जलियांवाला बाग की जघन्य हत्याकांड का बदला लेने के लिये लंडन में जाकर अंग्रेजों को लोहे के चने चबवाने वाले वीर बहुजन सपूत शहीद उधमसिंह जी के कुर्बानी दिवस 31-JULY पर कोटि-कोटि भावभीनी आदरांजलि।

udham singh

 

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उधम सिंह
जन्म 26 दिसम्बर 1899
सुनाम, पंजाब, ब्रिटिश भारत
मृत्यु 31 जुलाई 1940 (उम्र 40)
पेंटोविले जेल, यूनाइटेड किंगडम
अन्य नाम राम मोहम्मद सिंह आजाद
संस्था गदर पार्टी, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन, भारतीय श्रमिक संघ
राजनीतिक आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

सरदार उधम सिंह (26 दिसम्बर 1899 से 31 जुलाई 1940) का नाम भारत की आज़ादी की लड़ाई में पंजाब के प्रमुख क्रान्तिकारी के रूप में अमर है। उन्होंने जलियांवाला बाग कांड के समय पंजाब के गर्वनर जनरल रहे माइकल ओ’ ड्वायर(en:Sir Michael Francis O’Dwyer) को लन्दन में जाकर गोली मारी और निर्दोष लोगों की हत्या का बदला लिया।[1] कई इतिहासकारों का मानना है कि यह हत्याकाण्ड ओ’ ड्वायर व अन्य ब्रिटिश अधिकारियों का एक सुनियोजित षड्यंत्र था, जो पंजाब पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए पंजाबियों को डराने के उद्देश्य से किया गया था। यही नहीं, ओ’ ड्वायर बाद में भी जनरल डायर के समर्थन से पीछे नहीं हटा था।[2][3][4]

मिलते जुलते नाम के कारण यह एक आम धारणा है कि उधम सिंह ने जालियाँवाला बाग हत्याकांड के उत्तरदायी जनरल डायर (पूरा नाम – रेजिनाल्ड एडवार्ड हैरी डायर, Reginald Edward Harry Dyer) को मारा था, लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि प्रशासक ओ’ ड्वायर जहां उधम सिंह की गोली से मरा (सन् १९४०), वहीं गोलीबारी को अंजाम देने वाला जनरल डायर १९२७ में पक्षाघात तथा कई तरह की बीमारियों से ग्रसित होकर मरा।

उत्तर भारतीय राज्य उत्तराखण्ड के एक ज़िले का नाम भी इनके नाम पर उधम सिंह नगर रखा गया है।

जीवन वृत्त

उधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गाँव में हुआ था। सन 1901 में उधमसिंह की माता और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। उधमसिंह का बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्तासिंह था जिन्हें अनाथालय में क्रमश: उधमसिंह और साधुसिंह के रूप में नए नाम मिले। इतिहासकार मालती मलिक के अनुसार उधमसिंह देश में सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे और इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतीक है।

अनाथालय में उधमसिंह की जिन्दगी चल ही रही थी कि 1917 में उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया। वह पूरी तरह अनाथ हो गए। 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शमिल हो गए। उधमसिंह अनाथ हो गए थे, लेकिन इसके बावजूद वह विचलित नहीं हुए और देश की आजादी तथा डायर को मारने की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए लगातार काम करते रहे।

माइकल ओ’ड्वायर की गोली मारकर हत्या

उधमसिंह १३ अप्रैल १९१९ को घटित जालियाँवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे। राजनीतिक कारणों से जलियाँवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं आ पाई। इस घटना से वीर उधमसिंह तिलमिला गए और उन्होंने जलियाँवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओ डायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली। अपने मिशन को अंजाम देने के लिए उधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा की। सन् 1934 में उधम सिंह लंदन पहुंचे और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीद ली। भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगा।

उधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 1940 में मिला। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी जहां माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुंच गए। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके।

बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ डायर पर गोलियां दाग दीं। दो गोलियां माइकल ओ डायर को लगीं जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। उधमसिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दुनिया को संदेश दिया कि अत्याचारियों को भारतीय वीर कभी बख्शा नहीं करते। उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी। उन पर मुकदमा चला। अदालत में जब उनसे पूछा गया कि वह डायर के अन्य साथियों को भी मार सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया। उधम सिंह ने जवाब दिया कि वहां पर कई महिलाएं भी थीं और भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है।

4 जून 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई। इस तरह यह क्रांतिकारी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया। 1974 में ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए। एसा था यह वीर जवान्।

https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%89%E0%A4%A7%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9

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ईंटें ढोता है शहीद ऊधम सिंह का पोता

एसपी रावत ॥ कुरुक्षेत्र

जिन शहीदों की कुर्बानियों से देश आजाद हुआ अब उनके वारिसों पर क्या बीत रही है, इससे देश के मौजूदा कर्णधार अनजान हो गए लगते हैं। ऐसा ही एक मामला प्रकाश में आया है, शहीदे आजम उधम सिंह के पोते के परिवार का। इस परिवार के सदस्य सिर पर ईंटें ढोकर दैनिक मजदूरी करके पेट पाल रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि उधम सिंह ने जलियांवाला बाग में हजारों निहत्थे स्वतंत्रता सेनानियों के नरसंहार का बदला लेने के लिए लंदन में जरनल डायर को मार डाला था। आज उसी उधम सिंह के पोते जीत सिंह का परिवार सुनाम में बदहाली में है। यह जानकारी मिलने पर हरियाणा से राज्यसभा सांसद रामप्रकाश ने इन्हें सुनाम पंजाब से बुलवाकर शनिवार को शहीदे आजम उधम सिंह के 71वें शहीदी दिवस पर जिला यमुनानगर के रादौर कस्बे में आर्थिक मदद देकर इनकी मदद करने की पहल की।

सांसद रामप्रकाश ने शनिवार को कुरुक्षेत्र के पिपली पैराकीट व रादौर में आयोजित हुए शहीद सम्मान समारोह में कहा कि शहीदों ने जो रास्ता चुना था, उसी कारण आज उनके वंशजों को तंगी में जिंदगी बितानी पड़ रही है। इनकी सुध लेने के लिए सभी को आगे आना होगा। शहीदों के गुमनाम वारिसों पर फिल्म बना रहे शिवानंद झा ने कहा कि देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने वाले शहीदों के गुमनाम वारिसों के लिए हमें कुछ करना होगा। मेरा पूरा प्रयास होगा कि ऐसे गुमनाम वारिसों को देश की जनता के सामने लाए जाए।

शहीद ऊधम सिंह के वंशज जीत सिंह को कांबोज धर्मशाला रादौर की ओर से 1 लाख 41 हजार रुपये की सहायता राशि भेंट की गई। वहीं शिवनाथ झा व उसकी पत्नी मीना झा को जय भगवान शर्मा ने 2 लाख रुपये की नकद राशि दी। जीत सिंह के साथ उनका बेटा जग्ग सिंह भी आया था। इस अवसर पर रामप्रकाश ने रादौर में निर्माणधीन शहीदेआजम उधम सिंह कांबोज धर्मशाला के लिए सात लाख रुपये देने की घोषणा की।

 

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/9425570.cms

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बहुजन लेखक मुंशी प्रेमचंद जी की जयंती पर प्रस्तुत हैं भारत में बहुजनों कि दुर्दशा को दर्शाती कहानी “ठाकुर का कुआँ”…मुंशी प्रेमचन्द

भारत के प्रसिद्ध साहित्यकार एवं लेखक जिन्होने राजा रानी से हटकर आम आदमी की
परेशानियों को महत्व देते हुए जिनको समस्त भरतवंश के सामने उजागर किया ।
फिरंगियों की लाख कोशिशों के बावजूद जिन्होंने अपनी कलम को रुकने न दिया ।
आधुनिक हिंदी के पितामह “मुंशी प्रेमचंद जी ” को उनकी १३५ वि जयंती पर सत् सत् नमन ।
(1880-1936)

 

भारत में बहुजनों कि दुर्दशा को दर्शाती कहानी  “ठाकुर का कुआँ”…मुंशी प्रेमचन्द

ठाकुर का कुआँ

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जोखू ने लोटा मुंह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आई । गंगी से बोला-यह कैसा पानी है ? मारे बास के पिया नहीं जाता । गला सूखा जा रहा है और तू सडा पानी पिलाए देती है !
गंगी प्रतिदिन शाम पानी भर लिया करती थी । कुआं दूर था, बार-बार जाना मुश्किल था । कल वह पानी लायी, तो उसमें बू बिलकुल न थी, आज पानी में बदबू कैसी ! लोटा नाक से लगाया, तो सचमुच बदबू थी । जरुर कोई जानवर कुएं में गिरकर मर गया होगा, मगर दूसरा पानी आवे कहां से?
ठाकुर के कुंए पर कौन चढ़नें देगा ? दूर से लोग डॉँट बताऍगे । साहू का कुऑं गॉँव के उस सिरे पर है, परन्तु वहॉं कौन पानी भरने देगा ? कोई कुऑं गॉँव में नहीं है।
जोखू कई दिन से बीमार हैं । कुछ देर तक तो प्यास रोके चुप पड़ा रहा, फिर बोला-अब तो मारे प्यास के रहा नहीं जाता । ला, थोड़ा पानी नाक बंद करके पी लूं ।
गंगी ने पानी न दिया । खराब पानी से बीमारी बढ़ जाएगी इतना जानती थी, परंतु यह न जानती थी कि पानी को उबाल देने से उसकी खराबी जाती रहती हैं । बोली-यह पानी कैसे पियोंगे ? न जाने कौन जानवर मरा हैं। कुऍ से मै दूसरा पानी लाए देती हूँ।
जोखू ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा-पानी कहॉ से लाएगी ?
ठाकुर और साहू के दो कुऍं तो हैं। क्यो एक लोटा पानी न भरन देंगे?
‘हाथ-पांव तुड़वा आएगी और कुछ न होगा । बैठ चुपके से । ब्राहम्ण देवता आशीर्वाद देंगे, ठाकुर लाठी मारेगें, साहूजी एक पांच लेगें । गराबी का दर्द कौन समझता हैं ! हम तो मर भी जाते है, तो कोई दुआर पर झॉँकनें नहीं आता, कंधा देना तो बड़ी बात है। ऐसे लोग कुएँ से पानी भरने देंगें ?’
इन शब्दों में कड़वा सत्य था । गंगी क्या जवाब देती, किन्तु उसने वह बदबूदार पानी पीने को न दिया ।2रात के नौ बजे थे । थके-मॉँदे मजदूर तो सो चुके थें, ठाकुर के दरवाजे पर दस-पॉँच बेफिक्रे जमा थें मैदान में । बहादुरी का तो न जमाना रहा है, न मौका। कानूनी बहादुरी की बातें हो रही थीं । कितनी होशियारी से ठाकुर ने थानेदार को एक खास मुकदमे की नकल ले आए । नाजिर और मोहतिमिम, सभी कहते थें, नकल नहीं मिल सकती । कोई पचास मॉँगता, कोई सौ। यहॉ बे-पैसे-कौड़ी नकल उड़ा दी । काम करने ढ़ग चाहिए ।
इसी समय गंगी कुऍ से पानी लेने पहुँची ।
कुप्पी की धुँधली रोशनी कुऍं पर आ रही थी । गंगी जगत की आड़ मे बैठी मौके का इंतजार करने लगी । इस कुँए का पानी सारा गॉंव पीता हैं । किसी के लिए रोका नहीं, सिर्फ ये बदनसीब नहीं भर सकते ।
गंगी का विद्रोही दिल रिवाजी पाबंदियों और मजबूरियों पर चोटें करने लगा-हम क्यों नीच हैं और ये लोग क्यों ऊचें हैं ? इसलिए किये लोग गले में तागा डाल लेते हैं ? यहॉ तो जितने है, एक-से-एक छॅटे हैं । चोरी ये करें, जाल-फरेब ये करें, झूठे मुकदमे ये करें । अभी इस ठाकुर ने तो उस दिन बेचारे गड़रिए की भेड़ चुरा ली थी और बाद मे मारकर खा गया । इन्हीं पंडित के घर में तो बारहों मास जुआ होता है। यही साहू जी तो घी में तेल मिलाकर बेचते है । काम करा लेते हैं, मजूरी देते नानी मरती है । किस-किस बात मे हमसे ऊँचे हैं, हम गली-गली चिल्लाते नहीं कि हम ऊँचे है, हम ऊँचे । कभी गॉँव में आ जाती हूँ, तो रस-भरी आँख से देखने लगते हैं। जैसे सबकी छाती पर सॉँप लोटने लगता है, परंतु घमंड यह कि हम ऊँचे हैं!
कुऍं पर किसी के आने की आहट हुई । गंगी की छाती धक-धक करने लगी । कहीं देख ले तो गजब हो जाए । एक लात भी तो नीचे न पड़े । उसाने घड़ा और रस्सी उठा ली और झुककर चलती हुई एक वृक्ष के अँधरे साए मे जा खड़ी हुई । कब इन लोगों को दया आती है किसी पर ! बेचारे महगू को इतना मारा कि महीनो लहू थूकता रहा। इसीलिए तो कि उसने बेगार न दी थी । इस पर ये लोग ऊँचे बनते हैं ?
कुऍं पर स्त्रियाँ पानी भरने आयी थी । इनमें बात हो रही थीं ।
‘खान खाने चले और हुक्म हुआ कि ताजा पानी भर लाओं । घड़े के लिए पैसे नहीं है।’
हम लोगों को आराम से बैठे देखकर जैसे मरदों को जलन होती हैं ।’
‘हाँ, यह तो न हुआ कि कलसिया उठाकर भर लाते। बस, हुकुम चला दिया कि ताजा पानी लाओ, जैसे हम लौंडियाँ ही तो हैं।’
‘लौडिंयॉँ नहीं तो और क्या हो तुम? रोटी-कपड़ा नहीं पातीं ? दस-पाँच रुपये भी छीन-झपटकर ले ही लेती हो। और लौडियॉं कैसी होती हैं!’
‘मत लजाओं, दीदी! छिन-भर आराम करने को ती तरसकर रह जाता है। इतना काम किसी दूसरे के घर कर देती, तो इससे कहीं आराम से रहती। ऊपर से वह एहसान मानता ! यहॉं काम करते-करते मर जाओं, पर किसी का मुँह ही सीधा नहीं होता ।’
दानों पानी भरकर चली गई, तो गंगी वृक्ष की छाया से निकली और कुऍं की जगत के पास आयी । बेफिक्रे चले गऐ थें । ठाकुर भी दरवाजा बंदर कर अंदर ऑंगन में सोने जा रहे थें । गंगी ने क्षणिक सुख की सॉस ली। किसी तरह मैदान तो साफ हुआ। अमृत चुरा लाने के लिए जो राजकुमार किसी जमाने में गया था, वह भी शायद इतनी सावधानी के साथ और समझ्-बूझकर न गया हो । गंगी दबे पॉँव कुऍं की जगत पर चढ़ी, विजय का ऐसा अनुभव उसे पहले कभी न हुआ ।
उसने रस्सी का फंदा घड़े में डाला । दाऍं-बाऍं चौकनी दृष्टी से देखा जैसे कोई सिपाही रात को शत्रु के किले में सूराख कर रहा हो । अगर इस munshi premchandसमय वह पकड़ ली गई, तो फिर उसके लिए माफी या रियायत की रत्ती-भर उम्मीद नहीं । अंत मे देवताओं को याद करके उसने कलेजा मजबूत किया और घड़ा कुऍं में डाल दिया ।
घड़े ने पानी में गोता लगाया, बहुत ही आहिस्ता । जरा-सी आवाज न हुई । गंगी ने दो-चार हाथ जल्दी-जल्दी मारे ।घड़ा कुऍं के मुँह तक आ पहुँचा । कोई बड़ा शहजोर पहलवान भी इतनी तेजी से न खींसच सकता था।
गंगी झुकी कि घड़े को पकड़कर जगत पर रखें कि एकाएक ठाकुर साहब का दरवाजा खुल गया । शेर का मुँह इससे अधिक भयानक न होगा।
गंगी के हाथ रस्सी छूट गई । रस्सी के साथ घड़ा धड़ाम से पानी में गिरा और कई क्षण तक पानी में हिलकोरे की आवाजें सुनाई देती रहीं ।
ठाकुर कौन है, कौन है ? पुकारते हुए कुऍं की तरफ जा रहे थें और गंगी जगत से कूदकर भागी जा रही थी ।
घर पहुँचकर देखा कि लोटा मुंह से लगाए वही मैला गंदा पानी रहा है।

बहुजन लेखक मुंशी प्रेमचंद जी की जयंती पर प्रस्तुत हैं भारत में बहुजनों कि दुर्दशा को दर्शाती उन्हीं की लिखी एक कहानी “शूद्रा”

भारत के प्रसिद्ध साहित्यकार एवं लेखक जिन्होने राजा रानी से हटकर आम आदमी की
परेशानियों को महत्व देते हुए जिनको समस्त भरतवंश के सामने उजागर किया ।
फिरंगियों की लाख कोशिशों के बावजूद जिन्होंने अपनी कलम को रुकने न दिया ।
आधुनिक हिंदी के पितामह “मुंशी प्रेमचंद जी ” को उनकी १३५ वि जयंती पर सत् सत् नमन ।
(1880-1936)

