4-May-2015 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: ब्राह्मणवाद की बुराई करने से पहले उनके और अपने संगर्ष की तुलना आवश्यक है, यदि आप ठीक से तुलना कर पाये तो आप समझ जाओगे की ब्राह्मणवाद की बुराई से कुछ न होगा जो भी होगा वो उनसे ज्यादा तेज संगर्ष करने से ही होगा|…..समयबुद्धा


कोई भक्ति, कोई देवी देवता,कोई ईश्वर, कोई धर्म, कोई गुरु या पंडित आपको आपके दुखों से निजात नहीं दिल सकता क्योंकि आपका दुःख पारलौकिक नहीं मानव निर्मित है, इसका समाधान भी मानव संगर्ष से होगा| आप नज़रअंदाज़ करना छोड़ो, ध्यान दो, जानो मनो और जी जान से संगर्ष में जुट जाओ, संगर्ष ही जीवन है|

dalit tyago dalit prerna sthalजस्टिस काटजू जी ने कहा है की भारत को नब्बे प्रतिशत जनता मूर्ख है,कितना सही कहा है|आप खुद देखो अपने चारों और दस प्रतिशत से भी कम के पास इस देश के नब्बे प्रतिशत ससंसाधन है और ये नब्बे प्रतिशत जनता जिसे बहुजन कहते हैं वो दस प्रतिशत से भी काम संसाधनों में गुज़ारा करने को मजबूर हैं| इन बहुजनों की हर समस्या का कारन और समाधान उपलब्ध है पर इन समाधानो और आम जनता के बीच के लिंक को ब्राह्मणवादियों ने घृणा की कैंची से काट दिया है| नहीं समझे? अरे भाई जनता का हित और सुख बहुजन विचारधारा में है जिसके जनक, गौतम बुद्ध, सम्राट अशोक महान, कबीर, रविदास और डॉ आंबेडकर हैं, पर आप इनको नहीं सुनोगे क्योंकि आपकी आँखों पर तो जातिगत घृणा का पर्दा पड़ा है| इसी को तो मूर्खता कहते हैं की खुद जानने की बजाये ब्राह्मणवादियों के दुष्प्रचार पर यकीन करते हैं|मानना न मानना तो बाद की बात है पहले जानो तो, अगर आप नहीं जानोगे तो गलती किसकी है| आपको चोट लगी है और डॉक्टर को आप जानते हो पर आप इलाज नहीं करवाओगे तो गलती किसकी है? उदाहरण के लिए अपने आस पास देखो धार्मिक कर्मकांडों में जिस प्रकार लोग अपना समय ऊर्जा और धन बर्बाद करके अपने शोषक धर्म का झंडा बुलंद कर रहे हैं, उसे देख कर ये कहना आसान है की ये जनता खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रही है ये अपने दुखो की खुद जिम्मेदार हैं|

बहुजन विचारधारा के जनक गौतम बुद्ध ने कहा है की अत्त दीपो भव अर्थात अपना सहारा खुद बनो किसी के भरोसे न रहो,अपनी बुद्धि की शरण में जाओ| मतलब साफ़ है की ,जितना समय धन और ऊर्जा आम जनता धार्मिक कर्मकांड में लगाती है अगर उतने समय में वो पढाई लिखे कर ज्ञान साधना करे अपनी बुद्धि विकसित करें तो उसका ज्यादा भला होगा|बचपन में हमारी गली में जो बच्चे शिक्षा पर ध्यान देते थे वो बहुत आगे निकल गए और जो जागरण,कावंड,भजन संध्या आदि में समय बर्बाद करते थे अब वो मजदूरी या अपराध में लगे हैं| काटजू जी ने सही कहा है की भारत को नब्बे प्रतिशत जनता मूर्ख है, अगर कोई भी ये बात इनको समझने जाएगा तो ये लोग उसे ही अपना विरोधी समझ कर मार डालेंगे और फिर उसी को पूजने का ढोंग करने लगेंगे|केवल भेड़ों को ही चरवाहा चाहिए, खुद से सवाल करो क्या आप भेड़ हो? अगर इस बात को नहीं समझ सकते तो वाकई आप भेड़ हो और आपको चरवाहा चाहिए | (यहाँ भेड़ है आम जनता और चरवाह है ईश्वर या कोई तथाकथित मुक्तिदाता या रक्षक राजा)|वाकई मूर्खों को समझाना आत्महत्या करना है, और ये बात ब्राह्मणवादी भी जानते हैं इसलिए उन्होंने जनता को उसके हाल पर छोड़ दिया है, जो गिरना चाहता है उसे एक धक्का और दे देते हैं, शायद सही करते हैं

