धर्म के नाम पर इतना गोरख धंधा क्‍यों? …ओशो


धर्म के नाम पर इतना गोरख धंधा क्‍यों? ( ओशो)

dharm nahin karm acchaधर्मों के कारण ही। धर्मों का विवाद इतना है, धर्मों की एक दूसरे के साथ इतनी छीना-झपटी है। धर्मों का एक दूसरे के प्रति विद्वेष इतना है कि धर्म-धर्म ही नहीं रहे। उन पर श्रद्धा सिर्फ वे ही कर सकते है जिनमें बुद्धि नाममात्र को नहीं है। अस सिर्फ मूढ़ ही पाए जाते है मंदिरों में, मसजिदों में। जिसमें थोड़ा भी सोच विचार है, वहां से कभी का विदा हो चुका है। क्‍योंकि जिसमें थोड़ा-सोचविचार है, उसे दिखाई पड़ेगा कि धर्म ने नाम से जो चल रहा है वह धर्म नहीं, राजनीति है। कुछ और है।
जीसस चले जब जमीन पर तो धर्म चला; पोप जब चलते है तो धर्म नहीं चलता, कुछ और चलता है। बुद्ध जब चले तो धर्म चला; अब पंडित है, पुजारी है, पुरोहित है, वे चलते है। उनके चलने में वह प्रसाद नहीं। उनकी वाणी में अनुभव की गंध नहीं। उनके व्‍यक्‍तित्‍व में वह कमल नहीं खिला जो प्रतीक है धर्म का उनके ह्रदय बंद है और उतनी ही कालिख से भरे है जितने किसी और के शायद थोड़े ज्‍यादा ही।

धर्म के नाम पर वैमनस्‍य है, ईप्सा है, हिंसा है। खून ख़राबा है। मस्‍जिद और मंदिर ने इतना लड़वाया है कि कोई भरोसा भी करना चाहे तो कैसे करे। और शास्‍त्र आज नहीं कल झूठे हो osho36जाते है। सत्‍य तो शास्‍ता है, शास्‍त्रों में नहीं। सत्‍य तो बुद्ध है। धम्म पद में नहीं; मोहम्‍मद में है, कुरान में नहीं। यद्यपि कुरान मोहम्‍मद से पैदा हुई है। तो जब तक कुरान मोहम्‍मद के होंठों पर थी, तब तक उसमें मोहम्‍मद की श्‍वास थी। मोहम्‍मद की प्राण उर्जा थी। प्रतिफलित होती थी। जैसे ही शब्‍द मोहम्‍मद के होठो से हटे, मुर्दा हो गये। स्‍त्रोत से टूटे, कुछ के कुछ हो गये। फिर तुम्‍हारे हाथ में पड़े, तुमने उन्‍हें वह अर्थ दिया जो तुम दे सकते हो। तुम वह अर्थ तो कैसे दोगे जो मोहम्‍मद देना चाहते थे। मोहम्‍मद हुए बिना वह अर्थ नहीं दिया जा सकता। वह अर्थ मोहम्‍मद के होने में है। तुमने अपने अर्थ दिए। तुम्‍हारे अर्थ किसी प्रयोजन के नहीं। लाभ तो नहीं हो सकता, हानि सुनिश्चत होगी।

अनातोले फ्रांस का प्रसिद्ध वचन है कि कोई बंदर अगर दर्पण में झांकेगा तो बंदर ही नजर आयेगा।

दर्पण में वही दिखाई पड़ता है, जो तुम हो। शास्त्रों में भी वहीं दिखाई पड़ता है जो तुम हो। जिसके हाथ ते शास्‍त्र पडा उसका ही हो गया। मोहम्‍मद के हाथ में जब तक था, तब तक कुरान थी; तुम्‍हारे हाथ में जब तक आया कुछ का कुछ हो गया। और फिर तुम्‍हारे हाथ से भी चलती रही, हजारों साल बीत गये, एक हाथ से दूसरे हाथ में बदलते हुए। किताबें गंदी हो गई है। तुम्‍हारे हाथ की मैल उन पर जम गई है। कौन उन्‍हें झाड़े और साफ करे। वही तुम्‍हारा सबसे बड़ा दुश्मन।