शूद्रा

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मां और बेटी एक झोंपड़ी में गांव के उसे सिरे पर रहती थीं। बेटी बाग से पत्तियां बटोर लाती, मां भाड़-झोंकती। यही उनकी जीविका थी। सेर-दो सेर अनाज मिल जाता था, खाकर पड़ रहती थीं। माता विधवा था, बेटी क्वांरी, घर में और कोई आदमी न था। मां का नाम गंगा था, बेटी का गौरा!
गंगा को कई साल से यह चिन्ता लगी हुई थी कि कहीं गौरा की सगाई हो जाय, लेकिन कहीं बात पक्की  न होती थी। अपने पति के मर जाने के बाद गंगा ने कोई दूसरा घर न किया था, न कोई दूसरा धन्धा ही करती थी। इससे लोगों को संदेह हो गया था कि आखिर इसका  गुजर कैसे होता है! और लोग तो छाती फाड़-फाड़कर काम करते हैं, फिर भी पेट-भर अन्न मयस्सर नहीं होता। यह स्त्री कोई धंधा नहीं करती, फिर भी मां-बेटी आराम से रहती हैं, किसी के सामने हाथ नहीं फैलातीं। इसमें कुछ-न-कुछ रहस्य अवश्य है। धीरे-धीरे यह संदेह और भी द़ृढ़ हो गया और अब तक जीवित था। बिरादरी में कोई गौरा से सगाई करने पर राजी न होता था। शूद्रों की बिरादरी बहुत  छोटी होती है। दस-पांच कोस से अधिक उसका क्षेत्र नहीं होता, इसीलिए एक दूसरे के गुण-दोष किसी से छिपे नहीं रहते, उन पर परदा ही डाला जा सकता है।
     इस भ्रांति को शान्त करने के लिए  मां ने बेटी  के साथ कई तीर्थ-यात्राएं कीं। उड़ीसा तक हो आयी, लेकिन संदेह न मिटा। गौरा युवती थी, सुन्दरी थी, पर उसे किसी ने कुएं पर या खेतों में हंसते-बोलते नहीं देखा। उसकी निगाह कभी ऊपर उठती ही न थी। लेकिन ये बातें भी संदेह को और पुष्ट करती थीं। अवश्य कोई- न- कोई रहस्य है। कोई युवती इतनी सती नहीं हो सकती। कुछ गुप-चुप की बात अवश्य है।
यों ही दिन गुजरते जाते थे। बुढ़िया दिनोंदिन  चिन्ता से घुल रही थी। उधर सुन्दरी की मुख-छवि दिनोंदिन निहरती जाती थी। कली खिल कर फूल हो रही थी।
एक दिन एक परदेशी गांव से होकर निकला। दस-बारह कोस से आ रहा था। नौकरी की खोज में कलकत्ता  जा रहा था। रात हो गयी। किसी कहार का घर पूछता हुआ गंगा के  घर आया। गंगा ने उसका खूब आदर-सत्कार किया, उसके लिए गेहूं का आटा लायी, घर से बरतन निकालकर दिये। कहार ने पकाया, खाया, लेटा, बातें होने लगीं। सगाई की चर्चा छिड़ गयी।  कहार जवान था, गौरा पर निगाह पड़ी, उसका रंग-ढंग देखा, उसकी सजल छवि ऑंखों में खुब गयी। सगाई करने पर राजी हो गया। लौटकर घर चला गया। दो-चार गहने अपनी बहन के यहां से लाया; गांव के बजाज ने कपड़े उधार दे दिये। दो-चार भाईबंदों के साथ सगाई करने आ पहुंचा। सगाई हो गयी, यही रहने लगा। गंगा बेटी और दामाद को आंखों से दूर न कर सकती थी।
परन्तु दस ही पांच दिनों में मंगरु के कानों में इधर-उधर की बातें पड़ने लगीं। सिर्फ बिरादरी ही  के नहीं, अन्य जाति वाले भी उनके कान भरने लगे। ये बातें सुन-सुन कर मंगरु पछताता था कि नाहक यहां फंसा। पर गौरा को छोड़ने का ख्याल कर उसका दिल कांप उठता था।
एक महीने के बाद मं गरु अपनी बहन के गहने लौटाने गया। खाने के समय उसका बहनोई उसके साथ भोजन करने न बैठा।  मंगरु को कुछ  संदेह हुआ, बहनोई से बोला- तुम क्यों नहीं आते?
बहनोई ने कहा-तुम खा लो, मैं फिर खा लूंगा।
मंगरु – बात क्या है? तु खाने क्यों नहीं उठते?
बहनोई –जब तक पंचायत न होगी, मैं तुम्हारे साथ कैसे खा सकता हूं? तुम्हारे लिए बिरादरी भी नहीं छोड़ दूंगा। किसी से पूछा न गाछा, जाकर एक हरजाई से सगाई  कर ली।
मंगरु चौके पर उठ आया, मिरजई पहनी और ससुराल चला आया। बहन खड़ी रोती रह गयी।
उसी रात  को वह किसी वह किसी से कुछ कहे-सुने बगैर, गौरा को छोड़कर कहीं चला गया। गौरा नींद में मग्न थी। उसे क्या खबर थी कि वह रत्न, जो मैंने इतनी तपस्या के बाद पाया है, मुझे सदा के लिए छोड़े चला जा रहा है।
कई साल बीत गये। मंगरु का कुछ पता न चला। कोई पत्र तक न आया, पर गौरा  बहुत प्रसन्न थी। वह मांग में सेंदुर डालती, रंग बिरंग के कपड़े पहनती और अधरों पर मिस्सी के धड़े जमाती। मंगरु भजनों की एक पुरानी किताब छोड़ गया था। उसे कभी-कभी पढ़ती और गाती। मंगरु ने उसे हिन्दी सिखा  दी थी। टटोल-टटोल कर भजन पढ़ लेती थी।
पहले वह अकेली बैठली रहती। गांव की और स्त्रियों के साथ बोलते-चालते उसे शर्म आती थी। उसके पास वह वस्तु न थी, जिस पर दूसरी स्त्रियां गर्व करती थीं। सभी अपने-अपने पति की चर्चा  करतीं। गौरा के पति कहां था? वह किसकी  बातें करती! अब उसके भी पति था। अब  वह अन्य स्त्रियों के साथ इस विषय पर बातचीत  करने की अधिकारिणी थी। वह भी मंगरु की चर्चा करती, मंगरु कितना स्नेहशील है, कितना सज्जन, कितना वीर।  पति चर्चा से उसे कभी तृप्ति ही न होती थी।
स्त्रियां- मंगरु तुम्हें छोड़कर क्यों चले गये?
गौरी कहती – क्या करते? मर्द कभी ससुराल  में पड़ा रहता है। देश –परदेश में निकलकर चार पैसे कमाना  ही तो मर्दों का काम है, नहीं  तो मान-मरजादा का निर्वाह कैसे हो?
जब कोई पूछता, चिट्ठ-पत्री क्यों नहीं भेजते? तो हंसकर कहती- अपना पता-ठिकाना बताने में डरते हैं। जानते हैं न, गौरा आकर सिर पर सवार हो जायेगी। सच कहती हूं  उनका  पता-ठिकाना मालूम हो जाये, तो यहां मुझसे एक दिन भी न रहा जाये। वह बहुत  अच्छा करते हैं कि मेरे पास चिट्ठी-पत्री नहीं भेजते। बेचारे परदेश में कहां घर गिरस्ती संभालते फिरेंगे?
     एक दिन किसी सहेली ने कहा- हम न मानेंगे,  तुझसे जरुर मंगरु से झगड़ा  हो गया है, नहीं तो बिना कुछ कहे-सुने क्यों चले जाते ?
गौरा ने हंसकर कहा- बहन, अपने देवता  से भी कोई झगड़ा करता है? वह मेरे मालिक  हैं, भला  मैं उनसे झगड़ा करुंगी? जिस दिन झगड़े की नौबत आयेगी, कहीं डूब मरुंगी। मुझसे कहकर जाने पाते? मैं उनके पैरों से लिपट न जाती।
एक दिन कलकत्ता से एक  आदमी आकर  गंगा के घर ठहरा। पास ही के किसी  गांव में अपना  घर बताया। कलकत्ता में वह  मंगरु के पड़ोस ही में रहता था। मंगरु ने उससे गौरा को अपने साथ लाने को कहा था। दो साड़ियां और राह-खर्च के लिये  रुपये भी भेजे थे। गौरा फूली न समायी। बूढ़े ब्राह्मण के साथ चलने को तैयार हो गयी। चलते  वक्त वह गांव की सब औरतों  से गले मिली। गंगा उसे स्टेशन तक पहुंचाने गयी। सब कहते थे, बेचारी लड़की के भाग जग गये, नहीं तो यहाँ कुढ़-कुढ़ कर मर जाती।
रास्ते-भर गौरा सोचती – न जाने वह कैसे  हो गये होंगे ? अब तो  मूछें अच्छी तरह निकल आयी होंगी। परदेश में आदमी सुख से रहता है। देह भर आयी होगी। बाबू साहब हो गये होंगे। मैं पहले दो-तीन दिन उनसे बोलूंगी नहीं। फिर पूछूंगी-तुम मुझे छोड़कर क्यों चले गये? अगर किसी ने मेरे बारें में कुछ बुरा-भला कहा ही था, तो तुमने उसका विश्वास क्यों कर लिया? तुम अपनी आंखों से न देखकर दूसरों के कहने पर क्यों गये? मैं भली हूं या बूरी हूं, हूं तो तुम्हारी, तुमने मुझे इतने दिनों रुलाया क्यो? तुम्हारे  बारे में अगर इसी तरह कोई मुझसे  कहता, तो क्या मैं तुमको  छोड़ देती? जब तुमने मेरी बांह पकड़ ली, तो तुम मेरे हो गये। फिर तुममें लाख एब हों, मेरी बला से। चाहे तुम तुर्क ही क्यों न हो जाओ, मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकती। तुम क्यों मुझे छोड़कर भागे? क्या समझते थे, भागना सहज है?  आखिर झख मारकर बुलाया कि नहीं?  कैसे न बुलाते? मैंने तो तुम्हारे ऊपर दया की, कि चली आयी, नहीं तो कह देती कि मैं ऐसे निर्दयी के पास नहीं जाती, तो तुम आप दौड़े आते। तप करने से देवता  भी मिल जाते हैं, आकर सामने खड़े हो जाते हैं, तुम कैसे न आते? वह धरती बार-बार उद्विग्न हो-होकर बूढ़े ब्राह्मण से पूछती, अब कितनी दूर है? धरती के छोर पर रहते हैं क्या? और भी कितनी ही बातें वह पूछना  चाहती थी, लेकिन संकोच-वश न पूछ सकती थी। मन-ही-मन अनुमान करके अपने को सन्तुष्ट कर लेती थी। उनका मकान बड़ा-सा होगा, शहर में लोग पक्के घरों में रहते हैं। जब  उनका साहब  इतना मानता है, तो नौकर भी होगा। मैं नौकर  को भगा दूंगी। मैं दिन-भर पड़े–पड़े क्या किया करूंगी?
बीच-बीच में उसे घर की याद भी आ जाती थी। बेचारी अम्मा रोती होंगी। अब उन्हें घर का सारा काम आप ही करना  पड़ेगा। न जाने बकरियों को चराने ले जाती है। या नहीं। बेचारी दिन-भर में-में करती होंगी। मैं अपनी बकरियों के लिए महीने-महीने रुपये भेजूंगी। जब कलकत्ता से लौटूंगी तब सबके लिए साड़ियां लाऊंगी। तब मैं इस तरह थोड़े लौटूंगी। मेरे साथ बहुत-सा असबाब होगा। सबके लिए कोई-न-कोई  सौगात लाऊंगी। तब तक तो बहुत-सी बकरियां हो जायेंगी।
यही सुख  स्वप्न देखते-देखते  गौरा ने सारा रास्ता काट दिया। पगली क्या  जानती थी कि मेरे मान कुछ और कर्त्ता के मन कुछ और। क्या जानती थी कि बूढ़े ब्राह्मणों के भेष में पिशाच होते हैं। मन की मिठाई खाने में मग्न थी।
तीसरे दिन गाड़ी कलकत्ता पहुंची। गौरा की छाती धड़-धड़ करने लगी। वह यहीं-कहीं खड़े होंगें। अब आते हीं होंगे। यह सोचकर उसने घूंघट निकाल लिया और संभल बैठी। मगर मगरु वहां न दिखाई दिया। बूढ़ा ब्राह्मण बोला-मंगरु तो यहां नहीं दिखाई देता, मैं चारों ओर छान आया। शायद किसी काम में लग गया होगा, आने की छुट्टी न मिली होगी, मालूम भी तो न था कि हम लोग किसी गाड़ी से आ रहे हैं। उनकी राह क्यों देखें, चलो, डेरे पर चलें।
दोनों गाड़ी पर बैठकर चले। गौरा कभी तांगे पर सवार न हुई थी। उसे गर्व हो रहा था कि कितने ही बाबू लोग  पैदल जा रहे हैं, मैं तांगे पर बैठी हूं।
एक क्षण में गाड़ी मंगरु के डेरे पर पहुंच गयी। एक विशाल भवन था, आहाता साफ-सुथरा, सायबान में फूलों के गमले रखे हुए थे। ऊपर चढ़ने लगी, विस्मय, आनन्द और आशा से। उसे अपनी सुधि ही न थी। सीढ़ियों पर चढ़ते–चढ़ते पैर दुखने लगे। यह सारा महल उनका है। किराया बहुत देना पड़ता होगा। रुपये को तो वह कुछ समझते ही नहीं।  उसका हृदय धड़क रहा था  कि कहीं मंगरु ऊपर से उतरते आ न रहें हों सीढ़ी पर भेंट हो गयी, तो मैं क्या करुंगी? भगवान करे वह पड़े सोते  रहे हों, तब मैं जगाऊं और वह मुझे देखते ही हड़बड़ा कर उठ बैठें। आखिर सीढ़ियों का अन्त हुआ। ऊपर एक कमरें में गौरा को ले जाकर ब्राह्मण देवता ने बैठा दिया। यही मंगरु का डेरा था। मगर मंगरु यहां भी नदारद!  कोठरी में केवल एक खाट पड़ी हुई थी। एक किनारे दो-चार बरतन रखे हुए थे। यही उनकी कोठरी है। तो मकान किसी दूसरे का है, उन्होंने यह कोठरी किराये पर ली होगी। मालूम होता है, रात को बाजार में पूरियां खाकर सो रहे होंगे। यही उनके सोने की खाट है। एक किनारे घड़ा रखा हुआ था। गौरा को मारे प्यास के तालू सूख रहा था। घड़े से पानी उड़ेल कर पिया। एक किनारे पर एक झाडू रखा था। गौरा रास्ते की थकी थी, पर प्रेम्मोल्लास में  थकन कहां? उसने कोठरी  में झाडू लगाया, बरतनों को धो-धोकर एक जगह रखा। कोठरी की एक-एक वस्तु यहां तक कि उसकी फर्श और दीवारों में उसे आत्मीयता की झलक दिखायी देती थी। उस घर में भी, जहां उसे  अपने जीवन के २५ वर्ष काटे थे, उसे अधिकार  का ऐसा गौरव-युक्त आनन्द न प्राप्त हुआ था।
     मगर उस कोठरी  में बैठे-बैठे उसे संध्या हो गयी और मंगरु का कहीं पता नहीं। अब छुट्टी मिली होगी। सांझ को सब जगह छुट्टी होती है। अब वह आ रहे होंगे। मगर बूढ़े बाबा ने उनसे कह तो दिया ही होगा, वह क्या अपने साहब से थोड़ी देर की छुट्टी न ले सकते थे? कोई बात होगी, तभी तो नहीं आये।
अंधेरा हो गया। कोठरी में दीपक न था। गौरा द्वार पर खड़ी पति की बाट देख रहीं थी। जाने पर बहुत-से आदमियों के चढ़ते-उतरने की आहट मिलती थी, बार-बार गौरा   को मालूम होता था कि वह आ रहे हैं, पर इधर कोई नहीं आता था।
नौ बजे बूढ़े बाबा आये। गौरी ने समझा, मंगरु है। झटपट कोठरी के बाहर निकल आयी। देखा तो ब्राह्मण! बोली-वह कहां रह गये?
बूढ़ा–उनकी तो यहां से बदली हो गयी। दफ्तर में गया था तो मालूम हुआ कि वह अपने साहब के साथ यहां से कोई आठ दिन की राह पर चले गये। उन्होंने साहब से बहुत हाथ-पैर जोड़े कि मुझे दस दिन की मुहलत दे दीजिए, लेकिन साहब ने एक न मानी। मंगरु यहां लोगों से कह गये हैं कि घर के लोग आयें तो मेरे पास भेज देना। अपना पता दे गये हैं। कल मैं तुम्हें यहां से जहाज पर बैठा दूंगा। उस जहाज पर हमारे देश के और भी बहुत से होंगे, इसलिए मार्ग में कोई कष्ट न होगा।
गौरा ने पूछा- कै दिन में जहाज पहुंचेगा?
बूढ़ा- आठ-दस दिन से कम न लगेंगे, मगर घबराने की कोई बात नहीं। तुम्हें किसी बात की तकलीफ न होगी।
अब तक गौरा को अपने गांव लौटने की आशा थी। कभी-न-कभी वह अपने पति को वहां अवश्य खींच ले जायेगी। लेकिन जहाज पर बैठाकर उसे ऐसा मालूम हुआ कि अब फिर माता को न देखूंगी, फिर गांव के दर्शन  न होंगे, देश से सदा के लिए नाता टूट रहा है। देर तक घाट  पर खड़ी रोती रही, जहाज और समुद्र देखकर उसे भय हो रहा था। हृदय दहल जाता था।
शाम को जहाज खुला। उस समय गौरा का हृदय एक अक्षय भय से चंचल हो उठा। थोड़ी देर के लिए नैराश्य न उस पर अपना आतंक जमा लिया। न-जाने किस देश जा रही हूं, उनसे भेंट भी होगी या नहीं। उन्हें कहां खोजती फिरुंगी, कोई पता-ठिकाना भी तो नहीं मालूम। बार-बार पछताती थी कि एक दिन पहिले क्यों न चली आयी। कलकत्ता में भेंट हो जाती तो मैं उन्हें वहां कभी न जाने देती।
जहाज पर और कितने ही मुसाफिर थे, कुछ स्त्रियां भी थीं। उनमें बराबर गाली-गलौज होती रहती थी। इसलिए गौरा को उनसें बातें करने की इच्छा न होती थी। केवल एक स्त्री उदास दिखाई देती थी। गौरा ने उससे पूछा-तुम कहां  जाती हो बहन?
उस स्त्री की बड़ी-बड़ी आंखे सजल हो गयीं। बोलीं, कहां बताऊं बहन  कहां जा रहीं हूं? जहां भाग्य लिये जाता है, वहीं  जा रहीं हूं। तुम कहां जाती हो?
गौरा- मैं तो अपने मालिक के पास जा रही हूं। जहां यह जहाज रुकेगा। वह वहीं नौकर हैं। मैं कल आ जाती तो उनसे कलकत्ता में ही  भेंट हो जाती। आने में देर हो गयी। क्या  जानती थी कि वह इतनी दूर चले जायेंगे, नहीं तो क्यों देर करती!
स्त्री – अरे बहन, कहीं तुम्हें भी तो कोई बहकाकर नहीं लाया है? तुम घर से किसके साथ आयी हो?
गौरा – मेरे आदमी ने कलकत्ता से आदमी भेजकार मुझे बुलाया था।
स्त्री – वह आदमी तुम्हारा जान–पहचान का था?
गौरा- नहीं, उस तरफ का एक बूढ़ा ब्राह्मण था।
स्त्री – वही लम्बा-सा, दुबला-पतला लकलक बूढ़ा, जिसकी एक ऑंख में फूली पड़ी हुई है।
     गौरा – हां, हां, वही।  क्या तुम उसे जानती हो?
स्त्री – उसी दुष्ट ने तो मेरा भी सर्वनाश किया। ईश्वर करे, उसकी सातों पुश्तें नरक भोगें, उसका निर्वश हो जाये, कोई पानी देनेवाला भी न रहे, कोढ़ी होकर मरे। मैं अपना वृतान्त सुनाऊं तो तुम समझेगी कि झूठ है। किसी को विश्वास न आयगा। क्या कहूं, बस सही समझ लो कि इसके कारण मैं न घर की रह गयी, न घाट की। किसी को मुंह नहीं दिखा सकती। मगर जान तो बड़ी प्यार होती है। मिरिच के देश जा रही हूं कि वहीं मेहनत-मजदूरी  करके जीवन के दिन काटूं।
गौरा के प्राण नहीं में समा गये। मालूम हुआ जहाज अथाह जल में डूबा जा रहा है। समझ गयी बूढ़े ब्राह्मण ने दगा की। अपने गांव में सुना करती थी कि गरीब लोग मिरिच में भरती होने के लिए जाया करते हैं। मगर जो वहां जाता है, वह फिर नहीं लौटता। हे, भगवान् तुमने मुझे किस पाप का यह दण्ड दिया? बोली- यह सब क्यों लोगों को इस तरह छलकर मिरिच भेजते हैं?
स्त्री- रुपये के लोभ  से और किसलिए? सुनती हूं, आदमी पीछे इन सभी को कुछ रुपये मिलते हैं।
गौरा – मजूरी
गौरा सोचने लगी – अब क्या करुं? यह आशा –नौका जिस पर बैठी हुई वह चली जा रही थी, टुट गयी थी और अब समुद्र की लहरों के सिवा उसकी रक्षा करने वाला कोई  न था। जिस आधार पर उसने अपना जीवन-भवन बनाया था, वह जलमग्न हो गया। अब उसके लिए जल के सिवा और कहां आश्रय है? उसकी अपनी माता की, अपने घर की अपने गांव की, सहेलियों की याद आती और ऐसी घोर मर्म वेदना होने लगी, मानो कोई सर्प अन्तस्तल में बैठा हुआ, बार-बार डस रहा हो।  भगवान! अगर मुझे यही यातना देनी थी तो तुमने जन्म ही क्यों दिया था? तुम्हें दुखिया पर दया नहीं आती? जो पिसे हुए हैं उन्हीं को पीसते हो! करुण स्वर से बोली – तो अब  क्या करना होगा बहन?
स्त्री – यह तो वहां पहुंच कर मालूम होगा। अगर मजूरी ही करनी पड़ी तो कोई बात नहीं, लेकिन अगर किसी ने कुदृष्टि से देखा तो मैंने निश्चय कर लिया है कि या तो उसी के प्राण ले लूंगी या अपने प्राण दे दूंगी।
