29 Aug 2015 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना: आईये जाने लोगों की सोच को बनाने और बदलने का उद्योग यानी “पब्लिक रिलेशन इंडस्ट्री” जिसके बल पर कैसे धन खर्च करके जनता को अपने पक्ष में किया जाता है, ऐसे मीडिया युग में मूलनिवासियों को क्या करना चाहिए | …समयबुद्धा

क्या आप जानते हैं की भारत में लोगों की सोच को बनाने और बदलने का उद्योग यानी “पब्लिक रिलेशन इंडस्ट्री” बहुत तेज़ी से फ़ैल रही है जिसके कारण आप सही चुनाव नहीं कर सकते, आप वही चुनते हैं जो ब्राह्मणवादी/पूंजीपति अपने चुनवाना चाहते हैं | बस धन खर्च करो और जनता को अपने पक्ष में कर लो, फिर चित भी आपकी पट्ट भी आपकी| इस युग में धन ही ईश्वर है, जो काम ईश्वर या देवता नहीं कर सकते वो धन कर देता है|प्रख्यात समाजवादी लेखक एव पत्रकार दिलीप सी मंडल का एक फेसबुक पोस्ट है जिसमें वो लिखते हैं:
” क्या आप उन महिलाओं में हैं, जिन्हें लगता है कि सिगरेट पीना आजादी का प्रतीक है? तब तो आपको यह भी पता होगा कि इसे आजादी का प्रतीक बनाने वाला शख्स बरनेस, फ्रायड का रिश्तेदार था। और सिगरेट को महिलाओं की आजादी से जोड़ने का ठेका बरनेस को अमेरिका की सबसे बडी सिगरेट कंपनी ने दिया था। अमेरिकन टौबैको कंपनी की दिक़्क़त यही थी कि वहाँ औरतों का सिगरेट पीना अच्छा नहीं माना जाता था। इससे बिक्री पर असर पड़ रहा था। बरनेस ने मीडिया कैंपेन से यह छवि बदल दी और बताया कि औरतों के लिए यह “आजादी की मशाल” है।
क्या आपने सोचा कि अभी अभी जो मजदूरों द्वारा भारत बंद हुआ, उसके बारे में आपको यह तो बताया गया कि इससे ‘देश’ को 25,000 करोड़ रुपए का घाटा हो गया, लेकिन क्या मीडिया ने आपको बताया कि भारत बंद के मुद्दे क्या थे और इसकी जरूरत ही क्यों पड़ी? 25,000 करोड़ का आँकड़ा मीडिया को किसने दिया होगा?
भारत में लोगों की सोच को बनाने और बदलने का उद्योग यानी पब्लिक रिलेशन इंडस्ट्री का साइज़ सालाना 27,000 करोड़ रुपए का है। जनता की यह सोच राजनीतिक हो सकती है, किसी प्रोडक्ट के बारे में हो सकती है। कुछ भी हो सकता है।
पब्लिक रिलेशन विज्ञापन नहीं है। यह खबरों के बीच कहीं होता है। आप उसे न्यूज जानकर देखते-पढ़ते हैं।
मीडिया में कहाँ से आती हैं ख़बरें, पब्लिक रिलेशन का मीडिया से क्या है रिश्ता, प्रोपेगंडा से विचार किस हद तक बदले जा सकते हैं, इन सवालों से टकराता मेरा लेख, इस बार के Socialist Factor मैगजीन में।” उस लेख की तस्वीरें इस देशना के साथ अटेच हैं|

 

धम्मबंधुओं!! हमारे पीढ़ी ने टीवी पर दूरदर्शन से ‘केवल टीवी’ की तरफ जाने की घटना देखी है, इसी घटना में एक बड़ी घटना थी समाचारों को एक घंटे से बढाकर चौबीस घंटे का कर देना| आपने कभी सोचा
क्या वाकई इसकी जनता को जरूरत थी?
क्या वाकई समाचार इतने ज्यादा होते हैं की एक घंटे में पूरे नहीं परोसे जा सकते?
हमारे जीवन में चौबीस घंटे के समाचारों को देख कर क्या कोई फर्क पड़ा?
क्या हमारा जीवन बेहतर हुआ?

सोचने का टाइम ही कहाँ रहा अब, अब तो चौबीस घंटे आप पूंजीपतियों के अजेंडे को अपने अंतर्मन में बैठने में व्यस्त हो, चाहे टीवी हो या इंटरनेट हो| आपको फ्री वाई फाई और काम कीमत में तेज़ इंटरनेट ऐसे ही तो नहीं दिया जा रहा, इसका लाभ भी तो उठाया जायेगा| यकीनन इंटरनेट और टीवी हमारे लिए जरूरी है पर उससे भी ज्यादा जरूरी है हमारी सजगता और सही चुनाव|

मीडिया पर अपनी कमाई खर्च कर के भी अगर हमें ज्ञान नहीं होगा तो चुनाव सही नहीं होगा| मतलब पैसा आपका होगा पर एजेंडा उनका, ये ठीक वही नीति है जिसमे पांडा आपके पैसों पर आपके ही घर में कथा कहने आता था और आपका पता भी नहीं चलता था की कब उसने ब्राह्मणवादी एजेंडा आपके दिमाग में भर दिया, जो आपके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गया|

इस लेख को पढ़ने के बाद, जब आप मीडिया (टीवी,इंटरनेट,बॉलीवुड,अख़बार आदि) पर जरा गौर करेंगे तो शायद आप समझ सकते हैं की :
– क्यों इस देश को उसके संवेधानिक और जायज़ नाम “भारत” न बोलकर हिंदुस्तान बोलते हैं?
– क्यों मंदिरों की भीड़ की तस्वीरें भी एक खबर बन जाती हैं और आपके अंतर्मन में कहीं मंदिर प्रेम जग जाता है?
– क्यों किसी फिल्म का हीरो या दबंग इतना ज्यादा धार्मिक और दानी दिखाया जाता है?
– क्यों गरीब, मजदूर और भूखों मरते लोगों की खोज खबर मीडिया में गम होक रह जाती है?
– क्यों नाटक और फिल्मों के पत्रों के नाम और उनके टाइटल एक विशेष वर्ग के ही होते हैं?
– क्यों किसी कौम की छवि ख़राब कर दी जाती है?
– क्यों गौतम बुद्ध, सम्राट आशिक महान और डॉ आंबेडकर जैसे महानतम व्यक्तित्वों पर मीडिया चुप्पी साध लेती है, इनको घृणा का पत्र बना रखा है|
– क्यों कोई मसालेदार खबर किसी दूसरी ‘जनहित खबर’ के मुकाबले ज्यादा दिखाई जाती है?
– क्यों प्राइम टाइम में किरकेट और बॉलीवुड पर इतनी ज्यादा चर्चा होती है जिसकी जनता को जरूरत ही नहीं?
– अब क्यों आपके दिमाग की जगह टीवी फैसला करता है की आप क्या सोचते हो, या आपको क्या जरूरत है?
– क्यों आपका टीवी पर बैठे श्रद्ये-देवता आपकी कुंडली दोष और भविष्ये और दुखों का समाधान देते-बेचते मिल जायेंगे?
– क्यों उन लोगों की खबर और प्रमाण जनता के सामने नहीं आ पाते जो वोटिंग मशीन की कमियां साबित करते हुए वापस कागज़ से वोटिंग की मांग करते हैं?
– क्यों दस बीस लोगों का धरना प्रदर्शन राष्ट्रीय खबर हो जाता हैं और क्यों लाखों का धरना प्रदर्शन एक छोटी से खबर बन के रह जाती है ?
– क्यों दलितों का बौद्ध धर्म में लाखों की संख्या में वापस लौटने की घटना कोई खबर नहीं होती जबकि किसी फ़िल्मी हीरो का मंदिर में जाना भी खबर हो जाती है ?

