आप सभी प्रबुद्ध साथियों का फिर से “द्वतीये सम्यक बौद्ध सम्मेलन ” में हार्दिक स्वागत है। 01नवंबर 2015 को तालकटोरा स्टेडियम, नई दिल्ली,निकट आर के आश्रम मेट्रो स्टेशन , समय दोपहर 12 बजे से रात 10 बजे तक

2nd samyak baudh sammelan
प्रथम सम्यक बौद्ध सम्मेलन, 21 दिसंबर 2014, स्थान – तालकटोरा स्टेडियम, नई दिल्ली, समय 1:00 बजे से रात 10:00 बजे तक, सौजन्य – यूथ फॉर बुद्धिस्ट इंडिया में हो चूका है

 

यूथ फॉर बुद्धिस्ट इंडिया फिर लेकर आ रहा है उत्तर भारत का सबसे भव्य सम्मेलन।
आप सभी प्रबुद्ध साथियों का फिर से
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द्वितीय सम्यक बौद्ध सम्मेलन ”
एवं
गीतों भरी शाम बाबासाहेब के नाम ”
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में हार्दिक स्वागत है।
आप जरूर आएं और साथ में परिवार, दोस्तों, रिश्तेदारो को भी लाएं ।
समाज निर्माण के लिए अपने साथ नए साथियों को जोडें और इस भव्य प्रोग्राम में साथ लेकर आए और बौद्धमय भारत के निर्माण में अपनी महती भूमिका निभाए।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शानदार भव्य प्रस्तुतियों के साथ
भारतवर्ष के नए उदीयमान कलाकारों और ढेरों नई प्रतिभाओं की नवीनतम प्रस्तुतियों के साथ ।
जिन्होंने बाबासाहेब के दर्शन किए उनका ” भीम रत्न सम्मान ” ( जो लोग पिछले सम्मेलन में रह गए थे )
” द्वितीय सम्यक बौद्ध सम्मेलन ” समाज की प्रतिष्ठित एवं बुद्धिजीवी महिलाओं को समर्पित होगा
समाज के प्रतिष्ठित एवं बुद्धिजीवीयों का धम्मगर्भित संबोधन।
इस प्रोग्राम को सफल बनाने में आप सभी धम्म ध्वजवाहकों की ऐतिहासिक गरिमामयी उपस्थिति बहुत आवश्यक है।
समाज के सभी प्रतिष्ठित संगठन अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज करा कर समाज के संगठित होने का परिचय दे।
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1⃣नवंबर 2015⃣
स्थान – तालकटोरा स्टेडियम, नई दिल्ली
निकट मैट्रो स्टेशन – आर के आश्रम मेट्रो स्टेशन
⏰ 12⃣बजे से रात 10 बजे तक,
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰सौजन्य – यूथ फॉर बुद्धिस्ट इंडिया
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*सम्पर्क – बौद्धाचार्य शांति स्वरूप बौद्ध (संरक्षक) 09810161823
*हरि भारती (अध्यक्ष) 09717454430
*सुधीर भास्कर (सचिव) 09717878086
*संदीप बौद्ध (कोषाध्यक्ष) -09810249452
*मुकेश गौतम ( उपाध्यक्ष) 09971720390
*सत्यप्रकाश गौतम ( उपाध्यक्ष) -09958574779
*हेमंत कुमार बौद्ध ( सहसचिव) 09999151331
**➖तन मन धन के सहयोग की अपेक्षा सहित
( सभी दान देने वाले प्रबुद्ध साथियों को संस्था का हिसाब किताब जानने का पूरा अधिकार है )
* रात्रि भोजन की व्यवस्था है।
* कृप्या समय से पधारकर अपना और अपनो का स्थान सुनिश्चित करें।
निवेदक-कपिल स्वरूप बौद्ध (सम्यक प्रकाशन) -09818390161
✊जय भीम नमो बुद्धस्स्
आप आ रहे हैं क्या ???

 

 

जिनको लगता है की यह हमारी परम्परा, हमरी संस्कृति, हमारे नायकों की संध्या
है वे ज़रूर आयें. यह फेस्टिवल ह्मे हमारे खोए हुए इतिहास को पुन: प्राप्त करने
का अनूठा प्रयास है. भारतीय समाज अनेक सस्कृतियों एवं समजो का साक्षी रहा है,
इसी लिए ‘अनेकता मे एकता” का नारा बुलंद किया. भारत की अनेक संस्कृतियों
मेी बौध संस्कृति भी एक है. आज यह संस्कृति विश्व के 170 देशो मे फल-फूल
रही है. इसी लिए बौध दर्शन को केवल एक राष्ट्र के लिए नही पूरे विश्व के लिए
कल्लयाँणकरी माना गया है. अत: आप जब इस करक्रम मे शामिल होगे तो राष्ट्र-
निर्माण ही मे नही विश्व निर्माण में अपना योगदान दोगे.
प्रो. विवेक कुमार,

