घोड़ी पर नहीं हाथी पर बारात ले जाना बौद्ध धम्म की प्रथा है …समयबुद्धा


घोड़ी पर नहीं हाथी पर बारात ले जाना बौद्ध धम्म की प्रथा है …समयबुद्धा

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निम्न 14-july-2013की टाइम्स ऑफ़ इंडिया की खबर को देखें :

http://timesofindia.indiatimes.com/india/Knot-scared-Rajasthan-dalit-groom-defies-threats-rides-horse/articleshow/21063085.cms

इस खबर का सार ये है की राजस्थान में आज भी पिछड़े बहुजन (दलित) दूल्हों को घोड़े पर चड़कर अपनी बारात सजाने और चढाने की आज़ादी नहीं हैं| अगर वो ऐसा करते हैं दबंग मनुवादी मानसिकता के लोग इनको प्रतारित करते हैं|दलितों को विशेष रूप से शादी के जुलूस के लिए एक घोड़े की सवारी करने के लिए अनुमति नहीं है|आज भी जातिवाद का जहर ख़तम होने पर नहीं आ रहा है|

इस खबर में राजस्थान के अजमेर जिले में नीमादा गांव की घटना का ब्यौरा दिया गया है| रंजीत सिंह बेरवा की बरात जानी थी पर गाँव के मनुवादी दबंगों ने उसे घोड़ी पर न चड़ने की धमकी दी थी|रंजीत सिंह बेरवा और उसके परिवार को पुलिस के पास अपनी सुरक्षा की अर्जी लगनी पड़ी और पुलिस की सुरक्षा में ही रंजीत सिंह बेरवा की बरात घोड़ी चढ़कर जा पायी|इस इलाके में किसी पिछड़े बहुजन की बारात घोड़े पर चड़ने की ये पहली घटना है|इससे पहले कभी किसी
पिछड़े बहुजन की बारात घोड़े पर नहीं गई थी|

कभी आपनी सोचा की शादी के वक़्त घोड़ी पर चढ़कर राजा जैसी वेशभूषा बनाकर और एक तलवाल लेकर बारात चढाने या लड़की वालों के यहाँ जाने का चलन क्यों है क्या है ये सब? ये सब कुछ नहीं बस यही दर्शाता है की किसी राजा द्वारा विजय करने के लिए घोड़ी पर जा रहा है और अपनी दुल्हन को जीतकर लाता है| ये यही दर्शाता है|

अब सवाल उठता है की क्या बहुजन घोडा नहीं चडेगा तो शादी नहीं होगी, बिलकुल होगी|

आर्ये अनार्य युद्ध में बहुजन अनार्यों की हार इसलिए हुई थी क्योंकि इनकी सेना के पास बैल थे जबकि आर्यों के पास घोड़े,इसीलिए शिव शंकर के पास बैल दर्शाया जाता है| तो इस तरह घोडा आर्यों की विजय का घोतक है| भारत में जब अनार्य/बौद्धों की क्रांति हुई और अनार्यों ने जब आर्यों से सत्ता अपने हाथों में ली तब उन युद्धों में “हाथी” का बड़ा योगदान था| हमारे सम्राट अशोक महान की सेना को इतिहासकार ELEPHANT WARRIORS अर्थात हाथी वाले योद्धा कहते थे|इस तरह हम ये कह सकते हैं की हाथी हमारे लिए बहुत उपयोगी साबित हुआ है| अधिक जानकारी के लिए ये विडियो देखिये|


अब समय आ गया है की हमें बौद्ध पद्धति से शादी की रस्म संपन्न करनी चाहिए| मैं समयबुद्धा आज तुमसे कहता हूँ की छोड़ो दूसरों की नक़ल अपनी रस्म और प्रथा आप बनाओ, अपनी बारात हाथी पर ले जाओ|

“बौद्ध संस्कृति में हम ‘हाथी’ को कई प्रकार के राजनेतिक एव धार्मिक चिन्ह के रूप में प्रयोग इसलिए करते हैं क्योंकि हमारी हिंसा जंगल में हाथी की हिंसा के सामान है|जिस तरह हाथी मासाहारी जानवरों की तरह पहल करके हिंसा नहीं करता पर जब उसे छेड़ा जाए तो वो इतना हिंसात्मक हो जाता है की सब तहस नहस कर डालता है| उसी तरह भारत का बहुजन या बौद्ध भी है पहल करके बिना वजह हिंसा नहीं करता|हाथी की हिंसा में ध्यान देने वाली बात ये है की उसको हिंसा की जरूरत इसलिए नहीं पड़ती क्योंकि उसकी ताकत का सबको अंदाजा होता है,ये बात हिरन पर लागू नहीं हो सकती|इसीलिए किसी ने सही कहा है की अगर शांति चाहिए तो युद्ध के लिए तयार रहो|”

हे बहुजनों केवल शिकायत मत करते रह जाओ अपनी लिए खुद ही नियम बनाओ अपने लिए खुद ही प्रथा बनाओ|दूसरों के नियम और दूसरों की प्रथाओं पर चलना बंद करो|

Buddhist Wedding

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