29-Sep-2015 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना: आपको जानकर हैरानी होगी की असल बुद्ध धम्म शिक्षाओं पर कोई चला है तो वो ब्राह्मण ही है,देखो कितनी खुशाली पायी है| आप भी मिलावट वाली धम्म शिक्षाओं को छोड़ो और असल धम्म शिक्षा को अपनाओ|… समयबुद्धा

tisharan sheel

 

29-Sep-2015 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना: आपको जानकर हैरानी होगी की असल बुद्ध धम्म शिक्षाओं पर कोई चला है तो वो ब्राह्मण ही है,देखो कितनी खुशाली पायी है| आप भी मिलावट वाली धम्म शिक्षाओं को छोड़ो और असल धम्म शिक्षा को अपनाओ|… समयबुद्धा

 

विगत् कुछ वर्षों में यूरोप तथा अमरीका के हजारों रोमन कैथोलिकों ने बौद्ध धर्म अपनाया है, जिनमें इटली के विश्व प्रसिद्ध फुटबाल खिलाड़ी राबर्टो बज्जियो तथा हालीबुड के सुपर स्टार रिचार्ड गेरे भी शामिल हैं। पिछले दिनों रोम के एक अखबार को दिये गये साक्षात्कार में सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति गोर्वाचोव ने ठीक ही कहा ‘इक्कीसवीं सदी बुद्ध की सदी होगी।`

आज से सौ साल पहले तक देश में गौतम बुद्ध को बेहद कम या न के बराबर लोग जानते थे, बौद्ध महापुरुषों जैसे राजा बलि,महिषासुर,गौतम बुद्ध, कबीर, रैदास, डॉ अम्बेडकर, पेरियार, सम्राट अशोक महान, राजा हर्षवर्धन आदि अनेकों महापुरुषों के ऐतिहासिक स्थल या मूर्तिाया देखने को भी नहीं मिलती थीं, और अगर यदा कदा कहीं कोई मूर्ती मिल भी जाए तो लोगों को उससे सरोकार नहीं था | पार आज अगर संख्या की दृस्टि से देखे तो सत्तासीन हिन्दू के मंदिर सबसे ज्यादा मिलेंगे फिर कुछ ही सदियों पहले सत्ताहीन हुए मुग़ल या ईसाई  के मस्जिद  और गिरजाघर मिलेंगे| क्या आपने कभी नोट किया की तीसरे नम्बर पर भारतीय/बहुजन महापुरुषों की मूर्तियां,विहार,ऐतिहासिक स्थल अब मिल जायेंगे, जिसमे डॉ अम्बेडकर की मूर्ती की संख्या प्रमुख है| भारत में ही नहीं अब तो विदेशों में भी डॉ अम्बेडकर की प्रतिमाएं लग रही नहीं, बुद्ध का सन्देश पहुंच रहा है|कमाल की बात ये है की भरपूर दमन, राजनैतिक अवहेलना, दुस्प्रचार, घृणा, कट्टर दमन, मीडिया में प्रचार प्रसार न होने देना  और धन के आभाव के बावजूद हर रोज हजारों हजारों लोग बौद्ध धम्म में लौट रहे हैं| जो लोग बौद्ध धम्म और अम्बेडकरवाद को कमजोर करके आंकते हैं वो जरा ये अनुमान लगाएं की इतने दमन के बावजूद इतनी मजबूत स्तिथि है अगर सत्तासीन हो तो क्या स्तिथि होगी|

गर्व करो की आप मूलनिवासी बौद्ध संस्कृति के ताल्लुक रखते हो, क्योंकि अब प्रबुद्ध भारत विश्व गुरु होने जा रहा है| भारत के कुछ धर्मांध लोगों को छोड़ दें तो सारा शिक्षित विश्व जानता है की भारत ने अपने इतिहास के सबसे स्वर्णिम समय बौद्ध काल में ही देखा है, जितनी भी खोजें भारत के नाम पर हैं वो सभी ६०० बी सी से ६०० ए डी की बीच की ही हैं| आज भारतवासी लोगों में बौद्ध धम्म की तरफ रुझान बढ़ रहा है,लोग वापस अपने धम्म में लौट रहे हैं| इसकी शुरुआत बाबा साहब डॉ अम्बेडकर महान ने प्रतिक्रांति में शूद्र या दास  बनाये गये लोगों को, जिन्हें मीडिया दलित कहता है, को वापस अपने खुद के बौद्ध धम्म में लौटा देने से हुई |खुद को शूद्र समझने वाले जब बौद्ध इतिहास से जुड़े  तब जाना की वे ही विश्व गुरु थे, नीच अछूत नहीं, उनके अंदर नयी ऊर्जा आई|

 

पर आज मिलावट वाले धम्म लोगों तक पहुंच रहा है ऐसे में सही धम्म का मर्म समझने के लिए मैंने आज की धम्म देशना का विषय ब्राह्मण और बौद्ध धम्म की शिक्षाएं चुना है|आज बहुत से लोग ऐसे भी हो गए हैं जो खुद को  बौद्ध या अम्बेडकर वादी तो कहते हैं, इनकी फोटो या मूर्ती लगाते और पहचानते भी हैं, पर इनकी शिक्षाओं को न ही जानते हैं न ही उनपर अपना जीवन चलाते हैं| ये परिवर्तन का दौर हैं ऐसा तो होगा ही  पर मैं आपको जोर देकर कहना चाहूँगा की केवल खुद को बौद्ध कहने भर से मुक्ति नहीं मिलगी बल्कि बौद्ध धम्म के मार्ग पर चलना पड़ेगा|

बौद्ध धम्म प्रैक्टिस की चीज़ है भक्ति की नहीं, करने से होगा, गाने बजाने से नहीं| गौतम बुद्ध और डॉ अम्बेडकर की मूर्ती की पूजा से कुछ न होगा उनकी शिक्षा को मैंने और ऊपर चलने से होगा, ध्यान रखना अगर इनकी पूजा शुरू हो गयी तो ये भी देवता बन जायेंगे और इनकी विचारधारा खत्म हो जायगी, जिसका लाभ आपके विरोधी लेंगे| ये बात गौतम बुद्ध जानते थे धम्म के लिए उन्होंने कहा था   “मैंने तुझे नौका दी थी नदी पार करने के लिए न कि सिर पर ढोने के लिए।” बुद्ध की इस उक्ति से उनके तर्क-संगत दर्शन की साफ झलक मिल जाती है। उनकी शिक्षा यह थी कि सत्य को पहले तर्क की कसौटी पर परखो, फिर उसमें विश्वास करो, जब तक जान न लेना मानना नहीं, आस्था या विश्वास से नहीं मानना| खेर इन सब बातों और शिक्षाओं पर तो हम अक्सर ही चर्चा करते हैं पर आज हम जानने की कोशिश करेंगे की बौद्ध शिक्षाओं पर चलकर कितना लाभ होता है|

बौद्धों में ब्राह्मणों के लिए उनके शोषक इतिहास के कारन घृणा का भाव है| गौतम बुद्ध का एक सूत्र है की “हम जिससे मोह करते हैं उसमें बुराई नहीं देख पाते और जिससे घृणा करते हैं उसमें अच्छाई नहीं देख पाते|” जब आप इस सूत्र पर और ब्राह्मणों के बहिष्कार पर गौर करोगे तो आप इस सूत्र को समझ सकते हो| आपको ये जान कर हैरानी होगी की आज के समय में भी जो ब्राह्मण गौतम बुद्ध के मार्ग पर चल रहे हैं वही इस देश की व्यस्था के मालिक हैं, खुश हाल हैं| ये और बात है की ब्राह्मण आज भी गौतम बुद्ध से नाराज है और उनका नाम भी अपने मीडिया में आने नहीं देता पर बौद्ध धम्म की शिक्षओं का सही इस्तेमाल कर के सुखी जीवन भी ब्राह्मण ही बिता रहे हैं| मन्दिरवाजी देवी देवता वगेरा अपनी जगह हैं पर उनको जो असल लाभ मिल रहा है वो बौद्ध मार्ग से ही मिल रहा है| आईये इसे कुछ उद्धरणों से समझते हैं:

 

(I)  प्रज्ञा (बुद्धि या विवेक, शिक्षा, ज्ञान)

बौद्ध धम्मम् प्रज्ञा पर बहुत जोर दिया जाता है| देखो अपने आस पार ब्राह्मण अपनी ज्ञान द्वारा  बुद्धि विवेक बढ़ा रहा है, अपने बच्चों को उची से ऊंची शिक्षा दिला रहा है| जिस कॉलोनी में  मेरा बचपन गुज़रा वो तब नयी  नयी ही बसी थी वहां बिहार और उत्तर प्रदेश से गरीब जनता काम की तलाश में आई थी जिसमे ब्राह्मण भी थे और मूलनिवासी कौमे भी , दोनों के घर एक जैसे कच्चे पक्के से थे| आज बीस तीस सालों बाद मैं देखता हूँ की शेडूल कास्ट में शिक्षितों को छोड़ दे तो ज्यादातर के घर आज भी फटे हाल है पर ब्राह्मण के घर अब पक्के और ऊंचे बन गए हैं| सब कैसे हुआ, मुझे याद है ब्राह्मण अपने बच्चों की शिक्षा पर बहुत जतदा जोर देते थे| और हमारे लड़के सरकारी स्कूल में पढ़ते थे, जागरण और देवी देवता की पूजा खूब करते थे| पर आज देखो जिसने शिक्षा ली वो कामयाब और खुशाल है बाकि मजदूरी करने को मजबूर हैं|

 

(II) शील (जिंदगी में नियम या उसूल होना) 

गौतम बुद्ध ने पंचशील पर चलने की शिक्षा दी|अगर आप घ्यान से सोचोगे तो समझ जाओगे की जिंदगी में जितने भी दुःख हैं उन सभी की जड़ों में इन्हीं पांच शीलों को तोडना ही है|   पंचशील है

१. अनावश्यक हिंसा से दूर रहना

२. हराम कमाई जैसे जुआ,चोरी,लूट आदि से दूर रहना

३. कामुक या सेक्स व्यभिचार से दूर रहना

४. झूठ बोलना चुगली करना आदि से दूर रहना

५. नशा करने से दूर रहना

आप अपने आस पास देखो ब्राह्मणों को देखो और दलितों को देखो, आप पाओगे की कुछ अपवादों को छोड़कर ब्राह्मण आज भी खुद हत्या नहीं करता न मांस खता है, न ही जुआ या तास खेलता मिलेगा,न ही नशे का शिकार मेलगा, शिक्षा और ज्ञान पर जोर होगा| मोटा मोती मैं ये कहना चाहता हूँ को ब्राह्मण पंचशीलों में बहुत कुछ अपने जीवन में बुद्ध काल से ही उतार चुका है| जो ब्राह्मण पंचशील तोड़ रहे हैं उनका पतन भी हो रहा है|हमारे लोग अक्सर प्राचीन इतिहास की किताबों से उदाहरण देते हैं की ब्राह्मण तब कितने घृणित काम करते थे| बुद्ध काल से पहले ब्राह्मण कुछ भी करते हों पर जो शीलों पर चलने के बाद वो खुशाल हैं|

(III) बुद्धम शरणम् गच्छामि:

इसका मतलब बुद्ध की मूर्ती की शरण में जाना नहीं है जैसे की ज्यादातर हमारे लोग समझते हैं| इसका मतलब है अपनी खुद की और ज्ञानियों की बुद्धि के शरण में जाओ| संसार की ज्यादातर समस्यां किसी न किसी की बुद्धि से ही जन्मती हैं और उनका हल भी किसी न किसी की बुद्धि से ही निकलता है| बौद्ध धम्म में बुद्धि ही सर्वोपरि है, या बात को समझने के लिए निम्न बौद्ध कहावत है “सब कहते हैं की ईश्वर ने संसार बनाया बौद्ध जानते हैं की इंसान की बुद्धि ने ईश्वर को बनाया”| बुद्धि की शरण में जाओ और प्रज्ञा विकसित करो आप भी ब्राह्मणों की तरह खुशहाल होओगे|बुद्ध काल से पहले ब्राह्मण कुछ भी करते हों पर जो बुद्धि की शरण में चल गए हैं वो खुशाल हैं|

(IV) संघम शरणम् गच्छामि:

