29 Aug 2015 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना: आईये जाने लोगों की सोच को बनाने और बदलने का उद्योग यानी “पब्लिक रिलेशन इंडस्ट्री” जिसके बल पर कैसे धन खर्च करके जनता को अपने पक्ष में किया जाता है, ऐसे मीडिया युग में मूलनिवासियों को क्या करना चाहिए | …समयबुद्धा


क्या आप जानते हैं की भारत में लोगों की सोच को बनाने और बदलने का उद्योग यानी “पब्लिक रिलेशन इंडस्ट्री” बहुत तेज़ी से फ़ैल रही है जिसके कारण आप सही चुनाव नहीं कर सकते, आप वही चुनते हैं जो ब्राह्मणवादी/पूंजीपति अपने चुनवाना चाहते हैं | बस धन खर्च करो और जनता को अपने पक्ष में कर लो, फिर चित भी आपकी पट्ट भी आपकी| इस युग में धन ही ईश्वर है, जो काम ईश्वर या देवता नहीं कर सकते वो धन कर देता है|प्रख्यात समाजवादी लेखक एव पत्रकार दिलीप सी मंडल का एक फेसबुक पोस्ट है जिसमें वो लिखते हैं:
” क्या आप उन महिलाओं में हैं, जिन्हें लगता है कि सिगरेट पीना आजादी का प्रतीक है? तब तो आपको यह भी पता होगा कि इसे आजादी का प्रतीक बनाने वाला शख्स बरनेस, फ्रायड का रिश्तेदार था। और सिगरेट को महिलाओं की आजादी से जोड़ने का ठेका बरनेस को अमेरिका की सबसे बडी सिगरेट कंपनी ने दिया था। अमेरिकन टौबैको कंपनी की दिक़्क़त यही थी कि वहाँ औरतों का सिगरेट पीना अच्छा नहीं माना जाता था। इससे बिक्री पर असर पड़ रहा था। बरनेस ने मीडिया कैंपेन से यह छवि बदल दी और बताया कि औरतों के लिए यह “आजादी की मशाल” है।
क्या आपने सोचा कि अभी अभी जो मजदूरों द्वारा भारत बंद हुआ, उसके बारे में आपको यह तो बताया गया कि इससे ‘देश’ को 25,000 करोड़ रुपए का घाटा हो गया, लेकिन क्या मीडिया ने आपको बताया कि भारत बंद के मुद्दे क्या थे और इसकी जरूरत ही क्यों पड़ी? 25,000 करोड़ का आँकड़ा मीडिया को किसने दिया होगा?
भारत में लोगों की सोच को बनाने और बदलने का उद्योग यानी पब्लिक रिलेशन इंडस्ट्री का साइज़ सालाना 27,000 करोड़ रुपए का है। जनता की यह सोच राजनीतिक हो सकती है, किसी प्रोडक्ट के बारे में हो सकती है। कुछ भी हो सकता है।
पब्लिक रिलेशन विज्ञापन नहीं है। यह खबरों के बीच कहीं होता है। आप उसे न्यूज जानकर देखते-पढ़ते हैं।
मीडिया में कहाँ से आती हैं ख़बरें, पब्लिक रिलेशन का मीडिया से क्या है रिश्ता, प्रोपेगंडा से विचार किस हद तक बदले जा सकते हैं, इन सवालों से टकराता मेरा लेख, इस बार के Socialist Factor मैगजीन में।” उस लेख की तस्वीरें इस देशना के साथ अटेच हैं|

 

धम्मबंधुओं!! हमारे पीढ़ी ने टीवी पर दूरदर्शन से ‘केवल टीवी’ की तरफ जाने की घटना देखी है, इसी घटना में एक बड़ी घटना थी समाचारों को एक घंटे से बढाकर चौबीस घंटे का कर देना| आपने कभी सोचा
क्या वाकई इसकी जनता को जरूरत थी?
क्या वाकई समाचार इतने ज्यादा होते हैं की एक घंटे में पूरे नहीं परोसे जा सकते?
हमारे जीवन में चौबीस घंटे के समाचारों को देख कर क्या कोई फर्क पड़ा?
क्या हमारा जीवन बेहतर हुआ?