बहुजन लोग संवेधानिक सरक्षण के बावजूद दलित कैसे रह जाते हैं? इसका जवाब है की ये लोग अपना इतिहास ही नहीं जानते न ही अपने दुसमन को पहचानते हैं और सबसे बड़ी बात जानना ही नहीं चाहते, कोई अगर बताने की कोशिश करे तो कमाल देखिये ये उसे अपना और अपने धर्म हिंदुत्व का दुश्मन समझते हैं| दलित बौद्ध धम्म में नहीं अगर दलित कहीं हैं तो वो हिन्दू धर्म में हैं,ये लोग अपनी दुर्दशा के लिए खुद ही जिम्मेदार हैं| अम्बेडकरवादी संविधान द्वारा दिए गए गुलामी से छुटकारा, पढ़ने और कमाने की आजादी आदि हकों से जो सक्षमता प्राप्त होती हैं उससे ये लोग अम्बेडकरवाद को बढ़ाने की बजाये, अपने प्रिये हिंदुत्व के दलितपन को दान देकर बढ़ाते हैं| यही लोग अपना धन समय और ऊर्जा खर्च कर के हिन्दू धर्म की मन्दिरबाज़ी,यात्रायें और कर्मकांड करते हैं और फिर जब लात पड़ती तो चिल्लाते हैं की की हम दलित हैं इसलिए हमपर अन्याय हो रहा है| ‘

पता नहीं ये लोग खुद से ये क्यों नहीं पूछते की दो हज़ार साल तक जब ये गुलाम थे मैले कुचले थे, भोजन और पानी के बिना भूखे प्यासे अपमानित मौत मर जाते थे , बेहद गरीब थे तब ये ईश्वर कहाँ था | आज जब संवेधानिक सरक्षण से पेट में रोटी, तन पे कपडा और इज़्ज़त मिली है और जेब में पैसा आ गया है तब ही क्यों इसी ईश्वर ने इनको अपना लिए, पहले क्यों नहीं अपनाया| ये क्यों नहीं सोचते की आज भी जहाँ तहाँ दलित उत्पीड़न की जब घटनाएँ सुनने में आतीं हैं तब वहां कोई ईश्वर क्यों नहीं पहुचता उनको बचने को| एक कमाल की बात और बताता हूँ बहुजन गुरुओं ने बारवी तेरवी सदी से समझाना शुरू किया की मन्दिरबाज़ी और पत्थर पूजा और दान नुकसानदायक है, तो अब संविधान लागू होने के बाद कुछ लोगों को समझ में आ गयी है तो उन्होंने मन्दिरबाजी कम कर दी| कम होती मन्दिरबाज़ी को देख विरोधियों ने बहुजन धम्म चर्चा का प्लेटफार्म “सत्संग” को अपना लिया और दुरूपयोग शुरू कर दिया| बात फिर वहीँ आ गई मंदिर नहीं जाते तो क्या सत्संग तो जाते हैं , वहां पर भी तो वही सब मिलता है बस पैकिंग बदल गयी| क्या आपको इनकी मूर्खता पर हसी नहीं आती, अम्बेडकरवादी संगर्ष के चलते इन हिन्दू दलितों के पास सुविधातें आयीं और आज ये लोग बढ़िया धुले प्रेस करे कपडे पहनकर बाबूजी बनकर अपनी मोटरसाइकिल और कार में अपने पैसों का पेट्रोल जलाकर विरोधी झंडे की भीड़ बनाने जाते हैं| क्या ये लोग अपने और अपनी कौम के लिए खतरा नहीं? ऐसे गुलाम जो अपनी गुलामी के बेड़ियों को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करते हों इनको कोई मुक्त करा सकता है क्या ?