संघ का मतलब केवल बौद्ध भिक्षुओं का संघ ही नहीं है, भिक्षु आपकी सुरक्षा कैसे करेंगे| इसका मतलब  अपनी सुरक्षा के लिए अपनी कौम के संगठन की शरण में जाओ| ब्राह्मणों के कई संगठन हैं और उन संगठनों के बल पर उन्होंने कितना कुछ हासिल किया है हम सब जान रहे हैं और देख रहे हैं, क्षत्रिय और शूद्र वर्ण में हज़ारों जातियां मिल जाएँगी पर भारत के एक कोने से दुसरे कोने तक ब्राह्मण एक ही है | १९२५ में जब भारत ने सामंतवादी हिन्दू राष्ट्र न बनकर प्रजातंत्र बनने का फैसला किया तब अल्पसंख्यक ब्राह्मणधर्मी  घबरा गए, क्योंकि प्रजा तंत्र में वोट से सरकार बनेगी और इनकी संख्या कम है तो ऐसे में इनकी उपेक्षा हो सकती है| तब इन्होने स्वेव सेवक संघठन बनाया और ब्राह्मण धर्म शब्द की जगह हिन्दू धर्म अपनाया, मतलब गौतम बुद्ध की शिक्षा “समय के प्रवाह में बने रहो को अपनाया” | समयबुद्धा धम्म सूत्र कहता है “चार सौ रन छोड़ों से चालीस टिकने वाले सूरमा जीत जाते हैं”  आज आप खुद देख रहे हो, छिप छिपा कर चलने वाला संगठन आज कहाँ है|ये समझ चुके हैं की संघ से ऊपर कुछ नहीं चाहे वो कोई भी हो, अगर उसके हटने में संघ का भला है तो हटा ही देते हैं| देखो दलित लोग न्योता मिलने के बावजूद अपने संगठन में नहीं जाते| बुद्ध काल से पहले ब्राह्मण कुछ भी करते हों पर जो संघ की शरण में चल रहे हैं वो खुशाल हैं|

 

(V) धम्मम शरणम् गच्छामि :

धम्म का मतलब है न्याय और जीवन विकास के सूत्र|देखो अपने आस पास को जितना दलित,गरीब और अनपढ़ है वो उतना ही ज्यादा भक्ति में लगा हुआ है, जीवन सूत्रों को न ही जनता है न ही उनपर चलता है परिणाम दुखी है| दूसरी तरफ ब्राह्मण भले ही भक्ति तो करता है पर जीवन सूत्रों पर भी चलता है|सूत्र ऐसे बात होती है जो हमारे जीवन को खुशाल करती है, समस्त बौद्ध धम्म शिक्षा सूत्रों की ही शिक्षा है जो कभी भी पुरानी नहीं पड़ती| जैसे वो हजारों साल पहले जीवन पर लागू थे वैसे ही आज भी हैं और आगे भी रहेंगे| जबकि दुसरे धर्मों की बातें विज्ञानं की तर्रकी की कारन गैरजरूरी और झूटी पड़ जाती है| इसी लिय धम्म को सनातन कहा गया है,सनातन मतलब सब समय एक सी…एक धम्मो सनंतनो| आप सूत्र का मतलब नहीं समझे होगे, सूत्र के कुछ उदाहरण हैं:

“हमेशा समय के प्रवाह में बने रहो”

“हम जो भी हैं अपनी सोच के कारन है आगे जो भी  अपनी सोच के कारन होंगे”

“पंचशील का पालन न करने से दुःख मिलेगा”

“अत्त दीपो भव, अपना मार्गदर्शक स्वेव बनो”

“जब तक जान न लो मानना मत, जानो फिर मनो”

“जिन्हें अपना इतिहास नहीं पता वो अपना वर्तमान नहीं सुधार सकता और भविष्ये नहीं बचा सकता”

“जिसे अपना जीवन सुधारना है उसे लड़ना होगा और जिसे लड़ना है उसे पहले पढ़ना होगा”

“राजनैतिक समस्याओं का समाधान राजनीती में ही है ईश्वरवाद में नहीं “

“किसी कौम की आबादी कितनी ही कम हो पर अगर वो राजनीती में सक्रिय है तो वो बेहतर जीवन बिताएंगी”

“राजनीती में हिस्सा न लेने का परिणाम ये होता है की अयोग्य व्यक्ति आपपर शाशन करने लगते हैं”

“जिसे जानता भाग्ये समझती है उसका फैसला राजनैतिक गलियारों में होता है “

शायद इन उदाहरणों से आप “सूत्र” शब्द का मतलब समझ गए होगे|

 

[VI] ध्यान दो , नध्यान(IGNORANCE) छोड़ो :

ध्यान का मतलब केवल ये नहीं है की अकेले बैठ कर अपनी आती जाती साँस को देखना, बल्कि ध्यान का मतलब है  अपने आस पास की घटनाओं और वातावरण पर ध्यान देना, अपना इतहास, वर्तमान और भविष्ये नीति का ज्ञान होना ताकि जागरूक रहो|बौद्ध होने का मतलब जाग जाना ही है| जागरूक रहोगे तो कोई तुम्हें धोखा नहीं दे सकता, बरगला नहीं सकता, चाहे उसपर कितना ही धन और मीडिया की शक्ति हो, तुम सही फैसला लोगे, सही जगह वोट दोगे| देखो ब्राह्मणवादी कितना ध्यान रखते हैं अपने आस पास की घटनाओं पर जो भी उनको अपने खिलाफ लगता है उसका इंतज़ाम कर देते हैं|जहाँ भी सही मौका मिलता है लपक लेते हैं और ऊँचे पदों पर बैठ जाते हैं| अपने पूर्वजों की शिक्षाओं को कभी नहीं त्यागते, उनपर ध्यान देते हैं और उनका पालन करते हैं , और दलित लोग , इनको बुद्ध या अम्बेडकर की किताब दे भी दो तो भी नहीं पढ़ते|आपमें से कितनो को डॉ अम्बेडकर की बाइस प्रतिज्ञा याद हैं | मैं ये धम्म देशना दे रहा हूँ और वो देखो बहार हमारे युवा अपनी ही दुनिया में मस्त हैं, मतलब ध्यान नहीं दे रहे तो ये बातें उनको पता ही नहीं चलेंगी|

 

(ग) अप्रमाद (संगर्ष शील होना, आलस्य न करना ):

देखो अपने आस पास दलित लोग कैसे अपना कीमती समय बर्बाद कर रहे हैं, और ब्राह्मण धीरे धीरे सत्ताधारी होता जा रहा है| सुबह पांच बजे उठ कर खाखी नेकर पहन कर संघ की शाखाओं में राजनीती के दाव पेच सीख रहा है, शरीर और संगठन मजबूत कर रहा है|हर वक़्त जगा हुआ और सतर्क रहता है, मेहनत करता है| आज बूढ़े ब्राह्मण राजनीती, इन जी ओ, मंदिर संस्था आदि  में सक्रिय हैं और दलितों के बुड्ढे कहीं गली में बैठे तास पीट रहे हैं, जवान इश्क में समय बर्बाद कर रहे हैं | ब्राह्मण संगर्ष कर रहा है और ये धम्म सूत्र है की जो संगर्ष करेग वो पायेगा, दलित तास पीटते रह जायेंगे और ब्राह्मण राजा बना जा रहा है|बुद्ध काल से पहले ब्राह्मण कुछ भी करते हों पर जो अप्रमाद पर चल रहे हैं वो खुशाल हैं|अगर कोई ब्राह्मण इसे पड़े तो उसे गौतम बुद्ध का धन्यवाद देना चाहिए, अगर नहीं मनो तो बुद्ध काल से पहले के सच्चे ब्राह्मण इतिहास को पढ़ना|ध्यान रहे तुम्हारे आज की अच्छी स्तिथि में उनकी शिक्षाओं का बहुत योगदान है| गौतम बुद्ध के शिष्यों में कई ब्राह्मण भी थे

ऐसे अनेकों अनेकों उदाहरण हैं बौद्ध शिक्षाओं औद्वारा  ब्राह्मण जीवन सुधार को बात को साबित करता हो| पर यहाँ इतना ही बहुत है आप मेरी बात का मर्म समझो तो आप खुद ही दो और दो चार कर लोगे, आप जान जाओगे की कौन सी धम्म शिक्षा से ब्राह्मण ने कितना फायदा उठाया|

जरा बुद्ध की शिक्षाओं पर चल तो देखो, आपका कल्याण निश्चित है| डॉ अम्बेडकर महान ने ऐसे ही तो आपको अपने धम्म में नहीं लौटाया, वो चाहते तो वर्तमान में सक्रिय इस्लाम, ईसाइयत या सिख धर्म में भी तो धर्मान्तरण करवा सकते थे, और हमारे लोग तो उस समय तक कर भी रहे थे|वाकई डॉ अम्बेडकर जैसा महान मासिया पाकर ये भारत और भारतवासी धन्ये हो गए|

 

बहुजन हिताए बहुजन सुखाये

…समयबुद्धा

 

 

 

 

पूना पैक्ट मूलनिवासी (or Schedule Caste) गुलामी का दस्तावेज़….एस.आर.दारापुरी. ………….राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्ज़ फ्रंट, ((24 सितंबर को पूना पैक्ट दिवस पर विशेष))

poona-pact1पूना पैक्ट मूलनिवासी (or Schedule Caste) गुलामी का दस्तावेज़

एस.आर.दारापुरी. राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्ज़ फ्रंट

(24 सितंबर को पूना पैक्ट दिवस पर विशेष)

भारतीय हिन्दू समाज में जाति को आधारशिला माना गया है. इस में श्रेणीबद्ध असमानता के ढांचे में अछूत सबसे निचले स्तर पर हैं जिन्हें 1935 तक सरकारी तौर पर ‘ डिप्रेस्ड क्लासेज’ कहा जाता था. गांधी जी ने उन्हें ‘हरिजन’ के नाम से पुरस्कृत किया था जिसे अधिकतर अछूतों ने स्वीकार नहीं किया था. अब उन्होंने अपने लिए ‘मूलनिवासी (or Schedule Caste)’ नाम स्वयम   चुना है जो उनकी पदमूलनिवासी (or Schedule Caste) स्थिति का परिचायक है. वर्तमान  में वे भारत की कुल आबादी का लगभग छठा भाग (16.20 %) तथा  कुल हिन्दू आबादी का पांचवा भाग (20.13 %) हैं. अछूत सदियों से हिन्दू समाज में सभी प्रकार के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक व शैक्षिक अधिकारों से वंचित रहे हैं और काफी हद तक आज भी हैं.

मूलनिवासी (or Schedule Caste) कई प्रकार की वंचनाओं एवं निर्योग्यताओं को झेलते रहे हैं.  उनका हिन्दू समाज एवं राजनीति में बराबरी का दर्जा पाने के संघर्ष का एक लम्बा इतिहास रहा है. जब श्री. ई.एस. मान्तेग्यु, सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फॉर इंडिया,  ने  पार्लियामेंट में 1917 में यह महत्वपूर्ण घोषणा की कि “अंग्रेजी सरकार का अंतिम लक्ष्य भारत को डोमिनियन स्टेट्स देना है तो दलितों ने बम्बई में दो मीटिंगें करके अपना मांग पत्र वाइसराय तथा भारत भ्रमण पर भारत आये सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फॉर इंडिया को दिया. परिणामस्वरूप निम्न जातियों को विभिन्न प्रान्तों में अपनी समस्यायों को 1919 के भारतीय संवैधानिक सुधारों के पूर्व भ्रमण कर रहे कमिशन को पेश करने का मौका मिला.

तदोपरांत विभिन्न कमिशनों , कांफ्रेंसों एवं कौंसिलों  का एक लम्बा एवं जटिल  सिलसिला चला. सन 1918 में मान्तेग्यु चैमस्फोर्ड रिपोर्ट के बाद 1924 में मद्दीमान कमेटी रिपोर्ट आई जिसमें कौंसलों में डिप्रेस्ड क्लासेज के अति अल्प प्रतिनिधित्व और उसे बढ़ाने के उपायों के बारे में बात कही गयी. साईमन कमीशन (1928) ने स्वीकार  किया कि डिप्रेस्ड क्लासेज को पर्याप्त प्रातिनिधित्व दिया जाना चाहिए. सन 1930 से 1932 एक लन्दन में तीन गोलमेज़ कान्फ्रेंसें हुयीं जिन में अन्य अल्प संख्यकों के साथ साथ दलितों के  भी भारत के भावी संविधान के निर्माण में अपना मत देने के अधिकार को   मान्यता मिली. यह एक ऐतहासिक  एवं निर्णयकारी परिघटना थी . इन गोलमेज़  कांफ्रेंसों में डॉ. बी. आर. आंबेडकर तथा राव बहादुर आर. श्रीनिवासन द्वारा  दलितों के प्रभावकारी प्रतिनिधित्व एवं ज़ोरदार प्रस्तुति के कारण 17 अगस्त, 1932 को ब्रिटिश सरकार द्वारा घोषित ‘कमिनुअल अवार्ड’  में दलितों को  पृथक निर्वाचन का स्वतन्त्र राजनीतिक अधिकार मिला. इस अवार्ड से दलितों को आरक्षित सीटों पर पृथक निर्वाचन द्वारा अपने प्रतिनिधि स्वयं  चुनने  तथा साथ ही सामान्य जाति के निर्वाचन क्षेत्रों में सवर्णों को चुनने हेतु दो वोट का अधिकार भी प्राप्त हुआ. इस प्रकार भारत के इतिहास में अछूतों को  पहली वार  राजनैतिक स्वतंत्रता का अधिकार  प्राप्त हुआ जो  उनकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर  सकता था.