  • क्यों सरे देश का मीडिया एक सुर में आरक्षण के विरोध में ही खबरे लेख आर्टिकल पेश करता है क्या कहीं कोई भी ऐसा नहीं इस देश में जो आरक्षण के पक्ष में लिख सके बोल सके
  • क्यों किसी टीवी डिबेट में किसी मूलनिवासी को नहीं लाया जाता, और अगर लाया भी जाता है तो ऐसे को जिसको कुछ पाता ही नहीं होता

लिस्ट लम्बी है,बाकि आप खुद समझो….क्योंकि ज्यादा लिखने से कुछ नहीं होता समझदार को इशारा ही काफी है, जो इतना पर भी नहीं समझे उन भक्तों के लिए भक्तिमार्ग ही सही है|

ये इसलिए होता है क्योंकि सब सत्य नहीं फायदा को चाहते हैं, सत्ये की जरूरत किसी को नहीं |पर फायदे की इस रेस में जो पिछड़ जाता है वही तो आम जनता बनता है बाकि तो शाशक बनते हैं| लोग आखिर पिछड़ते क्यों है| उदाहरण से समझते हैं :

सब छात्र जानते हैं की स्कूल का सिलेबस और शिक्षा में ही उनका भला है न की बिगड़ैल दोस्तों की मौज मस्ती में, पर फिर भी मौज मस्ती और टाइम पास को चुनते हैं न|इस उदहारण से आप समझ सकते हो की क्यों लोग धम्म की जगह धर्म को चुनते हैं| धम्म में ही हमारा भला है पर धर्म या सत्संग में चका चौंध है मजा है रस है|

खेर मुद्दे पर लौटते हैं | शायद अब आप समझ सकें की जिससे सवर्ण नीच और अछूत समझकर बहिष्कार करते हैं असल में उसके काम के बुद्धिजीवियों के पास सत्य होता है जिसे दबाने के लिए इनका सामूहिक बहिष्कार कारगर बाह्मणवादी औज़ार है|शायद इस तथ्ये से आप समझ सकते हाँ क्यों गौतम बुद्ध, सम्राट आशिक महान और डॉ आंबेडकर जैसे महानतम व्यक्तित्वों पर मीडिया चुप्पी साध लेती है, इनको घृणा का पत्र बना रखा है| आप घृणा करोगे तभी तो इनके पास नहीं जाओगे और जब नहीं जाओगे तो आपको सत्य और समाधान नहीं मिलेगा और आपके विरोधी बदस्तूर आपपर राज करते रहेंगे|ये इंसानी प्रकृति होती है की अगर आपकी आँखों पर किसी के लिए घृणा की पट्टी बंधी हो वो आप उसमें अच्छाई देख ही नहीं पाओगे|

आपने अब लोगों की सोच को बनाने और बदलने का उद्योग यानी “पब्लिक रिलेशन इंडस्ट्री” के सत्य को जान लिया आपने, अब क्या? ऐसे तो बहुत से सत्य जानते हो आप , क्या कर लिया आपने….| कहने से नहीं करने से होता है | मुझे लगता हैं ऐसे में मुझे मार्गदर्शन करना चाहिए,सही मार्गदर्शक वो नहीं जो सिर्फ ज्ञान ही न झाडे बल्कि वही है जो समाधान भी बताये| इसलिए यहाँ दिमाग लगाने वाली बात ये है की मूलनिवासियों शेडूल कास्ट को अपनी मुक्ति के लिए ऐसे में क्या करना चाहिए, इस बारे में मुझे लगता है :

जब तक ब्रामण मंदिर व्यस्था,जाट खाप पंचायत और मुस्लमान की मस्जिद व्यस्था की तरह शेडूल कास्ट के पास ‘सूचना और एक्शन’ का एकरूप क्रियान्वयन प्लेटफॉर्म नहीं बन जाता तब तक इन बिखरे हुए लोगों को अत्याचार से कोई नहीं बचा सकता, चाहे कोई भी सत्ता में हो| ये प्लेटफार्म हो सकते हैं जाती,प्रान्त,राजनैतिक पार्टी, आदि आदि पर भारत जैसे देश में जहाँ हर पचास किलोमीटर पर सामाजिक इकाई बदल जाती है ऐसे में ये सभी प्लेटफार्म बेकार हो जाते हैं| उदाहरण के लिए जब राजस्थान के बैरवा के साथ अत्याचार होता है तो महाराष्ट्र का महार और यु0पि० का चमार दोनों कुछ नहीं बोलते क्योंकि न ये उनको अपना समझते हैं न ही वो इनको अपना समझते हैं, दूसरी और से भी सामान प्रतिक्रिया ही होता है| इतना ही नहीं जब डॉ आंबेडकर की प्रतिमा को नुक्सान पहुचाया जाता है तो हमारे अपने मूलनिवासी भाई जो धोबी,धानुक,खटीक,कोरी,कुर्मी,पासी,डोम,भंगी,अहीर आदि आदि अनेकों नामों का प्लेटफार्म या झंडे लेके बैठे हैं, ये लोग इसे अपनी हार नहीं मानते, इसे केवल चमारों का सरोकार मानते हैं, इसे कहते हैं अलग अलग प्लेटफार्म होना, फुट डालकर शाशन करना|हमारे लोगों ने गुरुओं के नाम पर संगठित होना शुरू कर दिया है, अगर आप गुरुओं के नाम पर प्लेटफार्म बनाना चाहो तो भी नहीं हो सकता वाल्मीकि वाले कबीर वालों के साथ नहीं और पेरियार वाले रविदास वालों के साथ नहीं| पता नहीं आप इस बात को समझ पा रहे हैं की नहीं पर डॉ आंबेडकर इस बात को अच्छी तरह समझ गए थे, इसीलिए “बौद्ध धम्म” का सर्व मान्य चौमुखी प्लेटफार्म देकर गए हैं| हमें अपने बौद्ध धम्म पर वापस लौटना ही होगा और जैसे पहले हम विश्व गुरु थे दोबारा बन सकते हैं| भारत के इतहास में ऐसा कई बार हुआ है जब ब्राह्मणवाद अपने न्यूनतम स्तर पर था और तब बौद्ध धम्म अपने चरम पर था| ध्यान रहे बौद्ध धम्म का लक्ष्य ही ‘बहुजन हिताए बहुजन सुखाये’ था, है और रहेगा,( नोट: बहुजन मतलब बहुसंख्यक 95% जनता न की दलित) | बौद्ध धम्म ऐसा प्लेटफार्म हैं जो न केवल देश में बल्कि विदेश में से भी में दुनिया की आबादी का तीसरा हिस्सा आपके सुख दुःख में साथ दे सकता है अगर सही से प्रस्तुत किया जाए| बौद्ध धम्म हमें न केवल अंतर्मन से , देश के अंदर से ही नहीं बल्कि बहार इस दुनिया में भी सशक्त करने को पर्याप्त है| बस ध्यान में रखने वाली बात ये हैं की आप ब्राह्मणवादी मिलावट वाले बौद्ध धम्म में न फस जाएँ|ध्यान रहे बाबा साहब और गौतम बुद्ध की मूर्ती केवल उपासना के लिए नहीं है बल्कि ये उस विचारधारा का इशारा मात्र है जिससे आपका भला होगा, उनके बताए मार्ग पर चलकर ही मुक्ति संभव है| जिसको मुक्ति चाहिए उसे लड़ना होगा, और जिसे लड़ना है उसे पहले पढ़ना होगा| जो संगर्ष करते हैं वो पाते हैं और जो ध्यान न देके अपनी मौज में लगे रहते हैं वो खुद भी गुलाम बनते है और अपनी कौम को भी गुलामी में धकेल देते हैं|

….समयबुद्धा

बहुजन हिताए बहुजन सुखायेsocialist factor mandal1


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भारत के पिछड़ों के लिए आरक्षण जरूरी क्यों है …राम शिव मूर्ति यादव

NAMEआरक्षण का मुद्दा आरम्भ से ही लोगों को उद्वेलित करता रहा है। कुछ लोग इसे योग्यता, अवसर की समानता व रोजगार से जोड़कर देखते हैं, तो कुछ के लिए यह निर्णय में भागीदारी से सम्बन्धित है। वस्तुतः आरक्षण किसी न किसी रूप में भारतीय समाज में प्राचीन काल से ही मौजूद रहा है। परम्परागत वर्ण-व्यवस्था में इसके बीज खोजे जा सकते हैं, जहाँ ब्राह्यण-क्षत्रिय वैश्य-शूद्र सभी के कर्म निर्धारित कर दिए गए थे। यही कारण था कि भगवान राम ने शम्बूक का वध इसलिए कर दिया कि वह शूद्र होकर तपस्या कर रहा था। महाभारत काल में गुरू द्रोणाचार्य ने एकलव्य को शूद्र होने के कारण शिक्षा देने से मना कर दिया और जब उन्हें अहसास हुआ कि एकलव्य अर्जुन से भी बड़ा वीर है, तो उन्होंने गुरूदक्षिणा की आड़ में उसके हाथ का अंगूठा ही माँग लिया। स्पष्ट है कि वर्ण व्यवस्था रूपी विशेषाधिकारों की आड़ में पिछड़ों और दलितों को शिक्षा से वंचित करने का षडयंत्र रचा गया और उन्हें वेद ज्ञान तथा आधुनिक शिक्षा से वंचित रखा। कालान्तर में ऐसे वंचित वर्गों को थोड़ी विशेष सुविधा देकर विभिन्न सरकारों ने उनका जीवन स्तर उठाने और अन्य वर्गों के समकक्ष खड़ा करने का प्रयास किया। स्वयं मण्डल आयोग के अध्यक्ष डॉ0 वी0 पी0 मण्डल ने कहा था- ‘‘यह सच है कि आरक्षण से कुछ लोगों का दिल जलेगा। मगर क्या महज दिल जलने को सामाजिक सुधार के खिलाफ एक नैतिक निषेधाधिकार माना जाये?’’

