29-Sep-2015 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना: आपको जानकर हैरानी होगी की असल बुद्ध धम्म शिक्षाओं पर कोई चला है तो वो ब्राह्मण ही है,देखो कितनी खुशाली पायी है| आप भी मिलावट वाली धम्म शिक्षाओं को छोड़ो और असल धम्म शिक्षा को अपनाओ|… समयबुद्धा


tisharan sheel

 

29-Sep-2015 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना: आपको जानकर हैरानी होगी की असल बुद्ध धम्म शिक्षाओं पर कोई चला है तो वो ब्राह्मण ही है,देखो कितनी खुशाली पायी है| आप भी मिलावट वाली धम्म शिक्षाओं को छोड़ो और असल धम्म शिक्षा को अपनाओ|… समयबुद्धा

 

विगत् कुछ वर्षों में यूरोप तथा अमरीका के हजारों रोमन कैथोलिकों ने बौद्ध धर्म अपनाया है, जिनमें इटली के विश्व प्रसिद्ध फुटबाल खिलाड़ी राबर्टो बज्जियो तथा हालीबुड के सुपर स्टार रिचार्ड गेरे भी शामिल हैं। पिछले दिनों रोम के एक अखबार को दिये गये साक्षात्कार में सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति गोर्वाचोव ने ठीक ही कहा ‘इक्कीसवीं सदी बुद्ध की सदी होगी।`

आज से सौ साल पहले तक देश में गौतम बुद्ध को बेहद कम या न के बराबर लोग जानते थे, बौद्ध महापुरुषों जैसे राजा बलि,महिषासुर,गौतम बुद्ध, कबीर, रैदास, डॉ अम्बेडकर, पेरियार, सम्राट अशोक महान, राजा हर्षवर्धन आदि अनेकों महापुरुषों के ऐतिहासिक स्थल या मूर्तिाया देखने को भी नहीं मिलती थीं, और अगर यदा कदा कहीं कोई मूर्ती मिल भी जाए तो लोगों को उससे सरोकार नहीं था | पार आज अगर संख्या की दृस्टि से देखे तो सत्तासीन हिन्दू के मंदिर सबसे ज्यादा मिलेंगे फिर कुछ ही सदियों पहले सत्ताहीन हुए मुग़ल या ईसाई  के मस्जिद  और गिरजाघर मिलेंगे| क्या आपने कभी नोट किया की तीसरे नम्बर पर भारतीय/बहुजन महापुरुषों की मूर्तियां,विहार,ऐतिहासिक स्थल अब मिल जायेंगे, जिसमे डॉ अम्बेडकर की मूर्ती की संख्या प्रमुख है| भारत में ही नहीं अब तो विदेशों में भी डॉ अम्बेडकर की प्रतिमाएं लग रही नहीं, बुद्ध का सन्देश पहुंच रहा है|कमाल की बात ये है की भरपूर दमन, राजनैतिक अवहेलना, दुस्प्रचार, घृणा, कट्टर दमन, मीडिया में प्रचार प्रसार न होने देना  और धन के आभाव के बावजूद हर रोज हजारों हजारों लोग बौद्ध धम्म में लौट रहे हैं| जो लोग बौद्ध धम्म और अम्बेडकरवाद को कमजोर करके आंकते हैं वो जरा ये अनुमान लगाएं की इतने दमन के बावजूद इतनी मजबूत स्तिथि है अगर सत्तासीन हो तो क्या स्तिथि होगी|

गर्व करो की आप मूलनिवासी बौद्ध संस्कृति के ताल्लुक रखते हो, क्योंकि अब प्रबुद्ध भारत विश्व गुरु होने जा रहा है| भारत के कुछ धर्मांध लोगों को छोड़ दें तो सारा शिक्षित विश्व जानता है की भारत ने अपने इतिहास के सबसे स्वर्णिम समय बौद्ध काल में ही देखा है, जितनी भी खोजें भारत के नाम पर हैं वो सभी ६०० बी सी से ६०० ए डी की बीच की ही हैं| आज भारतवासी लोगों में बौद्ध धम्म की तरफ रुझान बढ़ रहा है,लोग वापस अपने धम्म में लौट रहे हैं| इसकी शुरुआत बाबा साहब डॉ अम्बेडकर महान ने प्रतिक्रांति में शूद्र या दास  बनाये गये लोगों को, जिन्हें मीडिया दलित कहता है, को वापस अपने खुद के बौद्ध धम्म में लौटा देने से हुई |खुद को शूद्र समझने वाले जब बौद्ध इतिहास से जुड़े  तब जाना की वे ही विश्व गुरु थे, नीच अछूत नहीं, उनके अंदर नयी ऊर्जा आई|

