डा बी.आर. अम्बेडकर की 22 प्रतिज्ञा जो उन्होंने 1956 में बौद्ध धम्म पर “वापस लौटते” वक्त दिलाई

डा बी.आर. अम्बेडकर ने  बौद्ध धर्मं में “वापस लौटने” के अवसर पर,15 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं.उन्होंने इन शपथों को निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके.ये 22 प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं.  प्रसिद्ध 22 प्रतिज्ञाएँ निम्न हैं:

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  1. मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा
  2. मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा
  3. मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा.
  4. मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता हूँ
  5. मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूँ
  6. मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंड-दान दूँगा.
  7. मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन करने वाले तरीके से कार्य नहीं करूँगा
  8. मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा
  9. मैं मनुष्य की समानता में विश्वास करता हूँ
  10. मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूँगा
  11. मैं बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग का अनुशरण करूँगा
  12. मैं बुद्ध द्वारा निर्धारित परमितों का पालन करूँगा.
  13. मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार भरी दयालुता रखूँगा तथा उनकी रक्षा करूँगा.
  14. मैं चोरी नहीं करूँगा.
  15. मैं झूठ नहीं बोलूँगा
  16. मैं कामुक पापों को नहीं करूँगा.
  17. मैं शराब, ड्रग्स जैसे मादक पदार्थों का सेवन नहीं करूँगा.
  18. मैं महान आष्टांगिक मार्ग के पालन का प्रयास करूँगा एवं सहानुभूति और प्यार भरी दयालुता का दैनिक जीवन में अभ्यास करूँगा.
  19. मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूँ जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूँ
  20. मैं दृढ़ता के साथ यह विश्वास करता हूँ की बुद्ध का धम्म ही सच्चा धर्म है.
  21. मुझे विश्वास है कि मैं फिर से जन्म ले रहा हूँ (इस धर्म परिवर्तन के द्वारा).
  22. मैं गंभीरता एवं दृढ़ता के साथ घोषित करता हूँ कि मैं इसके (धर्म परिवर्तन के) बाद अपने जीवन का बुद्ध के सिद्धांतों व शिक्षाओं एवं उनके धम्म के अनुसार मार्गदर्शन करूँगा.डा बी.आर. अम्बेडकर

जो लोग खुद को दलित समझकर शिथिल पड़े हैं उनको ये जानने की जरूरत है की उन्हीं का इतिहास सम्पूर्ण विश्व में सबसे सुनहरा है, जब जब इन्होने सत्ता अपने हाथों में ली है, बहुजन जनता सुखी हुई है|आज भारत को सबसे ज्यादा जरूरत है सम्राट अशोक महान और उनके बौध शाशन की…Team SBMT

आज भारत को सबसे ज्यादा जरूरत है सम्राट अशोक महान और उनके बौध शाशन की
 “मानव जाति के लम्बे खुनी इतिहास में सबसे चमकदार अंतराल, इतिहास में लाखों सम्राटों की भीड़ , जो  their majesties and graciousnesses and serenities and royal highnesses , की उपाधियों से सुसज्जित हैं, सब कुछ दिनों के लिए चमके फिर गायब हो गये. लेकिन आज भी उन सबके बीच अशोक महान का नाम एक तारे के तरह चमक रहा है,  अकेले तारे की तरह |”mauryan_empire ashoka

यह कथन प्रसिद्द लेखक व इतिहासकार एच.गी. वेल्स ने अपनी पुस्तक ” आ शॉर्ट हिस्टरी ऑफ  वर्ल्ड.” में अशोक के बारे में लिखा है. एच. जी. वेल्स ने विश्व्प्रशिद्ध ” वॉर ऑफ थे वर्ल्ड्स,  टाइम मशीन,  इनविज़िबल मान” जैसे अन्य विश्व्पर्सिद्ध उपन्यास भी लिखे हैं.