अब तक आप ये तो समझ चुके होगे की जिस भी समाज को मुक्ति चाहिए उसके पास एक विचारधारा, एक झंडा, एक धर्म संगठन के मानक आदि होना चाहिए| केवल हिन्दू जातिगत झंडे से मुक्ति संभव नहीं, ये तो बस बड़े पिंजरे के अंदर एक और पिंजरे ही है| हमारे पास अपना बौद्ध धम्म और अम्बेडकरवाद है, ये एक ऐसी जबरदस्त विचारधारा है की विरोधी डर के मारे इसका प्रचार प्रसार नहीं होने देते| इधर हमारे लोग समझते ही नहीं कितना भी कोशिश कर लो, कितने ही महापुरुष आये और चले गए पर बहुजन वहीँ के वहीँ, इनकी दशा में कोई सुधार नहीं| सारा खेल समझ का ही तो है, एक तरफ विरोधी एक नीति बनाते हैं और सारे विरोधी उसे तुरंत समझ कर अपना लेते है दूसरी तरफ हमारे लोग कोई नीति बनाओ भी तो उसे समझने में ही इतनी देर लगा देते हैं जितनी देर में विरोधी उसकी काट खोज लेता है आधे तो इसके बाद भी नहीं समझ पाते| सारा खेल समझ का ही है| अगर हमारे लोग समझ सकते तो कितना अच्छा होता, अब तक तो मुक्ति ही हो गयी होती| हमारे महापुरुषों और हमारी जनता में जो दूरी है वो “समझ” की ही तो है| समझने के लिए सबसे पहले अपनी नज़रअंदाज़ या बिना जाने ख़ारिज करने की आदत बदलनी होगी| जानने की शुरुआत तो करनी ही होगी|जिस क्षण आप नज़रअंदाज़ करते हो आपका बुरा समय उसी समय शुरू होता है, इसलिए नज़रअंदाज़ मत करो जानो , समझो और फिर फैसला करना की मन्ना है की नहीं, बिना जाने नज़रअंदाज़ न करो| ये मेरा दवा है की जब आप जान जाओगे तो सोचोगे हम भी कितने मूर्ख थे जो बुद्ध और आंबेडकर नामक दवाई को जानते हुए भी दर्द दर्द चिल्लाते रहे कभी इस्तेमाल करके नहीं देखी | ये दवा दोनों स्तरों पर काम करती है व्यक्तिगत स्तर पर तो आप शशक्त हो ही जाते हो पर अगर सामाजिक स्तर पर इस लागू कर पाये तो मुक्त ही हो जाओगे|…
हमारी समस्या अब ये नहीं रह गई है की हमारे लोग संगर्ष नहीं कर रहे हैं बल्कि उससे बड़ी समस्या ये है की उस संगर्ष के बल पर जो बहुजन कुछ सक्षम हो जाते हैं वो अम्बेडकरवाद को छोड़कर कट्टर हिन्दू बनने का दिखावा करते हैं और अपने ही लोगों से दूरी बनाये रखते हैं| वे ऐसा इसलिए करते है जिससे उनको सवर्ण समाज अपनाये रहे धक्का न दे,मैं समझ सकता हूँ|मैं ऐसे लोगों से कहना चाहूँगा की परोक्ष नहीं तो कम से कम अपरोक्ष रूप से ही समाज की मदत करो|मैं समझ सकता हूँ की सक्षम और कामयाब बहुजन किसी नेता की रैली में भीड़ बढ़ाने तो नहीं जाएगा| सबका अपना अपना दाइत्व होता है,

-कोई विचार दे सकता है,
-कोई धन दे सकता है,
-कोई सामने आकर नेता बन सकता है,
-कोई बौद्ध धम्म का प्रचार कर सकता है
-जो कार्टून बना सकते हैं वो कार्टून बनायें
-जो कहानियां बना सकते हैं वो बौद्ध विचारधारा को दर्शाती कहानी बनायें जैसे ओह माय गॉड, लूसी(२०१४) और पिके फिल्मे
-जो गाना लिख सकते हैं वो लिखें जो गा बजा सकते हैं वो संगीतमय प्रचार प्रसार करें

