समयबुद्धा मिशन का फेसबुक अकाउंट बंद करवा दिया गया है, वाकई भारत में बौद्ध धम्म का प्रचार प्रसार करना भी मुश्किल है

समयबुद्धा मिशन का फेसबुक अकाउंट बंद करवा दिया गया है,

जबकि उसपर हम कोई भी राजनैतिक टिप्पणी नहीं करते थे |

वाकई भारत में बौद्ध धम्म का प्रचार प्रसार करना भी मुश्किल है

समयबुद्धा मिशन का फेसबुक अकाउंट दोबारा एक्टिव करवाने हेतु हमारा संगर्ष जारी है|
आप मार्गदर्शन के लिए श्री दिलीप मंडल और श्री ओम सुधा के फेसबुक अकाउंट को फॉलो करें,
बहुत ही अच्छा और क्रांतकारी कटु सत्य लिखते है, लिंक इस प्रकार हैं

https://www.facebook.com/dilipc.mandal

https://www.facebook.com/om.sudha.7?pnref=eh

नोट: इन दोनों का समयबुद्धा मिशन से कोई ताल्लुक नहीं पर बस बहुत अच्छा लिखते हैं इसलिए यहाँ जिक्र किया है|

ये लोग इतना अच्छा लिखते हैं की इनकी पांच हज़ार की  फ्रेंड लिस्ट तो पूरी हो चुकी है फिर भी आप फॉलो कर सकते हैं, इससे आपको इनके पोस्ट दिखने लगेंगे

भारतियों के मुक्तिदाता,विश्व के राजनीतक बुद्ध ..बाबा साहब डॉ आंबेडकर महान द्वारा रचित भारतीय संविधान – संक्षिप्त परिचय,,…मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से

indianinstitutionambedkar samvidhanभारत, संसदीय प्रणाली की सरकार वाला एक प्रभुसत्तासम्पन्न, समाजवादी धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य है। यह गणराज्य भारत के संविधान के अनुसार शासित है। भारत का संविधान संविधान सभा द्वारा 26 नवम्बर 1949 को पारित हुआ तथा 26 जनवरी 1950 से प्रभावी हुआ। 26 जनवरी का दिन भारत मेंगणतन्त्र दिवस के रूप में मनाया जाता है।[1] [2] [3]

संक्षिप्त परिचय:  भारत का संविधान विश्व के किसी भी गणतांत्रिक देश का सबसे लंबा लिखित संविधान है।[4]इसमें अब 465 अनुच्छेद, तथा 12 अनुसूचियां हैं और ये 22 भागों में विभाजित है। परन्तु इसके निर्माण के समय मूल संविधान में 395 अनुच्छेद, जो 22 भागों में विभाजित थे इसमें केवल 8 अनुसूचियां थीं। संविधान में सरकार के संसदीय स्‍वरूप की व्‍यवस्‍था की गई है जिसकी संरचना कुछ अपवादों के अतिरिक्त संघीय है। केन्‍द्रीय कार्यपालिका का सांविधानिक प्रमुख राष्‍ट्रपति है। भारत के संविधान की धारा 79 के अनुसार, केन्‍द्रीय संसद की परिषद् में राष्‍ट्रपति तथा दो सदन है जिन्‍हें राज्‍यों की परिषद राज्‍यसभा तथा लोगों का सदन लोकसभा के नाम से जाना जाता है। संविधान की धारा 74 (1) में यह व्‍यवस्‍था की गई है कि राष्‍ट्रपति की सहायता करने तथा उसे सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगा जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होगा, राष्‍ट्रपति इस मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार अपने कार्यों का निष्‍पादन करेगा। इस प्रकार वास्‍तविक कार्यकारी शक्ति मंत्रिपरिषद् में निहित है जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री है जो वर्तमान में नरेन्द्र मोदी हैं।[5]

मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोगों के सदन (लोक सभा) के प्रति उत्तरदायी है। प्रत्‍येक राज्‍य में एक विधानसभा है। जम्मू कश्मीर, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में एक ऊपरी सदन है जिसे विधानपरिषद कहा जाता है। राज्‍यपाल राज्‍य का प्रमुख है। प्रत्‍येक राज्‍य का एक राज्‍यपाल होगा तथा राज्‍य की कार्यकारी शक्ति उसमें विहित होगी। मंत्रिपरिषद, जिसका प्रमुख मुख्‍यमंत्री है, राज्‍यपाल को उसके कार्यकारी कार्यों के निष्‍पादन में सलाह देती है। राज्‍य की मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से राज्‍य की विधान सभा के प्रति उत्तरदायी है।

संविधान की सातवीं अनुसूची में संसद तथा राज्‍य विधायिकाओं के बीच विधायी शक्तियों का वितरण किया गया है। अवशिष्‍ट शक्तियाँ संसद में विहित हैं। केन्‍द्रीय प्रशासित भू-भागों को संघराज्‍य क्षेत्र कहा जाता है।

इतिहास: मुख्य लेख : भारतीय संविधान का इतिहास
द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद जुलाई 1945 में ब्रिटेन ने भारत संबन्धी अपनी नई नीति की घोषणा की तथा भारत की संविधान सभा के निर्माण के लिए एक कैबिनेट मिशन भारत भेजा जिसमें ३ मंत्री थे। 15 अगस्त 1947 को भारत के आज़ाद हो जाने के बाद संविधान सभा की घोषणा हुई और इसने अपना कार्य 9 दिसम्बर 1947 से आरम्भ कर दिया। संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे। जवाहरलाल नेहरू, डॉ भीमराव अम्बेडकर, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे। इस संविधान सभा ने 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन मे कुल 114 दिन बैठक की। इसकी बैठकों में प्रेस और जनता को भाग लेने की स्वतन्त्रता थी। भारत के संविधान के निर्माण में डॉ भीमराव अम्बेडकर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, इसलिए उन्हें ‘संविधान का निर्माता’ कहा जाता है।

भारतीय संविधान की संरचना
वर्तमान समय में (सितम्बर 2012) भारतीय संविधान के निम्नलिखित भाग हैं-

एक उद्देशिका ,
448 धाराओं से युक्त 25 भाग,
12 अनुसूचियाँ,
5 अनुलग्नक (appendices), तथा
99 संशोधन ।
अनुसूचियाँ
पहली अनुसूची – (अनुच्छेद 1 तथा 4) – राज्य तथा संघ राज्य क्षेत्र का वर्णन।

दूसरी अनुसूची – [अनुच्छेद 102(3), 65(3), 75(6),97, 125,148(3), 158(3),164(5),186 तथा 221] – मुख्य पदाधिकारियों के वेतन-भत्ते

