02 JUNE 2015 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- “जिस कौम का नेता नहीं उस कौम का कुछ होता नहीं, नेता के बिना जनता अनाथ होती है|आज आप छत्रपति साहू जी महाराज की बात “सदियों बाद आज डॉ आंबेडकर के रूप में पिछड़े बहुजनों को अपना नेता मिल गया है” का मतलब समझ सकते हैं और ये भी समझ सकते हैं की नेता मिल जाना मतलब क्या होता है| …समयबुद्धा


ambedkar rajnitikanshiram ashokaजिस कौम का नेता नहीं उस कौम का कुछ होता नहीं, नेता के बिना जनता अनाथ होती है, और जनसमर्थन के बिना नेता कुछ नहीं|

भारत ही नहीं समस्त विश्व की जनता किसी न किसी प्रकार के जन समूहों में बंटी है, और सब अपने अपने समूह के लिए संगर्ष शील रहते हैं| इन्हीं समूहों को कौम कहते हैं|उदाहरण के लिए इस्लाम में सिया सुन्नी , ईसाईयों में ऑर्थोडॉक्स और कंसर्व आदि, हाँ ये और बात है की इन समूहों में भारत की जाती व्यस्था जैसे भयानक गलाकाट नफरत और आसनशीलता नहीं है, आपस में जी लेते हैं|भारत में ये जन समूह का ये बटवारा सबसे भयानक और क्रूर है, यहाँ दोहरा बटवारा है पहले वर्ण के आधार पर और दूसरा जाती के आधार पर, भारत में जाती से बढ़कर कोई सच्चाई नहीं| जाती के लिए कहावत मसहूर है “जाती जो कभी नहीं जाती” |

ब्राह्मणवाद की जीत में जातिवाद का बहुत बड़ा योगदान हैं, फूट डालो और शाशन करो का इससे बेजोड़ और जबरदस्त उदहारण दुनिया में कहीं और नहीं मिलता| जाती को बनाये रखने के लिए ब्राह्मणवादी लोग अंतर्जातीय विवाह और अंतर्जातीय  प्रतिभोज पर राजनैतिक व् धार्मिक अंकुश द्वारा रोक बनाये रखते हैं, इस कारन जातियां खत्म नहीं होतीं| ये ठीक इस तरह है जैसे सेना में कई प्रकार की बटालियन होती है और अगर कोई बटालियन विद्रोह कर दे तो दूसरी बटालियन उसके सामने खड़ी कर दी जाती है, उदाहरण के लिए अगर जाट रेजिमेंट विद्रोह करे तो गोरखा रेजिमेंट उस विद्रोह को रोकेगी, मतलब अपने ही देश का आदमी अपने ही देश के आदमी को मारेगा | इसी तरह जाती का हिसाब होता है, एक जाती विद्रोह करती है तो दूसरी जाती ब्राह्मणवादी शाशन को बचाने को आ जाती है| इस तरह जाती व्यस्था ब्राह्मणवाद के शाशन को बरक़रार रखने का सर्वोत्तम साधन है|जो जातियां ब्राह्मणवादी शाशन के पक्ष में रहती हैं उनके लिए संगर्ष करती हैं उनकी दशा तो ठीक है पर जो जातियां विरोध में रहतीं हैं उनकी दशा बहुत बुरी हैं|इस चर्चा से हम समझ सकते हैं की भाषणों में कुछ भी कहा जाये पर जाती ही सबसे बड़ा सत्य है | अगर कोई जाती से हटकर कोई बात करता है तो वो केवल कहने सुनने वाली कोरी किताबी बातें साबित होतीं हैं|

हालाँकि कौम बहुत ही ज्यादा अमानवीय और मानवता विरोधी चीज़ है पर सामूहिक बटवारा या कौम राजनीती की सबसे बड़ी जरूरत होती है, और जब तक राजनीती होगी सामूहिक बटवारा जारी रहेगा, राजा कोई भी बन जाये, धर्म कोई भी आ जाये| इसका मतलब ये निकला की हमें जो भी रणनीति बनानी है उसमे इस बात का ख्याल रहना होगा की कौम एक जमीनी सच्चाई है जिको मने बिना हार निश्चित है| अब हमारे पास ये विकल्प है की हम समानता और मानवता की दुहाई देकर शोषित होते रहें या संगर्षशील लोगों का समूह बनाकर संघर्ष करें| ध्यान रहे “चार सौ रण छोड़ों से चार साथ निभाने वाले सूरमा जीत जाते हैं ” |

