बौद्ध धम्म साहित्य में विरोधियों ने जबरदस्त मिलावट की है, उदाहरण के लिए गौतम बुद्ध ने ‘घर त्याग की घटना’,इसका कारन वह कहानी नहीं है जिसमे बुद्ध वृद्ध मनुष्य , रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर विचलित हो चले थे|बल्कि युद्द को टालने की कोशिश ही कारण था |…डॉ प्रभात टंडन


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माना जाता है कि बुद्ध के गृह त्याग के पीछे वह कहानी है जिसमे बुद्ध वृद्ध मनुष्य , रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर विचलित हो चले थे और उसी के फ़लस्वरुप उन्होने गृह त्याग किया ।, यह कितना तर्क संगत लगता है जब कि उनके पिता , माँ और उनके राज्य के मंत्री गण स्वयं वृद्ध हो चले थे , क्या वह कभी बीमार नही पडे , यह कहानी तर्क संगत नही लगती । हाँलाकि इसको ही प्रचलित कहानियों मे माना गया है । डा. भदन्त आनन्द कौसात्यायन के अनुसार त्रिपिटक के किसी भी ग्रन्थ में गृहत्याग के इस कथानक का कहीं उल्लेख नहीं है। फ़िर यह उल्लेख बार –२ क्युं पाया जाता रहा है । डा. कौसात्यायन का मत है कि वृद्ध, रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर गृहत्याग की मान्यता ‘‘वे अट्टकथाएँ हैं, जिन्हें बुद्धघोष तथा अन्य आचार्यों ने भगवान बुद्ध के एक हजार वर्ष बाद परम्परागत सिंहल अट्टकथाओं का आश्रय ग्रहण कर पाली भाषा में लिखा।”
अत्त्द्ण्डा भवं जातं , जनं पस्सच मेषकं।

संवेनं कित्त्यिस्सामि यथा संविजितं मया ॥ १ ॥

फ़न्दमानं पजं दिस्वा मच्छे अप्पोदके यथा ।

अज्जमज्जेहि व्यारुद्धे दिस्वा मं भयमाविसि ॥२॥

समन्तसरो लोको, दिसा सब्बा समेरिता ।

इच्छं भवन्मत्तनो नाद्द्सासिं अनोसितं ।

ओसाने त्वेव व्यारुद्धे दिस्वा अरति अहु ॥३॥

अर्थ :‘‘शस्त्र धारण भयावह लगा। मुझमें वैराग्य उत्पन्न हुआ, यह मैं बताता हूँ। अपर्याप्त पानी मैं जैसे मछलियां छटपटाती हैं, वैसे एक-दूसरे से विरोध करके छटपटाने वाली प्रजा को देखकर मेरे मन में भय उत्पन्न हुआ। चारों ओर का जगत असार दिखायी देने लगा, सब दिशाएं काँप रही हैं, ऐसा लगा और उसमें आश्रय का स्थान खोजने पर निर्भय स्थान नहीं मिला, क्योंकि अन्त तक सारी जनता को परस्पर विरुद्ध हुए देखकर मेरा जी ऊब गया।’’
सम्भवत: शाक्यों और कोलियों में रोहिणी नदी के पानी को लेकर झगड़े ही बुद्ध के गृह त्याग का सच था ।
संघ ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध का प्रस्ताव पारित किया, जिसका सिद्धार्थ गौतम ने विरोध किया। शाक्य संघ के नियम के अनुसार बहुमत के विरुद्ध जाने पर दण्ड का प्राविधान था। संघ ने तीन विकल्प रखे- (1) सिद्धार्थ सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लें, (2) फांसी पर लटक कर मरने या देश छोड़कर जाने का दण्ड स्वीकार करें या (3) अपने परिवार के लोगों का सामाजिक बहिष्कार और उनके खेतों की जब्ती के लिये राजी हों। संघ का बहुमत सिद्धार्थ के विरुद्ध था। सिद्धार्थ के लिये सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लेने की बात को स्वीकार करना असम्भव था। अपने परिवार के सामाजिक बहिष्कार पर भी वह विचार नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने दूसरे विकल्प को स्वीकार किया और वे स्वेच्छा से देश त्याग कर जाने के लिये तैयार हो गये।

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  1. Sadhuvad

    साभार – बी॰एल॰ राव   उप मण्डल अभियन्ता (दूरसंचार), विपणन अनुभाग  बीएसएनएल, कार्यालय मुख्य महाप्रबंधक दूरसंचार, लखनऊ-1   मोबाइल – 9415335868, लैंड्लाइन -0522-2230210 

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