खैर बात यहाँ अशोक की हो रही है. आखिर क्या ऐसा था अशोक में जो उसे सर्वश्रेष्ठ शाषक की उपाधि दिलाता है?

अशोक चन्द्रगुप्त मौर्या का प्रपोत्र और बिन्दुसार का पुत्र था. अशोक के कई सौतेले भाई थे, जो उससे इर्ष्या रखते थे. बिन्दुसार की मृत्यु के पश्चात अशोक के सौतेले भाई सुशीम को बिन्दुस्सर की इच्छा के अनुस्सर गद्दी मिलनी थी, परन्तु ज्यादातर मंत्री अशोक को राजा देखना चाहते थे. उनके सहयोग से और भाइयों  की ह्त्या के बाद वो राजा बना.

कहते हैं अशोक ने अपने ९९ भाइयों  का वध कर दिया था, एक भाई तिस्सा को छोड़ कर. अशोक  एक दुष्ट प्रकृति वाला और  गुस्सैल राजा  था.  उसके हरम में ५०० औरतें थीं. इसमें से कईयों को उसने ज़िंदा जलवा डाला था.   उसने अपने तकरीबन  ३०० मंत्रियों को शक की वजह से मार डाला था. उसने एक यातना गृह बनवाया था अपने विरोधियों के लिए, जिसे धरती पर नरक की संज्ञा दी गयी थी. उसके इन क्रूर कर्मों की वजह से उसे ” चंड अशोक”  कहा जाता था.

राजा बनने के आठ साल के भीतर उसने अपना साम्राज्य  आज के बर्मा से इरान तक और कश्मीर से तमिलनाडु तक स्थापित किया.

