डा बी.आर. अम्बेडकर की 22 प्रतिज्ञा जो उन्होंने 1956 में बौद्ध धम्म पर “वापस लौटते” वक्त दिलाई

डा बी.आर. अम्बेडकर ने  बौद्ध धर्मं में “वापस लौटने” के अवसर पर,15 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं.उन्होंने इन शपथों को निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके.ये 22 प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं.  प्रसिद्ध 22 प्रतिज्ञाएँ निम्न हैं:

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  1. मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा
  2. मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा
  3. मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा.
  4. मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता हूँ
  5. मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूँ
  6. मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंड-दान दूँगा.
  7. मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन करने वाले तरीके से कार्य नहीं करूँगा
  8. मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा
  9. मैं मनुष्य की समानता में विश्वास करता हूँ
  10. मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूँगा
  11. मैं बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग का अनुशरण करूँगा
  12. मैं बुद्ध द्वारा निर्धारित परमितों का पालन करूँगा.
  13. मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार भरी दयालुता रखूँगा तथा उनकी रक्षा करूँगा.
  14. मैं चोरी नहीं करूँगा.
  15. मैं झूठ नहीं बोलूँगा
  16. मैं कामुक पापों को नहीं करूँगा.
  17. मैं शराब, ड्रग्स जैसे मादक पदार्थों का सेवन नहीं करूँगा.
  18. मैं महान आष्टांगिक मार्ग के पालन का प्रयास करूँगा एवं सहानुभूति और प्यार भरी दयालुता का दैनिक जीवन में अभ्यास करूँगा.
  19. मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूँ जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूँ
  20. मैं दृढ़ता के साथ यह विश्वास करता हूँ की बुद्ध का धम्म ही सच्चा धर्म है.
  21. मुझे विश्वास है कि मैं फिर से जन्म ले रहा हूँ (इस धर्म परिवर्तन के द्वारा).
  22. मैं गंभीरता एवं दृढ़ता के साथ घोषित करता हूँ कि मैं इसके (धर्म परिवर्तन के) बाद अपने जीवन का बुद्ध के सिद्धांतों व शिक्षाओं एवं उनके धम्म के अनुसार मार्गदर्शन करूँगा.डा बी.आर. अम्बेडकर

जो लोग खुद को दलित समझकर शिथिल पड़े हैं उनको ये जानने की जरूरत है की उन्हीं का इतिहास सम्पूर्ण विश्व में सबसे सुनहरा है, जब जब इन्होने सत्ता अपने हाथों में ली है, बहुजन जनता सुखी हुई है|आज भारत को सबसे ज्यादा जरूरत है सम्राट अशोक महान और उनके बौध शाशन की…Team SBMT

आज भारत को सबसे ज्यादा जरूरत है सम्राट अशोक महान और उनके बौध शाशन की
 “मानव जाति के लम्बे खुनी इतिहास में सबसे चमकदार अंतराल, इतिहास में लाखों सम्राटों की भीड़ , जो  their majesties and graciousnesses and serenities and royal highnesses , की उपाधियों से सुसज्जित हैं, सब कुछ दिनों के लिए चमके फिर गायब हो गये. लेकिन आज भी उन सबके बीच अशोक महान का नाम एक तारे के तरह चमक रहा है,  अकेले तारे की तरह |”mauryan_empire ashoka

यह कथन प्रसिद्द लेखक व इतिहासकार एच.गी. वेल्स ने अपनी पुस्तक ” आ शॉर्ट हिस्टरी ऑफ  वर्ल्ड.” में अशोक के बारे में लिखा है. एच. जी. वेल्स ने विश्व्प्रशिद्ध ” वॉर ऑफ थे वर्ल्ड्स,  टाइम मशीन,  इनविज़िबल मान” जैसे अन्य विश्व्पर्सिद्ध उपन्यास भी लिखे हैं.

खैर बात यहाँ अशोक की हो रही है. आखिर क्या ऐसा था अशोक में जो उसे सर्वश्रेष्ठ शाषक की उपाधि दिलाता है?

अशोक चन्द्रगुप्त मौर्या का प्रपोत्र और बिन्दुसार का पुत्र था. अशोक के कई सौतेले भाई थे, जो उससे इर्ष्या रखते थे. बिन्दुसार की मृत्यु के पश्चात अशोक के सौतेले भाई सुशीम को बिन्दुस्सर की इच्छा के अनुस्सर गद्दी मिलनी थी, परन्तु ज्यादातर मंत्री अशोक को राजा देखना चाहते थे. उनके सहयोग से और भाइयों  की ह्त्या के बाद वो राजा बना.

कहते हैं अशोक ने अपने ९९ भाइयों  का वध कर दिया था, एक भाई तिस्सा को छोड़ कर. अशोक  एक दुष्ट प्रकृति वाला और  गुस्सैल राजा  था.  उसके हरम में ५०० औरतें थीं. इसमें से कईयों को उसने ज़िंदा जलवा डाला था.   उसने अपने तकरीबन  ३०० मंत्रियों को शक की वजह से मार डाला था. उसने एक यातना गृह बनवाया था अपने विरोधियों के लिए, जिसे धरती पर नरक की संज्ञा दी गयी थी. उसके इन क्रूर कर्मों की वजह से उसे ” चंड अशोक”  कहा जाता था.

राजा बनने के आठ साल के भीतर उसने अपना साम्राज्य  आज के बर्मा से इरान तक और कश्मीर से तमिलनाडु तक स्थापित किया.