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बुद्ध और नालागिरी हाथी- एक कहानी… बुद्धकथाएँ

buddha28_medबुद्ध और नालागिरी हाथी

बुद्ध का ममेरा भाई देवदत्त सदा ही बुद्ध को नीचा दिखाने की चेष्टा में लगा रहता था, मगर उसे हमेशा मुँह की ही खानी पड़ती थी।

एक बार बुद्ध जब कपिलवस्तु पहुँचे तो अनेक कुलीन शाक्यवंसी राजकुमार उनके अनुयायी बने। देवदत्त भी उनमें से एक था।

कुछ समय पश्चात् देवदत्त ने भी कुछ जादुई शक्तियाँ प्राप्त कीं और एक बार उनका प्रदर्शन मगध के भावी सम्राट अजातशत्रु के समक्ष किया। वहाँ वह एक शिशु के रुप में प्रकट हुआ जिसने साँप की मेखला बाँधी हुई थी। तभी से अजातशत्रु उसे परम आदर की दृष्टि से देखा करता था।

कुछ दिनों के बाद देवदत्त मगध से लौट कर जब संघ में वापिस आया तो उसने स्वयं को बुद्ध से श्रेष्ठ घोषित किया और संघ का नेतृत्व करना चाहा। भिक्षुओं को बुद्ध से विमुख करने के लिए उसने यह कहा हैं कि बुद्ध तो बूढ़े हो चुके थे और सठिया गये हैं। किन्तु भिक्षुओं ने जब उसकी कोई बात नहीं सुनी तो वह बुद्ध और संघ दोनों से द्वेष रखने लगा।

खिन्न होकर वह फिर वापिस मगध पहुँचा और अजात शत्रु को महाराज बिम्बिसार का वध करने के लिए प्रेरित किया क्योंकि बिम्बिसार बुद्ध और बौद्धों को प्रचुर प्रश्रय प्रदान करते थे। प्रारंभिक दौर में बिम्बिसार को मरवाने की उसकी योजना सफल नहीं हुई। अत: उसने सोलह धुनर्धारियों को बुद्ध को मारने के लिए भोजा। किन्तु बुद्ध के व्यक्तित्व से प्रभावित हो सारे उनके ही अनुयायी बन गये।

क्रोध में देवदत्त ने तब बुद्ध पर ग्रीघकूट पर्वत की चोटी से एक चट्टान लुढ़काया जिसे पहाड़ से ही उत्पन्न हो दो बड़े पत्थरों ने रास्ते में ही रोक दिया।

देवदत्त के क्रोध की सीमा न रही। उसने एक दिन मगध राज के अस्तबल में जाकर एक विशाल हाथी नालगिरी को ताड़ी पिलाकर बुद्ध के आगमन के मार्ग में भेज दिया। नालगिरी के आगमन से सड़कों पर खलबली मच गई और लोग जहाँ-तहाँ भाग खड़े हुए। तभी बुद्ध भी वहाँ से गुजरे। ठीक उसी समय एक घबराई महिला अपने बच्चे को हाथी के सामने ही छोड़ भाग खड़ी हुई। जैसे ही नालगिरि ने बच्चे को कुचलने के लिए अपने पैर बढ़ाये बुद्ध उसके ठीक सामने जा खड़े हुए। उन्होंने हाथी के सिर को थपथपाया। बुद्ध के स्पर्श से नालगिरि उनके सामने घुटने टेक कर बैठ गया।

नालगिरि हाथी की इस घटना से देवदत्त मगध में बहुत अप्रिय हुआ और उसे तत्काल ही नगर छोड़ कर भागना पड़ा।

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गौतम बुद्ध ने एक कन्या को अछूत मानने से रोका, एक कहानी ..बुद्धकथाएँ

Gautam-Buddhaएक बार वैशाली नगर के बाहर जाते हुए गौतम बुद्ध ने देखा कि कुछ सैनिक तेजी से भागती हुई एक लड़की का पीछा कर रहे हैं। वह डरी हुई लड़की एक कुएं के पास जाकर खड़ी हो गई। वह हांफ रही थी और प्यासी भी थी। बुद्ध ने उस बालिका को अपने पास बुलाया और कहा कि वह उनके लिए कुएं से पानी निकाले, खुद भी पिए और उन्हें भी पिलाए। इतनी देर में सैनिक भी वहां पहुंच गए। बुद्ध ने उन सैनिकों को हाथ के संकेत से रुकने को कहा।