 अपनी विजय देखने के लिए वह युद्ध के मैदान में घुमने निकला. वहां पर पड़े शवों और उन पर विलाप करते उबके सगे संबधियों को देख कर उसके मन में करुना जागी और वह कहने लगा ” यह मैंने क्या किया? यदि यह विजय है तो पराजय क्या है? यह न्याय है या अन्याय? यह वीरता है या बर्बादी? क्या मासूम बच्चों और स्त्रियों की ह्त्या वीरता है? क्या यह मैंने अपने साम्राज्य के विस्तार और समृद्धि के लिए किया या दुसरे के राज्य के विनाश के लिए? किसी ने अपना पुत्र खोया,किसी ने अपना पिता, किसी ने माँ किसी ने अपना अजन्मा बच्चा, किसी ने पति किसी ने पत्नी.यह शवों का ढेर क्या है? क्या यह मेरी विजय का सूचक हैं या मेरी कायरता के? यह कव्वे,गिद्ध शैतान के दूत हैं या मृत्यु के?” 
इसके बाद अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया. कहते हैं की ��िक्षु के रूप में स्वयं भगवन बुद्ध ने अशोक को उपदेश दिया था. ( मिथ?)
और जो नदी रक्त से लाल हो गयी थी, जिसके किनारे पर अशोक को ग्लानी हुई  आज उस नदी को “दया नदी” कहा जाता है.
अशोक ने इसके बाद घोषणा की ” अब युद्ध ढोल की ध्वनि के बजाय धर्म  का नाद  बजेगा “
आइये अशोक के  कल्याणकारी कार्यों पर एक दृष्टि डालते हैं( बौद्ध धर्म स्वीकारने के बाद): यह सारी बातें इतिहासकारों  को अशोक द्वारा निर्मित उस वक़्त के शिलालेखों पर मिली हैं. जो उसके घोषणा पात्र की तराह थी.
१) आज जिसे हम मुफ्त चिकित्सा कहते हैं, अशोक ने उस युग में वो किया था. अपने पुरे राज्य में उसने मुफ्त हॉस्पिटल और दवाखानों का निर्माण करवाया, इच्छा अनुसार कोई भी उसमें दान दे सकता था.
२) अशोक ने अपने राज्य में पशु वध पर पूर्ण पाबंदी लगा दी, और पशुओं के लिए भी हॉस्पिटल खुलवाए.
३)हर ८ किलोमीटर पर उसने तालाब खुदवाए व  आश्रय स्थल बनवाए, बरगद और आम  के पेड़ हर रास्ते पर लगवाए .
४) अपनी रसोई में उसने मांसाहार पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगवा दिया.
५) शिकार प्रथा बंद करवा दी.
६) अशोक ने सभी बौद्ध तीर्थों की यात्रा की, लुम्बिनी, गया, कपिलवस्तु, एवं सारनाथ जहां उसने अशोक स्तम्भ बनवाया जो आज भारत का प्रतिक चिन्ह है.
७) जो सभी लोगों के कल्याण को बढ़ावा दे  वास्तव में  वही  मेरे लिए सबसे  महत्वपूर्ण कर्तव्य है.
8)  कैदियों से  नम्रता से व्यवहार किया जाना चाहिए.
9)  सभी लोगों को  माता – पिता, याजकों और भिक्षुओं का सम्मान करना चाहिए.
10) भिक्षुओं और जरूरतमंद से  उपहार प्राप्त करने के बजाय  देना  श्रेष्ठ  हैं.
11)धर्म के द्वारा विजय बल से प्राप्त  विजय से  बेहतर है लेकिन अगर बल से विजय किया जाता है, यह धैर्य और हलकी  सजा द्वारा होनी चाहिए.
12)अपने प्रजा के लोगों के कल्याण के बारे में  मुझे सूचित किया जाना चाहिए. इससे कोई फरक नहीं पड़ता की ” कोई बात नहीं है या वह कहाँ है या क्या कर रहा है”
13) और सबसे बड़ी बात विश्व में पहली बार राज्य धर्म निरपेक्षता का आधार अशोक ने रखा ( जिसे पश्चिम जगत अपनी देन मानता है)जो उसके बारहवें शिलालेख पर इस प्रकार  अंकित है ” जो भी खुद के संप्रदाय को महान और दुसरे के संप्रदाय को  धर्मांध होकर  या  अज्ञानता वश तुच्छ बताता है, वह अपने ही सम्प्रदाय का शत्रु है. एकता में ही बल है, एक दुसरे के मतों को सुनना और उनका आदर करना ही सही है.”
इन सब बातों से प्रेरित होकर अनेक  पर्यावरण वादी जैसे  सुन्दरलाल बहुगुणा ने अक्सर अशोक का उदहारण दिया है पर्यावरण की रक्षा हेतु.
वंदना शिवा, जिन्होनें प्राचीन भारतीय जड़ी बूटियों का पश्चिम जगत द्वारा पेटेंट के विरुद्ध लडाइयां  लड़ी हैं, उन्होंने अशोक के इसी सिद्धांत  ” सभी जड़ी बूटियाँ एवं चिकित्सीय पौधों का उपयोग समस्त मानव जाती के लिए मुफ्त में होना चाहिए” को आधार बनाया.
जब लाखों दलितों ने बौध धर्म स्वीकार किया बाबा साहेब अमबेडकर के नेत्रित्व में, तो ज्यादातर लोगों ने अपना नाम अशोक रखा.
आज यदि आधे विश्व में बौद्ध धर्म फैला है तो इसमें सबसे बड़ा योगदान अशोक का है.
भारत के झंडे,राज चिन्ह हर जगह अशोक के ही चिन्ह हैं.
अशोक स्तम्भ , जो भारत का राज चिन्ह है,  चार पशुओं का चिन्ह  भगवान बुद्ध के जीवन के विभिन्न चरणों का प्रतीक माना जाता है.
१) हाथी: एक सफेद हाथी उसके गर्भ में प्रवेश की रानी माया का सपना के संदर्भ में बुद्ध के विचार का प्रतिनिधित्व करता है.
२) सांड:  एक राजकुमार के रूप में बुद्ध के जीवन के दौरान इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है.
३) घोडा: महलनुमा जीवन से बुद्ध के प्रस्थान का प्रतिनिधित्व करता है.
४) शेर : बुद्ध की उपलब्धि का प्रतिनिधित्व करता है.
वैसे एक मिथक भी है की भगवन बुद्ध ने स्वयं अशोक के बारे में भविष्यवाणी की थी ” मेरे मरने के बाद एक सौ साल बाद  एक सम्राट पाटलिपुत्र में अशोक के नाम से हो जाएगा. वह चार महाद्वीपों में से एक पर  राज करेगा और मेरे अवशेष लोगों के कल्याण के लिए चौरासी  हजार स्तूप का निर्माण के साथ जम्बुद्वीप को सजाएगा . वह देवताओं और पुरुषों द्वारा सम्मानित कियाजाएगा. उनकी प्रसिद्धि व्यापक होगा.  जया  ने यह सुनते ही तथागत के कटोरामें एक मुट्ठी धूल फेंक दिया.” यह ” धुल का उपहार” नामक प्रसंग है, भगवन बुद्ध के जीवन में, शायद मिथक हो या सत्य, कह नहीं सकता.
परन्तु एक बात अवश्य कह सकता हूँ, हमारे पास बुद्ध,महावीर,नानक,राम,कृष्ण, विवेकानंद, सभी की शिक्षाएं हैं किन्तु इस समय अशोक  नहीं है जो अखिल  विश्व  में वो स्वर्णिम दिन वापस  ला दे.
ये लेख निम्न लिंक से लिया गया है