 अपनी विजय देखने के लिए वह युद्ध के मैदान में घुमने निकला. वहां पर पड़े शवों और उन पर विलाप करते उबके सगे संबधियों को देख कर उसके मन में करुना जागी और वह कहने लगा ” यह मैंने क्या किया? यदि यह विजय है तो पराजय क्या है? यह न्याय है या अन्याय? यह वीरता है या बर्बादी? क्या मासूम बच्चों और स्त्रियों की ह्त्या वीरता है? क्या यह मैंने अपने साम्राज्य के विस्तार और समृद्धि के लिए किया या दुसरे के राज्य के विनाश के लिए? किसी ने अपना पुत्र खोया,किसी ने अपना पिता, किसी ने माँ किसी ने अपना अजन्मा बच्चा, किसी ने पति किसी ने पत्नी.यह शवों का ढेर क्या है? क्या यह मेरी विजय का सूचक हैं या मेरी कायरता के? यह कव्वे,गिद्ध शैतान के दूत हैं या मृत्यु के?” 
इसके बाद अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया. कहते हैं की ��िक्षु के रूप में स्वयं भगवन बुद्ध ने अशोक को उपदेश दिया था. ( मिथ?)
और जो नदी रक्त से लाल हो गयी थी, जिसके किनारे पर अशोक को ग्लानी हुई  आज उस नदी को “दया नदी” कहा जाता है.
अशोक ने इसके बाद घोषणा की ” अब युद्ध ढोल की ध्वनि के बजाय धर्म  का नाद  बजेगा “
आइये अशोक के  कल्याणकारी कार्यों पर एक दृष्टि डालते हैं( बौद्ध धर्म स्वीकारने के बाद): यह सारी बातें इतिहासकारों  को अशोक द्वारा निर्मित उस वक़्त के शिलालेखों पर मिली हैं. जो उसके घोषणा पात्र की तराह थी.
१) आज जिसे हम मुफ्त चिकित्सा कहते हैं, अशोक ने उस युग में वो किया था. अपने पुरे राज्य में उसने मुफ्त हॉस्पिटल और दवाखानों का निर्माण करवाया, इच्छा अनुसार कोई भी उसमें दान दे सकता था.
२) अशोक ने अपने राज्य में पशु वध पर पूर्ण पाबंदी लगा दी, और पशुओं के लिए भी हॉस्पिटल खुलवाए.
३)हर ८ किलोमीटर पर उसने तालाब खुदवाए व  आश्रय स्थल बनवाए, बरगद और आम  के पेड़ हर रास्ते पर लगवाए .
४) अपनी रसोई में उसने मांसाहार पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगवा दिया.
५) शिकार प्रथा बंद करवा दी.
६) अशोक ने सभी बौद्ध तीर्थों की यात्रा की, लुम्बिनी, गया, कपिलवस्तु, एवं सारनाथ जहां उसने अशोक स्तम्भ बनवाया जो आज भारत का प्रतिक चिन्ह है.
७) जो सभी लोगों के कल्याण को बढ़ावा दे  वास्तव में  वही  मेरे लिए सबसे  महत्वपूर्ण कर्तव्य है.
8)  कैदियों से  नम्रता से व्यवहार किया जाना चाहिए.
9)  सभी लोगों को  माता – पिता, याजकों और भिक्षुओं का सम्मान करना चाहिए.
10) भिक्षुओं और जरूरतमंद से  उपहार प्राप्त करने के बजाय  देना  श्रेष्ठ  हैं.
11)धर्म के द्वारा विजय बल से प्राप्त  विजय से  बेहतर है लेकिन अगर बल से विजय किया जाता है, यह धैर्य और हलकी  सजा द्वारा होनी चाहिए.
12)अपने प्रजा के लोगों के कल्याण के बारे में  मुझे सूचित किया जाना चाहिए. इससे कोई फरक नहीं पड़ता की ” कोई बात नहीं है या वह कहाँ है या क्या कर रहा है”
13) और सबसे बड़ी बात विश्व में पहली बार राज्य धर्म निरपेक्षता का आधार अशोक ने रखा ( जिसे पश्चिम जगत अपनी देन मानता है)जो उसके बारहवें शिलालेख पर इस प्रकार  अंकित है ” जो भी खुद के संप्रदाय को महान और दुसरे के संप्रदाय को  धर्मांध होकर  या  अज्ञानता वश तुच्छ बताता है, वह अपने ही सम्प्रदाय का शत्रु है. एकता में ही बल है, एक दुसरे के मतों को सुनना और उनका आदर करना ही सही है.”
इन सब बातों से प्रेरित होकर अनेक  पर्यावरण वादी जैसे  सुन्दरलाल बहुगुणा ने अक्सर अशोक का उदहारण दिया है पर्यावरण की रक्षा हेतु.
वंदना शिवा, जिन्होनें प्राचीन भारतीय जड़ी बूटियों का पश्चिम जगत द्वारा पेटेंट के विरुद्ध लडाइयां  लड़ी हैं, उन्होंने अशोक के इसी सिद्धांत  ” सभी जड़ी बूटियाँ एवं चिकित्सीय पौधों का उपयोग समस्त मानव जाती के लिए मुफ्त में होना चाहिए” को आधार बनाया.
जब लाखों दलितों ने बौध धर्म स्वीकार किया बाबा साहेब अमबेडकर के नेत्रित्व में, तो ज्यादातर लोगों ने अपना नाम अशोक रखा.
आज यदि आधे विश्व में बौद्ध धर्म फैला है तो इसमें सबसे बड़ा योगदान अशोक का है.
भारत के झंडे,राज चिन्ह हर जगह अशोक के ही चिन्ह हैं.
अशोक स्तम्भ , जो भारत का राज चिन्ह है,  चार पशुओं का चिन्ह  भगवान बुद्ध के जीवन के विभिन्न चरणों का प्रतीक माना जाता है.
१) हाथी: एक सफेद हाथी उसके गर्भ में प्रवेश की रानी माया का सपना के संदर्भ में बुद्ध के विचार का प्रतिनिधित्व करता है.
२) सांड:  एक राजकुमार के रूप में बुद्ध के जीवन के दौरान इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है.
३) घोडा: महलनुमा जीवन से बुद्ध के प्रस्थान का प्रतिनिधित्व करता है.
४) शेर : बुद्ध की उपलब्धि का प्रतिनिधित्व करता है.
वैसे एक मिथक भी है की भगवन बुद्ध ने स्वयं अशोक के बारे में भविष्यवाणी की थी ” मेरे मरने के बाद एक सौ साल बाद  एक सम्राट पाटलिपुत्र में अशोक के नाम से हो जाएगा. वह चार महाद्वीपों में से एक पर  राज करेगा और मेरे अवशेष लोगों के कल्याण के लिए चौरासी  हजार स्तूप का निर्माण के साथ जम्बुद्वीप को सजाएगा . वह देवताओं और पुरुषों द्वारा सम्मानित कियाजाएगा. उनकी प्रसिद्धि व्यापक होगा.  जया  ने यह सुनते ही तथागत के कटोरामें एक मुट्ठी धूल फेंक दिया.” यह ” धुल का उपहार” नामक प्रसंग है, भगवन बुद्ध के जीवन में, शायद मिथक हो या सत्य, कह नहीं सकता.
परन्तु एक बात अवश्य कह सकता हूँ, हमारे पास बुद्ध,महावीर,नानक,राम,कृष्ण, विवेकानंद, सभी की शिक्षाएं हैं किन्तु इस समय अशोक  नहीं है जो अखिल  विश्व  में वो स्वर्णिम दिन वापस  ला दे.
ये लेख निम्न लिंक से लिया गया है

अफगानिस्तान के बामियान में 14 साल पहले इस्लामिक कट्टरपंथी तालिबान ने गौतम बुद्ध की विशाल मूर्ती को बम से उड़ा दिया था, ठीक उसी जगह एक बार फिर 3-D टेक्नीक से बुद्ध की वैसी ही मूर्तियां बनाई गईं। चीन के एक दंपती ने इस परियोजना को पूरा किया।…Team SBMT

काबुल
अफगानिस्तान में बुद्ध फिर ‘मुस्कराए’ हैं! अफगानिस्तान के बामियान में 14 साल पहले गौतम बुद्ध की जिन दो विशाल मूर्तियों को तालिबान ने तबाह कर दिया था, ठीक उसी जगह एक बार फिर 3-D टेक्नीक से बुद्ध की वैसी ही मूर्तियां बनाई गईं। चीन के एक दंपती ने इस परियोजना को पूरा किया।

दंपती ने काबुल के उत्तर-पश्चिम में 230 किलोमीटर पर स्थित हजराजात की बामियान घाटी में चट्टान की खाली गुफाओं में 3D लेजर लाइट प्रॉजेक्शन टेक्नीक का प्रयोग किया।

 

दंपती जॉनसन यू और लियान हू छठी शताब्दी में बनाई गई दो प्रतिमाओं को ढहाए जाने से दुखी थे और उन्होंने इस परियोजना को पूरा करने का फैसला किया।

उन्होंने चट्टान में खाली गुफाओं में केवल एक रात के लिए प्रतिमाएं वापस लाने के लिए अफगान सरकार और यूनेस्को से अनुमति ली। सात जून को हुए इस समारोह मेें प्रॉजेक्टरों की मदद से पूर्व की प्रतिमाओं के आकार की होलोग्राफिक प्रतिमाएं प्रदर्शित की गईं।

महात्मा बुद्ध की मूर्तियां 115 फीट और 174 फीट लंबी थीं और ये 1500 साल से ज्यादा समय तक खड़ी रहीं। मार्च 2001 में तालिबान ने इन्हें उड़ा दिया था। यूनेस्को ने इन्हें वर्ल्ड हेरिटेज साइट के तहत सूचीबद्ध किया हुआ था।

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SOURCE:

http://i1.wp.com/navbharattimes.indiatimes.com/thumb/msid-47677404,width-300,resizemode-4/world/asian-countries/world-famous-buddhas-of-bamiyan-resurrected-in-afghanistan/-14-/world-famous-buddhas-of-bamiyan-resurrected-in-afghanistan.jpg?resize=0%2C0

कविता-भीमराव के “बौद्ध” नहीं, ये तो हिन्दू दलित/हरिजन है…..सूरजपाल चौहान

ye baudh nahin dalit haiभीमराव का बौद्ध नहीं ये,
हिन्दू दलित/हरिजन है.
रोज़ सवेरे मंदिर जाता
रखता है मंगल उपवास
शनिदेव की करे अर्चना
बेटा इसका रामदास
जय जगदीश हरे आँगन में
घर में इसके कीर्तन है
भीमराव का “बौद्ध” नहीं ये
हिन्दू दलित/हरिजन  है.
धर्म दूसरों का ढोता है
नंगें पाँव भगाफिरता
चुल्लू भर पानी की खातिर
यहाँ वहां गिरतापड़ता
कावंडिया बन कर करे गुलामी
अकल से भी यह निर्धन है
भीमराव का “बौद्ध” नहीं ये
हिन्दू दलित/हरिजन है.

मीट लंबा तिलक माथे
सुतल डोर गले डाल
हा कलावा बांधे फिरत
मटर का पोता काल
इसक आगे शर्माता
पंडि रामचरण
भीमरा का बौद्ध नहीं ये
हिन्द दलित/हरिजन है ।।

इसक तो कुछ पता नहीं
स्कू,कॉलेज क्या होत
देसथैली डाल हलक मे
दि भर गफलत में रहत
बाल इसके अनपढ़ रह गए
ज्ञा का खाली बर्तन
भीमरा का बौद्ध नहीं
हिन्द दलित/हरिजन  है.

अम्म इसकी अमरनाथ मे
गयी पत्थर के नीच
बर् में दबकर बाप मरा
मानसरोव के पीछ
वैष्ण देवी भइया खोय
आय इस पर दुर्दिन
भीमरा का बौद्ध नहीं
हिन्द दलित/हरिजन है.

पढलिखकर धोखा देता
धूर् बना मक्कार
आरक्ष लेता बढ़बढ़क
कोठ, बंगला, कार
अपन जाति छिपाकर रहत
बेट इसका सर्जन
भीमरा का बौद्ध नहीं ये
हिन्द दलित/हरिजन है.

