स्वदेशी भाषा पाली के मौजूदा अस्तित्व को मिटाने के प्रयास हो रहे हैं। दुनिया में जहॉं जहॉं बौद्ध धम्म पहुँचा, वहॉं वहॉं बौद्ध दर्शन एवं साहित्य के रूप में पाली भाषा भी पहुँची। …एम एल परिहार


1_A_Monk_with_Pali_Manuscript Brahmi script (circa 3rd cent. BCE)

 

 

हम सभी भारत वासी मूलनिवासी देख रहे हैं बौद्ध धम्म विरोधियों के नापाक मनसूबे।
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1 ) ;- दुनिया में खास तौर से बौद्ध देशों में बुद्ध के कारण भारत का बड़ा सम्मान है। जब भी कभी हमारे राजनेताओं को बौद्ध देशों या विश्व बैंक से बौद्ध स्थलों के विकास के लिए सहायता लेनी होती है या पूँजी निवेश कराना होता है, तब राजनेताओं को तथागत बुद्ध और उनका धम्म याद आता है। पिछले दिनों चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि ”बौद्ध धर्म चीन और भारत को मजबूती से जोड़ता है।” और जब चीनी राष्ट्रपति को भारत में घुमाने की बात आयी, तो मीडिया में महात्मा गांधी जी का साबरमती आश्रम छाया रहा। अगर बौद्ध धर्म चीन और भारत के रिश्तों को मजबूती देता है, तो स्वाभाविक रूप से चीनी राष्ट्रपति को बोधगया जैसे पवित्र स्थलों पर भी घुमाया जाना चाहिए था।
2 ) ;- लेकिन यह कोई पहला मामला नहीं है जब भारत ने तथागत की व्यावहारिक उपेक्षा की है। भारत में समय-समय पर तथागत बुद्ध की वैचारिक उपेक्षा होती रही है। मुझे याद है कि नई दिल्ली में अशोका मिशन ने चार दिवसीय वैश्विक बौद्ध सम्मेलन का आयोजन किया था जिसमें करीब 50 देशों के बौद्ध गुरू, अनुयायी, शोधार्थी आामंत्रित थे। सम्मेलन के उद्घाटन के लिए भारत के तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल और मुख्य अतिथि के रूप में तत्काली प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह को आमंत्रित किया था। पर सम्मेलन में न तो महामहिम राष्ट्रपति पहॅुंच पायीं और न ही प्रधानमंत्री। शायद यह इस तरह का पहला उदाहरण है। वरिष्ठ कॉंग्रेसी नेता डॉ0 कर्णसिंह ने सम्मेलन का उद्घाटन किया था। माना कि भारत एक धर्मनिरपेक्षीय देश है। पर सवाल है, कि जब 6 नवम्बर 2005 को तत्कालीन राष्ट्रपति ए पी जे अबुल कलाम और प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह संयुक्त रूप से नई दिल्ली में अक्षरधाम मंदिर का उद्घाटन कर सकते हैं, प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद वाले राजनेताओं को लाल किला मैदान में लवकुश रामलीला के दौरान धनुष बाण चलाते देखा जा सकता है तो वैश्विक बौद्ध सम्मेलन में भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हिस्सा क्यू नहीं ले सकते थे।
3 ) ;- स्वदेशी भाषा पाली के मौजूदा अस्तित्व को मिटाने के प्रयास हो रहे हैं। मसलन् गत वर्ष पाली भाषा को कुछ विदेशी भाषाओं के साथ सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा के विषयों की सूची से हटा दिया गया। सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा में वैकल्पिक भाषा के तौर पर एक भारतीय भाषा को चुनने का प्रावधान है। अगर संघ लोक सेवा आयोग की वाार्षिक रिपोर्टों के आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे कि मुख्य परीक्षा में पाली भाषा हिन्दी के बाद दूसरी सबसे ज्यादा पसंदीदा भाषा है। यानी कि पाली भाषा भारतीय लोकतंत्र के भावी नौकरशाहों की दूसरी सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली भाषा है। लेकिन विडम्बना देखिए कि हमारे राजनेताओं के इशारों पर उन्हीं नौकरशाहों की कलम से पाली भाषा के अस्तित्व को मिटाने के फरमान जारी हो रहे हैं।