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 (4) में सन्निहित है कि- ‘‘इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।’’ वस्तुतः संविधान का यह उपबन्ध सामाजिक न्याय की प्रतिष्ठा सुनिश्चित करता है। इन्द्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा था कि- ‘‘पिछड़े हुए नागरिकों का वर्ग’’-इस पद की संविधान में कोई परिभाषा नहीं दी गई है। जाति, उपजीविका, निर्धनता और सामाजिक पिछड़ापन का निकट का सम्बन्ध है। भारत के सन्दर्भ में निचली जातियों को पिछड़ा माना जाता है। जाति अपने आप ही पिछड़ा वर्ग हो सकती है। हिन्दू समाज में पिछड़े वर्ग की पहचान जाति के आधार पर की जा सकती है।’’ वस्तुतः भारतीय परिप्रेक्ष्य में आरक्षण सामाजिक स्थिति सुधारने का एक उपाय है, न कि आर्थिक स्थिति। आरक्षण का मामला मात्र रोजगार का नहीं वरन् सामाजिक समानता और भागीदारी का है। आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए तो तमाम आर्थिक कल्याणकारी योजनाओं को ईमानदारी से लागू किया जा सकता है और गरीबी हटाओ जैसे नारों को क्रियान्वित किया जा सकता है। यहाँ तक कि स्वयं अमेरिका जैसे सर्वाधिक विकसित देश में भी ‘डायवर्सिटी सिद्धान्त’ के आधार पर अश्वेतों के लिए आरक्षण लागू है।

आरक्षण के विरोध में सबसे सशक्त तर्क यही दिया जाता है कि आरक्षण व्यवस्था समानता एवं योग्यता हनन के लिए एक षडयंत्र है। पर यह तर्क देने वाले भूल जाते हैं कि समता बराबर के लोगों में ही आती है। जब तक तराजू के दोनों पलड़े बराबर न हों, उनमें बराबरी की बात करना ही व्यर्थ है। क्या इस नि’कर्ष को खारिज करना संभव है कि उच्च व तकनीकी संस्थानों में कुछ जातियों का वर्चस्व है। नेशनल सर्वे आर्गेनाइजेशन के आंकड़ों पर गौर करें तो ग्रामीण भारत में 20 साल से ऊपर के स्नातकों में अनुसूचित जातियाँ, जनजातियों व मुस्लिमों का प्रतिशत मुश्किल से एक फीसदी है, जबकि सवर्ण स्नातक पाँच फीसदी से अधिक हैं। आरक्षण विरोधी सवर्ण अपने पक्ष में तर्क दे सकते हैं कि ऐसा सिर्फ उनकी योग्यता के कारण है। पर वास्तव में ‘योग्यता’ का राग अलापना निम्न तबके को वंचित रखने की साजिश मात्र है क्योंकि यदि योग्यता एक सहज एवं अन्तर्जात गुण है तो अन्य वर्गों के लोगों में भी है, पर फिर भी वे इस स्तर तक नहीं पहुँच पाए तो दाल में कुछ काला अवश्य है। अर्थात-वे इतने साधन सम्पन्न नहीं हैं कि प्रगति कर सकें, विभिन्न प्रशासकीय व राजनैतिक पदों पर बैठे उच्च वर्णों के भाई-भतीजावाद का वे शिकार हुए हैं, प्रारम्भिक स्तर पर ही उन्हें सामाजिक हीनता का अहसास कराकर आगे बढ़ने नहीं दिया गया। ऐसे में यदि सवर्णों के विचार से ‘योग्यता’ की निर्विवाद धारणा महत्वपूर्ण है, जो उस सामाजिक संरचना की ही अनदेखी करता है, जिसकी बदौलत स्वयं उनका अस्तित्व है, तो निम्न वर्ग या आरक्षण के पक्षधरों के अनुसार योग्यता को ही पूर्णरूपेण से नजर अंदाज कर देना चाहिए क्योंकि यह योग्यता की आड़ में एक विशिष्ट वर्ग को बढ़ावा देने की नीति मात्र है। आखिर क्या कारण है कि संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षाओं में आरक्षित वर्गों को अलग क्रम के रोल नंबर आवंटित किए जाते हैं? क्या किसी न किसी रूप में यह भेदभाव का कारण न बनता होगा? निश्चिततः आज की योग्यता थोपी गई योग्यता है। योग्यता के मायने तब होंगे जब सभी को समान परिस्थितियाँ मुहैया कराकर एक निश्चित मुकाम तक पहुँचाया जाये एवं फिर योग्यता की बात की जाए। योग्यता की आड़ में सामाजिक न्याय को भोथरा नहीं बनाया जा सकता।

वस्तुतः आजादी के 6 दशकों बाद भी आरक्षण का दायरा अगर घटाने की बजाय बढ़ाने की जरूरत पड़ रही है तो इसका सीधा सा अर्थ है कि संविधान के सामाजिक न्याय सम्बन्धी निर्देशों का पालन करने में हमारी संसद विफल रही है। राजनैतिक सत्ता के शीर्ष पर अधिकतर सवर्णों का ही कब्जा है। ऐसे में अगर वे स्वयं आरक्षण का दायरा बढ़ाना चाहते हैं तो देर से ही सही पर उन्हें पिछड़ों व दलितों की शक्ति का अहसास हो रहा है न कि स्वार्थ के वशीभूत वे पिछड़ों और दलितों पर कोई एहसान कर रहे हैं, क्योंकि आरक्षण संविधानसम्मत प्रक्रिया है। चूंकि पिछड़ी और दलित जातियाँ व्यवस्था में समुचित भागीदारी के अभाव में अपनी आवाज उठाने में सक्षम नहीं हैं अतः कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के तहत सरकार का कर्तव्य है कि इन उपेक्षित वर्गों को व्यवस्था में निर्णय की भागीदारी में उचित स्थान दिलाये। इसे किसी का अधिकार छीनना नहीं वरन् समाज के हर वर्ग को उचित प्रतिनिधित्व देना कहा जायेगा।

वस्तुतः आज आरक्षण समाज को पीछे धकेलने की नहीं वरन् पुरानी कमजोरियों और बुराईयों को सुधार कर भारत को एक विकसित देश बनाने की ओर अग्रसर कदम है। यह लोकतंत्र की भावना के अनुकूल है कि समाज में सभी को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए एवम् यदि किन्हीं कारणोंवश किसी वर्ग को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है तो उसके लिए समुचित आरक्षण जैसे रक्षोपाय करने चाहिए। सामाजिक समरसता को कायम करने एवं योग्यता को बढ़ावा देने के लिए जरूरी है कि ‘अवसर की समानता’ के साथ-साथ ‘परिणाम की समानता’ को भी देखा जाय। देश में दबे, कुचले और पिछड़े वर्ग को अपनी प्रतिभा का प्रदर्शान करने का मौका नहीं मिला, मात्र इसलिए ये वर्ग अक्षम नजर आते हैं। इन्हें सरसरी तौर पर अयोग्य ठहराना सामाजिक न्याय के सिद्धान्तों के प्रतिकूल है। शम्बूक व एकलव्य जैसे लोगों की प्रतिभा को कुटिलता से समाप्त कर उनकी कीमत पर अन्य की प्रगति को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

कालान्तर में आरक्षण की काट के लिए आर्थिक उदारीकरण को एक अपरिहार्यता के रूप में देश पर थोप दिया गया। उसके बाद से निरंतर राज्य अपना कार्यक्षेत्र सीमित करता जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्रों में विनिवेश के माध्यम से उन्हें निजी हाथों में सौंपा जा रहा है, सरकारी सेवाओं में अवसर कम हो रहे हैं, पेन्शान जैसी व्यवस्थाओं को खत्म कर सरकारी नौकरियों को आकर्षणहीन बनाया जा रहा है-निश्चिततः ऐसे में निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की जरूरत महसूस होने लगी है। रा’ट्र की इतनी बड़ी जनसंख्या को संसाधन और अधिकारविहीन रखना रा’ट्र् की प्रगति, विकास एवं समृद्धि के लिए अहितकर है। तकनीकी योग्यता के लिए क्षमतावान विद्यार्थियों के सामने उच्च शैक्षणिक संस्थाओं की अंगे्रजी भाषा व भारी-भरकम खर्चे आड़े आते हैं, मात्र इसलिए ये उस व्यवस्था में प्रवेश नहीं पा पाते और हीनता का अनुभव करते हैं। ये कहना कि उनमें योग्यता का अभाव है, उचित नहीं होगा। ऐसी परिस्थितियों में उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण की अनिवार्यता को समझा जा सकता है। प्रखर राष्ट्रवादी विचारक विवेकानन्द ने एक बार कहा था- ‘‘जब वे (शूद्र) जागेंगे और आप (उच्च वर्ग) द्वारा अपने प्रति किए गये शोषण को समझेंगे तो अपनी फूँक से वे (शूद्र) आप (उच्च वर्ग) सबको उड़ा देंगे। यह शूद्र वे लोग हैं, जिन्होंने आपको सभ्यता सिखायी और ये ही लोग आपका पतन भी कर सकते हैं।’’ वर्तमान परिप्रेक्ष्य को इन अवधारणाओं के बीच ही समझने की जरूरत है अन्यथा समाज की प्रतिगामी शक्तियाँ तो अपने परम्परागत विशेषाधिकारों के लिए सदैव ही सामाजिक न्याय जैसी विस्तृत अवधारणा को मात्र रोजी-रोटी से जोड़कर उनका क्षुद्रीकरण करने की कोशिश करती रहेंगी।