     यह कहते-कहते उसे अपना वृतान्त सुनाने की वह उत्कट इच्छा हुई, जो दुखियों को हुआ करती है। बोली – मैं बड़े  घर की बेटी और उससे भी बड़े घर की बहूं हूं, पर अभागिनी ! विवाह के तीसरे ही साल पतिदेव का देहान्त हो गया। चित्त की कुछ ऐसी दशा हो गयी कि नित्य मालूम होता कि वह मुझे बुला रहे हैं। पहले तो ऑंख झपकते ही उनकी मूर्ति सामने आ जाती थी, लेकिन फिर तो यह दशा हो गयी कि जाग्रत दशा में भी रह-रह कर उनके दर्शन होने लगे। बस यही जान पड़ता था कि  वह साक्षात् खड़े बुला रहे हैं। किसी से शर्म के मारे कहती न थी, पर मन में यह शंका होती थी कि जब उनका देहावसान हो गया है तो वह मुझे दिखाई कैसे देते हैं? मैं इसे भ्रान्ति समझकर चित्त को शान्त न कर सकती। मन कहता था, जो वस्तु प्रत्यक्ष दिखायी देती है, वह मिल क्यों नहीं सकती?  केवल वह ज्ञान चाहिए। साधु-महात्माओं को सिवा ज्ञान और कौन दे सकता है? मेरा तो अब  भी विश्वास है कि अभी ऐसी क्रियाएं हैं, जिनसे हम मरे हुए प्राणियों से बातचीत कर सकते हैं, उनको स्थूल रुप में देख सकते हैं। महात्माओं की खोज में रहने लगी। मेरे यहां अक्सर साधु-सन्त आते थे, उनसे एकान्त में इस विषय में बातें किया करती थी, पर वे लोग सदुपदेश देकर मुझे टाल देते थे। मुझे सदुपदेशों की जरुरत न थी। मैं वैधव्य-धर्म खूब जानती थी। मैं तो वह ज्ञान चाहती थी जो जीवन और मरण के बीच  का परदा उठा दे। तीन साल तक मैं इसी खेल में लगी रही। दो महीने होते हैं, वही बूढ़ा ब्राह्मण संन्यासी बना हुआ मेरे यहां जा पहुंचा। मैंने इससे वही भिक्षा मांगी। इस धूर्त ने कुछ ऐसा मायाजाल फैलाया कि मैं आंखे रहते हुए भी फंस गयी। अब सोचती हूं तो अपने ऊपर आश्चर्य होता है कि मुझे उसकी बातों पर इतना विश्वास क्यों हुआ? मैं पति-दर्शन के लिए सब कुछ झेलने को, सब कुछ करने को तैयार थी। इसने रात को अपने पास बुलाया। मैं घरवालों से पड़ोसिन के घर जाने का बहाना करके इसके पास गयी। एक पीपल से इसकी धूईं जल रही थी। उस विमल चांदनी में यह जटाधारी ज्ञान और योग का देवता-सा  मालूम होता था। मैं आकर धूईं के पास खड़ी हो गयी। उस समय यदि बाबाजी मुझे आग में कुद पड़ने की आज्ञा देते, तो मैं तुरन्त कूद पड़ती। इसने मुझे बड़े प्रेम से बैठाया और मेरे सिर पर हाथ रखकर न जाने क्या कर दिया कि मैं बेसुध हो गयी। फिर मुझे कुछ नहीं मालूम कि मैं कहां गयी, क्या हुआ? जब मुझे होश आया तो मैं रेल पर सवार थी। जी में आया कि चिल्लाऊं, पर यह सोचकर कि अब गाड़ी रुक भी गयी  और मैं उतर भी पड़ी तो घर में घुसने न पाऊंगी, मैं चुपचाप बैठी रह गई। मैं परमात्मा की दृष्टि से निर्दोष थी, पर संसार की दृष्टि में कलंकित हो चुकी थी। रात को किसी युवती का घर से निकल जाना कलंकित करने के लिए काफी था। जब मुझे मालूम हो गया कि सब मुझे टापू में भेज रहें हैं तो मैंने जरा भी आपत्ति नहीं की। मेरे लिए अब सारा संसार एक-सा है। जिसका संसार में कोई न हो, उसके लिए देश-परदेश दोनों बराबर है। हां, यह पक्का निश्चय कर चूकी हूं कि मरते दम तक अपने सत की रक्षा  करुंगी। विधि के हाथ में मृत्यु से बढ़ कर कोई यातना नहीं। विधवा के लिए मृत्यु का क्या भय। उसका तो जीना और मरना दोनों बराबर हैं। बल्कि मर जाने से जीवन की विपत्तियों का तो अन्त हो जाएगा।
गौरा  ने सोचा – इस स्त्री में कितना धैर्य और साहस है। फिर मैं क्यों इतनी कातर  और  निराश हो रही हूं? जब जीवन की अभिलाषाओं का अन्त हो गया तो जीवन के अन्त का क्या डर? बोली- बहन, हम और तुम एक जगह रहेंगी। मुझे तो अब तुम्हारा ही भरोसा है।
स्त्री ने कहा- भगवान का भरोसा रखो और मरने से मत डरो।
सघन अन्धकार छाया हुआ था। ऊपर काला आकाश था, नीचे काला जल। गौरा आकाश की ओर ताक रही थी। उसकी संगिनी जल की  ओर। उसके सामने आकाश के कुसुम थे, इसके चारों ओर अनन्त, अखण्ड, अपार अन्धकार था।
     जहाज से उतरते ही एक आदमी ने यात्रियों के नाम लिखने शुरु किये। इसका पहनावा तो अंग्रेजी था, पर बातचीत से हिन्दुस्तानी मालूम होता था। गौरा सिर झुकाये अपनी संगिनी के पीछे खड़ी थी। उस आदमी की आवाज सुनकर वह चौंक पड़ी। उसने दबी आंखों से उसको ओर देखा। उसके समस्त शरीर में सनसनी दौड़ गयी। क्या स्वप्न तो नहीं देख रही हूं। आंखों पर विश्वास न आया, फिर उस पर निगाह  डाली। उसकी छाती वेग से धड़कने लगी। पैर थर-थर कांपने लगे। ऐसा मालूम होने लगा, मानो चारों ओर जल-ही-जल है और उसमें  और उसमें बही जा रही हूं। उसने अपनी संगिनी का हाथ पकड़ लिया, नहीं तो जमीन में गिर पड़ती। उसके सम्मुख वहीं पुरुष खड़ा था, जो उसका प्राणधार था और जिससे इस जीवन में भेंट होने की उसे लेशमात्र भी आशा न थी। यह मंगरु था, इसमें जरा भी सन्देह न था। हां उसकी सूरत बदल गयी थी। यौवन-काल का वह कान्तिमय साहस, सदय छवि, नाम को भी न थी। बाल खिचड़ी हो गये थे, गाल पिचके हुए, लाल आंखों से कुवासना और कठोरता झलक रही थी। पर था वह मंगरु।  गौरा के जी में प्रबल इच्छा हुई कि स्वामी के पैरों से लिपट जाऊं। चिल्लाने का जी चाहा, पर संकोच ने मन को रोका। बूढ़े ब्राह्मण ने बहुत ठीक कहा था। स्वामी ने अवश्य मुझे बुलाया था और आने से पहले यहां चले आये। उसने अपनी संगिनी के कान में कहा – बहन, तुम उस ब्राह्मण को व्यर्थ ही बुरा कह रहीं थीं। यही तो वह हैं जो यात्रियों के नाम लिख रहे हैं।
स्त्री – सच, खूब पहचानी हो?
गौरा – बहन, क्या  इसमें भी हो सकता है?
स्त्री – तब तो तुम्हारे  भाग जग गये, मेरी भी सुधि लेना।
गौरा – भला, बहन ऐसा भी हो सकता है कि यहां तुम्हें छोड़ दूं?
मंगरु यात्रियों  से बात-बात पर बिगड़ता था, बात-बात पर गालियां देता था, कई आदमियों को ठोकर मारे और कई को केवल गांव का जिला न बता सकने के कारण धक्का देकर गिरा दिया। गौरा मन-ही-मन गड़ी जाती थी। साथ ही अपने स्वामी के अधिकार पर उसे गर्व भी हो रहा था। आखिर मंगरु उसके सामने आकर खड़ा हो गया और कुचेष्टा-पूर्ण नेत्रों से देखकर बोला –तुम्हारा क्या नाम है?
गौरा ने कहा—गौरा।
मगरू चौंक पड़ा, फिर बोला – घर कहां है?
मदनपुर, जिला बनारस।
यह कहते-कहते हंसी आ गयी। मंगरु ने अबकी उसकी ओर ध्यान से देखा, तब लपककर उसका हाथ पकड़ लिया और बोला –गौरा! तुम यहां कहां? मुझे पहचानती हो?
गौरा रो रही थी, मुहसे बात न निकलती।
मंगरु फिर बोला—तुम यहां कैसे आयीं?
गौरा खड़ी हो गयी, आंसू पोंछ डाले और मंगरु की ओर देखकर बोली – तुम्हीं ने तो बुला भेजा था।
मंगरु –मैंने ! मैं तो सात साल से यहां हूं।
गौरा –तुमने उसे बूढ़े ब्राह्मण से मुझे लाने को नहीं कहा था?
मंगरु – कह तो  रहा हूं, मैं सात साल से यहां हूं। मरने पर ही यहां से जाऊंगा। भला, तुम्हें क्यों बुलाता?
गौरा को मंगरु से इस निष्ठुरता का आशा न थी। उसने सोचा, अगर यह सत्य  भी हो कि इन्होंने मुझे नहीं बुलाया, तो भी इन्हें मेरा यों अपमान न करना चाहिए था। क्या वह समझते हैं कि मैं इनकी रोटियों पर आयी हूं? यह तो इतने ओछे स्वभाव के न थे। शायद दरजा पाकर इन्हें मद हो गया है। नारीसुलभ अभिमान से गरदन उठाकर उसने कहा- तुम्हारी इच्छा हो, तो अब यहां से लौट जाऊं, तुम्हारे ऊपर भार बनना नहीं चाहती?
मंगरु कुछ लज्जित होकर बोला – अब तुम यहां से लौट नहीं सकतीं गौरा ! यहां आकर बिरला ही कोई लौटता है।
यह कहकर वह कुछ देर चिन्ता में मग्न  खड़ा रहा, मानो संकट में पड़ा हुआ हो कि क्या करना चाहिए। उसकी कठोर मुखाकृति पर दीनता का रंग झलक पड़ा। तब कातर स्वर से बोला –जब आ ही गयी हो तो रहो। जैसी कुछ पड़ेगी, देखी जायेगी।
गौरा – जहाज फिर कब लौटेगा।
मंगरु – तुम यहां से पांच बरस के पहले नहीं जा सकती।
गौरा –क्यों, क्या कुछ जबरदस्ती है?
मंगरु – हां, यहां का यही हुक्म है।
गौरा – तो फिर मैं अलग मजूरी करके अपना पेट पालूंगी।
मंगरु ने सजल-नेत्र होकर कहा—जब तक मैं जीता हूं, तुम मुझसे अलग नहीं रह सकतीं।
गौरा- तुम्हारे ऊपर भार बनकर न रहूंगी।
मंगरु – मैं तुम्हें भार नहीं समझता गौरा, लेकिन यह जगह तुम-जैसी देवियों के रहने लायक नहीं है, नहीं तो अब तक मैंने तुम्हें कब का बुला लिया होता। वहीं बूढ़ा आदमी जिसने तुम्हें बहकाया, मुझे घर से आते समय पटने में मिल गया और झांसे देकर मुझे यहां भरती कर दिया। तब से यहीं पड़ा हुआ हूं। चलो, मेरे घर में रहो, वहां बातें होंगी। यह दूसरी औरत कौन है?
गौरा – यह मेरी सखी है। इन्हें भी बूढ़ा बहका लाया।
मंगरु -यह तो किसी कोठी में जायेंगी?  इन सब आदमियों की बांट होगी। जिसके  हिस्से में जितने आदमी आयेंगे, उतने हर एक कोठी में भेजे जायेंगे।
गौरा – यह तो मेरे साथ रहना चाहती हैं।
मंगरु – अच्छी बात है इन्हें भी लेती चलो।
यत्रियों रके नाम तो लिखे ही जा चुके थे, मंगरु ने उन्हें एक चपरासी को सौंपकर दोंनों औरतों के साथ घर की राह ली। दोनों ओर सघन वृक्षों की कतारें थी। जहां तक निगाह जाती थी, ऊख-ही-ऊख दिखायी देती थी। समुद्र की ओर से शीतल, निर्मल वायु के झोंके आ रहे थे। अत्यन्त सुरम्य दृश्य था।  पर मंगरु की निगाह उस ओर न थी। वह भूमि की ओर ताकता, सिर झुकाये, सन्दिग्ध चवाल से चला जा रहा था, मानो मन-ही-मन कोई समस्या हल कर रहा था।
थोड़ी ही दूर गये  थे कि सामने से दो आदमी आते हुए दिखाई दिये। समीप आकर दानों रुक गये और एक ने हंसकर कहा –मंगरु, इनमें से एक हमारी है।
दूसरा बोला- और दूसरा मेरी।
मंगरु का चेहरा तमतमा उठा था। भीषण क्रोध से कांपता हुआ बोला- यह दोनों मेरे घर की औरतें है। समझ गये?
     इन दोनों ने जोर से कहकहा मारा और एक ने गौरा के समीप आकर उसका हाथ पकड़ने की चेष्टा करके कहा- यह मेरी हैं चाहे तुम्हारे घर की हो, चाहे बाहर की। बचा, हमें चकमा देते हो।
मंगरु – कासिम, इन्हें मत छेड़ो, नहीं तो अच्छा न होगा। मैंने कह दिया, मेरे घर की औरतें हैं।
मंगरी की आंखों से अग्नि की ज्वाला-सी निकल रही थी। वह दानों के उसके मुख का भाव देखकर कुछ सहम गये और समझ लेने की धमकी देकर आगे बढ़े। किन्तु मंगरु के अधिकार-क्षेत्र से बाहर पहुंचते ही एक ने पीछे से ललकार कर कहा- देखें  कहां ले के जाते हो?
मंगरू ने उधर ध्यान नहीं दिया। जरा कदम बढ़ाकर चलने लगा, जेसे सन्ध्या के एकान्त में हम कब्रिस्तान के पास से गुजरते हैं, हमें पग-पग पर यह शंका होती है कि कोई  शब्द कान में न पड़ जाय, कोई सामने आकर खड़ा न हो जाय, कोई जमीन के नीचे से कफन ओढ़े उठ न खड़ा हो।
गौरा ने कहा—ये दानों बड़े शोहदे थे।
मंगरु – और मैं किसलिए कह रहा था कि यह जगह तुम-जैसी स्त्रियों के रहने लायक नहीं है।
सहसा दाहिनी तरफ  से एक अंग्रेज घोड़ा दौड़ाता आ पहुंचा और मंगरु से बोला- वेल जमादार, ये दोनों औरतें हमारी कोठी में रहेगा। हमारे कोठी में कोई औरत नहीं है।
मंगरु ने दोनों औरतों को अपने पीछे कर लिया और सामने खड़ा होकर बोला–साहब, ये दोनों हमारे घर की औरतें हैं।
साहब- ओ हो ! तुम झूठा आदमी। हमारे कोठी में कोई औरत नहीं और तुम दो  ले जाएगा। ऐसा नहीं हो सकता। ( गौरा की ओर इशारा करके) इसको हमारी कोठी पर पहुंचा दो।
मंगरु ने सिर से पैर तक कांपते हुए कहा- ऐसा नहीं हो सकता।
मगर साहब आगे बढ़  गया था, उसके कान में बात  न पहुंची। उसने हुक्म दे दिया था और उसकी तामील करना  जमादार का काम था।
शेष मार्ग निर्विघ्न समाप्त हुआ। आगे मजूरों के रहने के मिट्ठी के घर थे। द्वारों पर स्त्री-पुरुष जहां-तहां बैठे हुए थे। सभी इन दोनों स्त्रियों की ओर घूरते थे और आपस में इशारे करते हंसते थे। गौरा ने देखा, उनमें छोटे-बड़े का लिहाज नहीं है, न किसी के आंखों में शर्म है।
एक भदैसले और ने हाथ पर चिलम पीते हुए अपनी पडोसिन से कहा- चार दिन की चांदनी, फिर अंधेरी पाख !
दूसरी अपनी चोटी गूंथती हुई बोली – कलोर हैं न।
मंगरु दिन-भर द्वार पर बैठा रहा, मानो कोई किसान अपने मटर के खेत की रखवाली कर रहा हो। कोठरी में दोनों स्त्रियां बैठी अपने नसीबों को रही थी। इतनी देर में दोनों को यहां की दशा का परिचय कराया गया था। दोनों भूखी-प्यासी बैठी थीं। यहां का रंग देखकर भूख प्यास सब  भाग गई थी।
रात के दस बजे होंगे कि एक सिपाही ने आकर मंगरु से कहा- चलो, तुम्हें जण्ट साहब बुला रहे हैं।
मंगरु ने बैठे-बैठे कहा – देखो नब्बी, तुम भी हमारे देश के आदमी हो। कोई मौका पड़े, तो हमारी मदद करोगे न? जाकर साहब से कह दो, मंगरु कहीं गया है, बहुत होगा जुरमाना कर देंगे।
नब्बी – न भैया, गुस्से में भरा बैठा है, पिये हुए हैं, कहीं मार चले, तो बस, चमड़ा इतना मजबूत नहीं है।
मंगरु – अच्छा  तो जाकर कह दो, नहीं आता।
नब्बी- मुझे क्या, जाकर कह दूंगा। पर तुम्हारी खैरियत नहीं है के बंगले पर चला। यही वही साहब थे, जिनसे आज मंगरु की भेंट हुई थी। मंगरु जानता था कि साहब से बिगाड़ करके यहां एक  क्षण भी निर्वाह नहीं हो सकता। जाकर साहब के सामने खड़ा हो गया।  साहब ने दूर  से ही डांटा, वह औरत कहां है? तुमने उसे अपने घर में क्यों रखा है?
     मंगरु – हजूर, वह मेरी ब्याहता औरत है।
साहब – अच्छा,  वह दूसरा कौन है?
मंगरु – वह मेरी सगी बहन है हजूर !
साहब – हम कुछ नहीं जानता। तुमको लाना पड़ेगा। दो में से कोई, दो में से कोई।
मंगरु पैरों पर गिर पड़ा और रो-रोकर अपनी सारी राम कहानी सुना गया। पर साहब जरा भी न पसीजे! अन्त में वह बोला – हुजूर, वह दूसरी औरतों की तरह नहीं है। अगर यहां आ भी गयी, तो प्राण दे देंगी।
साहब ने हंसकर कहा – ओ ! जान देना इतना आसान नहीं है !
नब्बी – मंगरु अपनी दांव रोते क्यों हो? तुम हमारे घर नहीं घुसते थे! अब भी जब घात पाते हो, जा पहुंचते हो। अब क्यों रोते हो?
एजेण्ट – ओ, यह बदमाश है। अभी जाकर लाओ, नहीं तो  हम तुमको हण्टरों से पीटेगा।
मंगरु – हुजूर जितना चाहे पीट लें, मगर मुझसे यह काम करने को न कहें, जो मैं जीते –जी नहीं कर सकता !
     एजेण्ट- हम एक सौ हण्टर मारेगा।
मंगरु – हुजूर एक हजार हण्टर मार लें, लेकिन मेरे घर की औरतों से न बोंले।
एजेण्ट नशे में चूर था।  हण्टर लेकर मंगरु पर पिल पड़ा और लगा सड़ासड़ जमाने। दस बाहर कोड़े मंगरु ने धैर्य के साथ सहे, फिर हाय-हाय करने लगा। देह की खाल फट गई थी और मांस पर चाबुक पड़ता था, तो बहुत जब्त करने पर भी कण्ठ से आर्त्त-ध्वनि निकल आती थी टौर अभी एक सौं में कुछ पन्द्रह चाबुक पड़े थें।
रात के दस बज गये थे। चारों ओर सन्नाटा छाया था और उस नीरव अंधकार में मंगरु का करुण-विलाप किसी पक्ष की भांति आकाश में मुंडला रहा था। वृक्षों के समूह  भी हतबुद्धि से खड़े मौन रोन की मूर्ति बने हुए थे।  यह पाषाणहृदय लम्पट, विवेक शून्य जमादार इस समय एक अपरिचित स्त्री के सतीत्व की रक्षा करने के लिए अपने प्राण तक देने को तैयार था, केवल इस नाते कि यह उसकी पत्नी की संगिनी थी।  वह समस्त संसार की नजरों में गिरना गंवारा कर सकता था, पर अपनी पत्नी की भक्ति पर अखंड राज्य करना चाहता था। इसमें अणुमात्र की कमी भी उसके लिए असह्य थी। उस अलौकिक भक्ति के सामने उसके जीवन का क्या मूल्य था?
ब्राह्मणी तो जमीन पर ही सो गयी थी, पर गौरा बैठी पति की बाट जोह रही थी। अभी तक वह उससे कोई बात नहीं कर सकी थी। सात वर्षों की विपत्ति–कथा कहने और सुनने के लिए बहुत समय की जरुरत थी और रात के सिवा वह समय फिर कब मिल सकता था। उसे ब्राह्मणी पर कुछ क्रोध-सा आ रहा था कि यह क्यों मेरे गले का हार हुई? इसी के कारण तो वह घर में नहीं आ रहे हैं।
यकायक वह किसी का रोना सुनकर चौंक पड़ी। भगवान्, इतनी रात गये कौन दु:ख का मारा रो रहा है। अवश्य कोई कहीं मर गया है। वह उठकर द्वार पर आयी और यह अनुमान करके कि मंगरु यहां बैठा हुआ है, बोली – वह कौन रो रहा है ! जरा देखो तो।
लेकिन जब कोई जवाब न मिला, तो वह स्वयं कान लगाकर सुनने लगी। सहसा उसका कलेजा धक् से हो गया। तो यह उन्हीं की आवाज है। अब आवाज साफ सुनायी दे रही थी। मंगरु की आवाज थी। वह द्वार के बाहर निकल आयी। उसके सामने एक गोली के अम्पें  पर एजेंट का बंगला था। उसी तरफ से आवाज आ रही थी। कोई उन्हें  मार रहा है। आदमी मार पड़ने  पर ही इस तरह रोता है। मालूम होता है, वही साहब उन्हें मार रहा है। वह वहां खड़ी न रह सकी, पूरी शक्ति से उस बंगले की ओर दौड़ी, रास्ता साफ था। एक क्षण में वह फाटक पर पहुंच गयी। फाटक बंद था। उसने जोर से फाटक पर धक्का दिया, लेकिन वह फाटक न खुला और कई बार जोर-जोर  से पुकारने पर भी कोई बाहर न निकला, तो वह फाटक के जंगलों पर पैर रखकर भीतर कूद पड़ी और उस पार जाते हीं  उसने एक रोमांचकारी दृश्य देखा। मंगरु नंगे बदन बरामदे में खड़ा  था और एक  अंग्रेज उसे हण्टरों से मार रहा था। गौरा की आंखों के सामने अंधेरा छा गया।  वह एक छलांग में साहब के सामने जाकर खड़ी हो गई और मंगरु को अपने अक्षय- प्रेम-सबल हाथों से ढांककर बोली –सरकार, दया करो, इनके बदले मुझे जितना मार लो, पर इनको छोड़ दो।
एजेंट ने हाथ रोक लिया और उन्मत्त की भांति गौरा की ओर कई कदम आकर बोला- हम इसको छोड़ दें, तो तुम मेरे पास  रहेगा।
मंगरु के नथने फड़कने लगे। यह पामर, नीच, अंग्रेज मेरी पत्नी से इस तरह की बातें कर रहा है। अब तक वह जिस अमूल्य रत्न की रक्षा के लिए इतनी यातनांए  सह रहा था,  वही  वस्तु साहब के हाथ में चली जा रही है, यह असह्य था।उसने चाहा कि लपककर साहब की गर्दन पर चढ़ बैठूँ, जो कुछ होना है, हो जाय। यह अपमान सहने के बाद जीकर ही क्या करूँगा। लेकिन नब्बी ने उसे तुरन्त पकड़ लिया और कई आदमियों को बुलाकर उसके हाथ-पाँव बान्ध दिये। मँगरू भूमि पर छटपटाने लगा।गौरा रोती हुई साहब के पैरों पर गिर पड़ी और बोली – हुजूर, इन्हें छोड़ दें, मुझ पर दया करें।एजेंट – तुम हमारे पास रहेगा।गौरा ने खून का घूँट पीकर कहा – हाँ, रहूँगी।