उक्त अवार्ड द्वारा दलितों  को गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट,1919 में अल्प संख्यकों के रूप में मिली मान्यता के आधार  पर अन्य अल्प संख्यकों – मुसलमानों, सिक्खों, ऐंग्लो इंडियनज तथा कुछ अन्य के साथ साथ पृथक निर्वाचन के रूप में प्रांतीय विधायकाओं एवं केन्द्रीय एसेम्बली हेतु अपने प्रतिनिधि स्वयं  चुनने का अधिकार मिला तथा उन सभी के लिए सीटों की  संख्या निश्चित की  गयी. इसमें अछूतों के लिए 78 सीटें विशेष निर्वाचन क्षेत्रों के रूप में आरक्षित की  गयीं.

गाँधी जी ने उक्त अवार्ड की  घोषणा होने पर यरवदा (पूना) जेल में 18 अगस्त, 1932 को दलितों को मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार के विरोध में 20 सितम्बर, 1932 से आमरण अनशन  करने की घोषणा कर दी.  गाँधी जी का मत था कि इससे अछूत हिन्दू समाज से अलग हो जायेंगे  जिससे हिन्दू समाज व हिन्दू धर्म विघटित हो जायेगा. यह ज्ञातव्य है कि उन्होंने मुसलमानों, सिक्खों व ऐंग्लो- इंडियनज को मिले उसी अधिकार का कोई विरोध  नहीं किया था. गाँधी जी ने इस अंदेशे को लेकर 18 अगस्त, 1932 को तत्कालीन ब्रिटिश प्रधान मंत्री, श्री रेम्ज़े मैकडोनाल्ड को एक पत्र भेज कर दलितों को दिए गए पृथक निर्वाचन  के अधिकार को समाप्त करके संयुक्त मताधिकार की  व्यवस्था  करने तथा हिन्दू समाज को विघटन से बचाने की अपील की. इसके उत्तर में ब्रिटिश प्रधान मंत्री ने अपने पत्र दिनांकित 8 सितम्बर, 1932 में अंकित किया, ” ब्रिटिश सरकार की  योजना के अंतर्गत मूलनिवासी (or Schedule Caste) वर्ग हिन्दू समाज के अंग बने रहेंगे और वे हिन्दू निर्वाचन के लिए समान  रूप से मतदान करेंगे, परन्तु ऐसी व्यवस्था प्रथम 20 वर्षों तक रहेगी तथा  हिन्दू समाज का अंग रहते हुए  उनके लिए सीमित संख्या में विशेष निर्वाचन क्षेत्र होंगे ताकि  उनके अधिकारों और हितों की रक्षा हो सके. वर्तमान स्थिति में ऐसा करना नितांत आवश्यक हो गया है. जहाँ जहाँ विशेष निर्वाचन क्षेत्र होंगे वहां वहां सामान्य हिन्दुओं के निर्वाचन क्षेत्रों में मूलनिवासी (or Schedule Caste) वर्गों को मत देने से वंचित नहीं किया जायेगा. इस प्रकार दलितों के लिए दो मतों का अधिकार होगा – एक विशेष निर्वाचन क्षेत्र के अपने सदस्य  के लिए और दूसरा हिन्दू समाज के सामान्य सदस्य के लिए. हम ने जानबूझ  कर – जिसे आप ने अछूतों के लिए सम्प्रदायिक निर्वाचन कहा है, उसके विपरीत फैसला दिया है. मूलनिवासी (or Schedule Caste) वर्ग के  मतदाता सामान्य अथवा हिन्दू निर्वाचन क्षेत्रों में सवर्ण  उमीदवार को मत दे सकेंगे तथा सवर्ण हिन्दू  मतदाता मूलनिवासी (or Schedule Caste) वर्ग के उमीदवार को उसके निर्वाचन क्षेत्र में मतदान क़र सकेंगे. इस प्रकार हिन्दू समाज की  एकता को सुरक्षित रखा गया है.” कुछ अन्य तर्क देने के बाद उन्होंने गाँधी जी से  आमरण अनशन छोड़ने का आग्रह किया था.

परन्तु गाँधी जी ने प्रत्युत्तर में आमरण अनशन को अपना पुनीत धर्म मानते हुए कहा कि मूलनिवासी (or Schedule Caste) वर्गों को केवल दोहरे  मतदान का अधिकार  देने से उन्हें तथा हिन्दू समाज को छिन्न – भिन्न  होने से नहीं रोका जा सकता. उन्होंने आगे कहा, ” मेरी समझ में मूलनिवासी (or Schedule Caste) वर्ग के लिए पृथक निर्वाचन की  व्यवस्था  करना हिन्दू धर्म  को बर्बाद करने का इंजेक्शन लगाना है. इस से मूलनिवासी (or Schedule Caste) वर्गों का कोई लाभ नहीं होगा.” गंधी जी ने इसी प्रकार के तर्क दूसरी और तीसरी गोल मेज़ कांफ्रेंस में भी दिए थे जिसके प्रत्युत्तर में डॉ. आंबेडकर ने गाँधी जी के दलितों के भी अकेले प्रतिनिधि और उनके शुभचिन्तक होने के दावे को नकारते हुए उनसे दलितों के राजनीतिक अधिकारों का विरोध न करने का अनुरोध किया था. उन्होंने यह भी कहा था कि फिलहाल मूलनिवासी (or Schedule Caste) केवल स्वतन्त्र राजनीतिक अधिकारों की  ही मांग कर रहे हैं न कि हिन्दुओं  से अलग हो कर अलग देश बनाने की. परन्तु गाँधी जी का सवर्ण हिन्दुओं के हित को सुरक्षित रखने और अछूतों को  हिन्दू समाज का गुलाम बनाये रखने का स्वार्थ था. यही कारण था कि उन्होंने सभी तथ्यों व तर्कों को नकारते हुए 20 सितम्बर, 1932 को अछूतों के पृथक निर्वाचन के अधिकार के विरुद्ध आमरण अनशन शुरू कर दिया. यह एक विकट स्थिति थी. एक तरफ गाँधी जी के पक्ष में एक विशाल शक्तिशाली हिन्दू समुदाय था,  दूसरी  तरफ डॉ. आंबेडकर और अछूत  समाज. अंतत  भारी  दबाव  एवं   अछूतों के संभव जनसंहार के भय तथा  गाँधी जी की जान बचाने के उद्देश्य से डॉ. आंबेडकर तथा उनके  साथियों को दलितों के पृथक निर्वाचन के अधिकार  की बलि देनी पड़ी और सवर्ण हिन्दुओं से 24 सितम्बर, 1932 को  तथाकथित पूना पैक्ट करना पड़ा. इस प्रकार अछूतों को गाँधी जी की जिद्द के कारण अपनी राजनैतिक आज़ादी के अधिकार को खोना पड़ा.

यद्यपि पूना पैक्ट  के अनुसार दलितों के लिए ‘ कम्युनल अवार्ड’ में सुरक्षित   सीटों की संख्या बढ़ा कर 78 से 151 हो गयी परन्तु संयुक्त निर्वाचन के कारण उनसे अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने का अधिकार छिन्न  गया जिसके दुष्परिणाम आज तक मूलनिवासी (or Schedule Caste) समाज झेल रहा है. पूना पैकट के प्रावधानों को गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट, 1935 में शामिल करने के बाद सन 1937 में प्रथम चुनाव संपन्न हुआ जिसमें  गाँधी जी के मूलनिवासी (or Schedule Caste) प्रतिनिधियों को कांग्रेस द्वारा कोई भी दखल न देने के दिए गए आश्वासन के बावजूद कांग्रेस ने 151 में से 78 सीटें हथिया लीं क्योंकि संयुक्त निर्वाचन प्रणाली में मूलनिवासी (or Schedule Caste) पुनः सवर्ण वोटों पर निर्भर हो गए थे. गाँधी जी और कांग्रेस के इस छल से खिन्न होकर डॉ. आंबेडकर ने कहा था, ” पूना पैकट  में दलितों के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है.”

कम्युनल अवार्ड के माध्यम से अछूतों के पृथक निर्वाचन के रूप में अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने  और दोहरे वोट के अधिकार से सवर्ण हिन्दुओं की भी दलितों पर निर्भरता से दलितों का स्वंतत्र राजनीतिक अस्तित्व  सुरक्षित रह सकता था  परन्तु  पूना पैक्ट  करने की विवशता ने दलितों को फिर से सवर्ण हिन्दुओं का गुलाम बना दिया. इस व्यवस्था  से आरक्षित सीटों पर  जो सांसद या विधायक चुने जाते हैं वे वास्तव में दलितों द्वारा न चुने जा कर विभिन्न राजनैतिक पार्टियों एवं सवर्णों द्वारा चुने जाते हैं जिन्हें उन का गुलाम/ बंधुआ बन कर रहना पड़ता है. सभी राजनैतिक पार्टियाँ गुलाम मानसिकता वाले ऐसे प्रतिनिधियों पर  कड़ा नियंत्रण रखती हैं और पार्टी लाइन से हट कर किसी भी मूलनिवासी (or Schedule Caste) मुद्दे को उठाने या उस पर  बोलने की इजाजत नहीं देतीं. यही कारण है कि लोकसभा तथा विधान सभायों में मूलनिवासी (or Schedule Caste) प्रतिनिधियों कि स्थिति महाभारत  के भीष्म पितामह जैसी रहती है जिस ने  यह पूछने पर कि ” जब कौरवों के दरबार में द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था तो आप क्यों नहीं बोले?” इस पर उन का उत्तर था, ” मैंने कौरवों का नमक खाया था.”

वास्तव में कम्युनल अवार्ड से दलितों को स्वंतत्र राजनैतिक अधिकार प्राप्त हुए थे जिससे वे  अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने के लिए सक्षम हो गए थे और वे उनकी आवाज़ बन सकते थे. इस के साथ ही दोहरे वोट के अधिकार के कारण सामान्य निर्वाचन क्षेत्र में सवर्ण  हिन्दू भी उन पर निर्भर रहते  और दलितों को नाराज़ करने की हिम्मत नहीं करते. इस से हिन्दू समाज में एक नया समीकरण बन सकता था जो मूलनिवासी (or Schedule Caste) मुक्ति का रास्ता प्रशस्त करता. परन्तु गाँधी जी ने हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म  के विघटित होने की  झूठी दुहाई दे कर तथा आमरण अनशन का अनैतिक हथकंडा अपना कर दलितों की राजनीतिक स्वतंत्रता का हनन कर लिया जिस कारण मूलनिवासी (or Schedule Caste) फिर से सवर्णों  के राजनीतिक गुलाम बन गए. वास्तव  में गाँधी जी की चाल काफी हद तक राजनीतिक भी थी जो कि बाद में उनके एक अवसर पर सरदार पटेल को कही गयी इस  बात से भी स्पष्ट है:

“अछूतों के अलग मताधिकार के परिणामों से मैं भयभीत हो उठता हूँ. दूसरे वर्गों के लिए अलग निर्वाचन अधिकार के बावजूद भी मेरे पास उनसे सौदा करने की गुंजाइश रहेगी परन्तु मेरे पास अछूतों से सौदा करने का कोई साधन नहीं रहेगा. वे नहीं जानते कि पृथक निर्वाचन हिन्दुओं को इतना बाँट देगा कि उसका अंजाम खून खराबा होगा. अछूत गुंडे मुसलमान गुंडों से मिल जायेंगे और हिन्दुओं को मारेंगे. क्या अंग्रेजी  सरकार को इस का कोई अंदाज़ा नहीं है? मैं ऐसा नहीं सोचता.” (महादेव  देसाई, डायरी, पृष्ट 301,  प्रथम खंड).