अफगानिस्तान के बामियान में 14 साल पहले इस्लामिक कट्टरपंथी तालिबान ने गौतम बुद्ध की विशाल मूर्ती को बम से उड़ा दिया था, ठीक उसी जगह एक बार फिर 3-D टेक्नीक से बुद्ध की वैसी ही मूर्तियां बनाई गईं। चीन के एक दंपती ने इस परियोजना को पूरा किया।…Team SBMT

काबुल
अफगानिस्तान में बुद्ध फिर ‘मुस्कराए’ हैं! अफगानिस्तान के बामियान में 14 साल पहले गौतम बुद्ध की जिन दो विशाल मूर्तियों को तालिबान ने तबाह कर दिया था, ठीक उसी जगह एक बार फिर 3-D टेक्नीक से बुद्ध की वैसी ही मूर्तियां बनाई गईं। चीन के एक दंपती ने इस परियोजना को पूरा किया।

दंपती ने काबुल के उत्तर-पश्चिम में 230 किलोमीटर पर स्थित हजराजात की बामियान घाटी में चट्टान की खाली गुफाओं में 3D लेजर लाइट प्रॉजेक्शन टेक्नीक का प्रयोग किया।

 

दंपती जॉनसन यू और लियान हू छठी शताब्दी में बनाई गई दो प्रतिमाओं को ढहाए जाने से दुखी थे और उन्होंने इस परियोजना को पूरा करने का फैसला किया।

उन्होंने चट्टान में खाली गुफाओं में केवल एक रात के लिए प्रतिमाएं वापस लाने के लिए अफगान सरकार और यूनेस्को से अनुमति ली। सात जून को हुए इस समारोह मेें प्रॉजेक्टरों की मदद से पूर्व की प्रतिमाओं के आकार की होलोग्राफिक प्रतिमाएं प्रदर्शित की गईं।

महात्मा बुद्ध की मूर्तियां 115 फीट और 174 फीट लंबी थीं और ये 1500 साल से ज्यादा समय तक खड़ी रहीं। मार्च 2001 में तालिबान ने इन्हें उड़ा दिया था। यूनेस्को ने इन्हें वर्ल्ड हेरिटेज साइट के तहत सूचीबद्ध किया हुआ था।

Taller_Buddha_of_Bamiyan_before_and_after_destruction

SOURCE:

http://i1.wp.com/navbharattimes.indiatimes.com/thumb/msid-47677404,width-300,resizemode-4/world/asian-countries/world-famous-buddhas-of-bamiyan-resurrected-in-afghanistan/-14-/world-famous-buddhas-of-bamiyan-resurrected-in-afghanistan.jpg?resize=0%2C0