बाहर मँगरू बरामदे में पड़ा कराह रहा था। उसकी देह में सूजन थी और घावों में जलन, सारे अंग जकड़ गए थे। हिलने की भी शक्ति न थी। हवा घावों में शर के समान चुभती थी, लेकिन यह व्यथा वह सह न सकता था। असह्य यह था कि साहब गौरा के साथ इसी घर में विहार कर रहा है और मैं कुछ नहीं कर सकता। उसे अपनी पीड़ा भूल सी गई थी, कान लगाए सुन रहा था कि उनकी बातों की भनक कान में पड़ जाए, तो देखूँ क्या बातें हो रही हैं। गौरा अवश्य चिल्लाकर भागेगी और साहब उसके पीछे दौड़ेगा। अगर मुझ से उठा जाता, तो उस वक्त बचा को खोदकर गाड़ ही देता। लेकिन बड़ी देर हो गई न तो गौरा चिल्लाई, न बंगले से निकलकर भागी। वह उस सजे-सजाए कमरे में साहब के साथ बैठी सोच रही थी – क्या इसमें तनिक भी दया नहीं है? मँगरू का पीड़ा क्रन्दन सुन-सुनकर उसके हृदय के टुकड़े हुए जाते थे। क्या इसके अपने भाईबन्द, माँ-बहन नहीं है? माता यहाँ होती तो उसे इतना अत्याचार न करने देती। मेरी अम्मा लड़कों पर कितना बिगड़ती थीं, जब वह किसी को पेड़ पर ढेले चलाते देखती थीं। पेड़ में भी प्राण होते हैं। क्या इसकी माता इसे एक आदमी के प्राण लेते देखकर भी इसे मना न करती। साहब शराब पी रहा था और गौरा गोश्त काटने का छुरा हाथ में लिए खेल रही थी।

सहसा गौरा की निगाह एक चित्र की ओर गई। उसमें एक माता बैठी हुई थी। गौरा ने पूछा – साहब यह किसकी तस्वीर है?

साहब ने शराब का गिलास मेज पर रखकर कहा – ओ, यह हमारे खुदा की माँ मरियम है।

गौरा – बड़ी अच्छी तस्वीर है। क्यों साहब तुम्हारी माँ जीती हैं न?

साहब – वह मर गया। जब हम यहाँ आया, तो वह बीमार हो गया। हम उसको देख भी नहीं सका।

साहब के मुखमंडल पर करुणा की झलक दिखाई दी।

गौरा बोली – तब तो उन्हें बड़ा दुख हुआ होगा। तुम्हें अपनी माता का प्यार नहीं था? वह रो-रोकर मर गई और तुम देखने भी नहीं गए? तभी तुम्हारा दिल कड़ा है।

साहब – नहीं नहीं, हम अपनी माता को बहुत चाहता था। वैसी औरत दुनिया में न होगी। हमारा बाप हमको बहुत छोटा-सा छोड़कर मर गया था। माते ने कोयले की खान में मजूरी करके हमको पाला।

गौरा – तब तो वह देवी थी। इतनी गरीबी का दुःख सहकर भी तुम्हें दूसरे पर तरस नहीं आता। क्या वह दया की देवी तुम्हारी बेदरदी देखकर दुःखी न होती होंगी? उनकी कोई तस्वीर तुम्हारे पास है?

साहब – ओ, हमारे पास उनके कई फोटो हैं। देखो,वह उन्हीं की तस्वीर है, वह दीवाल पर।

गौरा ने समीप जाकर तस्वीर देखी और करुण स्वर में बोली – सचमुच देवी थीं, जान पड़ता है, दया की देवी हैं। वह तुम्हें कभी मारती थीं कि नहीं? मैं तो जानती हूँ, वह कभी किसी पर न बिगड़ती होंगी। बिल्कुल दया की मूर्ति हैं।

साहब – ओ, मामा हमको कभी नहीं मारता थ। वह बहुत गरीब था, पर अपने कमाई में कुछ-न-कुछ जरूर खैरात करता था। किसी बे-बाप के बाक को देखकर उसकी आँखों में आँसू भर आता था। वह बहुत ही दयावान था।

गौरा ने तिरस्कार के स्वर में कहा – और उसी देवी के पुत्र होकर तुम इतने निर्दयी हो। क्या वह होतीं तो तुम्हें किसी को इस तरह हत्यारों की भाँति मारने देतीं? वह सरग में रो रही होंगी। सरग-नरक तो तुम्हारे यहाँ भी होगा। ऐसी देवी के पुत्र कैसे हो गए?

गौरा को यह बातें कहते हुए जरा भी भय न होता था। उसने अपने मन में एक दृढ़ संकल्प कर लिया था और अब उसे किसी प्रकार का भय न था। जान से हाथ धो लेने का निश्चय कर लेने के बाद भय की छाया भी नहीं रह जाती। किन्तु वह हृदय-शून्य अंग्रेज इन तिरस्कारों पर आग हो जाने के बदले और भी नम्र होता जाता था। गौरा मानवी भावों से कितनी ही अनभिज्ञ हो, पर इतना जानती थी कि अपनी जननी के लिए प्रत्येक हृदय में, चाहे वह साधु का हो या कसाई का, आदर और प्रेम का एक कोना सुरक्षित रहता है। ऐसा भी कोई अभागा प्राणी है, जिसे मातृ-स्नेह की स्मृति थोड़ी देर के लिए रुला न देती हो, उसके हृदय के कोमल भाव को जगा न देती हो?

साहब की आँखें डबडबा गई थीं। सिर झुकाए बैठा रहा। गौरा ने फिर उसी ध्वनि में कहा – तुमने उनकी सारी तपस्या धूल में मिला दी। जिस देवी ने मर-मरकर तुम्हारा पालन किया, उसी को मरने के पीछे इतना कष्ट दे रहे हो? क्या इसीलिए माता अपने पुत्र को अपना रक्त पिला-पिला कर पालती है? अगर वह बोल सकतीं तो क्या चुप बैठी रहतीं? तुम्हारे हाथ पकड़ सकतीं तो न पकड़तीं? मैं तो समझती हूँ, वह जीती होतीं तो इस वक्त विष खाकर मर जातीं।

साहब अब जब्त न कर सके। नशे में क्रोध की भाँति ग्लानि का वेग सहज ही में उठ आता है। दोनों हाथों से मुँह छिपाकर साहब ने रोना शुरू किया और इतना रोया कि हिचकी बँध गई। माता के चित्र के सम्मुख जाकर वह कुछ देर तक खड़ा रहा, मानो माता से क्षमा माँग रहा हो। तब आकर आर्द्र-कण्ठ से बोला – हमारे माता को अब कैसे शान्ति मिलेगा। हाय हाय, हमारे सबब से उसको स्वर्ग में भी सुख नहीं मिला। हम कितना अभागा है।

गौरा – अभी जरा देर में तुम्हारा मन बदल जाएगा और फिर तुम दूसरों पर अत्याचार करने लगोगे।

साहब – नईं, नईं, अब हम मामा को कभी दुःख नहीं देगा। हम अभी मँगरू को अस्पताल भेजता है।

रात ही को मँगरू अस्पताल पहुँचा दिया गया। एजेंट खुद उसको पहुँचाने आया। गौरा भी उसके साथ थी। मँगरू को ज्वर हो आया था, बेहोश पड़ा हुआ था।

मँगरू ने तीन दिन आँखें न खोलीं और गौरा तीनों दिन उसके पास बैठी रही। एक क्षण के लिए भी वहाँ से न हटी। एजेंट भी कई बार हाल-चाल पूछने आ जाता और हर मरतबा गौरा से क्षमा माँगता।

चौथे दिन मँगरू ने आँखें खोलीं, तो देखा गौरा सामने बैठी हुई है। गौरा उसे आँखें खोलते देखकर पास आ खड़ी हुई और बोली – अब कैसा जी है?

मँगरू ने कहा – तुम यहाँ कब आयी?

गौरा – मैं तो तुम्हारे साथ ही यहाँ आयी थी, तब से यहीं हूँ।

मँगरू – साहब के बंगले में क्या जगह नहीं है?

गौरा – अगर बँगले की चाह होती, तो सात समुद्र-पार तुम्हारे पास क्यों आती?

मँगरू – आकर कौन सा सुख दे दिया है? तुम्हें यही करना था, तो मुझे मर क्यों न जाने दिया?

गौरा ने झुँझला कर कहा – तुम इस तरह की बातें मुझसे न करो। ऐसी बातों से मेरी देह में आग लग जाती है।

मँगरू ने मुँह फेर लिया, मानो उसे गौरा की बात पर विश्वास नहीं आया।

दिन भर गौरा मँगरू के पास बे दाना-पानी खड़ी रही। गौरा ने कई बार उसे बुलाया, लेकिन वह चुप्पी साधे रह गया। यह संदेह-युक्त निरादर, कोमल हृदय गौरा के लिए असह्य था। जिस पुरुष को वह देव-तुल्य समझती थी, उसके प्रेम से वंचित होकर वह कैसे जीवित रह सकती थी? यही प्रेम उसके जीवन का आधार था। उसे खोकर अब वह अपना सर्वस्व खो चुकी थी।

आधी रात से अधिक बीत चुकी थी। मँगरू बेखबर सोया हुआ था, शायद वह कोई स्वप्न देख रहा था। गौरा ने उसके चरणों पर सिर रखा और अस्पताल से निकली। मँगरू ने उसका परित्याग कर दिया था। वह भी उसका परित्याग करने जा रही थी।

अस्पताल के पूर्व दिशा में एक फर्लांग पर एक छोटी सी नदी बहती थी। गौरा उसके कगार पर खड़ी हो गई। अभी कई दिन पहले वह अपने गाँव में
munshi premchandआराम से पड़ी हुई थी। उसे क्या मालूम था कि जो वस्तु इतनी मुश्किल से मिल सकती है, वह इतनी आसानी से खोयी भी जा सकती है। उसे अपनी माँ की, अपने घर की, अपनी सहेलियों की, अपनी बकरी के बच्चों की याद आयी। वह सब कुछ छोड़ कर इसीलिए यहाँ आयी थी? पति के ये शब्द – ‘क्या साहब के बँगले में जगह नहीं है’ उसके मर्मस्थान में बाणों के समान चुभे हुए थे। यह सब मेरे ही कारण तो हुआ। मैं न रहूँगी तो वह फिर आराम से रहेंगे। सहसा उसे ब्राह्मणी की याद आ गयी। उस दुखिया के दिन यहाँ कैसे कटेंगे। चलकर साहब से कह दूँ कि उसे या तो उसके घर भेज दें या किसी पाठशाला में काम दिला दें।

वह लौटना ही चाहती थी कि किसी ने पुकारा – गौरा! गौरा!!