4 ) ;- संघ लोक सेवा आयोग की वार्षिक रिपोर्ट वर्ष 2011-2012 के अनुसार 2010 में सर्वाधिक 939 परीक्षार्थियों ने वैकल्पिक भाषा के रूप में हिन्दी भाषा को चुना, 345 परीक्षार्थियोेंं ने पाली, 129 ने तमिल, 116 ने तेलुगु और 107 परीक्षार्थियों ने संस्कृत भाषा को चुना। वर्ष 2011 में 395 परीक्षार्थियों ने हिन्दी भाषा को, 345 ने पाली भाषा, 98 ने मलयालम, 92 ने कन्नड़, 82 ने तमिल और मात्र 49 परीक्षार्थियों ने संस्कृत भाषा को चुना। आयोग की वार्षिक रिपोर्ट 2012-13 के अनुसार वर्श 2011 में 395 परीक्षार्थियों ने हिन्दी भाषा को, 345 ने पाली, 92 ने कन्नड़, 82 ने तमिल, 80 ने तेलुगु और मात्र 49 परीक्षार्थिर्यों ने संस्कृत भाषा को चुना। वर्ष 2012 में 492 परीक्षार्थियों ने हिन्दी भाषा को, 368 परीक्षार्थियों ने पाली, 124 ने मलयालम, 122 ने कन्नड़, 98 ने तेलुगु , 95 ने तमिल औेर 88 परीक्षार्थियों ने संस्कृत भाषा को चुना। पाली भाषा भारत में करीब 60 विश्वविद्यालयों, डीम्ड विश्वविद्यालयों और संस्थानों में पढ़ाई जा रही है।
5 ) ;- उल्लेखनीय है कि बुद्ध की शिक्षाएं सुत्तपिटक में संकलित है और सुत्तपिटक पाली भाषा में लिखे गए हैं। दुनिया में जहॉं जहॉं बौद्ध धम्म पहुँचा, वहॉं वहॉं बौद्ध दर्शन एवं साहित्य के रूप में पाली भाषा भी पहुँची। यही कारण है कि आज बौद्ध दर्शन एवं साहित्य की भाषा पाली एशियाई देशों में ही नहीं बल्कि आक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज जैसे कई यूरोपीय विष्वविद्यालयों में भी पढ़ाई जा रही है।
6 ) ;- यही कारण है कि सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा से पाली को हटाए जाने का देश में ही नहीं विदेशों में भी विरोध हुआ था। पर यह विरोध भारतीय मीडिया में कोई खास स्थान न पा सका। भाषाओं के संरक्षण का मामला सँस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत आता है। इसी भाषायी संरक्षणवादी नीति के तहत भाषाओं को प्रोत्साहित करने के लिए स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रपति द्वारा संस्कृत, फारसी, अरबी, पाली और प्राकृत साहित्य के विद्वानों को सम्मानित किया जाता है। सम्मानित होने वालों में सँस्कृत के विद्वानों की संख्या सबसे अधिक होती है। इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि सरकार को संस्कृत भाषा के संरक्षण की चिंता अधिक है। गत स्वतंत्रता दिवस पर भी संस्कृत के सर्वाधिक 20 विद्वानों, अरबी के 3, फारसी के 2 और प्राकृत के 2 विद्वानों को सम्मानित किया गया। यहॉं भी पाली भाषा उपेक्षित हुई और पाली साहित्य के किसी विद्वान को उक्त सम्मान नहीं मिल सका। बौद्ध दर्शन की मौलिक जुबान पाली के अस्तित्व को मिटाने के प्रयासों से बौद्ध विरासत को बचाने का यह कैसा तरीका है। पाली के प्रति उपेक्षित व्यवहार से ऐसा लगता है कि जैसे किसी व्यक्ति की जुबान काटकर उससे कह दिया जाए कि अब वह बोलने के लिए स्वतंत्र है।
7 ) ;- भारत ने विदेशी आक्रमणकारियों का लंबा दौर देखा है। जिसमें भारत की धन संपदा को लूटने के साथ यहॉं की सांस्कृतिक जड़ों को समूल नष्ट करने के प्रयास भी हुए हैं।
8 ) ;- उल्लेखनीय है कि 1193 ई0 में एक तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने बौद्ध साहित्य एवं शिक्षा के लिए विश्व प्रसिद्ध नालंदा विविद्यालय को आग के हवाले कर दिया था। विशाल पुस्तकालय में रखी हजारों पुस्तकें जलकर राख हो गयी थीं। बख्तियार खिलजी यह समझकर खुश हो रहा था कि उसने भारत से बौद्ध साहित्य को बिल्कुल नष्ट कर दिया है। यह सच भी है कि नालंदा विष्वविद्यालय को भव्य एवं विशाल बनाने में जहॉं कई सौ वर्ष लग गए, वहीं बख्तियार खिलजी की तुर्की सनक ने इसे चंद घंटों में ही नष्ट कर दिया था। जो बौद्ध भिक्षु नालंदा विश्वविद्यालय को बचाने की याचना कर रहे थे, उन भिक्षुओं को भी बख्तियार खिलजी ने आग में झोक दिया था।
9 ) ;- फिर भी बौद्धिसत्व बाबा साहब डा0 अम्बेडकर के अथक प्रयासों के कारण आज भी भारत में बौद्ध दर्शन और उसका साहित्य मौजूद है। इतना ही नहीं उसकी झलक आजाद भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों में भी देखने को मिलती है। बिहार सरकार और बौद्ध देशों के सहयोग से नवनिर्मित नालंदा विश्वविद्यालय में फिर से अध्ययन कार्य प्रारम्भ हो चुका है। जिससे तथागत बुद्ध के विचारों की प्रासंगिकता और बढ़ गयी है कि ”हिंसा के दम पर अहिंसावादी विचारों को दबाया नहीं जा सकता। बल्कि हिंसा को अहिंसा से जीता जा सकता है।

