‘धर्म’ क्या है ? ‘धम्म’ , ‘धर्म’ से कैसे भिन्न है ? ये लेख डॉ अम्बेडकर द्वारा लिखित पुस्तक “बुद्ध और उनका धम्म” के पेज नंबर 275-278 से लिया गया । …..राहुल अहिरवार


DHAMMA or DHARMA“धर्म और धम्म”
‘धर्म’ क्या है ?

1. ‘धर्म’ (मजहब-Religion) एक अनिश्चित शब्द है,जिसका कोई स्थिर अर्थ नहीं ।
2. यह शब्द तो एक है,किन्तु इसके अर्थ अनेक हैं।
3.इसका कारण है कि ‘धर्म’ बहुत सी अवस्थाओं में से गुजरा है।हर अवस्था में हम उस मान्यता विशेष को ‘धर्म’ ही कहते हैं। निस्सन्देह हर एक समय की मान्यताओं से भी भिन्न रही है और अपने बाद में आने वाली मान्यताओं से भी भिन्न रही है।
4. ‘धर्म’ की कल्पना कभी स्थिर नहीं रही है।
5.यह हर समय पर बदलती रही है।
6. एक समय था जब बिजली ,बर्षा और बाढ़ की घटनायें आदिम-आदमी की समझ से सर्वथा परे की बातें थी।इन पर काबू पाने के लिये जो भी कुछ भी टोना-टोटका किया जाता था,उस समय ‘धर्म’ और ‘जादू’ एक ही चीज के दो नाम थे ।
7.तब ‘धर्म’ के विकास में दूसरा समय आया। इस समय ‘धर्म’ का मतलब था-आदमी के विश्वास,धार्मिक कर्म-काण्ड रीति-रिवाज,प्राथनाएँ और बलियों वालें यज्ञ ।
8. लेकिन ‘धर्म’ का यह स्वरूप व्युतपन्न है ।
9. धर्म का केन्द्र-बिन्दु इस विश्वास पर निर्भर करता है कि ,कोई शक्ति विशेष है जिसके कारण यें घटनायें घटती हैं और जो आदिम- आदमी की समझ से परे बाते थीं । अब इस अवस्था को पहुँच कर ‘जादू’ का प्रभाव जाता रहा ।
10. आरंभ में यह शक्ति शैतान का रूप थी, किन्तु बाद में यह माना जाने लगा कि यंह ‘शिव’ रूप भी हो सकती है ।
11. तरह-तरह के विश्वास , कर्म – काण्ड और यज्ञ ‘शिव’ रूपी शक्ति को प्रसन्न करने के लिये और क्रोध रूप शक्ति को संतुष्ट रखने के लिये भी आवश्यक थे ।
12. आगे चलकर वही ‘ईश्वर’ , ‘परमात्मा’ या दुनिया बनाने वाली कहलायी ।
13. ‘तब’ मान्यता ने तीसरी शक्ल ग्रहण की , जब यह माने जाने लगा कि,इस एक ही शक्ति ने ‘आदमी’ और ‘दुनिया’ दोनों को पैदा किया हैं ।
14. इसके बाद धर्म कि मान्यता में एक यह बात भी शामिल हो गई कि , हर आदमी की देह में एक ‘आत्मा’ है , वह ‘ आत्मा ‘ नित्य है , और आदमी जो कुछ भी भला – करता है, उस ‘आत्मा’ को ईश्वर के प्रति उसके लिये उत्तरदायी रहना पड़ता है ।
15. यही थोड़े में ‘धर्म’ की मान्यता के विकास का इतिहास है ।
16. अब ‘धर्म’ का यही अर्थ हो गया है और अब ‘धर्म’ से यही भावार्थ ग्रहण किया जाता है ईश्वर में विश्वास ,आत्मा में विश्वास ,ईश्वर की पूजा ,आत्मा का सुधार , प्रार्थना आदि करके ईश्वर को प्रसन्न रखना ।

‘धम्म’ , ‘धर्म’ से कैसे भिन्न है ?