वह मँगरू का करुण कंपित स्वर था। वह चुपचाप खड़ी हो गयी। मँगरू ने फिर पुकारा – गौरा! गौरा!! तुम कहाँ? मैं ईश्वर से कहता हूँ कि…

गौरा ने और कुछ न सुना। वह धम-से नदी में कूद पड़ी। बिना अपने जीवन का अन्त किये वह स्वामी की विपत्ति का अन्त न कर सकती थी।

धमाके की आवाज सुनते ही मँगरू भी नदी में कूदा। वह अच्छा तैराक था। मगर कई बार गोते मारने पर भी गौरा का कहीं पता न चला।

प्रातःकाल दोनों लाशें साथ-साथ नदी में तैर रही थीं। जीवन-यात्रा में उन्हें वह चिर-संग कभी न मिला था। स्वर्ग-यात्रा में दोनों साथ-साथ जा रहे थे।

http://premchand.kahaani.org/2011/05/shudra.html

31 JULY 2015 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना: सावधान !! ये जो आज़ादी की जिंदगी जी रहे हो ये ज्यादा दिनों की नहीं है, देखो चारों तरफ पूँजीवाद हावी होता जा रहा है,आज़ादी फ्री की नहीं होती, इसकी कीमत चुकानी पड़ती है या तो पहले संगर्ष कर के या बाद में जुल्म सहकर| डॉ आंबेडकर के संगर्ष की बदौलत इतने साल आज़ादी से जी लिए पर उनकी मेहनत का कोटा भी तो खत्म होगा, हमने नया क्या जोड़ा…समयबुद्धा

caste-system-3सावधान !!!!! ये जो आज़ादी की जिंदगी जी रहे हो ये ज्यादा दिनों की नहीं है, देखो चारों तरफ ब्राह्मणवाद/पूँजीवाद हावी होता जा रहा है| ध्यान रखना आज़ादी फ्री की नहीं होती| इसकी कीमत चुकानी पड़ती है या तो पहले या बाद में|

-अपना समय और धन निकालकर अगर अम्बेडकरवाद और बुद्धवाद को बढ़ावा देकर ब्राह्मणवाद से सतर्क रहते हो तो ये प्रीपेड होगा

-और अगर अपने को “हिन्दू दलित” समझ कर बस मजे मजे में अपने पूर्वजों के हत्यारों क पूजा करते हुए टाइम पास करते हो, कोई संगर्ष नहीं करते हो तो ब्राह्मणवाद का शिकंजा धीरे धीरे कसता जायेगा और फिर एक दिन गुलाम बन जाओगे वो पोस्टपेड होगा|

और तब तुमको न्याय मिलने का कोई चांस न होगा| मन हो या न हो , ताकत हो या न हो सवर्णों की गुलामी करनी ही होगी, और उसके बदले कीमत नहीं मिलेगी, सड़ा गला खाना मिलेगा बस, अच्छा जीवन ,इलाज ,शिक्षा और अधिकार तो भूल ही जाओ|पहले की तरह तुम्हारे बच्चे इलाज न मिल पाने की वजह से तड़प तड़प कर मरेंगे क्योंकि कोई डॉक्टर अछूतों को नहीं छूएगा|पहले की तरह जब प्यास लगेगी तो गन्दा पानी पीना पड़गा सवर्ण का साफ़ पानी पी लिया तो मार मार कर चमड़ी उधेड़ दी जाएगी| आप चिंता मत करो आप की तो नौकरी लग गयी है आपको अब मंदिर भी जाने दिया जाता है, सवर्णों के यहाँ थोड़ा बहुत पूछ भी मिलने लगी है, आपको कुछ नहीं होगा जो भी होगा आपकी आने वाली पीढ़ियों को होगा|

चिंता न करो ब्राह्मणवाद धीरे धीरे अपना दबाव बनता है पीढ़ियां लग जातीं हैं, उदाहरण के लिए

– सार्वजानिक शिक्षा व्यस्था (सरकारी स्कूल) आज संविधान लागू होने के लगभग साठ साल के अन्दर ही महत्व हीन कर दी गई और गुरुकुल शिक्षा व्यस्था को अंग्रेजी स्कूल के नए रूप में लागू कर दिया गया|सरकारी स्कूल में अक्सर देखा गया है की न तो वहां पढ़ाने वाले हैं न पढने वाले|पहले ज़माने के अनपढ़ के समतुल्य आज सार्वजानिक शिक्षा व्यस्था से निकले व्यक्ति से की जा सकती है और गुरुकुल के से पास सत्ताधारी की तुलना आज के प्राइवेट स्कूल से पास हो रहे लोगों से की जा सकती है|

– बाबा साहब के जाने के चंद सालों में ही ऐसी स्थिति आ गई है की जब भारत की सारी बहुजन जनता सवर्णों के चंगुल में फस गयी है, बाबा साहब द्वारा दिलाई आज़ादी खत्म होती जाambedkar julm hinsa रही है| आप लोगों को याद होगा,याद नहीं है तो इतिहास में सुना होगा की ब्राह्मणवाद जब अपने चरम पर था तब देश के सभी संसाधनों जैसे शिक्षा, धन, धरती,अनाज, पानी, इलाज आदि पर सवर्णों का राज था, प्रेमचंद की कहानी “ठाकुर का कुआँ” सुनी होगी, ऐसी बहुत कहानियां हैं| आपको याद होगा की कैसे जीवन की हर चीज़ के लिए आप सवर्णों की गुलामी करने को मजबूर थे, उनके खेतों में काम करते थे तो जीते थे वरना भूखों मर जाते था, ज्यादा विद्रोही होकर हतियार उठा लेते थे तो आतंकवादी/माओवादी/राक्षश/डकैत आदि घोषित कर के  पाली हुए सेना से मरवा डालते थे|

-आज़ादी के बाद आप नौ से छह बजे तक ही नौकरी करते थे पर अब पूँजीवाद या ब्राह्मणवाद के चलते आपके आने का तो समय है पर जाने का कोई समय नहीं| पहले तनख्वा में गुज़ारा हो जाता है अब दिन रात खटने के बाद भी अच्छी शिक्षा और अच्छे इलाज़ नहीं करवा पाते|पहले आपका बॉस अफसर होता था अब कोई सवर्ण की कम्पनी होती है जिसमें आपका बॉस कोई अफसर भले ही हो पर मालिक सवर्ण होता है जो कानून से नहीं अपने फायदे से आप अकेले से दो तीन लोगों का काम खीच के लेता है| सवर्णों की ये कम्पनियाँ ठीक वैसी ही हैं जैसी पहले जागीरदारों के खेत होते थे, तुम उनमे मजदूरी करते थे तो खाते थे वार्ना भूखे मर जाते थे|

ठीक आज भी वैसा ही स्थिति बनती जा रही है बल्कि  नब्बे प्रतिशत बन चुकी है, ध्यान दो की जब आपका बच्चा पैदा होता है तो वो हस्पताल सवर्ण का होता है क्योंकि सरकारी चिकित्सा व्यस्था बेकार की जा चुकी है, फिर जब वो पढाई करने लायक होता है तो अच्छी पढाई उसे सवर्णों के स्कूलों में ही मिलती है सरकारी शिक्षा व्यस्था बर्बाद की जा चुकी है| फिर जब वो बड़ा होता है नौकरी करना चाहता है तब जो कम्पनियाँ होतीं है वो भी सवर्णों की ही होतीं है क्योंकि बाकि के लोगों को कम्पनियाँ चने नहीं देती सवर्णों की यूनियन| मतलब आपका जीवन हर तरह से सवर्णों के कब्जे में जाता जा रहा है| प्राइवेटीकरण तो  होना ही था पर इसका ब्राह्मणी करण करके केवल सवर्णों को ही मालिक बना डाला है, बहुजन बस मजदूर बन कर रह गया है ये अन्याय है|जी तोड़ मेहनत करके अगर वो कुछ कम भी ले तो अच्छी शिक्षा या अच्छा इलाज के एक झटके में ही उसकी सारी जमा पूँजी सवर्णों की तिजोरियों में पहुंच जाती है|

RSS_20141004आपको अहसास हुआ की पिछले साठ सालों में ही ब्राह्मणवाद का शिकंजा इतना कस गया, नहीं न आपके बच्चों को भी पता नहीं चलेगा की वो कब गुलाम बन गए| ऐसे ही धीरे धीरे देश के सभी संसाधनों के मालिक सवर्ण बनते जायेगे, क्या आपको नहीं पता प्राइवेटईकरन इसी को तो कहते हैं, वो तो शुक्र मनाओ अभी मल्टी नेशनल कम्पनियाँ है क्योंकि भारत को टेक्नोलॉजी भी तो चाहिए, इसलिए अंग्रेजों की कमपनियों में काम करने वाले को अंग्रेजी पालिसी के तहत इंसान समझा जाता है| पर तब क्या होगा जब सवर्ण पूरी तरह से मालिक हो जायेगे, चिंता न करो आपपर नहीं बीतेगी आपकी आने वाली पीढ़ियों पर बीतेगी अभी तो डॉ अबमेडकर की मेहनत द्वारा आपकी आज़ादी का प्रीपेड रिचार्ज चल रहा है, आप तो चैन की नींद सो जाओ और मीडिया जिसे बोले अच्छा है उसे ही वोट दे दो| आपको कोई ये सब समझाए तो उसे दुधकार देना ये कहकर की ‘अब ऐसा कुछ नहीं तू क्यों कट्टरपन्ति जातिवादी बातें करता है’|

अभी डॉ अम्बेडकर के संविधान के पलटने में कुछ समय बाकि है , सो जाओ आपके मालिक जो करें उनको करने दे कोई अगर अपने धर्म को बढ़ा रहा है दान कर रहा है मंदिर बनवा रहा है, खाखी चड्डी पहनकर लाठी, तलवार, बंदूक लेके सुबह पांच बजे ही मीटिंग कर रहा है,आपको गुलाम बनाने की नीतियां और युक्तियाँ खोजी और समझी समझायी जा रही ,करने दो उनको अपनी विचारधारा का प्रचार,क्या हुआ जो सरकारी अफसर और कलेक्टर और जज इस कट्टर विचारधारा में डूबते जा रहे हो, आपको थोड़े ही भुगतना है|

आप कुछ मत करना अपनी आज़ादी को बचाने को, अभी डॉ अम्बेडकर संविधान थोड़े दिन और चलेगा आपका जीवन तो काट ही देगा आगे बच्चे जाने और उनका भविष्ये …. क्या अम्बेडकर और बुद्ध लगा रखा है पका दिया यार….और बोलो बाबा जी जी जय , चलो सत्संग चलते हैं या बोलो गणपत चल दारू ला ….. या बोलो माता मईया की जय …भजन गाओ घंटा बजाओ क्योंकि जैसे दो हज़ार साल तक इन बाबाओं देवताओं ने तुमको ब्राह्मणवाद से बचाये रखा वैसे ही फिर बचा लेंगे क्योंकि तुम भूल गए हो की ये वही देवी देवता हैं बाबा हैं जिनके यहाँ तुम घुस नहीं सकते थे और अगर घुस जाते थे तो मार पड़ती थी अछूतों और ये देवी देवता और बाबा तुमको बचा लेते थे है न| मुझे मालूम है इसको पढ़ कर भी नहीं समझोगे इसीलिए तो नीच कहे जाते हो….

sfnac2yब्राह्मणवाद का डिजाइन और मकसद ये रहता है की कैसे दस प्रतिशत बुद्धिजीवियों को संगठित करके नब्बे प्रतिशत जनता और संसाधनों पर कब्ज़ा किया जाए| इसी मकसद के लिए धर्म, ईश्वर, वर्ण व्यस्था और जातिवादी व्यस्था बनाई और सदियों से चलाई जा रही है|अपने आस पास देखो देश की नब्बे प्रतिशत पूँजी और संसाधन किसके पास हैं और केवल दस प्रतिशत पूँजी और संसाधन में नब्बे प्रतिशत जनता को ठूस रखा है,क्या ये अपकृतिक बटवारा अन्याय नहीं है? ब्राह्मणवादी विचारधार कामयाब इसलिए हैं क्योंकि ये धन और शक्ति के संचय पर केंद्रित रहते है और इनको केवल दस प्रतिशत जनता को ही साधना होता है जो आपस में “फायदे” की वजह से एक दुसरे के जबरदस्त सहयोगी हो जाते हैं|वहीँ बुद्धवाद को नब्बे प्रतिशत बहुजन को फायदे की जगह न्याय से साधना पड़ता है जो की बहुजन की अनदेखी और नासमझी के कारन बहुत मिश्किल है|

भारत का अम्बेडकरवादी संविधान बुद्धवादी यही इसीलिए जनता पर गुज़रे ज़माने के मुकाबले कोई अत्याचार नहीं होते, अगर कुछ होते भी है तो उसकी वजह ये है की ब्राह्मणवादी संविधान को ठीक से लागू नहीं करते|ब्राह्मणवादियों की क्रूरता,अन्याय,दमन आदि और बहुजन जनता के बीच में संविधान खड़ा है, सोचो अगर संविधान न हो तो क्या हाल हो|ब्राह्मणवादी हमेश ये कोशिश करेंगे की शक्ति एक जगह या व्यक्ति पर केंद्रित हो और उसको ये अपने इशारे पर नचाएँ| जबकि बुद्धवादी व्यस्था में शक्ति का बटवारा करके तनशाही को रोकती है| इसका उदाहरण है की भारत के संविधान में शक्ति किसी एक राजा को नहीं दी, शाशन की शक्ति बटी है जनता के वोट देने के अधिकार में, न्याय पालिका,कार्ये पालिका, विधायिका, सेना और राज्ये सरकार व् केंद्र सरकार| तबी तो इस बुद्धवादी व्यस्था में अगर राजा गलत फैसले ले या अन्यायी हो तो बाकि के शक्ति-हिस्सेदार उसे हटा सकते हैं, जनता का भला ही बुधवादी व्यस्था है| पर ब्राह्मणवादी व्यस्था में शक्ति का एक ही केंद्र बनाया जाता है जैसे कोई राजा या कोई ईश्वर, तथाकथित ईश्वर भी शक्ति का केंद्र ही है जिसके आड़ में ब्राह्मणवादी जनता का शोषण करते हैं|

ye baudh nahin dalit haiबहुजन विरोधी मनुवाद का मुख्य हथियार ये है कि वो कुछ भी बुरा करने से पहले जनता कि मानसिकता उसके हिसाब से ढाल देते हैं , माहौल बनाते हैं और फिर तीर छोड़ देते हैं|आज मीडिया में कहीं भी न्याय,समानता,रास्ट्रवाद और सामाजिक एकता सुनाई और दिखाई नहीं पड़ती| टीवी पर जिंतनी भी फिल्मे आ रहीं हैं या अब बन रहीं हैं उसमे दो ही बात है एक वो पैसा कमाए दूसरा उसमें सामंतवादी मानसिकता को लोगों के दिमाग में बैठा दे| हर फ़िल्म में किसी न किसी तरह कोई एक बाहुबली होता है जिससे जनता और पुलिस डरती है, न्याय व्यस्था और समानता सभी जगह से गायब|फिर एक हीरो आता है वो भी मार काट मचाकर वापस उसी तरह कि व्यस्था कायम करता है, पहले दूसरा डिक्टेटर था फिर हीरो डिक्टेटर बन जाता है, फिर जनता उसकी पूजा करती है| इस सब कहानी में ये बताना कभी नहीं भूलते कि हीरो बहुत बड़ा हिन्दू देवी देवता भक्त है| खासकर कि साउथ इंडिया कि फिल्मों में इसी अन्यायी मानसिकता कि जबर दस्त डोज समाज को पिलाई जा रही है| इस सब अन्यायी मानसिकता के प्रचार में संविधान द्वारा दिए गए हक़, संवेधानिक शाशन कि तारीफ कहीं नहीं दिखाई जाती|आज जब भारत का सुनहरा समय चल रहा है उसे अराजकता के तौर पर लोगों के मन मस्तिष्क में बैठाया जा रहा है|किसी मुद्दे पर भीड़ इकट्ठी कर कर के संविधानिक व्यस्था के खिलाफ भड़का कर बदलवाने के एक्सपेरिमेंट हर स्तर पर चल रहे हैं जिनसे भावी रणनीति तैयार होगी|ऐसे में एक दिन ऐसा आ जाये जब इस सब अव्यस्था के लिए संविधान को दोषी ठहरकर लोगों को उसके खिलाफ भड़का दिया जाए….ऐसे में बहुजन साथ देकर वापिस अपने ऊपर सामंती राज स्वीकार कर लेंगे.सावधान|

ध्यान रहे इस देश में आज संविधान के आलावा बहुजन लोगों SC+ST+OBC+Minorities का कोई नहीं , आपको नहीं लगता आपको इसकी रक्षा करनी चाहिए, काम से काम इन बातों को अपने लोगों तक पंहुचा तो सकते हो |इग्नोर या नज़रअंदाज़ करने से दुःख शुरू होता है|

सवर्णों और दलितों में जो सबसे बड़ा फर्क मुझे समझ में आया वो ये है की जैसे ही सुख के दिन आते हैं दलित अपने समाज और संगर्ष को छोड़ देता है जबकि सवर्ण इसके उलट जितना संपन्न होता जाता है उतना ही संगर्ष और अपने समाज के उत्थान के लिए समर्पित होता जाता है| हमारे सक्षम वर्ग को ये समझना होगा की अम्बेडकरवाद संगर्ष के चलते उनकी जिन्दगी में आज जो सम्पन्नता आई है उससे अर्जित ज्ञान,धन और समय का ५% हिस्सा इसी संगर्ष पर खर्च करना होगा वरना वो नीं दूर नहीं ये ५% बचने के चक्कर में पूरा १०० % छीनने वाले का सामना अकेले करना पड़ेगा|

for solution of all these problems please read following dhamm deshna

4-Apr-2015 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: हमारी समस्या दैविक नहीं है इसलिए देवपूजा और मन्दिरबाजी से कुछ न हुआ न ही होगा, हमारी समस्या सामाजिक और राजनीति है, इसका समाधान भी सामाजिक और राजनैतिक संगर्ष से ही होगा|इसके लिए हमारे लोग के पास चर्चा का प्लेटफार्म (बौद्ध विहार संस्था) को दुरुस्त करना होगा …समयबुद्धा

https://samaybuddha.wordpress.com/2015/04/04/4-apr-2015-samaybuddha-vishesh-poornim-dhamm-deshna/