सच्च बात बताता इसक
उस को आँख दिखाता
भगवरंग में सराबोर
गी राम के गाता
हिन्दमुस्लिम के झगडे मे
सबस आगे यही जन
भीमरा का बौद्ध नहीं
हिन्द दलित/हरिजन है.

बौद्ध”-साहित्य तनिक भात
मौलि चिंतन से ना प्या
वर्व्यवस्था ये ना जान
लिलिख करके गया मैं हा
पोंगपंडित को पढ़ता
जिसक झूठा दर्शन
भीमरा का बौद्ध नहीं
हिन्द दलित/हरिजन है.
 
जुल्म इसकी कौम पे होते दिन रात
ये जात छुपा बैठा मंदिर सत्संग में
कर रहा अपने पूर्वजों के हत्यारों की पूजा
जिनसे बचना है ये उन्हीं के संग संग में
इसीलिए बाबा साहब कह गए बार बार
जुल्म करने वाले से सहने वाला ज्यादा है गुनहगार
मुझे मेरे पढ़े लिखों ने धोखा दिया रात दिन है
भीमराव काबौद्धनहीं ये
हिन्दू दलित/हरिजन है.

बहुजन नायक श्री पार्शव नाथ मौर्या जी के भाषण के विडिओ, विषय “कैसे डॉ आंबेडकर ने संविधान को बौद्ध धम्म पर आधारित किया है”…Team SBMT

 

अम्बेडकर चाहते थे कि अछूतो के अपने उम्मीदवार और अपने निर्वाचन क्षेत्र हों, अन्यथा उनका कहीं भी किसी भी संसद में प्रतिनिधित्व कभी नहीं होगा, भारत में एक मोची अछूत है, कौन एक मोची को वोट देंगे? कौन उसे वोट देने जा रहा है?……. पूना पैक्ट पर ओशो के विचार

osho36अम्बेडकर चाहते थे कि अछूतो के अपने उम्मीदवार और अपने निर्वाचन क्षेत्र हों, अन्यथा उनका कहीं भी किसी भी संसद में प्रतिनिधित्व कभी नहीं होगा, भारत में एक मोची अछूत है, कौन एक मोची को वोट देंगे? कौन उसे वोट देने जा रहा है?

अम्बेडकर बिल्कुल सही थे। देश की एक चौथाई लोग अछूत है।

स्कूलों में जाने के लिए उन्हें अनुमति नहीं है, अन्य छात्र उनके साथ बैठने के लिए तैयार नहीं है, कोई शिक्षक उन्हें सिखाने के लिए तैयार नहीं है।

सरकार कहती है कि सरकारी स्कूल खुले हैं , लेकिन वास्तविकता में कोई एक अछूत छात्र कक्षा में प्रवेश करता है, तो सभी तीस छात्रों कक्षा छोड़ने को …. तैयार है। शिक्षक वर्ग कक्षा छोड़ देता है, तो फिर कैसे इन गरीब लोगों का — जो इस देश का एक चौथाई भाग हैं – प्रतिनिधित्व किया जा रहा है? इसलिए उन्हें अलग निर्वाचन क्षेत्र दिए जाने चाहिए। जहां केवल वे खड़े हो सकते हैं और केवल वे मतदान कर सकते हों,

अम्बेडकर पूरी तरह से तार्किक और पूरी तरह से मानवतावादी थे।

लेकिन गांधी, अनशन पर चला गया “उन्होंने कहा कि अम्बेडकर हिंदू समाज के भीतर एक प्रभाग बनाने की कोशिश कर रहे है।”

विभाजन दस हजार साल से अस्तित्व में है। यही कारण है कि गरीब अम्बेडकर विभाजन पैदा नहीं कर रहे थे, वह सिर्फ इतना कह रहे थे कि हजारों सालो से देश के एक चौथाई लोगों पर अत्याचार किया गया है.

अब कम से कम उन्हें खुद को आंगे लाने के लिए एक मौका दे। कम से कम उन्हें विधानसभाओं में, संसद में उनकी समस्याओं को आवाज दें। लेकिन गांधी ने कहा ” जब तक मै जिन्दा हूँ, मै इसकी अनुमति नहीं दे सकता, उसने कहा कि वे हिन्दू समाज का हिस्सा हैं इसलिए अछूत एक अलग मतदान प्रणाली की मांग नहीं कर सकते हैं, ,” – और गाँधी उपवास पर चला गया

इक्कीस दिनों के लिए अम्बेडकर अनिच्छुक बने रहे, लेकिन हर दिन … पूरे देश का दबाव उन पर आता जा रहा था. और उन्हें ये महसूस हो रहा था कि अगर वह बूढा आदमी मर जाता है तो महान रक्तपात शुरू हो जायेगा

अगर गाँधी की मौत हो गयी तो यह स्पष्ट था – कि अम्बेडकर को तुरंत मार डाला जाएगा, और लाखों अछूतों को पूरे देश में, हर जगह मारा जाएगा: क्यों कि ये माना जायगा कि ये तुम्हारी वजह से है।” अम्बेडकर को सारी गणित को समझाया गया था कि – “ज्यादा मय नहीं है, वह तीन दिन से ज्यादा जीवित नहीं रह सकते, कुछ दिनों में सब बाहर आने वाला है ” – अम्बेडकर झिझक रहे थे.

अम्बेडकर पूरी तरह से सही थे; गांधी पूरी तरह से गलत था।

लेकिन क्या करना चाहिए था ? क्या उन्हें जोखिम लेना चाहिए था ? अम्बेडकर अपने जीवन के बारे में चिंतित नहीं थे उन्होंने कहा कि अगर उन्हें मार दिया गया तो कोई बात नहीं – लेकिन वो उन लाखों गरीब लोगों के बारे में चिंतित थे जो ये भी नहीं जानते थे कि आखिर चल क्या रहा है.

उनके घरों को जला दिया जाएगा, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाएगा, उनके बच्चों को बेरहमी से काट दिया जाएगा । और वह सब कुछ होगा जो पहले कभी नहीं हुआ था।

आखिरकार उन्होंने गांधी की शर्तों को स्वीकार कर लिया । अपने हाथ में नाश्ता लिए हुए अम्बेडकर गांधी के पास चले गये उन्होंने कहा कि मैं आपकी शर्तों को स्वीकार करता हूँ. हम एक अलग वोट या अलग उम्मीदवारों के लिए नहीं कहेंगे। । इस संतरे का रस स्वीकार करें “और गांधी ने संतरे का रस स्वीकार कर लिया।
लेकिन यह संतरे का रस ,असल में इस एक गिलास संतरे के रस में लाखों लोगों का खून मिला हुआ था

मैं डॉक्टर अंबेडकर से व्यक्तिगत रूप से मिला । निश्चित ही डॉ अम्बेडकर मुझे आज तक मिले हुए सबसे बुद्धिमान लोगों में से एक थे। लेकिन मैंने उनसे कहा कि मुझे लगता है कि “आप कमजोर साबित हुए ।

अम्बेडकर ने कहा कि आप समझ नहीं रहे हैं, मैं सही था और ये बात मै जानता था, गाँधी गलत था, लेकिन उस जिद्दी बूढ़े आदमी के साथ क्या किया जा सकता था ? वह मरने के लिए जा रहा था, और अगर वह मर गया होता है तो मुझे उसकी मौत के लिए जिम्मेदार माना जाता , और अछूतों को बड़ी समस्या का सामना करना पड़ता.

संकलन    —- गणनायक

धर्म और संविधान मे भेद…ओ पी गौतम

ambedkar-samvidhan sadhye🍁धर्म और संविधान मे भेद🍁

१. धर्म ने आपको दी हजारों साल की गुलामी जबकि संविधान ने दी आपको हजारों साल की गुलामी से आजादी।

२. धर्म ने आपको अछूत बनाया संविधान ने समानता का अधिकार देकर आपको इन्सान बनाया।

३. धर्म ने आपको शिक्षा से वंचित रखकर विकास से वंचित किया जबकि संविधान ने आपको शिक्षा का अधिकार देकर विकास के नए रास्ते खोले।

४. धर्म ने आपको संपत्ति से वंचित रखकर आर्थिक रूप से पंगु कर दिया जबकि संविधान ने आपको संपत्ति, कारोबार का अधिकार देकर उन्नति के लिए नये रास्ते खोले।

5. धर्म ने आपको शहर, गाँव से अलग एक तरफ बस्ती बनाकर समाज से काटकर रख दिया जबकि संविधान ने आपको शेष समाज से जोड़कर इन्सान होने का एहसास दिलाया।

६. धर्म ने आपको नीच बनाया संविधान ने आपको सभी इंसानों के समान ही इन्सान बनाया।

७. धर्म आपको जानवरों से भी बदतर समझता है जबकि संविधान आपको किसी भी आदमी से कम नहीं समझता।

