व्यंग कहानी “जंगल में चीटियों को गुलाम बनाने के विदेशी षडियंत्र”….. बोधिसत्व भाई एस० प्रेम अनार्ये


The-ant-and-the-grasshopperएक समय की बात है एक खूबसूरत जंगल था वहां की  चींटियां बहुत मेहनती थी और आजाद भी …..पूरा जंगल उन्ही का था उन्मुक्त होकर पूरे जंगल में जहाँ कहीं भी रह सकतीं थी उनकी सभ्यता और संस्कृति बहुत ही परिस्कृत और प्राकृतिक थीं उन्होंने जंगल में अनेकों स्थान पर सुन्दर नगर विकसित किये हुए थे जहाँ से वे अपनी कला विज्ञान और व्यापार को दुनिया के अन्य जंगलों तक पहुँचाकर विश्वकल्याण का काम करती थीं …लेकिन बुरा वक्त बता कर नहीं आता …बाहर से आये टिड्डों के एक दल ने उस जंगल पर अतिक्रमण आरम्भ किया चींटियों ने अपनी वसुदैवकुटुम्बकम् की संस्कृति का पालन करते हुए उन्हें मेहमान समझने की भूल की… चींटियों का इलाका सिमटने लगा उनकी आजादी पर संकट आया तो उन्होंने एकजुटता दिखाई और मुकाबला किया …वे हारे ,कई बार हारे ,बार बार हारे…

फिर उन्होंने अपनी लगातार हारो से सबक लिया और चींटियों के नेताओं को छल पूर्वक मारने का षड्यंत्र आरम्भ किया और कामयाब हुए…अब अंततः चींटियाँ टिड्डों की गुलाम हुईं गुलाम बनाई गई चींटियों को जातियों में बाँट दिया गया उनके नगरों को ध्वस्त कर दिया गया उनके समृद्ध इतिहास को मिटा दिया गया …अब चींटियों का कोई जंगल नहीं था कोई घर नहीं था बल्कि वो अपने ही घर में पराई हो चुकी थी वो लगातार गुलाम बनी रहें इसके लिए टिड्डों ने कानून बनाये ग्रन्थ लिखे और चींटियों को यह अहसास करा दिया की तुम्हारी गुलामी का कारण तुम्हारी किस्मत है तुम्हारा भाग्य है बस फिर क्या था चींटिया गुलामी को अपनी किस्मत मान कर ढोती रहीं ढोती रहीं …..

टिड्डों ने जंगल के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया जिससे जंगल में आराजकता पैदा होने लगी जानवर मरने लगे गिध्द मंडराने लगे ….

कुछ गिद्ध आते और पेट भरकर वापस चले जाते लेकिन कुछ गिद्धों ने इस जंगल में रुकने का फैसला किया यह टिड्डों के लिए मुसीबत की बात थी ….

टिड्डों का डर सच साबित हुआ गिद्धों ने टिड्डों को अपना गुलाम बना लिया …
अजीब स्थिति पैदा हो गई अब जंगल में दो तरह के गुलाम थे गिद्धों के गुलाम टिड्डे और टिड्डों की गुलाम चींटियाँ ….

वक्त बीता टिड्डों ने अपनी आजादी का आंदोलन शुरू किया उधर चींटियों में भी एक  चींटी को गिद्धों के राज में पढ़ने लिखने का मौका मिला उसे अपने समाज की दयनीयता का अहसास हुआ उसने टिड्डों से अपनी वर्षों पुरानी गुलामी से मुक्ति का आंदोलन शुरू कर दिया अब जंगल में दो तरह के सामानांतर आंदोलन चल रहे थे एक नंगे टिड्डे के नेतृत्व में टिड्डों का आंदोलन जो गिद्धों से आजादी के लिए था दूसरा चींटियों का आंदोलन जो टिड्डों की गुलामी से मुक्ति के लिए था ….

गिद्धों को जब चींटियों की हजारों वर्षों की गुलामी का पता चला उन्होंने चींटियों के नेता को टिड्डों से मुक्त रहने का पूर्ण अधिकार प्रदान कर दिया लेकिन हरामखोर टिड्डों ने इसे नामंजूर कर दिया और टिड्डादल के नंगे मुखिया ने छल से उन अधिकारों को एक  समझौता बदलवा लिया ये सब उसने आत्महत्या की धमकी देकर किया !

अंततः जंगल से गिद्ध चले गए टिड्डों ने आजादी का जश्न मनाया ….सबकुछ छीनने वाले टिड्डों ने चींटियों के नेता को जंगल का संविधान बनाने का मौका दिया….संविधान में  चींटियों को वे सभी अधिकार वापस मिले जो वर्षों से टिड्डों ने उनसे छीने थे इन्हीं अधिकारों में उसे आगे बढ़ने के लिए कुछ विशेषाधिकारों का प्रबंध भी किया गया जिसे आरक्षण कहा गया !

अब चींटिया पढ़ सकती थी जंगल में कहीं भी रह सकती थी लेकिन उनकी ये थोड़ी सी आजादी भी टिड्डों को हजम नहीं हुई टिड्डों ने अपना नेतृत्व बदला और फिर ….

एक बार फिर से चींटियों को पूर्ण गुलाम बनाने का षड्यंत्र शुरू हो गया अब तो जंगल भी इनका था जंगल की मिडिया भी इनकी ….

लेकिन इनके रस्ते की सबसे बड़ी रूकावट संविधान बना हुआ था इन्होंने धीरे धीरे संविधान के विरुद्ध माहौल बनाना शुरू कर दिया टिड्डों ने जंगल में फिर से अराजकता का माहौल खड़ा कर दिया भेड़ियों को लोमड़ियों से डराया सियारों को कुत्तों से लड़ाया हाथी को चूहे के विरुद्ध खड़ा कर दिया …..

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