो रिंगटोन आंबेडकर पर सॉन्ग था।वहां बैठे युवकों ने सागर से कहा कि वह मोबाइल का स्विच ऑफ कर ले।पुलिस को दिए बयान में सागर के चचेरे भाई ने बताया कि उसका रिंग टोन में यह गाना था-तुम चाहे करो जितना हल्ला, मजबूत होगा भीम का किला।इसी रिंगटोन के बाद वहां बैठे युवकों ने सागर पर बियर की बोतल से हमला बोला।इसके साथ ही उन्होंने मुक्के भी खूब मारे। सागर को फिर इन्होंने मोटर साइकल पर खींच जंगल के करीब लाया और बाइक से कुचल दिया।सागर का नंगा शव करीब साढ़े छह बजे शाम में रुई गांव के पास बरामद किया गया। कई जगह की हड्डियां टूटने से सागर की मौत हुई है।पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक सागर के शरीर में करीब 25 जख्म थे।सभी हमलावर स्थानीय प्रभुत्वशाली मराठा और ओबीसी समुदाय से हैं।इन्होंने सागर के शरीर पर लगातार बाइक चढ़ाई।सागर के पिता सुभाष शेजवाल ने कहा, ‘मैं समझ सकता हूं कि वे कितनी क्रूरता से हमले किए होंगे।लड़ाई किसी वक्त हो सकती है लेकिन ऐसी क्रूरता देखने लायक है।वे छोटी सी बात पर इस हद तक क्यों गए?
सीसीटीवी फुटेज
बियर शॉप पर शुरुआती हमले सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गए हैं।21 मिनट के फुटेज में हमलावरों की क्रूरता साफ दिख रही है।इस मामले में पुलिस को सीसीटीवी फुटेज से अहम सबूत मिल गए हैं।इस मामले में पुलिस पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। बियर शॉप के पास में ही शिरडी पुलिस स्टेशन है। बियर शॉप के मैनेजर संदीप ने कहा कि मैंने 1.45 p.m पर पुलिस को कॉल किया था लेकिन इन्होंने आने में लंबा वक्त लिया।सागर के चचेरे भाई वहां से किसी तरह जान बचाकर भागे।

 

साईं बाबा के नगरी शिरडी में एक युवक की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई, क्योंकि उसके मोबाईल फोन में बाबासाहेब भीम राव अंबेडकर का रिंगटोन बजने लगा। दलित युवक को हत्यारों ने बाइक से कुचककर मार डाला।

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स्वदेशी भाषा पाली के मौजूदा अस्तित्व को मिटाने के प्रयास हो रहे हैं। दुनिया में जहॉं जहॉं बौद्ध धम्म पहुँचा, वहॉं वहॉं बौद्ध दर्शन एवं साहित्य के रूप में पाली भाषा भी पहुँची। …एम एल परिहार

1_A_Monk_with_Pali_Manuscript Brahmi script (circa 3rd cent. BCE)

 

 