८. धर्म ने आपको जल रूपी जीवन से वंचित रखा जबकि संविधान ने आपको जल पर समान अधिकार दिया।
🍁 अब बतलाईये धर्म महान है या संविधान, अगर आपका जवाब संविधान है तो ” हिन्दु “धर्म में रहने की क्या जरूरत है।
कृपया अाप भी राय दें।

सदियों के अँधेरे से संविधान के द्वारा प्रकाश की किरण मिले। आप सभी का मंगल हो। ऐसी उम्मीद के साथ….
“नमों बुद्धाय जय भीम”

ओ पी गौतम आकाशवाणी नई दिल्ली

ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम और डॉ. अम्बेडकर… एडवोकेट कुशाल चन्द्र

ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम और डॉ. अम्बेडकर

dr Ambedkar image

आज हम उस दौर की बात कर रहे है जिसमें डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रथम गोलमेज सम्मेलन 1930 में दिये गये भाषण की ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने प्रंशसा की तथा ’’ दी इंडियन डेली मेल ‘‘ ने डॉ. अम्बेडकर के भाषण को सम्पूर्ण सम्मेलन का सर्वोतम भाषण बताया तथा अंग्रेजी समाचार पत्रों ने भी डॉ. अम्बेडकर के भाषण को प्रमुखता से छापा था,
डॉ. अम्बेडकर के भाषण की खास विशेषता रही की उनकी वाणी में एक मात्र थी , वक्तव्य नही जिसमें धुआँ का नाम नही , लपलपाती सुर्ख लपटे थी ।
इससे प्रभावित होकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री ‘रैम्जे‘ मैकडोनाल्ड, डॉ. अम्बेडकर के तर्को, उनकी व्याख्या और स्पष्ट अभिव्यक्ति के प्रंशसक हो गए । गांधी जी के प्रति उनका सम्मोहन मिट सा गया था ।
द्वितिय गोलमेज सम्मेलन 1931 मे जब गांधी जी ने यह कहा की कांग्रेस ही सम्पूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व करती है तथा वह अछूतों का भी प्रतिनिधित्व करती है, उसी समय तपाकसे डॉ. अम्बेडकर ने गांधी जी की बात को काटते हुए स्पष्ट शब्दों मे कहा की ‘कांग्रेस और गांधी का यह दावा कि वे मुझसे ज्यादा दलितों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो एकदम झूठा और गलत है ।’ यह तमाम उन झूठें बयानो मे से एक है जो अक्सर गैर जिम्मेवार लोग देते है । मिस्टर चेयरमेन, मैं भारत के सम्पूर्ण अछूतों का प्रतिनिधित्व करता हॅूं । इतना कहते ही पूरा सदन हक्का-बक्का रह गया, पूरे सदन मे डॉ. अम्बेडकर की आवाज देर तक गूंजती रही ।
अंत मे द्वितिय गोलमेज सम्मेलन के चेयरमेन, ब्रिटिश प्रधानमंत्री ‘रैम्जे‘ मैकडोनाल्ड, ने डॉ. अम्बेडकर को उनकी शानदार पैरवी के लिए धन्यवाद दिया और कहा की उन्होने अपने वक्तव्य से सारी स्थिति स्पष्ट कर दी जिसमे सन्देह की कोई गुंजाईश नही रही ।
इसी का परिणाम था कि अंग्रेज सरकार द्वारा घोषित साम्प्रदायिक पंचाट में दलितो के लिए जो अधिकारो की मांग डॉ. अम्बेडकर द्वारा रखी गई उसे उसी रूप मे स्वीकार कर लिया गया । जिसके विरूद्ध गांधी जी ने अनशन किया परिणामस्वरूप पूना पेक्ट समझोता हुआ ।
द्वितिय गोलमेज सम्मेलन के समापन अवसर पर ब्रिटेन के सम्राट जार्ज पंचम ने एक पार्टी का आयोजन किया जिसमे सभी राजनेता मेहमान शरीक हुए इसमे डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने ब्रिटेन के सम्राट जार्ज पंचम से बातचीत करते हुए उनके प्रश्नों का उत्तर दिया । दूर से गांधी जी नंगे सिर, लंगोटी लगाए और चप्पल पहने हुए इस दृश्य को देख रहे थे कि सम्राट जार्ज पंचम भीमराव अम्बेडकर के प्रति गहरी दिलचस्पी लेने लगे है ।
भीमराव अम्बेडकर ने अछूतों की अति दयनीय और भंयकर उपेक्षित स्थिति का वर्णन जिन शब्दों और जिस ढंग से किया, उससे सम्राट जार्ज पंचम का हदय दहल गया था । उनकी ऑंखों में लाली उतर आई थी । उनके अधर कॉप गए थे ।
‘क्या अछूत सिर पर मैला उठाकर चलते हैं? ‘
‘जी हॉं, सम्राट!‘
‘क्या उन्हें अछूत होने के लिए अपनी पहचान रखना जरूरी है?‘ जार्ज पंचम ने प्रश्न किया ।
जी , सम्राट!‘
‘वे हिन्दू हैं?‘ साश्चर्य जार्ज पंचम ने पूछा ।
‘जी हॉं सम्राट , वे हिंदू हैं ‘ लेकिन वे उनके मंदिरों में नहीं जा सकते, उनके तालाब, कुओं आदि से पानी नहीं भर सकते , उनकी किसी चीजो को नहीं छू सकते ‘ भीमराव अम्बेडकर ने धीरे – धीरे बताया ।
‘क्यों ?‘ जार्ज पंचम का मुहॅ खुला रह गया ।
क्योकि वे अछूत हैं ……….. मैं भी उनमें से एक हूँ – भीमराव अम्बेडकर ने कहा ।
‘आप तो विद्वान है…. आपका यहॉ बहुत नाम हुआ है । हमारे लोगों ने आपको डाक्टर अम्बेडकर, बहुत पसंद किया है । फिर भी….!‘ जार्ज पंचम आगे कहते -कहते रूक गए । वे सोचने लगे ।
मैं भी अछूतों मे से हूँ । आपकी सरकार कुछ करे , उनको भी जीने का हक मिले , यह प्रार्थना लेकर मैं आया हॅू ।‘ भीमराव अम्बेडकर ने भारी स्वर में कहा ।
‘श्योर…..श्योर…..डाक्टर……अम्बेडकर !‘ जार्ज पंचम ने सहानुभूतिपूर्ण स्वर में कहा और फिर वे अन्य अतिथियों से घिर गए ।

लेखक

कुशाल चन्द्र रैगर, एडवोकेट

संस्थापक अध्यक्ष, रैगर जटिया समाज सेवा संस्था, पाली राज।

डॉ भीमराव आंबेडकर ने अपनी पी. एच. डी. की थीसिस में बताया था कि कैसे अचानक ही भारत के रूपये का मूल्य एकदम गिर गया था और आज तक वह उठ नहीं पाया। क्या थी तब की और आज की समस्या? पढ़ें पूरा लेख।…निखिल सबलानिया

rupya rupees“डॉ भीमराव आंबेडकर ने
बताई थी रूपये की समस्या और अब समस्या है कि…”

“डॉ भीमराव आंबेडकर ने अपनी पी. एच. डी. की थीसिस में बताया था कि कैसे अचानक ही भारत के रूपये का मूल्य
एकदम गिर गया था और आज तक वह उठ नहीं पाया। क्या थी तब की और आज की समस्या? पढ़ें पूरा लेख।”

डॉ भीमराव आंबेडकर जैसे विद्यावान लोग विश्व में विरले ही होते हैं। एक तरफ उन्होंने भारत का संविधान लिखा और दूसरी
तरफ वह एक महान अर्थशास्त्री भी थे। अपने विद्यार्थी काल में ही उन्होंने अपनी पी. एच. डी. की थीसिस में रूपये की समस्या के बारे में लिख कर तब की ब्रिटिश सरकार को हैरान कर दिया था। उनकी वह थीसिस उत्तम दर्जे का अर्थशास्त्र का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। अफ़सोस कि भारत में उसे बहुत कम लोगों ने पढ़ा है, अन्यथा उसे भारत की एक मत्वपूर्ण कृति माना जाता। परन्तु उन्होंने जो लिखा था उस पर विदेशों में शोध हुआ और अमेरिका जैसे उन्नत राष्ट्र के लोगों को वह सब बातें बाद में समझ में आई जो कि उन्होंने आज से लगभग सौ साल पहले लिखी थी। पर अफ़सोस कि भारत के लोग अभी तक उन तथ्यों को नहीं समझे हैं और उन्हें स्कूल अथवा कालेजों में पढ़ाया भी नहीं जाता।