भाग-क : राष्ट्रपति और राज्यपाल के वेतन-भत्ते,
भाग-ख : लोकसभा तथा विधानसभा के अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष, राज्यसभा तथा विधान परिषद् के सभापति तथा उपसभापति के वेतन-भत्ते,
भाग-ग : उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन-भत्ते,
भाग-घ : भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षकके वेतन-भत्ते।
तीसरी अनुसूची – [अनुच्छेद 75(4),99, 124(6),148(2), 164(3),188 और 219] – व्यवस्थापिका के सदस्य, मंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, न्यायाधीशों आदि के लिए शपथ लिए जानेवाले प्रतिज्ञान के प्रारूप दिए हैं।

चौथी अनुसूची – [अनुच्छेद 4(1),80(2)] – राज्यसभा में स्थानों का आबंटन राज्यों तथा संघ राज्य क्षेत्रों से।

पाँचवी अनुसूची – [अनुच्छेद 244(1)] – अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जन-जातियों के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित उपबंध।

छठी अनुसूची – [अनुच्छेद 244(2), 275(1)] – असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन के विषय मे उपबंध।

सातवीं अनुसूची – [अनुच्छेद 246] – विषयों के वितरण से संबंधित सूची-1 संघ सूची, सूची-2 राज्य सूची, सूची-3 समवर्ती सूची।

आठवीं अनुसूची – [अनुच्छेद 344(1), 351] – भाषाएँ – 22 भाषाओं का उल्लेख।

नवीं अनुसूची – [अनुच्छेद 31 ख ] – कुछ भुमि सुधार संबंधी अधिनियमों का विधिमान्य करण।

दसवीं अनुसूची – [अनुच्छेद 102(2), 191(2)] – दल परिवर्तन संबंधी उपबंध तथा परिवर्तन के आधार पर अ

ग्यारवीं अनुसूची – पन्चायती राज/ जिला पंचायत से सम्बन्धित यह अनुसूची संविधान मे 73वे संवेधानिक संशोधन (1993) द्वारा जोड़ी गई।

बारहवीं अनुसूची – यह अनुसूची संविधान मे 74 वे संवेधानिक संशोधन द्वारा जोड़ी गई।

आधारभूत विशेषताएँ
संविधान प्रारूप समिति तथा सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय संविधान को संघात्मक संविधान माना है, परन्तु विद्वानों में मतभेद है। अमेरीकी विद्वान इस को ‘छद्म-संघात्मक-संविधान’ कहते हैं, हालांकि पूर्वी संविधानवेत्ता कहते हैं कि अमेरिकी संविधान ही एकमात्र संघात्मक संविधान नहीं हो सकता। संविधान का संघात्मक होना उसमें निहित संघात्मक लक्षणों पर निर्भर करता है, किन्तु माननीय सर्वोच्च न्यायालय (पी कन्नादासन वाद) ने इसे पूर्ण संघात्मक माना है।

भारतीय संविधान के प्रस्तावना के अनुसार भारत एक सम्प्रुभतासम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य है।

सम्प्रुभता
सम्प्रुभता शब्द का अर्थ है सर्वोच्च या स्वतंत्र. भारत किसी भी विदेशी और आंतरिक शक्ति के नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त सम्प्रुभतासम्पन्न राष्ट्र है। यह सीधे लोगों द्वारा चुने गए एक मुक्त सरकार द्वारा शासित है तथा यही सरकार कानून बनाकर लोगों पर शासन करती है।

समाजवादी
मुख्य लेख : समाजवाद
समाजवादी शब्द संविधान के १९७६ में हुए ४२वें संशोधन अधिनियम द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया। यह अपने सभी नागरिकों के लिए सामाजिक और आर्थिक समानता सुनिश्चित करता है। जाति, रंग, नस्ल, लिंग, धर्म या भाषा के आधार पर कोई भेदभाव किए बिना सभी को बराबर का दर्जा और अवसर देता है। सरकार केवल कुछ लोगों के हाथों में धन जमा होने से रोकेगी तथा सभी नागरिकों को एक अच्छा जीवन स्तर प्रदान करने की कोशिश करेगी।

भारत ने एक मिश्रित आर्थिक मॉडल को अपनाया है। सरकार ने समाजवाद के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कई कानूनों जैसे अस्पृश्यता उन्मूलन, जमींदारी अधिनियम, समान वेतन अधिनियम और बाल श्रम निषेध अधिनियम आदि बनाया है।

धर्मनिरपेक्ष
मुख्य लेख : धर्मनिरपेक्षता
धर्मनिरपेक्ष शब्द संविधान के १९७६ में हुए ४२वें संशोधन अधिनियम द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया। यह सभी धर्मों की समानता और धार्मिक सहिष्णुता सुनिश्चीत करता है। भारत का कोई आधिकारिक धर्म नहीं है। यह ना तो किसी धर्म को बढावा देता है, ना ही किसी से भेदभाव करता है। यह सभी धर्मों का सम्मान करता है व एक समान व्यवहार करता है। हर व्यक्ति को अपने पसन्द के किसी भी धर्म का उपासना, पालन और प्रचार का अधिकार है। सभी नागरिकों, चाहे उनकी धार्मिक मान्यता कुछ भी हो कानून की नजर में बराबर होते हैं। सरकारी या सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूलों में कोई धार्मिक अनुदेश लागू नहीं होता।

लोकतांत्रिक
मुख्य लेख : लोकतंत्र
भारत एक स्वतंत्र देश है, किसी भी जगह से वोट देने की आजादी, संसद में अनुसूचित सामाजिक समूहों और अनुसूचित जनजातियों को विशिष्ट सीटें आरक्षित की गई है। स्थानीय निकाय चुनाव में महिला उम्मीदवारों के लिए एक निश्चित अनुपात में सीटें आरक्षित की जाती है। सभी चुनावों में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने का एक विधेयक लम्बित है। हांलाकि इसकी क्रियांनवयन कैसे होगा, यह निश्चित नहीं हैं। भारत का चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए जिम्मेदार है।

गणराज्य
मुख्य लेख : गणराज्य
राजशाही, जिसमें राज्य के प्रमुख वंशानुगत आधार पर एक जीवन भर या पदत्याग करने तक के लिए नियुक्त किया जाता है, के विपरित एक गणतांत्रिक राष्ट्र के प्रमुख एक निश्चित अवधि के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित होते है। भारत के राष्ट्रपति पांच वर्ष की अवधि के लिए एक चुनावी कॉलेज द्वारा चुने जाते हैं।