उनकी बात पर वह लड़की कुछ झेंपती हुई बोली महाराज मै एक अछूत कन्या हूं। मेरे कुएं से पानी निकालने पर जल दूषित हो जाएगा। बुद्ध ने उस से फिर कहा पुत्री, बहुत जोर की प्यास लगी है, पहले तुम पानी पिलाओ। इतने में वैशाली के राजा भी वहां आ पहुंचे। उन्होंने बुद्ध को प्रणाम किया और सोने के बर्तन में केवड़े और गुलाब का सुगंधित पानी पेश किया। बुद्ध ने उसे लेने से इंकार कर दिया। एक बार फिर बालिका से अपनी बात कही। इस बार बालिका ने साहस बटोरकर कुएं से पानी निकल कर खुद भी पिया और गौतम बुद्ध को भी पिलाया।

पानी पीने के बाद बुद्ध ने बालिका से भय का कारण पूछा। लड़की ने बताया मुझे संयोग से राजा के दरबार में गाने का अवसर मिला था। राजा ने मेरा गीत सुन मुझे अपने गले की माला पुरस्कार में दी, लेकिन उन्हें किसी ने बताया कि मै अछूत लड़की हूं। यह पता चलते ही उन्होंने अपने सिपाहियों को मुझे कैद खाने में डाल देने का आदेश दिया। मै किसी तरह उनसे बचकर यहां तक पहुंची थी। इस पर बुद्ध ने कहा, सुनो राजन! यह लड़की अछूत नहीं है, आप अछूत हैं। जिस बालिका के मधुर कंठ से निकले गीत का आपने आनंद उठाया, उसे पुरस्कार दिया, वह अछूत हो ही नहीं सकती। गौतम बुद्ध की ये बात सुनकर राजा लज्जित महसूस करने लगे।

इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। जात-पात के आधार किया जाने वाला भेदभाव निरर्थक है, जो ऐसा सोचते हैं वे खुद सबसे बड़े अछूत हैं।इंसान अपने कर्मों से बड़ा होता है न कि सोच से।

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27-OCT-2015 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना: बाबा साहब डॉ आंबेडकर की इच्छाएं और हमसे उपेक्षाएं, जरूर पढ़ें और समझें…समयबुद्धा

ambedkar sandeshबाबा साहेब भी दलित शब्द को सही नहीं मानते थे, हमें भी इस ब्राह्मणवादी मीडिया के कलंक और नहीं ढोना है|

घटनाक्रम इस प्रकार है
1=बाबा साहेब ने 1920 में मूकनायक अख़बार निकला दलित अख़बार नहीं निकाला
1=1924 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा बनाया दलित हित कारिणी सभा नहीं बनाया
3=1927में बहिष्कृत भारत अख़बार निकाला दलित भारत अख़बार नहीं निकल
4 =1930 में मराठी जनता पाक्षिक अख़बार निकाला दलित अख़बार निहाई निकाला
5 =1937में independent labour party बनायीं दलित पार्टी नहीं बनायीं
6= 1942 में sceduled cast Federation की स्थापना किया दलित फेडरेशन नहीं बनाया
7=1945में The people education society बनाई दलित एजुकेशन सोसाइटी नहीं बनायीं

सम्पूर्ण वांग्मय खंड 16 पेज 316 पर गोलमेज सम्मलेन में दिया हुआ ज्ञापन जिसमे दलित नाम के आलावा दूसरा नाम चाहिए दिया है
जब बाबा साहेब दलित शब्द को पसंद नहीं करते तो हम क्यों| जब हम अपना सम्मान खुद करेंगे तब दुनिया करेगी , ध्यान रहे सम्मान माँगा नहीं छीना जाता है| बाबा साहब हमको बौद्ध बनाकर ब्राह्मणवादी शब्द – हरिजन,दलित,पराजित,शूद्र,अछूत, जैसे जलील शब्दों से छुटकारा दिल चुके हैं, अब भी इनको ढोना आपकी इच्छा है| जो दलित है वो बौद्ध नहीं हो सकता और जो बौद्ध हो गया वो अब दलित कहाँ बचा|