नमो बुद्धाय

2 thoughts on “स्वदेशी भाषा पाली के मौजूदा अस्तित्व को मिटाने के प्रयास हो रहे हैं। दुनिया में जहॉं जहॉं बौद्ध धम्म पहुँचा, वहॉं वहॉं बौद्ध दर्शन एवं साहित्य के रूप में पाली भाषा भी पहुँची। …एम एल परिहार

  1. गपौडे गाने से कोई महान नहीं बनता कभी मेडिकल साइंस पढ़ी है तो देखो अगर ब्लड ग्रुप मैच ना करे तो सगे भाई बहन का खून भी नहीं चढ़ाया जा सकता और अगर ABO टाइपिंग मिल जाए और Rh टाइपिंग ना मैच हो तो भी आदमी तुरंत मर जाता है ऐसा ब्लड चढाने से और बात रही head ट्रांसप्लांट करने की तो जन्म के समय ही हाथी के बच्चे का सिर और गर्दन आदमी के पूरे शरीर से भी मोटे होते हैं कैसे फिट होगा दूसरी बात हाथी का कोई भी अंग अगर मनुष्य के शरीर में लगा दे या यूँ कहें जोड़ दे तो वह अंग स्वयं ही survive नहीं कर सकता क्योंकि human blood cells are very much different from elephants अतः कोशिकाओं के कम्पेटिबल ना होने से anaphylaxis होने से दोनों की ही मृत्यु हो जायेगी ।