शक्ति विभाजन
यह भारतीय संविधान का सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्षण है, राज्य की शक्तियां केंद्रीय तथा राज्य सरकारों मे विभाजित होती हैं। दोनों सत्ताएँ एक-दूसरे के अधीन नही होती है, वे संविधान से उत्पन्न तथा नियंत्रित होती हैं।

संविधान की सर्वोचता
संविधान के उपबंध संघ तथा राज्य सरकारों पर समान रूप से बाध्यकारी होते हैं। केन्द्र तथा राज्य शक्ति विभाजित करने वाले अनुच्छेद निम्न दिए गए हैं:

अनुच्छेद 54,55,73,162,241।
भाग -5 सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालय राज्य तथा केन्द्र के मध्य वैधानिक संबंध।
अनुच्छेद 7 के अंतर्गत कोई भी सूची।
राज्यो का संसद मे प्रतिनिधित्व।
संविधान मे संशोधन की शक्ति अनु 368इन सभी अनुच्छेदो मे संसद अकेले संशोधन नही ला सकती है उसे राज्यो की सहमति भी चाहिए।
अन्य अनुच्छेद शक्ति विभाजन से सम्बन्धित नहीं हैं:

लिखित संविधान अनिवार्य रूप से लिखित रूप मे होगा क्योंकि उसमे शक्ति विभाजन का स्पषट वर्णन आवश्यक है। अतः संघ मे लिखित संविधान अवश्य होगा।
संविधान की कठोरता इसका अर्थ है संविधान संशोधन मे राज्य केन्द्र दोनो भाग लेंगे।
न्यायालयो की अधिकारिता- इसका अर्थ है कि केन्द्र-राज्य कानून की व्याख्या हेतु एक निष्पक्ष तथा स्वतंत्र सत्ता पर निर्भर करेंगे।
विधि द्वारा स्थापित:

न्यायालय ही संघ-राज्य शक्तियो के विभाजन का पर्यवेक्षण करेंगे।
न्यायालय संविधान के अंतिम व्याख्याकर्ता होंगे भारत मे यह सत्ता सर्वोच्च न्यायालय के पास है।
ये पांच शर्ते किसी संविधान को संघात्मक बनाने हेतु अनिवार्य है। भारत मे ये पांचों लक्षण संविधान मे मौजूद है अत्ः यह संघात्मक हैं। परंतु भारतीय संविधान मे कुछ विभेदकारी विशेषताए भी है:

भारतीय संविधान मे कुछ विभेदकारी विशेषताएँ भी है
1 यह संघ राज्यों के परस्पर समझौते से नहीं बना है
2 राज्य अपना पृथक संविधान नही रख सकते है, केवल एक ही संविधान केन्द्र तथा राज्य दोनो पर लागू होता है
3 भारत मे द्वैध नागरिकता नहीं है। केवल भारतीय नागरिकता है
4 भारतीय संविधान मे आपातकाल लागू करने के उपबन्ध है [352 अनुच्छेद] के लागू होने पर राज्य-केन्द्र शक्ति पृथक्करण समाप्त हो जायेगा तथा वह एकात्मक संविधान बन जायेगा। इस स्थिति मे केन्द्र-राज्यों पर पूर्ण सम्प्रभु हो जाता है
5 राज्यों का नाम, क्षेत्र तथा सीमा केन्द्र कभी भी परिवर्तित कर सकता है [बिना राज्यों की सहमति से] [अनुच्छेद 3] अत: राज्य भारतीय संघ के अनिवार्य घटक नही हैं। केन्द्र संघ को पुर्ननिर्मित कर सकती है
6 संविधान की 7वीं अनुसूची मे तीन सूचियाँ हैं संघीय, राज्य, तथा समवर्ती। इनके विषयों का वितरण केन्द्र के पक्ष मे है।
6.1 संघीय सूची मे सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय हैं
6.2 इस सूची पर केवल संसद का अधिकार है
6.3 राज्य सूची के विषय कम महत्वपूर्ण हैं, 5 विशेष परिस्थितियों मे राज्य सूची पर संसद विधि निर्माण कर सकती है किंतु किसी एक भी परिस्थिति मे राज्य, केन्द्र हेतु विधि निर्माण नहीं कर सकते-
क1 अनु 249—राज्य सभा यह प्रस्ताव पारित कर दे कि राष्ट्र हित हेतु यह आवश्यक है [2/3 बहुमत से] किंतु यह बन्धन मात्र 1 वर्ष हेतु लागू होता है
क2 अनु 250— राष्ट्र आपातकाल लागू होने पर संसद को राज्य सूची के विषयों पर विधि निर्माण का अधिकार स्वत: मिल जाता है
क3 अनु 252—दो या अधिक राज्यों की विधायिका प्रस्ताव पास कर राज्य सभा को यह अधिकार दे सकती है [केवल संबंधित राज्यों पर]
क4 अनु 253— अंतराष्ट्रीय समझौते के अनुपालन के लिए संसद राज्य सूची विषय पर विधि निर्माण कर सकती है
क5 अनु 356—जब किसी राज्य मे राष्ट्रपति शासन लागू होता है, उस स्थिति मे संसद उस राज्य हेतु विधि निर्माण कर सकती है
7 अनुच्छेद 155 – राज्यपालों की नियुक्ति पूर्णत: केन्द्र की इच्छा से होती है इस प्रकार केन्द्र राज्यों पर नियंत्रण रख सकता है
8 अनु 360 – वित्तीय आपातकाल की दशा मे राज्यों के वित्त पर भी केन्द्र का नियंत्रण हो जाता है। इस दशा मे केन्द्र राज्यों को धन व्यय करने हेतु निर्देश दे सकता है
9 प्रशासनिक निर्देश [अनु 256-257] -केन्द्र राज्यों को राज्यों की संचार व्यवस्था किस प्रकार लागू की जाये, के बारे मे निर्देश दे सकता है, ये निर्देश किसी भी समय दिये जा सकते है, राज्य इनका पालन करने हेतु बाध्य है। यदि राज्य इन निर्देशों का पालन न करे तो राज्य मे संवैधानिक तंत्र असफल होने का अनुमान लगाया जा सकता है
10 अनु 312 मे अखिल भारतीय सेवाओं का प्रावधान है ये सेवक नियुक्ति, प्रशिक्षण, अनुशासनात्मक क्षेत्रों मे पूर्णत: केन्द्र के अधीन है जबकि ये सेवा राज्यों मे देते है राज्य सरकारों का इन पर कोई नियंत्रण नहीं है
11 एकीकृत न्यायपालिका
12 राज्यों की कार्यपालिक शक्तियां संघीय कार्यपालिक शक्तियों पर प्रभावी नही हो सकती है।
संविधान की प्रस्तावना
मुख्य लेख : भारतीय संविधान की उद्देशिका
संविधान के उद्देश्यों को प्रकट करने हेतु प्राय: उनसे पहले एक प्रस्तावना प्रस्तुत की जाती है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना अमेरिकी संविधान से प्रभावित तथा विश्व मे सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। प्रस्तावना के माध्यम से भारतीय संविधान का सार, अपेक्षाएँ, उद्देश्य उसका लक्ष्य तथा दर्शन प्रकट होता है। प्रस्तावना यह घोषणा करती है कि संविधान अपनी शक्ति सीधे जनता से प्राप्त करता है इसी कारण यह ‘हम भारत के लोग’ – इस वाक्य से प्रारम्भ होती है। केहर सिंह बनाम भारत संघ के वाद मे कहा गया था कि संविधान सभा भारतीय जनता का सीधा प्रतिनिधित्व नही करती अत: संविधान विधि की विशेष अनुकृपा प्राप्त नही कर सकता, परंतु न्यायालय ने इसे खारिज करते हुए संविधान को सर्वोपरि माना है जिस पर कोई प्रश्न नही उठाया जा सकता है।

