चैतन्य का सागर हैं गौतम बुद्ध…ओशो


11112491_879270758797826_9043491599120799600_nगौतम बुद्ध ने कहा है, ‘तुम सागर को कहीं से भी चखो, वह हमेशा खारा है।’ इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि यह अटलांटिक है अथवा प्रशांत महासागर। बुद्धत्व के विषय में भी सच है- यह चैतन्य का एक सागर है और इसका स्वाद बहुत मीठा, तृप्तिदायक, प्रकाशवान है। और जो व्यक्ति तुम्हारे सामने है, वह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण तो वह अदृश्य अनुभव है, जो वह अपने भीतर, अपने साथ लिए हुए है।

इसलिए यदि तुम किसी चौराहे पर किसी गौतम बुद्ध, या महावीर, या महाकश्यप, या कबीर या फरीद से कभी मिल चुके हो – तब मुझसे मिल कर तुम्हारी चेतना पर पड़े वे क्षणिक प्रभाव पुनर्जीवित हो उठेंगे और ऐसा लगेगा, जैसे कि तुम मुङो पहले भी कई-कई बार मिल चुके हो, कई-कई जन्मों से जानते रहे हो।
परंतु मात्र आभास होना सत्य नहीं है।

मैं इस जन्म के पूर्व संबुद्ध न था। इसलिए यदि तुम मुझसे मिले भी हो, तो तुम ‘मुझसे’ तो नहीं मिले होगे – वह भी तुम्हारी ही तरह का एक मूच्र्छित व्यक्ति रहा होगा। मैं भी उन हजारों मूच्र्छित व्यक्तियों में से एक रहा होऊंगा, जिनसे कि तुम मिले होगे – यह कोई महत्वपूर्ण बात नहीं है।

बुद्धत्व के साथ यह परेशानी है कि तुम केवल एक जन्म में ही संबुद्ध हो सकते हो, क्योंकि वही तुम्हारा अंतिम जन्म हो जाता है। एक बार तुम संबुद्ध हो जाओ, फिर तुम पुन: मानव शरीर में नहीं आ सकते। फिर सदा के लिए उस कारागृह, उस दर्द, उस संताप, उस अर्थहीनता, उस दुखद अस्तित्व से तुम्हारा छुटकारा हो जाता है। अब तुम किसी सीमित आकार में बंधे नहीं रह जाते, बल्कि निराकार और असीम में प्रवेश कर जाते हो।
एक बार तुम संबुद्ध हुए नहीं कि तुम्हारी मृत्यु अंतिम मृत्यु बन जाती है। दूसरे शब्दों में, केवल संबुद्ध व्यक्ति ही मरते हैं। जो अभी जागे नहीं – उनके लिए यह बड़ा कठिन है – वे जाते हैं और वापस आते हैं, वस्तुत: वे कभी मरते ही नहीं। केवल संबुद्ध व्यक्ति ही मरना जान सकता है; अ-संबुद्ध व्यक्ति मरना जान ही नहीं सकता, वह अभी तैयार ही नहीं है।

जीवन एक पाठशाला है और जब तक तुम अपने पाठ ठीक प्रकार से सीख नहीं लोगे, तुम्हें उसी कक्षा में पुन:-पुन: वापस आना पड़ेगा। एक बार तुमने पाठ सीख लिया, परीक्षा पास कर ली, फिर यदि तुम कक्षा में वापस आना भी चाहो तो तुम पाओगे कि तुम्हारे लिए सब द्वार-दरवाजे बंद हैं। तुम्हें अस्तित्व के एक और ही तल पर ऊपर उठना होगा।
हम एक रूप से दूसरे रूप में आवागमन करते रहे हैं। मनुष्य अंतिम रूप है। मनुष्य के पार एक निराकार, विराट सागरीय चेतना है।

गौतम बुद्ध कहते हैं, ‘पच्चीस शताब्दियों के बाद मैं वापस आऊंगा।’ वह बस एक सांत्वना दे रहे हैं। उनके स्थान पर मैं आ गया हूं! लेकिन स्वाद वही है। एक अर्थ में वे झूठ नहीं बोले हैं; एक अर्थ में वे झूठ बोले हैं।
जीसस कहते हैं, ‘मैं वापस आऊंगा।’
कृष्ण कहते हैं, ‘मैं फिर-फिर वापस आऊंगा।’
कोई संबुद्ध व्यक्ति वापस नहीं आ सकता।
फिर ये लोग ऐसी बातें क्यों कहते हैं? वे जानते हैं कि वे वापस नहीं आ सकते। पर लोग तो संबुद्ध होते ही रहेंगे – और संबोधि का कोई नाम नहीं होता। यह गौतम बुद्ध के शरीर में हो या कृष्ण के शरीर में हो या जीसस के शरीर में हो या किसी अन्य के शरीर में हो, यह एक ही घटना है। इसलिए ऊपरी तौर से देखने पर तो वे झूठ बोल रहे प्रतीत होते हैं, पर बुनियादी रूप से वे एक बड़े गहन सत्य की अभिव्यक्ति कर रहे हैं।
यही अनुभव तुम्हें हुआ, जब तुम मुझसे पहली बार मिले।

हां, पहले भी तुम दूसरे संबुद्ध व्यक्तियों में मुझसे मिलते रहे हो। लेकिन यदि वे कह सकते हैं कि वे पुन: आएंगे.. और मुझे आना पड़ा, तब मैं कह सकता हूं कि मैं भी वहां था.. यह झूठ बोलना है, पीछे की तरफ से।
जब तुम गौतम बुद्ध से मिले तो मुझसे भी मिल लिए। लेकिन यह मिलना अनुभव का है, देह का नहीं; चेतना का है शरीर या आकार का नहीं।
(‘अनंत से अनंत की ओर’ से साभार)

osho

http://www.livehindustan.com/news/article/article1-story-334671.html

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s