संक्षिप्त में डॉ आंबेडकर ने यह बताया है कि किस प्रकार मुद्रा का मान अचानक ही स्वर्णमान पर आधारित कर दिया गया
अर्थात एक देश उतनी ही मुद्रा निकाल सकता है जितना कि उसके पास सोना हो। उस समय तक भारत एवं चीन समेत अनेक
राष्ट्र चांदी के मान पर चलते थे। उस समय सोने और चांदी का मूल्य लगभग सामान था। अचानक एक ऐसी धातु को मुद्रा का
मान बना दिया गया जो कि अल्प मात्रा में थी। ऐसा अमरीका के दबाव में किया गया था क्योंकि उसके पास तब अच्छे स्वर्ण भण्डार थे। परन्तु भारत के पास स्वर्ण प्रचुर मात्रा में नहीं था। और साथ ही अमरीका, ब्रिटेन, फ़्रांस आदि आज के विकसित कहलाने वाले यूरोपियन देशों ने यह शर्त भी लगा दी कि व्यापार का भुगतान वे स्वयं चांदी से करेंगे परन्तु खुद सोना लेंगे। इसके लिए भारत को अपनी चांदी बेच कर भुगतान के लिए सोना प्राप्त करना पड़ता था जिससे कि उन देशों को भुगतान किया जा सके। ऐसे न सिर्फ पहले से ही अल्प मात्रा में स्वर्ण
और कम हुआ और साथ ही भुगतान के लिए सोना खरीदने से चांदी भी कम हो गई। फिर स्थिति यह आई कि सोना न होने से देश की मुद्रा का मूल्य निरंतर घटता गया। आप इसे विस्तार से डॉ आंबेडकर की थीसिस में पढ़ सकते हैं।

तो यह तो थी कल की बात और आज तक रूपये का मूल्य डॉलर और यूरोपीय व ऑस्ट्रेलिआई आदि मुद्राओं के मुकाबले उठ नहीं पाया है और निरंतर घटता ही जा रहा है। आखिर क्या कारण है कि हमारी मुद्रा का भाव इतना नीचे है? आईए समझते हैं।

ज़रा इन प्रश्नों के उत्तर मन में दीजिए :

“किसी भी देश की मुद्रा क्या है?”

“कौन है जो मुद्रा को समाज में लेनदेन का साधन बनाता है?”

“कैसे इस मुद्रा का मूल्य बढ़ता या चढ़ता है?”

यूँ तो इन प्रश्नों के उत्तर देने के लिए अर्थशास्त्र की बहुत सी जटिलताओं से रूबरू होना पड़ेगा, फिर भी इनको संक्षिप्त में और सरलता से इस प्रकार समझें।

मुद्रा एक साधन है (एक ऐसी चीज़ है) जिससे सम्पत्तियों का हस्तांतरण (ट्रांसफर) होता है, अर्थात सम्पति एक हाथ से उस
हाथ में चली जाती है जो मुद्रा देता है।
“मुद्रा को साधन वह बनाते हैं जिनके पास पहले से संपत्ति प्रचुर मात्रा में होती है या उनका एकाधिकार होता है।” जैसे कि राजा या देश की सरकारें। पहले के समय में राजा और बड़े व्यापारी भी अपनी मुद्रा निकालते थे। अब यह देशों तक ही लगभग सिमित है। संविधान द्वारा ऐसे कानूनों का निर्माण
किया जाता है जिनके द्वारा सरकार का एकछत्र अधिकार बन जाता है। परन्तु सरकार और कोई नहीं बल्कि लोगों का एक
समूह है जैसे आज के सांसद और विधायक। यह समूह अपने कार्यों को कर्मचारियों द्वारा करवाते हैं जिसमे सेना से लेकर स्कूलों
तक के कर्मचारी शामिल होते हैं। यह सब देश के सब संसाधनों पर पहले कब्जा करते हैं और फिर एक व्यापारी समूह के साथ मिलकर उन संसाधनों से उत्पादन करवाते हैं अथवा उन्हें सीधे बेचते हैं जैसे ज़मीन। अपने कर्मचारियों को सरकार निम्नतम वेतन देती है। और इसे सरकारी नौकरियों का नाम दिया जाता है जिसका कि अभाव होता है। दूसरी तरफ होते हैं वह बड़े उत्पादक जो
संसाधनों को वस्तुओं में बदलते हैं। यह वेतन इस पर निर्धारित करते हैं कि श्रमिक की उपलब्धता कितनी है। चूँकि एक महँगी
शिक्षा वाला श्रमिक जैसे डॉक्टर या इंजीनियर बनना सबके बस की बात नहीं, इनका अभाव होने से इन्हें वेतन सरकारी
कर्मचारियों के बराबर अथवा उनसे थोड़ा ज्यादा मिल जाता है। जब विदेशी कंपनियों में लोग जाते हैं तो उस कंपनी के वयवसाय और देश के आधार पर यह वेतन होता है। परन्तु जो श्रमिक महँगी शिक्षा का खर्च नहीं उठा पाते उनका वेतन सरकार में दिए जानेवाले वेतन से भी कम रह जाता है। बड़े उत्पादक जैसे-जैसे लोगों तक अपनी वस्तुएं पहुंचाते हैं इससे निजी क्षेत्र बढ़ता है जिसमें अब विक्रेता और कुछ सेवाएं देनेवाले रह जाते हैं जैसे कि ट्रांसपोर्टर। उत्पादक विक्रेताओं को बड़ा हिस्सा देते हैं जिससे कि यह वर्ग बिक्री के कार्य से चिपका रहे। यह बिक्रेता और भी कम वेतन देते हैं और इनके द्वारा अर्जित मुद्रा के अधिकांश भाग में से कम-से-कम वेतन ही श्रमिकों तक पहुँच
पाता है। अब रह गए वह जो मात्र शारीरिक श्रम पर ही आश्रित हैं, तो उनके पास तो मुद्रा का कम-से-कम हिस्सा ही पहुंचता है
क्योंकि उनके पास उतने संसाधन ही नहीं होते जिससे कि वह मुद्रा का अधिक हिस्सा कम श्रम किए बिना अपने तक मोड़
पाएं। “मुद्रा की इस सारी प्रक्रिया को बैंकों द्वारा संचालित किया जाता है।” बैंक बड़े उत्पादकों को मोटे-मोटे लोन कम ब्याज पर देते हैं, वहीं माध्यम वर्ग को छोटे-से-छोटा
लोन बड़ी ब्याज दर पर देते हैं, और गरीब को तो विरले ही लोन देते हैं। असल में बैंक और सरकारें यह बात जानती हैं कि धन के
द्वारा संपत्ति का निर्माण किया जा सकता है, और यदि अधिक लोग इस काम में निपुण होकर संपत्ति का निर्माण कर लेंगे तो वे मौजूदा उत्पादकों और सरकार के लिए सस्ते में उपलब्ध कैसे होंगे? मौजूदा परिस्थिति में नए आविष्कार जो कि मानव के जीवन को सरल बना सकते हैं, उन्हें साकार रूप देना केवल बड़े उत्पादकों और सरकार (नेताओं के समूह) के पास ही होता है और
वह उनको तब तक अंजाम नहीं देते जब तक कि उन्हें उसमें अधिक शोषण की संभावना नज़र नहीं आती, अथवा उनके पास और कोई दूसरा विकल्प नहीं रह जाता। जैसे बिजली से चलनेवाली कार
का निर्माण अस्सी वर्षों पूर्व हो चुका था और उसमें सुधार करके आज तक उसे मुख्य वाहन नहीं बनाया गया और पेट्रोल व
डीज़ल के इंजनों का ही प्रयोग वाहनों में किया जाता है क्योंकि सरकार और उत्पादक तब ही यह जान गए थे कि बिजली
के इंजन से वह लोगों का वह शोषण नहीं कर पाएंगे जो कि तेल बेच कर किया जा सकता है। ठीक वैसे ही जैसा कि अमरीका ने मुद्रा के मान को स्वर्णमान बनाते हुए सोचा होगा।