1. भगवान बुद्ध जिसे ‘धम्म’ कहते है, वह ‘धर्म’ सर्वथा भिन्न है
2. यूं जिसे भगवान बुद्ध ‘धम्म’ कहते हैं,वह उसके समान्तर है,जिसे यूरोप के दैववादी ‘धर्म’ कहते हैं ।
3. लेकिन दोनों में कोई खास ‘समानता’ नहीं है, बल्कि दोनों में बहुत बड़ा अंतर है ।
4.इसीलिये कुछ यूरोपीय देव-वादी भगवान बुद्ध के ‘धम्म’ को धर्म स्वीकार करने से इन्कार करते है ।
5. हमें इसके लिए कोई अफसोस नहीं है । नुकसान उन्ही का है । इससे बुद्ध-धम्म कोई हानि नहीं बल्कि, इससे ‘धर्म’ की कमियाँ स्पष्ट रूप से ध्यान में आती हैं ।
6. इस विवाद में पड़ने की अपेक्षा यह अच्छा है कि हम यह बतायें कि ,धम्म क्या है और फिर दिखायें कि यह ‘धर्म’ या ‘रिलिजन’ से कैसे भिन्न है ?
7. कहा जाता है कि , ‘धर्म’ या ‘ रिलिजन’ व्यक्तिगत चीज है और आदमी इसे अपने तक ही सीमित रखना चाहिये । इसे सार्वजनिक जीवन में बिल्कुल दखल नहीं देना चाहिये ।
8. इसके सर्वथा विरुद्ध ‘धम्म’ सामाजिक वस्तु है यह प्रधान रूप से और आवश्यक रूप से सामाजिक है ।
9. धम्म का मतलब है सदाचार , जिसका मतलब है जीवन के सभी क्षैत्रों में एक आदमी का दूसरे आदमी के प्रति अच्छा व्यवहार
10. इससे स्पष्ट है कि यदि कहीं एक आदमी अकेला ही हो,तो उसे किसी ‘धम्म’ की आवश्यकता नहीं
11. लेकिन यदि कहीं परस्पर सम्बंधित दो आदमी भी एक साथ रहतें हो , तो चाहे वे चाहें और न चाहें , उन्हें ‘धम्म’ के लिये जगह बनानी होगी । दोनों में से कोई एक भी बचकर नहीं जा सकता ।
12. दूसरे शब्दों में बिना ‘धम्म’ के समाज का काम नहीं चल सकता ।
13. समाज में तीन बातों में से एक का चुनाव करना ही पड़ेगा ।
14. समाज चाहे तो अपने ‘अनुशासन’ के लिए धम्म का चुनाव नहीं कर सकता । यदि धम्म ‘अनुशासन’ नहीं करता हो तो वह धम्म नहीं है ।
15. इसका मतलब है समाज ‘अराजकता’ के पथ पर आगे बढ़ना ठीक समझता है ।
16. दूसरे समाज पुलिस को अर्थात डिक्टेटर को ‘ अनुशासन’ के लिये चुन सकता है
17. तीसरे, समाज ‘धम्म ‘और मजिस्ट्रेट दोनों का चुनाव कर सकता है; जितने अंश में समाज “धम्म’ का पालन करव,उतने अंश में ‘धम्म’ और जहां ‘धम्म’ पालन न करे, वहा मजिस्ट्रेट ।
18. न अराजकता में स्वतंत्रता है और न डिक्टेटर – राज्य में स्वतंत्रता है।
19. केवल तीसरी व्यवस्था में ही स्वतंत्रता जीवित रहती है ।
20. इसलिए जो स्वतंत्रता चाहते है , उनके लिये ‘धम्म’ अनिवार्य है ।
21. धम्म क्या है?’धम्म’ की आनिवार्यता क्यों है ? भगवान बुद्ध के अनुसार धम्म के दो प्रधान तत्व हैं-प्रज्ञा तथा करुणा ।
22. प्रज्ञा क्या है ? प्रज्ञा किसलिये ? प्रज्ञा का मतलब है बुद्धि (निर्मल बुद्धि) भगवान बुद्ध ने प्रज्ञा को दो स्तंभों में से एक माना है, क्योकि वह नहीं चाहतें थे की मिथ्या कि कोई गुंजाइश बची रहे
23. करुणा क्या है?और करुणा किस लिये ? करुणा का मतलब है (दया) प्रेम ,(मैत्री)।इसके बिना न समाज जीवित रह सकता है और न समाज उन्नति कर सकती है-इसीलिये भगवान बुद्ध ने करुणा को अपने धम्म का दूसरा स्तम्भ बनाया ।
24. भगवान बुद्ध के ‘धम्म’ के यही परिभाषा है ।
25. ‘धम्म’ की परिभाषा ‘धर्म’ से कितनी भिन्न है
26. कितनी प्राचीन और कितनी आधुनिक है, यह भगवान बुद्ध द्वारा दी गई है ‘धम्म’ की परिभाषा
27. कितनी अलौकिक है और कितनी मौलिक !
28. किसी से उधार नहीं ली गई । कितनी सच्ची !
29. ‘प्रज्ञा’ और ‘करुणा’ का एक अलौकिक सम्मिश्रण ही तथागत का ‘धम्म’ है।
30. ‘धर्म’ और ‘धम्म’ में इतना अंतर है ।

“बुद्ध और उनका धम्म” नामक पुस्तक से लिया गया ।
पेज नंबर 275-278
राहुल अहिरवार
मो. 7354751322
जय भीम , नमों बुद्धाय

One thought on “‘धर्म’ क्या है ? ‘धम्म’ , ‘धर्म’ से कैसे भिन्न है ? ये लेख डॉ अम्बेडकर द्वारा लिखित पुस्तक “बुद्ध और उनका धम्म” के पेज नंबर 275-278 से लिया गया । …..राहुल अहिरवार

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s