कृपया ध्यान दें, आप के पास मीडिया,किताबों,जनचर्चां,मोबाइल आदि से जो भी राजनीति एव धार्मिक विचारधारा आती है उसमे से कहीं एक छोटा सा हिस्सा आपका अपनी कौमी विचारधारा होती है, जिसे हम बहुजन,मूलनिवासी,अम्बेडकरवादी, बुद्ध,कबीर,रविदासिया,कम्युनिस्ट विचारधारा आदि अनेकों नाम से जानते हैं| आप ये तो मानते हो होंगे की आप वही मानेंगे जिसे जानेंगे,पर अगर ऐसी बातें जो आपके हक़ में हों उनका स्वर बड़ा ही धीमा हो तो क्या आप अपने हकों को कुर्बान कर देंगे? दूसरी तरफ ब्राह्मणवाद,पूँजीवाद जैसी विरोधी बातें बड़े ही मनोरंजक, रंगीन, डिजिटल, सराउंड साउंड, उत्क्रिस्ट अभिव्यक्ति, धन और शक्ति की चकाचौंध आदि से दिन रात आपके सामने परोसी जातीं हों, क्या आप इनसे प्रभावित होकर अपने राजनैतिक और धार्मिक फैसले लोगे| राजनीती और धर्म ही वो जगह हैं जहाँ से असल में आपके भाग्य, वर्तमान और भविष्य का फैसला हो जाता है| इस चर्चा से मैं आपको ये बताने की कोशिश कर रहा हूँ की राजनैतिक दमन के चलते भले ही बहुजन अपनी बात को चमकार टीवी अखबार रेडियो आदि पर प्रस्तुत नहीं कर पा रहे पर अगर उनकी बात आप तक कहीं कैसे ही पहुचती है जैसे सोशल मीडिया मोबाइल आदि से, तो उसपर धयान दो| ध्यान दो साथियों वार्ना बहुत बुरे दिन आने वाले हैं, आप ब्राह्मणवाद की चकाचौंध में अंधे हुए जा रहे हो और उधर आपके पैरों तले जमीन खिसक रही है, गुलामी अब ज्यादा दूर नहीं है| अब जब मीडिया से ही राजा तय होने लगे हैं तो क्या आप नहीं समझ सकते की राजा उसी का बनेगा जिसके पर मीडिया का कंट्रोल हो? क्या आप इतना नहीं समझ पा रहे की मीडिया का कंट्रोल किनके हाथों में है? क्या आप इतना नहीं समझ पा रहे की आपकी अपनी राजनीती जहाँ से आपका भाग्य तय होता है, इस मीडिया-वॉर में पिछड़ रही है? समयबुद्धा ध्यान सूत्र कहता है की “दुःख की शुरुआत उसी क्षण से होती है जब आप नज़रअंदाज़ करना शुरू करते हो और सुख की शुरुआत उसी क्षण से होती है जब आप ध्यान देना शुरू करते हो |” मैं फिर कहूँगा अगर बहुजन विचारधारा आप तक कहीं कैसे ही पहुचती है, तो उसपर धयान दो, बड़ी मुश्किल से आप तक पहुंच पा रही है, ध्यान दो, ध्यान दो, वरना जिस तरह आपकी बात और अस्तित्व मीडिया में गायब है आप का अस्तित्व और आज़ादी भी गायब हो जायेंगे| ध्यान दो

आप खुद अपनी क्षमता पहचानो की इस बहुजन/बौद्ध/अम्बेडकरवादी संगर्ष और क्रांति में आप जो योगदान कर सकते हो जरूर करो| कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम हर साल कुछ हज़ार खर्च कर के अम्बेडकरवादी साहित्य दूर दराज गाँव में तो बाँट सकते हो,आज हमारा संगर्ष जहाँ है वहां विचारों का प्रचार प्रसार सबसे जरूरी काम है|आपका छोटा छोटा योगदान भी बहुजनों के अपने झोपड़े बौद्ध धम्म को फिर से महल बनाने की और ले जायेगा|

जब से बहुजनों ने ब्राह्मणवाद को जाना है तबसे ज्यादातर अपनी दुर्दशा के लिए ब्राह्मणवाद को दोषी ठहराकर संगर्ष करना छोड़ देते हैं| यकीनन दोषी है, पर संविधान लागू होने के बाद तो आपको संगर्ष करना चाहिए था, अब तक संगठित हो जाना चाहिए था,पर आप खुद देखो हम में कितना संगठन है| हमारे लोग हर उस बहुजन के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं जो समाज, राजनीती और बौद्ध धर्म द्वारा धन और सक्षमता अर्जित करे|अरे जब समाज में लोगों के पास धन होगा तभी तो रस्ते खुलेंगे| दूसरों को दोष देने से पहले क्या आपने खुद से ये सवाल किया की क्या आप संगठित होकर संगर्ष कर पा रहे हैं| ब्राह्मणवाद्यों को दोष देना आसान है पर क्या आपने सोचा की वो कैसे आपका शोषण कर पाते हैं, ऐसा क्या हैं उनके पास जो आपके पास नहीं और वो खास आप क्यों नहीं अर्जित कर लेते| जानते हैं वो खास क्या है शिक्षा और राजनैतिक दखल और धार्मिक संगठन और सतत संगर्ष| हमारे लोग जैसे ही पेट में रोटी गयी संगर्ष भूल कर आयशी शुरू परिणाम वहीँ लौट आते हैं| तभी तो ब्राह्मणवादी ये कहावत कहते हैं की “ये लोग बलवान तो हो सकते हैं पर स्थाई नहीं होंगे”|ध्यान रहे आपकी सफलता का सफर उस दिन से शुरू होता है जिस दिन से आप अपनी असफलता के लिए दूसरों को दोषी ठहराना छोड़ देते हैं|…