गाँधी जी के इस सत्य कथन से आप गाँधी जी द्वारा अछूतों को पूना पैक्ट  करने के लिए बाध्य करने के असली उद्देश्य का अंदाज़ा लगा सकते हैं.

दलितों की संयुक्त  मताधिकार व्यवस्था के कारण सवर्ण हिन्दुओं पर निर्भरता के फलस्वरूप  दलितों की कोई भी राजनैतिक पार्टी पनप नहीं पा  रही है चाहे वह डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित  रिपब्लिकन पार्टी ही क्यों न हो. इसी कारण डॉ. आंबेडकर को भी दो बार चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा क्योंकि आरक्षित सीटों पर  सवर्ण वोट ही निर्णायक होता है. इसी कारण सवर्ण पार्टियाँ ही अधिकतर आरक्षित सीटें जीतती हैं. पूना पैक्ट के इन्हीं दुष्परिणामों के कारण ही डॉ. आंबेडकर ने संविधान में राजनैतिक आरक्षण को केवल 10 वर्ष तक ही जारी रखने की बात कही थी. परन्तु विभिन्न राजनीतिक पार्टियाँ इसे दलितों के हित में नहीं बल्कि अपने स्वार्थ के लिए अब तक लगातार 10-10 वर्ष तक  बढाती  चली आ रही हैं क्योकि इस से उन्हें अपने मनपसंद और गुलाम  मूलनिवासी (or Schedule Caste) सांसद और विधायक चुनने की सुविधा रहती है.

सवर्ण हिन्दू राजनीतिक पार्टियाँ मूलनिवासी (or Schedule Caste) नेताओं को खरीद लेती हैं और मूलनिवासी (or Schedule Caste) पार्टियाँ कमज़ोर हो कर टूट जाती  हैं. यही कारण है की  उत्तर भारत में तथाकथित दलितों की कही जाने वाली बहुजन समाज पार्टी भी ब्राह्मणों और बनियों के पीछे घूम रही है और ” हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है” जैसे नारों को स्वीकार करने के लिए वाध्य है. अब तो उसका रूपान्तार्ण बहुजन से सर्वजन में हो गया है. इन परिस्थितयों के कारण दलितों का बहुत  अहित हुआ है वे राजनीतिक तौर प़र  सवर्णों  के गुलाम बन कर रह गए हैं. अतः इस सन्दर्भ  में पूना पैक्ट के औचित्य की समीक्षा करना समीचीन होगा. क्या दलितों को पृथक निर्वाचन की मांग पुनः उठाने के बारे में नहीं सोचना चाहिए?

S R DARAPURIयद्यपि पूना पैक्ट की शर्तों में छुआ-छूत को समाप्त करने, सरकारी सेवाओं में आरक्षण देने तथा दलितों की शिक्षा के लिए बजट का प्रावधान करने की बात थी परन्तु आजादी के 65 वर्ष बाद भी उनके किर्यान्वयन की स्थिति  दयनीय ही है. डॉ. आंबेडकर ने अपने इन  अंदेशों को पूना पैक्ट के अनुमोदन हेतु बुलाई गयी  25 सितम्बर, 1932 को बम्बई में सवर्ण हिन्दुओं की बहुत बड़ी मीटिंग में व्यक्त करते हुए कहा था, ” हमारी एक ही चिंता है. क्या हिन्दुओं की भावी पीढियां इस समझौते का अनुपालन करेंगी ?” इस पर सभी सवर्ण हिन्दुओं ने एक स्वर में कहा था, ” हाँ, हम करेंगे.” डॉ. आंबेडकर ने यह भी कहा था, ” हम देखते हैं कि दुर्भाग्यवश हिन्दू सम्प्रदाय एक संघटित समूह नहीं है बल्कि विभिन्न सम्प्रदायों की फेडरेशन  है. मैं आशा  और विश्वास करता हूँ कि आप अपनी तरफ से इस अभिलेख को पवित्र मानेंगे तथा एक सम्मानजनक भावना  से काम करेंगे.” क्या आज सवर्ण हिन्दुओं को अपने पूर्वजों द्वारा दलितों के साथ किये गए इस समझौते को ईमानदारी से लागू करने के बारे में थोडा  बहुत आत्म चिंतन नहीं करना चाहिए. यदि वे इस समझौते को ईमानदारी से लागू करने में अपना अहित देखते हैं तो क्या उन्हें दलितों के पृथक निर्वाचन का राजनैतिक अधिकार लौटा नहीं देना चाहिए? मेरे विचार में अब समय आ गया है जब दलितों को संगठित हो कर आरक्षित सीटों पर वर्तमान संयुक्त चुनाव प्रणाली की जगह पृथक चुनाव प्रणाली की मांग उठानी चाहिए ताकि वे अपने प्रतिनिधियों को सवर्णों की जगह स्वयम चुनने में सक्षम हो सकें.

 

 

 

एस.आर.दारापुरी.

राष्ट्रीय प्रवक्ता,

आल इंडिया पीपुल्ज़ फ्रंट

कार्ल मार्क्स और उनके अनमोल विचार…Team SBMT

Karl_Marx

परिचय:                     
नाम Karl Marx कार्ल मार्क्स
जन्म दिन : 5 मई 1818
जन्म स्थान : ट्राएर, प्रुशिया किंगडम, German Confederation
मृत्यु : 14 मार्च 1883
स्कूल : मार्क्सवाद,  कम्युनिज्म , समाजवाद , भौतिकवाद
मुख्य रूचि : राजनीति, अर्थशास्त्र, दर्शन, समाज शास्त्र, आदि
पुस्तक : The Communist Manifesto, Das Kapital, materialist conception of history

कार्ल मार्क्स के अनमोल विचार

Quote 1 : The worker of the world has nothing to lose, but their chains, workers of the world unite.
In Hindi : दुनिया के मजदूरों के पास अपनी जंजीर के अलावा खोने के लिए कुछ भी नहीं है, दुनिया के मजदूरों एक हो.
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 2 : Society does not consist of individuals but expresses the sum of interrelations, the relations within which these individuals stand.
In Hindi : समाज व्यक्तियों से मिलकर नहीं बनता है बल्कि उनके अंतर्संबंधों का योग होता है, इन्हीं संबंधों के भीतर ये व्यक्ति खड़े होते हैं.
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 3 : The country that is more developed industrially only shows, to the less developed, the image of its own future.
In Hindi : औद्योगिक रूप से अधिक विकसित देश, कम विकसित की तुलना में, अपने स्वयं के भविष्य की छवि दिखाते हैं.
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 4 : Capitalist production, therefore, develops technology, and the combining together of various processes into a social whole, only by sapping the original sources of all wealth – the soil and the labourer.
In Hindi : पूंजीवादी उत्पादन इसलिए प्रौद्योगिकी विकसित करता है, और विभिन्न प्रक्रियाओं को एक पूर्ण समाज के रूप में संयोजित करता है, केवल संपत्ति के मूल स्रातोंजमीन और मजदूर की जमीन खोदकर.
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 5 : Landlords, like all other men, love to reap where they never sowed.
In Hindi : जमींदार, सभी अन्य लोगों की तरह, वैसी फसल काटना पसंद करते हैं जिसे कभी बोया ही नहीं.
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 6 : History repeats itself, first as tragedy, second as farce.
In Hindi : इतिहास खुद को दोहराता है पहली त्रासदी के रूप में, दूसरा प्रहसन के रूप में.
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 7 : Democracy is the road to socialism.
In Hindi : लोकतंत्र समाजवाद का मार्ग होता है .
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 8 : The production of too many useful things results in too many useless people.
In Hindi : कई उपयोगी चीजों का उत्पादन कई बेकार लोगों को भी उत्पन्न करता है.
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 9 : Religion is the impotence of the human mind to deal with occurrences it cannot understand.
In Hindi : संयोग से निपटने के लिए धर्म मानव मन की नपुंसकता है जिसे वह नहीं समझ सकता.
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 10 : Workers of the world unite; you have nothing to lose but your chains.
In Hindi : दुनिया के मजदूरों एक हो, आपके पास खोने के लिए अपनी जंजीरों के अलावा कुछ भी नहीं है.
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 11 : Capital is dead labor, which, vampire-like, lives only by sucking living labor, and lives the more, the more labor it sucks.
In Hindi : पूंजी मृत श्रम है जो पिशाच की तरह है , जो केवल श्रम चूसकर ही जिन्दा रहता है और जितना अधिक जीता है उतना श्रम चूसता है.
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 12 : The theory of Communism may be summed up in one sentence: Abolish all private property.
In Hindi : साम्यवाद के सिद्धांत को एक वाक्य में अभिव्यक्त किया जा सकता है: सभी निजी संपत्ति को समाप्त करो.
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 13 : Social progress can be measured by the social position of the female sex.
In Hindi : सामाजिक प्रगति महिलओं की सामाजिक स्थिति से मापा जा सकता है.
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 14 : Religion is the opium of the masses.
In Hindi : धर्म जनता के लिए अफीम है .
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 15 : The only antidote to mental suffering is physical pain.
In Hindi : मानसिक पीड़ा के लिए केवल ही विषनाशक औषधि शारीरिक दर्द है .
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 16 : Medicine heals doubts as well as diseases.
In Hindi : चिकित्सा संदेह के साथ ही रोगों को भी भर देता है .
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 17 : Men’s ideas are the most direct emanations of their material state.
In Hindi : मनुष्य के विचार उनके भौतिक दशा के सबसे प्रत्यक्ष निःसृत पदार्थ हैं .
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 18 : There is a specter haunting Europe, the specter of Communism.
In Hindi : यूरोप को एक काली छाया सता रही है वह है साम्यवाद का भूत.
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 19 : The meaning of peace is the absence of opposition to socialism.
In Hindi : शांति का मतलब समाजवाद के विरोध का अभाव है .
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 20 : If anything is certain, it is that I myself am not a Marxist.
In Hindi : अगर कुछ भी निश्चित है, तो यह है कि मैं स्वयं एक मार्क्सवादी नहीं हूँ.
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 21 : The first requisite for the happiness of the people is the abolition of religion.
In Hindi : लोगों की खुशी के लिए धर्म का उन्मूलन जरुरी है .
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 22 : Revolutions are the locomotives of history.
In Hindi : क्रांतियां इतिहास का इंजन होती हैं .
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 23 : Experience praises the most happy the one who made the most people happy.
In Hindi : अनुभव उस व्यक्ति की प्रशंसा करता है जिसने ज्यादातर लोगों को ख़ुशी दिया हो.
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 24 : The history of all previous societies has been the history of class struggles.
In Hindi : पिछले सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है.
Karl Marx कार्ल मार्क्स
Quote 25 : Nothing can have value without being an object of utility.
In Hindi : बिना उपयोगिता के किसी भी वस्तु का कोई मूल्य नहीं होता.
Karl Marx कार्ल मार्क्स

आज बहुजन नायक इरोड वेंकट नायकर रामासामी(17 सितम्बर, 1879-24 दिसम्बर, 1973) का जन्मदिन है जिन्होंने दक्षिणी भारत में बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के आंदोलन को उनके साथ कंधे से कन्धा मिलकर लड़ा…Team SBMT

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आज बहुजन नायक पेरियार रामास्वामी जी का जन्मदिन है जिन्होंने दक्षिणी भारत में बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के आंदोलन को उनके साथ कंधे से कन्धा मिलकर लड़ा और  दक्षिणी भारत में बहुजनों को जगाया और ब्राह्मणों का अत्याचार काफी हद तक काम किया | उन्हीं के संगर्ष का परिणाम है की आज वहां पर पचास प्रतिशत से भी अधिक बहुजन आरक्षण है|आईये ऐसे महान बहुजन नायक पेरियार इ0 वी0 रामास्वामी जी और उनके आंदोलन के बारे में जाने:

बचपन

इरोड वेंकट नायकर रामासामी(17 सितम्बर1879-24 दिसम्बर1973) जिन्हे पेरियार (तमिल में अर्थ -सम्मानित व्यक्ति) नाम से भी जाना जाता था, बीसवीं सदी के तमिलनाडु के एक प्रमुख राजनेता थे। इन्होने जस्टिस पार्टी का गठन किया जिसका सिद्धान्त रुढ़िवादी हिन्दुत्व का विरोध था। हिन्दी के अनिवार्य शिक्षण का भी उन्होने घोर विरोध किया। भारतीय तथा विशेषकर दक्षिण भारतीय समाज के शोषित वर्ग को लोगों की स्थिति सुधारने में इनका नाम शीर्षस्थ है।