हम सभी भारत वासी मूलनिवासी देख रहे हैं बौद्ध धम्म विरोधियों के नापाक मनसूबे।
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1 ) ;- दुनिया में खास तौर से बौद्ध देशों में बुद्ध के कारण भारत का बड़ा सम्मान है। जब भी कभी हमारे राजनेताओं को बौद्ध देशों या विश्व बैंक से बौद्ध स्थलों के विकास के लिए सहायता लेनी होती है या पूँजी निवेश कराना होता है, तब राजनेताओं को तथागत बुद्ध और उनका धम्म याद आता है। पिछले दिनों चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि ”बौद्ध धर्म चीन और भारत को मजबूती से जोड़ता है।” और जब चीनी राष्ट्रपति को भारत में घुमाने की बात आयी, तो मीडिया में महात्मा गांधी जी का साबरमती आश्रम छाया रहा। अगर बौद्ध धर्म चीन और भारत के रिश्तों को मजबूती देता है, तो स्वाभाविक रूप से चीनी राष्ट्रपति को बोधगया जैसे पवित्र स्थलों पर भी घुमाया जाना चाहिए था।
2 ) ;- लेकिन यह कोई पहला मामला नहीं है जब भारत ने तथागत की व्यावहारिक उपेक्षा की है। भारत में समय-समय पर तथागत बुद्ध की वैचारिक उपेक्षा होती रही है। मुझे याद है कि नई दिल्ली में अशोका मिशन ने चार दिवसीय वैश्विक बौद्ध सम्मेलन का आयोजन किया था जिसमें करीब 50 देशों के बौद्ध गुरू, अनुयायी, शोधार्थी आामंत्रित थे। सम्मेलन के उद्घाटन के लिए भारत के तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल और मुख्य अतिथि के रूप में तत्काली प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह को आमंत्रित किया था। पर सम्मेलन में न तो महामहिम राष्ट्रपति पहॅुंच पायीं और न ही प्रधानमंत्री। शायद यह इस तरह का पहला उदाहरण है। वरिष्ठ कॉंग्रेसी नेता डॉ0 कर्णसिंह ने सम्मेलन का उद्घाटन किया था। माना कि भारत एक धर्मनिरपेक्षीय देश है। पर सवाल है, कि जब 6 नवम्बर 2005 को तत्कालीन राष्ट्रपति ए पी जे अबुल कलाम और प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह संयुक्त रूप से नई दिल्ली में अक्षरधाम मंदिर का उद्घाटन कर सकते हैं, प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद वाले राजनेताओं को लाल किला मैदान में लवकुश रामलीला के दौरान धनुष बाण चलाते देखा जा सकता है तो वैश्विक बौद्ध सम्मेलन में भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हिस्सा क्यू नहीं ले सकते थे।
3 ) ;- स्वदेशी भाषा पाली के मौजूदा अस्तित्व को मिटाने के प्रयास हो रहे हैं। मसलन् गत वर्ष पाली भाषा को कुछ विदेशी भाषाओं के साथ सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा के विषयों की सूची से हटा दिया गया। सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा में वैकल्पिक भाषा के तौर पर एक भारतीय भाषा को चुनने का प्रावधान है। अगर संघ लोक सेवा आयोग की वाार्षिक रिपोर्टों के आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे कि मुख्य परीक्षा में पाली भाषा हिन्दी के बाद दूसरी सबसे ज्यादा पसंदीदा भाषा है। यानी कि पाली भाषा भारतीय लोकतंत्र के भावी नौकरशाहों की दूसरी सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली भाषा है। लेकिन विडम्बना देखिए कि हमारे राजनेताओं के इशारों पर उन्हीं नौकरशाहों की कलम से पाली भाषा के अस्तित्व को मिटाने के फरमान जारी हो रहे हैं।
4 ) ;- संघ लोक सेवा आयोग की वार्षिक रिपोर्ट वर्ष 2011-2012 के अनुसार 2010 में सर्वाधिक 939 परीक्षार्थियों ने वैकल्पिक भाषा के रूप में हिन्दी भाषा को चुना, 345 परीक्षार्थियोेंं ने पाली, 129 ने तमिल, 116 ने तेलुगु और 107 परीक्षार्थियों ने संस्कृत भाषा को चुना। वर्ष 2011 में 395 परीक्षार्थियों ने हिन्दी भाषा को, 345 ने पाली भाषा, 98 ने मलयालम, 92 ने कन्नड़, 82 ने तमिल और मात्र 49 परीक्षार्थियों ने संस्कृत भाषा को चुना। आयोग की वार्षिक रिपोर्ट 2012-13 के अनुसार वर्श 2011 में 395 परीक्षार्थियों ने हिन्दी भाषा को, 345 ने पाली, 92 ने कन्नड़, 82 ने तमिल, 80 ने तेलुगु और मात्र 49 परीक्षार्थिर्यों ने संस्कृत भाषा को चुना। वर्ष 2012 में 492 परीक्षार्थियों ने हिन्दी भाषा को, 368 परीक्षार्थियों ने पाली, 124 ने मलयालम, 122 ने कन्नड़, 98 ने तेलुगु , 95 ने तमिल औेर 88 परीक्षार्थियों ने संस्कृत भाषा को चुना। पाली भाषा भारत में करीब 60 विश्वविद्यालयों, डीम्ड विश्वविद्यालयों और संस्थानों में पढ़ाई जा रही है।
5 ) ;- उल्लेखनीय है कि बुद्ध की शिक्षाएं सुत्तपिटक में संकलित है और सुत्तपिटक पाली भाषा में लिखे गए हैं। दुनिया में जहॉं जहॉं बौद्ध धम्म पहुँचा, वहॉं वहॉं बौद्ध दर्शन एवं साहित्य के रूप में पाली भाषा भी पहुँची। यही कारण है कि आज बौद्ध दर्शन एवं साहित्य की भाषा पाली एशियाई देशों में ही नहीं बल्कि आक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज जैसे कई यूरोपीय विष्वविद्यालयों में भी पढ़ाई जा रही है।
6 ) ;- यही कारण है कि सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा से पाली को हटाए जाने का देश में ही नहीं विदेशों में भी विरोध हुआ था। पर यह विरोध भारतीय मीडिया में कोई खास स्थान न पा सका। भाषाओं के संरक्षण का मामला सँस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत आता है। इसी भाषायी संरक्षणवादी नीति के तहत भाषाओं को प्रोत्साहित करने के लिए स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रपति द्वारा संस्कृत, फारसी, अरबी, पाली और प्राकृत साहित्य के विद्वानों को सम्मानित किया जाता है। सम्मानित होने वालों में सँस्कृत के विद्वानों की संख्या सबसे अधिक होती है। इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि सरकार को संस्कृत भाषा के संरक्षण की चिंता अधिक है। गत स्वतंत्रता दिवस पर भी संस्कृत के सर्वाधिक 20 विद्वानों, अरबी के 3, फारसी के 2 और प्राकृत के 2 विद्वानों को सम्मानित किया गया। यहॉं भी पाली भाषा उपेक्षित हुई और पाली साहित्य के किसी विद्वान को उक्त सम्मान नहीं मिल सका। बौद्ध दर्शन की मौलिक जुबान पाली के अस्तित्व को मिटाने के प्रयासों से बौद्ध विरासत को बचाने का यह कैसा तरीका है। पाली के प्रति उपेक्षित व्यवहार से ऐसा लगता है कि जैसे किसी व्यक्ति की जुबान काटकर उससे कह दिया जाए कि अब वह बोलने के लिए स्वतंत्र है।
7 ) ;- भारत ने विदेशी आक्रमणकारियों का लंबा दौर देखा है। जिसमें भारत की धन संपदा को लूटने के साथ यहॉं की सांस्कृतिक जड़ों को समूल नष्ट करने के प्रयास भी हुए हैं।
8 ) ;- उल्लेखनीय है कि 1193 ई0 में एक तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने बौद्ध साहित्य एवं शिक्षा के लिए विश्व प्रसिद्ध नालंदा विविद्यालय को आग के हवाले कर दिया था। विशाल पुस्तकालय में रखी हजारों पुस्तकें जलकर राख हो गयी थीं। बख्तियार खिलजी यह समझकर खुश हो रहा था कि उसने भारत से बौद्ध साहित्य को बिल्कुल नष्ट कर दिया है। यह सच भी है कि नालंदा विष्वविद्यालय को भव्य एवं विशाल बनाने में जहॉं कई सौ वर्ष लग गए, वहीं बख्तियार खिलजी की तुर्की सनक ने इसे चंद घंटों में ही नष्ट कर दिया था। जो बौद्ध भिक्षु नालंदा विश्वविद्यालय को बचाने की याचना कर रहे थे, उन भिक्षुओं को भी बख्तियार खिलजी ने आग में झोक दिया था।
9 ) ;- फिर भी बौद्धिसत्व बाबा साहब डा0 अम्बेडकर के अथक प्रयासों के कारण आज भी भारत में बौद्ध दर्शन और उसका साहित्य मौजूद है। इतना ही नहीं उसकी झलक आजाद भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों में भी देखने को मिलती है। बिहार सरकार और बौद्ध देशों के सहयोग से नवनिर्मित नालंदा विश्वविद्यालय में फिर से अध्ययन कार्य प्रारम्भ हो चुका है। जिससे तथागत बुद्ध के विचारों की प्रासंगिकता और बढ़ गयी है कि ”हिंसा के दम पर अहिंसावादी विचारों को दबाया नहीं जा सकता। बल्कि हिंसा को अहिंसा से जीता जा सकता है।

नमो बुद्धाय

राजस्थान का नागौर जिला दलितों की कब्रगाह बनता जा रहा है,निर्मम नरसंहार ,अमानवीयता ,पशुता ,दरिंदगी का गढ़ बन गया है नागौर- भंवर मेघवंशी

dalit nagaur rajasthan nagaur rajasthan dalitएक और खैरलांजी
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राजस्थान का नागौर जिला दलितों की कब्रगाह बनता जा रहा है .
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राजस्थान की राजधानी जयपुर से तक़रीबन ढाई सौ किलोमीटर दूर स्थित अन्य पिछड़े वर्ग की एक दबंग जाट जाति की बहुलता वाला नागौर जिला इन दिनों दलित उत्पीडन की निरंतर घट रही शर्मनाक घटनाओं की वजह से कुख्यात हो रहा है .विगत एक साल के भीतर यहाँ पर दलितों के साथ जिस तरह का जुल्म हुआ है और आज भी जारी है ,उसे देखा जाये तो दिल दहल जाता है ,यकीन ही नहीं आता है कि हम आजाद भारत के किसी एक हिस्से की बात कर रहे है .ऐसी ऐसी निर्मम और क्रूर वारदातें कि जिनके सामने तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों द्वारा की जाने वाली घटनाएँ भी छोटी पड़ने लगती है .क्या किसी लोकतान्त्रिक राष्ट्र में ऐसी घटनाएँ संभव है ? वैसे तो असम्भव है ,लेकिन यह संभव हो रही है ,यहाँ के राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचें की नाकामी की वजह से …

दलित उत्पीडन का गढ़ बन गया है नागौर
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नागौर जिले के बसवानी गाँव में पिछले महीने ही एक दलित परिवार के झौपड़े में दबंग जाटों ने आग लगा दी ,जिससे एक बुजुर्ग दलित महिला वहीँ जल कर राख हो गयी और दो अन्य लोग बुरी तरह से जल गए ,जिन्हें जोधपुर के सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए भेजा गया ,इसी जिले के लंगोड़ गाँव में एक दलित को जिंदा दफनाने का मामला सामने आया है.मुंडासर में एक दलित औरत को घसीट कर ट्रेक्टर के गर्म सायलेंसर से दागा गया और हिरडोदा गाँव में एक दलित दुल्हे को घोड़ी पर से नीचे पटक कर जान से मरने की कोशिश की गयी .राजस्थान का यह जाटलेंड जिस तरह की अमानवीय घटनाओं को अंजाम दे रहा है ,उसके समक्ष तो खाप पंचायतों के तुगलकी फ़रमान भी कहीं नहीं टिकते है ,ऐसा लगता है कि इस इलाके में कानून का राज नहीं ,बल्कि जाट नामक किसी कबीले का कबीलाई कानून चलता है,जिसमे भीड़ का हुकुम ही न्याय है और आवारा भीड़ द्वारा किये गए कृत्य ही विधान है .