ध्‍यान रहे, इस जगत में प्रत्‍येक चीज का जन्‍म होता है और प्रत्‍येक चीज की मृत्‍यु होती है। धर्म तो शाश्‍वत है। लेकिन कौन सा धर्म? वह धर्म जो जीवन को धारण किए है। वह शाश्‍वत है। लेकिन बुद्ध ने जब कहा, कहा शाश्‍वत को ही, लेकिन जब विचार में बांधा तो शाश्‍वत समय में उतरा। और समय के भीतर कोई भी चीज शाश्‍वत नहीं हो सकती। समय के भीतर तो पैदा हुई है, मरेगी। जन्‍मदिन होगा, मृत्‍यु दिन भी आयेगा। जब कोई सत्‍य शब्‍द में रूपायित होता है तो सबसे पहले लोग उसका विरोध करते है। क्‍यों? क्‍योंकि उनकी पुरानी मानी हुई किताबों के खिलाफ पड़ता है। खिलाफ न पड़े तो कम से कम भिन्‍न तो पड़ता है। लोग विरोध करते है।

सत्‍य का पहला स्‍वागत विरोध से होता है—पत्‍थरों से, गलियों से। सत्‍य पहले विद्रोह की तरह मालूम होता है। खतरनाक मालूम होता है। बहुत सूलियां चढ़नी पड़ती है सत्‍य को, तब कहीं स्‍वीकार होता है। लेकिन वे सूलियां चढ़ने में ही समय बीत जाता है और सत्‍य जो संदेश लाया थ वह धूमिल हो चुका होता है। जब तक तुम सत्‍य को स्‍वीकार करते हो, तब तक वह सत्‍य ही नहीं रह जाता। इतनी देर लगा देते हो स्‍वीकार करने में; लड़ने-झगड़ने में, विवाद में इतना समय गंवा देते हो कि तब तक सत्‍य पर बहुत धूल जम जाती है। धूल जाती है तब तुम स्‍वीकार करते हो। क्‍योंकि तब सत्‍य तुम्‍हारे शास्‍त्र जैसा मालूम होने लगाता है। तुम्‍हारे शास्‍त्र पर भी धूल जमी है बहुत।

जब समय की धूल जम जाती है शास्‍त्रों पर, तो वह परंपरा बन जाता है। जब शास्‍त्र सत्‍य को जन्माता नहीं। सत्‍य की कब्र बन जाता है। तब तुम स्‍वीकार करते हो—इसीलिए तुम स्‍वीकार करते हो। कब्रें-कब्रें सब एक जैसी होती है। क़ब्रों में तो सिर्फ नाम का ही फर्क होता है। जिंदा आदमियों में फर्क होता है। कब्र किस की है, पत्‍थर पर लिखा होता है। बस इतना ही फर्क होता है। और तो कोई फर्क नहीं होता। धम्म पद जब कब्र बन जाता है तो गीता की कब्र और कुरान की कब्र और वेद उपनिषद या बाइबल की कब्र में कुछ फर्क नहीं रह जाता है। तब तुम स्‍वागत करते हो। तुम पुराने का स्‍वागत करते हो।

सत्‍य जब नया होता है तब सत्‍य होता है। जितना नया होता है उतना ही सत्‍य होता है। क्‍योंकि उतना ही ताजा-ताजा परमात्‍मा से आया होता है। जैसे गंगा गंगोत्री में जैसी स्‍वच्‍छ है, फिर वैसी काशी में थोड़ी ही होगी। हालांकि तुम काशी जाते हो पूजने। काशी तक तो बहुत गंदी हो चुकी, बहुत नदी नाले गीर चूके, बहुत अर्थ मिश्रित हो चूका, न जाने कितने मुर्दे बहाये जा चूके। काशी तक आते-आते तो गंगा अपवित्र हो गई। कितनी ही पवित्र रही हो गंगोत्री में। जैसे वर्षा होती है, तो जब तक पानी की बूंद न जमीन नहीं छुई, तब तक वह परम शुद्ध होती है; जैसे ही जमीन छुई, कीचड़ हो गई। कीचड़ के साथ एक हो गई।

ओशो

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा, भाग—1

Source:

http://oshosatsang.org/2012/01/28/%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A4%96-%E0%A4%A7%E0%A4%82/