 

पर आज मिलावट वाले धम्म लोगों तक पहुंच रहा है ऐसे में सही धम्म का मर्म समझने के लिए मैंने आज की धम्म देशना का विषय ब्राह्मण और बौद्ध धम्म की शिक्षाएं चुना है|आज बहुत से लोग ऐसे भी हो गए हैं जो खुद को  बौद्ध या अम्बेडकर वादी तो कहते हैं, इनकी फोटो या मूर्ती लगाते और पहचानते भी हैं, पर इनकी शिक्षाओं को न ही जानते हैं न ही उनपर अपना जीवन चलाते हैं| ये परिवर्तन का दौर हैं ऐसा तो होगा ही  पर मैं आपको जोर देकर कहना चाहूँगा की केवल खुद को बौद्ध कहने भर से मुक्ति नहीं मिलगी बल्कि बौद्ध धम्म के मार्ग पर चलना पड़ेगा|

बौद्ध धम्म प्रैक्टिस की चीज़ है भक्ति की नहीं, करने से होगा, गाने बजाने से नहीं| गौतम बुद्ध और डॉ अम्बेडकर की मूर्ती की पूजा से कुछ न होगा उनकी शिक्षा को मैंने और ऊपर चलने से होगा, ध्यान रखना अगर इनकी पूजा शुरू हो गयी तो ये भी देवता बन जायेंगे और इनकी विचारधारा खत्म हो जायगी, जिसका लाभ आपके विरोधी लेंगे| ये बात गौतम बुद्ध जानते थे धम्म के लिए उन्होंने कहा था   “मैंने तुझे नौका दी थी नदी पार करने के लिए न कि सिर पर ढोने के लिए।” बुद्ध की इस उक्ति से उनके तर्क-संगत दर्शन की साफ झलक मिल जाती है। उनकी शिक्षा यह थी कि सत्य को पहले तर्क की कसौटी पर परखो, फिर उसमें विश्वास करो, जब तक जान न लेना मानना नहीं, आस्था या विश्वास से नहीं मानना| खेर इन सब बातों और शिक्षाओं पर तो हम अक्सर ही चर्चा करते हैं पर आज हम जानने की कोशिश करेंगे की बौद्ध शिक्षाओं पर चलकर कितना लाभ होता है|

बौद्धों में ब्राह्मणों के लिए उनके शोषक इतिहास के कारन घृणा का भाव है| गौतम बुद्ध का एक सूत्र है की “हम जिससे मोह करते हैं उसमें बुराई नहीं देख पाते और जिससे घृणा करते हैं उसमें अच्छाई नहीं देख पाते|” जब आप इस सूत्र पर और ब्राह्मणों के बहिष्कार पर गौर करोगे तो आप इस सूत्र को समझ सकते हो| आपको ये जान कर हैरानी होगी की आज के समय में भी जो ब्राह्मण गौतम बुद्ध के मार्ग पर चल रहे हैं वही इस देश की व्यस्था के मालिक हैं, खुश हाल हैं| ये और बात है की ब्राह्मण आज भी गौतम बुद्ध से नाराज है और उनका नाम भी अपने मीडिया में आने नहीं देता पर बौद्ध धम्म की शिक्षओं का सही इस्तेमाल कर के सुखी जीवन भी ब्राह्मण ही बिता रहे हैं| मन्दिरवाजी देवी देवता वगेरा अपनी जगह हैं पर उनको जो असल लाभ मिल रहा है वो बौद्ध मार्ग से ही मिल रहा है| आईये इसे कुछ उद्धरणों से समझते हैं:

 

(I)  प्रज्ञा (बुद्धि या विवेक, शिक्षा, ज्ञान)

बौद्ध धम्मम् प्रज्ञा पर बहुत जोर दिया जाता है| देखो अपने आस पार ब्राह्मण अपनी ज्ञान द्वारा  बुद्धि विवेक बढ़ा रहा है, अपने बच्चों को उची से ऊंची शिक्षा दिला रहा है| जिस कॉलोनी में  मेरा बचपन गुज़रा वो तब नयी  नयी ही बसी थी वहां बिहार और उत्तर प्रदेश से गरीब जनता काम की तलाश में आई थी जिसमे ब्राह्मण भी थे और मूलनिवासी कौमे भी , दोनों के घर एक जैसे कच्चे पक्के से थे| आज बीस तीस सालों बाद मैं देखता हूँ की शेडूल कास्ट में शिक्षितों को छोड़ दे तो ज्यादातर के घर आज भी फटे हाल है पर ब्राह्मण के घर अब पक्के और ऊंचे बन गए हैं| सब कैसे हुआ, मुझे याद है ब्राह्मण अपने बच्चों की शिक्षा पर बहुत जतदा जोर देते थे| और हमारे लड़के सरकारी स्कूल में पढ़ते थे, जागरण और देवी देवता की पूजा खूब करते थे| पर आज देखो जिसने शिक्षा ली वो कामयाब और खुशाल है बाकि मजदूरी करने को मजबूर हैं|

