जलियांवाला बाग की जघन्य हत्याकांड का बदला लेने के लिये लंडन में जाकर अंग्रेजों को लोहे के चने चबवाने वाले वीर बहुजन सपूत शहीद उधमसिंह जी के कुर्बानी दिवस 31-JULY पर कोटि-कोटि भावभीनी आदरांजलि।


udham singh

 

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
उधम सिंह
जन्म 26 दिसम्बर 1899
सुनाम, पंजाब, ब्रिटिश भारत
मृत्यु 31 जुलाई 1940 (उम्र 40)
पेंटोविले जेल, यूनाइटेड किंगडम
अन्य नाम राम मोहम्मद सिंह आजाद
संस्था गदर पार्टी, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन, भारतीय श्रमिक संघ
राजनीतिक आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

सरदार उधम सिंह (26 दिसम्बर 1899 से 31 जुलाई 1940) का नाम भारत की आज़ादी की लड़ाई में पंजाब के प्रमुख क्रान्तिकारी के रूप में अमर है। उन्होंने जलियांवाला बाग कांड के समय पंजाब के गर्वनर जनरल रहे माइकल ओ’ ड्वायर(en:Sir Michael Francis O’Dwyer) को लन्दन में जाकर गोली मारी और निर्दोष लोगों की हत्या का बदला लिया।[1] कई इतिहासकारों का मानना है कि यह हत्याकाण्ड ओ’ ड्वायर व अन्य ब्रिटिश अधिकारियों का एक सुनियोजित षड्यंत्र था, जो पंजाब पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए पंजाबियों को डराने के उद्देश्य से किया गया था। यही नहीं, ओ’ ड्वायर बाद में भी जनरल डायर के समर्थन से पीछे नहीं हटा था।[2][3][4]

मिलते जुलते नाम के कारण यह एक आम धारणा है कि उधम सिंह ने जालियाँवाला बाग हत्याकांड के उत्तरदायी जनरल डायर (पूरा नाम – रेजिनाल्ड एडवार्ड हैरी डायर, Reginald Edward Harry Dyer) को मारा था, लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि प्रशासक ओ’ ड्वायर जहां उधम सिंह की गोली से मरा (सन् १९४०), वहीं गोलीबारी को अंजाम देने वाला जनरल डायर १९२७ में पक्षाघात तथा कई तरह की बीमारियों से ग्रसित होकर मरा।

उत्तर भारतीय राज्य उत्तराखण्ड के एक ज़िले का नाम भी इनके नाम पर उधम सिंह नगर रखा गया है।

जीवन वृत्त

उधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गाँव में हुआ था। सन 1901 में उधमसिंह की माता और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। उधमसिंह का बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्तासिंह था जिन्हें अनाथालय में क्रमश: उधमसिंह और साधुसिंह के रूप में नए नाम मिले। इतिहासकार मालती मलिक के अनुसार उधमसिंह देश में सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे और इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतीक है।

अनाथालय में उधमसिंह की जिन्दगी चल ही रही थी कि 1917 में उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया। वह पूरी तरह अनाथ हो गए। 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शमिल हो गए। उधमसिंह अनाथ हो गए थे, लेकिन इसके बावजूद वह विचलित नहीं हुए और देश की आजादी तथा डायर को मारने की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए लगातार काम करते रहे।

माइकल ओ’ड्वायर की गोली मारकर हत्या

उधमसिंह १३ अप्रैल १९१९ को घटित जालियाँवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे। राजनीतिक कारणों से जलियाँवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं आ पाई। इस घटना से वीर उधमसिंह तिलमिला गए और उन्होंने जलियाँवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओ डायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली। अपने मिशन को अंजाम देने के लिए उधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा की। सन् 1934 में उधम सिंह लंदन पहुंचे और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीद ली। भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगा।

उधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 1940 में मिला। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी जहां माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुंच गए। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके।

बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ डायर पर गोलियां दाग दीं। दो गोलियां माइकल ओ डायर को लगीं जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। उधमसिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दुनिया को संदेश दिया कि अत्याचारियों को भारतीय वीर कभी बख्शा नहीं करते। उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी। उन पर मुकदमा चला। अदालत में जब उनसे पूछा गया कि वह डायर के अन्य साथियों को भी मार सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया। उधम सिंह ने जवाब दिया कि वहां पर कई महिलाएं भी थीं और भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है।

4 जून 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई। इस तरह यह क्रांतिकारी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया। 1974 में ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए। एसा था यह वीर जवान्।

https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%89%E0%A4%A7%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9

========================================

ईंटें ढोता है शहीद ऊधम सिंह का पोता

एसपी रावत ॥ कुरुक्षेत्र

जिन शहीदों की कुर्बानियों से देश आजाद हुआ अब उनके वारिसों पर क्या बीत रही है, इससे देश के मौजूदा कर्णधार अनजान हो गए लगते हैं। ऐसा ही एक मामला प्रकाश में आया है, शहीदे आजम उधम सिंह के पोते के परिवार का। इस परिवार के सदस्य सिर पर ईंटें ढोकर दैनिक मजदूरी करके पेट पाल रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि उधम सिंह ने जलियांवाला बाग में हजारों निहत्थे स्वतंत्रता सेनानियों के नरसंहार का बदला लेने के लिए लंदन में जरनल डायर को मार डाला था। आज उसी उधम सिंह के पोते जीत सिंह का परिवार सुनाम में बदहाली में है। यह जानकारी मिलने पर हरियाणा से राज्यसभा सांसद रामप्रकाश ने इन्हें सुनाम पंजाब से बुलवाकर शनिवार को शहीदे आजम उधम सिंह के 71वें शहीदी दिवस पर जिला यमुनानगर के रादौर कस्बे में आर्थिक मदद देकर इनकी मदद करने की पहल की।

सांसद रामप्रकाश ने शनिवार को कुरुक्षेत्र के पिपली पैराकीट व रादौर में आयोजित हुए शहीद सम्मान समारोह में कहा कि शहीदों ने जो रास्ता चुना था, उसी कारण आज उनके वंशजों को तंगी में जिंदगी बितानी पड़ रही है। इनकी सुध लेने के लिए सभी को आगे आना होगा। शहीदों के गुमनाम वारिसों पर फिल्म बना रहे शिवानंद झा ने कहा कि देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने वाले शहीदों के गुमनाम वारिसों के लिए हमें कुछ करना होगा। मेरा पूरा प्रयास होगा कि ऐसे गुमनाम वारिसों को देश की जनता के सामने लाए जाए।

शहीद ऊधम सिंह के वंशज जीत सिंह को कांबोज धर्मशाला रादौर की ओर से 1 लाख 41 हजार रुपये की सहायता राशि भेंट की गई। वहीं शिवनाथ झा व उसकी पत्नी मीना झा को जय भगवान शर्मा ने 2 लाख रुपये की नकद राशि दी। जीत सिंह के साथ उनका बेटा जग्ग सिंह भी आया था। इस अवसर पर रामप्रकाश ने रादौर में निर्माणधीन शहीदेआजम उधम सिंह कांबोज धर्मशाला के लिए सात लाख रुपये देने की घोषणा की।

 

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/9425570.cms

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s