One thought on “धर्म के नाम पर इतना गोरख धंधा क्‍यों? …ओशो

  1. [6/9, 1:46 PM] dr k k patthak: धर्म अर्थात अध्यात्म (अ= not,ध्या = concentration ,आत्म= self ,अर्थात मैं पन का ध्यान न करना ही अध्यात्म है = concentration of selflessness is called the real meditation ) अर्थात विश्व /व्यक्ति / शरीर का भीतरी आयतन i.e. internal view =reality of the things or world or all universe .
    सामान्यतः आज के समय में जनसामान्य धर्म को संप्रदाय और संप्रदाय को ही धर्म समझते हैं अपितु धर्म शब्द की उत्पत्ति पुरातन भारतीय भाषाओं :- प्राकृत एवं पालि से हुई है। पुरातन पालि भाषा में धम्म शब्द प्रयुक्त होता था जिसका संस्कृत भाषा में रूपान्तरण होकर धर्म हो जाता है , जबकि धम्म शब्द तो आज तक भी हमारे देश की विभिन्न जातियों ,गोत्रों और कबीर तुलसी के काव्यों में भी पाया जाता है । इतना ही नहीं हमारे देश में जो चार धाम हैं उन्हें धाम इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वे धम्म (= धर्म ) स्थल हैं । इस बात का अटूट प्रमाण तो यही है कि जिस प्रकार समय के साथ- साथ सामाजिक परिवर्तन होता जाता है ,ठीक उसी प्रकार किसी देश अथवा क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषाओं में भी परिवर्तन होता जाता है । परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि पुरानी भाषा बिल्कुल बदल जाती है ,बदलाव केवल इतना ही होता है कि पुरानी भाषा में कुछ नये शब्द किसी दूसरे देश अथवा क्षेत्र से आकर बस जाने वाले लोगों की भाषाओं के मिलते जाते हैं । परंतु अत्यधिक संख्या में तो पुरातन भाषा के शब्द ही ऐसे के ऐसे या कुछ विकृत होकर प्रयुक्त होते रहते हैं । जैसे देखिये पालि भाषा में बच्चा तो हिन्दी में भी बच्चा , जच्चा ,पिया , दिया,सच्चा ,कम्म=काम ,यान ,खेत , जोत , जोतना ,पोतना ,खोटना ,पुच्छ=पूछना ,पत्त=पतन=गिरना=झडना ,रतन=रतन=रत्न ,पुत्त=पूत=पुत्र ,चित्त=चित , मन ,चक्क=चक्का=चाकी ,मही=मट्टी=माटी , इसि=ऋषि , देव=देवता ,इस्सर=ईश्वर ,अत्त=आत्म=self ,दीप=दीपक ,चक्खु =चक्षु ,केस=केश =hair ,नक्ख=नाखून ,रस=रस्सा =soup ,सीह=सिंह ,गोत्त=गोत्र ,सोत्त=सोत्र=स्रोत = any stream from ground , पुब्ब=पूर्व=earlier ,सेट्ठ=श्रेष्ठ ,कुम्भ=कुंभकार=कुम्हार , चमर=चँवर=चौर , पुच्छ=पूछना =ask ,भव=happen ,सब्ब=सब=सर्व ,मंगल=भला=nice ,रक्ख=राख़=रखना ,सदा=always ,हिरी=ह्री=लज्जा=shyness ,मुंड=सरदार=गंजे सिर वाला लाल वस्त्र धारी = religious teacher = head , अविज्जा=अविद्दा =unknownness ,संखार=संस्कार , रुक्ख=वृक्ष ,भरोस्सी, आरहा ,खल ,खेम (=क्षेम) जैसे खेमचंद , हल ,पच्च=पचना , धातु , चक्खु= चक्षु आदि अनगिनत शब्द आज भी ज्यों के त्यों उत्तर भारत में बोले जाते हैं , उन सभी शब्दों का उल्लेख इस छोटे से ग्रंथ में करना हमारा उद्देश्य नहीं बल्कि पाठकों को सीधी सी बात को समझाने का प्रयास है । जैसे उत्तर भारत में बोली जाने वाली हिन्दी ही अलग-अलग क्षेत्रों में कुछ विभिन्नता के साथ बोली जाती है । जिस प्रकार आप देखेंगे कि “ क्या कर रहा है ।’’ हिन्दी का एक किताबी वाक्य है जिसे मुरादाबाद के आगे के क्षेत्र में “ के कर रो है ” , बिजनौर क्षेत्र में “ क्या कर रिया है “ और गंगा पार के क्षेत्र मुजफ्फर नगर , मेरठ , बागपत आदि में “ के करन लाघ रा सै ।” बोला जाता है। जनसामान्य इस बात से बिल्कुल भी परीचित नहीं कि इस जगत में विभिन्न भाषाओं (=बोलीयों ) का विकास होता है उसके बाद लेखनी (=लिपि=writing system ) का विकास (=development ) होता है ।और जैसे –जैसे एक देश अथवा क्षेत्र के लोग किसी दूसरे क्षेत्र में आते जाते हैं या वहाँ बस जाते हैं तो लोग अपनी – अपनी भाषाओं को एक दूसरे को समझाने के प्रयास में अपनी- अपनी भाषाओं के व्याकरण(=grammer) के नियम बनाते हैं परंतु वे सभी नियम चाहे कितने भी सटीक बनायें पर उस भाषा की सम्पूर्ण रूप से व्याख्या नहीं कर पाते , क्योंकि नियम किसी विशेष समय/ काल में कुछ विद्वान लोगों द्वारा बनाये जाते हैं जबकि भाषा का विकास व्याकरण के नियमों और लेखनी से भी अत्यधिक पुरातन काल से नैसर्गिक (=कुदरती ) रूप से होता आया है । इसी कारण चाहे कोई भी व्याकरण चाहे कितना भी सटीक हो ,वह अपनी ही भाषा पर पूरी पकड़ नहीं रखता । सबसे सुव्यवस्थित व्याकरण संस्कृत भाषा का माना जाता है परंतु यह भी पूरी पकड़ अपनी भाषा संस्कृत पर नहीं रखता ।इसका अनुभव तो ऋग्वेद को पढ़कर किया जा सकता है जिसकी भाषा को छांदस कहा जाता है , जैसे आप गायत्री मंत्र को ही देखिये जो छंद की व्याकरण के अनुसार लंगड़ा छंद है । तो कहने का तात्पर्य यह है कि भाषा का विकास व्याकरण से बहुत पुराना है तथा भाषा निरंतर बदलती जाती है ,इस बदलाव को रोकने का कोई उपाय जनमानस के पास नहीं है, क्योंकि पुरानी कहावत है कि :-कोस-कोस पै पानी बदलै ,चार कोस पै बानी || तो पहले जम्मुद्वीप (आज के भारतवर्ष ) में पुरातन भाषा बोली जाती थी जो कि आज भी जैन धर्म की धार्मिक भाषा है , बाद में जब ईरान की खाड़ी देशों के सजायाफ्ता मुजरिम घुमक्कड़ असभ्य लोगों ने भारतवर्ष में प्रवेश किया तो सिंधु घाटी की पुरातन सौम्य – सुव्यवस्थित – सुसभ्य संस्कृति को छिन्न – भिन्न कर डाला , परंतु वे लोग भी चाहे अपनी पुरानी ईरानियन भाषा अवेस्तान के सूत्रों को बाँचते रहे परंतु उनकी वह पुरातन भाषा सिंधु की पुरातन भाषा प्राकृत-पालि के प्रभाव से अछूती न रह सकी , जिसका फल यह हुआ कि एक नयी मिश्रित भाषा संस्कृत का प्रादुर्भाव हुआ । इसका एक अटूट प्रमाण तो यही है कि संस्कृत की व्याकरण हु-ब-हु (same) अवेस्तान की व्याकरण जैसी है क्योंकि अवेस्तान और संस्कृत भाषा में एक वचन(=singular ) , द्विवचन(=dual ) एवं