    अन्य बात धर्म की आती है वो श्रद्धा का विषय तो है पर अंध श्रद्धा का विषय नहीं । भारत में मूर्तिकला की शुरुवात मौर्य काल के चक्रवर्ती सम्राट देवनाप्रिय महाराज अशोक ने शुरू करवाई थी जब उन्होंने भगवान् बुद्ध के ९ स्तूप जो मगध सम्राट अजात सत्तु के काल में बनवाये गए थे । महाराज अशोक ने उन स्तूपों को उखड़वाकर पूरे जम्मूद्वीप अर्थात मौर्यकालीन भारत में ८४ हज़ार स्तूपों का निर्माण कराया और एक ही दिन कार्तिक अमावस्या को पूरे जम्मुद्वीप और ८४ हज़ार स्तूपों पर दीपक जलवाने का और एक दूसरे को मिठाई बांटने का राज्यादेश जारी किया तब से दीपावली मनाई जाने लगी और भिक्खुओं ने गुफाओं आदि में भगवान् बुद्ध के जीवन और धर्म को मूर्तिकला के रूप में प्रतिस्थापित किया । उसके बाद ही अन्य सम्प्रदाय वालों ने भी मूर्तियों का निर्माण अपने अपने सम्प्रदाय के अनुसार किया । परन्तु बौद्ध और जैन धर्म के अलावा किसी भी अन्य सम्प्रदाय ने मूर्तियों का निर्माण नहीं किया था । वैदिक धर्म को मानने वाले लोग जो ब्राह्मण पुरोहित थे वे तो मूर्ती कला और भव्य पूजास्थलों के विरुद्ध थे वैदिक केवल यज्ञ और पशुबलि वेदों के मंत्रोउच्चार का ही पालन करते थे । परंतु ८ शताब्दी में जब शंकराचार्य हुए तो बौद्ध और जैन धर्म के साधुओं का कत्लेआम किया गया जो कि राजा सुधन्वा बंगाल की सेना शंकराचार्य के साथ चलती थी और जो साधू या ब्रह्मचारी शंकराचार्य के मत को शास्तार्थ में काट देता तो सिपाही उसका क़त्ल कर देते थे । जब बौद्ध और जैन राज्य समाप्त हो गए तो पुरोहित ब्राह्मणों ने उनके मंदिरों पर कब्जा कर लिया और उनमें काल्पनिक वैदिक देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित कर डालीं । परंतु ज्यादातर मूर्तियां तो बौद्धों और जैनियों द्वारा ही बनवायी गयी थी जो आज भी समाज में अंधश्रद्धा के कारण पूजी जाती हैं जबकि वह मूर्तिकला एक तीसरा प्रकार है अभिव्यक्ति का उसमें बिना लिपि और बिना वाणी के धर्म को निरूपित किया गया है । काली गणेश शिव ब्रह्मा नौदुर्गे विष्णु इंद्र आदि सभी एक प्रकार से उनके गुणवाचक निरूपण हैं और धर्म अर्थात भगवान् बुद्ध के द्वारा बताये गए ३७ बोधिपक्षिय धर्म का निरूपण हैं और कुछ में संसार के भौतिक जीवन का निरूपण है ।। अब आज लोग अंधश्रद्धा से मूर्तियों को पूजने में ही लग गए हैं धर्म तो कुछ भी ना जानते ना उसपे चलते हैं केवल सम्प्रदायवाद रह गया है धर्म तो डूबता चला गया है । वैदिक विचार के अनुसार भी केवल तीन मूर्तियाँ पूजनीय हैं गुरु माता पिता ।। अन्य कोई मूर्ती है भी नहीं केवल निरूपण है धर्म का , तो समझने और धर्म का पालन कैसे करें इसके लिए मूर्तिकला का आविष्कार वज्रयानी बौद्ध भिक्खुओं ने किया था इसी पत्थर पर मूर्ती के रूप में धर्म का निरूपण करने के कारण उनका एक सम्प्रदाय वज्रयान =पत्थर कहलाया था ।।

  2. शरीर की पीड़ा हो या मन का हो दुःख तुझे ।
    जब भी हो कष्ट तुझे तो मानव ही तेरे काम आया।।
    अपने ही अपनों के काम आते हैं जगत में।
    देव देव का मानव मानव का सहारा बनें ये कायदा तो ऋत ने बनाया।।
    रोज़ लेता हूँ सहारा और आनंद मैं ज्ञानी मानवों के दान का।
    दुःख हो तो ज्ञानियों के कदमों में सिर अपना झुकाया।।
    जब सुख सुविधा पायी मानव के द्वारा खोजित वस्तु से ।
    तो धन्यवाद जिसे न देखा न जाना उस देव का नाम ले ले कर शोर मचाया।।
    सीख ले लेगा जिस दिन तू हे ! मानव इन खोजी दानी मानवों की।
    तो समझ ले हे !स्वार्थी कुमति तू सर्व कष्ट से मुक्ति को पाया।।

    देव देव के साथ संवास करे हैं शेर शेर के साथ संवास ।
    मानव तू मूरख है जिसे ना देखे ना जाने अपनों को छोड़ ।
    किसी और की योनि के मूरत को घड़ उसके नाम पर अपनों से युद्ध करे है …….. अपनों से युद्ध करे है।।

    नमो बुद्धाय ।।
    भवतु सब्ब मंगलं।।

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