रचनाकार परिचय:ram shiv murit yadav

नाम : राम शिव मूर्ति यादव

जन्म तिथि : 20 दिसम्बर 1943

जन्म स्थान : सरांवा, जौनपुर (उ0 प्र0)

पिता : स्व0 श्री सेवा राम यादव

शिक्षा : एम0 ए0 (समाज शास्त्र), काशी विद्यापीठ, वाराणसी

लेखन : देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं- अरावली उद्घोष, युद्धरत आम आदमी, समकालीन

सोच, आश्वस्त, अपेक्षा, बयान, अम्बेडकर इन इण्डिया, अम्बेडकर टुडे, दलित साहित्य वार्षिकी,

दलित टुडे, मूक वक्ता, सामथ्र्य, सामान्यजन संदेश, कमेरी दुनिया, जर्जर कश्ती, दहलीज

इत्यादि में विभिन्न विषयों पर लेख प्रकाशित। प्रकाशित लेखों का एक संग्रह प्रेस में।

सम्मान : भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘‘ज्योतिबा फुले फेलोशिप सम्मान‘‘ एवं

राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ’’भारती ज्योति’’ से सम्मानित।

रूचियाँ : रचनात्मक लेखन एवं अध्ययन, बौद्धिक विमर्श, सामाजिक कार्यों में रचनात्मक भागीदारी।

सम्प्रति : उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्ति पश्चात स्वतन्त्र लेखन व अध्ययन एवं समाज सेवा।

सम्पर्क : राम शिव मूर्ति यादव, स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी(सेवानिवृत्त),तहबरपुर, पो0-टीकापुर, आजमगढ(उ0प्र0)

-संपर्क – rsmyadav@rediffmail.com

http://www.rachanakar.org/2008/06/blog-post_09.html

पत्थर व मिट्टी के “भगवान” की हार और “मानवता” की जीत” व 100% सही ‘भारतिय संविधान’ की जीत …डॉ दशरथ कुमार हिनुनिया

ambedkar-samvidhan sadhyeपत्थर व मिट्टी के “भगवान” की हार और “मानवता”  की जीत” व 100% सही ‘भारतिय संविधान’ की जीत अवश्य पढीये !

!!भारतिय संविधान के शिल्पकार विश्वरत्न डॉ.बाबासाहाब आबेडकर !!
देश स्वतंत्र होने के बाद भारत का संविधान कोन बनायेंगा इसकी खोज शुरू हुयी !
गांधी व पंडीत नेहरू ब्रिटीशो के पास गये और ब्रिटीशो से कहा हमे भारत का संविधान बनाना है !
ब्रिटीशो ने कहा हम आपके देश का संविधान कैसे बना सकते है इस देश मे अनेक जातीया है अनेक धर्म है
यदि कोई भारत का संविधान बना सकता है तो तुम्हारे देश मे एक ही हिरा है और वो हिरा है डॉ. बी.आर.आंबेडकर !
इसलिये कांग्रेस व गांधी को मजबुरन डॉ. बाबासाहाब आंबेडकर को संविधान समिती पर लेना पडा !
इस कार्य के लिये सात सदस्य की समिती गठीत कि गयी !
1. सदस्य बिमार पड गया !
2. सदस्य विदेश चला गया !
3. सदस्य अपने खाजगी काम मे व्यस्त रहा !
4. सदस्य राजनिती मे व्यस्त रहा !
5. सदस्य की मृत्यृ हो गयी !
6. सदस्य को बाबासाहाब का असपृश्य होना गवारा नही था !
7. अंत मे डॉ.बाबासाहाब आंबेडकर ने 21-21 घंटे अभ्यास करके भारतीय संविधान का मसौदा तैयार किया !
आगे संविधान सभा मे प्रश्न चर्चासत्र के लिये आया ! भारतीय संविधान की शुरवात कैसे की जाय !
1. मौलाना हजरत मोहली उठ खडे हुये और बोले भारतीय संविधान की शुरवात ” अल्लाह” के नाम से की जाय !
२.पंडीत मदन मोहन मालविय खडे हुये और बोले “ओम नमो शिवाय ” के नाम से की जाय !
3. एच.पी.कामत उठ खडे हुये और बोले ” ईश्वर” के नाम से की जाय !
4. डॉ.बाबासाहाब आंबेडकर उठ खडे हुये और बोले भारतीय संविधान की शुरवात “लोगो” के नाम से की जाय !

इस मुद्दे पर संसद मे मतदान हुआ “68 मत लोगो” के नाम के लिये मिले ! और “41 मत भगवान (देवताओ) के नाम के लिये मिले !
और संविधान की शुरवात ” We the people of India ” ” हम भारत के लोग ” ऐसे शुरू हुयी !
भारत के पहीले ही मतदान मे “पत्थर” के “भगवान” हार गये और मानव ( लोग) जित गये !
डॉ बाबासाहाब आंबेडकर जित गये आगे बाबासाहाब को ये समझ आया की आगे चलकर इस देश का नाम “हिन्दुस्थान” करेंगे

इसलिये बाबासाहाब ने भारतीय  संविधान की कलम “395 मे “A” के अनुसार अनुवाद किया ” India that is the “BHARAT”
” INDIA” याने “भारत” ऐसे पुष्टी कर दी

मित्रो आप से अनुरोध है ये संदेश प्रत्येक ग्रुप मे अवश्य भेजिए ।
डॉ दशरथ कुमार हिनुनिया
प्रदेश सचिव
अम्बेडकराईट पार्टी ऑफ इंडिया
राजस्थान ।

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले की खाप पंचायत ने दो अनुसूचित जाति बहनों के साथ बलात्कार करने का फरमान सुनाया है | इन लड़कियों का कसूर सिर्फ इतना था कि उनके भाई ने एक महिला से प्रेम किया था ….Sudhir Kumar

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले की खाप पंचायत ने दो अनुसूचित जाति बहनों के साथ बलात्कार करने का फरमान सुनाया है | इन लड़कियों का कसूर सिर्फ इतना था कि उनके भाई ने एक महिला से प्रेम किया था | क्या ये फरमान किसी आतंकवादी घटना से कम है ? लड़की का परिवार दहशत के कारण गाँव से पलायन कर दिल्ली चला गया है | युवक की जमानत मंजूर होने के बावजूद उसके परिजन आवश्यक दस्तावेज लेने के लिए गाँव नहीं जा पा रहे हैं जिस कारण युवक की रिहाई नहीं हो पा रही है | इससे बड़ा आतंकवाद क्या हो सकता है कि परिवार को घर बार, गाँव छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया जाये ? घर वापिस लौटने पर इनको जान और सम्मान गंवाने का खतरा है | क्या ये खुला आतंकवाद नहीं है ? इस आतंकवाद का स्रोत कोई मुस्लिम नहीं है और कोई ब्राह्मण भी नहीं है | इस आतंकवाद को जन्म देने वाली आपके मूलनिवासी बंधू ही है | इस खाप पंचायत की मालिक जाट बिरादरी ही है | हरियाणा में जो एस सी पर अत्याचार होते हैं उनके भी जनक ये खाप पंचायत ही होती है | बात करते हो ब्राह्मणों से लड़ने की ब्राह्मणों को भगाने की तो क्या आपके इन बंधुओ से हम इसलिए पिटते रहे कि ये आपके मूलनिवासी बंधू हैं ? पशिमी उत्तर प्रदेश में और हरियाणा में जितना जातिवाद का आतंकवाद इनका है किसी और जाति का नहीं है | यहाँ तक की ब्राह्मणों का भी आतंकवाद नहीं है | क्या सरकार को इस जातिवाद के आतंकवाद पर रोक नहीं लगानी चाहिए ? इन खाप पंचायतों को अवैध घोषित कर इनके मुखियाओं को जेल में नहीं डाल देना चाहिए ?
मूलनिवासी जनजागरण का अभियान चलाने वाले बन्धु भी ध्यान दें ब्राह्मणों को भगाने से पहले अपने इन भाईयों को समझा लो या फिर हमको भी खाप पंचायत बना लेनी चाहिए ? जिस तरह से हमारे साथ इन खाप पंचायतों का आतंक बढ़ रहा है उस तरह से हमको भी इनको जवाब देने के लिए तैयार हो जाना चाहिए और इन्ही के समानांतर खापों का गठन कर लेना चाहिए ताकि हम अपने पीड़ित भाई बहनों की सुरक्षा कर सके |

