27-OCT-2015 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना: बाबा साहब डॉ आंबेडकर की इच्छाएं और हमसे उपेक्षाएं, जरूर पढ़ें और समझें…समयबुद्धा


ambedkar sandeshबाबा साहेब भी दलित शब्द को सही नहीं मानते थे, हमें भी इस ब्राह्मणवादी मीडिया के कलंक और नहीं ढोना है|

घटनाक्रम इस प्रकार है
1=बाबा साहेब ने 1920 में मूकनायक अख़बार निकला दलित अख़बार नहीं निकाला
1=1924 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा बनाया दलित हित कारिणी सभा नहीं बनाया
3=1927में बहिष्कृत भारत अख़बार निकाला दलित भारत अख़बार नहीं निकल
4 =1930 में मराठी जनता पाक्षिक अख़बार निकाला दलित अख़बार निहाई निकाला
5 =1937में independent labour party बनायीं दलित पार्टी नहीं बनायीं
6= 1942 में sceduled cast Federation की स्थापना किया दलित फेडरेशन नहीं बनाया
7=1945में The people education society बनाई दलित एजुकेशन सोसाइटी नहीं बनायीं

सम्पूर्ण वांग्मय खंड 16 पेज 316 पर गोलमेज सम्मलेन में दिया हुआ ज्ञापन जिसमे दलित नाम के आलावा दूसरा नाम चाहिए दिया है
जब बाबा साहेब दलित शब्द को पसंद नहीं करते तो हम क्यों| जब हम अपना सम्मान खुद करेंगे तब दुनिया करेगी , ध्यान रहे सम्मान माँगा नहीं छीना जाता है| बाबा साहब हमको बौद्ध बनाकर ब्राह्मणवादी शब्द – हरिजन,दलित,पराजित,शूद्र,अछूत, जैसे जलील शब्दों से छुटकारा दिल चुके हैं, अब भी इनको ढोना आपकी इच्छा है| जो दलित है वो बौद्ध नहीं हो सकता और जो बौद्ध हो गया वो अब दलित कहाँ बचा|

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डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर कहते थे कि, मुझे “आंखे बंद कर बैठा हुआ ध्यानी बुद्ध पसंद नहीं है, बल्कि, “पैरों पर खडे होकर प्रचार प्रसार करने वाला क्रांतिकारी बुद्ध चाहिए”। इसका मतलब यह है कि, क्रांतिकारी बुद्ध और क्रांतिकारी भिक्षु संघ को बाबासाहेब मानते थे। इसलिए, उन्होंने वर्तमान भिक्षु संघ की शरण में जाने की बजाय तथागत बुद्ध के समय के भिक्षु संघ की शरण में जाना उचित समझा था।
भारत में ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के लिए तथागत बुद्ध ने 45 सालों तक अपनी विचारधारा का (धम्म का) प्रचार प्रसार किया था और अपने भिक्षुओं को भी उन्होंने यही आदेश दिया था।
लेकिन, इस. पूर्व 185 में ब्राम्हणों ने बौद्ध संघ में घुसकर उन्होंने संघ को 18 पंथों में विभाजित किया और क्रांतिकारी बौद्ध धर्म को कर्मकांडी धर्म अर्थात महायान में परिवर्तित किया।
वर्तमान में हमारा बौद्ध भिक्षु संघ बुद्ध की तरह क्रांतिकारी बनने के बजाय इसी ब्राह्मणी कर्मकांडों में उलझा हुआ है। इस बौद्ध संघ को और ज्यादा तहत नहस करने के लिए ब्राह्मणवादी लोग बडी संख्या में बौद्ध भिक्षु संघ में घुस रहे हैं। पिछले साल ही  तीन हजार ब्राह्मणवादी लोग ने भिक्षु संघ की दिक्षा ली थी।
अर्थात, व्यवस्था परिवर्तन के हमारे मुल उद्देश्य के लिए वर्तमान बौद्ध संघ प्रासंगिक नहीं है। इसलिए, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर इस संघ की शरण नहीं गये थे। इसलिए, तथाकथित आंबेडकरवादी लोगों ने भी इसपर विचार विमर्श करना चाहिए। अगर वर्तमान बौद्ध संघ बाबासाहब की नजर में प्रासंगिक नही है, तो उसे प्रासंगिक कैसे किया जाए, इसपर हमारे बुद्धिजीवी लोगों ने मंथन करना चाहिए।
जय मुलनिवासी।।
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बाबा साहब का अंतिम सन्देश
‘‘मेरे लोगों से कह देना नानक चन्द!
मैं उनके लिए जो कुछ भी हासिल कर पाया हूँ, वह मैंने अकेले ही किया है और यह मैंने विध्वंसक दुखों और अन्तहीन परेशानियों से गुजरते हुए, चारों ओर, विशेष कर हिन्दू अखबारों की ओर से मुझ पर की गई गालियों की बौछारों के बीच किया है, मैंने सारा जीवन अपने विरोधियों और अपने ही उन मुट्ठी भर लोगों से लड़ता रहा हूँ, जिन्होंने अपने स्वार्थी उद्देश्यों के लिए मुझे धोखा दे दिया।मैंने बड़ी कठिनाइयों से अपने कारवाँ को यहाँ तक लेकर आया हूँ, जहाँ यह आज दिखाई देता है।
कारवाँ को इसकी राह में आने वाली बाधाओं,अप्रत्या ­शित विपत्तियों और कठिनाइयों के बावजूद चलते रहना चाहिए। अगर वे एक सम्मानजनक और प्रतिष्ठित जीवन जीना चाहते हैं, तो उन्हें इस अवसर पर अपनी क्षमता दिखानी ही होगी। यदि मेरे लोग, मेरे साथी कारवाँ को आगे ले जाने के योग्य नहीं हैं, तो वो इसे वहीं छोड़ देना चाहिए, जहाँ यह आज दिखाई दे रहा हैं, लेकिन उन्हें किसी भी रूप में इस कारवाँ को पीछे न ले जाये।मैं पूरी गम्भीरता में यह सन्देश दे रहा हूँ, जो शायद
मेरा अन्तिम सन्देश है और मेरा विश्वास है कि यह व्यर्थ नहीं जाएगा।”जाओ जाकर उनसे उनसे कह दो”

