श्री दिलीप सी0 मंडल जी के फेसबुक पर आरक्षण की खिलाफत करने वाले ब्राह्मणवादियों को निरुत्तर करते कुछ चुनिंदा जवाव, क्या लिखते हैं, पढोगे तो आपमें भी जवाब देने की क्षमता विकसित होगी…Team SBMT


वे चाहते हैं कि जाति रह जाए और आरक्षण चला जाए।

इसलिए पटेल आंदोलन के बहाने जब बुद्धिजीवियों को लिखने-बोलने का मौका मिला तो उनमें से हरेक ने आरक्षण के खिलाफ लिखा या TV चैनल पर बोला। किसी एक ने भी जाति या जातिवाद के खिलाफ न लिखा न बोला।

हम समझते हैं आपकी नीयत!

क्योंकि यहाँ बीच का रास्ता नहीं है,

इसलिए रिज़र्वेशन की बहस में दो ही पक्ष हैं। एक जिसको मिलता है या मिलना है, वे पक्ष में हैं। और दो, जिनका पहले पूरा क़ब्ज़ा था और अब जिनका आरक्षण के कारण थोड़ा घट गया है, वे विरोध में है।

लेकिन एक तीसरी कटेगरी है, जिसे आरक्षण नहीं मिलता, मिलना भी नहीं है, पर वे आरक्षण के पक्ष में हैं। इस कटेगरी में दो तरह के लोग हैं-

1. एक, वे सवर्ण, जो न्याय के पक्ष में हैं और राष्ट्रहित में विविधता के पक्षधर हैं। इनका ख़ास तौर पर स्वागत और अभिनंदन।
2. दो, क्रीमी लेयर के ओबीसी, जैसे क्लास वन अफसर, कंपनियों के बड़े पद के अधिकारी, संपादक, डॉक्टर, प्रोफेसर आदि। क्रीमी लेयर में होने के कारण उन्हें या उनके परिवार को आरक्षण नहीं मिलेगा, लेकिन वे सामाजिक विविधता के पक्षधर हैं।

ये लोग निजी लाभ हानि से परे, आरक्षण को राष्ट्र निर्माण के लिए जरूरी मानकर उसके पक्षधर हैं।

इसलिए जब CSDS ने आरक्षण पर देश में सर्वे किया तो 88% पक्ष में थे और सिर्फ 12% खिलाफ।

Dilip C Mandal

कुछ जातिवादी लोग चाहते हैं कि सवर्णों को भी आरक्षण मिलना चाहिए। इसका एक ही तरीका है। SC-ST-OBC की हिस्सेदारी से तो उन्हें दिक़्क़त है ही। उन्हें अपने धर्म से निकाल दें। या खुद निकल जाएँ। इस तरह वे धार्मिक अल्पसंख्यक हो जाएंगे। आबादी में मुसलमानों से लगभग चार परसेंट कम हो जाएँगे।

इसके बाद वे धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यकों के आरक्षण के लिए राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ सकते हैं। ऐसा होने तक वे जिस तरह मुसलमानों का अल्पसंख्यक तुष्टीकरण होता है, वैसे ही अपना तुष्टीकरण करा सकते हैं। मौज करें।

September4 at 10:44pm

प्लीज, आरक्षण के खिलाफ आत्मदाह न करें।

एक बेहतर तरीका है। आरक्षण विरोधी एक पार्टी बनाएँ। या अभी मौजूद किसी पार्टी को राज़ी कर लें कि वह SC-ST-OBC आरक्षण के खिलाफ खुलकर चुनाव लड़े। अपने घोषणापत्र में यह बात शामिल करे। फिर दो तिहाई बहुमत से लोकसभा चुनाव जीते। राज्यसभा में भी हैसियत बनाए। राज्यों की विधानसभाओं में भी औक़ात पैदा करे।

तब होगा संविधान संशोधन।

यह भी आसान नहीं है। आरक्षण संविधान की मूल संरचना से आया है। समानता के अधिकार के अनुच्छेदों से। आसानी से नहीं हटेगा।

फिर भी कोशिश करके देखिए।

कुछ भी कीजिए। लेकिन प्लीज़, आरक्षण के खिलाफ आत्मदाह मत कीजिए।

 

September 3 at 10:44pm

 

सेपरेट इलेक्टोरेट यानी पृथक निर्वाचक या विशेष अवसर (आरक्षण)?