 युवावस्था में पेरियार

इनका जन्म 17 सितम्बर, 1879 को पश्चिमी तमिलनाडु के इरोड में एक सम्पन्न, परम्परावादी हिन्दू परिवार में हुआ था। १८८५ में उन्होंने एक स्थानीय प्राथमिक विद्यालय में दाखिला लिया। पर कोई पाँच साल से कम की औपचारिक शिक्षा मिलने के बाद ही उन्हें अपने पिता के व्यवसाय से जुड़ना पड़ा। उनके घर पर भजन तथा उपदेशों का सिलसिला चलता ही रहता था। बचपन से ही वे इन उपदशों में कही बातों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते रहते थे। हिन्दू महाकाव्यों तथा पुराणों में कही बातों की परस्पर विरोधी तथा बेतुकी बातों का माखौल भी वे उड़ाते रहते थे। बाल विवाह, देवदासी प्रथा, विधवा पुनर्विवाह के विरूद्ध अवधारणा, स्त्रियों तथा बहुजनों के शोषण के पूर्ण विरोधी थे। उन्होने हिन्दू वर्ण व्यवस्था का भी बहिष्कार किया। १९ वर्ष की उम्र में उनकी शादी नगम्मल नाम की १३ वर्षीया स्त्री से हुई। उन्होने अपना पत्नी को भी अपने विचारों से ओत प्रोत किया।

काशी यात्रा और परिणाम

१९०४ में पेरियार ने एक ब्राह्मण, जिसका कि उनके पिता बहुत आदर करते थे, के भाई को गिरफ़्तार किया जा सके न्यायालय के अधिकारियों की मदद की। इसके लिए उनके पिता ने उन्हें लोगों के सामने पीटा। इसके कारण कुछ दिनों के लिए पेरियार को घर छोड़ना पड़ा। पेरियार काशी चले गए। वहां निःशुल्क भोज में जाने की इच्छा होने के बाद उन्हें पता चला कि यह सिर्फ ब्राह्मणों के लिए था। ब्राह्मण नहीं होने के कारण उन्हे इस बात का बहुत दुःख हुआ और उन्होने हिन्दुत्व के विरोध की ठान ली। इसके लिए उन्होने किसी और धर्म को नहीं स्वीकारा और वे हमेशा नास्तिक रहे। इसके बाद उन्होने एक मन्दिर के न्यासी का पदभार संभाला तथा जल्द ही वे अपने शहर के नगरपालिका के प्रमुख बन गए। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के अनुरोध पर १९१९ में उन्होने कांग्रेस की सदस्यता ली। इसके कुछ दिनों के भीतर ही वे तमिलनाडु इकाई के प्रमुख भी बन गए। केरल के कांग्रेस नेताओं के निवेदन पर उन्होने वाईकॉम आन्दोलन का नेतृत्व भी स्वीकार किया जो मन्दिरों कि ओर जाने वाली सड़कों पर बहुजनों के चलने की मनाही को हटाने के लिए संघर्षरत था। उनकी पत्नी तथा दोस्तों ने भी इस आंदोलन में उनका साथ दिया।

कांग्रेस का परित्याग

युवाओं के लिए कांग्रेस द्वारा संचालित प्रशिक्षण शिविर में एक ब्राह्मण प्रशिक्षक द्वारा गैर-ब्राह्मण छात्रों के प्रति भेदभाव बरतते देख उनके मन में कांग्रेस के प्रति विरक्ति आ गई। उन्होने कांग्रेस के नेताओं के समक्ष बहुजनों तथा पीड़ितों के लिए आरक्षण का प्रस्ताव भा रखा जिसे मंजूरी नहीं मिल सकी। अंततः उन्होने कांग्रेस छोड़ दिया। बहुजनों के समर्थन में १९२५ में उन्होने एक आंदोलन भी चलाया। सोवियत रूस के दौरे पर जाने पर उन्हें साम्यवाद की सफलता ने बहुत प्रभावित किया। वापस आकर उन्होने आर्थिक नीति को साम्यवादी बनाने की घोषणा की। पर बाद में अपना विचार बदल लिया।

फिर इन्होने जस्टिस पार्टी, जिसकी स्थापना कुछ गैर ब्राह्मणों ने की थी, का नेतृत्व संभाला। १९४४ में जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर द्रविदर कड़गम कर दिया गया। स्वतंत्रता के बाद उन्होने अपने से कोई २० साल छोटी स्त्री से शादी की जिससे उनके समर्थकों में दरार आ गई और इसके फलस्वरूप डी एम के (द्रविड़ मुनेत्र कळगम) पार्टी का उदय हुआ। १९३७ में राजाजी द्वारा तमिलनाडु में आरोपित हिन्दी के अनिवार्य शिक्षण का उन्होने घोर विरोध किया और बहुत लोकप्रिय हुए। उन्होने अपने को सत्ता की राजनीति से अलग रखा तथा आजीवन बहुजनों तथा स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए प्रयास किया।

http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B0

 

पेरियार की दृष्टि में रामकथा

पेरियार ने लोगों की अंध भक्ति दूर करने के लिए किताब लिखी -‘सच्ची रामायाण,  जिसे १४ सितम्बर १९९९ को महज इस वजह से इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अस्थायी तौर पर प्रतिबंधित कर दिया था क्योंकि वह अधिकतर अन्य रामायणों की तरह राम के विश्ववन्द्य स्वरूप को ज्यों का त्यों प्रस्तुत नहीं करती।

इस रामायण के मूल लेखक हैं ई. वी. रामास्वामी पेरियार जो १८७९ में जन्मे और १९७३ तक जीवित रहे। वह एक सक्रिय स्वाधीनता सेनानी, कट्टर नास्तिक, प्रखर समाजवादी चिन्तक, नशाबन्दी के घनघोर समर्थक और क्रांतिकारी समाज सुधारक थे। उन्होंने, अस्पृश्यता, जमींदारी, सूदखोरी, स्त्रियों के साथ भेदभाव तथा हिन्दी भाषा के साम्राज्यवादी फैलाव के विरुद्ध आजीवन पूरे दमखम के साथ संघर्ष किया। कांग्रेस के राष्ट्रीयतावाद को वह मान्यता नहीं देते थे तथा गांधी जी के सिद्धांतों को प्रच्छन्न ब्राह्मणवाद बताते हुए उनकी तीखी आलोचना करते थे। वह द्रविड़ों के अविवाद्य रहनुमा तो थे ही दक्षिण में तर्क बुद्धिवाद के अनन्य प्रचारक व प्रसारक भी थे। संक्षेप में यदि उन्हें दक्षिण का अम्बेडकर कहा जाय तो शायद ही किसी को कोई आपत्ति हो। १९२५ में उन्होंने ‘कुडियारासु` (गणराज्य) नामक एक समाचार पत्र तमिल में निकालना शुरू किया। १९२६ में ‘सैल्फ रेस्पेक्ट लीग` की स्थापना की और १९३८ में जस्टिस पार्टी को पुनर्जीवित किया। १९४१ में ‘द्रविडार कषगम` के झण्डे तले उन्होंने सारी ब्राह्मणेत्तर पार्टियों को इकट्ठा किया और मृत्युपर्यन्त समाजसुधार के कार्यों में पूरी निष्ठा के साथ जुटे रहे।

लगभग ५० साल पहले उन्होंने तमिल में एक पुस्तक लिखी जिसमें वाल्मीकि द्वारा प्रणीत एवं उत्तर भारत में विशेष रूप से लोकप्रिय रामायण की इस आधार पर कटु आलोचना की कि इसमें उत्तर भारत आर्य जातियों को अत्यधिक महत्व दिया गया है और दक्षिण भारतीय द्रविड़ों को क्रूर, हिंसक, अत्याचारी जैसे विशेषण लगाकर न केवल अपमानित किया गया है बल्कि राम-रावण कलह को केन्द्र बनाकर राम की रावण पर विजय को दैवी शक्ति की आसुरी शक्ति पर, सत्य की असत्य पर और अच्छाई की बुराई पर विजय के रूप में गौरवान्वित किया गया है। इसका अंग्रजी अनुवाद ‘द रामायण : ए ट्रू रीडिंग` के नाम से सन् १९६९ में किया गया। इस अंग्रेजी अनुवाद का हिन्दी में रूपान्तरण १९७८ में ‘रामायण : एक अध्ययन` के नाम से किया। उल्लेखनीय है कि ये तीनों ही संस्करण काफी लोकप्रिय हुए। क्योंकि इसके माध्यम से पाठक अपने आदर्श नायक-नायिकाओं के उन पहलुओं से अवगत हुए जो अब तक उनके लिये वर्जित एवं अज्ञात बने हुए थे। ध्यान देने योग्य तथ्य यह सामने आया कि इनकी मानवोचित कमजोरियों के प्रकटीकरण ने लोगों में किसी तरह का विक्षोभ या आक्रोश पैदा नहीं किया बल्कि इन्हें अपने जैसा पाकर इनके प्रति उनकी आत्मीयता बढ़ी और अन्याय, उत्पीड़न ग्रस्त पात्रों के प्रति सहानुभूति पैदा हुई।