डांगावास : दलित हत्याओं की प्रयोगशाला
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नागौर जिले की तहसील मेड़ता सिटी का निकटवर्ती गाँव है डांगावास ,जहाँ पर 150 दलित परिवार निवास करते है और यहाँ 1600 परिवार जाट समुदाय के है ,तहसील मुख्यालय से मात्र 2 किलोमीटर दुरी पर स्थित है डांगावास ,..जी हाँ ,यह वही डांगावास गाँव है ,जहाँ पिछले एक साल में चार दलित हत्याकांड हो चुके है ,जिसमे सबसे भयानक हाल ही में हुआ है. एक साल पहले यहाँ के दबंग जाटों ने मोहन लाल मेघवाल के निर्दोष बेटे की जान ले ली थी ,मामला गाँव में ही ख़त्म कर दिया गया ,उसके बाद 6 माह पहले मदन पुत्र गबरू मेघवाल के पाँव तोड़ दिये गए ,4 माह पहले सम्पत मेघवाल को जान से ख़त्म कर दिया गया ,इन सभी घटनाओं को आपसी समझाईश अथवा डरा धमका कर रफा दफा कर दिया गया .पुलिस ने भी कोई कार्यवाही नहीं की .
स्थानीय दलितों का कहना है कि बसवानी में दलित महिला को जिंदा जलाने के आरोपी पकडे नहीं गए और शेष जगहों की गंभीर घटनाओं में भी कोई कार्यवाही इसलिए नहीं हुयी क्योंकि सभी घटनाओं के मुख्य आरोपी प्रभावशाली जाट समुदाय के लोग है .यहाँ पर थानेदार भी उनके है ,तहसीलदार भी उनके ही और राजनेता भी उन्हीं की कौम के है ,फिर किसकी बिसात जो वे जाटों पर हाथ डालने की हिम्मत दिखाये ? इस तरह मिलीभगत से बर्षों से दमन का यह चक्र जारी है ,कोई आवाज़ नहीं उठा सकता है ,अगर भूले भटके प्रतिरोध की आवाज़ उठ भी जाती है तो उसे खामोश कर दिया जाता है .

जमीन के बदले जान लेने का प्रचलन
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एक और ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि राजस्थान काश्तकारी कानून की धारा 42 (बी ) के होते हुए भी जिले में दलितों की हजारों बीघा जमीन पर दबंग जाट समुदाय के भूमाफियाओं ने जबरन कब्ज़ा कर रखा है.यह कब्जे फर्जी गिरवी करारों,झूठे बेचाननामों और धौंस पट्टी के चलते किये गए है ,जब भी कोई दलित अपने भूमि अधिकार की मांग करता है ,तो दबंगों की दबंगई पूरी नंगई के साथ शुरू हो जाती है.ऐसा ही एक जमीन का मसला दलित अत्याचारों के लिए बदनाम डांगावास गाँव में विगत 30 वर्षों से कोर्ट में जेरे ट्रायल था ,हुआ यह कि बस्ता राम नामक मेघवाल दलित की 23 बीघा 5 बिस्वा जमीन कभी मात्र 1500 रूपये में इस शर्त पर गिरवी रखी गयी कि चिमना राम जाट उसमे से फसल लेगा और मूल रकम का ब्याज़ नहीं लिया जायेगा ,बाद में जब भी दलित बस्ता राम सक्षम होगा तो वह अपनी जमीन गिरवी से छुडवा लेगा .बस्ताराम जब इस स्थिति में आया कि वह मूल रकम दे कर अपनी जमीन छुडवा सकें ,तब तक चिमना राम जाट तथा उसके पुत्रों ओमाराम और काना राम के मन में लालच आ गया,जमीन कीमती हो गयी ,उन्होंने जमीन हड़पने की सोच ली और दलितों को जमीन लौटने से मना कर दिया .पहले दलितों ने याचना की ,फिर प्रेम से गाँव के सामने अपना दुखड़ा रखा ,मगर जिद्दी जाट परिवार नहीं माना ,मजबूरन दलित बस्ता राम को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी .करीब तीस साल पहले मामला मेड़ता कोर्ट में पंहुचा ,बस्ताराम तो न्याय मिलने से पहले ही गुजर गया ,बाद में उसके दत्तक पुत्र रतनाराम ने जमीन की यह जंग जारी रखी और अपने पक्ष में फैसला प्राप्त कर लिया .वर्ष 2006 में उक्त भूमि का नामान्तरकरण रतना राम के नाम पर दर्ज हो गया तथा हाल ही में में कोर्ट का फैसला भी दलित खातेदार रतना राम के पक्ष में आ गया .इसके बाद रतना राम अपनी जमीन पर एक पक्का मकान और एक कच्चा झौपडा बना कर परिवार सहित रहने लग गया ,लेकिन इसी बीच 21 अप्रैल 2015 को चिमनाराम जाट के पुत्र कानाराम तथा ओमाराम ने इस जमीन पर जबरदस्ती तालाब खोदना शुरू कर दिया और खेजड़ी के वृक्ष काट लिये.रत्ना राम ने इस पर आपत्ति दर्ज करवाई तो जाट परिवार के लोगों ने ना केवल उसे जातिगत रूप से अपमानित किया बल्कि उसे तथा उसके परिवार को जान से मार देने कि धमकी भी दी गयी .मजबूरन दलित रतना राम मेड़ता थाने पंहुचा और जाटों के खिलाफ रिपोर्ट दे कर कार्यवाही की मांग की.मगर थानेदार जी चूँकि जाट समुदाय से ताल्लुक रखते है सो उन्होंने रतनाराम की शिकयत पर कोई कार्यवाही नहीं की ,दोनों पक्षों के मध्य कुछ ना कुछ चलता रहा .

निर्मम नरसंहार ,अमानवीयता ,पशुता ,दरिंदगी !
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12 मई को जाटों ने एक पंचायत डांगावास में बुलाने का निश्चय किया ,मगर रतना राम और उसके भाई पांचाराम के गाँव में नहीं होने के कारण यह स्थगित कर दी गयी ,बाद में 14 मई को फिर से जाट पंचायत बैठी ,इस बार आर पार का फैसला करना ही पंचायत का उद्देश्य था ,अंततः एकतरफा फ़रमान जारी हुआ कि दलितों को किसी भी कीमत पर उस जमीन से खदेड़ना है ,चाहे जान देनी पड़े या लेनी पड़े ,दूसरी तरफ पंचायत होने की सुचना पा कर दलित अपने को बुलाये जाने का इंतजार करते हुये अपने खेत पर स्थित मकान पर ही मौजूद रहे ,अचानक उन्होंने देखा कि सैंकड़ों की तादाद में जाट लोग हाथों में लाठियां ,लौहे के सरिये और बंदूके लिये वहां आ धमके है और मुट्ठी भर दलितों को चारों तरफ से घेर कर मारने लगे ,उन्होंने साथ लाये ट्रेक्टरों से मकान तोडना भी चालू कर दिया .