वहीं से निकला है आरक्षण। तमाम सहमति, असहमति के बाद हुआ पूना पैक्ट यही है। आपने दसवीं में इतिहास की किताब में पढा होगा। याद न हो तो किसी बच्चे से माँगकर पढ लीजिए।

इस समझौते से ही देश बना है। आज देश का ऐसा नक़्शा है, तो पूना पैक्ट के कारण है। इसी लिए भारत की संविधान सभा ने आरक्षण का प्रावधान किया।

आरक्षण राष्ट्र निर्माण के बुनियाद की ईंट है। आरक्षण का विरोध करने वालों की देशभक्ति संदिग्ध है।

 

September 2 at 10:44pm

शहरी जातिवाद का सच!

एक समान क्वालिफ़िकेशन और वर्क एक्सपीरिएंस वाले 50 Bio Data यानी Resume तैयार कीजिए। 25 कैंडिडेट का नाम इन टाइटिल के साथ लिखिए, जैसे कुशवाहा, अंसारी, यादव, जाधव, महतो, मौर्य, मुंडा, मंसूरी, पासवान, सोरेन, शाक्य, कांबली, अहीर, लोधी, जाटव, राजभर, गुर्जर, मीणा, बिंद वगैरह वगैरह। बाकी पच्चीस में नाम वही रखिए और टाइटिल बदलकर जोशी, पांडे, अग्रवाल, बंसल, दुबे, चतुर्वेदी, शर्मा, राय वगैरह वगैरह रखिए।

इन बायो डाटा को अलग अलग प्राइवेट कंपनियों में भेजिए। देखिए कि इंटरव्यू का बुलावा किन टाइटिल वाले बायो डाटा पर ज्यादा आता है।

दिल्ली-एनसीआर की कंपनियों पर इसे आज़माकर देखा जा चुका है। शहरी जातिवाद में शक की गुंजाइश नहीं होती।

करके देखिए।

 

September 2 at 9:57pm

तो आपकी दिक़्क़त आर्थिक आधार पर है?
गरीबी से परेशान हैं?
आप मनरेगा में अपनी पगार बढ़वाने के लिए आंदोलन कर सकते हैं।
मैं आपका समर्थन करूँगा।

आरक्षण ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है। यह राष्ट्र निर्माण में तमाम समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने का संवैधानिक कार्यक्रम है।

इत्ती-सी बात आपके भेजे में नहीं घुसती?

 


September 1 at 10:55pm · Edited ·

वे मुझसे पूछते हैं कि- इतने समय से जातिवाद के खिलाफ लिखते हुए आप थके नहीं।

मेरा वही जवाब है – आप हजारों साल से जातिवाद कर रहे हैं। आप थक गए क्या?

आप अन्याय करते नहीं थके, तो हम इंसानियत और न्याय के पक्ष में होकर कैसे थक जाएँ?

और, अभी तो हम जैसों ने लिखना सीखा ही है।

अभी हम लोग बहुत लिखने वाले हैं!

आप अभी से परेशान होने लगे?

 

 

 


Dilip C Mandal

September 1 at 8:24pm · Edited ·

विचारार्थ- आरक्षण कब ख़त्म होगा?

  1. नौकरियों और एडमिशन में इंटरव्यू और वाइवा का जातिवादी खेल पूरी तरह बंद होने के बाद। डोनेशन के आधार पर एडमिशन बंद होने और सबके लिए एक समान शिक्षा नीति लागू होने के बाद।
    2. चारों धाम और एक करोड़ से ज्यादा आमदनी वाले तमाम मंदिरों में जाति के अनुपात में पुजारियों और व्यवस्थापकों की नियुक्ति के बाद।
    3. शादी के लिए जाति का महत्व पूरी तरह ख़त्म होने के बाद। शादी के जातिवादी विज्ञापनों पर रोक के बाद।
    4. सभी जातियों में कच्चे घर का अनुपात समान हो जाने के बाद, या सबके घर पक्के होने के बाद। यह जानने के लिए जाति जनगणना होने के बाद।
    5. सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों और उच्च शैक्षणिक-नौकरशाही के पदों में सामाजिक विविधता आने के बाद।
    6. वाइस चांसलर, राजदूतों और ऐसे तमाम उच्च पदों पर सामाजिक विविधता आने के बाद।