रवीश कुमार : क्या ऑनलाइन गुंडागर्दी से तय होगी देशभक्ति…?…लेखक रविश कुमार NDTV

ravish-kumarआज सुबह व्हॉट्सऐप, मैसेंजर और ट्विटर पर कुछ लोगों ने एक प्लेट भेजा, जिस पर मेरा भी नाम लिखा है। मेरे अलावा कई और लोगों के नाम लिखे हैं। इस संदर्भ में लिखा गया है कि हम लोग उन लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने याकूब मेमन की फांसी की माफी के लिए राष्ट्रपति को लिखा है। अव्वल तो मैंने ऐसी कोई चिट्ठी नहीं लिखी है और लिखी भी होती तो मैं नहीं मानता, यह कोई देशद्रोह है। मगर वे लोग कौन हैं, जो किसी के बारे में देशद्रोही होने की अफवाह फैला देते हैं। ऐसा करते हुए वे कौन सी अदालत, कानून और देश का सम्मान कर रहे होते हैं। क्या अफवाह फैलाना भी देशभक्ति है।

किसी को इन देशभक्तों का भी पता लगाना चाहिए। ये देश के लिए कौन-सा काम करते हैं। इनका नागरिक आचरण क्या है। आम तौर पर ये लोग किसी पार्टी के भ्रष्टाचारों पर पर्दा डालते रहते हैं। ऑनलाइन दुनिया में एक दल के लिए लड़ते रहते हैं। कई दलों के पास अब ऐसी ऑनलाइन सेना हो गई है। इनकी प्रोफाइल दल विशेष की पहचान चिह्नों से सजी होती हैं। किसी में नारे होते हैं तो किसी में नेता तो किसी में धार्मिक प्रतीक। क्या हमारे लोकतंत्र ने इन्हें ठेका दे रखा है कि वे देशद्रोहियों की पहचान करें, उनकी टाइमलाइन पर हमला कर आतंकित करने का प्रयास करें।

सार्वजनिक जीवन में तरह-तरह के सवाल करने से हमारी नागरिकता निखरती है। क्यों ज़रूरी हो कि सारे एक ही तरह से सोचें। क्या कोई अलग सोच रखे तो उसके खिलाफ अफवाह फैलाई जाए और आक्रामक लफ़्ज़ों का इस्तेमाल हो। अब आप पाठकों को इसके खिलाफ बोलना चाहिए। अगर आपको यह सामान्य लगता है तो समस्या आपके साथ भी है और इसके शिकार आप भी होंगे। एक दिन आपके खिलाफ भी व्हॉट्सऐप पर संदेश घूमेगा और ज़हर फैलेगा, क्योंकि इस खेल के नियम वही तय करते हैं, जो किसी दल के समर्थक होते हैं, जिनके पास संसाधन और कुतर्क होते हैं। पत्रकार निखिल वाघले ने ट्वीट भी किया है, “अब इस देश में कोई बात कहनी हो तो लोगों की भीड़ के साथ ही कहनी पड़ेगी, वर्ना दूसरी भीड़ कुचल देगी…” आप सामान्य पाठकों को सोचना चाहिए। आप जब भी कहेंगे, अकेले ही होंगे।

पूरी दुनिया में ऑनलाइन गुंडागर्दी एक खतरनाक प्रवृत्ति के रूप में उभर रही है। ये वे लोग हैं, जो स्कूलों में ‘बुली’ बनकर आपके मासूम बच्चों को जीवन भर के लिए आतंकित कर देते हैं, मोहल्ले के चौक पर खड़े होकर किसी लड़की के बाहर निकलने की तमाम संभावनाओं को खत्म करते रहते हैं और सामाजिक प्रतिष्ठा को ध्वस्त करने का भय दिखाकर ब्लैकमेल करते हैं। आपने ‘मसान’ फिल्म में देखा ही होगा कि कैसे वह क्रूर थानेदार फोन से रिकॉर्ड कर देवी और उसके बाप की ज़िन्दगी को खत्म कर देता है। उससे पहले देवी के प्रेमी दोस्त को मौके पर ही मार देता है। यह प्रवृत्ति हत्यारों की है, इसलिए सतर्क रहिए।

बेशक आप किसी भी पार्टी को पसंद करते हों, लेकिन उसके भीतर भी तो सही-गलत को लेकर बहस होती है। चार नेताओं की अलग-अलग लाइनें होती हैं, इसलिए आपको इस प्रवृत्ति का विरोध करना चाहिए। याद रखिएगा, इनका गैंग बढ़ेगा तो एक दिन आप भी फंसेंगे। इसलिए अगर आपकी टाइमलाइन पर आपका कोई भी दोस्त ऐसा कर रहा हो तो उसे चेता दीजिए। उससे नाता तोड़ लीजिए। अपनी पार्टी के नेता को लिखिए कि यह समर्थक रहेगा तो हम आपके समर्थक नहीं रह पाएंगे। क्या आप वैसी पार्टी का समर्थन करना चाहेंगे, जहां इस तरह के ऑनलाइन गुंडे हों। सवाल करना मुखालफत नहीं है। हर दल में ऐसे गुंडे भर गए हैं। इसके कारण ऑनलाइन की दुनिया अब नागरिकों की दुनिया रह ही नहीं जाएगी।

ऑनलाइन गुंडागर्दी सिर्फ फांसी, धर्म या किसी नेता के प्रति भक्ति के संदर्भ में नहीं होती है। फिल्म कलाकार अनुष्का शर्मा ने ट्वीट किया है कि वह ग़ैर-ज़िम्मेदार बातें करने वाले या किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान करने वालों को ब्लॉक कर देंगी। मोनिका लेविंस्की का टेड पर दिया गया भाषण भी एक बार उठाकर पढ़ लीजिए। मोनिका लेविंस्की ऑनलाइन गुंडागर्दी के खिलाफ काम कर ही लंदन की एक संस्था से जुड़ गई हैं। उनका प्रण है कि अब वह किसी और को इस गुंडागर्दी का शिकार नहीं होने देंगी। फेसबुक पर पूर्व संपादक शंभुनाथ शुक्ल के पेज पर जाकर देखिए। आए दिन वह ऐसी प्रवृत्ति से परेशान होते हैं और इनसे लड़ने की प्रतिज्ञा करते रहते हैं। कुछ भी खुलकर लिखना मुश्किल हो गया है। अब आपको समझ आ ही गया होगा कि संतुलन और ‘is equal to’ कुछ और नहीं, बल्कि चुप कराने की तरकीब है। आप बोलेंगे तो हम भी आपके बारे में बोलेंगे। क्या किसी भी नागरिक समाज को यह मंज़ूर होना चाहिए।

इन तत्वों को नज़रअंदाज़ करने की सलाह बिल्कुल ऐसी है कि आप इन गुंडों को स्वीकार कर लीजिए। ध्यान मत दीजिए। सवाल है कि ध्यान क्यों न दें। प्रधानमंत्री के नाम पर भक्ति करने वालों का उत्पात कई लोगों ने झेला है। प्रधानमंत्री को लेकर जब यह सब शुरू हुआ तो वह इस ख़तरे को समझ गए। बाकायदा सार्वजनिक चेतावनी दी, लेकिन बाद में यह भी खुलासा हुआ कि जिन लोगों को बुलाकर यह चेतावनी दी, उनमें से कई लोग खुद ऐसा काम करते हैं। इसीलिए मैंने कहा कि अपने आसपास के ऐसे मित्रों या अनुचरों पर निगाह रखिए, जो ऑनलाइन गुंडागर्दी करता है। ये लोग सार्वजनिक जीवन के शिष्टाचार को तोड़ रहे हैं।

मौजूदा संदर्भ याकूब मेमन की फांसी की सज़ा के विरोध का है। जब तक सज़ा के खिलाफ तमाम कानूनी विकल्प हैं, उनका इस्तेमाल देशद्रोह कैसे हो गया। सवाल उठाने और समीक्षा की मांग करने वाले में तो हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई भी हैं। अदालत ने तो नहीं कहा कि कोई ऐसा कर देशद्रोह का काम कर रहे हैं। अगर इस मामले में अदालत का फैसला ही सर्वोच्च होता तो फिर राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास पुनर्विचार के प्रावधान क्यों होते। क्या ये लोग संविधान निर्माताओं को भी देशद्रोही घोषित कर देंगे।

याकूब मेमन का मामला आते ही वे लोग, जो व्यापमं से लेकर तमाम तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण ऑनलाइन दुनिया से भागे हुए थे, लौट आए हैं। खुद धर्म की आड़ लेते हैं और दूसरे को धर्म के नाम पर डराते हैं, क्योंकि अंतिम नैतिक बल इन्हें धर्म से ही मिलता है। वे उस सामूहिकता का नाजायज़ लाभ उठाते हैं, जो धर्म के नाम पर अपने आप बन जाती है या जिसके बन जाने का मिथक होता है। फिल्मों में आपने दादा टाइप के कई किरदार देखें होंगे, जो सौ नाजायज़ काम करेगा, लेकिन भक्ति भी करेगा। इससे वह समाज में मान्यता हासिल करने का कमज़ोर प्रयास करता है। अगर ऑनलाइन गुंडागर्दी करने वालों की चली तो पूरा देश देशद्रोही हो जाएगा।

यह भी सही है कि कुछ लोगों ने याकूब मेमन के मामले को धार्मिकता से जोड़कर काफी नुकसान किया है, गलत काम किया है। फांसी के आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं कि फैसले का संबंध धर्म से नहीं है। लेकिन क्या इस बात का वे लोग खुराक की तरह इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, जो हमेशा इसी फिराक में रहते हैं कि कोई चारा मिले नहीं कि उसकी चर्चा शहर भर में फैला दो। क्या आपने इन्हें यह कहते सुना कि वे धर्म से जोड़ने का विरोध तो करते हैं, मगर फांसी की सज़ा का भी विरोध करते हैं। याकूब का मामला मुसलमान होने का मामला ही नहीं हैं। पुनर्विचार एक संवैधानिक अधिकार है। नए तथ्य आते हैं तो उसे नए सिरे से देखने का विवेक और अधिकार अदालत के पास है।

90 देशों में फांसी की सज़ा का प्रावधान नहीं हैं। क्या वहां यह तय करते हुए आतंकवाद और जघन्य अपराधों का मामला नहीं आया होगा। बर्बरता के आधार पर फांसी की सज़ा का करोड़ों लोग विरोध करते हैं। आतंकवाद एक बड़ी चुनौती है। हमने कई आतंकवादियों को फांसी पर लटकाया है, पर क्या उससे आतंकवाद ख़त्म हो गया। सज़ा का कौन-सा मकसद पूरा हुआ। क्या इंसाफ का यही अंतिम मकसद है, जिसे लेकर राष्ट्रभक्ति उमड़ आती है। इनके हमलों से जो परिवार बर्बाद हुए, उनके लिए ये ऑनलाइन देशभक्त क्या करते हैं। कोई पार्टी वाला जाता है उनका हाल पूछने।

फांसी से आतंकवाद खत्म होता तो आज दुनिया से आतंकवाद मिट गया होता। आतंकवाद क्यों और कैसे पनपता है, उसे लेकर भोले मत बनिए। उन क्रूर राजनीतिक सच्चाइयों का सामना कीजिए। अगर इसका कारण धर्म होता और फांसी से हल हो जाता तो गुरुदासपुर आतंकी हमला ही न होता। उनके हमले से धार्मिक मकसद नहीं, राजनीतिक मकसद ही पूरा होता होगा। धर्म तो खुराक है, ताकि एक खास किस्म की झूठी सामूहिक चेतना भड़काई जा सके। जो लोग इस बहस में कूदे हैं, उनकी सोच और समझ धार्मिक पहचान से आगे नहीं जाती है। वे कब पाकिस्तान को आतंकी बता देते हैं और कब उससे हाथ मिलाकर कूटनीतिक इतिहास रच देते हैं, ऐसा लगता है कि सब कुछ टू-इन-वन रेडियो जैसा है। मन किया तो कैसेट बजाया, मन किया तो रेडियो। मन किया तो हम देशभक्त, मन किया तो आप देशद्रोही।ravish kumar abused bu hidu extrimest

http://khabar.ndtv.com/news/blogs/ravish-kumar-writes-about-online-goons-and-the-patriotism-1200971

आओ धर्म और धम्म शब्द में में अंतर जाने….team SBMT

DHAMMA or DHARMA“धर्म और धम्म”

धर्म एक अनिश्चित शब्द है जिसका कोई स्थिर. अर्थ नही है किन्तु इसके अर्थ अनेक है इसका कारण है धर्म बहुत सी अवस्थाओं से होकर गुजरा है। हर अवस्था मे हम उस मान्यता विशेष को धर्म ही कहते रहे है। निसन्देह हर एक समय कि मान्यता अपने से पूर्व की मान्यताओ से भिन्न रही है।धर्म की कल्पना भी कभी स्थिर नही रही है यह. हर समय बदलती चली आयी है
एक समय था जब बिजली वर्षा और बाढ की घटनाये आम आदमी की समझ. से सर्वथा परे की बात थी इन सब पर काबू पाने के लिये जो भी कुछ टोना टुटका किया जाता था उस समय धर्म और जादू एक ही चीज के दो नाम थे।
धर्म के विकाश मे दूसरा समय आया इस समय धर्म का मतलब था आदमी के विश्वास, धार्मिक कर्मकाण्ड, रीति रिवाज, प्रार्थनाये और बलियो वाले यज्ञ. ।
लेकिन धर्म का स्वरुप व्युत्पन्न. है।धर्म का केन्द्रबिन्दु इस विश्वास पर निर्भर करता है कि कोई शक्ति विशेष है जिनके कारण ये सभी घटनाये घटती है और जो आदमी की समझ से परे की बात है।अब इस अवस्था मे पहुँच कर जादू का प्रभाव जाता रहा। आरंभ मे यह शक्ति शैतान के रुप मे थी किन्तु बाद मे यह माना जाने लगा कि शिव( कल्याण) रुप हो सकती है । तरह- तरह के विश्वास, कर्मकाण्ड. शिव स्वरुप शक्ति को प्रसन्न करने के लिये एवं क्रोध रुपी शक्ति को सन्तुष्ट रखने के लिये आवश्यक थे आगे चलकर वही शक्ति ईश्वर, परमात्मा या दुनिया को बनाने वाली कहलाई।
तब धर्म की मान्यता ने तीसरी शक्ल ग्रहण की तब यह माने जाने लगा कि इस एक ही शक्ति ने आदमी और दुनिया बनाया है यानि दोनो को पैदा किया है।इसके बाद धर्म की मान्यता मे एक बात और भी शामिल हो गयी कि हर आदमी के शरीर मे एक आत्मा है और आदमी जो भी भला और बुरा काम करता है उस आत्मा को ईश्वर के प्रति उत्तरदायी रहना पडता है यही धर्म की मान्यता के विकास का इतिहास है।अब धर्म का यही अर्थ हो गया है या धर्म से यही भावार्थ ग्रहण किया जाता है कि ईश्वर मे विश्वास ,आत्मा मे विश्वास, ईस्वर की पूजा, आत्मा मे सुधार, प्रार्थना आदि करके ईस्वर को प्रसन्न रखना।
तथागत गौतम बुद्ध जिसे धम्म कहते है वह धर्म से सर्वथा भिन्न है । कहा जाता है कि धर्म या रिलिजन व्यक्तिगत. चीज है और आदमी को अपने तक सिमित रखना चाहिये। इसे सार्वजनिक जीवन मे बिल्कुल दखल नही देना चाहिये जबकि धम्म एक सामाजिक वस्तु है धम्म का मतलब है सदाचरण। जिसका मतलब है जीवन के सभी क्षेत्रों मे एक आदमी का दुसरे आदमी के प्रति अच्छा व्यवहार। इससे स्पष्ट. होता है कि यदि कही एक आदमी अकेला ही हो तो उसे किसी धम्म की आवश्यकता नही लेकिन कही दो आदमी एक साथ रहते हो तो वो चाहे या ना चाहे धम्म के लिये जगह बनानी ही होगी। दोनो मे से कोई एक बचकर नही जा सकता। दूसरे शब्दो मे धम्म के बिना समाज का काम नही चल सकता।
तथागत के अनुशार धम्म के दो प्रधान तत्व है प्रज्ञा और करुणा। प्रज्ञा का मतलब है बुद्धि (निर्मल बुद्धि) बुद्ध ने प्रज्ञा को सर्वप्रथम इसलिये माना है कि वे नही चाहते थे कि मिथ्या विश्वासों के लिये कही कोई गुन्जाईश बची रहे दूसरा करुणा जिसका मतलब है दया, मैत्री, प्रेम इसके बिना न समाज रह सकता है न समाज की उन्नति हो सकती है । तथागत की धम्म देशना का यही उद्देश्य है कि जो धम्म के अनुसार आचरण करेगा वह अपने दु:ख का नाश करेगा॥
जबकि धर्म का सरोकार ईश्वर और सृष्टि से है और धम्म का इन सब वातो से कोई सरोकार नही उनका कहना है कि ईश्वर कहाँ है ,सन्सार असीम है आत्मा और शरीर एक है, इन प्रश्नो के उत्तर मे जाने से किसी को कोई लाभ होने वाला नही है इनका धम्म से कोई भी सम्बन्ध नही है, इनसे आदमी का आचरण सुधारने मे कुछ भी सहायता नही मिलती, इनसे विराग नही बढता, इनसे राग द्वेष से मुक्ति लाभ नही मिलता, इससे विद्या( ज्ञान) प्राप्त. नही होता।
तथागत ने बताया कि दु:ख क्या है ,दु:ख का मूल कारण क्या है, दु:ख को रोकने का मार्ग क्या है, इनसे लोगो को लाभ है, इनसे आदमी को अपना आचरण सुधारने मे सहायता मिलती है, राग द्वेष से मुक्ति मिलती है, इसे शान्ति मिलती है विद्या प्राप्त होती है और ये निर्वाण ( मोक्ष) की ओर अग्रसर. होते है।
नैतिकता का धर्म और रेलिजिन मे कोई स्थान नही है। नैतिकता धर्म का मूलाधार नही है यह एक रेल के उस डिब्बे के समान है कि जब चाहे इन्जन मे जोड दिया जाये और जब चाहे पृथक कर दिया जाये अर्थात धर्म मे नैतिकता का स्थानआकस्मिक है ताकि व्यवस्था और शान्ति मे उपयोगी सिद्ध हो सके। जबकि धम्म मे नैतिकता का स्थान है दुसरे शब्दो मे धम्म ही नैतिकता है अथवा नैतिकता ही धम्म है । यद्यपि धम्म मे ईश्वर के लिये कोई स्थान नही है तो भी धम्म मे नैतिकता का वही स्थान है जो धर्म मे ईश्वर का।
धम्म मे जो नैतिकता है उसका सीधा मूल श्रोत आदमी को आदमी से मैत्री करने की जो आवश्यकता है वही है अपने भले के लिये अथवा दुसरे के भले के लिये यह आवश्यक है कि वह धम्म का आचरण कर मैत्री करे।
हर कोई जानता है कि मानव समाज का जो विकाश हुआ वह जीवन सन्घर्ष के कारण हुआ क्योकि आरम्भिक युग मे भोजन ,सामग्री बडी सिमित मात्रा मे थी जिससे भयानक सन्घर्ष रहा और योग्यतम/ श्रेष्ठतम ही बचा रहा। मानव की मूल अवस्था ऎसी ही रही। किन्तु क्या योग्यतम( सबसे अधिक शक्ति सम्पन्न) ही श्रेष्ठतम माना जाना चाहिये क्या जो निर्बलतम है उसे भी सरक्षण देकर यदि बचाया जाये तो क्या यह आगे चलकर समाज के हित की दृष्टि से अच्छा सिद्ध नही होगा ?