दलितों ने गोली चलायी ही नहीं
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लाठियों और सरियों से जब दलितों को मारा जा रहा था ,इसी दौरान किसी ने रतनाराम मेघवाल के बेटे मुन्नाराम को निशाना बना कर फ़ायर कर दिया ,लेकिन उसी वक्त किसी और ने मुन्ना राम के सिर के पीछे की और लोहे के सरिये से भी वार कर दिया ,जिससे मुन्नाराम गिर पड़ा और गोली रामपाल गोस्वामी को जा कर लग गयी ,जो कि जाटों की भीड़ के साथ ही आया हुआ था .गोस्वामी की बेवजह हत्या के बाद जाट और भी उग्र हो गये ,उन्होंने मानवता की सारी हदें पार करते हए वहां मौजूद दलितों का निर्मम नरसंहार करना शुरू कर दिया.

ट्रेक्टरों से कुचला ,लिंग नोचा ,ऑंखें फोड़ दी ,गुप्तांगों में लकड़ियाँ डाल दी
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ट्रेक्टर जो कि खेतों में चलते है और फसलों को बोने के काम आते है ,वे निरीह ,निहत्थे दलितों पर चलने लगे ,पूरी बेरहमी से जाट समुदाय की यह भीड़ दलितों को कुचल रही थी ,तीन दलितों को ट्रेक्टरों से कुचल कुचल कर वहीँ मार डाला गया .इन बेमौत मारे गए दलितों में श्रमिक नेता पोकर राम भी था ,जो उस दिन अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए अपने भाई गणपत मेघवाल के साथ वहां आया हुआ था .जालिमों ने पोकरराम के साथ बहुत बुरा सलूक किया ,उस पर ट्रेक्टर चढाने के बाद उसका लिंग नोंच लिया गया तथा आँखों में जलती लकड़ियाँ डाल कर ऑंखें फोड़ दी गयी .महिलाओं के साथ ज्यादती की गयी और उनके गुप्तांगों में लकड़ियाँ घुसेड़ दी गयी .तीन लोग मारे गए ,14 लोगों के हाथ पांव तोड़ दिये गए ,एक ट्रेक्टर ट्रोली तथा चार मोटर साईकलें जला कर राख कर दी गयी ,एक पक्का मकान जमींदोज कर दिया गया और कच्चे झौपड़े को आग के हवाले कर दिया गया .जो भी समान वहां था ,जालिम उसे लूट ले गए .इस तरह तकरीबन एक घंटा मौत के तांडव चलता रहा ,लेकिन मात्र 4 किलोमीटर दूरी पर मौजूद पुलिस सब कुछ घटित हो जाने के बाद पंहुची और घायलों को अस्पताल पंहुचाने के लिए एम्बुलेंस बुलवाई ,जिसे भी रोकने की कोशिश जाटों की उग्र भीड़ ने की ,इतना ही नहीं बल्कि जब गंभीर घायलों को मेड़ता के अस्पताल में भर्ती करवाया गया तो वहां भी पुलिस तथा प्रशासन की मौजूदगी में ही धावा बोलकर बचे हुए दलितों को भी खत्म करने की कोशिश की गयी .

यह अचानक नहीं हुआ ,सब कुछ पूर्वनियोजित था
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ऐसी दरिंदगी जो कि वास्तव में एक पूर्वनियोजित नरसंहार ही था ,इसे नागौर की पुलिस और प्रशासन जमीन के विवाद में दो पक्षों की ख़ूनी जंग करार दे कर दलित अत्याचार की इतनी गंभीर और लौमहर्षक वारदात को कमतर करने की कोशिश कर रही है .पुलिस ने दलितों की और से अर्जुन राम के बयान के आधार पर एक कमजोर सी एफआईआर दर्ज की है ,जिसमे पोकरराम के साथ की गयी इतनी अमानवीय क्रूरता का कोई ज़िक्र तक नहीं है और ना ही महिलाओं के साथ हुयी भयावह यौन हिंसा के बारे में एक भी शब्द लिखा गया है. सब कुछ पूर्वनियोजित था ,भीड़ को इकट्टा करने से लेकर रामपाल गोस्वामी को गोली मारने तक की पूरी पटकथा पहले से ही तैयार थी ,ताकि उसकी आड़ में दलितों का समूल नाश किया जा सके . कुछ हद तक वो यह करने में कामयाब भी रहे ,उन्होंने बोलने वाले और संघर्ष कर सकने वाले समझदार घर के मुखिया दलितों को मौके पर ही मार डाला . बाकी बचे हुए तमाम दलित स्त्री पुरुषों के हाथ और पांव तोड़ दिये जो ज़िन्दगी भर अपाहिज़ की भांति जीने को अभिशप्त रहेंगे ,दलित महिलाओं ने जो सहा वह तो बर्दाश्त के बाहर है तथा उसकी बात करना ही पीड़ाजनक है ,इनमे से कुछ अपने शेष जीवन में सामान्य दाम्पत्य जीवन जीने के काबिल भी नहीं रही ,इससे भी भयानक साज़िश यह है कि अगर ये लोग किसी तरह जिंदा बच कर हिम्मत करके वापस डांगावास लौट भी गये तो रामपाल गोस्वामी की हत्या का मुकदमा उनकी प्रतीक्षा कर रहा है ,यानि कि बाकी बचा जीवन जेल की सलाखों के पीछे गुजरेगा ,अब आप ही सोचिये ये दलित कभी वापस उस जमीन पर जा पाएंगे .क्या इनको जीते जी कभी न्याय हासिल हो पायेगा ? आज के हालात में तो यह असंभव नज़र आता है .

इस शर्मनाक कृत्य पर शर्मिंदा नहीं है जालिम
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कुछ दलित एवं मानव अधिकार जन संगठन इस नरसंहार के खिलाफ आवाज़ उठा रहे है ,मगर उनकी आवाज़ कितनी सुनी जाएगी यह एक प्रश्न है .सूबे की भाजपा सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है ,कोई भी ज़िम्मेदार सरकार का नुमाइंदा घटना के चौथे दिन तक ना तो डांगावास पंहुचा था और ना ही घायलों की कुशलक्षेम जानने आया .अब जबकि मामले ने तूल पकड़ लिया है तब सरकार की नींद खुली है ,फिर भी मात्र पांच किलोमीटर दूर रहने वाला स्थानीय भाजपा विधायक सुखराम कल तक अपने ही समुदाय के लोगों के दुःख को जानने नहीं पंहुचा .नागौर जिले में एक जाति का जातीय आतंकवाद इस कदर हावी है कि कोई भी उनकी मर्जी के खिलाफ नहीं जा सकता है .दूसरी और जाट समुदाय के छात्र नेता ,कथित समाजसेवक और छुटभैये नेता इस हत्याकाण्ड के लिए एक दुसरे को सोशल मीडिया पर बधाईयाँ दे रहे है तथा कह रहे है कि आरक्षण तथा अजा जजा कानून की वजह से सिर पर चढ़ गए इन दलितों को औकात बतानी जरुरी थी ,वीर तेज़पुत्रों ने दलित पुरुषों को कुचल कुचल कर मारा तथा उनके आँखों में जलती लकड़ियाँ घुसेडी और उनकी नीच औरतों को रगड़ रगड़ कर मारा तथा ऐसी हालत की कि वे भविष्य में कोई और दलित पैदा ही नहीं कर सकें .इन अपमानजनक टिप्पणियों के बारे में मेड़ता थाने में दलित समुदाय की तरफ से एफ आई आर भी दर्ज करवाई गयी है ,जिस पर कार्यवाही का इंतजार है.