संविधान की प्रस्तावना:

हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा
उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए
दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा
इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
संविधान की प्रस्तावन 13 दिसम्वर 1946 को जवाहर लाल नेहरू द्वारा पास की गयी प्रस्तावन को आमुख भी कहते हैं।

संविधान भाग 5 : नीति निर्देशक तत्व
मुख्य लेख : नीति निर्देशक तत्व
भाग 3 तथा 4 मिलकर ‘संविधान की आत्मा तथा चेतना’ कहलाते है क्योंकि किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र के लिए मौलिक अधिकार तथा नीति-निर्देश देश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नीति निर्देशक तत्व जनतांत्रिक संवैधानिक विकास के नवीनतम तत्व हैं। सर्वप्रथम ये आयरलैंड के संविधान मे लागू किये गये थे। ये वे तत्व है जो संविधान के विकास के साथ ही विकसित हुए हैं। इन तत्वॉ का कार्य एक जनकल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। भारतीय संविधान के इस भाग में नीति निर्देशक तत्वों का रूपाकार निश्चित किया गया है, मौलिक अधिकार तथा नीति निर्देशक तत्व मे भेद बताया गया है और नीति निदेशक तत्वों के महत्व को समझाया गया है।

भाग 4 क : मूल कर्तव्य
मूल कर्तव्य, मूल सविधान में नहीं थे, इन्हे ४२ वें संविधान संशोधन द्ववारा जोड़ा गया है। ये रूस से प्रेरित होकर जोड़े गये तथा संविधान के भाग ४ (क) के अनुच्छेद ५१ – अ मे रखे गये हैं। ये कुल ११ हैं।

51 क. मूल कर्तव्य- भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह-

(क) संविधान का पालन करे और उस के आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे ;
(ख) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उन का पालन करे;
(ग) भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे;
(घ) देश की रक्षा करे और आह्वान करने किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे;
(ङ) भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध है;
(च) हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उस का परिरक्षण करे;
(छ) प्राकृतिक पर्यावरण की, जिस के अंतर्गत वन, झील नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करे और उस का संवर्धन करे तथा प्राणि मात्र के प्रति दयाभाव रखे;
(ज) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे;
(झ) सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे;
(ञ) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे जिस से राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊंचाइयों को छू ले;
(ट) यदि माता-पिता या संरक्षक है, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले अपने, यथास्थिति, बालक या प्रतिपाल्य के लिए शिक्षा का अवसर प्रदान करे।

 https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8

26 नवंबर को संविधान दिवस घोषित, जानिए अपने संविधान की 26 खास बातें……. एबीपी न्यूज

संविधान के उद्देश्यों को प्रकट करने हेतु प्राय: उनसे पहले एक प्रस्तावना प्रस्तुत की जाती है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना अमेरिकी संविधान से प्रभावित तथा विश्व मे सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। प्रस्तावना के माध्यम से भारतीय संविधान का सार, अपेक्षाएँ, उद्देश्य उसका लक्ष्य तथा दर्शन प्रकट होता है। प्रस्तावना यह घोषणा करती है कि संविधान अपनी शक्ति सीधे जनता से प्राप्त करता है इसी कारण यह ‘हम भारत के लोग’ – इस वाक्य से प्रारम्भ होती है। केहर सिंह बनाम भारत संघ के वाद मे कहा गया था कि संविधान सभा भारतीय जनता का सीधा प्रतिनिधित्व नही करती अत: संविधान विधि की विशेष अनुकृपा प्राप्त नही कर सकता, परंतु न्यायालय ने इसे खारिज करते हुए संविधान को सर्वोपरि माना है जिस पर कोई प्रश्न नही उठाया जा सकता है।

संविधान की प्रस्तावना:

हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा
उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए
दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा
इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

संविधान की प्रस्तावन 13 दिसम्वर 1946 को जवाहर लाल नेहरू द्वारा पास की गयी प्रस्तावन को आमुख भी कहते हैं।

26 नवंबर को संविधान दिवस घोषित, जानिए अपने संविधान की 26 खास बातेंBy  एबीपी न्यूज

ambedkar-samvidhan sadhye

सरकार ने 26 नवंबर को संविधान दिवस घोषित किया है. इस अवसर पर गुरुवार को विभिन्न कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया है. सरकार ने संसद के विशेष सत्र का भी आयोजन किया है. संसदीय कार्य मंत्रालय ने संविधान दिवस के दिन संसद भवन परिसर को रोशन करने का फैसला किया है.

सरकारी सूत्रों के अनुसार, सरकार ने 26 नवंबर को अधिकारियों से संविधान की प्रस्तावना पढ़ने को कहा है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा गणतंत्र है और इसके संविधान की कई खासियतें भी हैं. आइए जानते हैं भारतीय संविधान की खास बातें….

1. भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है. संविधान में सरकार के संसदीय स्‍वरूप की व्‍यवस्‍था की गई है. जिसकी संरचना कुछ अपवादों के अतिरिक्त संघीय है.

2. संविधान को 26 नवंबर 1949 को स्वीकार किया गया था लेकिन वह 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ.

3. 11 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की बैठक में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को स्थायी अध्यक्ष चुना गया, जो अंत तक इस पद पर बने रहें.