यह कहकर बाबा साहेब के आँखोँ मेँ आँसु आ गए वो सिसक रहे थे ।

ambedkar rajniti

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डॉ. अम्बेडकर की 22 प्रसिद्ध प्रतिज्ञाएँ 

 डॉ. अम्बेडकर की 22 प्रतिज्ञाएँ 

डा बी.आर. अम्बेडकर ने दीक्षा भूमि, नागपुर, भारत में ऐतिहासिक बौद्ध धर्मं में परिवर्तन के अवसर पर,15 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं.800000 लोगों का बौद्ध धर्म में रूपांतरण ऐतिहासिक था क्योंकि यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक रूपांतरण था.उन्होंने इन शपथों को निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके.ये 22 प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं. ये एक सेतु के रूप में बौद्ध धर्मं की हिन्दू धर्म में व्याप्त भ्रम और विरोधाभासों से रक्षा करने में सहायक हो सकती हैं.इन प्रतिज्ञाओं से हिन्दू धर्म,जिसमें केवल हिंदुओं की ऊंची जातियों के संवर्धन के लिए मार्ग प्रशस्त किया गया, में व्याप्त अंधविश्वासों, व्यर्थ और अर्थहीन रस्मों, से धर्मान्तरित होते समय स्वतंत्र रहा जा सकता है. प्रसिद्ध 22 प्रतिज्ञाएँ निम्न हैं:
१. मैं, ब्रम्हा, विष्णू और महेश इनको भगवान नहीं मानूंगा तथा इनकी उपासना नहीं करुंगा।
२. मैं, राम और कृष्ण इनको भगवान नही मानूंगा तथा इनकी उपासना नहीं करुंगा।
३. मैं, गौरी, गणपती आदि हिंदूधर्म की किसी भी देवी या देवताओं को नहीं मानूंगा तथा इनकी उपासना नहीं करुंगा।
४. मैं, भगवान ने कभी अवतार लिया इस पर मैं विश्वास नहीं रखता।
५. बुद्ध यह विष्णू का अवतार है इस पर मेरा विश्वास नही है, यह जान-बुझकर किया गया झुठा प्रचार है ऐसा मैं मानता हुँ।
६. मैं, श्राद्ध पक्ष नही करुंगा तथा पिंड-दान नही करुंगा।
७. मैं, बुद्ध के तत्वों और शिक्षा का भंग हो ऐसा आचरण नहीं करुंगा।
८. मैं, ब्राम्हणों द्वारा किए जाने वाले किसी भी धर्मानुष्ठान को अनुमति नही दूंगा।
९. मैं, मानव की समानता में विश्वास रखुंगा।
१०. मैं, समता प्रस्थापित करने में प्रयत्न करुंगा।
११. मैं, बुद्ध के “आर्य अष्टांगिक मार्ग” का पालन करुंगा।
१२. मैं, बुद्ध द्वारा बतायी गई “पारमिताओं” का पालन करुंगा।
१३. मैं, सभी सजीवों पर करुणा तथा दया करुंगा और उनकी रक्षा करुंगा।
१४. मैं चोरी नहीं करुंगा।
१५. मैं झुठ नहीं बोलुंगा।
१६. मैं, व्यभिचार नहीं करुंगा।
१७. मैं, शराब, मादक पेय जैसे नशीले द्रव्यों का सेवन नहीं करुंगा।
१८. मैं बौद्धधर्म के प्रज्ञा, शील तथा करुणा इन तीन तत्वों को अपनाकर अपना जीवन यापन करुंगा।
१९. मैं, हिंदूधर्म का परित्याग करता हुँ, जो असमानता पर आधारित होने के कारण मानवता के लिए हानिकारक और मानव की उन्नति और विकास में बाधक है, और अपने धर्म के रुप में बुद्ध धर्म का स्वीकार करता हुँ।
२०. केवल बुद्ध का धम्म ही सत्य धर्म है ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।
२१. यह (धर्मांतरण से) मेरा पुनर्जन्म हो रहा है ऐसा मैं मानता हूँ।
२२. मैं विधिवत् तथा दृढ़तापूर्वक यह घोषणा करता हुँ कि मैं इसके बाद मेरा जीवन बुद्ध और उनके धम्म के तत्वों तथा शिक्षा के अनुसार बिताऊंगा।

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