सोचने का टाइम ही कहाँ रहा अब, अब तो चौबीस घंटे आप पूंजीपतियों के अजेंडे को अपने अंतर्मन में बैठने में व्यस्त हो, चाहे टीवी हो या इंटरनेट हो| आपको फ्री वाई फाई और काम कीमत में तेज़ इंटरनेट ऐसे ही तो नहीं दिया जा रहा, इसका लाभ भी तो उठाया जायेगा| यकीनन इंटरनेट और टीवी हमारे लिए जरूरी है पर उससे भी ज्यादा जरूरी है हमारी सजगता और सही चुनाव|

मीडिया पर अपनी कमाई खर्च कर के भी अगर हमें ज्ञान नहीं होगा तो चुनाव सही नहीं होगा| मतलब पैसा आपका होगा पर एजेंडा उनका, ये ठीक वही नीति है जिसमे पांडा आपके पैसों पर आपके ही घर में कथा कहने आता था और आपका पता भी नहीं चलता था की कब उसने ब्राह्मणवादी एजेंडा आपके दिमाग में भर दिया, जो आपके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गया|

इस लेख को पढ़ने के बाद, जब आप मीडिया (टीवी,इंटरनेट,बॉलीवुड,अख़बार आदि) पर जरा गौर करेंगे तो शायद आप समझ सकते हैं की :
– क्यों इस देश को उसके संवेधानिक और जायज़ नाम “भारत” न बोलकर हिंदुस्तान बोलते हैं?
– क्यों मंदिरों की भीड़ की तस्वीरें भी एक खबर बन जाती हैं और आपके अंतर्मन में कहीं मंदिर प्रेम जग जाता है?
– क्यों किसी फिल्म का हीरो या दबंग इतना ज्यादा धार्मिक और दानी दिखाया जाता है?
– क्यों गरीब, मजदूर और भूखों मरते लोगों की खोज खबर मीडिया में गम होक रह जाती है?
– क्यों नाटक और फिल्मों के पत्रों के नाम और उनके टाइटल एक विशेष वर्ग के ही होते हैं?
– क्यों किसी कौम की छवि ख़राब कर दी जाती है?
– क्यों गौतम बुद्ध, सम्राट आशिक महान और डॉ आंबेडकर जैसे महानतम व्यक्तित्वों पर मीडिया चुप्पी साध लेती है, इनको घृणा का पत्र बना रखा है|
– क्यों कोई मसालेदार खबर किसी दूसरी ‘जनहित खबर’ के मुकाबले ज्यादा दिखाई जाती है?
– क्यों प्राइम टाइम में किरकेट और बॉलीवुड पर इतनी ज्यादा चर्चा होती है जिसकी जनता को जरूरत ही नहीं?
– अब क्यों आपके दिमाग की जगह टीवी फैसला करता है की आप क्या सोचते हो, या आपको क्या जरूरत है?
– क्यों आपका टीवी पर बैठे श्रद्ये-देवता आपकी कुंडली दोष और भविष्ये और दुखों का समाधान देते-बेचते मिल जायेंगे?
– क्यों उन लोगों की खबर और प्रमाण जनता के सामने नहीं आ पाते जो वोटिंग मशीन की कमियां साबित करते हुए वापस कागज़ से वोटिंग की मांग करते हैं?
– क्यों दस बीस लोगों का धरना प्रदर्शन राष्ट्रीय खबर हो जाता हैं और क्यों लाखों का धरना प्रदर्शन एक छोटी से खबर बन के रह जाती है ?
– क्यों दलितों का बौद्ध धर्म में लाखों की संख्या में वापस लौटने की घटना कोई खबर नहीं होती जबकि किसी फ़िल्मी हीरो का मंदिर में जाना भी खबर हो जाती है ?