सीबीआई जाँच ही सच सामने ला सकती है .
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अगर डांगावास नरसंहार की निष्पक्ष जाँच करवानी है तो इस पूरे मामले को सी बी आई को सौपना होगा ,क्योंकि अभी तक तो जाँच अधिकारी भी जाट लगा कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया है कि वह कितनी संवेदनहीन है ,आखिर जिन अधिकारियों के सामने जाटों ने यह तांडव किया और उसकी इसमें मूक सहमति रही ,जिसने दलितों की कमजोर एफ आई आर दर्ज की और दलितों को फ़साने के लिए जवाबी मामला दर्ज किया तथा पोस्टमार्टम से लेकर मेडिकल रिपोर्ट्स तक सब मैनेज किया ,उन्हीं लोगों के हाथ में जाँच दे कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया कि उनकी नज़र में भी दलितों की औकात कितनी है .

ख़ामोशी भयानक है .
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इतना सब कुछ होने के बाद भी दलित ख़ामोश है ,यह आश्चर्यजनक बात है .कहीं कोई भी हलचल नहीं है ,मेघसेनाएं ,दलित पैंथर्स ,दलित सेनाएं ,मेघवाल महासभाएं सब कौनसे दड़बे में छुपी हुयी है ? अगर इस नरसंहार पर भी दलित संगठन नहीं बोले तब तो कल हर बस्ती में डांगावास होगा ,हर घर आग के हवाले होगा ,हर दलित कुचला जायेगा और हर दलित स्त्री यौन हिंसा की शिकार होगी ,हर गाँव बथानी टोला होगा ,कुम्हेर होगा ,लक्ष्मणपुर बाथे और भगाना होगा .इस कांड की भयावहता और वहशीपन देख कर पूंछने का मन करता है कि क्या यह एक और खैरलांजी नहीं है ? अगर हाँ तो हमारी मरी हुयी चेतना कब पुनर्जीवित होगी या हम मुर्दा कौमों की भांति रहेंगे अथवा जिंदा लाशें बन कर धरती का बोझ बने रहेंगे .अगर हम दर्द से भरी इस दुनिया को बदल देना चाहते है तो हमें सडकों पर उतरना होगा और तब तक चिल्लाना होगा जब तक कि डांगावास के अपराधियों को सजा नहीं मिल जाये और एक एक पीड़ित को न्याय नहीं मिल जाये ,उस दिन के इंतजार में हमें रोज़ रोज़ लड़ना है ,कदम कदम पर लड़ना है और हर दिन मरना है ,ताकि हमारी भावी पीढियां आराम से ,सम्मान और स्वाभिमान से जी सके .
– भंवर मेघवंशी
(लेखक राजस्थान में दलित ,आदिवासी और घुमन्तु समुदाय के प्रश्नों पर संघर्षरत है )

 

http://twocircles.net/2015may23/1432402038.html#.VWFZSvmqqko

http://teesrijungnews.com/blog/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%B0-%E0%A4%A6%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%B9/

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“हद्द है क्या ये अत्याचार, ये बलात्कार,ये दमन, ये घृणा, ये गरीबी, ये लाचारी, ये कमजोरी इस सब से आपको मुक्त होने का  आज़ाद होने का मन नहीं करता| आपका कोई भी देवता और ईश्वर कभी भी आपको आज़ादी नहीं दिला सकता, विश्वास नहीं होता तो खुद से पूछों की पिछले दो हज़ार सालों से तुम्हारे पूर्वज अमानवीय गुलामी में जिए और मर गए वो सब भी ईश्वरवादी थे पर कभी भी कोई ईश्वर उनकी मदत करने क्यों नहीं आया? जिस इस्वर के चरणों में  आप आज गिड़गिड़ा रहे हो ये उस वक़्त कहाँ था| आज जब आंबेडकर मिशन से तुम्हारी दशा सुधरी है तब इस ईश्वर ने तुमको क्यों अपनाया?अगर आपको आज़ादी चाहिए तो उसका बस एक ही तरीका है, अपने शोषक से अपनी आज़ादी छीन लो| छीनने के लिए बस एक ही नियम एक ही रास्ता एक ही ताकत है और वो है कड़ी मेहनत| आपकी व्यक्तिगत मेहनत , सामाजिक संगठन और भविष्य नीति जब आपके विरोधी से भी ज्यादा जबरदस्त होगी तब आपको कोई नहीं रोक सकता|तो हे दलितों उठो आसूं पोछो और बन जाओ चंड अशोक और “अपनी शक्ति संगठन और नीति” से “छीन” लो अपनी आज़ादी, ये आज़ादी की जंग है जंग में सब जायज़ है उठो और भिड़ जाओ बाद में देखेंगे की क्या जायज था क्या नाजायज|सारे इतिहास में इससे सुनहरा अवसर कभी नहीं मिला तुमको,कब तक दलित रहोगे? क्या शाशक बनने का मन नहीं होता, तुम उठो  छोड़ दो निकम्मों को क्योंकि जो नहीं उठेगा वही दलित रह जायेगा, जो उठ गया वो  दलित नहीं वो है भारत का  शाशक और शाशक से लोग डरते हैं उसपर अत्याचार नहीं करते”…समयबुद्धा

फेसबुक पर बलात्कार कर के मार दी गई दलित लड़कियों की फ़ोटो डालकर लोग मीडिया और सरकार की शिकायत करते रहते हैं | बौद्ध धम्म  के नाम पर जो लोग अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा  देते फिरते हैं मैं उनसे पूछता हूँ कि अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा द्वारा क्या ये दलित लड़कीया और इनकी कौम अपनी इस दुर्दशा से कैसे बच सकते हैं | अगर नहीं तो फिर अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा का इसको और इसकी कौम को क्या फायदा| ध्यान रहे हर बात का समय होता है जब आप शक्तिशाली हो तब आपको अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा काम आएगी पर जब विपत्ति का समय हो तब केवल क्षमता बढ़ाना और अपने दुश्मनों के खिलाफ संगर्ष करने से कल्याण होगा| ये संगर्ष कुछ भी हो सकता है राजनीति ,धार्मिक, नीति, विज्ञानं या युद्ध भी| ध्यान रहे अगर शांति से जीना चाहते हो तो अपनी क्षमता बढ़ाओ और युद्ध के लिए तैयार रहो| ध्यान रहे अगर आप अपनी कौम के लिए क़ुरबानी नहीं दोगे तो ऐसे ही क़ुरबानी ले ली जायेगी अब ये आपके हाथों में है की आप खुद फूलन देवी की तरह क़ुरबानी देते हो या दुश्मन को अपने क़ुरबानी लेने देते हो|मैं हमेशा बौद्ध धम्म को बढ़ाने को प्रयासरत रहता हूँ पर मैंने समय के हिसाब से बुद्धा की शिक्षाओं को मानने की देशना की है| समय की नब्ज पहचानो हर नियम हर बात हर समय  एक सी लागू  नहीं होती, आज का समय अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा की शिक्षा से भी ज्यादा अपनी और अपनी कौम की क्षमता बढ़ाने का है   …समयबुद्धा