 

(II) शील (जिंदगी में नियम या उसूल होना) 

गौतम बुद्ध ने पंचशील पर चलने की शिक्षा दी|अगर आप घ्यान से सोचोगे तो समझ जाओगे की जिंदगी में जितने भी दुःख हैं उन सभी की जड़ों में इन्हीं पांच शीलों को तोडना ही है|   पंचशील है

१. अनावश्यक हिंसा से दूर रहना

२. हराम कमाई जैसे जुआ,चोरी,लूट आदि से दूर रहना

३. कामुक या सेक्स व्यभिचार से दूर रहना

४. झूठ बोलना चुगली करना आदि से दूर रहना

५. नशा करने से दूर रहना

आप अपने आस पास देखो ब्राह्मणों को देखो और दलितों को देखो, आप पाओगे की कुछ अपवादों को छोड़कर ब्राह्मण आज भी खुद हत्या नहीं करता न मांस खता है, न ही जुआ या तास खेलता मिलेगा,न ही नशे का शिकार मेलगा, शिक्षा और ज्ञान पर जोर होगा| मोटा मोती मैं ये कहना चाहता हूँ को ब्राह्मण पंचशीलों में बहुत कुछ अपने जीवन में बुद्ध काल से ही उतार चुका है| जो ब्राह्मण पंचशील तोड़ रहे हैं उनका पतन भी हो रहा है|हमारे लोग अक्सर प्राचीन इतिहास की किताबों से उदाहरण देते हैं की ब्राह्मण तब कितने घृणित काम करते थे| बुद्ध काल से पहले ब्राह्मण कुछ भी करते हों पर जो शीलों पर चलने के बाद वो खुशाल हैं|

(III) बुद्धम शरणम् गच्छामि:

इसका मतलब बुद्ध की मूर्ती की शरण में जाना नहीं है जैसे की ज्यादातर हमारे लोग समझते हैं| इसका मतलब है अपनी खुद की और ज्ञानियों की बुद्धि के शरण में जाओ| संसार की ज्यादातर समस्यां किसी न किसी की बुद्धि से ही जन्मती हैं और उनका हल भी किसी न किसी की बुद्धि से ही निकलता है| बौद्ध धम्म में बुद्धि ही सर्वोपरि है, या बात को समझने के लिए निम्न बौद्ध कहावत है “सब कहते हैं की ईश्वर ने संसार बनाया बौद्ध जानते हैं की इंसान की बुद्धि ने ईश्वर को बनाया”| बुद्धि की शरण में जाओ और प्रज्ञा विकसित करो आप भी ब्राह्मणों की तरह खुशहाल होओगे|बुद्ध काल से पहले ब्राह्मण कुछ भी करते हों पर जो बुद्धि की शरण में चल गए हैं वो खुशाल हैं|

(IV) संघम शरणम् गच्छामि:

संघ का मतलब केवल बौद्ध भिक्षुओं का संघ ही नहीं है, भिक्षु आपकी सुरक्षा कैसे करेंगे| इसका मतलब  अपनी सुरक्षा के लिए अपनी कौम के संगठन की शरण में जाओ| ब्राह्मणों के कई संगठन हैं और उन संगठनों के बल पर उन्होंने कितना कुछ हासिल किया है हम सब जान रहे हैं और देख रहे हैं, क्षत्रिय और शूद्र वर्ण में हज़ारों जातियां मिल जाएँगी पर भारत के एक कोने से दुसरे कोने तक ब्राह्मण एक ही है | १९२५ में जब भारत ने सामंतवादी हिन्दू राष्ट्र न बनकर प्रजातंत्र बनने का फैसला किया तब अल्पसंख्यक ब्राह्मणधर्मी  घबरा गए, क्योंकि प्रजा तंत्र में वोट से सरकार बनेगी और इनकी संख्या कम है तो ऐसे में इनकी उपेक्षा हो सकती है| तब इन्होने स्वेव सेवक संघठन बनाया और ब्राह्मण धर्म शब्द की जगह हिन्दू धर्म अपनाया, मतलब गौतम बुद्ध की शिक्षा “समय के प्रवाह में बने रहो को अपनाया” | समयबुद्धा धम्म सूत्र कहता है “चार सौ रन छोड़ों से चालीस टिकने वाले सूरमा जीत जाते हैं”  आज आप खुद देख रहे हो, छिप छिपा कर चलने वाला संगठन आज कहाँ है|ये समझ चुके हैं की संघ से ऊपर कुछ नहीं चाहे वो कोई भी हो, अगर उसके हटने में संघ का भला है तो हटा ही देते हैं| देखो दलित लोग न्योता मिलने के बावजूद अपने संगठन में नहीं जाते| बुद्ध काल से पहले ब्राह्मण कुछ भी करते हों पर जो संघ की शरण में चल रहे हैं वो खुशाल हैं|

