हरयाणा के एक गाव ‘भगाना’ के बलात्कारी पीड़ितों समते सौ परिवारों ने इस्लाम कबूल कर लिया है. चर्चा-परिचर्चा शुरू हो गयी है. आइये इस मुद्दे पर पढ़ते हैं डॉ ओम सुधा के विचार,,…RavishKumarFansndtv Favebook Page se


150809190308_haryana_dalit_convert_1_624x351_bbcहरयाणा के एक गाव  ‘भगाना’ के बलात्कारी पीड़ितों समते सौ परिवारों ने इस्लाम कबूल कर लिया है. चर्चा-परिचर्चा शुरू हो गयी है. आइये इस मुद्दे पर पढ़ते हैं डॉ ओम सुधा के विचार
भगाना के बलात्कार पीड़ित , इस्लाम और हम बीबीसी पर भगाना के बलात्कार पीड़ितों सहित लगभग सौ परिवारों के इस्लाम धर्म में परिवर्तन की खबर पढ़ी.

http://www.bbc.com/hindi/india/2015/08/150809_dalits_embraces_islam_pm

वहीँ फेसबुक पर सारिका चौधरी का इसी से सम्बंधित पोस्ट भी पढ़ा. बीबीसी के इस मामले और पीड़ितों के हिन्दू धर्म छोड़ने के मायने यह हैं की इस्लाम धर्म कबूल कर अब वो चर्चा के केंद्र में हैं. बात सारिका के पोस्ट पर करते हैं सारिका ने अपने पोस्ट में एक तथ्यात्मक भूल की है. भारतीय समाज भावना के उद्वेलन में इस तरह की गलतियां करता है. मसलन भारत के लोग बिना कोई फिल्म देखे उसका पोस्टर जला सकते हैं, बिना सलमान रुश्दी और तसलीमा को पढ़े सार्वजानिक रूप से उसको गरिया सकते हैं.

सारिका ने लिखा है की वो लोग कई बार धरने पर बैठे. सारिका को सूचनार्थ है की वो लोग कई बार धरना पर नहीं बैठे बल्कि एक साल से ज्यादा वक़्त हुए वो लगातार जंतर-मंतर पर न्याय की आस में लगातार धरना पर बैठे हुए थे. अब आप सोचिये की सैकड़ों लोग न्याय की आस लिए एक साल से ज्यादा वक़्त से धरना पर बैठे हुए हैं उनको न्याय नहीं मिलता . कभी कल्पना की है की इन एक सालों में वो दिल्ली जैसे जगह में कैसे टिके हुए होने? साधारण परिवार के इन लोगों की रोजी-रोटी कैसे चलती होगी? जिन लोगों का जड़ कट गया वो कैसा महसूस करते होंगे? इस एक साल में सर्दी-गर्मी-बरसात इन लोगों ने कैसे गुजरा होगा?
नहीं, हम ऐसा नही सोच पाए, सोच भी नहीं सकते . क्यूंकि, इन बातों से हमारे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता . हम धर्म के मामले में संवेदनशील हैं. छोटी-छोटी बातों से हमारी भावनाएं आहत होने को मरी जाती हैं. संघर्स के इस गुजरे हुए एक साल में भगाना पीड़ितों ने सबकुछ किया जो किया जाना चाहिए. शायद ही ऐसी चौखट होगी जिसे इनलोगों ने नहीं चूमा होगा. पुलिस, थाना , कचहरी , नेता मंत्री अफसर और सोशल मीडिया हर जगह हर दरवाजे पर इन्होने दस्तक दी. पर हमारी नींद नहीं खुली . पर जैसे ही इन्होने हिन्दू धर्म छोड़कर इस्लाम कबूला हम सब छटपटा गए. हाय रे हमारी संवेदनशीलता और हाय रे हमारी इंसानियत . इतना होने पर भी हम अबतक उन पीड़ितों के लिए संवेदित नहीं हो पाए , बल्कि हमारी पीड़ा ये है की इस्लाम क्यूँ कबूल किया ? इससे क्या हो जायेगा? क्या इस्लाम में भेदभाव नहीं होगा ? क्या मुसलमान बनकर गर्त में नहीं गिर गए? क्या अपने बच्चों की किस्मन में तीन सौत नहीं थोप दिए? क्या भाइयों द्वारा रोज बलात्कार नहीं होगा?,

क्या ये दंगे में हिन्दुओं के खिलाफ हथियार नहीं उठाएंगे ?
मैं इस तरह से सोचने वालों की कल्पनाशीलता की दाद देता हूँ. इस्लाम कबूल करना इस बात का प्रतीकात्मक विरोध है , अगर ये बौध धर्म कबूल करते तो इतना बवेला नहीं मचाते लोग. ना पीड़ितों का दर्द चर्चा के केंद्र में आ पाता .की एक तरफ तो आप दलितों को हिन्दू मानते हो ,दूसरी तरफ हमारे अन्याय की खिलाफ आप हमारे प्रतिकार में साथ नहीं खड़े हो . ऐसे धर्म में रहकर क्या फायदा? दूसरी बात , भारतीय संविधान इस बात की इजाजत देता है की आप किसी भी धर्म को मान सकते हैं. तीसरी बात , अगर आपको लगता है की मुसलमान बनकर वो गत में चले जायेंगे तो यह बातैये हिन्दू रहकर ही वो कौन सा सम्मान की जिंदगी जी रहे थे? रही बात भाइयों द्वारा बलात्कार की तो ये आपकी कुंठा से उपजा सवाल है ? जहां तक दंगों में हथियार उठाने का सवाल है, ये बाताये की भारत में जितने भी साम्प्रदायिक दंगे होते हैं “ वो दंगे है या मुसलमानों का सामूहिक नरसंहार “ .

बहरहाल , बेहतर होगा की हम विषय से विमुख ना होकर , उन छोटी-छोटी बच्चियों को न्याय दिलाने के लिए एक कदम बाधाएं जो पिछले एक साल से न्याय के लिए राष्ट्रिय राजधानी में जंतर-मंतर पर अपनी अस्मिता-सम्मान –न्याय के लिए बैठे हैं..

 

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