  • क्यों सरे देश का मीडिया एक सुर में आरक्षण के विरोध में ही खबरे लेख आर्टिकल पेश करता है क्या कहीं कोई भी ऐसा नहीं इस देश में जो आरक्षण के पक्ष में लिख सके बोल सके
  • क्यों किसी टीवी डिबेट में किसी मूलनिवासी को नहीं लाया जाता, और अगर लाया भी जाता है तो ऐसे को जिसको कुछ पाता ही नहीं होता

लिस्ट लम्बी है,बाकि आप खुद समझो….क्योंकि ज्यादा लिखने से कुछ नहीं होता समझदार को इशारा ही काफी है, जो इतना पर भी नहीं समझे उन भक्तों के लिए भक्तिमार्ग ही सही है|

ये इसलिए होता है क्योंकि सब सत्य नहीं फायदा को चाहते हैं, सत्ये की जरूरत किसी को नहीं |पर फायदे की इस रेस में जो पिछड़ जाता है वही तो आम जनता बनता है बाकि तो शाशक बनते हैं| लोग आखिर पिछड़ते क्यों है| उदाहरण से समझते हैं :

सब छात्र जानते हैं की स्कूल का सिलेबस और शिक्षा में ही उनका भला है न की बिगड़ैल दोस्तों की मौज मस्ती में, पर फिर भी मौज मस्ती और टाइम पास को चुनते हैं न|इस उदहारण से आप समझ सकते हो की क्यों लोग धम्म की जगह धर्म को चुनते हैं| धम्म में ही हमारा भला है पर धर्म या सत्संग में चका चौंध है मजा है रस है|

खेर मुद्दे पर लौटते हैं | शायद अब आप समझ सकें की जिससे सवर्ण नीच और अछूत समझकर बहिष्कार करते हैं असल में उसके काम के बुद्धिजीवियों के पास सत्य होता है जिसे दबाने के लिए इनका सामूहिक बहिष्कार कारगर बाह्मणवादी औज़ार है|शायद इस तथ्ये से आप समझ सकते हाँ क्यों गौतम बुद्ध, सम्राट आशिक महान और डॉ आंबेडकर जैसे महानतम व्यक्तित्वों पर मीडिया चुप्पी साध लेती है, इनको घृणा का पत्र बना रखा है| आप घृणा करोगे तभी तो इनके पास नहीं जाओगे और जब नहीं जाओगे तो आपको सत्य और समाधान नहीं मिलेगा और आपके विरोधी बदस्तूर आपपर राज करते रहेंगे|ये इंसानी प्रकृति होती है की अगर आपकी आँखों पर किसी के लिए घृणा की पट्टी बंधी हो वो आप उसमें अच्छाई देख ही नहीं पाओगे|

आपने अब लोगों की सोच को बनाने और बदलने का उद्योग यानी “पब्लिक रिलेशन इंडस्ट्री” के सत्य को जान लिया आपने, अब क्या? ऐसे तो बहुत से सत्य जानते हो आप , क्या कर लिया आपने….| कहने से नहीं करने से होता है | मुझे लगता हैं ऐसे में मुझे मार्गदर्शन करना चाहिए,सही मार्गदर्शक वो नहीं जो सिर्फ ज्ञान ही न झाडे बल्कि वही है जो समाधान भी बताये| इसलिए यहाँ दिमाग लगाने वाली बात ये है की मूलनिवासियों शेडूल कास्ट को अपनी मुक्ति के लिए ऐसे में क्या करना चाहिए, इस बारे में मुझे लगता है :