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डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर कहते थे कि, मुझे “आंखे बंद कर बैठा हुआ ध्यानी बुद्ध पसंद नहीं है, बल्कि, “पैरों पर खडे होकर प्रचार प्रसार करने वाला क्रांतिकारी बुद्ध चाहिए”। इसका मतलब यह है कि, क्रांतिकारी बुद्ध और क्रांतिकारी भिक्षु संघ को बाबासाहेब मानते थे। इसलिए, उन्होंने वर्तमान भिक्षु संघ की शरण में जाने की बजाय तथागत बुद्ध के समय के भिक्षु संघ की शरण में जाना उचित समझा था।
भारत में ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के लिए तथागत बुद्ध ने 45 सालों तक अपनी विचारधारा का (धम्म का) प्रचार प्रसार किया था और अपने भिक्षुओं को भी उन्होंने यही आदेश दिया था।
लेकिन, इस. पूर्व 185 में ब्राम्हणों ने बौद्ध संघ में घुसकर उन्होंने संघ को 18 पंथों में विभाजित किया और क्रांतिकारी बौद्ध धर्म को कर्मकांडी धर्म अर्थात महायान में परिवर्तित किया।
वर्तमान में हमारा बौद्ध भिक्षु संघ बुद्ध की तरह क्रांतिकारी बनने के बजाय इसी ब्राह्मणी कर्मकांडों में उलझा हुआ है। इस बौद्ध संघ को और ज्यादा तहत नहस करने के लिए ब्राह्मणवादी लोग बडी संख्या में बौद्ध भिक्षु संघ में घुस रहे हैं। पिछले साल ही  तीन हजार ब्राह्मणवादी लोग ने भिक्षु संघ की दिक्षा ली थी।
अर्थात, व्यवस्था परिवर्तन के हमारे मुल उद्देश्य के लिए वर्तमान बौद्ध संघ प्रासंगिक नहीं है। इसलिए, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर इस संघ की शरण नहीं गये थे। इसलिए, तथाकथित आंबेडकरवादी लोगों ने भी इसपर विचार विमर्श करना चाहिए। अगर वर्तमान बौद्ध संघ बाबासाहब की नजर में प्रासंगिक नही है, तो उसे प्रासंगिक कैसे किया जाए, इसपर हमारे बुद्धिजीवी लोगों ने मंथन करना चाहिए।
जय मुलनिवासी।।
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बाबा साहब का अंतिम सन्देश
‘‘मेरे लोगों से कह देना नानक चन्द!
मैं उनके लिए जो कुछ भी हासिल कर पाया हूँ, वह मैंने अकेले ही किया है और यह मैंने विध्वंसक दुखों और अन्तहीन परेशानियों से गुजरते हुए, चारों ओर, विशेष कर हिन्दू अखबारों की ओर से मुझ पर की गई गालियों की बौछारों के बीच किया है, मैंने सारा जीवन अपने विरोधियों और अपने ही उन मुट्ठी भर लोगों से लड़ता रहा हूँ, जिन्होंने अपने स्वार्थी उद्देश्यों के लिए मुझे धोखा दे दिया।मैंने बड़ी कठिनाइयों से अपने कारवाँ को यहाँ तक लेकर आया हूँ, जहाँ यह आज दिखाई देता है।
कारवाँ को इसकी राह में आने वाली बाधाओं,अप्रत्या ­शित विपत्तियों और कठिनाइयों के बावजूद चलते रहना चाहिए। अगर वे एक सम्मानजनक और प्रतिष्ठित जीवन जीना चाहते हैं, तो उन्हें इस अवसर पर अपनी क्षमता दिखानी ही होगी। यदि मेरे लोग, मेरे साथी कारवाँ को आगे ले जाने के योग्य नहीं हैं, तो वो इसे वहीं छोड़ देना चाहिए, जहाँ यह आज दिखाई दे रहा हैं, लेकिन उन्हें किसी भी रूप में इस कारवाँ को पीछे न ले जाये।मैं पूरी गम्भीरता में यह सन्देश दे रहा हूँ, जो शायद
मेरा अन्तिम सन्देश है और मेरा विश्वास है कि यह व्यर्थ नहीं जाएगा।”जाओ जाकर उनसे उनसे कह दो”

यह कहकर बाबा साहेब के आँखोँ मेँ आँसु आ गए वो सिसक रहे थे ।

ambedkar rajniti

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डॉ. अम्बेडकर की 22 प्रसिद्ध प्रतिज्ञाएँ 