4. भारत संघ में ऐसे सभी क्षेत्र शामिल होंगे, जो इस समय ब्रिटिश भारत में हैं या देशी रियासतों में हैं या इन दोनों से बाहर, ऐसे क्षेत्र हैं, जो प्रभुता संपन्न भारत संघ में शामिल होना चाहते हैं.

5. भारत के नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, पद, अवसर और कानूनों की समानता, विचार, भाषण, विश्वास, व्यवसाय, संघ निर्माण और कार्य की स्वतंत्रता, कानून तथा सार्वजनिक नैतिकता के अधीन प्राप्त होगी.

6. इसमें अब 465 अनुच्छेद, तथा 12 अनुसूचियां हैं और ये 22 भागों में विभाजित है. परन्तु इसके निर्माण के समय मूल संविधान में 395 अनुच्छेद, जो 22 भागों में विभाजित थे इसमें केवल 8 अनुसूचियां थीं.

7. संविधान की धारा 74 (1) में यह व्‍यवस्‍था की गई है कि राष्‍ट्रपति की सहायता को मंत्रिपरिषद् होगी जिसका प्रमुख पीएम होगा.

8. वास्‍तविक कार्यकारी शक्ति मंत्रिपरिषद् में निहित है जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री है जो वर्तमान में नरेन्द्र मोदी हैं.

9. संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे. जवाहरलाल नेहरू, डॉ भीमराव अम्बेडकर, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे.

10. इस संविधान सभा ने 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन मे कुल 114 दिन बैठक की. इसकी बैठकों में प्रेस और जनता को भाग लेने की स्वतन्त्रता थी.

11. भारत के संविधान के निर्माण में डॉ भीमराव अम्बेडकर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्हें ‘संविधान का निर्माता’ कहा जाता है.

12. भारत किसी भी विदेशी और आंतरिक शक्ति के नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त सम्प्रुभतासम्पन्न राष्ट्र है. यह सीधे लोगों द्वारा चुने गए एक मुक्त सरकार द्वारा शासित है तथा यही सरकार कानून बनाकर लोगों पर शासन करती है.

13. ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द संविधान के 1976 में हुए 42वें संशोधन अधिनियम द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया. यह सभी धर्मों की समानता और धार्मिक सहिष्णुता सुनिश्चीत करता है.

14. भारत का कोई आधिकारिक धर्म नहीं है. यह ना तो किसी धर्म को बढावा देता है, ना ही किसी से भेदभाव करता है.

15. भारत एक स्वतंत्र देश है, किसी भी जगह से वोट देने की आजादी, संसद में अनुसूचित सामाजिक समूहों और अनुसूचित जनजातियों को विशिष्ट सीटें आरक्षित की गई है.

16. स्थानीय निकाय चुनाव में महिला उम्मीदवारों के लिए एक निश्चित अनुपात में सीटें आरक्षित की जाती है.

17. राजशाही, जिसमें राज्य के प्रमुख वंशानुगत आधार पर एक जीवन भर या पदत्याग करने तक के लिए नियुक्त किया जाता है, के विपरित एक गणतांत्रिक राष्ट्र के प्रमुख एक निश्चित अवधि के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित होते है.

18. भारत के राष्ट्रपति पांच वर्ष की अवधि के लिए चुनावी प्रक्रिया से चुना जाता है.

19. भारतीय संविधान का सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्षण है, राज्य की शक्तियां केंद्रीय तथा राज्य सरकारों मे विभाजित होती हैं. दोनों सत्ताएं एक-दूसरे के अधीन नहीं होती है, वे संविधान से उत्पन्न तथा नियंत्रित होती हैं.

20. राज्य अपना पृथक संविधान नही रख सकते है, केवल एक ही संविधान केन्द्र तथा राज्य दोनो पर लागू होता है.

21. भारत मे द्वैध नागरिकता नहीं है. केवल भारतीय नागरिकता है. जाति, रंग, नस्ल, लिंग, धर्म या भाषा के आधार पर कोई भेदभाव किए बिना सभी को बराबर का दर्जा और अवसर देता है.

22. भारतीय संविधान की प्रस्तावना अमेरिकी संविधान से प्रभावित तथा विश्व में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है. प्रस्तावना के माध्यम से भारतीय संविधान का सार, अपेक्षाएँ, उद्देश्य उसका लक्ष्य तथा दर्शन प्रकट होता है.

23. संविधान की प्रस्तावना यह घोषणा करती है कि संविधान अपनी शक्ति सीधे जनता से प्राप्त करता है इसी कारण यह ‘हम भारत के लोग’, इस वाक्य से प्रारम्भ होती है.

24.  प्रत्‍येक राज्‍य में एक विधान सभा है. जम्मू कश्मीर, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में एक ऊपरी सदन है जिसे विधान परिषद् कहा जाता है. राज्‍यपाल, राज्‍य का प्रमुख है.

25. संविधान की सातवीं अनुसूची में संसद तथा राज्‍य विधायिकाओं के बीच विधायी शक्तियों का वितरण किया गया है. अवशिष्‍ट शक्तियाँ संसद में विहित हैं. केन्‍द्रीय प्रशासित भू-भागों को संघराज्‍य क्षेत्र कहा जाता है.

26. ‘समाजवादी’ शब्द संविधान के 1976 में हुए 42वें संशोधन अधिनियम द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया. यह अपने सभी नागरिकों के लिए सामाजिक और आर्थिक समानता सुनिश्चित करता है.