बहुवचन (= plural ) के आधार पर व्याकरण है जबकि प्राकृत, पालि और दुनिया की अन्य भाषाओं में केवल एकवचन एवं बहुवचन के आधार पर व्याकरण है । जो कि एक नैसर्गिक भाषा की नैसर्गिक रूप से विकसित व्याकरण है । परंतु सिंधु की प्राकृत भाषा के प्रभाव को हम संस्कृत में साफ-साफ देख सकते हैं कि संस्कृत में प्राकृत– पालि के शब्दों को ऐसे का ऐसे ही या थोड़ा विकृत करके प्रयोग किया गया । जैसे :- पालि भाषा संस्कृत भाषा पुरिस पुरुष इसि ऋषि ( ऋ में इ की बोलने की आवाज मौजूद है बस इ के पहले र जोड़ दिया गया है इत्थि (त्+थ+इ=त्री ) स्त्री (इ की बोलने की आवाज मौजूद है केवल इ की जगह स् का प्रयोग कर दिया गया है ) इस्सर ईश्वर मग्ग मार्ग बाल बालक सच्च सत्य सत्त (=जीव ) सत्व वसल (=नीच ) वृषल कम्म कर्म खेम (क का ख और ख का क्ष हो जाता है ) क्षेम i.e. k>kh>ksh गोत्त गोत्र चक्क चक्र चित्त चित पिय प्रिय पियहर (=पीहर)=मायका प्रियजन तं त्वं देव देव धम्म धर्म पुत्त पुत्र मित्त मित्र नोट:-पालि एवं प्राकृत हमारे देश भारतवर्ष की प्राचीनतम भाषाएँ हैं और सबसे मजे की बात यह है कि पतंजलि ऋषि के गुरु पाणिनि ऋषि ने वेदिक साहित्य की व्याकरण बनायी थी जिसे संस्कृत की व्याकरण कहा गया ।पतंजलि लगभग १५० ईसापूर्व हुए जो कि भगवान गोतम बुद्ध के ४०० वर्ष बाद हुए और बुद्ध के जीवित रहते समय ही उनके शिष्य मोग्गलान (=मोद्गल्यान्) ने भगवान गोतम बुद्ध के ८२००० व उनके अर्हत शिष्यों के २००० सूत्रों कुल ८४००० सूत्रों के आधार पर पालि व्याकरण बनाई थी । अतः व्याकरण का निर्माण संस्कृत के पहले पालि का ही हुआ था ।अब पतंजलि के योगसूत्र में देखिये कि योग की अगर बात करें तो प्राचीन भारत में सर्वोत्तम योगी भी गोतम बुद्ध हुए । जिसका प्रैक्टिकल रूप से विवरण बुद्ध द्वारा दीघनिकाय के सतिपट्ठान सुत्त में किया गया है ।बुद्ध ने योग (=अध्यात्म ) के आठ मार्ग बताये हैं (१) सम्मा दिट्ठी (२)सम्मा संकप्पो (३)सम्मा वाचा (४)सम्मा कम्मन्तो (५)सम्मा आजीवो (६)सम्मा वायामो (७)सम्मा सति (८) सम्मा समाधि । इन आठ मार्गों की संज्ञा(=name) और थोडा कर्म बदलकर अपने नाम से अष्ठान्गिक योग बनाया जिसे पतंजलि का योगसूत्र भी कहा जाता है ।जो कि इस प्रकार हैं (१)यम :-अहिंसा ,सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह ।(२)नियम:-सौंच (cleanness),संतोष,तप,स्वाध्याय,ईश्वर प्रणिधान (=self surrender to god ) (३)आसन (= relaxable posture of body) (४)प्राणायाम (=आश्वास-प्रश्वास i.e. inspiration-expiration ) (५)प्रत्याहार (=मन को पाँच वाह्य इन्द्रियों के विषयों से अलग कर लेना ) (६)धारणा (=restorative thought about goal=दृढ संकल्प ) (७)ध्यान (=practice of concentration of mind ) (८) समाधि (=fully concentrated mind =मन का मन में अवस्थित हो जाना ) । इन आठ अंगों में पहले ६ तो पंचेंद्रियों को पूर्णतः वश में करने के लिए हैं और ७,८ वें कैवल्य (=मोक्ष ) प्राप्त करने हेतु हैं ।इन आठ की व्याख्या चार भागों में की है (१)-समाधि पाद:- चित की वृत्तियों के निरोध के जो मार्ग हैं उन सबको योग कहा जाता है।अतः चित वृत्तियों के निरोध की अवस्था को समाधि कहा गया है । (२)- साधनपाद :-इन्द्रियों के विषयों को त्याग ध्यान द्वारा मन को समाधिष्ठ करने के जो साधन हैं । जैसे प्रथम ६ साधनों द्वारा ध्यान में अवस्थित होया जाता है । (३)-विभूतिपाद:-पूर्ण ध्यानस्थ अवस्था में साधक विभिन्न प्रकार की दिव्य शक्तियों का अनुभव करने लगता है ,जैसे दिव्य श्रोत , आकाश में शरीर सहित गमन करना,अदृश्य हो जाना आदि ।अतः साधक को कैवल्य अवस्था को प्राप्त करने का ज्ञान हो जाता है । (४)-कैवल्य पाद:-जब साधक का शरीर और मन एक ही हो जाता है अर्थात अविच्छिन समाधि । तब साधक का मोक्ष हो जाता है यानि पुरुष और मन एक हो जाते हैं एवं शरीर और मन में कुछ भी अशुद्धि नहीं रह जाती अर्थात सत्व(=मन) और पुरुष (=शरीर) पूर्णतः राग आदि दोषों का बीज सहित नाश हो जाता है , साधक ब्रह्म अवस्था को प्राप्त हो जाता है । इसे ही कैवल्य कहा जाता है । पतंजलि ने साधनपाद के १३ वें एवं ४९ वें सूत्रों में सति शब्द का प्रयोग किया है जो कि संस्कृत के शब्द नहीं हैं और खूब ढूँढने से भी नहीं मिल पाए जबकि वामन शिवराम आप्टे के संस्कृत शब्द कोश में भी नहीं है ये सति शब्द । सबसे मजे कि बात तो ये है कि सति शब्द का अर्थ ही नहीं समझ पाए संस्कृत के विद्वान् १३वें सूत्र में जो बताया गया है कि जीवित प्राणी भिन्न-२ प्रकार के विपाक (=फल) भोगता है , उनके मूल (=कारण=causes) के प्रति सति=सजग (=conscious) होना ।एवं ४९ वें सूत्र में प्राणायाम (=inspiration-expiration) करते समय सजग रहना ।जबकि सति शब्द पालि वांग्मय (=बुद्ध वचनों का संग्रह) का एक विशिष्ट शब्द है जैसे भगवान गोतम बुद्ध के द्वारा महासति पट्ठान सुत्त (दीघनिकाय २२.२/९ )में चार सति पट्ठान १-कायानुपस्सना ( = इसमें आसन और आश्वास-प्रश्वास आदि की practice है ) २-वेदानानुपस्सना ३-चित्तानुपस्सना ४- धर्मनुपस्सना को विस्तार पूर्वक समझाया है कि किस प्रकार एक भिक्खु (=साधक) विपस्सना द्वारा सम्यक समाधि प्राप्त करता है ।इससे भी पता चलता है कि पतंजलि ने महावीर और बुद्ध के योग मार्ग को नाम बदलकर प्रयोग किया , पर ढंग से योग को नहीं समझा पाए क्योंकि वो कभी भी बुद्ध महावीर के मार्ग को practically नहीं जिए तो केवल शास्त्रीय गुणगान ही कर सके वो भी क्रमबद्ध तरीके से नहीं किया, क्योंकि केवल काय के योग तक ही सीमित रह गए । सम्यक ध्यान और कैवल्य को भी नहीं जान पाए practically , विपस्सना और निब्बान को तो बेचारे क्या जान पाते।
    [6/9, 2:07 PM] dr k k patthak: dr kaushal kumar patthak on May 31, 2015 at 10:20 am

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    गपौडे गाने से कोई महान नहीं बनता कभी मेडिकल साइंस पढ़ी है तो देखो अगर ब्लड ग्रुप मैच ना करे तो सगे भाई बहन का खून भी नहीं चढ़ाया जा सकता और अगर ABO टाइपिंग मिल जाए और Rh टाइपिंग ना मैच हो तो भी आदमी तुरंत मर जाता है ऐसा ब्लड चढाने से और बात रही head ट्रांसप्लांट करने की तो जन्म के समय ही हाथी के बच्चे का सिर और गर्दन आदमी के पूरे शरीर से भी मोटे होते हैं कैसे फिट होगा दूसरी बात हाथी का कोई भी अंग अगर मनुष्य के शरीर में लगा दे या यूँ कहें जोड़ दे तो वह अंग स्वयं ही survive नहीं कर सकता क्योंकि human blood cells are very much different from elephants अतः कोशिकाओं के कम्पेटिबल ना होने से anaphylaxis होने से दोनों की ही मृत्यु हो जायेगी ।

    अन्य बात धर्म की आती है वो श्रद्धा का विषय तो है पर अंध श्रद्धा का विषय नहीं । भारत में मूर्तिकला की शुरुवात मौर्य काल के चक्रवर्ती सम्राट देवनाप्रिय महाराज अशोक ने शुरू करवाई थी जब उन्होंने भगवान् बुद्ध के ९ स्तूप जो मगध सम्राट अजात सत्तु के काल में बनवाये गए थे । महाराज अशोक ने उन स्तूपों को उखड़वाकर पूरे जम्मूद्वीप अर्थात मौर्यकालीन भारत में ८४ हज़ार स्तूपों का निर्माण कराया और एक ही दिन कार्तिक अमावस्या को पूरे जम्मुद्वीप और ८४ हज़ार स्तूपों पर दीपक जलवाने का और एक दूसरे को मिठाई बांटने का राज्यादेश जारी किया तब से दीपावली मनाई जाने लगी और भिक्खुओं ने गुफाओं आदि में भगवान् बुद्ध के जीवन और धर्म को मूर्तिकला के रूप में प्रतिस्थापित किया । उसके बाद ही अन्य सम्प्रदाय वालों ने भी मूर्तियों का निर्माण अपने अपने सम्प्रदाय के अनुसार किया । परन्तु बौद्ध और जैन धर्म के अलावा किसी भी अन्य सम्प्रदाय ने मूर्तियों का निर्माण नहीं किया था । वैदिक धर्म को मानने वाले लोग जो ब्राह्मण पुरोहित थे वे तो मूर्ती कला और भव्य पूजास्थलों के विरुद्ध थे वैदिक केवल यज्ञ और पशुबलि वेदों के मंत्रोउच्चार का ही पालन करते थे । परंतु ८ शताब्दी में जब शंकराचार्य हुए तो बौद्ध और जैन धर्म के साधुओं का कत्लेआम किया गया जो कि राजा सुधन्वा बंगाल की सेना शंकराचार्य के साथ चलती थी और जो साधू या ब्रह्मचारी शंकराचार्य के मत को शास्तार्थ में काट देता तो सिपाही उसका क़त्ल कर देते थे । जब बौद्ध और जैन राज्य समाप्त हो गए तो पुरोहित ब्राह्मणों ने उनके मंदिरों पर कब्जा कर लिया और उनमें काल्पनिक वैदिक देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित कर डालीं । परंतु ज्यादातर मूर्तियां तो बौद्धों और जैनियों द्वारा ही बनवायी गयी थी जो आज भी समाज में अंधश्रद्धा के कारण पूजी जाती हैं जबकि वह मूर्तिकला एक तीसरा प्रकार है अभिव्यक्ति का उसमें बिना लिपि और बिना वाणी के धर्म को निरूपित किया गया है । काली गणेश शिव ब्रह्मा नौदुर्गे विष्णु इंद्र आदि सभी एक प्रकार से उनके गुणवाचक निरूपण हैं और धर्म अर्थात भगवान् बुद्ध के द्वारा बताये गए ३७ बोधिपक्षिय धर्म का निरूपण हैं और कुछ में संसार के भौतिक जीवन का निरूपण है ।। अब आज लोग अंधश्रद्धा से मूर्तियों को पूजने में ही लग गए हैं धर्म तो कुछ भी ना जानते ना उसपे चलते हैं केवल सम्प्रदायवाद रह गया है धर्म तो डूबता चला गया है । वैदिक विचार के अनुसार भी केवल तीन मूर्तियाँ पूजनीय हैं गुरु माता पिता ।। अन्य कोई मूर्ती है भी नहीं केवल निरूपण है धर्म का तो समझने और धर्म का पालन कैसे करें इसके लिए मूर्तिकला का आविष्कार वज्रयानी बौद्ध भिक्खुओं ने किया था इसी पत्थर पर मूर्ती के रूप में धर्म का निरूपण करने के कारण उनका एक सम्प्रदाय वज्रयान =पत्थर कहलाया था अर्थात वज्र यानि पत्थर और यान का अर्थ है मार्ग ।।
    [6/20, 8:13 PM] dr k k patthak: [6/20, 8:05 PM] dr k k patthak: ध्यान के ये पांच अंग भगवान् बुद्ध ने बताये और practically जानने योग्य हैं

    १-वितक्क i.e. initial thinking
    २-विचार i.e. thinking
    ३-पीति i.e. affection without any greed

    ४-वेदना i.e. perceptions like pain , feeling at orgasm or neutral
    ५-एकग्गकता i.e. unification of body and mind

    ये ध्यान के पांच अंग और इसके बाद शुरू होता है आनापान और विपस्सना का ज्ञान जो स्वतः appear होता है ।।

    पर इसके पूर्व

    ये करना होता है

    १-दो अतियों का त्याग
    २-चार सति पट्ठान
    ३-चार सम्यक प्रधान
    ४-चार ऋद्धिपाद
    ५-पञ्च (दिव्य)इन्द्रिय
    ६-पांच (दिव्य) बल
    ७-सात बोज्झंग
    ८-आठ अरिय अष्ठांगिक मार्ग

    अर्थात दो अतियों का त्याग सर्व प्रथम बाकी ३७ बोधिपक्खिय धम्मो को practically जानना ही बुद्ध का धर्म है

    बाकी सभी अच्छे और बुरे धम्म बुद्ध की १० शक्तियों में आ जाते हैं

    आओ चलें दुनिया के गुरु बनें
    पुनः ।।

    नमो बुद्धाय ।।
    भवतु सब्ब मंगलं ।।
    [6/20, 8:08 PM] dr k k patthak: ३,४,५,६,७ जो अंग हैं उन्हें कोई करता नहीं पर स्वतः ही appear होते हैं
    बस एक दो और आठ को साधना है बाकी तो फलस्वरूप स्वयं ही प्रकट हो जायेंगे ।।

    नमो बुद्धाय ।।
    भवतु सब्ब मंगलं ।।
    [7/8, 11:07 PM] dr k k patthak: भगवान् बुद्ध ने बड़े ही विस्तार पूर्वक अभिधम्म में समझाया है

    यह संसार छः धातुओं से बना है
    १-अग्नि
    २-वायु
    ३-आपो
    ४-पृथ्वी
    ५-आकास
    ६-विञ्ञान

    और हे !भिक्खुओं ये सभी धातुएँ जो हैं इनमें से चार स्थूल धातु हैं अर्थात अग्नि वायु आपो पृथ्वी तथा आकास और विञ्ञान ये धातुएं अस्थूल और अनंत आयतन वाली हैं ।
    प्रत्येक स्थूल धातु अट्ठकलाप से निर्मित है ।

    अर्थात

    उतु-वर्ण
    वायो-गंध
    आपो-रस
    पृथ्वी-ओज

    क्योंकि ये आठ हैं पर युग्म में रहते हैं क्योंकि धातु और उसका गुण अलग अलग नहीं रह सकते और इसी कारण इन आठ के कारण जो मूल कलाप i.e. fundamental unit है उसे अट्ठकलाप कहा भगवान बुद्ध ने ।
    और आगे भगवान् ने बताया कि जो अट्ठ कलाप है इनसे मिलकर एक जीवित नवक कलाप बनता है । यह जो जीवित नवक कलाप है यही जीवन की सबसे न्यूनतम इकाई है । इसे ही आप modern medicine में genes की सबसे छोटी इकाई मान सकते हैं ।
    परंतु यह केवल भौतिक जीवन है अर्थात चेतना ।।

    इसके अतिरिक्त जब जीवन होता है तो उसमें एक धातु विञ्ञान की संस्कारमय अवस्था के जुड़ जाने से मनो धातु की उत्पत्ति होती है ।

    और मन होता है चित्त और चेतसिक का योग ।
    चित्त जो ८९ प्रकार या अर्हत में १२१प्रकार के होते हैं।
    चेतसिक जो है ५२ प्रकार के

    इस प्रकार जिसे लोग भूलवश अज्ञानता के कारण आत्मा या चेतना कहते हैं वो तो केवल भौतिक जीवन की एक मूल इकाई मात्र है ।
    जबकि सम्पूर्ण जीवित शरीर जिसमें मनोधातु भी है उसे भगवान रूपनाम की संज्ञा से नवाजते हैं ।

    अतः आधे मॉडर्न साइंस और आधे नास्तिक और आधे धार्मिक लोग तो कुछ का कुछ बकवास करते रहते हैं ।।

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