 

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डॉ0 भीम राव अम्बेडकर समाज कल्याण समिति (रजि0) बिहोली, पानीपत
भगवान कहाँ रहता है ?
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•गजराज (हाथी) का पैर मगरमच्छ ने पकड़ लिया तो उसने हरि को पुकारा । हरि नंगे पाँव दौड़े आये और मगरमच्छ का वध कर गज को मुक्त कराया ।
•दु:शासन ने द्रोपदी का चीर हरण किया तो उसने भी हरि को पुकारा हरि ने आकर उसको भी बचाया ।
•होलिका ने प्रह्लाद को जलाने की कोशिश की तो प्रह्लाद ने हरि को पुकारा हरि उसको भी बचाने आया ।
•गोकुलवासियों ने इंद्र के प्रकोप बाड़ से बचाने हरी को बुलाया, हरी ने गोवेर्धन पर्वत एक उँगली से उठाकर उनको बचाया |
•…दो चार आप खुद जोड़ लीजिये।
…अब वास्तविक घटनाओं पर आ जाइये !
•महमूद गजनवी ने भारत पर 17 आक्रमण किये,सोमनाथ का मंदिर लूटा और भयानक मार काट की ।
-भक्तो ने फिर भगवान को पुकारा । गजनवी के सैनिक रक्तपात करते रहे लेकिन कोई भगवान नही आया ????
-भारत पर हमला करने शक, तुर्क, गौरी, ख़िलजी, तुगलक, सैयद, लोदी, मुग़ल , डच, अंग्रेज़ आये, लेकिन भारत भुमि को लम्बी गुलामी से बचाने कोई हरी नहीं आये ?
-औरंगज़ेब ने आपके भक्तों को मार-मार मुसलमान बनाया, लेकिन आप सहायता को नहीं आये ???
-अब केदारनाथ में प्रलय आ गयी , 20000 भक्त मारे गए। भक्त फिर भगवान को सहायता के लिए पुकारते रहे लेकिन कोई भगवान नही आया ।
भक्त मरते रहे और भगवान देखते रहे ?
*आपने सिर्फ अपना घर यानि मंदिर बचाया ?
•अब नेपाल में भूकंप आया ।
-भक्त फिर भगवान से प्रार्थना करने लगे लेकिन कोई भगवान नही आया बचाने ।
*इससे पहले भी भूकंप दंगे फसाद या कोई अन्य त्रासदी होने पर भी सब भगवान को पुकारते रहे लेकिन कभी कोई भगवान नही आया ।
•प्रतिवर्ष धार्मिक स्थलों, तीर्थस्थानों व यात्राओं में भगदड़ और प्राकृतिक आपदाओं से हजारों भक्तों की जान जाती हैं ।मगर बचाने कोई भगवान नही आता हैं।
-इससे क्या सिद्ध होता है ?
*•इससे सिर्फ एक ही बात सिद्ध होती है कि भगवान बचाने को तो आता है; लेकिन सिर्फ मिथकीय किस्से-कहानियों में ।
•अब अगला सवाल होता है कि भगवान कब सहायता करने आता हैं ?
-सीधी सी बात है जब लेखक भांग खाकर धर्मग्रन्थ लिखने लग जाये तब।
•अगला सवाल भगवान किसकी मदद करता है ?
-निष्कर्ष कहता है भगवान पौराणिक कथाओं के सिर्फ अपने जैसे ही काल्पनिक पात्रों की रक्षा करता हैं ।
•अगला सवाल भगवान कहाँ रहता है ?
-ईश्वर का अस्तित्व मानव मस्तिष्क के अलावा कहीं नहीं है। वो कुछ लोगों के दिमाग में डर के रूप में बसे होने के अतिरिक्त मिथकीय (झूठे) किस्से कहानियों में ही रहता है ।
-इन तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष यह निकलता है की यथार्थ और वास्तविकता के धरातल पर न तो कभी किसी ने ईश्वर को देखा है और ना ही कभी कोई भगवान किसी की मदद आयें है।

 

 

कुशीनाला के शालवन में बुद्ध की अंतिम विदा—(कथा—98)…..ओशो (एस धम्‍मो संनतनो)

buddha123कुशीनाला के शालवन में बुद्ध की अंतिम विदा—(कथा—98)

एस धम्‍मो सनंतनो—(कथा—यात्रा)

गवान की इस पृथ्वी पर अंतिम घड़ी। भगवान कुसीनाला के शालवन उप्पवतन में अपने भिक्षुको से अंतिम विदा लेकर लेट गए हैं! दो शालवृक्षों के नीचे उन्होंने अपनी मृत्यु का स्वागत करने का आयोजन किया है।

मौत आ रही है। तो बुद्ध ने अपने भिक्षुओं से कहा, तुम्हें कुछ पूछना हो तो पूछ लो। कुछ कहना हो तो कह लो, अब मैं चला। अब यह देह जाती है। मैं तो चला गया था बयालीस साल पहले ही, देह भर रह गयी थी, अब देह भी जाती है। तो बौद्ध दो शब्दों का उपयोग करते हैं—निर्वाण और महापरिनिर्वाण। निर्वाण तो उस दिन उपलब्ध हो गया जिस दिन बुद्ध को शान हुआ। फिर महापरिनिर्वाण उस दिन हुआ जिस दिन देह विसर्जित हो गयी। उस दिन वे महाशून्य में खो गए, महाकाश के साथ एक हो गए। आकाश हो गए।

तो भिक्षु क्या पूछते? बुद्ध ने इतना तो कहा, वही कहा सुना! कितना तो कहा, वही कहा सुना! पूछने को बचा क्या ‘ जो पूछा था, वह कहा, जो नहीं पूछा, वह भी कह दिया है। बुद्ध ने तो खूब लुटाया है, बयालीस साल सुबह से सांझ तक लुटाते ही रहे। जो कहा है, वह भी समझ में नहीं आया है, अब और पूछने को क्या है! तो भिक्षु तो चुप रह गए। उन्होंने कहा, पूछने को भगवान क्या है? बस आपका आशीष! ऐसा बुद्ध ने तीन बार पूछा—ऐसी उनकी आदत थी कि शायद किसी को याद पड़ जाए, शायद किसी को खयाल आ जाए, फिर ऐसा न हो कि मैं जा चुका होऊं और मन में एक खटक रह जाए कि पूछना था, नहीं पूछ पाया, अब किससे पूछे? अब कौन उत्तर देगा? तो बुद्ध ने तीन बार पूछा, तीनों बार भिक्षुओं ने स्वीकृति दी कि हमें कुछ पूछना नहीं। आपने हमें, जितना देना चाहिए, उससे ज्यादा दे दिया। हम उसका उपयोग कर लें, रत्तीभर भी उपयोग कर लें तो पर्याप्त है।

तो फिर बुद्ध दो शालवृक्षों के मध्य में, आनंद ने उनकी शथ्या तैयार कर दी, उस पर लेट गए। और धीरे—धीरे वह अपनी देह से मुक्त होने लगे।

तभी सुभद्र नाम का एक व्यक्ति गांव से भाग? हुआ आया?