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989…सभी जरूर पढ़े और जाने …Team SBMT

ambedkar jayanti4सभी जरूर पढ़े और जाने :
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अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989

परिचय;-
यह कानून एस.सी., एस.टी. वर्ग के सम्मान, स्वाभिमान, उत्थान एवं उनके हितों की रक्षा के लिए भारतीय संविधान में किये गये विभिन्न प्रावधानों के अलावा इन जातीयों के लोगों पर होने वालें अत्याचार को रोकनें के लिए 16 अगस्त 1989 को उपर्युक्त अधिनियम लागू किये गये। वास्तव में अछूत के रूप में दलित वर्ग का अस्तित्व समाज रचना की चरम विकृति का द्योतक हैं।

भारत सरकार ने दलितों पर होने वालें विभिन्न प्रकार के अत्याचारों को रोकनें के लिए भारतीय संविधान की अनुच्छेद 17 के आलोक में यह विधान पारित किया। इस अधिनियम में छुआछूत संबंधी अपराधों के विरूद्ध दण्ड में वृद्धि की गई हैं तथा दलितों पर अत्याचार के विरूद्ध कठोर दंड का प्रावधान किया गया हैं। इस अधिनिमय के अन्तर्गत आने वालें अपराध संज्ञेय गैरजमानती और असुलहनीय होते हैं। यह अधिनियम 30 जनवरी 1990 से भारत में लागू हो गया।

यह अधिनियम उस व्यक्ति पर लागू होता हैं जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैं और इस वर्ग केड सदस्यों पर अत्याचार का अपराध करता है़। अधिनियम की धारा 3 (1) के अनुसार जो कोई भी यदि वह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति का सदस्य नही हैं और इस वर्ग के सदस्यों पर निम्नलिखित अत्याचार का अपराध करता है तो कानून वह दण्डनीय अपराध माना जायेगा-

1. अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को जबरन अखाद्य या घृणाजनक (मल मूत्र इत्यादि) पदार्थ खिलाना या पिलाना।
2. टनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को शारीरिक चोट पहुंचाना या उनके घर के आस-पास या परिवार में उन्हें अपमानित करने या क्षुब्ध करने की नीयत से कूड़ा-करकट, मल या मृत पशु का शव फेंक देना।
3. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के शरीर से बलपूर्वक कपड़ा उतारना या उसे नंगा करके या उसके चेहरें पर पेंट पोत कर सार्वजनिक रूप में घुमाना या इसी प्रकार का कोई ऐसा कार्य करना जो मानव के सम्मान के विरूद्ध हो।
4. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के आबंटित भूमि पर से गैर कानूनी-ढंग से खेती काट लेना, खेती जोत लेना या उस भूमि पर कब्जा कर लेना।
5. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को गैर कानूनी-ढंग से उनकें भूमि से बेदखल कर देना (कब्जा कर लेना) या उनके अधिकार क्षेत्र की सम्पत्ति के उपभोग में हस्तक्षेप करना।
6. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के सदस्य को भीख मांगनें के लिए मजबूर करना या उन्हें बुंधुआ मजदूर के रूप में रहने को विवश करना या फुसलाना।
7. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के सदस्य को वोट (मतदान) नहीं देने देना या किसी खास उम्मीदवार को मतदान के लियें मजबूर करना।
8. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के विरूद्ध झूठा, परेशान करने की नीयत से इसे पूर्ण अपराधिक या अन्य कानूनी आरोप लगा कर फंसाना या कारवाई करना।
9. किसी लोक सेवक (सरकारी कर्मचारी/ अधिकारी) को कोई झूठा या तुच्छ सूचना अथवा जानकारी देना और उसके विरूद्ध अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को क्षति पहुंचाने या क्षुब्ध करने के लियें ऐसें लोक सेवक उसकी विधि पूर्ण शक्ति का प्रयोग करना।
10. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को जानबूझकर जनता की नजर में जलील कर अपमानित करना, डराना।
11. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी महिला सदस्य को अनादार करना या उन्हें अपमानित करने की नीयत से शील भंग करने के लिए बल का प्रयोग करना।
12. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी महिला का उसके इच्छा के विरूद्ध या बलपूर्वक यौन शोषण करना।
13. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के सदस्यों द्वारा उपयोग में लायें जाने वालें जलाशय या जल स्त्रोतों का गंदा कर देना अथवा अनुपयोगी बना देना।
14. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को किसी सार्वजनिक स्थानों पर जाने से रोकना, रूढ़ीजन्य अधिकारों से वंचित करना या ऐसे स्थान पर जानें से रोकना जहां वह जा सकता हैं।
15. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को अपना मकान अथवा निवास स्थान छोड़नें पर मजबूर करना या करवाना।

दण्ड:-
ऊपर वर्णित अत्याचार के अपराधों के लियें दोषी व्यक्ति को छः माह से पाँच साल तक की सजा, अर्थदण्ड (फाइन) के साथ प्रावधान हैं। क्रूरतापूर्ण हत्या के अपराध के लिए मृत्युदण्ड की सजा हैं। अधिनियम की धारा 3 (2) के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैं और-
यदि वह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के खिलाफ झूठा गवाही देता है या गढ़ता हैं जिसका आशय किसी ऐसे अपराध में फँसाना हैं जिसकी सजा मृत्युदंड या आजीवन कारावास जुर्मानें सहित है। और इस झूठें गढ़ें हुयें गवाही के कारण अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के सदस्य को फाँसी की सजा दी जाती हैं तो ऐसी झूठी गवाही देने वालें मृत्युदंड के भागी होंगें।
यदि वह मिथ्या साक्ष्य के आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को किसी ऐसे अपराध के लियें दोष सिद्ध कराता हैं जिसमें सजा सात वर्ष या उससें अधिक है तो वह जुर्माना सहित सात वर्ष की सजा से दण्डनीय होगा।

आग अथवा किसी विस्फोटक पदार्थ द्वारा किसी ऐसे मकान को नष्ट करता हैं जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य द्वारा साधारणतः पूजा के स्थान के रूप में या मानव आवास के स्थान के रूप में या सम्पत्ति की अभिरक्षा के लिए किसी स्थान के रूप में उपयोग किया जाता हैं, वह आजीवन कारावास के साथ जुर्मानें से दण्डनीय होगा।