ध्यान क्या है -ओशो एस धम्मो सनंतनो, भाग-9

osho dhyanप्रश्न: ध्यान क्या है?
इस छोटी सी घटना को समझें। चांग चिंग के संबंध में कहा जाता है, वह बड़ा कवि था, बड़ा सौंदर्य-पारखी था। कहते हैं, चीन में उस जैसा सौंदर्य का दार्शनिक नहीं हुआ। उसने जैसे सौंदर्य-शास्त्र पर, एस्थेटिक्स पर बहुमूल्य ग्रंथ लिखे हैं, किसी और ने नहीं लिखे। वह जैसे उन पुराने दिनों का क्रोशे था। बीस साल तक वह ग्रंथों में डूबा रहा। सौंदर्य क्या है, इसकी तलाश करतारहा।
एक रात, आधी रात, किताबों में डूबा-डूबा उठा, पर्दा सरकाया, द्वार के बाहर झाँका-पूरा चांद आकाश में था। चिनार के ऊंचे दरख्त जैसे ध्यानस्थ खड़े थे। मंद समीर बहती थी। और समीरपर चढ़कर फूलों की गंध उसके नासापुटों तक आयी। कोई एक पक्षी, जलपक्षी जोर से चीखा, और उस जलपक्षी की चीख में कुछ घटित हुआ-कुछ घट गया। चांग चिंग अपने आपसे हीजैसे बोला-हाउ मिस्टेकन आइ वाज! हाउ मिस्टेकन आइ वाज! रेज द स्क्रीन एंड सी द वल्र्ड। कैसी मैं भूल में भरा था! कितनी भूल में था मैं! पर्दा उठाओ और जगत को देखो! बीस सालकिताबों में से उसे सौंदर्य का पता न चला। पर्दा हटाया और सौंदर्य सामने खड़ा था, साक्षात।
तुम पूछते हो, ‘ध्यान क्या है?’
ध्यान है पर्दा हटाने की कला। और यह पर्दा बाहर नहीं है, यह पर्दा तुम्हारे भीतर पड़ा है, तुम्हारे अंतस्तल पर पड़ा है। ध्यान है पर्दा हटाना। पर्दा बुना है विचारों से। विचार के ताने-बानों सेपर्दा बुना है। अच्छे विचार, बुरे विचार, इनके ताने-बाने से पर्दा बुना है। जैसे तुम विचारों के पार झांकने लगो, या विचारों को ठहराने में सफल हो जाओ, या विचारों को हटाने में सफल होजाओ, वैसे ही ध्यान घट जाएगा। निर्विचार दशा का नाम ध्यान है।
ध्यान का अर्थ है, ऐसी कोई संधि भीतर जब तुम तो हो, जगत तो है और दोनों के बीच में विचार का पर्दा नहीं है। कभी सूरज को ऊगते देखकर, कभी पूरे चांद को देखकर, कभी इन शांतवृक्षों को देखकर, कभी गुलमोहर के फूलों पर ध्यान करते हुए-तुम हो, गुलमोहर है, सजा दुल्हन ही तरह, और बीच में कोई विचार नहीं है। इतना भी विचार नहीं कि यह गुलमोहर का वृक्षहै, इतना भी विचार नहीं; कि फूल सुंदर हैं, इतना भी विचार नहीं-शब्द उठ ही नहीं रहे हैं-अवाक, मौन, स्तब्ध तुम रह गए हो, उस घड़ी का नाम ध्यान है।
पहले तो क्षण-क्षण को होगा, कभी-कभी होगा, और जब तुम चाहोगे तब न होगा, जब होगा तब होगा। क्योंकि यह चाह की बात नहीं, चाह में तो विचार आ गया। यह तो कभी-कभी होगा।
इसलिए ध्यान के संबंध में एक बात खयाल से पकड़ लेना, खूब गहरे पकड़ लेना-यह तुम्हारी चाहत से नहीं होता है। यह इतनी बड़ी बात है कि तुम्हारी चाहने से नहीं होती है। यह तो कभी-कभी, अनायास, किसी शांत क्षण में हो जाती है।
तो हम करें क्या? ध्यान के लिए हम करें क्या? यही शायद तुमने पूछना चाहा है कि ध्यान क्या है? कैसे करें?
ध्यान के लिए हम इतना ही कर सकते हैं कि अपने को शिथिल करें, दौड़धाप से थोड़ी देर के लिए रुक जाएं, घड़ी भर को चौबीस घंटे में सब आपाधापी छोड़ दें। लेकर तकिया निकल गए,लेट गए लान पर, टिक गए वृक्ष के साथ, आंखें बंद कर लीं; पहुंच गए नदी तट पर, लेट गए रेत में, सुनने लगे नदी की कलकल। मंदिर-मस्जिद जाने को मैं कह ही नहीं रहा हूं, क्योंकिपत्थरों में कहां ध्यान! तुम जीवंत प्रकृति को खोजो। इसलिए बुद्ध ने अपने शिष्यों को कहा, जंगल चले जाओ। वहां प्रकृति नाचती चारों तरफ। चौबीस घंटे वहां रहोगे, कितनी देर तकबचोगे, कभी न कभी-तुम्हारे बावजूद-किसी क्षण में अनायास प्रकृति तुम्हें पकड़ लेगी। एक क्षण को संस्पर्श हो जाएं, एक क्षण को द्वार खुल जाएं, एक क्षण को पर्दा हट जाए, तो ध्यानका पहला अनुभव हुआ।