 डॉ. अम्बेडकर की 22 प्रतिज्ञाएँ 

डा बी.आर. अम्बेडकर ने दीक्षा भूमि, नागपुर, भारत में ऐतिहासिक बौद्ध धर्मं में परिवर्तन के अवसर पर,15 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं.800000 लोगों का बौद्ध धर्म में रूपांतरण ऐतिहासिक था क्योंकि यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक रूपांतरण था.उन्होंने इन शपथों को निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके.ये 22 प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं. ये एक सेतु के रूप में बौद्ध धर्मं की हिन्दू धर्म में व्याप्त भ्रम और विरोधाभासों से रक्षा करने में सहायक हो सकती हैं.इन प्रतिज्ञाओं से हिन्दू धर्म,जिसमें केवल हिंदुओं की ऊंची जातियों के संवर्धन के लिए मार्ग प्रशस्त किया गया, में व्याप्त अंधविश्वासों, व्यर्थ और अर्थहीन रस्मों, से धर्मान्तरित होते समय स्वतंत्र रहा जा सकता है. प्रसिद्ध 22 प्रतिज्ञाएँ निम्न हैं:
१. मैं, ब्रम्हा, विष्णू और महेश इनको भगवान नहीं मानूंगा तथा इनकी उपासना नहीं करुंगा।
२. मैं, राम और कृष्ण इनको भगवान नही मानूंगा तथा इनकी उपासना नहीं करुंगा।
३. मैं, गौरी, गणपती आदि हिंदूधर्म की किसी भी देवी या देवताओं को नहीं मानूंगा तथा इनकी उपासना नहीं करुंगा।
४. मैं, भगवान ने कभी अवतार लिया इस पर मैं विश्वास नहीं रखता।
५. बुद्ध यह विष्णू का अवतार है इस पर मेरा विश्वास नही है, यह जान-बुझकर किया गया झुठा प्रचार है ऐसा मैं मानता हुँ।
६. मैं, श्राद्ध पक्ष नही करुंगा तथा पिंड-दान नही करुंगा।
७. मैं, बुद्ध के तत्वों और शिक्षा का भंग हो ऐसा आचरण नहीं करुंगा।
८. मैं, ब्राम्हणों द्वारा किए जाने वाले किसी भी धर्मानुष्ठान को अनुमति नही दूंगा।
९. मैं, मानव की समानता में विश्वास रखुंगा।
१०. मैं, समता प्रस्थापित करने में प्रयत्न करुंगा।
११. मैं, बुद्ध के “आर्य अष्टांगिक मार्ग” का पालन करुंगा।
१२. मैं, बुद्ध द्वारा बतायी गई “पारमिताओं” का पालन करुंगा।
१३. मैं, सभी सजीवों पर करुणा तथा दया करुंगा और उनकी रक्षा करुंगा।
१४. मैं चोरी नहीं करुंगा।
१५. मैं झुठ नहीं बोलुंगा।
१६. मैं, व्यभिचार नहीं करुंगा।
१७. मैं, शराब, मादक पेय जैसे नशीले द्रव्यों का सेवन नहीं करुंगा।
१८. मैं बौद्धधर्म के प्रज्ञा, शील तथा करुणा इन तीन तत्वों को अपनाकर अपना जीवन यापन करुंगा।
१९. मैं, हिंदूधर्म का परित्याग करता हुँ, जो असमानता पर आधारित होने के कारण मानवता के लिए हानिकारक और मानव की उन्नति और विकास में बाधक है, और अपने धर्म के रुप में बुद्ध धर्म का स्वीकार करता हुँ।
२०. केवल बुद्ध का धम्म ही सत्य धर्म है ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।
२१. यह (धर्मांतरण से) मेरा पुनर्जन्म हो रहा है ऐसा मैं मानता हूँ।
२२. मैं विधिवत् तथा दृढ़तापूर्वक यह घोषणा करता हुँ कि मैं इसके बाद मेरा जीवन बुद्ध और उनके धम्म के तत्वों तथा शिक्षा के अनुसार बिताऊंगा।

पिछले कुछ दिनो मे दलितो के साथ अन्याय की कुछ मुख्य घटनाएं….Harbans Virdee, London

dalit nagaur rajasthanपिछले कुछ दिनो मे दलितो के साथ अन्याय की कुछ मुख्य घटनाएं..

1 . महाराष्ट्र में अंबेडकर पर आधारित रिंगटोन रखने पर दलित युवक की हत्या ।

2 दलितों को मंदिर जाने पर रोक ।

3 . बिहार मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के मंदिर जाने से मंदिर जाने से मंदिर अछूत, मंदिर धोया।

4. दलित प्रोफ़ेसर जो बैठने के किये कुर्सी नही ।

5 . 200 दलित परिवारो को पानी लेने से रोका गया ।

6 . दलित दूल्हा घोड़े पर बैठा तो उसपर पथराव ।

7. दलित ने साथ खाना खाँ लिया तो उसकी नाक काटी ।

8. दलित महिला को गुजरात में बिच चौराहे पर जलाया ।

9 . आदिवाशी महिला को डायन बता उसके साथ किया रेप ।

10 . आईआईटी मद्रास दलित ग्रुप को हिन्दूऔ के द्वारा बंद किया ।

11. दलित महिलाओ को र्निवस्त्र घुमाया ।

12 . दबंगों के डर से दलित परिवार ने छोड़ा गांव ।

13 . दलितों को दंबगों के सामने चारपाई पर बैठना महंगा पड़ गया. दंबगों ने दलित के साथ घर में घुसकर मारपीट की