“अब महत्वपूर्ण बात यह है कि इस मुद्रा का भाव कैसे बढ़ता या चढ़ता है?” इसका उत्तर सरल है कि आपके पास कुछ ऐसा होना चाहिए जो कि लोगों की आवश्यकता हो। आप उन्हें दें और बदले में वे आपको कुछ दें। भारत के रूपये का मूल्य भले ही
विकसित देशों की मुद्रा के मुकाबले बहुत कम है, पर भारत के भीतर इसका महत्त्व बहुत है। क्योंकि भीतर यह विरला है। यह है
सरकार, उत्पादकों, विक्रेताओं और बैंकों के पास। शेष वर्ग चाहे वह सरकारी कर्मचारी हो या साधारण श्रमिक, वह रूपये के
लिए जूझता है। वह जूझ रहा है क्योंकि उसे यह मिल नहीं रहा। उसे यह मिल नहीं रहा क्योंकि यह एक चौकड़ी (सरकार, उत्पादकों,
विक्रेताओं और बैंकों) में अधिक घूम रहा है और उन्हें श्रम देने देने लिए ही थोड़ा बहुत दिया जाता है। आप इस चौकड़ी के हाथों
से सारी मुद्रा निकाल लीजिए। तब इसके पास क्या रह जाता है? यह चौकड़ी मुद्रा को तुरंत असंवैधानिक घोषित कर देगी।
अर्थात वस्तुएं लेने के साधन का अब कोई मूल्य नहीं रह जाएगा। रुपया कागज़ का टुकड़ा मात्र रह जाएगा। लोगों को बाध्य
करने के लिए सरकार सेना से कहेगी। पर सेना सरकार की इस मामले में मदद करने से मना कर देती है और अपनी जरूरतों को सीधे अपने परिवार से पूरी कर देती है और सुरक्षा उपकरण किसी और राष्ट्र से कुछ वस्तुएं दे कर ले लेती है। तब यह चौड़ी क्या करेगी? किसी विदेशी राष्ट्र से हाथ मिला कर अपने ही राष्ट्र पर आक्रमण करवा दे? मान लेते हैं कि यह भी नहीं हो पाया। तो इस
चौकड़ी के पास क्या रह जाएगा? लोग अपने कार्य करते रहेंगे, बस मुद्रा के स्थान पर किसी वास्तु से अदला-बदली करेंगे। ऐसे में
ऐतिहासिक पहिंया पीछे में घूम सकता है और चंद शक्तिशाली लोग छोटे राजा और फिर बड़े राजा बन कर अपना आधिपत्य एक बड़े भूभाग पर कर सकते हैं। परन्तु यह भी उसी स्थिति में संभव है जब लोग सेना बनाने के लिए तैयार हो जाएं। परन्तु यदि लोग सेना निर्माण से भी मना कर देते हैं, तब क्या होगा? तब शायद रूपये के लिए काम करने की जरुरत नहीं होगी और अपनी जरूरतों को पूरा करने के बाद लोग विज्ञान और कला की और अधिक अग्रसर होंगे। ऐसे में नए अविष्कारों की संभावना भी अधिक होगी और जीवन अधिक सरल होगा क्योंकि अविष्कारों का उपयोग शोषण नहीं बल्कि सबकी सुविधा के लिए किया जाएगा।

मैंने प्रश्न शुरू किया था कि “मुद्रा भाव कैसे बढ़ता या चढ़ता है?” ऊपर लिखी बाते इस प्रश्न का उत्तर सरलता से देती है। ऊपर की स्थिति को अंत से शुरू कीजिए और मानिए कि लोगों के बीच एक ऐसी चीज़ घुसा दी जाए जिसके लिए उन्हें इतना संघर्ष करना पड़े कि उनका सरलता से जीवन यापन करना भी नामुमकिन हो जाए। परन्तु उस चीज़ के घुसाने तक संपत्ति पर लोगों का ही अधिकार है। परन्तु अब वह अपनी संपत्ति अथवा श्रम का आदान-प्रदान वैसे नहीं कर सकते जैसे कि पहले करते थे। अब उन्हें इसे उस चीज़ के आधार पर अपने सारे लेनदेन करने होंगे। और मान लीजिए कि यह चीज़ चंद लोगों के नियंत्रण में हो, जैसे कि हमारी ऊपर बताई चौकड़ी। तो सीधे-सीधे न केवल लोग, बल्कि उनके द्वारा किए गए आविष्कार भी उस चौकड़ी के पास चले जाते हैं। लोगों को वह चीज़ चाहिए होगी और उसके लिए वह अपनी सम्पति उसे देंगे जिसके पास वह चीज़ है। जैसे आज से सौ साल पहले तक सैंकड़ों एकड़ ज़मीन किसानों ने इसलिए चंद रुपयों में बेच दी क्योंकि सरकार द्वारा निकाले गए रूपये उनके पास नहीं थे। इस प्रकार लोग संपत्ति विहीन हो जाएंगे और फिर उन्हें श्रम देना पड़ेगा। किस प्रकार का श्रम होगा, यह वह चौकड़ी निर्धारित करेगी और उसी प्रकार उसे सिखाने की संस्थाएं
खोलेंगी। कुछ श्रमों को दुर्लभ बना कर महँगा कर दिया जाएगा ताकि अधिक लोग वह पर्याप्त न कर सके जिससे कि मानव श्रम उस चीज़ की काम-से-काम मात्रा में उसे मिल जाए जिसके पास वह चीज़ है। और वह चीज़ है मुद्रा (रुपया)।

तो मुद्रा का भाव तब बढ़ेगा जब लोगों के पास कम-से-कम संपत्ति होगी। इसलिए भारत में कम रूपये में भी श्रमिक मिलते हैं
क्योंकि उनके पास काम-से-काम संपत्ति है। परन्तु यदि भारत की तुलना विकसित देशों से की जाए तो उसकी मुद्रा का मूल्य घट जाता है। क्योंकि उसके पास उन देशों की तुलना में कम संपत्ति है। भारत में कम संपत्ति है तो अमरीकी डॉलर का भाव
ज्यादा है। अर्थात विकसित देशों के पास अधिक सम्पति है अथवा वे निरंतर आपकी संपत्ति को लेकर आपसे अधिक संपत्तिवान बन रहे हैं, जैसे भारत के भीतर हमारी बताई चौकड़ी अधिक संपत्तिवान बन रही है। विकसित देशों की संपत्ति है “सूचना और आविष्कार।” विकसित देश सूचना को संचित करके उसके आधार पर नए-नए आविष्कार करते हैं। उन अविष्कारों से वह
नई वस्तुएं बनाते हैं अथवा काम करनेवाले पुराने तरीकों को बदल देते हैं और उन्हें अधिक सरल बनाते है। इससे वहाँ की अधिकांश जनता के पास अतिरिक्त समय होता है और वह आधुनिक एवं रचनात्मक कार्यों में लगती है। इसलिए श्रम पर आधारित कार्य वें भारत जैसे देशों को देते हैं, जैसे वस्त्र निर्माण आदि। और हमें अपनी दुर्लभ वस्तुएं जैसे मशीनें दे कर हमारी उस कमाई को भी ले लेते हैं।

तो भारत में रूपये की कीमत अधिक है (अर्थात इसका महत्व अधिक है) क्योंकि यहाँ के लोगों के पास सम्पत्ति नहीं है। जब
ज़मीन संपत्ति थी तब यह चंद हाथों में थी। अब आधुनिक उपकरणों की संपत्ति है तो वह किसी और की है और उसकी कीमत बहुत ऊँची है। लोगों के पास वह ताकत नहीं है जिससे कि वह अविष्कारों को साकार रूप देकर उन्हें सर्वसुलभ कर (सबको सुलभ करवा) सकें। लोगों के पास वह ताकत नहीं है कि वह उत्तम शिक्षा सर्वसुलभ कर सकें। अर्थात सूचना और अविष्कारों पर चौकड़ी (सरकार, उत्पादक, विक्रेता और बैंकों) का अधिपत्य है। ऐसे ही विकसित देशों का उनकी सूचाना और अविष्कारों पर अधिपत्य है और वह उन्हें भारत जैसे देशों को उपलब्ध नहीं करते। “सो भारत को यदि अपने रूपये की कीमत विकसित देशों की
मुद्रा के मुकाबले ऊपर उठानी है तो उसे भारत के भीतर रूपये की कीमत गिरानी पड़ेगी।” अर्थात लोगों की रूपये पर
निर्भरता समाप्त करनी होगी। उन्हें जीवनयापन करने के साधन सुलभ करवा कर सूचना को सही प्रकार बांटना पड़ेगा। तभी
अधिकांश्तर लोग कला एवं विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ेंगे और
हम नए अविष्कारों को कर पाएंगे। फिर उन अविष्कारों से शोषण करने की जगह उन्हें सबका जीवन सरल बनाने के लिए प्रयास में लाने लायक बनाना पड़ेगा। इस प्रकार एक नए मानव का विकास करना पड़ेगा जो जापान जैसे डिजिटल उपकरणों अथवा जर्मनी जैसी मशीनरी का निर्माता हो। इस प्रकार ही भारत अपनी वह शोभा प्राप्त कर पाएगा जिसके बारे में डॉ आंबेडकर ने अपनी थीसिस में लिखा था।

इस लेख को लिखने में मैं दो विद्वानों के कारण सक्षम हो पाया और मैं उन दोनों का धन्यवाद करता हूँ। एक डॉ भीमराव
आंबेडकर, जिनकी थीसिस पढ़ कर मेरी अर्थशास्त्र की समझ बनानी शुरू हुई और दूसरे अमरीकी अर्थशास्त्री रॉबर्ट कियोसकी, जिनकी पुस्तकें पढ़ कर, और उनके ऑडियो
प्रोग्राम सुन कर मेरी अर्थशास्त्र की समझ बढ़ी। – nikhil sablaniya

 

 

 

 