 

(V) धम्मम शरणम् गच्छामि :

धम्म का मतलब है न्याय और जीवन विकास के सूत्र|देखो अपने आस पास को जितना दलित,गरीब और अनपढ़ है वो उतना ही ज्यादा भक्ति में लगा हुआ है, जीवन सूत्रों को न ही जनता है न ही उनपर चलता है परिणाम दुखी है| दूसरी तरफ ब्राह्मण भले ही भक्ति तो करता है पर जीवन सूत्रों पर भी चलता है|सूत्र ऐसे बात होती है जो हमारे जीवन को खुशाल करती है, समस्त बौद्ध धम्म शिक्षा सूत्रों की ही शिक्षा है जो कभी भी पुरानी नहीं पड़ती| जैसे वो हजारों साल पहले जीवन पर लागू थे वैसे ही आज भी हैं और आगे भी रहेंगे| जबकि दुसरे धर्मों की बातें विज्ञानं की तर्रकी की कारन गैरजरूरी और झूटी पड़ जाती है| इसी लिय धम्म को सनातन कहा गया है,सनातन मतलब सब समय एक सी…एक धम्मो सनंतनो| आप सूत्र का मतलब नहीं समझे होगे, सूत्र के कुछ उदाहरण हैं:

“हमेशा समय के प्रवाह में बने रहो”

“हम जो भी हैं अपनी सोच के कारन है आगे जो भी  अपनी सोच के कारन होंगे”

“पंचशील का पालन न करने से दुःख मिलेगा”

“अत्त दीपो भव, अपना मार्गदर्शक स्वेव बनो”

“जब तक जान न लो मानना मत, जानो फिर मनो”

“जिन्हें अपना इतिहास नहीं पता वो अपना वर्तमान नहीं सुधार सकता और भविष्ये नहीं बचा सकता”

“जिसे अपना जीवन सुधारना है उसे लड़ना होगा और जिसे लड़ना है उसे पहले पढ़ना होगा”

“राजनैतिक समस्याओं का समाधान राजनीती में ही है ईश्वरवाद में नहीं “

“किसी कौम की आबादी कितनी ही कम हो पर अगर वो राजनीती में सक्रिय है तो वो बेहतर जीवन बिताएंगी”

“राजनीती में हिस्सा न लेने का परिणाम ये होता है की अयोग्य व्यक्ति आपपर शाशन करने लगते हैं”

“जिसे जानता भाग्ये समझती है उसका फैसला राजनैतिक गलियारों में होता है “

शायद इन उदाहरणों से आप “सूत्र” शब्द का मतलब समझ गए होगे|

 

[VI] ध्यान दो , नध्यान(IGNORANCE) छोड़ो :

ध्यान का मतलब केवल ये नहीं है की अकेले बैठ कर अपनी आती जाती साँस को देखना, बल्कि ध्यान का मतलब है  अपने आस पास की घटनाओं और वातावरण पर ध्यान देना, अपना इतहास, वर्तमान और भविष्ये नीति का ज्ञान होना ताकि जागरूक रहो|बौद्ध होने का मतलब जाग जाना ही है| जागरूक रहोगे तो कोई तुम्हें धोखा नहीं दे सकता, बरगला नहीं सकता, चाहे उसपर कितना ही धन और मीडिया की शक्ति हो, तुम सही फैसला लोगे, सही जगह वोट दोगे| देखो ब्राह्मणवादी कितना ध्यान रखते हैं अपने आस पास की घटनाओं पर जो भी उनको अपने खिलाफ लगता है उसका इंतज़ाम कर देते हैं|जहाँ भी सही मौका मिलता है लपक लेते हैं और ऊँचे पदों पर बैठ जाते हैं| अपने पूर्वजों की शिक्षाओं को कभी नहीं त्यागते, उनपर ध्यान देते हैं और उनका पालन करते हैं , और दलित लोग , इनको बुद्ध या अम्बेडकर की किताब दे भी दो तो भी नहीं पढ़ते|आपमें से कितनो को डॉ अम्बेडकर की बाइस प्रतिज्ञा याद हैं | मैं ये धम्म देशना दे रहा हूँ और वो देखो बहार हमारे युवा अपनी ही दुनिया में मस्त हैं, मतलब ध्यान नहीं दे रहे तो ये बातें उनको पता ही नहीं चलेंगी|