लोक सेवक होत हुयें इस धारा के अधीन कोई अपराध करेगा, वह एक वर्ष से लेकर इस अपराध के लिए उपबन्धित दण्ड से दण्डनीय होगा।ज अधिनियम की धारा 4 (कर्तव्यों की उपेक्षा के दंड) के अनुसार कोई भी सरकारी कर्मचारी/अधिकारी जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति का सदस्य नही हैं, अगर वह जानबूझ कर इस अधिनियम के पालन करनें में लापरवाही करता हैं तो वह दण्ड का भागी होता। उसे छः माह से एक साल तक की सजा दी जा सकती हैं।

अन्य प्रावधान;-
धारा-14 (विशेष न्यायालय की व्यवस्था) के अन्तर्गत इस अधिनियम के तहत चल रहे मामले को तेजी से ट्रायल (विचारण) के लियें विशेष न्यायालय की स्थापना का प्रावधान किया गया है। इससे फैसलें में विलम्ब नहीं होता हैं और पीड़ित को जल्द ही न्याय मिल जाता हैं। धारा-15 के अनुसार इस अधिनियम के अधीन विशेष न्यायालय में चल रहें मामलें को तेजी से संचालन के लिये एक अनुभवी लोकज अभियोजक (सरकारी वकील) नियुक्त करने का प्रावधान हैं। धारा-17 के तहत इस अधिनियम के अधीन मामलें से संबंधित जाँच पड़ताल डी.एस.पी. स्तर का ही कोई अधिकारी करेगा। कार्यवाही करने के लियें पर्याप्त आधार होने पर वह उस क्षेत्र को अत्याचार ग्रस्त घोषित कर सकेगा तथा शांति और सदाचार बनायें रखने के लिए सभी आवश्यक उपाय करेगा तथा निवारक कार्यवाही कर सकेगा। धारा-18 के तहत इस अधिनियम के तहत अपराध करने वालें अभियुक्तों को जमानत नहीं होगी।

धारा-21 (1) में कहा गया हैं कि इस अधिनियम के प्रभावी ढंग ये कार्यान्वयन के लिये राज्य सरकार आवश्यक उपाय करेगी। (2) (क) के अनुसार पीड़ित व्यक्ति के लियें पर्याप्त के लियें सुविधा एवं कानूनी सहायता की व्यवस्था की गई हैं। (ख) इस अधिनियम के अधीन अपराध के जाँच पड़ताल और ट्रायल (विचारण) के दौरान गवाहों एवं पीड़ित व्यक्ति के यात्रा भत्ता और भरण-पोषण के व्यय की व्यवस्था की गई हैं। (ग) के अन्तर्गत सरकार पीड़ित व्यक्ति के लियें आर्थिक सहायता एवं सामाजिक पुनर्वास की व्यवस्था करेगी। (घ) के अनुसार ऐसे क्षेत्र का पहचान करना तथा उसके लियें समुचित उपाय करना जहाँ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर अत्यधिक अत्याचार होते हैं। अधिनियम की धारा 21 (3) के अनुसार केन्द्र सरकार राज्य सरकार द्वारा अधिनियम से संबंधित उठायें गयें कदमों एवं कियें गयें उपायों में समन्यव के लियें आवश्यकतानुसार सहायता करेगी। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1995 यह नियम अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 का ही विस्तार हैं। अधिनियम के अधीन दर्ज मामलें को और अधिक प्रभावी बनानें तथा पीड़ित व्यक्ति को त्वरित न्याय एवं मुआवजा दिलाने के लियें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण नियम 1995 पारित किया गया हैं।

धारा 5 (1) (थाना में थाना प्रभारी को सूचना संबंधी)- इसके अनुसार अधिनियम के तहत किये गयें अपराध के लियें प्रत्येंक सूचना थाना प्रभारी को दियें जानें का प्रावधान हैं। यदि सूचना मौखिक रूप से दी जाती हैं तो थाना प्रभारी उसे लिखित में दर्ज करेंगें। लिखित बयान को पढ़कर सुनायेंगें तथा उस पर पीड़ित व्यक्ति का हस्ताक्षर भी लेंगें। थाना प्रभारी मामलें को थाना के रिकार्ड में पंजीकृत कर लेगें। (2) उपनियम (1) के तहत दर्ज एफ.आई। आर. की एक काॅपी पीड़ित को निःशुल्क दिया जायेगा। (3) अगर थाना प्रभारी एफ.आई। आर. लेने से इन्कार करतें हैं तो पीड़ित व्यक्ति इसे रजिस्ट्री द्वारा एस. पी. को भेज सकेगा। एस.पी. स्वंय अथवा डी. एस.पी. द्वारा मामलें की जाँच पड़ताल करा कर थाना प्रभारी को एफ.आई। आर.दर्ज करने का आदेश देंगें।

धारा-6 के अनुसार डी.एस.पी. स्तर का पुलिस अधिकारी अत्याचार के अपराध की घटना की सूचना मिलतें ही घटना स्थल का निरीक्षण करेगा तथा अत्याचार की गंभीरता और सम्पत्ति की क्षति से संबंधित रिर्पोट राज्य सरकार को सौंपेगा। धारा-7 (1)-के तहत इस अधिनियम के तहत कियें गयें अपराध की जाँच डी.एस.पी. स्तर का पुलिस अधिकारी करेगा। जाँच हेतु डी.एस.पी. की नियुक्ति राज्य सरकार/डी.जी.पी. अथवा एस.पी. करेगा। नियुक्ति के समय पुलिस अधिकारी का अनुभव, योग्यता तथा न्याय के प्रति संवेदनशीलता का ध्यान रखा जायेगा। जाँच अधिकारी (डी.एस.पी.) शीर्ष प्राथमिकता के आधार पर घटना की जाँच कर तीस दिन के भीतर जाँच रिर्पोट एस.पी.को सौपेगा। इस रिर्पोट को एस.पी.तत्काल राज्य के डी.जी.पी. को अग्रसारित करेगें। धारा-11 (1) में यह प्रावधान किया गया हैं कि मामलें की जाँच पड़ताल, ट्रायल (विचारण) एवं सुनवाई के समय पीड़ित व्यक्ति उसके गवाहों तथा परिवार के सदस्यों को जाँच स्थल अथवा न्यायालय जाने आने का खर्च दिया जायेगा। (2) जिला मजिस्ट्रेट/ एस.डी.एम. या कार्यपालक दंडाधिकारी अत्याचार से पीड़ित व्यक्ति और उसके गवाहों के लियें न्यायालय जानें अथवा जाँच अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत होने के लियें यातायात की व्यवस्था करेगा अथवा इसका लागत खर्च भुगतान करने की व्यवस्था करेगा। धारा 12 (1) में कहा गया हैं कि जिला मजिस्ट्रेंट और एस.पी. अत्याचार के घटना स्थल की दौरा करेंगें तथा अत्याचार की घटना का पूर्ण ब्यौरा भी तैयार करेंगें। (3) एस.पी. घटना के मुआवजा करनें के बाद पीड़ित व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करने की व्यवस्था करेंगें तथा आवश्यकतानुसार उस क्षेत्र में पुलिस बल की नियुक्ति करेंगें। (4) के अनुसार डी.एम./एस.डी.एम. पीड़ित व्यक्ति तथा उसके परिवार के लियें तत्काल राहत राशि उपलब्ध करायेंगें साथ ही उचित मानवोचित सुविधा प्रदान करायेगें।

ज्यादा से ज्यादा शेर करे। धन्यवाद।

ब्राह्मणवाद रुपी वायरस की चपेट में आने के लक्षण….जय शंकर सहाय

naga babaब्राह्मणवाद रुपी वायरस की चपेट में आने के लक्षण
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जिसके अंदर ब्राह्मणवादी वायरस आ जाता है उसे सब ठीक-ठीक ही नजर आता है । क्योंकि इस वायरस के आने के बाद “ना” कहने की क्षमता अत्यंत क्षीण हो जाती है ।
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इसका एंटीडोज केवल अम्बेडकर वाद है । उसका भी पूरा टीकाकरण जरूरी है।

क्या आपने लिया ब्राह्मणवाद का एंटीडोज ????
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अभी लेना शुरू करें !!!