लेकिन जो लोग धर्म को व्यवसाय बना राम कथा को बेचकर अपना पेट पाल रहे थे, उनके लिये यह पुस्तक आंख की किरकिरी बन गई। क्योंकि राम को अवतार बनाकर ही वे उनके चमत्कारों को मनोग्राह्य और कार्यों को श्रद्धास्पद बनाये रख सकते थे। यदि राम सामान्य मनुष्य बन जाते हैं और लोगों को कष्टों से मुक्त करने की क्षमता खो देते हैं तो उनकी कथा भला कौन सुनेगा और कैसे उनकी व उन जैसों की आजीविका चलेगी। इसीलिये प्रचारित यह किया गया कि इससे सारी दुनिया में बसे करोड़ो राम भक्तों की भावनाओं के आहत होने का खतरा पैदा हो गया है। इसलिए इस पर पाबन्दी लगाया जाना जरूरी है। और पाबन्दी लगा भी दी गई। लेकिन उसी न्यायालय ने बाद में अस्थायी प्रतिबंध को हटा दिया और अपने फैसले में स्पष्ट कहा-‘हमें यह मानना संभव नहीं लग रहा है कि इसमें लिखी बातें आर्य लोगों के धर्म को अथवा धार्मिक विश्वासों को चोट पहुंचायेंगी। ध्यान देने लायक तथ्य यह है कि मूल पुस्तक तमिल में लिखी गई थी और इसका स्पष्ट उद्देश्य तमिल भाषी द्रविड़ों को यह बताना था कि रामायण में उत्तर भारत के आर्य-राम, सीता, लक्ष्मण आदि का उदात्त चरित्र और दक्षिण भारत के द्रविड़-रावण, कुंभकरण, शूर्पणखा आदि का घृणित चरित्र दिखला कर तमिलों का अपमान किया गया है। उनके आचरणों, रीति रिवाजों को निन्दनीय दिखलाया गया है। लेखक का उद्देश्य जानबूझकर हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के बजाय अपनी जाति के साथ हुए अन्याय को दिखलाना भी तो हो सकता है। निश्चय ही ऐसा करना असंवैधानिक नहीं माना जा सकता। ऐसा करके उसने उसी तरह अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का उपयोग किया है जैसे रामकथा प्रेमी आर्यों को श्रेष्ठ बताकर करते आ रहे हैं। इस तरह तो कल बहुजनों का वह सारा साहित्य भी प्रतिबंधित हो सकता है जो बहुजनों के प्रति हुए अमानवीय व्यवहार के लिये खुल्लम-खुल्ला सवर्ण लोगों को कठघरे में खड़ा करता है।`
पेरियार की इस पुस्तक को तमिल में छपे लगभग ५० साल और हिन्दी, अंग्रेजी में छपे लगभग तीन दशक हो चले हैं। अब तक इसके पढ़ने से कहीं कोई हिंसक प्रतिक्रिया नहीं दर्ज है। फिर अब ऐसी कौन सी नई परिस्थितियां पैदा हो गई हैं कि इससे हिन्दू समाज खतरा महसूस करने लगा है? यह कैसे हो सकता है कि संविधान लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार तो दे परन्तु धर्म के बारे में कुछ भी पढ़ने व जानने के अधिकार पर अंकुश लगा दे। यह कैसे न्यायसंगत हो सकता है कि लोग रामायण, महाभारत, गीता आदि धार्मिक ग्रन्थों को तो पढ़ते रहें पर उनकी आलोचनाओं को पढ़ने से उन्हें रोक दिया जाय। जहां तक जनभावनाओं का सवाल है इसका इकरतफा पक्ष नहीं हो सकता। यदि राम और सीता की आलोचना से लोगों को चोट लगती है तो शूद्रों, बहुजनों व स्त्रियों के बारे में जो कुछ हिन्दू धर्म ग्रन्थों में लिखा गया है क्या उससे वे आहत नहीं होते? यह बात भी विचारणीय है।
वस्तुत: पेरियार की ‘सच्ची रामायण` ऐसी अकेली रामायण नहीं है जो लोक प्रचलित मिथकों को चुनौती देती है और रावण के बहाने द्रविड़ों के प्रति किये गये अन्याय का पर्दाफाश कर उनके साथ मानवोचित न्यायपूर्ण व्यवहार करने की मांग करती है। दक्षिण से ही एक और रामायण अगस्त २००४ में आई है जो उसकी अन्तर्वस्तु का समाजशास्त्रियों विश्लेषण करती है और पूरी विश्वासोत्पादक तार्किकता के साथ प्रमाणित करती है कि राम में और अन्य राजाओं में चरित्रिक दृष्टि से कहीं कोई फर्क नहीं है। वह भी अन्य राजाओं की तरह प्रजाशोषक, साम्राज्य विस्तारक और स्वार्थ सिद्धि हेतु कुछ भी कर गुजरने के लिये सदा तत्पर दिखाई देते हैं। परन्तु यहां हम पेरियार की नजरों से ही बाल्मीकि की रामायण को देखने की कोशिश करते हैं।
वाल्मीकि रामायण में अनेक प्रसंग ऐसे हैं जो तर्क की कसौटी पर तो खरे उतरते ही नहीं। जैसे वह कहती है कि दशरथ ६० हजार बरस तक जीवित रह चुकने पर भी कामवासना से मुक्त नहीं हो पाये। इसी तरह वह यह भी प्रकट करती है कि उनकी केवल तीन ही पत्नियां नहीं थी। इन उद्धरणों के जरिये पेरियार दशरथ के कामुक चरित्र पर से तो पर्दा उठाते ही हैं यह भी साबित करते हैं कि उस जमाने में स्त्रियों केवल भोग्या थीं। समाज में इससे अधिक उनका कोई महत्व नहीं था। दशरथ को अपनी किसी ी़ से प्रेम नहीं था। क्योंकि यदि होता तो अन्य स्त्रियों की उन्हें आवश्यकता ही नहीं होती। सच्चाई यह भी है कि कैकेयी से उनका विवाह ही इस शर्त पर हुआ था कि उससे पैदा होने वाला पुत्र उनका उत्तराधिकारी होगा। इस शर्त को नजरन्दाज करते हुए जब उन्होंने राम को राजपाट देना चाहा तो वह उनका गलत निर्णय था। राम को भी पता था कि असली राजगद्दी का हकदार भरत है, वह नहीं। यह जानते हुए भी वह राजा बनने को तैयार हो जाते हैं। पेरियार के मतानुसार यह उनके राज्यलोलुप होने का प्रमाण है।

कैकेयी जब अपनी शर्तें याद दिलाती है और राम को वन भेजने की जिद पर अड़ जाती है तो दशरथ उसे मनाने के लिये कहते हैं-‘मैं तुम्हारे पैर पकड़ लेने को तैयार हूं यदि तुम राम को वन भेजने की जिद को छोड़ दो।` पेरियार एक राजा के इस तरह के व्यवहार को बहुत निम्नकोटि का करार देते हैं और उन पर वचन भंग करने तथा राम के प्रति अन्धा मोह रखने का आरोप लगाते हैं।

राम के बारे में पेरियार का मत है कि वाल्मीकि के राम विचार और कर्म से धूर्त थे। झूठ, कृतघ्नता, दिखावटीपन, चालाकी, कठोरता, लोलुपता, निर्दोष लोगों को सताना और कुसंगति जैसे अवगुण उनमें कूट-कूट कर भरे थे। पेरियार कहते हैं कि जब राम ऐसे ही थे और रावण भी ऐसा ही था तो फिर राम अच्छे और रावण बुरा कैसे हो गया?
उनका मत है कि चालाक ब्राह्मणों ने इस तरह के गैर ईमानदार, निर्वीर्य, अयोग्य और चरित्रहीन व्यक्ति को देवता बना दिया और अब वे हमसे अपेक्षा करते हैं कि हम उनकी पूजा करें। जबकि बाल्मीकि स्वयं मानते हैं कि राम न तो कोई देवता थे और न उनमें कोई दैवी विशेषताएं थी। लेकिन रामायण तो आरम्भ ही इस प्रसंग से होती है कि राम में विष्णु के अंश विद्यमान थे। उनके अनेक कृत्य अतिमानवीय हैं। जैसे उनका लोगों को शापमुक्त करना, जगह-जगह दैवी शक्तियों से संवाद करना आदि। क्या ये काम उनके अतिमानवीय गुणों से संपन्न होने को नहीं दर्शाते?

उचित प्यार और सम्मान न मिलने के कारण सुमित्रा और कौशल्या दशरथ की देखभाल पर विशेष ध्यान नहीं देतीं थी। बाल्मीकि रामायण के अनुसार जब दशरथ की मृत्यु हुई तब भी वे सो रही थीं और विलाप करती दासियों ने जब उन्हें यह दुखद खबर दी तब भी वे बड़े आराम से उठकर खड़ी हुई। इस प्रसंग को लेकर पेरियार की टिप्पणी है-‘इन आर्य महिलाओं को देखिये! अपने पति की देखभाल के प्रति भी वे कितनी लापरवाह थी।` फिर वे इस लापरवाही के औचित्य पर भी प्रकाश डालते हैं।

पेरियार राम में तो इतनी कमियां निकालते हैं किन्तु रावण को वे सर्वथा दोषमुक्त मानते हैं। वे कहते हैं कि स्वयं बाल्मीकि रावण की प्रशंसा करते हैं और उनमें दस गुणों का होना स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार रावण महापंडित, महायोद्धा, सुन्दर, दयालु, तपस्वी और उदार हृदय जैसे गुणों से विभूषित था। जब हम बाल्मीकि के कथनानुसार राम को पुरुषोत्तम मानते हैं तो उसके द्वारा दर्शाये इन गुणों से संपन्न रावण को उत्तम पुरुष क्यों नहीं मान सकते? सीताहरण के लिए रावण को दोषी ठहराया जाता है लेकिन पेरियार कहते हैं कि वह सीता को जबर्दस्ती उठाकर नहीं ले गया था बल्कि सीता स्वेच्छा से उसके साथ गई थी। इससे भी आगे पेरियार यह तक कहते हैं कि सीता अन्य व्यक्ति के साथ इसलिये चली गई थी क्योंकि उसकी प्रकृति ही चंचल थी और उसके पुत्र लव और कुश रावण के संसर्ग से ही उत्पन्न हुए थे। सीता की प्रशंसा में पेरियार एक शब्द तक नहीं कहते।

अपनी इस स्थापना को पुष्ट करने के लिये वह दस तर्क और प्रमाण देते हैं उनको यहाँ प्रकाशित नहीं करना चाहते, आप जानना चाहे तो कृपया चर्चित आलोचक सुरेश पंडित के इस लेख को निम्न लिंक पर पूरा पढ़ें

http://janvikalp.blogspot.in/2007/10/blog-post_6752.html

रामास्वामी-पेरियार-जी-के वचन 

THUS SPOKE, PERIYAR E.V.R. ::–>> ” जातिवाद क्या है ?? ” ::– पेरियार इ.वी. रामासामी (कोइन्म्ब्तूर में सन 1958 को पेरियार दुयारा दिया गये भाषण के कुछ अंश )

” मैं क्या हूँ ?? ( What I am ??)

” पहला ::– मुझे ईशवर तथा दुसरे देवी-देवताओं में कोई आस्था नहीं है / ”

“दूसरा ::– दुनियां के सभी संगठित धर्मो से मुझे सख्त नफरत है /”

“तीसरा ::– शास्त्र, पुराण और उनमे दर्ज देवी-देव्त्ताओं में मेरी कोई आस्था नहीं है , क्योंकि बह सारे के सारे दोषी हैं और उनको जलाने तथा नष्ट करने के लिए मैं “जनता” से अप्पील करता हूँ /”

मैंने सब कुछ किया और मैंने गणेश आदि सभी ब्रह्मणि देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ डाली हैं और राम आदि के चित्र भी जला दिए हैं / मेरे इन कार्यों के बावजूद भी, मेरी सभायों में मेरे भाषण सुनने के लिए यदि हजारों की गिनती में लोग इकट्ठे होते हैं, तो यह बात सपष्ट है कि, ” स्वाभिमान तथा बुद्धि का अनुभव होना जनता में , जागृति का सन्देश है /”

‘द्रविड़ कड़गम आन्दोलन’ का क्या मतलब है ?? इसका केवल एक ही निशाना है कि, इस नक्क्मी आर्य ब्राह्मणवादी और वर्ण व्यवस्था का अंत कर देना, जिस के कारन समाज उंच और नीच जातियों में बांटा गया है / इस तरह ‘द्रविड़ कड़गम आन्दोलन’ , ” उन सभी शास्त्रों, पुराणों और देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखता, जो वर्ण तथा जाति व्यवस्था को जैसे का तैसा बनाये रखे हुए हैं /”

राजनितिक आज़ादी प्राप्ति के बाद सन 1958 ( लगभग 10 बर्षों के बाद भी ) तक्क भी वर्ण व्यवस्था और जातिगत भेद-भाव की निति ने जनता के जीवन के ऊपर अपना वर्चस्व बनाये रखने के कारन, देश में पिछड़ेपण को साबित कर दिया है / अर्थात , आर्य ब्रह्मण सरकार ने, इन 10 बर्षों तक्क भी वर्ण और जाति व्यवस्था को ख़त्म करने का कोई भी यत्न नहीं किया है / किसी और मुल्क में इस तरह के जाति के भेदभाव के कारण बहाँ की जनता हजारों की संख्या में बांटी हुयी नहीं है / हैरानी की बात यह है कि, समझदार लोग भी इस तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं / अपनी ही लालसावादी स्वारथ का दौर इस देश के नेताओं में है / कुछ लोग राष्ट्रीयता तथा राजनितिक पार्टी के आधार पर ( कांग्रेस की और इशारा करते हुए ) अपने आपको समाज-सेवी कहलाते हैं, वे भारत की असली समस्याओं के तरफ थोडा सा भी ध्यान नहीं देते / जिस करके देशवासी पछडे हालातों में से गुजर रहे हैं / राजनितिक आज़ादी प्राप्त करने से बाद दुसरे देशों के लोगों ने , राष्ट्रीय विकास और सामाजिक सुधारों में बड़े पैमाने पर तरक्की की है //

आज से 2000 वर्ष पूर्व, तथागत बुद्ध ने हिन्दू धर्म के जहरीले अंगों से छुटकारा पाने के लिए जनता के दिलो-दिमाग को आज़ाद करने का यत्न किया था / बुद्ध ने जनता को , क्यों, कैसे तथा कौन से प्रशन किये और बस्तु / चीज के यथार्थ गुण तथा सवभाव के समीक्षा की / उन्होंने ने ब्राह्मणों के, वेदों को फिजूल बताया , उन्होंने किसी भी बस्तु से किसी भी ऋषि और महात्मा का अधिकार सवीकार नहीं किया / उन्होंने लोगों को अपनी भाषा में आत्म-चिंतन करने का और जीवन के साधारण सच्च को समझने का उपदेश दिया / इसका नतीजा क्या निकला ? ऐसे उपदेशकों को मौत के घाट उतारा गिया / उनके घर-बार जला दिए गए / उनकी औरतों का अपमान किया गया / बुद्ध धर्म के भारत में से अलोप हो जाने के बाद तर्कवाद समापित हो गया / बुद्ध की जन्म-भूमि से बुद्ध का प्रचार – प्रसार ना हो सका / बह चीन और जापान में चला गया / यहाँ उसने इन देशों को दुनियां के महान देशों की लाइन में खड़ा कर दिया / राष्रीय चरित्र, अनुशासन, शुद्धता, ईमानदारी और महिमानवाजी में कौनसा मुल्क जापान की बराबरी कर सकता है ??