अत्त द्वपो भवः।
भवतु सब्ब मङ्गलम्।

विश्व का ‘सबसे बड़ा’ प्राचीन बौद्ध विहार है बोरोबुदुर, ये इंडोनेशिया के मध्य जावा प्रान्त के मगेलांग नगर में स्थित सातवी सदी का बौद्ध विहार है। ..Team SBMT

Borobudur_Templeबोरोबुदुर अथवा बरबुदुर इंडोनेशिया के मध्य जावा प्रान्त के मगेलांग नगर में स्थित ९वीं सदी का मन्दिर है। यह छः वर्गाकार चबूतरों पर बना हुआ है जिसमें से तीन का उपरी भाग वृत्ताकार है। यह २,६७२ उच्चावचो और ५०४ बुद्ध प्रतिमाओं से सुसज्जित है।[1] इसके केन्द्र में स्थित प्रमुख गुंबद के चारों और स्तूप वाली ७२ बुद्ध प्रतिमायें हैं। यह विश्व का सबसे बड़ा[2][3] और विश्व के महानतम बौद्ध मन्दिरों में से एक है।[4]

इसका निर्माण ९वीं सदी में शैलेन्द्र राजवंश के कार्यकाल में हुआ। मंदिर की बनावट जावाई बुद्ध स्थापत्यकला के अनुरूप है जो इंडोनेशियाई स्थानीय पंथ की पूर्वज पूजा और बौद्ध अवधारणा निर्वाण का मिश्रित रूप है।[4] मंदिर में गुप्त कला का प्रभाव भी दिखाई देता है जो इसमें भारत के क्षेत्रिय प्रभाव को दर्शाता है मगर मंदिर में स्थानीय कला के दृश्य और तत्व पर्याप्त मात्रा में सम्मिलित हैं जो बोरोबुदुर को अद्वितीय रूप से इंडोनेशियाई निगमित करते हैं।[5][6] स्मारक गौतम बुद्ध का एक पूजास्थल और बौद्ध तीर्थस्थल है। तीर्थस्थल की यात्रा इस स्मारक के नीचे से आरम्भ होती है और स्मारक के चारों ओर बौद्ध ब्रह्माडिकी के तीन प्रतीकात्मक स्तरों कामधातु (इच्छा की दुनिया), रूपध्यान (रूपों की दुनिया) और अरूपध्यान (निराकार दुनिया) से होते हुये शीर्ष पर पहुँचता है। स्मारक में सीढ़ियों की विस्तृत व्यवस्था और गलियारों के साथ १४६० कथा उच्चावचों और स्तम्भवेष्टनों से तीर्थयात्रियों का मार्गदर्शन होता है। बोरोबुदुर विश्व में बौद्ध कला का सबसे विशाल और पूर्ण स्थापत्य कलाओं में से एक है।[4]

साक्ष्यों के अनुसार बोरोबुदुर का निर्माण कार्य ९वीं सदी में आरम्भ हुआ और १४वीं सदी में जावा में हिन्दू राजवंश के पतन और जावाई लोगों द्वारा इस्लाम अपनाने के बाद इसका निर्माण कार्य बन्द हुआ।[7]इसके अस्तित्व का विश्वस्तर पर ज्ञान १८१४ में सर थॉमस स्टैमफोर्ड रैफल्स द्वारा लाया गया और इसके इसके बाद जावा के ब्रितानी शासक ने इस कार्य को आगे बढ़ाया। बोरोबुदुर को उसके बाद कई बार मरम्मत करके संरक्षित रखा गया। इसकी सबसे अधिक मरम्मत, यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्द करने के बाद १९७५ से १९८२ के मध्य इंडोनेशिया सरकार और यूनेस्को द्वारा की गई।[4]

बोरोबुदुर अभी भी तिर्थयात्रियों के लिए खुला है और वर्ष में एक बार वैशाख पूर्णिमा के दिन इंडोनेशिया में बौद्ध धर्मावलम्बी स्मारक में उत्सव मनाते हैं। बोरोबुदुर इंडोनेशिया का सबसे अधिक दौरा किया जाने वाला पर्यटन स्थल है।

निर्माण

जी॰बी॰ हुइगर की चित्रकारी (c. १९१६—१९१९) जिसमें बोरोबुदुर के उमंग के समय का दृश्य बनाया गया है।

इसका कोई लिखीत अभिलेख नहीं है जो बोरोबुदुर के निर्माता अथवा इसके प्रयोजन को स्पष्ट करे।[21] इसके निर्माण का समय मंदिर में उत्कीर्णित उच्चावचों और ८वीं तथा ९वीं सदी के दौरान शाही पात्रों सामान्य रूप से प्रयुक्त अभिलेखों की तुलना से प्राकल्लित किया जाता है। बोरोबुदुर सम्भवतः ८०० ई॰ के लगभग स्थापित हुआ।[21] यह मध्य जावा में शैलेन्द्र राजवंश के शिखर काल ७६० से ८३० ई॰ से मेल खाता है।[22] इस समय यह श्रीविजय राजवंश के प्रभाव में था। इसके निर्माण का अनुमानित समय ७५ वर्ष है और निर्माण कार्य सन् ८२५ के लगभग समरतुंग के कार्यकाल में पूर्ण हुआ।[23][24]

जावा में हिन्दू और बौद्ध शासकों के समय में भ्रम की स्थिति है। शैलेन्द्र राजवंश को बौद्ध धर्म के कट्टर अनुयायी माना जाता है यद्यपि सोजोमेर्टो में प्राप्त पत्थर शिलालेखों के अनुसार वो हिन्दू थे।[23] यह वो समय था जब विभिन्न हिन्दू और बौद्ध स्मारकों का केदु मैदानी इलाके के निकट मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण हुआ। बोरोबुदुर सहित बौद्ध स्मारकों की स्थापना लगभग उसी समय हुई जब हिन्दू शिव प्रमबनन मंदिर का निर्माण हुआ। ७२० ई॰ में शैव राजा संजय ने बोरोबुदुर से केवल 10 किमी (6.2 मील) पूर्व में वुकिर पहाड़ी पर शिवलिंग देवालय को शुरू किया।[25]

बोरोबुदुर सहित बौद्ध मंदिर का निर्माण उस समय सम्भव था क्योंकि संजय के उत्तराधिकारी रकाई पिकतन ने बौद्ध अनुयायीयों को इस तरह के मंदिरों के निर्माण की अनुमति प्रदान कर दी थी।[26]सन् ७७८ ई॰ से दिनांकित कलसन राज-पत्र में लिखे अनुसार, वास्तव में, उनके प्रति अपना सम्मान प्रदर्शन करने के लिए पिकतन ने बौद्ध समुदाय को कलसन नामक गाँव दे दिया।[26] जिस तरह हिन्दी राजा ने बौद्ध स्मारकों की स्थापना में सहायता करना अथवा एक बौद्ध राजा द्वारा ऐसा ही करना, जैसे विचारों से प्रेरित कुछ पुरातत्वविदों का मत है कि जावा में कभी भी बड़ा धार्मिक टकराव नहीं था।[27] हालांकि, यह इस तरह है कि वहाँ पर एक ही समय पर दो विरोधी राजवंश थे—बौद्ध शैलेन्द्र राजवंश और शैव संजय—जिनमें बाद में रतु बोको महालय पर ८५६ ई॰ में युद्ध हुआ।[28] भ्रम की स्थिति प्रमबनन परिसर के लारा जोंग्गरंग मंदिर के बारे में मौजूद है जो संजय राजवंश के बोरोबुदुर के प्रत्युत्तर में शैलेन्द्र राजवंश के विजेता रकाई पिकतान ने स्थापित करवाया।[28] लेकिन अन्य मतों के अनुसार वहाँ पर शान्तिपूर्वक सह-अस्तित्व का वातावरण था जहाँ लारा जोंग्गरंग में शैलेन्द्र राजवंश का की भागीदारी रही।[29]

परित्याग

पहाड़ी पर अनदेखे बोरोबुदुर स्तूप। सदियों तक ये सुनसान पड़ा रहा।

बोरोबुदुर को कई सदियों तक ज्वालामुखीय राख और जंगल विकास ने छुपाये रखा। इसके परित्याग के पिछे के कारण भी रहस्यमय हैं। यह ज्ञात नहीं है कि स्मारक का उपयोग और तीर्थयात्रियों के लिए इसे कब बन्द किया गया था। सन् ९२८ और १००६ के मध्य शृंखलाबद्ध ज्वालामुखियाँ फुटने के कारण राजा मपु सिनदोक ने माताराम राजवंश की राजधानी को पूर्वी जावा में स्थानान्तरित कर दिया; यह निश्चित नहीं है कि इससे परित्याग प्रभावित है लेकिन विभिन्न स्रोतों के अनुसार यह परित्याग का सबसे उपयुक्त समय था।[7][20] स्मारक का अस्पष्ट उल्लेख मध्यकाल में १३६५ के लगभग मपु प्रपंचा की पुस्तक नगरकरेतागमा में मिलता है जो मजापहित काल में लिखी गई तथा इसमें “बुदुर में विहार” का उल्लेख है।[30] सोेक्मोनो (१९७६) ने भी लौकिक मत का उल्लेख किया है जिसके अनुसार १५वीं सदी में जब लोगों ने इस्लाम में धर्मान्तरित करना आरम्भ किया तो मंदिर को उजाड़ना आरम्भ कर दिया।[7]

स्मारक को पूर्णतया नहीं भूलाया जा सका, क्योंकि लोक कथायें इसके महिमापूर्ण इतिहास से असफलता और दुर्गति के साथ अंधविश्वासों से जुड़ गयी। १८वीं सदी के दो प्राचीन जावाई वृत्तांतों (बाबाद) में स्मारक के साथ जुड़ी नाकामयाबियों की कथा का उल्लेख मिलता है। बाबाद तनाह जावी (अथवा जावा का इतिहास) के अनुसार १७०९ में माताराम साम्राज्य के राजा पकुबुवोनो प्रथम के प्रति विद्रोह करना मास डाना के लिए घातक कारक सिद्ध हुआ।[7] उसमें उल्लिखीत है कि “रेडी बोरोबुदुर” पहाड़ी की घेराबंदी की गई और विद्रोहियों की इसमें पराजय हुई तथा राजा ने उन्हें मौत की सजा सुनायी। बाबाद माताराम (अथवा माताराम साम्राज्य का इतिहास) में, स्मारक को सन् १७५७ में योग्यकर्ता सल्तनत के युवराज राजा मोंचोनागोरो के दुर्भाग्य से जोड़ा गया है।[31] इसमें लिखे हुये के अनुसार स्मारक में प्रवेश निषेध होने के बावजूद “वो एक छिद्रित स्तूप (कैद में डाला हुआ एक शूरवीर) लेकर गये”। अपने महल में वापस आने के बाद वो बिमार हो गये और अगले दिन उनका निधन हो गया।

पुनराविष्कार

१९वीं सदी के मध्य में बोरोबुदुर के मुख्य स्तूप पर काष्ठचत्वर लगाया गया।

जाव को अधिकृत करने के बाद १८११ से १८१६ के मध्य यह ब्रितानी प्रशासन के अधीन रहा। यहाँ का कार्यभार लेफ्टिनेंट गवर्नर-जनरल थॉमस स्टैमफोर्ड रैफल्स को सौंपा गया। उन्होंने जावा के इतिहास में गहरी रूचि ली। उन्होंने जावा की प्राचीन वस्तुओं को लिया और द्वीप पर अपने दौरे के दौरान वहाँ के स्थानीय निवासीयों के साथ सम्पर्क के माध्यम से सामग्री तैयार की। सन् १८१४ में सेमारंग के निरीक्षण दौर पर, बुमिसेगोरो के गाँव के पास एक जंगल के खाफी अन्दर एक बड़े स्मारक के बारे में जानकारी प्राप्त की।[31] वो इसकी खोज करने में स्वयं असमर्थ थे अतः उन्होंने डच अभियंता एच॰सी॰ कॉर्नेलियस को अन्वेषण के लिए भेजा। दो माह बाद कॉर्नेलियस और उनके २०० लोगों ने पेड़ों को काट दिया, नीचे की घास को जला दिया और जमीन को खोदकर स्मारक को बाहर निकाला। स्मारक के ढ़हने के खतरे को देखते हुये वो सभी वीथिकाओं का पता लगाने में असमर्थ रहे। यद्यपि यह खोज कुछ वाक्यों में ही उल्लिखीत है, रैफल्स को स्मारक के पुनरुद्धार का श्रेय दिया जाता है क्योंकि वो स्मारक को दुनिया के सामने रखने वालों में से एक थे।[12]

केदु क्षेत्र के डच प्रशासक हार्टमान ने कॉर्नेलियस के कार्य को लगाता आगे बढ़ाया और १८३५ में पूरे परिसर को भूमि से बाहर निकाला। उनकी बोरोबुदुर में आधिकारिक से भी अधिक व्यक्तिगत दिलचस्पी थी। उन्होंने इस बारे में कोई लेखन कार्य नहीं किया। विशेष रूप से कथित कहानियों के अनुसार उन्होंने मुख्य स्तूप में बुद्ध की बड़ी मूर्ति को खोजा।[32] सन् १८४२ में हार्टमान ने मुख्य गुम्बद का अन्वेषण किया, हालांकि उनके द्वारा खोजा गया कार्य अज्ञात है और मुख्य स्तूप खाली है।

सन् १८७२ में बोरोबुदुर

डच ईस्ट इंडीज सरकार ने एक डच आधिकारिक अभियंता एफ॰सी॰ विल्सन यह कार्य सौंपा। उन्होंने स्मारक का अध्ययन किया और उच्चावचों के सैकड़ों रेखा-चित्र बनाये। जे॰एफ॰जी॰ ब्रुमुण्ड को भी स्मारक का अध्ययन करने के लिए नियुक्त किया गया और उन्होंने अपना कार्य १८५९ में पूर्ण किया। सरकार ने विल्सन के रेखाचित्रों को साथ जोड़कर ब्रुमुण्ड के कार्य पर आधारित लेख प्रकाशित करना चाहती थी लेकिन ब्रुमुण्ड ने सहयोग नहीं किया। सरकार ने बाद में एक अन्य शोधार्थी सी॰ लीमान्स को यह कार्य सौंपा। उन्होंने विल्सन के स्रोतों और ब्रुमुण्ड के कार्य पर आधारित विनिबंध संकलित किये। सन् १८७३ में बोरोबुदुर के अध्ययन का विनिबंधात्मक अध्ययन उनका अंग्रेज़ी में प्रकाशन हुआ और उसके एक वर्ष बाद इसे फ्रांसीसी भाषा में अनुवाद भी प्रकाशित किया गया।[32] स्मारक का प्रथम चित्र १८७३ में डच-फ्लेमिश तक्षणकार इसिडोर वैन किंस्बेर्गन ने लिया।[33]

धीरे-धीरे इस स्थान का गुणविवेचन होने लगा और यह व्यापक रूप में यादगार के रूप में और चोरों तथा स्मारिका खोजियों के लिए आय का साधन बना रहा। सन् १८८२ में सांस्कृतिक कलाकृतियों के मुख्य निरीक्षक ने स्मारक की अस्थायी स्थिति के कारण उच्चावचों को किसी अन्य स्थान पर संग्राहलय में स्थानान्तरित करने का अनुग्रह किया।[33] इसके परिणामस्वरूप सरकार ने पुरातत्वविद् ग्रोयनवेल्ड्ट को स्थान का अन्वेषण करने और परिसर की वास्तविक स्थिति ज्ञात करने के लिए नियुक्त किया; अपने प्रतिवेदन में उन्होंने पाया कि इस तरह के डर अनुचित हैं और इसे उसी स्थिति में बरकरार रखने का अनुग्रह किया।

बोरोबुदुर स्मृति चिह्नों के स्रोत के रूप में जाना जाने लगा और इसकी मूर्तियों के भागों को लूट लिया गया। इनमें से कुछ भाग तो औपनिवेशिक सरकार सहमति से भी लूटे गये। सन् १८९६ में श्यामदेश के राजाचुलालोंगकॉर्न ने जावा की यात्रा की और बोरोबुदुर से मूर्तियाँ ले जाने का आग्रह किया। उन्हें मूर्तियों के आठ छकड़ा भर लाने की अनुमति मिल गई। इसमें विभिन्न स्तंभों से लिए गये तीस उच्चावच, पाँच बुद्ध के चित्र, दो शेर की मूर्तियाँ, एक व्यालमुख प्रणाल, सीढ़ियों और दरवाजों से कुछ काला अनुकल्प और द्वारपाल की प्रतिमा सम्मिलित हैं। इनमें से कुछ प्रमुख कलाकृतियाँ, जैसे शेर, द्वारपाल, काला, मकर और विशाल जलस्थल (नाले) आदि, बैंकॉक राष्ट्रीय संग्रहालय के जावा कला कक्ष में प्रदर्शित की जाती हैं।[34]

पुनःस्थापन

१९११ में वैन एर्प के पुनःस्थापन के बाद बोरोबुदुर। इसके मुख्य स्तूप के शीर्ष शीखर परछत्र बनाया गया था (अब ध्वस्त)।

बोरोबुदुर ने सन् १८८५ में उस समय ध्यान आकर्षित किया योग्यकर्ता में पुरातत्व समुदाय के अध्यक्ष यजेर्मन ने एक छुपे हुये पैर को खोज निकाला।[35] उच्चावचों के छुपे हुये पैर व्यक्त करने वाले चित्र १८९०–१८९१ में बने थे।[36] डच ईस्ट इंडीज़ सरकार ने इस खोज के बाद स्मारक की रक्षा के लिए कदम उठाये। सन् १९९० में सरकार ने स्मारक के उपयोग के लिए तीन अधिकारियों का एक आयोग बनाया। इनमें कला इतिहासकार ब्रांडेस, डच सेना के अभियंता अधिकारी थियोडोर वैन एर्प और लोक निर्माण विभाग के निर्माण अभियंता वैन डी कमर शामिल थे।

सन् १९०२ में आयोग ने सरकार के सामने तीन प्रस्तावों वाली योजना रखी। इसमें पहले प्रस्ताव में कोनों को पुनः स्थापित करने, ठीक से नहीं लगे पत्थरों को हटाना, वेदिकाओं का सुदृढ़ीकरण और झरोखे, महिराब (तोरण), स्तूप और मुख्य गुम्बद को पुनः स्थापित करना शामिल था जिससे तत्काल हो सकने वाले दुर्घटनाओं को रोका जा सके। दूसरे प्रस्ताव में प्रकोष्ठ को हटाना, उचित रखरखाव उपलब्ध कराना, तलों (छतों) और स्तूपों की मरम्मत करके जल की निकासी में सुधार करना शामिल था। उस समय इस कार्य की कुल अनुमानित लागत लगभग ४८,८०० डच गिल्डर थी।

उसके बाद १९०७ से १९११ के मध्य थियोडोर वैन एर्प और पुरातत्व विभाग के नियमों के अनुसार मरम्मत का कार्य किया गया।[37] इसकी मरम्मत के प्रथम सात माह तक बुद्ध की मूर्तियों के सिर और स्तम्भों के पत्थर खोजने के लिए स्मारक के आसपास खुदाई में लग गये। वैन एर्प ने तीनों उपरी वृत्ताकार चबूतरे और स्तूपों को ध्वस्थ करके पुनः निर्मित किया। इसी बीच, वैन एर्प ने स्मारक में सुधारने हेतु अन्य विषयों की खोज की; उन्होंने के और प्रस्ताव रखा जो अतिरिक्त ३४,६०० गिल्डर की लागत के साथ स्वीकृत हो गया। पहली नज़र में बोरोबुदुर अपनी पुरानी महिमा के साथ स्थापित हो गया। वैन एर्प ने सावधानीपूर्वक मुख्य स्तूप के शिखर पर छत्र (तीन स्तरीय छतरी) पुनर्निर्माण का कार्य आरम्भ करवाया। हालांकि बाद में उन्होंने छत्र को पुनः हटा दिया क्योंकि शिखर के निर्माण में मूल पत्थर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थे। अर्थात बोरोबुदुर के शिखर की मूल बनावट ज्ञात नहीं है। हटाया गया छत्र अब बोरोबुदुर से कुछ सैकड़ों मीटर उत्तर में स्थित कर्मविभांगगा संग्राहलय में रखा गया है।

परिमित बजट के कारण पुनःस्थापन के कार्य को प्राथमिक रूप से मूर्तियों की सफाई पर केन्द्रित रखा गया तथा वैन एर्प ने जलनिकासी की समस्या का समाधान नहीं किया। पन्द्रह वर्षो में गलियारे की दिवारे झुकने लगी और उच्चावचों में दरार तथा ह्रास दिखायी देने लग गया।[37] वैन एर्प ने कंकरीट काम में लिया था जिससे क्षारीय लवण तथा कैल्शियम हाइड्रोक्साइड का घोल बाहर आने लगा जिसका अपवाहन बाकी निर्माण में भी होने अगा। इसके कारण कुछ समस्यायें आने लगी और इसके पूरी तरह से नवीकरण की तत्काल आवश्यकता पड़ी।

१९७३ में की गई मरम्मत के दौरान बोरोबुदुर की जलनिकासी में सुधार के लिए पीवीसी नाले और कंकरीट का अंतःस्थापन

तत्काल कुछ लघु मरम्मत का कार्य किया गया लेकिन वो पूर्ण सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं था। द्वितीय विश्वयुद्ध और १९४५ से १९४९ में इंडोनेशियाई राष्ट्रीय क्रांति के दौरान, बोरोबुदुर के पुनःस्थापन के प्रयासों को रोकना पड़ा। इस समय स्मारक मौसम तथा जलनिकासी की समस्या का सामना करना पड़ा जिसके कारण पत्थरों की मूल बनावट में परिवर्तन तथा दीवारों के जमीन मे धँसनें जैसी समस्या उत्पन्न हो गई। १९५० के दशक तक बोरोबुदुर के ढ़हने की कगार पर पहुँच गया था। सन् १९६५ में इंडोनेशिया ने यूनेस्को से बोरोबुदुर सहित अन्य स्मारकों के अपक्षय को रोकने के लिए सहायता मांगी। सन् १९६८ में इंडोनेशिया के पुरातत्व सेवा के प्रमुख प्रोफेसर सोेक्मोनो ने “बोरोबुदुर सरंक्षण” अभियान आरम्भ किया और बड़े पैमाने पर मरम्मत की परियोजना आरम्भ की।[38]

१९६० के दशक के उत्तरार्द्ध में इंडोनेशिया सरकार को अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय ने स्मारक को बचाने के लिए बड़ा नवीनीकरण कराने का अनुरोध किया। सन् १९७३ में बोरोबुदुर के जीर्णोद्धार का महाअभियान चालु किया गया।[39]इसके बाद इंडोनेशिया सरकार और यूनेस्को ने १९७५ से १९८२ तक एक बड़ी नवीनीकरण परियोजना में स्मारक का जीर्णोद्धार का कार्य पूर्ण किया।[37] सन् १९७५ में वास्तविक कार्य आरम्भ हुआ। नवीनीकरण के दौरान दस लाख से भी अधिक पत्थर हटाये गये और उन्हें एक तरफ आरा रूप में रखा गया जिससे उन्हें अलग-अलग पहचाना जा सके तथा सूचीबद्ध रूप से सफैइ और परिरक्षण के लिए काम में लिए जा सकें। बोरोबुदुर नवीन सरंक्षण तकनीक का परीक्षण मैदान बन गया जहाँ पत्थरों के सूक्ष्मजीवों से क्षय की नवीन प्रक्रिया विकसित हो सके।[38] इस प्रक्रिया की नींव रखते हुए सभी १४६० स्तम्भों की सफ़ाई की गई। पुनःस्थापन में पाँच वर्गाकार चबूतरों को हटाकर स्मारक में जलनिकासी में सुधार का कार्य भी शामिल था। अपारगम्य और निस्यंदी दोनों परतें बनायी गई। इस विशाल परियोजना में स्मारक लगभग ६०० लोगों ने कार्य किया और कुल मिलाकर यूएस $६,९०१,२४३ की लागत आयी।[40]

नवीनीकरण समाप्त होने के बाद यूनेस्को ने १९९१ में बोरोबुदुर को विश्व विरासत स्थलों में सूचीबद्ध किया।[4] इसे सांस्कृतिक मानदंड (i) “मानव रचित उत्कृष्ट कृति”, (ii) “समयान्तराल में मानव मूल्यों का एक महत्वपूर्ण विनिमय प्रदर्शन अथवा विश्व के सांस्कृतिक क्षेत्र में स्थापत्य कला अथवा तकनीकी, स्मारक कला, नगर-योजना अथवा परिदृश्य बनावट में विकास और (vi) “जीवित परम्पराओं, विचारों, विश्वासों और उत्कृष्ठ सार्वभौमिक महत्व के साहित्यिक कार्यों से सीधे अथवा मूर्त रूप से जुड़े हों; के अन्तर्गत सूचिबद्ध किया ग्या।[4]

https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0


Indonesia-Borobudur1 Indonesia-Borobudur2 Indonesia-Borobudur4 Indonesia-Borobudur5

 

रूपांकन

मंडल रूप में बोरोबुदुर की भू-योजना।

बोरोबुदुर को एक बड़े स्तूप के रूप में निर्मित किया गया और जब इसे उपर से देखा जाये तो यह विशाल तांत्रिक बौद्ध मंडल का रूप प्राप्त करता है इसके साथ ही यह बौद्ध ब्रह्माण्ड विज्ञान और मन के स्वभाव को निरूपित करता है।[61] इसका मूल आधार वर्गाकार है जिसकी प्रत्येक भुजा 118 मीटर (387 फ़ुट) है।[62] इसमें नौ मंजिले हैं जिनमें से नीचली छः वर्गाकार हैं तथा उपरी तीन वृत्ताकार हैं। उपरी मंजिल पर मध्य में एक बड़े स्तूप के चारों ओर बहत्तर छोटे स्तूप हैं। प्रत्येक स्तूप घण्टी के आकार का है जो कई सजावटी छिद्रों से सहित है। बुद्ध की मूर्तियाँ इन छिद्रयुक्त सहपात्रों के अन्दर स्थापित हैं।

बोरोबुदुर का स्वरूप सोपान-पिरामिड से ली गयी है। इससे पहले इंडोनेशिया में प्रागैतिहासिक ऑस्ट्रोनेशियाई महापाषाण संस्कृति में पुंडेन बेरुंडक नामक विभिन्न जमीनी दुर्ग और पत्थरों से सोपान-पिरामिड संरचना पायी गयी जिसकी खोज पंग्गुयांगां, किसोलोक और गुनुंग पडंग, पश्चिम जावा में हुई। पत्थर से बने पिरामिडों के निर्माण निर्माण के पिछे स्थानीय विश्वास यह है कि पर्वतों और ऊँचे स्थानों पर पैतृक आत्माओं अथवा ह्यांग का निवास होता है। पुंडेन बेरुंडक सोपान-पिरमिड बोरोबुदुर की आधारभूत बनावट को महायान बौद्ध विचारों और प्रतीकों के साथ निगमित पाषाण परंपरा का विस्तार माना जाता है।[63]

बोरोबुदुर का स्थापत्य मॉडल

स्मारक के तीन भाग प्रतीकात्मक रूप से तीन लोकों को निरूपित करते हैं। ये तीन लोक क्रमशः कामधातु (इच्छाओं की दुनिया), रूपधातु (रूपों की दुनिया) और अरूपधातु (रूपरहित दुनिया) हैं। साधारण बौधगम्य अपना जीवन इनमें से निम्नतर जीवन स्तर इच्छाओं की दुनिया में रहता है। जो लोग अपनी इच्छाओं पर काबू प्राप्त कर लेते हैं वो प्रथम स्तर से उपर उठ जाते हैं और उस जगह पहुँच जाते हैं जहाँ से रूपों को देख तो सकते हैं लेकिन उनकी इच्छा नहीं होती। अन्त में पूर्ण बुद्ध व्यवहारिक वास्तविकता के जीवनस्तर से उपर उठ जाते हैं और यह सबसे मूलभूत तथा विशुद्ध स्तर माना जाता है। इसमें वो रूपरहित निर्वाण को प्राप्त होते हैं।[64]संसार के जीवन चक्र से उपरी रूप जहाँ प्रबुद्ध आत्मा शून्यता के समान, सांसारिक रूप के साथ संलग्न नहीं होती, उसे पूर्ण खालीपन अथवा अपने आप अस्तित्वहीन रखना आता है। कामधातु को आधार से निरूपित किया गया है, रूपधातु को पाँच वर्गाकार मंजिलों (सरंचना) से और अरूपधातु को तीन वृत्ताकार मंजिलों तथा विशाल शिखर स्तूप से निरूपित किया गया है। इन तीन स्तरों के स्थापत्य गुणों में लाक्षणिक अन्तर हैं। उदाहरण के लिए रूपधातु में मिलने वाले वर्ग और विस्तृत अलंकरण अरूपधातु के सरल वृत्ताकार मंजिल में लुप्त हो जाते हैं, जिससे रूपों की दुनिया को निरूपित किया जाता है–जहाँ लोग नाम और रूप से जुड़े रहते हैं—रूपहीन दुनिया में परिवर्तित हो जाते हैं।[65]

बोरोबुदुर में सामूहिक पूजा घूमते हुये तीर्थ के रूप में की जाती है। तीर्थयात्रियों का शिखर मंजिल तक जाने के लिए सीढ़ियां और गलियारा मार्गदर्शन करते हैं। प्रत्येक मंजिल आत्मज्ञान के एक स्तर को निरूपित करती है। तीर्थयात्रियों का मार्गदर्शन करने वाला पथ बौद्ध ब्रह्माण्ड विज्ञान को प्रतीकात्मक रूप में परिकल्पित करता है।[66]

सन् १८८५ में आकस्मिक रूप से आधार में छुपी हुई सरंचना खोजी गयी।[35] “छुपे हुये पाद” में उच्चावच भी शामिल हैं, जिनमें से १६० वास्तविक कामधातु के विवरण की व्याख्य करते हैं। इसके अलावा बच्चे हुये उच्चावच शिलालेखित चौखट हैं जिसमें मूर्तिकार ने नक्काशियों के बारे में कुछ आवश्यक अनुदेश लिखे थे।[67] वास्तविक आधार के उपर झालरदार आधार बना हुआ है जिसका उद्देश्य आज भी रहस्य बना हुआ है। प्रारम्भिक विचारों के अनुसार पहाड़ी में विनाशकारी घटाव आने की स्थिति में वास्तविक आधार को आच्छादित करने के लिए है।[67] अन्य मतों के अनुसार झालरदार आधार बनाने का कारण नगर नियोजन और स्थापत्य के बारे में प्राचीन भारतीय पुस्तक वास्तु शास्त्र के अनुसार छुपे हुये मूल आधार में बनावट दोष होना है।[35] इसके बावजूद चूँकि इसका निर्माण कार्य आरम्भ हो चुका था अतः झालरदार आधार का निर्माण पूर्ण सौंदर्य और धार्मिक विचारों का सुक्ष्मता से ध्यान रखकर किया गया।

बुद्ध प्रतिमायें

धर्मचक्र मुद्रा में बुद्ध की एक मूर्ति

बौद्ध ब्रह्माडिकी को पत्थर पर उतारने की कहानी के अतिरिक्त भी बोरोबुदुर में बुद्ध की विभिन्न मूर्तियाँ मौजूद हैं। इसमें पैर पर पैर रखकर पद्मासन स्थिति वाली मूर्तियाँ पाँच वर्गाकार चबूतरों पर (रुपधातु स्तर) के साथ-साथ उपरी चबूतरे (अरुपधातू स्तर) मौजूद हैं।

रुपधातु स्तर पर देवली में बुद्ध की प्रतिमायें स्तंभवेष्टन (वेदिका) के बाहर पंक्तियों में क्रमबद्ध हैं जिसमें उपरी स्तर पर मूर्तियों की संख्या लगातार कम होती है। प्रथम वेदिका में १०४ देवली, दूसरी में ८८, तीसरी में ७२, चौथी में ७२ और पाँचवी में ६४ देवली हैं। कुल मिलाकर रुपधातु स्तर तक ४३२ बुद्ध की मूर्तियाँ हैं।[1] अरुपधातु स्तर (अथवा तीन वृत्ताकार चबूतरों पर) पर बुद्ध की मूर्तियाँ स्तूपों के अन्दर स्थित हैं। इसके प्रथम वृत्ताकार चबूतरे पर ३२ स्तूप, दूसरे पर २४ और तीसरे पर १६ स्तूप हैं जिसका कुल ७२ स्तूप होता है।[1] मूल ५०४ बुद्ध मूर्तियों में से ३०० से अधिक क्षतिग्रस्थ (अधिकतर का सिर गायब है) हो चुकी हैं और ४३ मूर्तियाँ गुम हैं। स्मारक की खोज होने तक मूर्तियों के सिर पाश्चात्य संग्राहलयों द्वारा संग्रह की वस्तु के रूप में चोरी कर लिया।[68] बोरोबुदुर से बुद्ध की मूर्तियों के इन शिर्षमुखों में से कुछ अब ऐम्स्टर्डैम के ट्रोपेन म्यूजियम और लंदन के ब्रिटिश संग्रहालयसहित विभिन्न संग्राहलयों में देखे जा सकते हैं।[69]

ट्रोपेनमुसुम, एम्स्टर्डम में बोरोबुदुर बुद्ध प्रतिमा का मस्तिष्क।

बोरोबुदुर में मस्तिष्क रहित बुद्ध की मूर्ति, इसकी खोज के बाद कई मूर्तियाँ विदेशों में संग्राहलयों में रखने के लिए चोरी हो गई।

शेर द्वारपाल

पहली नज़र में बुद्ध की सभी मूर्तियाँ समरूप प्रतीत होती हैं लेकिन उन सभी मुर्तियों की मुद्रा अथवा हाथों की स्थिति में अल्प भिन्नता है। इनमें मुद्रा के पाँच समूह हैं: उत्तर, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और शिरोबिंदु। ये सभी मुद्रायें महायान के अनुसार पाँच क्रममुक्त दिक्सूचक को निरुपित करती हैं। प्रथम चार वेदिकाओं में पहली चार मुद्रायें (उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पश्चिम) में प्रत्येक मूर्ति कम्पास की एक दिशा को निरुपित करता है। पाँचवी वेदिका में बुद्ध की मूर्ति और उपरी चबूतरे के ७२ स्तूपो में स्थित मूर्तियाँ समान मुद्रा (शिरोबिंदु) में हैं। प्रत्येक मुद्रा में ‘पाँच ध्यानी बुद्ध’ में से किसी एक को निरूपित करती है जिनमें प्रत्येक का अपना प्रतीकवाद है।[70]

प्रदक्षिणा अथवा दक्षिणावर्त परिक्रमा (घड़ी की दिशा में परिक्रमा) के अनुसार पूर्व से आरम्भ करते हुये बोरोबुदुर में बुद्ध की मुर्तियों की मुद्रा निम्न प्रकार है:

 

प्रतिमा मुद्रा प्रतीकात्मक अर्थ ध्यानी बुद्ध प्रधान दिग्बिन्दु प्रतिमा की स्थति
COLLECTIE TROPENMUSEUM Boeddhabeeld van de Borobudur TMnr 10016277.jpg भूमिस्पर्श मुद्रा पृथ्वी साक्षी है अक्षोभ्य पूर्व प्रथम चार पूर्वी वेदिकाओं मेंरूपधातु झरोखे पर
COLLECTIE TROPENMUSEUM Boeddhabeeld van de Borobudur TMnr 60013976.jpg वार मुद्रा परोपकार, दान देने रत्नसम्भव दक्षिण प्रथम चार दक्षिण वेदिकाओं मेंरूपधातु झरोखे पर
COLLECTIE TROPENMUSEUM Boeddhabeeld van de Borobudur voorstellende Dhyani Boeddha Amitabha TMnr 10016276.jpg ध्यान मुद्रा एकाग्रता और ध्यान अमिताभ पश्चिम प्रथम चार पश्चिमी वेदिकाओं में रूपधातु झरोखा
COLLECTIE TROPENMUSEUM Boeddhabeeld van de Borobudur voorstellende Dhyani Boeddha Amogasiddha TMnr 10016274.jpg अभय मुद्रा साहस, निर्भयता अमोघसिद्धि उत्तर प्रथम चार उत्तरी वेदिकाओं मेंरूपधातु झरोखा
COLLECTIE TROPENMUSEUM Boeddhabeeld van de Borobudur voorstellende Dhyani Boeddha Vairocana TMnr 10015947.jpg वितर्क मुद्रा तर्क और पुण्य वैरोचन शिरोबिंदु सभी दिशाओं में पाँचवी (सबसे उपरी) वेदिका के रूपधातुझरोखे
COLLECTIE TROPENMUSEUM Boeddhabeeld van de Borobudur TMnr 60019836.jpg धर्मचक्र मुद्रा घूमता हुआ धर्म (कानून) का पहिया वैरोचन शिरोबिंदु तीन परिक्रमा वाले चबूतरों के छिद्रित ७२ स्तूपों में अरूपधातु