 

(ग) अप्रमाद (संगर्ष शील होना, आलस्य न करना ):

देखो अपने आस पास दलित लोग कैसे अपना कीमती समय बर्बाद कर रहे हैं, और ब्राह्मण धीरे धीरे सत्ताधारी होता जा रहा है| सुबह पांच बजे उठ कर खाखी नेकर पहन कर संघ की शाखाओं में राजनीती के दाव पेच सीख रहा है, शरीर और संगठन मजबूत कर रहा है|हर वक़्त जगा हुआ और सतर्क रहता है, मेहनत करता है| आज बूढ़े ब्राह्मण राजनीती, इन जी ओ, मंदिर संस्था आदि  में सक्रिय हैं और दलितों के बुड्ढे कहीं गली में बैठे तास पीट रहे हैं, जवान इश्क में समय बर्बाद कर रहे हैं | ब्राह्मण संगर्ष कर रहा है और ये धम्म सूत्र है की जो संगर्ष करेग वो पायेगा, दलित तास पीटते रह जायेंगे और ब्राह्मण राजा बना जा रहा है|बुद्ध काल से पहले ब्राह्मण कुछ भी करते हों पर जो अप्रमाद पर चल रहे हैं वो खुशाल हैं|अगर कोई ब्राह्मण इसे पड़े तो उसे गौतम बुद्ध का धन्यवाद देना चाहिए, अगर नहीं मनो तो बुद्ध काल से पहले के सच्चे ब्राह्मण इतिहास को पढ़ना|ध्यान रहे तुम्हारे आज की अच्छी स्तिथि में उनकी शिक्षाओं का बहुत योगदान है| गौतम बुद्ध के शिष्यों में कई ब्राह्मण भी थे

ऐसे अनेकों अनेकों उदाहरण हैं बौद्ध शिक्षाओं औद्वारा  ब्राह्मण जीवन सुधार को बात को साबित करता हो| पर यहाँ इतना ही बहुत है आप मेरी बात का मर्म समझो तो आप खुद ही दो और दो चार कर लोगे, आप जान जाओगे की कौन सी धम्म शिक्षा से ब्राह्मण ने कितना फायदा उठाया|

जरा बुद्ध की शिक्षाओं पर चल तो देखो, आपका कल्याण निश्चित है| डॉ अम्बेडकर महान ने ऐसे ही तो आपको अपने धम्म में नहीं लौटाया, वो चाहते तो वर्तमान में सक्रिय इस्लाम, ईसाइयत या सिख धर्म में भी तो धर्मान्तरण करवा सकते थे, और हमारे लोग तो उस समय तक कर भी रहे थे|वाकई डॉ अम्बेडकर जैसा महान मासिया पाकर ये भारत और भारतवासी धन्ये हो गए|

 

बहुजन हिताए बहुजन सुखाये

…समयबुद्धा

 

 

 

 

2 thoughts on “29-Sep-2015 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना: आपको जानकर हैरानी होगी की असल बुद्ध धम्म शिक्षाओं पर कोई चला है तो वो ब्राह्मण ही है,देखो कितनी खुशाली पायी है| आप भी मिलावट वाली धम्म शिक्षाओं को छोड़ो और असल धम्म शिक्षा को अपनाओ|… समयबुद्धा

  1. धम्मम् नहीं धम्मं है
    और
    बुद्धं है neuter gender में पुर्लिंग

    न कि स्त्रीलिंग

    तो
    बुद्धं का अर्थ है बुद्ध की धम्म काय

    जिसका
    न स्त्रीलिंग न पुर्लिंग होता है ।।

    बुद्धि शब्द ही स्त्रीलिंग है अब क्या
    बुद्ध और बुद्धि में फर्क नहीं

    धम्म का नाश तो मत करो यारो अगर नहीं आता जाता कुछ ।।

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