निखिल सबलानिया

हाल ही में डॉ एम. एल. परिहार ने तीन पुस्तकें लिखी है जो कि सम्पति एवं सूचना से सम्बंधित हैं। यह हैं : 1. दलितों बिजनेस
की और बढ़ो, 2. दलित कौड़ी से करोड़पति और 3. दलितों को अनपढ़ रखने की साजिश। यदि आप यह तीन पुस्तकें प्राप्त
करना चाहे तो संपर्क करें। इनका डाक सहित मूल्य है रु 430. अमरीकी अर्थशास्त्री रॉबर्ट कियोसकी की “व्यवसाय और
निवेश सीखनेवाली” हिंदी में अनुवादित सात पुस्तकें भी उपलब्ध हैं : 1. रिच डेड पुअर डेड (आमिर पिता गरीब पिता), 2. धनी बनो, खुश रहो , 3. केशफ्लो क्वाड्रैण्ट (कैसे धन बनाना सीखें), 4. रिटायर यांग रिटायर रिच (कम उम्र में कैसे सम्पति निर्माण करें), 5. हम आपको अमीर क्यों बनाना चाहते हैं, 6. 21वीं सदी का व्यवसाय और 7. बिज़नेस स्कूल (सभी सरल हिंदी में हैं जिन्हें कोई भी समझ सकता है) जिनका डाक सहित मूल्य है रु 2000. इन्हें प्राप्त करने के लिए संपर्क है: मोबाईल: 8527533051 , लैंडलाईन: 01123744243, वॉट्सऐप: 9910538943 , ईमेल: sablanian@gmail.com

02 JUNE 2015 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- “जिस कौम का नेता नहीं उस कौम का कुछ होता नहीं, नेता के बिना जनता अनाथ होती है|आज आप छत्रपति साहू जी महाराज की बात “सदियों बाद आज डॉ आंबेडकर के रूप में पिछड़े बहुजनों को अपना नेता मिल गया है” का मतलब समझ सकते हैं और ये भी समझ सकते हैं की नेता मिल जाना मतलब क्या होता है| …समयबुद्धा

ambedkar rajnitikanshiram ashokaजिस कौम का नेता नहीं उस कौम का कुछ होता नहीं, नेता के बिना जनता अनाथ होती है, और जनसमर्थन के बिना नेता कुछ नहीं|

भारत ही नहीं समस्त विश्व की जनता किसी न किसी प्रकार के जन समूहों में बंटी है, और सब अपने अपने समूह के लिए संगर्ष शील रहते हैं| इन्हीं समूहों को कौम कहते हैं|उदाहरण के लिए इस्लाम में सिया सुन्नी , ईसाईयों में ऑर्थोडॉक्स और कंसर्व आदि, हाँ ये और बात है की इन समूहों में भारत की जाती व्यस्था जैसे भयानक गलाकाट नफरत और आसनशीलता नहीं है, आपस में जी लेते हैं|भारत में ये जन समूह का ये बटवारा सबसे भयानक और क्रूर है, यहाँ दोहरा बटवारा है पहले वर्ण के आधार पर और दूसरा जाती के आधार पर, भारत में जाती से बढ़कर कोई सच्चाई नहीं| जाती के लिए कहावत मसहूर है “जाती जो कभी नहीं जाती” |

ब्राह्मणवाद की जीत में जातिवाद का बहुत बड़ा योगदान हैं, फूट डालो और शाशन करो का इससे बेजोड़ और जबरदस्त उदहारण दुनिया में कहीं और नहीं मिलता| जाती को बनाये रखने के लिए ब्राह्मणवादी लोग अंतर्जातीय विवाह और अंतर्जातीय  प्रतिभोज पर राजनैतिक व् धार्मिक अंकुश द्वारा रोक बनाये रखते हैं, इस कारन जातियां खत्म नहीं होतीं| ये ठीक इस तरह है जैसे सेना में कई प्रकार की बटालियन होती है और अगर कोई बटालियन विद्रोह कर दे तो दूसरी बटालियन उसके सामने खड़ी कर दी जाती है, उदाहरण के लिए अगर जाट रेजिमेंट विद्रोह करे तो गोरखा रेजिमेंट उस विद्रोह को रोकेगी, मतलब अपने ही देश का आदमी अपने ही देश के आदमी को मारेगा | इसी तरह जाती का हिसाब होता है, एक जाती विद्रोह करती है तो दूसरी जाती ब्राह्मणवादी शाशन को बचाने को आ जाती है| इस तरह जाती व्यस्था ब्राह्मणवाद के शाशन को बरक़रार रखने का सर्वोत्तम साधन है|जो जातियां ब्राह्मणवादी शाशन के पक्ष में रहती हैं उनके लिए संगर्ष करती हैं उनकी दशा तो ठीक है पर जो जातियां विरोध में रहतीं हैं उनकी दशा बहुत बुरी हैं|इस चर्चा से हम समझ सकते हैं की भाषणों में कुछ भी कहा जाये पर जाती ही सबसे बड़ा सत्य है | अगर कोई जाती से हटकर कोई बात करता है तो वो केवल कहने सुनने वाली कोरी किताबी बातें साबित होतीं हैं|

हालाँकि कौम बहुत ही ज्यादा अमानवीय और मानवता विरोधी चीज़ है पर सामूहिक बटवारा या कौम राजनीती की सबसे बड़ी जरूरत होती है, और जब तक राजनीती होगी सामूहिक बटवारा जारी रहेगा, राजा कोई भी बन जाये, धर्म कोई भी आ जाये| इसका मतलब ये निकला की हमें जो भी रणनीति बनानी है उसमे इस बात का ख्याल रहना होगा की कौम एक जमीनी सच्चाई है जिको मने बिना हार निश्चित है| अब हमारे पास ये विकल्प है की हम समानता और मानवता की दुहाई देकर शोषित होते रहें या संगर्षशील लोगों का समूह बनाकर संघर्ष करें| ध्यान रहे “चार सौ रण छोड़ों से चार साथ निभाने वाले सूरमा जीत जाते हैं ” |

मुझे बहुत बुरा लग रहा है की मैं कौम पर बात कर रहा हूँ पर अगर हम घाव पर ध्यान न दें और उसे ढककर सब ठीक है सब ठीक है बोलते रहेंगे तो घाव एक दिन मौत का कारन बन जायेगा|राष्ट्रकवि इकबाल ने कहाँ था “जिंदगी है कौम की तू कौम पे लुटाए जा , कदम कदम बढ़ाये जा…. हमें कौम को ध्यान रखना होगा| जब भी हम सत्ता में होंगे तब कौमों के बीच में कटुता खत्म करनी होगी आपस में रोटी बेटी का सम्बन्ध बनाने पर जोर देना होगा|

पहला पॉइंट आप समझ गए होंगे की कौम से बढ़कर कोई सच्चाई नहीं, अब सवाल उठता है की कुछ कौमे सक्षम और समृद्ध हैं पर कुछ कौमे फटेहाल है, ऐसा क्यों? इसके कई कारन होते हैं जैसे

– ध्यान न देना

– कौम का अपना नाम और पहचान न होना या इस बात ज्ञान न होना

– कौम का अपना इतिहास और महापुरुष न होना या उनका ज्ञान न होना

– वर्तमान शाशन में विलय करके उनके हिसाब से अपनी पहचान खो देना

– राजनैतिक जागरूकता व् महत्वाकांक्षा न होना

– कुछ कौमों ने ब्राह्मणवादी शाशन स्वीकार किया कुछ ने नहीं

जो भी कारन हो सभी कारणों का सीधा सम्बन्ध जनता और उसके नेता पर निर्भर करता है, किसी भी कौम का नेता ही उस कौम के वर्तमान और भविष्ये यहाँ तक की इतिहास को भी सही दिशा दे पता है| जिस कौम का नेता नहीं उस कौम का कुछ होता नहीं, नेता के बिना जनता अनाथ होती है, और जनसमर्थन के बिना नेता कुछ नहीं| नेता क्या है वो भी हमारी तरह एक हाड़ मांड का आदमी है, कोई सुपरमैन नहीं  पर वो ताकतवर कैसे होता है? वो जनता के समर्थन की वजह से ताकतवर होता है, हाँ वो नीति के देव पेच जनता है जिससे जनता का उसमे विश्वास होता है की ये हमारी लड़ाई जितवा सकता है| ऐसे समझो की जैसे तीस करोड़ बौद्ध  का एक नेता हो और हर बौद्ध एक दिन में एक रुपया दें तो उसके पास हर दिन तीस करोड़ रुपये आएंगे, इतना पैसों में वो जिसकी चाहे जैसे चाहे मदत कर सकता है, ठीक इसी तरह उसकी ताकत में तीस  करोड़ लोगों की थोड़ी थोड़ी ताकत शामिल होकर कितनी ताकत बनती  है|