lucknow stop dalit word

जस्टिस काटजू जी ने कहा है की भारत को नब्बे प्रतिशत जनता मूर्ख है,कितना सही कहा है|आप खुद देखो अपने चारों और दस प्रतिशत से भी कम के पास इस देश के नब्बे प्रतिशत ससंसाधन है और ये नब्बे प्रतिशत जनता जिसे बहुजन कहते हैं वो दस प्रतिशत से भी काम संसाधनों में गुज़ारा करने को मजबूर हैं| इन बहुजनों की हर समस्या का कारन और समाधान उपलब्ध है पर इन समाधानो और आम जनता के बीच के लिंक को ब्राह्मणवादियों ने घृणा की कैंची से काट दिया है| नहीं समझे? अरे भाई जनता का हित और सुख बहुजन विचारधारा में है जिसके जनक, गौतम बुद्ध, सम्राट अशोक महान, कबीर, रविदास और डॉ आंबेडकर हैं, पर आप इनको नहीं सुनोगे क्योंकि आपकी आँखों पर तो जातिगत घृणा का पर्दा पड़ा है| इसी को तो मूर्खता कहते हैं की खुद जानने की बजाये ब्राह्मणवादियों के दुष्प्रचार पर यकीन करते हैं|मानना न मानना तो बाद की बात है पहले जानो तो, अगर आप नहीं जानोगे तो गलती किसकी है| आपको चोट लगी है और डॉक्टर को आप जानते हो पर आप इलाज नहीं करवाओगे तो गलती किसकी है? उदाहरण के लिए अपने आस पास देखो धार्मिक कर्मकांडों में जिस प्रकार लोग अपना समय ऊर्जा और धन बर्बाद करके अपने शोषक धर्म का झंडा बुलंद कर रहे हैं, उसे देख कर ये कहना आसान है की ये जनता खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रही है ये अपने दुखो की खुद जिम्मेदार हैं| बहुजन विचारधारा के जनक गौतम बुद्ध ने कहा है की अत्त दीपो भव अर्थात अपना सहारा खुद बनो किसी के भरोसे न रहो,अपनी बुद्धि की शरण में जाओ| मतलब साफ़ है की ,जितना समय धन और ऊर्जा आम जनता धार्मिक कर्मकांड में लगाती है अगर उतने समय में वो पढाई लिखे कर ज्ञान साधना करे अपनी बुद्धि विकसित करें तो उसका ज्यादा भला होगा|बचपन में हमारी गली में जो बच्चे शिक्षा पर ध्यान देते थे वो बहुत आगे निकल गए और जो जागरण,कावंड,भजन संध्या आदि में समय बर्बाद करते थे अब वो मजदूरी या अपराध में लगे हैं| काटजू जी ने सही कहा है की भारत को नब्बे प्रतिशत जनता मूर्ख है, अगर कोई भी ये बात इनको समझने जाएगा तो ये लोग उसे ही अपना विरोधी समझ कर मार डालेंगे और फिर उसी को पूजने का ढोंग करने लगेंगे|केवल भेड़ों को ही चरवाहा चाहिए, खुद से सवाल करो क्या आप भेड़ हो? अगर इस बात को नहीं समझ सकते तो वाकई आप भेड़ हो और आपको चरवाहा चाहिए | (यहाँ भेड़ है आम जनता और चरवाह है ईश्वर या कोई तथाकथित मुक्तिदाता या रक्षक राजा)|वाकई मूर्खों को समझाना आत्महत्या करना है, और ये बात ब्राह्मणवादी भी जानते हैं इसलिए उन्होंने जनता को उसके हाल पर छोड़ दिया है, जो गिरना चाहता है उसे एक धक्का और दे देते हैं, शायद सही करते हैं
निकम्मे व्यक्ति या कौम का न ही कोई इतिहास होता है न ही वर्तमान न ही कोई भविष्य, जिसे भी ये तीनों चाहिए उस व्यक्ति या उस कौम को समय की मांग के अनुसार संगर्ष करना चाहिए जिसमे शांति से युद्ध तक सब कुछ शामिल है| ब्राह्मणवाद की बुराई करने से पहले उनके और अपने संगर्ष की तुलना आवश्यक है, यदि आप ठीक से तुलना कर पाये तो आप समझ जाओगे की ब्राह्मणवाद की बुराई से कुछ न होगा जो भी होगा वो उनसे ज्यादा तेज संगर्ष करने से ही होगा|

….समयबुद्धा

बहुजन हिताए बहुजन सुखाये

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