और सबसे बढ़कर,

  1. जातिवाद ख़त्म होने के बाद।

जब यह यह हो जाए, तो फिर इस बारे में विचार शुरू हो कि आरक्षण का क्या करना है।

 


Dilip C Mandal

September 1 at 2:13pm · New Delhi · Edited ·

BBC ने CSDS के 2014 के राष्ट्रीय सर्वे के आधार पर खबर छापी है कि सिर्फ 12 प्रतिशत भारतीय ही ऐसे हैं जिन्हें आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था से शिकायत है।

सवर्णों की कुल आबादी को अगर 15% माना जाए तो आरक्षण के विरोध में सिर्फ 12 प्रतिशत के आँकडे का एक मतलब यह भी है कि सवर्णों में लाखों लोग ऐसे हैं जो आरक्षण के समर्थक हैं और इसे न्याय और राष्ट्र निर्माण का जरूरी कार्यक्रम मानते हैं। ऐसे लोकतांत्रिक, राष्ट्रप्रेमी लोगों का अभिनंदन।

ऐसे लोगों की प्रत्याशा में ज्योतिबा फुले ने अपने प्रसिद्ध किताब ‘गुलामगीरी’ अमेरिकी के उन गोरों को समर्पित की थी, जो ग़ुलामी प्रथा के खिलाफ लड़े।

 


Dilip C Mandal

September 1 at 12:40am · Edited ·

सवर्ण ग़रीबों के लिए इनके दिल में कोई दर्द नहीं है।

इनसे कहिए कि 50% तो सामाजिक आधार पर है, बाकी 50% आर्थिक आधार पर सभी समुदायों के ग़रीबों के लिए आरक्षित कर दिया जाए, तो यही लोग विरोध में आत्मदाह कर लेंगे।

– इन्हें सवर्ण ग़रीबों की कोई चिता नहीं है।
– पैसे वाले लोग जनरल कटेगरी की सारी मलाई खाकर बैठे हैं।
– जनरल कटेगरी में अफसर का बेटा अफसर बनता है। इसे ये जारी रखना चाहते हैं।
– जनरल सीटों पर क्रीमी लेयर लगाने के खिलाफ ये जान दे देंगे।

 


Dilip C Mandal

August 31 at 6:56pm · Edited ·

भारतीय मीडिया जब किसी आंदोलन या नेता को बेवजह या जरूरत से ज्यादा उछालना शुरु करे तो सतर्क हो जाएँ। ज़रूर आपके खिलाफ कोई खेल, षड्यंत्र या प्रपंच हो रहा है।

मीडिया समाजशास्त्र के इस फ़ॉर्मूले यानी जंतर को किसी भी आंदोलन या नेता पर आज़माकर देखिए। आप कभी ठगे नहीं जाएँगे। मुझसे गारंटी कार्ड ले लीजिए।

 


Dilip C Mandal

August 31 at 2:07pm · New Delhi ·

नेम प्लेट का समाजशास्त्र

हार्दिक पटेल नाराज़ है। उसको लगता है कि किसी ने उसका हक़ मार लिया है। हार्दिक पटेल को मैं एक ऑफ़र दे रहा हूँ। मैं उन्हें अपने ख़र्च पर इस देश के तमाम सत्ता केंद्रों में ले जाना चाहता हूँ। शुरुआत प्रधानमंत्री कार्यालय से होगी, फिर कैबिनेट सेक्रेटारिएट, उसके बाद सभी मंत्रालय और विभाग। उसी तरह सभी राज्यों की राजधानियों में सीएम ऑफ़िस और सभी मंत्रालय और विभाग, फिर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट। उसके बाद आईआईटी, आईआईएम, तमाम विश्विद्यालय, फाउंडेशन और इंस्टिट्यूट, फिर सभी बड़े एनजीओ।

हार्दिक पटेल को सिर्फ यह करना है कि इन दफ़्तरों के नेम प्लेट में जो लिखा है, वह नोट करते जाना है। दफ़्तर में किसी कर्मचारी से नेम प्लेट में जिनका नाम लिखा है, उनकी जाति पूछ लेनी है।