भारत में डॉ आंबेडकर के आपने से पहले अपनी पहचान खो चुकी भारत की मूलनिवासी जनता ब्राह्मणवादी शाशन की दी हुई पहचान जैसे जाती और वर्ण, उन्हीं के दिए हुए झंडे जैसे धर्म देवी देवता आदि के सहारे सदियों से शोषित हो रहे थे| फिर डॉ आंबेडकर आये और इन लोगों को नेता मिल गए, जब नेता मिला तो कौम को नाम मिला, अपना झंडा मिला अपना इतिहास और आज़ादी पानी ली ललक जगी, खुद को ब्राह्मणवादी गुलामी से अलग एक इंसान की तरह देखने समझने लगे, राजनैतिक गलियारों जहाँ जनता की किस्मत का फैसला होता है, वहां पहुंच बनी|आज आप छत्रपति साहू जी महाराज की बात “सदियों बाद आज डॉ आंबेडकर के रूप में पिछड़े बहुजनों को अपना नेता मिल गया है”  का मतलब समझ सकते हैं और ये भी समझ सकते हैं की नेता मिल जाना मतलब क्या होता है|

आज अलग अलग रास्तों से ही सही पर सभी अपने अंतिम एकछत्र झंडे बौद्ध धम्म तक पहुंच रहे हैं| इस से हमारा जनबल साबित हो रहा है और राजनीतिक रूप से हमारी गिनती होने लगी है| परिणाम हमारे लोगों का जीवन स्तर सुधरा है और लगातार सुधार राह है, निकम्मों को छोड़कर जो भी संगर्ष कर रहा है आज वो पा रहा है| उम्मीद है की मूलनिवासी एक दिन पूर्ण स्वराज भी पा लेंगे|

कौम और नेता की अहमियत को ब्राह्मणवादी  सदियों से समझते हैं, बिना नेता के कभी नहीं रहते चाहे वो जिन्दा हो या मारा| इनका एक मसहूर श्लोक है

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” यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याहम।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम।धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥”  (गीता अध्याय ४ श्लोक ७ तथा ८)

(अर्थात – जब धरती पर स्थापित धर्म की हानि हो जाती है और उसके स्थान पर अधर्म और गंदी शक्तिया हावी हो जाती है तो मैं अवतार लेकर धरा पर उतर आता हूँ। मैं हर युग में अधर्म द्वारा धर्म को पहुँचाई गई हानि को दूर करने और साधु-संतों की रक्षा के लिए अवतार लेता हूँ। इस प्रकार मैं धर्म की फिर से स्थपना के साथ ही राक्षसों सरीखे दुष्टों को तहस- नहस कर देता हूँ।मतलब जब भी इनपर मुसीबतें आएँगी इनका नेता जन्मेगा जो इनको मुक्ति दिलाएगा, मतलब सरक्षक इनको भी चाहिए| समझदार लोग समझते हैं की ईश्वर, देवी, देवता आदि कौमी सरक्षक से ज्यादा कुछ नहीं, हाँ भक्त और श्रद्धालु इस बात को नहीं समझ पाएंगे|

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बाबा साहब के बाद आये साहव कांशीराम, जिस जाती ले लोगों को वोट तक नहीं डालने दिया जाता है उस जाती का राजा बना दिया| ये कैसे हुआ,ध्यान रहे ये तभी हुआ जब इस कौम को सही नेता मिला, नेता ने भी काम किया और जनता ने भी समर्थन किया| नेता के बिना जनता अनाथ है और जनता के बिना नेता अनाथ है|इस बात को आप ऐसे समझो की चमार जाती ने डॉ आंबेडकर को अपना नेता माना मार्गदर्शक माना, मतलब इनको नेता मिला, फिर आये साहब कांशीराम तब इनको राजनैतिक शक्ति मिली| देश की जितनी भी राजनैतिक पार्टियां हैं उन सभी को बड़े बड़े सेठों और पूंजीपतियों से आर्थिक मदत मिलती है पर साहब कांशीराम  जिनको जातिवाद के चलते कोई समर्थन को तैयार नहीं था, उनको जनता ने पांच पांच रुपये का चंदा देकर राजनैतिक सफलता प्रदान की|

कुछ मंद बुद्धि लोग पूछते हैं की उनको क्या मिला, भाई मिलता उसी को है जो संगर्ष करता है, ये एक सामूहिक उपलब्धि थी जो सामूहिक रूप से ही मिलेगी, बिना संगर्ष किये कोई तुम्हारे घर नहीं भर देगा| जिस देश में बौद्ध शाशन के पतन बाद दो हज़ार साल तक कभी कोई मूलनिवासी राजा न बना हो वहां राजा बनाने से एक इतिहास रच गए, अब सवर्ण जनता में एक मौन स्वीकृति है की भारत के मूलनिवासी भी राजा बन सकते हैं” मतलब राजा बनने का रास्ता खुल गया, कौम का सम्मान बढ़ा है, सामाजिक स्वीकृति बढ़ी है, आर्थिक समृद्धि आई है, और भविष्ये के लिए हमारे संगर्ष को बहुत बल मिला है|

यहाँ गौर करने वाली बात ये है की जिन जिन कौमों को नेता मिल गए उनकी तरक्की हो गयी  जैसे यादवों को लालू और मुलायम मिले जाटवों को साहब कांशीराम मिले, और जिन जातियों में अपने नेता नहीं पैदा किया और ब्राह्मणवाद को ही अपने सरक्षक के रूप में स्वीकारा उनकी तरक्की तुलनात्मक रूप से बहुत कम हुई| उदारण के लिए अन्ये शूद्र कौमे जैसे धोबी,धानुक,भंगी,नाइ आदि ने अपने नेता पैदा नहीं किया और अगर किये भी तो उनका अपना कोई इतिहस या विचारधारा नहीं है वो ब्राह्मणवाद को भी अपनी गति मानते हैं| ऐसा नहीं है की इन जैसे छह हज़ार शूद्र जश्न का इतिहास और विचारधारा नहीं है पर ये ध्यान न देने के कारन हैं क्योंकि ये लोग डॉ आंबेडकर  और बुद्ध तक आना ही नहीं चाहते, परिणाम वहीँ के वहीँ पड़े हैं| खेर जब बौद्ध लोग शाशन संभालेंगे तो इनको भी जगा लिया जायेगा|बहरहाल मुद्दे की बात ये है की जिन कौमों का अपना वजूद और नेता होते हैं वो ज्यादा तरक्की करीं हैं बजाये उनके जो जिनके नहीं होते|

नेता या जनप्रतिनिधि सेना पति की तरह होता है, सेना चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो अगर सेनापति को मार दो तो सेना की हार तय होती है, नेता किसी भी कौम का सेनापति होता है, इसलिए नेता की रक्षा अपनी कौम की रक्षा होती है|नेता जनता का प्रतिनिधि होता है राजदरबार में, जहाँ जनता की किस्मत का फैसला होता है जहाँ से उनके लिए कानून बनते हैं|मंदबुद्धि लोग कहते हैं की हमारी अपनी जात के नेता ने क्या किया अपनी तिजोरी भरी हमें क्या मिला| ठीक है माना तुमको कुछ नहीं मिला पर तुम्हारा आदमी पार्लियामेंट में तो बैठा था कानून बनाने में उसका भी वोट था| अगर आपका प्रतिनिधि पार्लियामेंट में नहीं होगा तो विरोधी आपके विरोध में कानून बनाएंगे और तब आप क्या करेंगे| रही बात तुमको मिलने की तो ध्यम रहे तुमको उतना ही मिलेगा जितने की क्षमता तुम अपने अंदर विकसित कर लोगे| उदाहरण के लिए फर्ज कीजिये कोई आपका राजा बना जो किसी रोड बनाने का ठेका अपने आदमी को देना चाहता है पर अपना आदमी भी तो ठेकेदार होना चाहिए उसके पास भी तो कमलियत मशीनरी और लाइसेंस होना चाहिए, अगर नहीं है तो मजबूरन किसी और को देना पड़ेगा, हाँ इतना किया जा सकता है की ठेकेदार बनने की क़ाबलियत लेने की व्यस्था की जा सकती है| हमारी कौम की यही एक बड़ी कमी है की सब संगर्ष नहीं करते जो भी संगर्ष करता है सब जिम्मेदारी उसी को सौप कर खुद उस पर सवार हो जाना चाहते हैं| खेर धीरे धीरे सद्बुद्धि आ रही है|

अब सवाल ये उठता है की कौमी प्रतिनिधि क्यों चाहिए ? हम खुद तय करेंगे हमारे नेता? जवाब आसान है अगर लोग खुद तय कर पाते, भला बुरा समझ पाते तो मीडिया के प्रचार में अंधे होकर अपना कीमती वोट अपनी विरोधियों का न दे देते| प्रतिनिधि ऐसा होना चाहिए जो तय कर पाये कौम के लिए क्या सही है क्या गलत है| जनता तो भोली है पहले की तरह अब भी ब्राह्मणवादियों के बहकावे में आ जाती है| तो नेता का काम ये भी होता है की जनता को सही रस्ते ले जाना वार्ना जनता अपने पैर पर खुद ही कुल्हाड़ी मार लेगी|

बाबा साहब के बाद साहब कांशीराम आये अब हमें इंतज़ार है अपने अगले नेता का, काश जल्दी ही मिल जाए|