मेरी बात को खयाल में ले लेना। ध्यान को सीधा-सीधा नहीं किया जाता, बाधा न दो। इसीलिए तो मैं कहता हूं, नाचो, गाओ। नाचने और गाने में तुम लीन हो जाओ, अचानक तुम पाओगे,हवा के झोंके की तरह ध्यान आया, तुम्हें नहला गया, तुम्हारा रोआं-रोआं पुलकित कर गया, ताजा कर गया। धीरे-धीरे तुम समझने लगोगे इस कला को-ध्यान का कोई विज्ञान नहीं है,कला है। धीरे-धीरे तुम समझने लगोगे कि किन घड़ियों में ध्यान घटता है, उन घड़ियों में मैं कैसे अपने को खुला छोड़ दूं। जैसे ही तुम इतनी सी बात सीख गए, तुम्हारे हाथ में कुंजी आगयी।
इसलिए मेरे सूत्र अनूठे हैं। मैं तुमसे कहता हूं, जब तुम्हारा मन बहुत सुखी मालूम पड़े। कोई मित्र आया है, बहुत दिनों बाद मिले हैं, गले लगे हैं, गपशप हुई है, मन ताजा है, हलका है, खूबप्रसन्न हो तुम, इस मौके को छोड़ना मत। बैठ जाना एकांत में। इस घड़ी में सुख का सुर बज रहा है, परमात्मा बहुत करीब है।
सुख का अर्थ ही होता है, जब तुम्हारे जाने-अनजाने परमात्मा करीब होता है; चाहे जानो, चाहे न जानो! सुख जब तुम्हारे भीतर बजता है, तो उसका अर्थ हुआ कि परमात्मा तुमसे बहुतकरीब आ गया। तुम किसी अनजाने मार्ग से घूमते-घूमते परमात्मा के पास पहुंच गए हो, मंदिर करीब है, इसीलिए सुख बज रहा है। इस घड़ी को चूकना मत। इसी घड़ी में तो जल्दी सेखोजना, कहीं किनारे पर ही, हाथ के बढ़ाने से ही मंदिर का द्वार मिल जाएगा।
लेकिन जीवनभर याद करते हैं कि बचपन में बड़ा सुख था। किस सुख की याद है यह? क्या तुम सोचते हो बचपन में तुम्हारे पास बहुत धन था? नहीं था, जरा भी नहीं था, दो-दो पैसे केलिए रोना पड़ता था! एक-एक पैसे के लिए बाप और मां के मोहताज होना पड़ता था! धन तो नहीं था। कोई बड़ा पद था? कहां से होता पद! सब तरह की झंझटें थीं, स्कूल कारागृह था, जहांरोज-रोज बांधकर भेज दिए जाते थे; जहां बैठे-बैठे परेशान होते थे और कुछ समझ में न पड़ता था। और हर कोई दबा देता था, बल भी नहीं था। हर एक छाती पर सवार था।
तो बचपन में सुख कैसा था? न धन था, न पद था, न प्रतिष्ठा थी; न कोई सम्मान देता था, सुख हो कैसे सकता था? सुख कुछ और था। तितलियों के पीछे भागने में ध्यान की किरणउतर आयी थी। सागर के किनारे शंख-सीप बीनने में परम आनंद का क्षण उतरा था। कंकड़-पत्थर बीन लाए थे और समझे थे कि हीरे ले आए, और किस चाल से मस्त होकर आए थे! कुछभी न था हाथ में, लेकिन कुछ ध्यान की सुविधा थी।
यहूदियों में एक कथा है कि जब कोई बच्चा पैदा होता है, तो देवता आते हैं और उस बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हैं; ताकि वह भूल जाए उस सुख को जो सुख परमात्मा के घर उसने जानाथा, नहीं तो जिंदगी बड़ी कठिन हो जाएगी-दयावश ऐसा करते हैं वे, नहीं तो जिंदगी बड़ी कठिन हो जाएगी। अगर वह सुख याद रहे, तो बड़ी कठिन हो जाएगी, तुलना में। तुम फिर कुछ भीकरो, व्यर्थ मालूम पड़ेगा। धन कमाओ, पद कमाओ, सुंदर से सुंदर पत्नी और पति ले आओ, अच्छे से अच्छे बच्चे हों, बड़ा मकान हो, कार हो, कुछ भी सार न मालूम पड़ेगा, अगर वहसुख याद रहे। तो यहूदी कथा कहती है कि एक देवता उतरता है करुणावश और हर बच्चे के माथे पर सिर्फ हाथ फेर देता है। उस हाथ के फेरते ही पर्दा बंद हो जाता है, उसे भूल जाता हैपरमात्मा। सुख भूल गया, फिर यह जीवन के दुखों में ही सोचने लगता है, सुख होगा।
उस पर्दे को फिर से खोलना है, जो देवताओं ने बंद कर दिया है। मुझे तो नहीं लगता कि कोई देवता बंद करते हैं। देवता ऐसी मूढ़ता नहीं कर सकते। लेकिन समाज बंद कर देता है। शायदकहानी उसी की सूचना दे रही है। मां-बाप, परिवार, समाज, स्कूल बंद कर देते हैं, पर्दे को डाल देते हैं। ऐसा डाल देते हैं कि तुम भूल ही जाते हो कि यहां द्वार है, तुम समझने लगते होदीवार है। ध्यान का अर्थ है, इस पर्दे को हटाना।
और इसे अनायास होने दो, इसे कभी-कभी तुम्हें पकड़ लेने दो-और जब तुम्हें यह तरंग पकड़े तो लाख काम छोड़कर बैठ जाना। क्योंकि इससे बहुमूल्य कोई और काम ही नहीं है। रात होकि दिन, सुबह हो कि सांझ, फिर मत देखना। कुछ चूकोगे नहीं तुम, कुछ खोएगा नहीं। और अपूर्व होगी तुम्हारी संपदा फिर। और यह संपदा तुम्हारे भीतर पड़ी है, बस पर्दा हटाने की बातहै।
‘ध्यान क्या है?’
ध्यान भीतर पड़े पर्दे को हटाना है।