इश्वर कैसे तथा क्यों जन्म-मरन करता है ? सभी देवी-देवताओं को देखो, राम का जन्म ‘नौवीं तिथि ‘ को हुआ, सुभ्रामानिया का जन्म ‘छेवीं तिथि’ को हुआ, कृष्ण का जन्म ‘अष्टमी तिथि’ को हुआ, और पुराणों के अनुसार इन सभी देवताओं की म्रत्यु भी हुई / क्या इस कथन के बाद भी हम उनकी पूजा देवते समझ कर करते रहें ?? ईशवर की पूजा क्यों करनी चाहिए ? ईशवर को भोग लगाने का क्या मतलव है ? रोजाना उसको नए कपडे पहना कर हार-शिंगार किया जाता है, क्यों ? यहाँ तक कि, मनुष्यों दुयारा ही, देवियों को नंगा करके स्नान करवाया जाता है ? इस अशलीलताके कारण ना तो उन देवियों को और ना ही उनके भक्तों को कभी क्रोध आता है, क्यों ? देवताओं को स्त्रियों कि क्या जरूरत है ? अक्सर वे एक औरत से सन्तुष नहीं होते / कभी कभी तो उनको एक एक रखैल यां वैश्य की जरूरत होती है / तिरुपति के देवता, मुस्लिम वैश्य के कोठे पर जाने की इच्छा करते हैं , और क्यों प्रतेक बर्ष यह देवता विवाह करवाते हैं ?? पिछले बर्ष के विवाह का क्या नतीजा है ? उसका कब तलाक हुआ ? किस अदालत ने उनके इस छोड़ने – छुड़ाने की मंजूरी दी है ? क्या इन सभी देवी-देवताओं के खिलवाड़ ने हमारी जनता को ज्यादा अकल्मन्द (समझदार), ज्यादा पवित्र और बड़ी सत्र पर एकता में नहीं बाँधा है ?

ईसाई, मुस्लिम और बुद्ध धर्म के संस्थापक दया भावना, करुणा, सज्जनता और भला करने वाले अवतार माने जाते हैं / ईसाई और बुद्ध धर्म के मूर्ति पूजा इन गुणों को दर्शाती है /

ब्राह्मण देवी-देवताओं को देखो, एक देवता तो हाथ में ‘भाला’ / त्रिशूल उठाकर खड़ा है , और दूसरा धनुष वाण , अन्य दुसरे देवी-देवते कोई गुर्ज , खंजर और ढाल के साथ सुशोभित हैं, यह सब क्यों है ? एक देवता तो हमेशा अपनी ऊँगली के ऊपर चारों तरफ चक्कर चलाता रहता है, यह किस को मारने के लिए है ?

यदि प्रेम तथा अनुग्रह आदमी के दिलो-दिमाग के ऊपर विजय प्राप्त कर लें तो, इन हिंसक अस्त्र -शास्त्र की क्या जरूरत है ? दुनियां के दुसरे धर्म उपदेशकों के पास कभी भी कोई हथियार नहीं मिलेगा / क्योंकि वो , शान्ति, अमन समानता तथा न्याय के पोषक हैं / जबकि आर्य-ब्राहमण धर्म सीधे तौर पर असमानता, अ-न्याय तथा हिंसा आदि का प्रवर्तक है / यही कारण है कि शान्ति, अमन तथा न्याय की बात करने वाले लोगों को डराने के लिए, आर्यों ब्राह्मणों ने अपने देवताओं के हाथों में हिंसक हथियार दिए हुए हैं / सपष्ट तौर पर हमारे ये देवी- देवता, बुराई करने वालों पर विजय प्राप्त करने के लिए इनको हिंसक शास्त्रों का इस्तेमाल करते हैं / क्या इसमें कोई कामयावी मिली है ?

हम आज कल के समय में रह रहे हैं / क्या यह वर्तमान समय इन देवी-देवताओं के लिए सही नहीं है ? क्या वे अपने आप को आधुनिक हथियारों से लैस करने और धनुषवान के स्थान पर , मशीन, यां बन्दूक धारण क्यों नहीं करते ? रथ को छोड़कर क्या श्री कृष्ण टैंक के ऊपर सवार नहीं हो सकते ? मैं पूछता हूँ कि, जनता इस परमाणु युग में इन देवी-देवताओं के ऊपर विश्वास करते हुए क्यों नहीं शर्माती ??

http://jaisudhir.blogspot.in/2012/01/blog-post.html

*ब्राहमण आपको भगवान के नाम पर मुर्ख बनाकर अंधविश्वास में निष्ठा रखने के लिए तैयार करता है |ओर स्वयं आरामदायक जीवन जी रहा है, तथा तुम्हे अछूत कहकर निंदा करता है | देवता की प्रार्थना करने के लिए दलाली करता है | मै इस दलाली की निदा करता हू | ओर आपको भी सावधान करता हू की ऐसे ब्राहमणों का विस्वास मत करो |

*उन देवताओ को नष्ट कर दो जो तुम्हे शुद्र कहे , उन पुराणों ओर इतिहास को ध्वस्त कर दो , जो देवता को शक्ति प्रदान करते है | उस देवता कि पूजा करो जो वास्तव में दयालु भला ओर बौद्धगम्य है |

*ब्राहमणों के पैरों में क्यों गिरना ???? क्या ये मंदिर है ?? क्या ये त्यौहार है ..??? नही ,ये सब कुछ भी नही है | हमें बुद्धिमान व्यक्ति कि तरह व्यवहार करना चाहिए यही प्रार्थना का सार है |

* अगर देवता ही हमें निम्न जाति बनाने का मूल कारन है तों ऐसे देवता को नष्ट कर दो , अगर धर्म है तों इसे मत मानो ,अगर मनुस्मृति , गीता, या अन्य कोई पुराण आदि है तों इसको जलाकर राख कर दो | अगर ये मंदिर , तालाब, या त्यौहार है तों इनका बहिस्कार कर दो | अंत में हमारी राजनीती ऐसी करती है तों इसका खुले रूप में पर्दाफास करो |

*संसार का अवलोकन करने पर पता चलता है की भारत जितने धर्म ओर मत मतान्तर कही भी नही है |ओर यही नही , बल्कि इतने धर्मांतरण (धर्म परिवर्तन ) दूसरी जगह कही भी नही हुए है ..?? इसका मूल कारण भारतीयों का निरक्षर ओर गुलामी प्रवृति के कारन उनका धार्मिक शोसन करना आसान है |

*आर्यो ने हमारे ऊपर अपना धर्म थोपकर ,असंगत,निर्थक ओर अविश्नीय बातों में हमें फांसा| अब हमें इन्हें छोड़कर ऐसा धर्म ग्रहण कर लेना चाहिए जो मानवता की भलाई में सहायक सिद्ध हो |

*ब्राहमणों ने हमें शास्त्रों ओर पुराणों की सहायता से गुलाम बनाया है |ओर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए मंदिर , ईश्वर,ओर देवि -देवताओं की रचना की |

* सभी मनुष्य समान रूप से पैदा हुए है , तों फिर अकेले ब्रहमान उंच व् अन्यों को नीच कैसे ठहराया जा सकता है |

* संसार के सभी धर्म अच्छे समाज की रचना के लिए बताए जाते है , परन्तु हिंदू -आर्य , वैदिक धर्म में हम यह अंतर पाते है कि यह धर्म एकता ओर मैत्री के लिए नही है |

* ऊँची – ऊँची लात किसने बनाई ?? मंदिर किसने बनाए ओर उसकी चोटी पर सुनहरी परत किसने चढाई ?? क्या ब्राहमणों ने इन मंदिरों , तालाबो या अन्य परोपकारी संस्थाओं के लिए एक रुपया भी दान दिया ????

*ब्राहमणों ने अपना पेट भरने हेतु अस्तित्व , गुण ,कार्य, ज्ञान,ओर शक्ति के बिना ही देवताओं की रचना करके ओर स्वयभू **भुदेवता **बनकर हंसी मजाक का विषय बना दिया है |

*सभी मानव एक है हमें भेदभाव रहित समाज चाहिए , हम किसी को प्रचलित सामाजिक भेदभाव के कारन अलग नही कर सकते |

* हमारे देश को आजादी तभी मिल गई समझाना चाहिए जब ग्रामीण लोग, देवता ,अधर्म , जाति ओर अंधविस्वास से छुटकारा पा जायेंगे |

* आज विदेशी लोग दूसरे ग्रहों पर सन्देश ओर अंतरिक्ष यान भेज रहे है ओर हम ब्राहमणों के द्वारा श्राद्धो में परलोक में बसे अपने पूर्वजो को चावल ओर खीर भेज रहे है | क्या ये बुद्धिमानी है ???

* ब्राहमणों से मेरी यह विनती है कि अगर आप हमारे साथ मिलकर नही रहना चाहते तों आप भले ही जहन्नुम में जाए| कम से कम हमारी एकता के रास्ते में मुसीबते खड़ी करने से तों दूर जाओ | . * ब्राहमण सदैव ही उच्च एवं श्रेष्ट बने रहने का दावा कैसे कर सकता है ?? समय बदल गया है उन्हें निचे आना होगा , तभी वे आदर से रह पायेंगे नही तों एक दिन उन्हें बलपूर्वक ओर देशाचार के अनुसार ठीक होना होगा |

जो भी अपने शोषण का सही कारन जान जाता है पर डॉ आंबेडकर और गौतम बुद्ध को नहीं जान पता, वो अपनी बुद्धि और ज्ञान के अनुसार ‘ब्राह्मणवादी धर्म’ कोछोड़कर किसी और धर्म में चला जाता है जहाँ उसे इंसान के बराबर दर्जा मिले| ईसाइयत और इस्लाम में तो 80 से 90% तक मूलनिवासी ही हैं पर एक उदाहरण है जिसमे बिहार के मूलनिवासी शेडूल कास्ट सिख धर्म अपनाकर मुक्ति पायी| (दलितों ने बिहार में बनाया ‘मिनी पंजाब’…BBC HINDI)

 

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बिहार की राजधानी पटना से क़रीब 300 किलोमीटर दूर बसे हैं दलितों के कुछ ऐसे गांव जहाँ पंच ककार यानी केश, कृपाण, कंघा, कड़ा और कच्छा का पूरा पालन होता है. यही नहीं यहाँ एक गुरुद्वारा भी है.

ज़िले के ख़ास हलहलिया, नयानगर, ख़वासपुर, परमानन्दपुर, माणिकपुर और मजलत्ता गाँव में लगभग 200 ऐसे दलित महिला-पुरुष हैं, जिन्होंने सिख धर्म को अपना लिया है.

ये सभी ब्राह्मणवादी व्यस्था के अनुसार मांझी समुदाय से थे .

ख़ास हलहलिया गाँव में पहले फूस के श्रीअकाल तख़्त साहब गुरुद्वारा को दिसंबर, 1985 में पक्का बना दिया गया.

इस सबकी शुरुआत नरेंद्र सिंह ज्ञानी ने की थी. वो क़रीब 10 साल तक रोज़ी-रोटी के लिये पंजाब में रहे थे, ग़रीबी और बिहार में जातीय भेदभाव से पीछा छुड़ाने के लिए इन्होंने ख़ालसा पंथ अपना लिया था.

विरोध

बाद में जब वो गाँव लौटे तो लोगों को अपने नए धर्म के प्रवचन और सत्संग सुनाए.

और लोगों में इसका प्रभाव बढ़ा वो उनके साथ होते गए.

और अस्सी के दशक में जिस बदलाव की गांव में शुरूआत हुई थी अब उसकी तीसरी पीढ़ी तैयार हो गई है.

पंजाब के कटाना साहब, खन्ना में क़रीब तीन साल काम कर चुके 35 साल के सरदार प्रमोद सिंह बताते हैं कि यह महादलितों का गाँव है.

यहां के गुरूद्वारे में ग्रंथी का काम वीरेन्द्र सिंह ज्ञानी कर रहे हैं. और हर रोज़ पांच वाणियों का जाप होता है.

लेकिन, ‘बदलाव’ की शुरुआत इतनी सहज नहीं थी और स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया था.

बराबरी का दर्जा

रूप सिंह कहते हैं, ”लोग कहते थे चाकू धारण कर आ गया है और ये सब वहां नहीं चलेगा. लेकिन, अब मामला ठीक है.”

हम हर साल गुरुनानक देव और गुरु गोविंद सिंह की जयंती और बैशाखी धूमधाम से मनाते हैं.

