जो भी अपने शोषण का सही कारन जान जाता है पर डॉ आंबेडकर और गौतम बुद्ध को नहीं जान पता, वो अपनी बुद्धि और ज्ञान के अनुसार ‘ब्राह्मणवादी धर्म’ कोछोड़कर किसी और धर्म में चला जाता है जहाँ उसे इंसान के बराबर दर्जा मिले| ईसाइयत और इस्लाम में तो 80 से 90% तक मूलनिवासी ही हैं पर एक उदाहरण है जिसमे बिहार के मूलनिवासी शेडूल कास्ट सिख धर्म अपनाकर मुक्ति पायी| (दलितों ने बिहार में बनाया ‘मिनी पंजाब’…BBC HINDI)


 

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बिहार की राजधानी पटना से क़रीब 300 किलोमीटर दूर बसे हैं दलितों के कुछ ऐसे गांव जहाँ पंच ककार यानी केश, कृपाण, कंघा, कड़ा और कच्छा का पूरा पालन होता है. यही नहीं यहाँ एक गुरुद्वारा भी है.

ज़िले के ख़ास हलहलिया, नयानगर, ख़वासपुर, परमानन्दपुर, माणिकपुर और मजलत्ता गाँव में लगभग 200 ऐसे दलित महिला-पुरुष हैं, जिन्होंने सिख धर्म को अपना लिया है.

ये सभी ब्राह्मणवादी व्यस्था के अनुसार मांझी समुदाय से थे .

ख़ास हलहलिया गाँव में पहले फूस के श्रीअकाल तख़्त साहब गुरुद्वारा को दिसंबर, 1985 में पक्का बना दिया गया.

इस सबकी शुरुआत नरेंद्र सिंह ज्ञानी ने की थी. वो क़रीब 10 साल तक रोज़ी-रोटी के लिये पंजाब में रहे थे, ग़रीबी और बिहार में जातीय भेदभाव से पीछा छुड़ाने के लिए इन्होंने ख़ालसा पंथ अपना लिया था.

विरोध

बाद में जब वो गाँव लौटे तो लोगों को अपने नए धर्म के प्रवचन और सत्संग सुनाए.

और लोगों में इसका प्रभाव बढ़ा वो उनके साथ होते गए.

और अस्सी के दशक में जिस बदलाव की गांव में शुरूआत हुई थी अब उसकी तीसरी पीढ़ी तैयार हो गई है.

पंजाब के कटाना साहब, खन्ना में क़रीब तीन साल काम कर चुके 35 साल के सरदार प्रमोद सिंह बताते हैं कि यह महादलितों का गाँव है.

यहां के गुरूद्वारे में ग्रंथी का काम वीरेन्द्र सिंह ज्ञानी कर रहे हैं. और हर रोज़ पांच वाणियों का जाप होता है.

लेकिन, ‘बदलाव’ की शुरुआत इतनी सहज नहीं थी और स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया था.

बराबरी का दर्जा

रूप सिंह कहते हैं, ”लोग कहते थे चाकू धारण कर आ गया है और ये सब वहां नहीं चलेगा. लेकिन, अब मामला ठीक है.”

हम हर साल गुरुनानक देव और गुरु गोविंद सिंह की जयंती और बैशाखी धूमधाम से मनाते हैं.

सरदार संजय सिंह के मुताबिक़ सिख धर्म बराबरी का दर्जा देता है.

संजय सिंह कहते हैं, “लंगर में एक साथ सब खाते हैं. ऊँच-नीच वाली बात इसमें नहीं है, इसलिए उन्होंने इस मत को अपनाया है.”

Source: http://www.bbc.com/hindi/india/2015/09/150914_bihar_mini_punjab_du?ocid=socialflow_facebook

 

कमाल की बात है की कम पढ़े लिखे लोग भी समझ रहे हैं की उनके शोषण का कारन /ब्राह्मणवाद  है पर हमारे समाज के पढ़े लिखे लोग अपने आप को हिन्दू साबित करने के लिए अपनी मेहनत की कमाई और समय बर्बाद कर रहे हैं|अगर मन्दिरबाजी नहीं करते तो सत्संग में बाबाबाजी करते हैं, मानते नहीं| सदियाँ बीत गयीं हैं पर गुलामी जाती नहीं

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