उसे खबर मिली, वह एक दुकानदार था, उसे खबर मिली कि बुद्ध का आखिरी दिन। तो वह घबड़ा गया। तीस साल में बुद्ध अनेक बार उसके गांव से निकले, कहते हैं, करीब तीस बार उसके गांव से निकले—वह गाव उनके मार्ग में पड़ता था। और तीस साल में उसने अनेक बार सोचा कि बुद्ध को सुनने जाना है, लेकिन कभी कोई बाधा आ गयी, कभी कोई बाधा आ गयी।

तुम तो जानते हो कितनी बाधाएं आती है! कभी पत्नी बीमार हो गयी—अब पत्नियों का क्या भरोसा कब बीमार हो जाएं! और ऐसे मौके पर जरूर बीमार हो जाएं। कभी बेटी घर आ गयी। कभी बेटे से झगड़ा हो गया। कभी मेहमान आ गए, कभी दुकान पर ग्राहक ज्यादा। कभी काम का बोझ आ गया। कभी कुछ, कभी कुछ। हर बार टालता रहा कि अगली बार, अगली बार।

आज अचानक गांव में खबर आयी, एक सन्नाटे की तरह छा गया सारे गांव में कि बुद्ध शरीर छोड़ रहे हैं, गांव के बाहर ही दो शालवृक्षों के नीचे उन्होंने अपनी अंतिम घड़ी चुन ली है। अब वे जा रहे हैं।

तो उसने जल्दी—जल्दी दुकान बंद की—आज उसने फिकर न की कि पत्नी बीमार, कि बेटी घर आयी, कि मेहमान आए, कि दुकान पर ग्राहक,उसने कहा, हटो भी! अब जाने दो बहुत हो गया, तीस साल मैं टालता रहा। अब अगर टालूंगा तो फिर, फिर कब? मुझे कुछ पूछना है। वह भागा।

जब तक वह पहुंचा तब तक बुद्ध ने आखें बंद कर लीं। वह तो लेट भी गए हैं। सुभद्र जोर—जोर से रोने लगा, उसने कहा कि मुझे पूछने दो। मैं तीस साल से तडूफ रहा हूं। आनंद ने उसे बहुत समझाया कि पागल, तीस साल तूने स्थगित किया, हमने तो स्थगित नहीं किया! अब वे विश्राम में जा रहे हैं, अब वे अपनी देह छोड़ रहे हैं, अब उनको लौटाना ठीक नहीं, अशोभन है। हमने उन्हें काफी बयालीस साल में पीड़ा दी है, हमने बहुत पूछा,हमने न मालूम क्या—क्या पूछा, नहीं पूछना था वह भी पूछा, उसके भी उत्तर उनसे चाहे हैं; अब नहीं!

लेकिन कहते हैं, भगवान ने सुभद्र की और आनंद की बातें सुनकर आंख खोल दी और उन्होंने कहा कि नहीं—नहीं आनंद, रोको मत, उसे आने दो। अभी मैं जिंदा हूं। नहीं तो यह एक दोष रह जाएगा, यह सुभद्र सदा के लिए मुझे दोषी ठहराएगा कि मैं पूछने गया था और भगवान के द्वार से बिना पूछे आ गया। इसे पूछ लेने दो। तो सुभद्र आकर उनके पास बैठ गया और उसनै जो प्रश्न पूछे, वे भी बड़े अजीब हैं। व्यर्थ के प्रश्न पूछे। दार्शनिक प्रश्न पूछे, जिनसे कुछ व्यावहारिक उपयोग नहीं है।

उसने प्रश्न पूछा कि भंते मुझे तीन प्रश्न पूछने हैं पहला क्या आकाश में पद हैं क्या आकाश में पदचिह्न बनते हैं? दूसरा क्या बाहर श्रमण हैं? और तीसरा क्या संस्कार शाश्वत हैं?

अब इनका कोई मूल्य नहीं है। इनको जान लेने से भी क्या होगा? ये हवाई बातें पूछीं।तुँम कभी बुद्धपुरुषों के पास भी जाते हो तो मूढ़तापूर्ण प्रश्न पूछते हो। जिनको तुम बड़ी आध्यात्मिक बातें कहते हो, वे अक्सर मूढ़तापूर्ण बातें हैं।

मेरे पास कोई आ जाता, वह कहता, भगवान ने संसार बनाया या नहीं? क्या मतलब है! क्या फर्क पड़ेगा! बनाया तो तुम ऐसे ही जीओगे, नहीं बनाया तो तुम ऐसे ही जीओगे। तुम्हारे जीने में कुछ फर्क पड़े, ऐसी बात पूछो। आदमी मरने के बाद बचता या नहीं? क्या फर्क पड़ेगा! अभी तुम जैसे हो, यहीं भीतर डुबकी लगाने की कोई बात पूछो। तो शायद तुम्हें पता चल जाए उसका भी जो बचेगा। पहचान हो जाए। मगर नही, इसमें उत्सुकता नहीं, ध्यान में उत्सुकता नहीं, योग में उत्सुकता नहीं, हवाई बातें! एब्‍स्‍ट्रेक्‍ट! जिनका कोई मूल्य नहीं है।

उस आदमी ने क्या प्रश्न पूछे! भंते, क्या आकाश में पद हैं ‘ बाहर श्रमण हैं? क्या संस्कार शाश्वत हैं ‘

उसको भी उत्तर भगवान ने दिया। साधारणत: वह इस तरह की बातों के उत्तर नहीं देते थे लेकिन यह अंतिम जिज्ञासु था और इसे इनकार करना ठीक नहीं था। ये अंतिम दो सूत्र सुभद्र कौ उत्तर में दिए गए सूत्र हैं।

आकासे व पदं नत्थि समणो नत्‍थि बाहिरे।

पपज्वाभिरता पजा निएप्पपन्चा तथागता।।

आकासे व पदं नत्थि समणो नत्थि बाहिरो।

संखारा सस्सता नत्थि नत्थि बुद्धानमिब्जितं।।

‘आकाश में पथ नहीं होता—कोई पदचिह्न नहीं बनते—बाहर में (बुद्ध—शासन से बाहर ) श्रमण नहीं होता। लोग प्रपंच में लगे रहते हैं, लेकिन तथागत प्रपंच रहित हैं।

आकाश में पथ नहीं होता—पदचिह्न नहीं बनते—बाहर में श्रमण नहीं होता, संस्कार शाश्वत नहीं होते हैं और बुद्धों का इंगित, अता—पता नहीं होता है। ‘

बुद्ध ने कहा, आकाश में कोई पदचिह्न नहीं बनते। पूछने वाले ने तो व्यर्थ की बात पूछी थी, पूछने वाले को तो इससे कुछ सार न था, लेकिन बुद्ध ने जो उत्तर दिया, वह बड़ा सार्थक है।

तुम भी बहुत बार प्रश्न पूछते हो जो व्यर्थ होते हैं। जिनसे तुम्हें कोई लाभ नहीं होने वाला है। इसलिए कई बार तुम्हें ऐसा भी लगता होगा कि मैं जो उत्तर देता हूं वह शायद ठीक—ठीक तुम्हारे प्रश्न का उत्तर नहीं है। क्योंकि मैं उत्तर तुम्हें वही देता हूं जिससे तुम्हें कुछ लाभ हो सके। तुम्हें तो क्षमा किया जा सकता है गलत प्रश्न पूछने के लिए, मुझे क्षमा नहीं किया जा सकता गलत उत्तर देने के लिए। तुम कुछ भी पूछो, मैं तुम्हें वही उत्तर देता हूं जिसका कोई परिणाम हो सके। जिससे तुम्हारे जीवन में कोई रूपांतरण हो सके। मैं तुम्हारे गलत प्रश्न से भी कुछ खोज लेता हूं जिसका ठीक उत्तर हो सके।

उसने जो पूछा था, वह व्यर्थ की बात थी। उसका कोई मूल्य नहीं था। लेकिन बुद्ध ने उसमें मूल्य डाल दिया। उन्होंने कहा, आकाश में पथ नहीं होता। और जीवन आकाश जैसा ही है। इसमें कोई पदचिह्न नहीं छूटते हैं। बुद्ध चलते हैं, उनके कोई पदचिह्न नहीं छूटते।

इसलिए तुम अगर चाहो कि हम बुद्ध के पदचिह्नों पर चलकर पहुंच जाएंगे, तो तुम गलती में हो। आकाश में पक्षी चलते हैं, उडते हैं, कोई पदचिह्न नहीं छूटते। इसलिए उनके पीछे कोई उनके पदचिह्नों पर चलकर कहीं जा नहीं सकता।

बुद्ध बार—बार कहते थे, अप्प दीपो भव, अपने दीए खुद बनो, किसी के पीछे चलकर कोई कभी नहीं पहुंवता, क्योंकि यहां चिह्न बनते ही नहीं। यहा चिह्न निर्मित ही नहीं होते। तुम अनुगमन कर ही नहीं सकते। तुम अनुकरण कर ही नहीं सकते। तुम किसी की छाया बनना चाहो तो भूल हो जाएगी। फिर तुम आत्मा न बन सकोगे। आकाश में पथ नहीं होता। ‘

आकासे व पदं नति समणो नत्थि बाहिरे।

उसने पूछा कि बाहर में श्रमण होता है या नहीं न इसका बौद्धों ने जो अब तक अर्थ किया है, वह एकदम गलत है। बौद्ध इसका अर्थ करते हैं कि उसने पूछा कि भगवान के संघ के बाहर कोई आदमी समाधि को उपलब्ध होता है? श्रमण होता है ‘ और बोद्ध—शायद उसने यह पूछा भी हो, हम उसको क्षमा कर सकते हैं, वह अज्ञानी आदमी, हो सकता है पूछा हो उसने कि आपके संघ के बाहर कोई शान को उपलब्ध होता है, आपके संघ के बाहर, आपके भिक्षुओं के बाहर कोई समाधि को उपलब्ध होता है g हो सकता है पूछने वाले ने यही पूछा हो। लेकिन बुद्ध तो इस तरह का उत्तर नहीं दे सकते हैं कि बाहर में (बुद्ध—शासन से बाहर ) श्रमण नहीं होता। यह बात गलत है। यह तो बुद्ध कतई नहीं कह सकते।

फिर बुद्ध का क्या अर्थ होगा? सूत्र सीधा—साफ है, उसके अर्थ भी खूब बिगाड़े गए हैं।

आकासे व पदं नत्‍थि।

‘आकाश में पदचिह्न नहीं बनते। ‘

समणो नत्थि बाहिरे।

बाहर श्रमण नहीं होता। ‘

अब इसका अर्थ जो मैं करता हूं वह यह है कि जो बहिर्मुखी है, वह श्रमण नहीं होता। जो बाहर दौड़ रहा है, बाहर की तरफ जा रहा है, वह कभी ज्ञान को उपलब्ध नहीं होता। जिसकी यात्रा अंतर्मुखी है, वही ज्ञान को उपलब्ध होता है।

समणो नत्थि बाहिरे।

जो बहिर्मुखी है, एक्सॉवर्ट, वह कभी शान को उपल्वध नहीं होता। यह मेरा अर्थ है।

बौद्धों का तो अब तक का अर्थ यही रहा है कि बुद्ध—शासन के बाहर कोई ज्ञान को उपलब्ध नहीं होता। यह बात तो बड़ी ओछी है। फिर महावीर शान को उपलब्ध नहीं होते। फिर कृष्ण ज्ञान को उपलब्ध नहीं होते। फिर क्राइस्ट, मोहम्मद, जरथुस्त्र ज्ञान को उपलब्ध नहीं होते। फिर तो यह बड़ी संकीर्ण बात हो जाएगी। बुद्ध ऐसा वचन बोलेंगे, यह असंभव है।

इसलिए मैं इस अर्थ को इनकार करता हूं। मैं अर्थ करता हूं—

समणो नत्थि बाहिरे।

बाहर घूमती चेतना, बाहर—बाहर जाती चेतना, कभी ज्ञान को उपल्वध नहीं होती। अंतर्यात्रा पर जो जाता है, वही शान को उपलब्ध होता है,वही श्रमण, वही समाधि को पाता है।

‘लोग प्रपंच में लगे रहते हैं और जो शान को उपलब्ध हो गया वह प्रपंचरहित हो जाता है।

आकाश में पथ नहीं।

आकासे व पदं नत्थि समणो नत्थि बाहिरे।

संखारा सस्सता नत्थि……..

संस्कार का अर्थ होता है, हमारे ऊपर जो—जो प्रभाव पड़े हैं, संस्कार, कंडीशनिंग। उस आदमी ने पूछा है, क्या संस्कार शाश्वत होते हैं? जो हम पर प्रभाव पड़े हैं, वे सदा रहने वाले हैं?

बुद्ध कहते हैं, नहीं, जो भी प्रभाव हैं, वे पानी पर खींचे गए प्रभाव हैं। जैसे पानी पर कोई लकीरें खींच दे। वे खींचते—खींचते मिट जाती हैं। या कोई रेत पर लकीरें खींचे; खींच देता है, थोड़ी देर टिकती हैं, फिर हवा आती है तब मिट जाती हैं।

तुम कहोगे, कोई पत्थर पर लकीरें खींच दे? वे भी समय आने पर मिट जाती हैं। कोई लोहे पर लकीरें खींच दे, वे भी एक दिन समय आने पर मिट जाती हैं। कोई हीरे पर लकीरें खींच दे, तो शायद करोड़ों वर्ष रहें, लेकिन वे भी समय आने पर मिट जाती हैं। कोई संस्कार शाश्वत नहीं है। यहां जो भी प्रभाव है, अशाश्वत है।

और इसलिए प्रभाव के बाहर हो जाना ही शाश्वत को पाना है। सब लकीरें मिट

ध्यान की खेती संतोष की भूमिए मे जाएं—सब खींची लकीरें, कि मैं हिंदू कि मैं मुसलमान, कि मैं ब्राह्मण, कि मैं पुरुष, कि मैं स्त्री, कि मैं धनी, कि मैं त्यागी, सब लकीरें हैं—सब लकीरें जब मिट जाएं, जब कोरा कागज तुम्हारे भीतर हो जाए, प्रपंचरहित, कोई उपद्रव तुम्हारे भीतर न रह जाए, शून्य विराजमान हो जाए।

संखारा सस्सता नत्थि नत्थि बुद्धानमिज्‍जितं।

संस्कार शाश्वत नहीं हैं, सुभद्र, और बुद्धों का इंगित नहीं होता। यह बड़ी अदभुत बात कही बुद्ध ने—

नत्थि बुद्धानमिज्‍जितं

‘बुद्धों का कुछ अता—पता नहीं होता।

तुम अगर चाहो भी तो तुम बुद्धों को खोज नहीं सकते। उनको खोजना संभव नहीं है। उनका कोई अता—पता नहीं होता।

यह बुद्ध ने जो बात कही, अंतिम, कि अब देह के खो जाने के बाद तुम मुझे खोजना चाहोगे तो खोज न सकोगे। जब तक संस्कार थे, तब तक मेरा अता—पता था। देह थी मेरी, मन था मेरा, तब तक मेरा अता—पता था। तुम कह सकते थे, बुद्ध इस समय कहां हैं? क्या हैं? कौन हैं? किस रूप में, किस वय में, स्त्री कि पुरुष, आदमी कि देव? लेकिन अब मेरा सब अता—पता खो जाएगा। अब मैं महाशून्य के साथ एक होने जा रहा हूं।

‘बुद्धों का कोई अता—पता नहीं होता। ‘

इसलिए कोई उनकई तरफ इंगित नहीं कर सकता कि वे यहां हैं। यह तो ठीक जो भगवान की परिक्सा होती है, वही बुद्ध की परिभाषा है। भगवान का कोई अता—पता नहीं। द्य यह नहीं कह सकते कि भगवान कहां है। तुम इतना ही कह सकते हो, भगवान कहां नहीं है! इंगित नहीं कर सकते। या तो सब कहीं है, या कहीं भी नहीं है। इशारा नहीं हो सकता।

संखारा सस्सता नत्थि नत्थि बुद्धानमिज्जितं।

बुद्ध ने कहा, अब संस्कारों से छुटकारा हो गया, आखिरी संस्कार छूटा जा रहा है, आखिरी लकीर हाथ से छूटी जा रही है, अब इसके आगे मेरा कोई अता—पता न होगा। अब मैं महाशून्य में जा रहा हूं। मैं उस आकाश में जा रहा हूं जहां कोई पदचिह्न नहीं होते। मैं उस अंतर—आकाश मे जा रहा हूं, जहां बुद्धत्व फलता है, केवल जहां बुद्धत्व फलता है। मैं उस अंतर्यात्रा का आखिरी कदम उठा रहा हूं। और अब तुम मुझे खोज न सकोगे, इसके बाद तुम मुझे खोज न सकोगे।

यही भगवत्ता की परिभाषा है। आदमी को खोज सकते हो, पशु—पक्षी को खोज सकते हो, सीमा है तो खोज सकते हो। जब असीम हो गया तो फिर कैसे खोजोगे?

फिर असीम की क्या खोज का कोई उपाय नहीं? नहीं, उपाय है। तुम भी असीम हो जाओ। बूंद अगर सागर को पाना चाहे तो एक ही उपाय है कि सागर में डूब जाए और एक हो जाए। फिर बुद्ध को बाहर नहीं खोजा जा सकता, फिर तो तुम जब बुद्धत्व को उपलब्ध होओगे तभी खोज पाओगे। तुम उसी क्षण खोज पाओगे जब तुम भी अपना अता—पता खो दोगे।

यह अता—पता खो देना ही आवागमन से मुक्‍त हो जाना है। फिर न कोई आना है, न कोई जाना है। फिर शाश्वत में निवास है। फिर तुम्हें अपना. घर मिल गया। उसी घर की तलाश है।

ओशो

एस धम्‍मो संनतनो

http://oshoganga.blogspot.com/2014/12/98.html

हरियाणा के कुछ भारतवासी (दलित) परिवारों का कहना है कि उन्होंने व्यवस्था से तंग आकर इस्लाम धर्म क़बूला है. ‘जब किसी ने नहीं सुनी, तो इस्लाम क़बूला’ BBC NEWS:

BBC NEWS:

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हरियाणा के कुछ दलित परिवारों का कहना है कि उन्होंने व्यवस्था से तंग आकर इस्लाम धर्म क़बूला है.

