02 JULY 2015 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:केवल अच्छे नहीं उपयोगी बनो, और हो सके तो शक्तिशाली बनो, अगर बौद्ध धम्म के नाम पर आप कायर बनने की शिक्षा घ्रहण कर रहे हैं तो समझ लीजिये आप गुलामी की ट्रेनिंग ले रहे हैं|….समयबुद्धा


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ambedkar julm hinsachanakye2अच्छे और अहिंसक हमारे लोग पहले ही हैं, तो बौद्ध धम्म और कितना अच्छा और अहिंसक बनाएगा इनको? सभी तो जानते और मानते हैं की बहुजन लोग कम खाकर जीते हैं, कम कहते हैं कम जगह में रहते हैं, धरती के संसाधनों को कम दोहन करते हैं, खाना बर्बाद नहीं करते हैं| किसी को सताने दबाने नहीं जाते|जिओ और जीने दो की नीति पर चलते हैं| पर फिर भी जुल्म का शिकार क्यों होते है, कभी सोचा आपने?|केवल अच्छे नहीं उपयोगी बनो, और हो सके तो शक्तिशाली बनो, अगर बौद्ध धम्म के नाम पर आप कायर बनने की शिक्षा घ्रहण कर रहे हैं तो समझ लीजिये आप गुलामी की ट्रेनिंग ले रहे हैं| इनको आत्मा रक्षा को तत्पर और दिमागी मेहनत करने की ट्रेनिंग की जरूरत है न की गुलामी की ट्रेनिंग की|

मुझे लगता है की बौद्ध धर्म में भिक्षा मांगने को बढ़ावा देना इस धर्म को कमजोर बनाये हुए है| हमें कुछ ऐसा करना पडेगा जिसे भंते आत्मनिर्भर हों और उन्हें भीक नहीं मंगनी पड़े|

भगवान् बुद्ध ने दान पर गुज़ारा किया क्योंकि तब ये धर्म नहीं फिलोसोफी थी जिसे लोगों तक पहुचाने के लिए अपना निजी काम छोड़ना पड़ा अर्थात राजपाठ छोड़ना पड़ा| राजपाठ छोड़ने के बाद जीवन चर्या चलने के लिए भिक्षा पर निर्भर रहना पड़ा |पर आज वैसे स्तिथि नहीं है आज बौद्ध फिलोसोफी ने धर्म का रूप ले लिया है, और धर्म से ये उम्मीद लगाई जाती है की वो अपने अनुयायिओं को आश्रय और सुरक्षा देगा|इसमें एक पॉइंट ये भी है की एक राजकुमार का भिक्षा मांगना गौतम बुद्ध को भीड़ आकर्षित करने का एक संसाधन लगा, दूसरा जो बिलकुल ठीक पॉइंट है वो ये है की धम्म प्रचार के लिए प्रचारकों की फ़ौज चाहिए थी, अब इतनी बड़ी फ़ौज रखने के लिए धन भी चाहिए, धन के आभाव में गौतम बुद्ध ने ये युक्ति निकली थी जिससे इतने बड़े जान संघ का पालन हो सके, उनका मुख्य मकसद बौद्ध धम्म का प्रचार प्रसार था न की भिखारी पैदा करना |

मेरे हिसाब से सभी बौद्ध अनुयायिओं की हर महीने को पूर्णिमा को बौद्ध विहार में एक ही समय इक्कठा होना चाहिए, इसके कई फायदे हैं जिनमे से कुछ प्रमुख फायदे हैं :

१. बौद्ध धम्म अनुयायी संगठित होंगे और संगठन अपने मेम्बरों की रक्षा करेगा
२. बौद्ध भिक्षु को भीक नहीं मांगनी पड़गी क्योंकि पूर्णिमा पर जो धन दान दिया जाए वो उनके लिए एक तनखा के रूम में पूरे महीने की जरूरतों के लिए पर्याप्त होगा|

उदहारण के लिए १०० लोग यदि १०० रूपत दे तो महीने में १०००० होता है जो बौद्ध भिक्षु की जीवन चर्या के लिए काफी है|