सरदार संजय सिंह के मुताबिक़ सिख धर्म बराबरी का दर्जा देता है.

संजय सिंह कहते हैं, “लंगर में एक साथ सब खाते हैं. ऊँच-नीच वाली बात इसमें नहीं है, इसलिए उन्होंने इस मत को अपनाया है.”

Source: http://www.bbc.com/hindi/india/2015/09/150914_bihar_mini_punjab_du?ocid=socialflow_facebook

 

कमाल की बात है की कम पढ़े लिखे लोग भी समझ रहे हैं की उनके शोषण का कारन /ब्राह्मणवाद  है पर हमारे समाज के पढ़े लिखे लोग अपने आप को हिन्दू साबित करने के लिए अपनी मेहनत की कमाई और समय बर्बाद कर रहे हैं|अगर मन्दिरबाजी नहीं करते तो सत्संग में बाबाबाजी करते हैं, मानते नहीं| सदियाँ बीत गयीं हैं पर गुलामी जाती नहीं

बौद्ध देश जापान के कोयासान विश्वविद्यालय परिसर में बाबासाहब डॉ आंबेडकर की प्रतिमा का अनावरण, धीरे धीरे बौद्ध देश समझने लगे हैं की असल बौद्ध कौन हैं और उनके चंदे पे पलने वाले बौद्ध संस्थाओं के कब्जेदार कौन हैं|…team SBMT

Dr Ambedkar Statue in JAPAN2Fadnavis unveils Dr Ambedkar statue at Japan varsity

जापान के कोयासान विश्वविद्यालय परिसर मै बाबासाहब के स्टेचू का अनावरण
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विश्वरत्न डॉ बाबासाहब अम्बेडकर इनके पूर्णाकृति स्टेच्यू का आज जापान के वाकायामा प्रांत के कोयसान विश्वविद्यालय में  अनावरण किया गया, बाबासाहब के ब्रॉन्ज़ से बनी ये प्रतिमा महाराष्ट्र के रत्नागिरी के कुडाल मै बनाई गई है |

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस एवं वाकायामा प्रांत के गवर्नर शिनाबु निसाका इनके द्वारा इस प्रतिमा का लोकार्पण किया गया ..

जापान के कोयासान इस क्षेत्र मै जो कोयासान टेम्पल है, उसे 1200 साल पुरे हुए है, इस उपलक्ष मैं कोयासान विश्वविद्यालय द्वारा भारत और जापान में  सांस्कृतिक विरासत को साझा करनेका निर्णय किया गया..कोयासान विश्वविद्यालय की रिसर्च टीम ने भारत मैं बाबासाहब की धम्मक्रांति को सबसे श्रेष्ठ माना, जिसके बाद तत्कालिन महाराष्ट्र सरकार से संपर्क किया गया
जिसके तहत महाराष्ट्र सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा बाबासाहब के स्टेच्यू को कोयासान मैं स्थापित करना और जापान द्वारा अजन्ता ऐलोरा केव्स का विकास ऐसा समझौता हुआ |

बाबासाहब द्वारा की गई धम्मक्रांति को कोयासान विश्वविद्यालय ने काफी अहम् माना इसलिए बोधिसत्व बाबासाहब अम्बेडकर की 125 वी जयंती के अवसर पर इस स्टेच्यु का निर्माण करनेका और लोकार्पण करनेका फैसला हुआ

यह समारोह मई मैं आयोजित किया गया था, लेकिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस इन्होंने ऐन वक़्त पर रद्द किया, उसके बाद आख़िरकार 10 सितम्बर को इसका अनावरण हुआ ~

यह प्रतिमा यह स्थापित करने का सिलसिला एवं प्रोग्राम का आयोजन करने मै डॉ अम्बेडकर इंटरनेशनल मिशन के डॉ सुशांत गोडघाटे की काफी सक्रिय भूमिका रही..इस समय महाराष्ट्र के उद्योगमंत्री सुभाष देसाई, आवाज़ इंडिया टीवी चैनल के संचालक अमन काम्बले, कोलकाता के बिमल क्रिष्णा दास, इंजीनियर विजय मेश्राम, पी एस खोब्रागड़े, हेमंत सुटे, कल्पना सरोज,जर्मनी से आये हुए सोहनलाल सांपला, लंदन से आये हुए रामलाल राही, सूरज खापर्डे, भंते प्रशिल,शिरिश् रामटेके आदि प्रमुख्तासे उपस्थित थे

कोयासान विश्वविद्यालय से तकरीबन 1500 बुद्ध विहार जुड़े हुए है, यह सारे विहार शिक्षा का केंद्र है, कोयासान का यह सारा खूबसूरत परिसर पहाड़ी पर स्थापित है..👌चलो बुद्ध की और.👌जय भीम नमो बुद्धाय.

http://indianexpress.com/article/cities/mumbai/fadnavis-unveils-ambedkar-statue-at-japan-varsity/

”Dr B R Ambedkar’s struggle and principles for human dignity, social equality and justice is universal and relevant even in the modern age,” said Chief Minister Devendra Fadnavis after unveiling Dr Babasaheb Ambedkar’s statue at Koyasan University in Japan.
Japanese officials led by Wakayama Governor Yoshinobu Nisaka and others sported the traditional Maharashtrain-style saffron “pheta” on the occasion.

Fadnavis said the Maharashtra government had planned an Ambedkar memorial on 12.5 acres of Indu Mills land in Mumbai. Recently, the state government also purchased the house in London where Ambedkar stayed as a student while studying in London School of Economics during 1921-22, which would be developed as an international study centre and museum on Ambedkar’s life and teachings.

Nisaka said Koyasan, the ancient seat of Buddhist learning in Japan, was the ideal place to establish the memorial for Dr Ambedkar.

Meanwhile, Fadnavis on Thursday also travelled in a bullet train in Tokyo and discussed the operations of the high-speed trains with officials. The Vice Minister for International Affairs of MLIT (Minister of Land, Infrastructure and Transport) Toshiya Morishige
discussed the operations of bullet trains with Fadnavis.

मानववादी प्रश्नोत्तरी – I -महामना रामस्वरूप वर्मा

Ramswaroop_Vermaमानववादी प्रश्नोत्तरी – I -महामना रामस्वरूप वर्मा

प्रश्न- मानववाद क्या है ?
उत्तर-मानववाद वह विचारधारा है जो मानव मात्र के लिए समता, सुख और समृद्धि का मार्ग निरूपण करती है.
प्रश्न- मानव समता से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर- बोलने, चलने, उठने, बैठने, खान और पान में जो कोई जैसे व्यवहार दूसरों से अपने लिए चाहता है वैसा ही वह दूसरो के साथ खुद करे यही छ: मानव समताये हैं.
प्रश्न- ये छ: मानव समतायें क्यों आवश्यक हैं ?
उत्तर- हर मानव – मान सम्मान चाहता है और सम्मान एक मानव को दूसरे मानव से ही मिलता है. बोलने आदि की उक्त छ: क्रियाओ में कौन किसका सम्मान करता है, इसका पता चलता है. अत: हर मानव दूसरे मानव को सम्मान दे तभी हर मानव की सम्मान की भूख शांत होगी और मानव मन सुखी होगा. इसलिए सभी मानवों को मन का सुख देने के लिए उक्त छ: समतायें आवश्यक हैं.
प्रश्न- मानव तन की आवश्यकतायें क्या हैं?
उत्तर- शुद्ध हवा (प्राण वायु), शुद्ध पानी, पौष्टिक भोजन और अचोट- ये चार मानवतन की आवश्यकतायें हैं. इनके बिना तन ठीक नही रहकर नष्ट हो जायेगा.
प्रश्न- तन और मन क्या दोनों पदार्थ है ? यदि है तो कैसे ?
उत्तर- हर पदार्थ माप्य है अत: उसे रूपवान कहते है और हर पदार्थ गतिमान है अत: उसकी गतिमानता को गति कहते है. पदार्थ में ही गति होती है. बिना पदार्थ के गति संभव नहीं. जैसे जब तक तन ठीक है, मन है, तन ध्वस्त तो मन ध्वस्त.
प्रश्न- पदार्थ जड़ होता है या चैतन्य ?
उत्तर- सम्पूर्ण पदार्थ गतिशील होने के कारण चैतन्य है, कोई भी परमाणु गतिहीन नही अत: सम्पूर्ण पदार्थ चैतन्य हुआ.
प्रश्न- यदि सम्पूर्ण पदार्थ चैतन्य है तो लोग जड़ पदार्थ और चैतन्य पदार्थ का भेद क्यों करते हैं ?
उत्तर- पदार्थ के जड़ चैतन्य के भेद करना उचित नही है, क्योंकि गतिशील होने के कारण सम्पूर्ण पदार्थ चैतन्य ही है, पदार्थ का कोई रूप जड़ नही. वास्तव में पदार्थ के दो भेद हैं- एक जीव दूसरा अजीव.
प्रश्न- सृष्टि रचना व विनाश का कारण क्या है ?
उत्तर- पदार्थ का संघात – व्याघात का स्वभाव.
प्रश्न- जीव किसे कहते हैं ?
उत्तर- पदार्थ का वह रूप जो अपने अंदर उर्जा का उत्पादन, उत्पादित उर्जा के प्रयोग से आवश्यक अणुओं का उत्पादन और अपना प्रजनन कर सके, जीव है.
प्रश्न- क्या मानव भी एक जीव है?
उत्तर- हाँ.
प्रश्न – सहज बुद्धि और विवेक बुद्धि का अंतर सोदाहरण स्पष्ट करेँ ?
उत्तर- मानव के अतिरिक्त सभी चलने या रेंगने वाले प्राणी, जो उड़ नहीं सकते, गहरे पानी को आवश्यकता पड़ने पर तैर कर पर कर सकते हैं. यह तैरने का हुनर उन्हें सहज बुद्धि से प्राप्त है. मनुष्य को सोच विचार करने पर तैरना आता है यानी जब वो सोचता है कि पानी में उसके खड़े होने से पानी का वजन कम और उसका वजन ज्यादा होगा जिससे वह डूब जायेगा. इसलिए चित या पट लेटने पर ज्यादा पानी घेरने के कारण पानी का वजन अधिक और उसका कम होगा जिससे पानी में उतराने लगेगा. हाथ से पानी काटने पर गति आती है. यही तैरना कहा जाता है. मनुष्य इसे सहज रूप से नही कर सकता वरन सोचने समझने के बाद ही वह तैरने का कला सीख पाता है. सही और अच्छा क्या है और गलत और बुरा क्या है, मन की इस सोचने समझने की शक्ति का नाम विवेक बुद्धि है.
प्रश्न- आप के उदाहरण से स्पष्ट है कि मानव जानवर से बदतर है ?
उत्तर- जब विवेक बुद्धि का प्रयोग करता है तब तो जानवर से श्रेष्ठ होता है किन्तु जब उसका प्रयोग नही करता तब जानवर से बदतर होता है. किसी भी अवस्था में मनुष्य जानवर के समान नहीं होता क्योंकि यह विवेक बुद्धि का प्राणी है और सारे जीव सहज बुद्धि के प्राणी हैं.
प्रश्न – मानव की रक्षा और उन्नति के लिए सबसे आवश्यक क्या होता है ?
उत्तर- विवेक बुद्धि का इस हेतु प्रयोग.
प्रश्न- क्या मन से बुद्धि भिन्न होता है ?
उत्तर-मन की विभिन्न अवस्थाओं का नाम विभिन्न बुद्धियाँ है. विवेकबुद्धि , दुर्बुद्धि, पाप बुद्धि, चेतना आदि सब मन की विभिन्न अवस्थायें हैं. जैसे कि एक ही व्यक्ति वैज्ञानिक, चित्रकार, भारवाहक आदि होता है.
प्रश्न- सृष्टि और प्रलय क्या होता है ?
उत्तर- पदार्थ की गतिशीलता के कारण जब अन्तरिक्ष में पदार्थ फैलने लगता है तो सृष्टि होती है और पदार्थ के गुरुत्वाकर्षण के कारण जब अन्तरिक्ष में पदार्थ सिकुड़ने लगता है तो प्रलय होती है.
  1. Ramswaroop Verma
  2. Ramswaroop Verma, was in Uttar Pradesh, India. He was the founder of Arjak Sangh, a humanist organisation. The organization emphasizes social equality and is strongly opposed to Brahminism. Verma denied the existence of god and soul. Wikipedia
  3. Born: August 22, 1923, Uttar Pradesh
  4. Died: August 19, 1998, Lucknow