14. MP: अलीराजपुर के गांव में दलित नहीं पी सकते हैंडपंप से आज भी पानी ।

15. पानी भरने पर दलित को जिंदा जलाने की कोशिश ।

16. दलित महिला सरपंच बनी तो गोबर खिलाया गया ।

17. बीएसए ने शैक्षिक दलित ग्रुप को थमाया नोटिस ।

18. नशे में धुत्त दबंगों ने दलित को तेज हथियार से काट डाला ।

19. गुजरात के 77 गांवों में दलितों के मंदिर में प्रवेश पर प्रतिबंध ।

20. दलित युवक को खूंटे से बांध पीटा ।

21. राजस्थान मे 4 दलितो की हत्या एवं महिलाओं के साथ बलात्कार ।

22. पूरे दलित परिवार को पुलिस ने नंगा किया ।

23. 4 दलितों को फ़रीदाबाद में जिंन्दा जलाया।

ये सभी घटनाएं पीछले 3 महीनों मे घटित हुई है॥

emailcgautam@gmail.com

1800 साल पुराना सातवाहन राजाओ का बौद्ध केंद्र होगा ,अब आंध्र प्रदेश की नयी राजधानी अमरावती आन्ध्र प्रदेश के गुंटूर ज़िले में कृष्णा नदी के दाहिने तट पर स्थित यह नगर सातवाहन राजाओं के शासनकाल में बौद्ध संस्कृति का केन्द्र था।…बुद्धकथाएँ facebook page

amravati andra pradesh buddhism1800 साल पुराना सातवाहन राजाओ का बौद्ध केंद्र होगा ,अब आंध्र प्रदेश की नयी राजधानी
अमरावती आन्ध्र प्रदेश के गुंटूर ज़िले में कृष्णा नदी के दाहिने तट पर स्थित यह नगर सातवाहन राजाओं के शासनकाल में बौद्ध संस्कृति का केन्द्र था। इसका प्राचीन नाम धान्यघट या धान्यकटक अथवा धरणिकोट है। कृष्णा नदी के तट पर बसे होने से इस स्थान का बड़ा महत्त्व था।
इतिहास
धम्मपद अट्ठकथा में उल्लेख है कि बुद्ध अपने किसी पूर्व जन्म में सुमेध नामक एक ब्राह्मण कुमार के रूप में इस नगर में पैदा हुए थे। अशोक की मृत्यु के बाद से तक़रीबन चार शताब्दियों तक दक्षिण भारत में सातवाहनों का शासन रहा। आंध्रवंशीय सातवाहन नरेश शातकर्णी ने लगभग 180 ई.पू. अमरावती को अपनी राजधानी बनाया। सातवाहन नरेश ब्राह्मण होते हुए भी महायान मत के पोषक थे। और उन्हीं के शासनकाल में अमरावती का प्रसिद्ध बौद्ध स्तूप बना, जो तेरहवीं शताब्दी तक बौद्ध यात्रियों के आकर्षण का केन्द्र बना रहा। मूल स्तूप घण्टाकार था। स्तूप की ऊँचाई सौ फुट थी। आधार से शिखर तक तक्षित शिला-पट्ट लगाये गये थे। इस प्रकार का अलंकरण अन्यत्र नहीं मिलता। चीनी यात्री युवानच्वांग ने उस स्थान के बारे लिखा था कि बैक्ट्रिया के समस्त भवनों की शान-शौक़त इसमें निहित थी। बुद्ध के जीवन की कथाओं के दृश्य उन पर उत्कीर्ण थे।
अमरावती स्तूप लगभग द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में कर्नल कालिन मैकेंजी ने ही सर्वप्रथम इस स्तूप का पता लगाया था। अमरावती स्तूप घंटाकृति में बना है। इस स्तूप में पाषाण के स्थान पर संगमरमर का प्रयोग किया गया है।
वास्तुकला और मूर्तिकला
स्तूप के अवशेष ही बचे हैं। इसके बचे-खुचे अवशेष ब्रिटिश संग्रहालय, लन्दन, राष्ट्रीय संग्रहालय, कोलकाता और चेन्नई संग्रहालय में देखे जा सकते हैं। इन अवशेषों के आधार पर कहा जा सकता है कि अमरावती में वास्तुकला और मूर्तिकला की स्थानीय मौलिक शैली विकसित हुई थी। यहाँ से प्राप्त मूर्तियों की कोमलता एवं भाव-भंगिमाएँ दर्शनीय हैं। प्रत्येक मूर्ति का अपना आकर्षण है। कमल पुष्प का अकंन इस बड़े स्वाभाविक रूप से हुआ है। अनेक दृशयों का साथ-साथ अंकन इस काल के अमरावती के शिल्प की प्रमुख विशेषता मानी जाती है। बुद्ध की मूर्तियों को मानव आकृति के बजाय प्रतीकों के द्धारा गढ़ा गया है, जिससे पता चलता है। कि अमरावती शैली, मथुरा शैली और गान्धार शैली से पुरानी है। यह यूनानी प्रभाव से पूर्णतया मुक्त थी। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि जिस समय अमरावती का स्तूप अपनी अक्षुण्ण अवस्था में रहा होगा, उस समय वह दक्षिण भारत के मूर्ति शिल्प का अपना ढँग का अत्यंत भव्य उदाहरण रहा होगा। अमरावती मूर्ति कला शैली, जो दक्षिण-पूर्वी भारत में लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. से तीसरी शताब्दी ई. तक सातवाहन वंश के शासनकाल में फली-फूली। यह अपने भव्य उभारदार, भित्ति-चित्रों के लिए जानी जाती है। जो संसार में कथात्मक मूर्तिकला के सर्वश्रेष्ट उदाहरण हैं।
आन्ध्र वंश के पश्चात् अमरावती पर कई शताब्दियों तक इक्ष्वाकु राजाओं का शासन रहा। उन्होंने उस नगरी को छोड़कर नागार्जुनकोंडा या विजयपुर को अपनी राजधानी बनाया।
कैसी होगी नई अमरावती?
> एन चंद्रबाबू नायडू की सरकार ने अमरावती को राजधानी बनाने के लिए 32,000 एकड़ जमीन ली है। सरकार के पास अब 50,000 एकड़ जमीन है।
> कृष्णा नदी के किनारे विजयवाड़ा-गुंटुर रीजन में नई राजधानी के लिए किसानों की जमीन ली गई है।
> किसी राज्य की यह पहली ऐसी राजधानी होगी जिसे इस तरह जमीन जुटा कर बनाया जा रहा है। इसे लैंड-पूलिंग कॉन्सेप्ट कहा जाता है।
> यह ऐसा पहला शहर होगा जहां पोस्ट डेवलपमेंट में मालिकों को शेयर मिलेगा।
> अमरावती विजयवाड़ा और गुंटुर जैसे शहरों के बीच में आता है। ये शहर नई राजधानी के डेवलपमेंट में कैटेलिस्ट की भूमिका निभा सकते हैं।
> अमरावती से सटे चार नेशनल हाईवे, एक नेशनल वाटर हाईवे, रेलवे का ग्रैंड ट्रंक रूट, तेजी से बढ़ रहा एयरपोर्ट और एक सी-पोर्ट है। यह शहर को फायदा पहुंचाएगा।
> 450 साल तक अमरावती का इलाका आंध्र प्रदेश तेलंगाना, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक तक फैला हुआ था।
> नए डिजाइन के तहत इस शहर को ईस्ट कोस्ट पर इसे ‘गेटवे ऑफ इंडिया’ के रूप में स्थापित किया जाएगा।