मुझे बहुत बुरा लग रहा है की मैं कौम पर बात कर रहा हूँ पर अगर हम घाव पर ध्यान न दें और उसे ढककर सब ठीक है सब ठीक है बोलते रहेंगे तो घाव एक दिन मौत का कारन बन जायेगा|राष्ट्रकवि इकबाल ने कहाँ था “जिंदगी है कौम की तू कौम पे लुटाए जा , कदम कदम बढ़ाये जा…. हमें कौम को ध्यान रखना होगा| जब भी हम सत्ता में होंगे तब कौमों के बीच में कटुता खत्म करनी होगी आपस में रोटी बेटी का सम्बन्ध बनाने पर जोर देना होगा|

पहला पॉइंट आप समझ गए होंगे की कौम से बढ़कर कोई सच्चाई नहीं, अब सवाल उठता है की कुछ कौमे सक्षम और समृद्ध हैं पर कुछ कौमे फटेहाल है, ऐसा क्यों? इसके कई कारन होते हैं जैसे

– ध्यान न देना

– कौम का अपना नाम और पहचान न होना या इस बात ज्ञान न होना

– कौम का अपना इतिहास और महापुरुष न होना या उनका ज्ञान न होना

– वर्तमान शाशन में विलय करके उनके हिसाब से अपनी पहचान खो देना

– राजनैतिक जागरूकता व् महत्वाकांक्षा न होना

– कुछ कौमों ने ब्राह्मणवादी शाशन स्वीकार किया कुछ ने नहीं

जो भी कारन हो सभी कारणों का सीधा सम्बन्ध जनता और उसके नेता पर निर्भर करता है, किसी भी कौम का नेता ही उस कौम के वर्तमान और भविष्ये यहाँ तक की इतिहास को भी सही दिशा दे पता है| जिस कौम का नेता नहीं उस कौम का कुछ होता नहीं, नेता के बिना जनता अनाथ होती है, और जनसमर्थन के बिना नेता कुछ नहीं| नेता क्या है वो भी हमारी तरह एक हाड़ मांड का आदमी है, कोई सुपरमैन नहीं  पर वो ताकतवर कैसे होता है? वो जनता के समर्थन की वजह से ताकतवर होता है, हाँ वो नीति के देव पेच जनता है जिससे जनता का उसमे विश्वास होता है की ये हमारी लड़ाई जितवा सकता है| ऐसे समझो की जैसे तीस करोड़ बौद्ध  का एक नेता हो और हर बौद्ध एक दिन में एक रुपया दें तो उसके पास हर दिन तीस करोड़ रुपये आएंगे, इतना पैसों में वो जिसकी चाहे जैसे चाहे मदत कर सकता है, ठीक इसी तरह उसकी ताकत में तीस  करोड़ लोगों की थोड़ी थोड़ी ताकत शामिल होकर कितनी ताकत बनती  है|

भारत में डॉ आंबेडकर के आपने से पहले अपनी पहचान खो चुकी भारत की मूलनिवासी जनता ब्राह्मणवादी शाशन की दी हुई पहचान जैसे जाती और वर्ण, उन्हीं के दिए हुए झंडे जैसे धर्म देवी देवता आदि के सहारे सदियों से शोषित हो रहे थे| फिर डॉ आंबेडकर आये और इन लोगों को नेता मिल गए, जब नेता मिला तो कौम को नाम मिला, अपना झंडा मिला अपना इतिहास और आज़ादी पानी ली ललक जगी, खुद को ब्राह्मणवादी गुलामी से अलग एक इंसान की तरह देखने समझने लगे, राजनैतिक गलियारों जहाँ जनता की किस्मत का फैसला होता है, वहां पहुंच बनी|आज आप छत्रपति साहू जी महाराज की बात “सदियों बाद आज डॉ आंबेडकर के रूप में पिछड़े बहुजनों को अपना नेता मिल गया है”  का मतलब समझ सकते हैं और ये भी समझ सकते हैं की नेता मिल जाना मतलब क्या होता है|

आज अलग अलग रास्तों से ही सही पर सभी अपने अंतिम एकछत्र झंडे बौद्ध धम्म तक पहुंच रहे हैं| इस से हमारा जनबल साबित हो रहा है और राजनीतिक रूप से हमारी गिनती होने लगी है| परिणाम हमारे लोगों का जीवन स्तर सुधरा है और लगातार सुधार राह है, निकम्मों को छोड़कर जो भी संगर्ष कर रहा है आज वो पा रहा है| उम्मीद है की मूलनिवासी एक दिन पूर्ण स्वराज भी पा लेंगे|

कौम और नेता की अहमियत को ब्राह्मणवादी  सदियों से समझते हैं, बिना नेता के कभी नहीं रहते चाहे वो जिन्दा हो या मारा| इनका एक मसहूर श्लोक है

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” यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याहम।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम।धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥”  (गीता अध्याय ४ श्लोक ७ तथा ८)

(अर्थात – जब धरती पर स्थापित धर्म की हानि हो जाती है और उसके स्थान पर अधर्म और गंदी शक्तिया हावी हो जाती है तो मैं अवतार लेकर धरा पर उतर आता हूँ। मैं हर युग में अधर्म द्वारा धर्म को पहुँचाई गई हानि को दूर करने और साधु-संतों की रक्षा के लिए अवतार लेता हूँ। इस प्रकार मैं धर्म की फिर से स्थपना के साथ ही राक्षसों सरीखे दुष्टों को तहस- नहस कर देता हूँ।मतलब जब भी इनपर मुसीबतें आएँगी इनका नेता जन्मेगा जो इनको मुक्ति दिलाएगा, मतलब सरक्षक इनको भी चाहिए| समझदार लोग समझते हैं की ईश्वर, देवी, देवता आदि कौमी सरक्षक से ज्यादा कुछ नहीं, हाँ भक्त और श्रद्धालु इस बात को नहीं समझ पाएंगे|

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बाबा साहब के बाद आये साहव कांशीराम, जिस जाती ले लोगों को वोट तक नहीं डालने दिया जाता है उस जाती का राजा बना दिया| ये कैसे हुआ,ध्यान रहे ये तभी हुआ जब इस कौम को सही नेता मिला, नेता ने भी काम किया और जनता ने भी समर्थन किया| नेता के बिना जनता अनाथ है और जनता के बिना नेता अनाथ है|इस बात को आप ऐसे समझो की चमार जाती ने डॉ आंबेडकर को अपना नेता माना मार्गदर्शक माना, मतलब इनको नेता मिला, फिर आये साहब कांशीराम तब इनको राजनैतिक शक्ति मिली| देश की जितनी भी राजनैतिक पार्टियां हैं उन सभी को बड़े बड़े सेठों और पूंजीपतियों से आर्थिक मदत मिलती है पर साहब कांशीराम  जिनको जातिवाद के चलते कोई समर्थन को तैयार नहीं था, उनको जनता ने पांच पांच रुपये का चंदा देकर राजनैतिक सफलता प्रदान की|

कुछ मंद बुद्धि लोग पूछते हैं की उनको क्या मिला, भाई मिलता उसी को है जो संगर्ष करता है, ये एक सामूहिक उपलब्धि थी जो सामूहिक रूप से ही मिलेगी, बिना संगर्ष किये कोई तुम्हारे घर नहीं भर देगा| जिस देश में बौद्ध शाशन के पतन बाद दो हज़ार साल तक कभी कोई मूलनिवासी राजा न बना हो वहां राजा बनाने से एक इतिहास रच गए, अब सवर्ण जनता में एक मौन स्वीकृति है की भारत के मूलनिवासी भी राजा बन सकते हैं” मतलब राजा बनने का रास्ता खुल गया, कौम का सम्मान बढ़ा है, सामाजिक स्वीकृति बढ़ी है, आर्थिक समृद्धि आई है, और भविष्ये के लिए हमारे संगर्ष को बहुत बल मिला है|

यहाँ गौर करने वाली बात ये है की जिन जिन कौमों को नेता मिल गए उनकी तरक्की हो गयी  जैसे यादवों को लालू और मुलायम मिले जाटवों को साहब कांशीराम मिले, और जिन जातियों में अपने नेता नहीं पैदा किया और ब्राह्मणवाद को ही अपने सरक्षक के रूप में स्वीकारा उनकी तरक्की तुलनात्मक रूप से बहुत कम हुई| उदारण के लिए अन्ये शूद्र कौमे जैसे धोबी,धानुक,भंगी,नाइ आदि ने अपने नेता पैदा नहीं किया और अगर किये भी तो उनका अपना कोई इतिहस या विचारधारा नहीं है वो ब्राह्मणवाद को भी अपनी गति मानते हैं| ऐसा नहीं है की इन जैसे छह हज़ार शूद्र जश्न का इतिहास और विचारधारा नहीं है पर ये ध्यान न देने के कारन हैं क्योंकि ये लोग डॉ आंबेडकर  और बुद्ध तक आना ही नहीं चाहते, परिणाम वहीँ के वहीँ पड़े हैं| खेर जब बौद्ध लोग शाशन संभालेंगे तो इनको भी जगा लिया जायेगा|बहरहाल मुद्दे की बात ये है की जिन कौमों का अपना वजूद और नेता होते हैं वो ज्यादा तरक्की करीं हैं बजाये उनके जो जिनके नहीं होते|

नेता या जनप्रतिनिधि सेना पति की तरह होता है, सेना चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो अगर सेनापति को मार दो तो सेना की हार तय होती है, नेता किसी भी कौम का सेनापति होता है, इसलिए नेता की रक्षा अपनी कौम की रक्षा होती है|नेता जनता का प्रतिनिधि होता है राजदरबार में, जहाँ जनता की किस्मत का फैसला होता है जहाँ से उनके लिए कानून बनते हैं|मंदबुद्धि लोग कहते हैं की हमारी अपनी जात के नेता ने क्या किया अपनी तिजोरी भरी हमें क्या मिला| ठीक है माना तुमको कुछ नहीं मिला पर तुम्हारा आदमी पार्लियामेंट में तो बैठा था कानून बनाने में उसका भी वोट था| अगर आपका प्रतिनिधि पार्लियामेंट में नहीं होगा तो विरोधी आपके विरोध में कानून बनाएंगे और तब आप क्या करेंगे| रही बात तुमको मिलने की तो ध्यम रहे तुमको उतना ही मिलेगा जितने की क्षमता तुम अपने अंदर विकसित कर लोगे| उदाहरण के लिए फर्ज कीजिये कोई आपका राजा बना जो किसी रोड बनाने का ठेका अपने आदमी को देना चाहता है पर अपना आदमी भी तो ठेकेदार होना चाहिए उसके पास भी तो कमलियत मशीनरी और लाइसेंस होना चाहिए, अगर नहीं है तो मजबूरन किसी और को देना पड़ेगा, हाँ इतना किया जा सकता है की ठेकेदार बनने की क़ाबलियत लेने की व्यस्था की जा सकती है| हमारी कौम की यही एक बड़ी कमी है की सब संगर्ष नहीं करते जो भी संगर्ष करता है सब जिम्मेदारी उसी को सौप कर खुद उस पर सवार हो जाना चाहते हैं| खेर धीरे धीरे सद्बुद्धि आ रही है|

अब सवाल ये उठता है की कौमी प्रतिनिधि क्यों चाहिए ? हम खुद तय करेंगे हमारे नेता? जवाब आसान है अगर लोग खुद तय कर पाते, भला बुरा समझ पाते तो मीडिया के प्रचार में अंधे होकर अपना कीमती वोट अपनी विरोधियों का न दे देते| प्रतिनिधि ऐसा होना चाहिए जो तय कर पाये कौम के लिए क्या सही है क्या गलत है| जनता तो भोली है पहले की तरह अब भी ब्राह्मणवादियों के बहकावे में आ जाती है| तो नेता का काम ये भी होता है की जनता को सही रस्ते ले जाना वार्ना जनता अपने पैर पर खुद ही कुल्हाड़ी मार लेगी|

बाबा साहब के बाद साहब कांशीराम आये अब हमें इंतज़ार है अपने अगले नेता का, काश जल्दी ही मिल जाए|

 

 

 

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