कविता-भीमराव के “बौद्ध” नहीं, ये तो हिन्दू दलित/हरिजन है…..सूरजपाल चौहान

ye baudh nahin dalit haiभीमराव का बौद्ध नहीं ये,
हिन्दू दलित/हरिजन है.
रोज़ सवेरे मंदिर जाता
रखता है मंगल उपवास
शनिदेव की करे अर्चना
बेटा इसका रामदास
जय जगदीश हरे आँगन में
घर में इसके कीर्तन है
भीमराव का “बौद्ध” नहीं ये
हिन्दू दलित/हरिजन  है.
धर्म दूसरों का ढोता है
नंगें पाँव भगाफिरता
चुल्लू भर पानी की खातिर
यहाँ वहां गिरतापड़ता
कावंडिया बन कर करे गुलामी
अकल से भी यह निर्धन है
भीमराव का “बौद्ध” नहीं ये
हिन्दू दलित/हरिजन है.

मीट लंबा तिलक माथे
सुतल डोर गले डाल
हा कलावा बांधे फिरत
मटर का पोता काल
इसक आगे शर्माता
पंडि रामचरण
भीमरा का बौद्ध नहीं ये
हिन्द दलित/हरिजन है ।।

इसक तो कुछ पता नहीं
स्कू,कॉलेज क्या होत
देसथैली डाल हलक मे
दि भर गफलत में रहत
बाल इसके अनपढ़ रह गए
ज्ञा का खाली बर्तन
भीमरा का बौद्ध नहीं
हिन्द दलित/हरिजन  है.

अम्म इसकी अमरनाथ मे
गयी पत्थर के नीच
बर् में दबकर बाप मरा
मानसरोव के पीछ
वैष्ण देवी भइया खोय
आय इस पर दुर्दिन
भीमरा का बौद्ध नहीं
हिन्द दलित/हरिजन है.

पढलिखकर धोखा देता
धूर् बना मक्कार
आरक्ष लेता बढ़बढ़क
कोठ, बंगला, कार
अपन जाति छिपाकर रहत
बेट इसका सर्जन
भीमरा का बौद्ध नहीं ये
हिन्द दलित/हरिजन है.

सच्च बात बताता इसक
उस को आँख दिखाता
भगवरंग में सराबोर
गी राम के गाता
हिन्दमुस्लिम के झगडे मे
सबस आगे यही जन
भीमरा का बौद्ध नहीं
हिन्द दलित/हरिजन है.

बौद्ध”-साहित्य तनिक भात
मौलि चिंतन से ना प्या
वर्व्यवस्था ये ना जान
लिलिख करके गया मैं हा
पोंगपंडित को पढ़ता
जिसक झूठा दर्शन
भीमरा का बौद्ध नहीं
हिन्द दलित/हरिजन है.
 
जुल्म इसकी कौम पे होते दिन रात
ये जात छुपा बैठा मंदिर सत्संग में
कर रहा अपने पूर्वजों के हत्यारों की पूजा
जिनसे बचना है ये उन्हीं के संग संग में
इसीलिए बाबा साहब कह गए बार बार
जुल्म करने वाले से सहने वाला ज्यादा है गुनहगार
मुझे मेरे पढ़े लिखों ने धोखा दिया रात दिन है
भीमराव काबौद्धनहीं ये
हिन्दू दलित/हरिजन है.

बहुजन नायक श्री पार्शव नाथ मौर्या जी के भाषण के विडिओ, विषय “कैसे डॉ आंबेडकर ने संविधान को बौद्ध धम्म पर आधारित किया है”…Team SBMT

 

अम्बेडकर चाहते थे कि अछूतो के अपने उम्मीदवार और अपने निर्वाचन क्षेत्र हों, अन्यथा उनका कहीं भी किसी भी संसद में प्रतिनिधित्व कभी नहीं होगा, भारत में एक मोची अछूत है, कौन एक मोची को वोट देंगे? कौन उसे वोट देने जा रहा है?……. पूना पैक्ट पर ओशो के विचार

osho36अम्बेडकर चाहते थे कि अछूतो के अपने उम्मीदवार और अपने निर्वाचन क्षेत्र हों, अन्यथा उनका कहीं भी किसी भी संसद में प्रतिनिधित्व कभी नहीं होगा, भारत में एक मोची अछूत है, कौन एक मोची को वोट देंगे? कौन उसे वोट देने जा रहा है?

अम्बेडकर बिल्कुल सही थे। देश की एक चौथाई लोग अछूत है।

स्कूलों में जाने के लिए उन्हें अनुमति नहीं है, अन्य छात्र उनके साथ बैठने के लिए तैयार नहीं है, कोई शिक्षक उन्हें सिखाने के लिए तैयार नहीं है।

सरकार कहती है कि सरकारी स्कूल खुले हैं , लेकिन वास्तविकता में कोई एक अछूत छात्र कक्षा में प्रवेश करता है, तो सभी तीस छात्रों कक्षा छोड़ने को …. तैयार है। शिक्षक वर्ग कक्षा छोड़ देता है, तो फिर कैसे इन गरीब लोगों का — जो इस देश का एक चौथाई भाग हैं – प्रतिनिधित्व किया जा रहा है? इसलिए उन्हें अलग निर्वाचन क्षेत्र दिए जाने चाहिए। जहां केवल वे खड़े हो सकते हैं और केवल वे मतदान कर सकते हों,

अम्बेडकर पूरी तरह से तार्किक और पूरी तरह से मानवतावादी थे।

लेकिन गांधी, अनशन पर चला गया “उन्होंने कहा कि अम्बेडकर हिंदू समाज के भीतर एक प्रभाग बनाने की कोशिश कर रहे है।”

विभाजन दस हजार साल से अस्तित्व में है। यही कारण है कि गरीब अम्बेडकर विभाजन पैदा नहीं कर रहे थे, वह सिर्फ इतना कह रहे थे कि हजारों सालो से देश के एक चौथाई लोगों पर अत्याचार किया गया है.

अब कम से कम उन्हें खुद को आंगे लाने के लिए एक मौका दे। कम से कम उन्हें विधानसभाओं में, संसद में उनकी समस्याओं को आवाज दें। लेकिन गांधी ने कहा ” जब तक मै जिन्दा हूँ, मै इसकी अनुमति नहीं दे सकता, उसने कहा कि वे हिन्दू समाज का हिस्सा हैं इसलिए अछूत एक अलग मतदान प्रणाली की मांग नहीं कर सकते हैं, ,” – और गाँधी उपवास पर चला गया

इक्कीस दिनों के लिए अम्बेडकर अनिच्छुक बने रहे, लेकिन हर दिन … पूरे देश का दबाव उन पर आता जा रहा था. और उन्हें ये महसूस हो रहा था कि अगर वह बूढा आदमी मर जाता है तो महान रक्तपात शुरू हो जायेगा

अगर गाँधी की मौत हो गयी तो यह स्पष्ट था – कि अम्बेडकर को तुरंत मार डाला जाएगा, और लाखों अछूतों को पूरे देश में, हर जगह मारा जाएगा: क्यों कि ये माना जायगा कि ये तुम्हारी वजह से है।” अम्बेडकर को सारी गणित को समझाया गया था कि – “ज्यादा मय नहीं है, वह तीन दिन से ज्यादा जीवित नहीं रह सकते, कुछ दिनों में सब बाहर आने वाला है ” – अम्बेडकर झिझक रहे थे.

अम्बेडकर पूरी तरह से सही थे; गांधी पूरी तरह से गलत था।

लेकिन क्या करना चाहिए था ? क्या उन्हें जोखिम लेना चाहिए था ? अम्बेडकर अपने जीवन के बारे में चिंतित नहीं थे उन्होंने कहा कि अगर उन्हें मार दिया गया तो कोई बात नहीं – लेकिन वो उन लाखों गरीब लोगों के बारे में चिंतित थे जो ये भी नहीं जानते थे कि आखिर चल क्या रहा है.

उनके घरों को जला दिया जाएगा, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाएगा, उनके बच्चों को बेरहमी से काट दिया जाएगा । और वह सब कुछ होगा जो पहले कभी नहीं हुआ था।

आखिरकार उन्होंने गांधी की शर्तों को स्वीकार कर लिया । अपने हाथ में नाश्ता लिए हुए अम्बेडकर गांधी के पास चले गये उन्होंने कहा कि मैं आपकी शर्तों को स्वीकार करता हूँ. हम एक अलग वोट या अलग उम्मीदवारों के लिए नहीं कहेंगे। । इस संतरे का रस स्वीकार करें “और गांधी ने संतरे का रस स्वीकार कर लिया।
लेकिन यह संतरे का रस ,असल में इस एक गिलास संतरे के रस में लाखों लोगों का खून मिला हुआ था

मैं डॉक्टर अंबेडकर से व्यक्तिगत रूप से मिला । निश्चित ही डॉ अम्बेडकर मुझे आज तक मिले हुए सबसे बुद्धिमान लोगों में से एक थे। लेकिन मैंने उनसे कहा कि मुझे लगता है कि “आप कमजोर साबित हुए ।

अम्बेडकर ने कहा कि आप समझ नहीं रहे हैं, मैं सही था और ये बात मै जानता था, गाँधी गलत था, लेकिन उस जिद्दी बूढ़े आदमी के साथ क्या किया जा सकता था ? वह मरने के लिए जा रहा था, और अगर वह मर गया होता है तो मुझे उसकी मौत के लिए जिम्मेदार माना जाता , और अछूतों को बड़ी समस्या का सामना करना पड़ता.

संकलन    —- गणनायक

धर्म और संविधान मे भेद…ओ पी गौतम

ambedkar-samvidhan sadhye🍁धर्म और संविधान मे भेद🍁

१. धर्म ने आपको दी हजारों साल की गुलामी जबकि संविधान ने दी आपको हजारों साल की गुलामी से आजादी।

२. धर्म ने आपको अछूत बनाया संविधान ने समानता का अधिकार देकर आपको इन्सान बनाया।

३. धर्म ने आपको शिक्षा से वंचित रखकर विकास से वंचित किया जबकि संविधान ने आपको शिक्षा का अधिकार देकर विकास के नए रास्ते खोले।

४. धर्म ने आपको संपत्ति से वंचित रखकर आर्थिक रूप से पंगु कर दिया जबकि संविधान ने आपको संपत्ति, कारोबार का अधिकार देकर उन्नति के लिए नये रास्ते खोले।

5. धर्म ने आपको शहर, गाँव से अलग एक तरफ बस्ती बनाकर समाज से काटकर रख दिया जबकि संविधान ने आपको शेष समाज से जोड़कर इन्सान होने का एहसास दिलाया।

६. धर्म ने आपको नीच बनाया संविधान ने आपको सभी इंसानों के समान ही इन्सान बनाया।

७. धर्म आपको जानवरों से भी बदतर समझता है जबकि संविधान आपको किसी भी आदमी से कम नहीं समझता।

८. धर्म ने आपको जल रूपी जीवन से वंचित रखा जबकि संविधान ने आपको जल पर समान अधिकार दिया।
🍁 अब बतलाईये धर्म महान है या संविधान, अगर आपका जवाब संविधान है तो ” हिन्दु “धर्म में रहने की क्या जरूरत है।
कृपया अाप भी राय दें।

सदियों के अँधेरे से संविधान के द्वारा प्रकाश की किरण मिले। आप सभी का मंगल हो। ऐसी उम्मीद के साथ….
“नमों बुद्धाय जय भीम”

ओ पी गौतम आकाशवाणी नई दिल्ली