जहाँ धन होगा वही धर्म को बल मिलेगा, केवल धन से धर्म की रक्षा की जा सकती है |जब धन आने लगेगा तो निकम्मे या कमजोर बौद्ध भिक्षु की जगह उर्जावान और संगर्ष शील धर्म आचार्य उपलब्ध होंगे| जब संगर्ष शील धर्म अधिकारी बौद्ध विहार में होंगे तो वहाँ की नीरसता और मुर्दानगी को समाधान होगा और नए लोग आकर्षित होंगे|

elephant dhamm chakra
बौद्ध धम्म के नाम पर अगर कोई आपको सिखाता है की कमजोर बनो, शक्ति इकठी न करो, अन्याय सहते रहो उसके खिलाफ संगर्ष या युद्ध न करो, मर जाओ पर अपने अपमान का बदला न लो,कभी धन इकठ्ठा न करो धन से दुःख होता है….ये सब गलत है, ये सब सब बातें अनीश्वरवादी या बौद्ध काल में तो सही हो सकती हैं पर ईश्वरवादी लोगों के राज में कभी नहीं|सबसे बड़ा सत्ये ये हैं की ईश्वर की दुनिया में जो कमजोर और निर्धन हैं वही सबसे ज्यादा दुखी है उसी को न्याय नहीं मिलता| इन बातों से हम जान सकते हैं की “जो बौद्ध धम्म” ब्राह्मणवाद और उसकी वर्ण व्यस्था के खिलाफ एक क्रांति था वो बौद्ध धम्म असल में वर्ण व्यस्था का एक पूरक एक साथी बन के रह गया| आप खुद सोचो वर्ण व्यस्था में जो शूद्र हैं वो शूद्र क्यों है? क्योंकि उनके पास धन नहीं, शक्ति नहीं, अपने अपमान का बदला नहीं लेते, ज्ञान नहीं है, कमजोर हैं, संगठन नहीं है, ऊपर के तीनों वर्णों के अत्याचार सहते हैं और अहिंसा की सीख के चलते कभी अपने हकों के लिए नहीं लड़ते आदि आदि| अब और गौर से सोचो की बौद्ध धम्म अगर आपको अहिंसा, कमजोर होना , निर्धन होना आदि सिखाये तो क्या ये वर्ण व्यस्था का ही काम नहीं कर रहा? क्या इस तरह ब्राह्मणवाद से मुकाबला होगा| बौद्ध धम्म में धन जमा ‘न’ करने की बहुत बातें होतीं हैं, पर मैं इसे धम्म में ब्राह्मणवादी मिलावट ही कहूँगा|

बौद्ध धम्म हमारा झंडा है जिसके तहत हम सभी को संगठित होना है, पर साथ साथ ये भी ध्यान रखना है की बौद्ध धम्म की कमजोरियों को दोबारा घ्रहण कर के पहले की तरह दोबारा तबाही झेलने की तैयारी नहीं करनी है|

foolan deviहिंसा करना बहुत ही गलत बात है पर हिंसा सहना उससे भी गलत बात है| बौद्ध धम्म के अहिंसा और शांति के नाम पर अगर आप मानसिक रूप से कमजोर बन रहे हैं या अत्याचार सहना सीख रहे हैं तो आपका भविष्य बहुत दी ज्यादा दुखमय होने वाला है| जब तक हमारा समाज अपने आदर्शों में विचारधारा देने वाले महापुरुषों के साथ साथ सम्राट अशोक महान,फूलन देवी जैसे न्याय के लिए मरने मारने वालों को अपना आदर्श नहीं बनाएंगे, तब तक इस कौम का हर संगर्ष व्यर्थ जाता रहेगा|क़ुरबानी तो देनी और लेनी ही पड़ती है चाहे अपनी मर्जी से देकर समाज को सशक्त बनाओ या दबंगों द्वारा बेइज़्ज़त मौत स्वीकारो| ब्राह्मण वर्ग दिन रात अपनी पीढ़ियों को राक्षशों को मारने की शिक्षा देता रहता है, क्या आप इसका महत्व नहीं समझ सकते| अगर बौद्ध धम्म मानसिक रूप से कमजोर कर रहा है तो क्या आपको नहीं लगता की ये ब्राह्मणवादियों के लिए शूद्र बनाने वाला एक टूल मात्र है

अहिंसा परमो धर्मः ये अधूरा श्लोक है पूरा श्लोक इस प्रकार है
अहिंसा परमो धर्मः धर्महिंसा तथैव च:

जिसका मतलब है अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है, और धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करना उस से भी श्रेष्ठ है..!इस बात को और लोहिया जी की बात “राजनीती अल्पकालीन धाम है और धर्म दीर्ग्कालिक राजनीती ” को साथ में समझने से भी क्या आप धर्म का मतलब नहीं समझ पा रहे, की अब भी नहीं समझे की हिन्दू धर्म की हिंसा ही आपकी गुलामी का कारन है |

 

दुनिया के किसी भी ईश्वर या देवी देवता के हाथ में हथियार नहीं हैं, केवल ब्राह्मणवादी देवी देवता ही ऐसे हैं जिनके हाथों में न केवल हथियार हैं बल्कि लोगों की कटी हुए गर्दन और दुसरे अंग भी प्रदर्शित किये जाते हैं

ब्राह्मणवादी मीडिया भी एकतरफा ख़बरों के प्रचार से समाज को गलत सन्देश देता रहता है, कभी भी मीडिया में सवानो के जुल्म के खिलाफ बहुजनों की प्रतिक्रिया या क्रांति या जीत को दिखाया ही नहीं जाता| ऐसे कोर्ट केस दिखाए ही नहीं जाते जिनमे बहुजनों की विजय हुई हो हाँ ऐसे कोर्ट कैसे जरूर दिखये जाते हैं जहाँ सवर्णों को शक या गवाह या सबूत न होने के कारन कोर्ट को मजबूरन छोड़ना पड़ा|अगर किसी सवर्ण के साथ कोई अपराध हो तो अपराधी के लिये ” दरिंदा” “हैवान “जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है । और वहीँ अगर किसी दलित के साथ अपराध की घटना हो और अपराधी कोई सवर्ण हो तो उसके लिए “दबंग” शब्द इस्तेमाल होता है|पता नहीं आप इन बातों को समझते हो की नहीं|

बौद्ध धम्म ग्रहण कर मानवता की सेवा करने के लिए पहले आपको चंड-अशोक बन कर खुद को चहु और से सुरक्षित और सक्षम करना होगा और फिर धम्म-अशोक बन कर जिओ और जीनो दो का सूत्र लागू करना होगा|नोट: ‘चंड-अशोक’ सम्राट अशोक महान के बौद्ध धम्म ग्रहण करने से पहले के रूप को कहते हैं जब उनका इतना भय था की शत्रु उनके नाम से ही हथियार डाल देता था लड़ना तो दूर की बात थी और इसी कारन अपने सभी भाइयों में आगे निकालकर वे ही सम्राट बने| धम्म-अशोक बौद्ध धम्म घ्रहण करने के बाद के रूप को कहा जाता है जब सम्राट रहते हुए उन्होंने मानव ही नहीं जानवरों तक पर दया की और सबका भला करने में कोई कसर नहीं छोड़ी|

मतलब जब तक आपके शत्रु बलवान हैं बौद्ध अहिंसा आपके किसी काम की नहीं, आपको संगर्ष का मार्ग चुनना ही होगा| नहीं मानते तो खुद से पूछो की क्या कोई कमजोर बिना किसी बल के किसी शक्तिशाली के अत्याचार से अपना बचाव कर सकता है| इसलिए बौद्ध धम्म के नाम पर कायर होने की शिक्षा घ्रहण न करो, वार्ना मुक्ति नहीं पा सकते|

क्या आप समझ सकते हैं की शांति से बैठने के लिए पहले संगर्ष जरूरी है| गौतम बुद्ध भी उसी क्षेत्र में ही घूमते रहे जहाँ के राजा उनको सरक्षण देते थे, क्या आप नहीं समझ सकते की भले गई गौतम बुद्ध ने हथियार छोड़ दिए हों पर ये बात उस समय कौन झुटला सकता था की वो राजकुमार थे और समस्त राजा लॉबी का उनको समर्थन और सरक्षण था| इसी तरह एम के गांधी भले ही एक लंगोटी में अहिंसा की बात करते हों पर कौन नहीं जानता की उनकी शक्ति कितनी थी, बाबा साहब को उनकी भूख हड़ताल के आगे अपनी मांगे कम करनी पड़ीं थी, अगर वो ऐसा नहीं करते तो समस्त भारत में बहुजनों का कत्लेआम हो जाता| क्या आप नहीं समझ सकते की ये अंग्रेजों की शक्तिशाली मध्यस्ता थी जिसके कारन बाबा साहब डॉ आंबेडकर हमारे लिए कुछ हक़ ले पाये, अंग्रेजी सरकार के सरक्षण और न्याय के बिना डॉ अंबेडकर क्या कर पाते, आज जैसा हाल होना था जब संगर्ष तो करते हैं पर सरकारी समर्थन बेहद काम मिलता है|

मेरा सन्देश साफ़ है. बारे बौद्ध धम्म को बौद्ध धम्म है जिसमें से कमजोर बनाने वाले सभी शिक्षाओं को निकाल दिया जाए| मतलब साफ़ है शांति की बात करने के लिए पहले संगर्ष जरूरी है|

 

प्रबुद्ध बररत समृद्ध भारत
बहुजन हिताए बहुजन सुखाये

 

RSS_20141004

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