 

‘एक गोभक्त से भेंट’…हरिशंकर परसाई // गाय को लेकर हो रही राजनीति नई नहीं है. भारत में चुनावों के वक्त गोभक्ति का मौसम जरूर आता है. प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने बरसों पहले इस गोभक्ति और भक्तों की खबर अपने व्यंग्य ‘एक गोभक्त से भेंट’ में ली थी, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है

cow_2808059bएक गोभक्त से भेंट- हरिशंकर परसाई

एक शाम रेलवे स्टेशन पर एक स्वामीजी के दर्शन हो गए. ऊंचे, गोरे और तगड़े साधु थे. चेहरा लाल. गेरुए रेशमी कपड़े पहने थे. पांवों में खड़ाऊं. हाथ में सुनहरी मूठ की छड़ी. साथ एक छोटे साइज का किशोर संन्यासी था. उसके हाथ में ट्रांजिस्टर था और वह गुरु को रफी के गाने के सुनवा रहा था.

मैंने पूछा- स्वामी जी, कहां जाना हो रहा है?

स्वामीजी बोले – दिल्ली जा रहे हैं, बच्चा!
मैंने कहा- स्वामीजी, मेरी काफी उम्र है, आप मुझे ‘बच्चा’ क्यों कहते हैं?

स्वामीजी हंसे. बोले – बच्चा, तुम संसारी लोग होटल में साठ साल के बूढ़े बैरे को ‘छोकरा’ कहते हो न! उसी तरह हम तुम संसारियों को बच्चा कहते हैं. यह विश्व एक विशाल भोजनालय है जिसमें हम खाने वाले हैं और तुम परोसने वाले हो. इसीलिए हम तुम्हें बच्चा कहते हैं. बुरा मत मानो. संबोधन मात्र है.