‘जब किसी ने नहीं सुनी, तो इस्लाम क़बूला’

हिसार ज़िले के भगाना गांव के रहने वाले इन लोगों का कहना है कि उन्होंने गांव के दबंगों के उत्पीड़न और समाज से बहिष्कार के विरोध में लगभग डेढ़ साल से दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना दे रहे हैं, लेकिन किसी ने उनकी सुध नहीं ली है.

शनिवार को जंतर-मंतर पर धर्म बदलने से पहले ही ये लोग अपने इस क़दम का एलान कर चुके थे.

सतीश काजला, जो अब अब्दुल कलाम बन चुके हैं, वो बताते हैं कि करीब सौ दलित परिवारों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर ही धर्म बदला.

धर्म बदलने वाले इन लोगों के लिए नए मज़हब की सबसे अहम पहचान सिर की टोपी है, जिसे जंतर मंतर पर धरना दे रहे सभी पुरुष हर वक्त सिर पर लगाए रहते हैं.

‘इंसाफ़ के लिए’

 

सतीश जिन अब्दुल रज़्ज़ाक को धर्म परिवर्तन में मददगार बताते हैं, उनका कहना है, “मैं सिर्फ क़ानूनी तौर पर भगाना गांव के दलितों को इंसाफ़ दिलाना चाहता हूं.”

धर्म बदलने वालों का दावा है कि वो क़रीब चार साल से इंसाफ़ की जंग लड़ रहे हैं.

सतीश काजला उर्फ अब्दुल कलाम बताते हैं, “चार साल पहले केंद्र और राज्य सरकार ने दलित और पिछड़े समाज को गांव की ज़मीन बांटने का प्रस्ताव रखा लेकिन गांव के कथित दबंगों ने दलितों को ज़मीन हासिल होना तो दूर, गांव से पलायन के लिए मजबूर कर दिया.”

पलायन को मज़बूर

सतीश और उनके साथ आंदोलन कर रहे लोगों के मुताबिक़, क़रीब सौ परिवार तीन साल से हिसार और डेढ़ साल से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हैं.

हिसार प्रशासन का कहना है कि धरने पर बैठे परिवारों की संख्या 50 से ज़्यादा नहीं है.

प्रशासन का यह भी दावा है कि इन लोगों से लगातार बात होती रही है.

लेकिन भगाना गांव के बाकी लोगों के साथ धर्म बदलने वाले राजेंद्र कहते हैं कि मज़हब बदलने के बाद ही उनकी सुनवाई हुई है.

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source:

http://www.bbc.com/hindi/india/2015/08/150809_dalits_embraces_islam_pm

हरयाणा के एक गाव ‘भगाना’ के बलात्कारी पीड़ितों समते सौ परिवारों ने इस्लाम कबूल कर लिया है. चर्चा-परिचर्चा शुरू हो गयी है. आइये इस मुद्दे पर पढ़ते हैं डॉ ओम सुधा के विचार,,…RavishKumarFansndtv Favebook Page se

150809190308_haryana_dalit_convert_1_624x351_bbcहरयाणा के एक गाव  ‘भगाना’ के बलात्कारी पीड़ितों समते सौ परिवारों ने इस्लाम कबूल कर लिया है. चर्चा-परिचर्चा शुरू हो गयी है. आइये इस मुद्दे पर पढ़ते हैं डॉ ओम सुधा के विचार
भगाना के बलात्कार पीड़ित , इस्लाम और हम बीबीसी पर भगाना के बलात्कार पीड़ितों सहित लगभग सौ परिवारों के इस्लाम धर्म में परिवर्तन की खबर पढ़ी.

http://www.bbc.com/hindi/india/2015/08/150809_dalits_embraces_islam_pm

वहीँ फेसबुक पर सारिका चौधरी का इसी से सम्बंधित पोस्ट भी पढ़ा. बीबीसी के इस मामले और पीड़ितों के हिन्दू धर्म छोड़ने के मायने यह हैं की इस्लाम धर्म कबूल कर अब वो चर्चा के केंद्र में हैं. बात सारिका के पोस्ट पर करते हैं सारिका ने अपने पोस्ट में एक तथ्यात्मक भूल की है. भारतीय समाज भावना के उद्वेलन में इस तरह की गलतियां करता है. मसलन भारत के लोग बिना कोई फिल्म देखे उसका पोस्टर जला सकते हैं, बिना सलमान रुश्दी और तसलीमा को पढ़े सार्वजानिक रूप से उसको गरिया सकते हैं.

सारिका ने लिखा है की वो लोग कई बार धरने पर बैठे. सारिका को सूचनार्थ है की वो लोग कई बार धरना पर नहीं बैठे बल्कि एक साल से ज्यादा वक़्त हुए वो लगातार जंतर-मंतर पर न्याय की आस में लगातार धरना पर बैठे हुए थे. अब आप सोचिये की सैकड़ों लोग न्याय की आस लिए एक साल से ज्यादा वक़्त से धरना पर बैठे हुए हैं उनको न्याय नहीं मिलता . कभी कल्पना की है की इन एक सालों में वो दिल्ली जैसे जगह में कैसे टिके हुए होने? साधारण परिवार के इन लोगों की रोजी-रोटी कैसे चलती होगी? जिन लोगों का जड़ कट गया वो कैसा महसूस करते होंगे? इस एक साल में सर्दी-गर्मी-बरसात इन लोगों ने कैसे गुजरा होगा?
नहीं, हम ऐसा नही सोच पाए, सोच भी नहीं सकते . क्यूंकि, इन बातों से हमारे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता . हम धर्म के मामले में संवेदनशील हैं. छोटी-छोटी बातों से हमारी भावनाएं आहत होने को मरी जाती हैं. संघर्स के इस गुजरे हुए एक साल में भगाना पीड़ितों ने सबकुछ किया जो किया जाना चाहिए. शायद ही ऐसी चौखट होगी जिसे इनलोगों ने नहीं चूमा होगा. पुलिस, थाना , कचहरी , नेता मंत्री अफसर और सोशल मीडिया हर जगह हर दरवाजे पर इन्होने दस्तक दी. पर हमारी नींद नहीं खुली . पर जैसे ही इन्होने हिन्दू धर्म छोड़कर इस्लाम कबूला हम सब छटपटा गए. हाय रे हमारी संवेदनशीलता और हाय रे हमारी इंसानियत . इतना होने पर भी हम अबतक उन पीड़ितों के लिए संवेदित नहीं हो पाए , बल्कि हमारी पीड़ा ये है की इस्लाम क्यूँ कबूल किया ? इससे क्या हो जायेगा? क्या इस्लाम में भेदभाव नहीं होगा ? क्या मुसलमान बनकर गर्त में नहीं गिर गए? क्या अपने बच्चों की किस्मन में तीन सौत नहीं थोप दिए? क्या भाइयों द्वारा रोज बलात्कार नहीं होगा?,

क्या ये दंगे में हिन्दुओं के खिलाफ हथियार नहीं उठाएंगे ?
मैं इस तरह से सोचने वालों की कल्पनाशीलता की दाद देता हूँ. इस्लाम कबूल करना इस बात का प्रतीकात्मक विरोध है , अगर ये बौध धर्म कबूल करते तो इतना बवेला नहीं मचाते लोग. ना पीड़ितों का दर्द चर्चा के केंद्र में आ पाता .की एक तरफ तो आप दलितों को हिन्दू मानते हो ,दूसरी तरफ हमारे अन्याय की खिलाफ आप हमारे प्रतिकार में साथ नहीं खड़े हो . ऐसे धर्म में रहकर क्या फायदा? दूसरी बात , भारतीय संविधान इस बात की इजाजत देता है की आप किसी भी धर्म को मान सकते हैं. तीसरी बात , अगर आपको लगता है की मुसलमान बनकर वो गत में चले जायेंगे तो यह बातैये हिन्दू रहकर ही वो कौन सा सम्मान की जिंदगी जी रहे थे? रही बात भाइयों द्वारा बलात्कार की तो ये आपकी कुंठा से उपजा सवाल है ? जहां तक दंगों में हथियार उठाने का सवाल है, ये बाताये की भारत में जितने भी साम्प्रदायिक दंगे होते हैं “ वो दंगे है या मुसलमानों का सामूहिक नरसंहार “ .

बहरहाल , बेहतर होगा की हम विषय से विमुख ना होकर , उन छोटी-छोटी बच्चियों को न्याय दिलाने के लिए एक कदम बाधाएं जो पिछले एक साल से न्याय के लिए राष्ट्रिय राजधानी में जंतर-मंतर पर अपनी अस्मिता-सम्मान –न्याय के लिए बैठे हैं..

 

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