जब तक ब्रामण मंदिर व्यस्था,जाट खाप पंचायत और मुस्लमान की मस्जिद व्यस्था की तरह शेडूल कास्ट के पास ‘सूचना और एक्शन’ का एकरूप क्रियान्वयन प्लेटफॉर्म नहीं बन जाता तब तक इन बिखरे हुए लोगों को अत्याचार से कोई नहीं बचा सकता, चाहे कोई भी सत्ता में हो| ये प्लेटफार्म हो सकते हैं जाती,प्रान्त,राजनैतिक पार्टी, आदि आदि पर भारत जैसे देश में जहाँ हर पचास किलोमीटर पर सामाजिक इकाई बदल जाती है ऐसे में ये सभी प्लेटफार्म बेकार हो जाते हैं| उदाहरण के लिए जब राजस्थान के बैरवा के साथ अत्याचार होता है तो महाराष्ट्र का महार और यु0पि० का चमार दोनों कुछ नहीं बोलते क्योंकि न ये उनको अपना समझते हैं न ही वो इनको अपना समझते हैं, दूसरी और से भी सामान प्रतिक्रिया ही होता है| इतना ही नहीं जब डॉ आंबेडकर की प्रतिमा को नुक्सान पहुचाया जाता है तो हमारे अपने मूलनिवासी भाई जो धोबी,धानुक,खटीक,कोरी,कुर्मी,पासी,डोम,भंगी,अहीर आदि आदि अनेकों नामों का प्लेटफार्म या झंडे लेके बैठे हैं, ये लोग इसे अपनी हार नहीं मानते, इसे केवल चमारों का सरोकार मानते हैं, इसे कहते हैं अलग अलग प्लेटफार्म होना, फुट डालकर शाशन करना|हमारे लोगों ने गुरुओं के नाम पर संगठित होना शुरू कर दिया है, अगर आप गुरुओं के नाम पर प्लेटफार्म बनाना चाहो तो भी नहीं हो सकता वाल्मीकि वाले कबीर वालों के साथ नहीं और पेरियार वाले रविदास वालों के साथ नहीं| पता नहीं आप इस बात को समझ पा रहे हैं की नहीं पर डॉ आंबेडकर इस बात को अच्छी तरह समझ गए थे, इसीलिए “बौद्ध धम्म” का सर्व मान्य चौमुखी प्लेटफार्म देकर गए हैं| हमें अपने बौद्ध धम्म पर वापस लौटना ही होगा और जैसे पहले हम विश्व गुरु थे दोबारा बन सकते हैं| भारत के इतहास में ऐसा कई बार हुआ है जब ब्राह्मणवाद अपने न्यूनतम स्तर पर था और तब बौद्ध धम्म अपने चरम पर था| ध्यान रहे बौद्ध धम्म का लक्ष्य ही ‘बहुजन हिताए बहुजन सुखाये’ था, है और रहेगा,( नोट: बहुजन मतलब बहुसंख्यक 95% जनता न की दलित) | बौद्ध धम्म ऐसा प्लेटफार्म हैं जो न केवल देश में बल्कि विदेश में से भी में दुनिया की आबादी का तीसरा हिस्सा आपके सुख दुःख में साथ दे सकता है अगर सही से प्रस्तुत किया जाए| बौद्ध धम्म हमें न केवल अंतर्मन से , देश के अंदर से ही नहीं बल्कि बहार इस दुनिया में भी सशक्त करने को पर्याप्त है| बस ध्यान में रखने वाली बात ये हैं की आप ब्राह्मणवादी मिलावट वाले बौद्ध धम्म में न फस जाएँ|ध्यान रहे बाबा साहब और गौतम बुद्ध की मूर्ती केवल उपासना के लिए नहीं है बल्कि ये उस विचारधारा का इशारा मात्र है जिससे आपका भला होगा, उनके बताए मार्ग पर चलकर ही मुक्ति संभव है| जिसको मुक्ति चाहिए उसे लड़ना होगा, और जिसे लड़ना है उसे पहले पढ़ना होगा| जो संगर्ष करते हैं वो पाते हैं और जो ध्यान न देके अपनी मौज में लगे रहते हैं वो खुद भी गुलाम बनते है और अपनी कौम को भी गुलामी में धकेल देते हैं|

….समयबुद्धा

बहुजन हिताए बहुजन सुखायेsocialist factor mandal1


socialist factor mandal3

socialist factor mandal2

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