असर आने में समय लगता है वरना ये वायरस आपके बच्चों को भी लग सकता है । 😢😢😢

यह वायरस दुनिया का सबसे खतरनाक वायरस है ।यह एड्स व् स्वाइन फ्लू से ज्यादा खतरनाक  है। 😰😰😰

इस वायरस से ग्रस्त व्यक्ति में निम्नलिखित लक्षण नजर आते हैं–

1. इस देश का मूलनिवासी होने की बजाय जाति विशेष का होने पर ज्यादा गर्व करना !!

2. कर्म से ज्यादा भाग्य अथवा किस्मत में ज्यादा यकीन करना !!

3 .कुछ भी गलत होने पर कारण जानने की बजाय भगवान की मर्जी मान लेना !!

4. अपने अधूरे कार्य करवाने के लिए विष्णु, भोले, माता, हनुमान ,साईं आदि व पाखण्डी बाबाओ की शरण में रहना 😓😓😓😓

5. बाबा साहेब की शिक्षाओं में इनकी रूचि अत्यधिक कम होती है तथा बाबा साहेब की बातों से किनारा करते है !!

6. अपनी सफलता का श्रेय सदैव भगवान को देना !!

7. पवित्र व अपवित्र की धारणा में यकीन करना !!

8. मंगल, गुरुवार को बाल ना कटवाना !!

9. शनिवार का विचार करना !!

10. किसी भी काम के करने से पहले पण्डित से महूर्त निकलवाना !!

11. शुभ ,अशुभ में विश्वास करना !!

12. व्रत पूजा पाठ में विश्वास करना !!

13. पूजा करते वक्त मूर्ति के सामने मन्नत मांगना !!

14. हमेशा अपनी ही बात को सही मानना व दूसरों  को मौका न देना। मतलब अलोकतांत्रिक होना !!

15. किसी ऐसी बात पर विश्वास करते रहना जिसके बारे में कभी भी पता न किया  हो !!

16. कभी समाज की समस्याओं के बारे में चिंतित न होना !!

17. रात के सपनों का अर्थ अपने अनुसार अच्छा या बुरा लगाना !!

18.औरतों को बुद्धि में सदैव कम ही आंकना ।

पहचान करके निवारण करना शुरू करे !!!

ब्राहमणवाद नामक गंभीर बीमारी से शीघ्र मुक्ति की शुभकामनाओं सहित

जय शंकर सहाय

बौद्ध धम्म साहित्य में विरोधियों ने जबरदस्त मिलावट की है, उदाहरण के लिए गौतम बुद्ध ने ‘घर त्याग की घटना’,इसका कारन वह कहानी नहीं है जिसमे बुद्ध वृद्ध मनुष्य , रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर विचलित हो चले थे|बल्कि युद्द को टालने की कोशिश ही कारण था |…डॉ प्रभात टंडन

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माना जाता है कि बुद्ध के गृह त्याग के पीछे वह कहानी है जिसमे बुद्ध वृद्ध मनुष्य , रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर विचलित हो चले थे और उसी के फ़लस्वरुप उन्होने गृह त्याग किया ।, यह कितना तर्क संगत लगता है जब कि उनके पिता , माँ और उनके राज्य के मंत्री गण स्वयं वृद्ध हो चले थे , क्या वह कभी बीमार नही पडे , यह कहानी तर्क संगत नही लगती । हाँलाकि इसको ही प्रचलित कहानियों मे माना गया है । डा. भदन्त आनन्द कौसात्यायन के अनुसार त्रिपिटक के किसी भी ग्रन्थ में गृहत्याग के इस कथानक का कहीं उल्लेख नहीं है। फ़िर यह उल्लेख बार –२ क्युं पाया जाता रहा है । डा. कौसात्यायन का मत है कि वृद्ध, रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर गृहत्याग की मान्यता ‘‘वे अट्टकथाएँ हैं, जिन्हें बुद्धघोष तथा अन्य आचार्यों ने भगवान बुद्ध के एक हजार वर्ष बाद परम्परागत सिंहल अट्टकथाओं का आश्रय ग्रहण कर पाली भाषा में लिखा।”
अत्त्द्ण्डा भवं जातं , जनं पस्सच मेषकं।

संवेनं कित्त्यिस्सामि यथा संविजितं मया ॥ १ ॥

फ़न्दमानं पजं दिस्वा मच्छे अप्पोदके यथा ।

अज्जमज्जेहि व्यारुद्धे दिस्वा मं भयमाविसि ॥२॥

समन्तसरो लोको, दिसा सब्बा समेरिता ।

इच्छं भवन्मत्तनो नाद्द्सासिं अनोसितं ।

ओसाने त्वेव व्यारुद्धे दिस्वा अरति अहु ॥३॥

अर्थ :‘‘शस्त्र धारण भयावह लगा। मुझमें वैराग्य उत्पन्न हुआ, यह मैं बताता हूँ। अपर्याप्त पानी मैं जैसे मछलियां छटपटाती हैं, वैसे एक-दूसरे से विरोध करके छटपटाने वाली प्रजा को देखकर मेरे मन में भय उत्पन्न हुआ। चारों ओर का जगत असार दिखायी देने लगा, सब दिशाएं काँप रही हैं, ऐसा लगा और उसमें आश्रय का स्थान खोजने पर निर्भय स्थान नहीं मिला, क्योंकि अन्त तक सारी जनता को परस्पर विरुद्ध हुए देखकर मेरा जी ऊब गया।’’
सम्भवत: शाक्यों और कोलियों में रोहिणी नदी के पानी को लेकर झगड़े ही बुद्ध के गृह त्याग का सच था ।
संघ ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध का प्रस्ताव पारित किया, जिसका सिद्धार्थ गौतम ने विरोध किया। शाक्य संघ के नियम के अनुसार बहुमत के विरुद्ध जाने पर दण्ड का प्राविधान था। संघ ने तीन विकल्प रखे- (1) सिद्धार्थ सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लें, (2) फांसी पर लटक कर मरने या देश छोड़कर जाने का दण्ड स्वीकार करें या (3) अपने परिवार के लोगों का सामाजिक बहिष्कार और उनके खेतों की जब्ती के लिये राजी हों। संघ का बहुमत सिद्धार्थ के विरुद्ध था। सिद्धार्थ के लिये सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लेने की बात को स्वीकार करना असम्भव था। अपने परिवार के सामाजिक बहिष्कार पर भी वह विचार नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने दूसरे विकल्प को स्वीकार किया और वे स्वेच्छा से देश त्याग कर जाने के लिये तैयार हो गये।