मैं गारंटी के साथ कह सकता हूँ कि हार्दिक पटेल को पता चल जाएगा कि उसका हक़ किसने मार लिया है।

अगर उनके पास ज्यादा समय है तो वे बैंक चेयरमैन, पीएसयू के बड़े अधिकारी वगैरह के नेम प्लेट का भी अध्ययन कर सकते हैं। अरबपति मंदिरों के संचालकों को वे चाहें तो छोड़ भी दें। सब पता चल जाएगा।

 


Dilip C Mandal

August 28 at 11:35pm · Edited ·

चलो मान लिया कि जेटली जी ठीक समझते हैं. जाति जनगणना के आंकड़े आएंगे तो देश और समाज में उथल पुथल मच जाएगी. लेकिन जो आंकड़े आ गए हैं और जिन्हें सरकार वेब साइट पर डाल चुकी है, उसकी तो इज्जत कीजिए.

2001 की जनगणना के मुताबिक, एससी और एसटी देश में क्रमश: 16.2% और 8.2% हो गए हैं. संविधान के मुताबिक उनका आरक्षण आबादी के अनुपात में होना है. तो फिर उन्हें क्रमश: 15% और 7.5% पर क्यों रोक कर रखा गया है. 2011 के आँकडे सर्च करने से यही पेज खुलता है. ज़ाहिर है नए आँकडे अपलोड करने से सरकार क़तरा रही है।

बहरहाल, जो आँकड़ा आपने माना है, उसके आधार पर इनका कोटा बढ़ाइए. कोई विरोध भी नहीं करेगा. सरकार को यह काम तत्काल करना चाहिए. इसके लिए आरक्षण की कुल सीमा 50% से ऊपर जाती है तो जिस तरह संसद ने तमिलनाडु के मामले में 69% का आरक्षण कानून पास किया था, वैसा ही इस मामले में भी करे.

देश की जनता को भी तो पता चले कि संसद में विरोध कौन कर रहा है.

 


Dilip C Mandal

August 27 at 4:09pm · Edited ·

मैं कैसे तय करता हूँ कि विवाद की स्थिति में किसके पक्ष में खडा होना है और किसके खिलाफ होना है? इसके लिए मेरे पास एक फ़ॉर्मूला है जिसके लिए मैं अपने पिता यानी मेरे मास्टर साहेब और स्कूल शिक्षक पासवान सर का शुक्रगुज़ार हूँ। हालाँकि मैं इसे हमेशा लागू नहीं कर पाता। गलती भी होती है। फ़ॉर्मूला है:-

  1. न्याय के पक्ष में खड़े हो जाओ।
    2. अगर समझ में नही आ रहा हो कि न्याय का पक्ष कौन सा है, तो जो कमज़ोर है, उसके पक्ष में खड़े हो जाओ। अंत में देखोगे कि ज्यादातर मामलों में तुम सही जगह खड़े हो।

इस गणित से स्त्री और पुरुष में स्त्री के पक्ष में, बॉस और कर्मचारी में कर्मचारी के पक्ष में, सवर्ण और अवर्ण में अवर्ण के पक्ष में, दलित और पिछड़े में दलित के पक्ष में, पिछड़े और अति पिछड़े में अति पिछडे के पक्ष हमें, प्रिंसिपल और स्टूडेंट में स्टूडेंट के पक्ष हमें, अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक मतावलंबियों में अल्पसंख्यक के पक्ष में, पसमांदा और अशराफ में पसमांदा के पक्ष में खड़े होकर देखिए। इस लिस्ट को आप गाँव-शहर, मज़बूत देश-कमज़ोर देश, साइकिल वाला-कार वाला, छोटी दुकान-मॉल समेत कई और मामले में लागू करके देख सकते हैं।

हंड्रेड परसेंट की गारंटी नहीं है, लेकिन ज्यादातर मामलों में आप खुद को सही जगह यानी न्याय के पक्ष में खडा पाएँगे।

One thought on “श्री दिलीप सी0 मंडल जी के फेसबुक पर आरक्षण की खिलाफत करने वाले ब्राह्मणवादियों को निरुत्तर करते कुछ चुनिंदा जवाव, क्या लिखते हैं, पढोगे तो आपमें भी जवाब देने की क्षमता विकसित होगी…Team SBMT

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s