स्वामीजी बात से दिलचस्प लगे. मैं उनके पास बैठ गया. वे भी बेंच पर पालथी मारकर बैठ गए. सेवक को गाना बंद करने के लिए कहा.

कहने लगे- बच्चा, धर्मयुद्ध छिड़ गया. गोरक्षा-आंदोलन तीव्र हो गया है. दिल्ली में संसद के सामने सत्याग्रह करेंगे.

मैंने कहा- स्वामीजी, यह आंदोलन किस हेतु चलाया जा रहा है?
स्वामीजी ने कहा- तुम अज्ञानी मालूम होते हो, बच्चा! अरे गौ की रक्षा करना है. गौ हमारी माता है. उसका वध हो रहा है.

मैंने पूछा- वध कौन कर रहा है?

वे बोले- विधर्मी कसाई.

मैंने कहा- उन्हें वध के लिए गौ कौन बेचते हैं? वे आपके सधर्मी गोभक्त ही हैं न?

स्वामीजी ने कहा- सो तो है. पर वे क्या करें? एक तो गाय व्यर्थ खाती है, दूसरे बेचने से पैसे मिल जाते हैं.

मैंने कहा- यानी पैसे के लिए माता का जो वध करा दे, वही सच्चा गो-पूजक हुआ!

स्वामीजी मेरी तरफ देखने लगे. बोले- तर्क तो अच्छा कर लेते हो, बच्चा! पर यह तर्क की नहीं, भावना की बात है. इस समय जो हजारों गोभक्त आंदोलन कर रहे हैं, उनमें शायद ही कोई गौ पालता हो पर आंदोलन कर रहे हैं. यह भावना की बात है.

स्वामीजी से बातचीत का रास्ता खुल चुका था. उनसे जमकर बातें हुईं, जिसमें तत्व मंथन हुआ. जो तत्व प्रेमी हैं, उनके लाभार्थ वार्तालाप नीचे दे रहा हूं.

स्वामीजी और बच्चा की बातचीत

स्वामीजी, आप तो गाय का दूध ही पीते होंगे?

नहीं बच्चा, हम भैंस के दूध का सेवन करते हैं. गाय कम दूध देती है और वह पतला होता है. भैंस के दूध की बढ़िया गाढ़ी मलाई और रबड़ी बनती है.

तो क्या सभी गोभक्त भैंस का दूध पीते हैं?

हां, बच्चा, लगभग सभी.

तब तो भैंस की रक्षा हेतु आंदोलन करना चाहिए. भैंस का दूध पीते हैं, मगर माता गौ को कहते हैं. जिसका दूध पिया जाता है, वही तो माता कहलाएगी.

यानी भैंस को हम माता…नहीं बच्चा, तर्क ठीक है, पर भावना दूसरी है.

स्वामीजी, हर चुनाव के पहले गोभक्ति क्यों जोर पकड़ती है? इस मौसम में कोई खास बात है क्या?

बच्चा, जब चुनाव आता है, तब हमारे नेताओं को गोमाता सपने में दर्शन देती है. कहती है बेटा चुनाव आ रहा है. अब मेरी रक्षा का आंदोलन करो. देशharishankar parsai की जनता अभी मूर्ख है. मेरी रक्षा का आंदोलन करके वोट ले लो. बच्चा, कुछ राजनीतिक दलों को गोमाता वोट दिलाती है, जैसे एक दल को बैल वोट दिलाते हैं. तो ये नेता एकदम आंदोलन छेड़ देते हैं और हम साधुओं को उसमें शामिल कर लेते हैं. हमें भी राजनीति में मजा आता है. बच्चा, तुम हमसे ही पूछ रहे हो. तुम तो कुछ बताओ, तुम कहां जा रहे हो?

स्वामीजी मैं ‘मनुष्य-रक्षा आंदोलन’ में जा रहा हूं.

यह क्या होता है, बच्चा?

स्वामीजी, जैसे गाय के बारे में मैं अज्ञानी हूं, वैसे ही मनुष्य के बारे में आप हैं.

पर मनुष्य को कौन मार रहा है?

इस देश के मनुष्य को सूखा मार रहा है, अकाल मार रहा है, महंगाई मार रही है. मनुष्य को मुनाफाखोर मार रहा है, काला-बाजारी मार रहा है. भ्रष्ट शासन-तंत्र मार रहा है. सरकार भी पुलिस की गोली से चाहे जहां मनुष्य को मार रही है. बिहार के लोग भूखे मर रहे हैं.

बिहार? बिहार शहर कहा है बच्चा?

बिहार एक प्रदेश है, राज्य है.

Source:

http://tehelkahindi.com/satire-on-cow-and-politics/

प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई