मेरा जीवन और बुद्ध….चंद्रसेन बी राव


buddha20चंद्रसेन बी राव अपना उस समय का अनुभव साझा कर रहे हैं जब उन्हें बंगलौर में विहार दर्शन के समय चैतन्य की प्राप्ति हुई थी।

बुद्ध का मेरे जीवन पर बचपन से ही बहुत प्रभाव रहा है। ऐसा बुद्ध की शिक्षाओं का पालन करने वाले मेरे माता-पिता और खासतौर पर मेरे दादाजी के कारण था। मुझे बहुत पहले बाबा साहब अंबेडकर के बुद्ध और उनके ‘धम्म’ के कुछ पढ़े हुए अंश याद हैं। बुद्ध की छवि मेरे मस्तिष्क में इस तरह से छप गयी थी कि ऐसा कभी नहीं होता था कि मैं उनका शांत और मुस्कुराता हुआ चेहरा देखूँ और मेरे जीवन में शांति और आनंद न आए।

जब मैंने बैंगलोर में काम करना शुरू किया उस समय मेरे अन्दर बुद्ध विहार जाने की बहुत तीव्र इच्छा हुई। मैंने महाबोधि विहार जाने का निर्णय लिया जहाँ से मैं बस गुजरा ही था। मैं देर से मिल रहे आशीर्वाद के लिए एकदम ठीक समय पर पहुंचा था। प्रार्थना कर रहे भिक्षुओं और भक्तों के बीच एक होने का एहसास बहुत ही खुबसूरत था। हालाँकि मेरा दिमाग विचारों से खाली था पर मैं पूरी चेतना में था। उस दिन जब मैं विहार से लौटा तो मुझे पता चल चुका था पूर्ण अनुभव की प्राप्ति के लिए वापस बुद्ध विहार आना है।

मैं भिक्षुओं के साथ धम्म की भाषा पाली में प्रार्थना करना चाहता था और इसे समझना भी चाहता था। ये इच्छा मुझे अगले दिन महाबोधि सोसाइटी के दफ़्तर ले गयी जहाँ मैं एक भिक्षु से मिला। मैंने उनसे पूछा कि क्या कोई प्रार्थना पुस्तक है जिससे मैं साथ में प्रार्थना कर सकूँ। भिक्षु थोड़ी देर में बौद्ध धर्म के धार्मिक व्यवहार की पुस्तक के साथ लौटा। यह पुस्तक आदरणीय आचार्य बुद्धरक्खिता के द्वारा लिखी गयी थी जिन्होंने 1956 में महाबोधि सोसाइटी की नींव रखी थी, उन्हें बड़ा भंतेजी के नाम  से जाना जाता है। मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। शायद मेरे कर्म ही मुझे यहाँ लेकर आए थे। मैं भिक्षुओं के चले जाने के बाद विहार की सीढ़ियों पर बैठ गया और किताब खोली।

जैसे मैंने पन्ने पलटे मुझे बोधि वृक्ष की सूखी हुई बरगद की पत्ती मिली जिसे निशान के तौर पर रखा गया था। पन्ने पर लिखा था, महामंगता सूत्र, जो कि बुद्ध के द्वारा आशीर्वाद पर आधारित प्रवचन  था। पहले छंद में लिखा था: “ग़लत लोगों की संगत से बचना, समझदार लोगों से जुड़ना और लौ के साथ लौ जैसे रहना, सब अपने आप में आशीर्वाद है।” सरल किन्तु कितना गहरा। उदाहरण के लिए, बिना किसी दाग के व्यवसाय करना आज भी कितना प्रासंगिक है। पर एक सवाल मेरे मन में कौंध रहा था। वह सवाल यह था क्या प्रतिदिन विहार में यही प्रार्थना होती है?” किताब में किसी भी प्रकार का सिद्धांत नहीं था, केवल सरल और शुद्ध विचार जो इंसान को बेहतर व्यक्ति बनाने के बारे में थे।

प्रार्थना पूरे जग के लिए प्रेम, क्षमा और खासतौर पर वह जो आपकी प्रार्थना से उपार्जित होता है जिसे बाकी लोगों से साझा किया जाता है। इससे बहुत ही जुड़ाव महसूस होता है। कहीं भी किसी भी प्रकार का अहंकार नहीं।

बुद्ध व्यक्ति को अपने विचारों की प्रक्रिया पर सवाल करने और साथ ही साथ सचेतता और ध्यान से मानसिक स्थिरता का विकास करने की अनुमति देते हैं। आप क्या सोचते हैं, करते हैं और बोलते हैं उसकी सचेतता की प्रक्रिया ही नकारात्मक प्रभाव को दैनिक जीवन से दूर रखने की जड़ है। साथ ही उन्होंने जिज्ञासुओं को उनकी शिक्षा को ग्रहण करने के पहले खुद को तर्क के आधार पर संतुष्ट होने के लिए प्रेरित किया। इसी जीवन में इच्छाओं और यातनाओं से ऊपर उठ आज़ाद होने के लिए पंचशील का पालन करें। ये उपदेश, ईमानदारी पूर्वक जीवन जीना, हत्या, चोरी, झूठ बोलने, व्यभिचार और ऐसे नशीले पदार्थों से बचना जिससे असावधानी की अवस्था आती हैं।

हाल ही में, मेरा दिमाग मेरे जीवन की कुछ अनपेक्षित घटनाओं के कारण बहुत ही व्यथित था। मुझे लगा कुछ ठीक नहीं हो सकता और धीरे-धीरे नकारत्मक विचारों ने मेरे मस्तिष्क पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया। ध्यान के द्वारा ही यह सब चीज़ें बेहतर होने लगीं और मैं आत्मविश्वास और सकारात्मक उर्जा से भर गया। जैसा कि बुद्ध ने कहा है कि हम अपने विचारों से बनते हैं; हम वही बनते हैं जो हम सोचते हैं। जब मस्तिष्क शुद्ध होता है तब खुशियाँ साय की तरह हमारे साथ होती हैं और कभी साथ नहीं छोड़ती। और आज़ाद होने का यह एहसास मैंने पहली बार मेत्ता ध्यान के पालन के बाद ही किया।

 

source http://hindi.speakingtree.in/spiritual-articles/mysticism/content-367717/comment

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