ओशो एस धम्मो सनंतनो, भाग9

 

https://sambodhihealingcenter.wordpress.com/2013/05/30/%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%93%E0%A4%B6%E0%A5%8B-%E0%A4%8F%E0%A4%B8-%E0%A4%A7%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%8B/

इस पृथ्वी लोक में कौन-सा अपराध ज्यादा पातक देता है…बुद्ध चरित

Buddha27बुद्ध चरित में एक कथा है—

बुद्ध के अंतिम समय में उनके प्रिय शिष्य आनंद ने उनसे पूछा कि भगवन् इस पृथ्वी लोक में कौन-सा अपराध ज्यादा पातक देता है, जान-बूझकर किया गया अपराध अथवा अनजाने में हुआ अपराध? बुद्ध ने आनंद की उम्मीद के विपरीत कहा कि अज्ञानतावश हुआअपराध। आनंद हतप्रभ रह गया। भगवन् किस तरह का उपदेश दे रहे हैं? भला जान-बूझकर किया गया अपराध क्षम्य है और अनजाने में किया अपराध ज्यादा पातक का भागी कैसे बना सकता है? उसने फिर पूछा यह कैसे भगवन्? मुझे तो लगता है कि अनजाने मेंकिया गया अपराध क्षमा के योग्य है। आनंद को लग रहा था कि वे शायद उसकी जिज्ञासा को समझ नहीं पाए।पर भगवान बुद्ध अपनी ही बात पर कायम थे। उन्होंने फिर वही जवाब दिया।शिष्य आनंद की जिज्ञासा का शमन करते हुए बुद्ध ने कहा कि देखो आनंद मैंतुमको एक उदाहरण दे रहा हूं। मान लो एक व्यक्ति खूब गर्म लोहे की छड़ पर अनजाने में बैठ जाता है और दूसरा उस छड़ की गर्माहट को जानते हुए, तो बताओ अग्नि का ताप किसको ज्यादा जलाएगा? आनंद ने कहा कि भगवन् जो अनजाने में उस गर्म लोहे कीछड़ पर बैठा है। बुद्ध बोले- तो यही बात मैं भी कह रहा हूं प्रिय आनंद। अनजाने में किया गयाअपराध ज्यादा पातक का भागी बनाता है। पर आनंद को अभी भी यह बात समझ में नहीं आई। उसने कहा कि मुझे लगता है कि अनजाने या भोले आदमी द्वारा किया गयाअपराध क्षम्य होना चाहिए। एक आदमी जानबूझ कर अपराध कर रहा है पर दूसरा बेचारा भूलवश, तो जाहिर है कि अपराध उसी का बड़ा समझा जाएगा जिसने जानबूझ कर किया। बुद्ध बोले—आनंद जो अज्ञान के कारण अपराध करता है वह अधिक दोषी इसलिएभी है कि उसने ज्ञान को नहीं स्वीकारा। हर चीज का ज्ञान जरूरी है आनंद और इसके लिए जरूरी है अनवरत ज्ञान का अभ्यास। जो अज्ञान में अपराध करेगा वह भीषण अपराध करेगा पर जानबूझ कर करने वाला अपराध छोटा होगा। अब आनंद की समझमें आयाकि वे ज्ञान की महिमा का बखान कर रहे हैं।भगवान बुद्ध का आशय ज्ञान की रोशनी से था। उनका मानना था कि हर आदमी अपने दुख से सिर्फ तब ही उबर सकता है जब वह अज्ञान से ज्ञान की तरफ जाए। यह ज्ञान की रोशनी ही उसे उसके सारे दुखों से उबारने मेंसहायक होगी। बुद्ध का सारा जोर प्राणियों को ज्ञानवान बनाना था और इसी का नतीजा था कि बुद्ध का दर्शनमनुष्य को अंधविश्वास की तरफ नहीं ले जाता और जिन प्रश्नों के उत्तर ज्ञात न हों, बुद्ध उन प्रश्नों को मानव जीवन के लिए व्यर्थ मानकर छोड़ने की सलाहदेते हैं। बुद्ध कहते हैं कि ईश्वर है अथवा नहीं याआत्मा है अथवा नहीं, इसे जान लेने या न जान लेने से मनुष्य का कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। इसलिए ऐसे फिजूल प्रश्नों को छोड़ देना ही श्रेयस्कर होगा । मनुष्य जीवन के बाकी सभी उपादेयों को समझ लेने की बात बुद्धकरते हैं पर ईश्वर के बारे में वे चुप साध जाते हैं। यही कारण है कि बुद्ध के बाद ही भारत में ज्ञानवाद की आंधी चल पड़ी और ज्यादातर वैज्ञानिक खोजें तथा चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियां बुद्ध के बाद की हैं।कणाद के दर्शन के जिस अणुवाद का ज्ञान हमें मिलता हैवह भी बुद्ध के परवर्ती काल का है। बुद्ध ने जीवन को वैज्ञानिक पद्धति से समझने का प्रयास किया और जाना भी। लेकिन बौद्ध धर्म में चूंकि निजी मोक्ष पर जोर इतना था कि शुरू में बुद्धचर्या मात्र कुछ बौद्ध भिक्षुओं तक ही सिमटी रही। पर जब बुद्धमार्ग का विस्तारहुआ तो महायान संप्रदाय का जन्म हुआ और बुद्ध का दर्शन आम आदमी तक भी पहुंचा। सिर्फसाधकों पर जोर होने के कारण बुद्ध का पूर्ववर्ती काल सिमटा हुआ ही रहा है पर जैसे-जैसे सबकी साझेदारी स्वीकार हुई, बौद्ध धर्म का इतना विस्तार हुआ कि देश और कालकी सीमाएं लांघते हुए बौद्ध धर्म पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया में तो पहुंचा ही। यूरोप के स्पेन में आज भी बौद्ध मठमिल जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि ईसाई मत में जो करुणा का आग्रह है वह बौद्ध मत से ही आया। पर ईसाई मत में ईश्वर की सत्तास्वीकार करने के बाद भी उसमें वैज्ञानिकता रही और निरंतर इस मत को और धारदार तथा आधुनिक जीवनशैली के अनुकूल बनाया गया पर बौद्ध मत कुछ सीमा तक प्रगति करने के बाद पीछे घिसटता चला गया। और आज खुद भारत में ही बौद्ध मत केअनुयायियों की संख्या एक करोड़ से ऊपर नहीं है।यह एक अजीब बात है कि जिस धर्म ने सबसे पहले ईश्वर की सत्ता को नकारा और सिर्फ ज्ञान की पहुंच को ही सत्य माना, उस धर्म का वजूद भारत में भले न हो पर पूरा दक्षिण-पूर्व एशिया तथा मध्य एशिया आजभी उसीधर्म को अपना आदर्श मानता है। चीन हो या जापान अथवा थाईलैंड या वियतनाम अथवा कंबोडिया, बर्मा या मलयेशिया और इंडोनेशिया आदि सभी जगह आदर्श बौद्ध ही हैं। मलयेशिया और इंडोनेशिया में राजकीय धर्म भलेइस्लाम हो पर वहां पर आमजनता की जीवनशैली पर बुद्ध के ही आदर्श हावी हैं और यही कारण है कि इन दोनोंही मुल्कों में इस्लाम का दखल बस मस्जिदों तक सीमित है। चीन और जापान में धर्म अध्यात्म का अबूझ रूप लेकर नहीं फैला बल्कि वहां बुद्ध चर्या का ज्ञान स्वरूप ही पसंद कियागया। यही कारण है कि बुद्ध वहांधर्म के प्रतीक हैं पर जीवन शैली में जो खुलापन और आध्यात्मिकता है वह प्रवृत्तिवादी है जो यहां के लोगों को निरंतर शोध और वैज्ञानिकता की तरफ ले जाती है। इन मुल्कों में धर्म त्राता का रूप तो है पर अंधविश्वास के रूप में कतईनहीं। वहां धर्म उपासना तक ही सीमित है और जीवन शैली में जो वैज्ञानिकता है वह बुद्ध धर्म के ज्ञानमार्ग के कारण ही। ऐसे में बुद्ध का उपदेश याद आता है—

अज्ञान ही सबसे बड़ा अपराध है और पातक है, इसलिए अज्ञान को त्यागो और ज्ञान की रोशनी की तरफ निरंतर चलते रहो। चरैवति! चरैवति!
👌नमो बुद्धाय 👌

भगवान बुद्ध का अंतिम भोजन—(कथा–12)…ओशो

Buddha30भगवान बुद्ध के आखिरी छ: महीने बहुत पीडा में बीते। पीड़ा में उनकी तरफ से,जिन्‍होंने देखा; बुद्ध की तरफ से नहीं। बुद्ध एक गांव में ठहरे थे। और उस गांव के एक शुद्र ने,एक गरीब आदमी ने बुद्ध को निमंत्रण दिया की मेरे घर भोजन करो। भगवान ने उसका निमंत्रण स्‍वीकार कर लिया। सुबह-सुबह जल्‍दी आ गया था। वह जानता था उसका नम्‍बर बाद में तो नहीं आ पायेगा। इससे पहले और लोग निमंत्रण न दे वह बहुत सुबह उठ भगवान की गंध कुटी के सामने आ बैठा। उस की बड़ी तमन्‍ना थी की जीवन में एक बार भगवान उसके यहाँ भी भोजन ग्रहण करे।

वह निमंत्रण दे ही रहा था कि इतनी देर में गांव को कोई धन पति ने आकर भगवान को कहा कि आज का भोजन निमंत्रण मेरे ग्रहण करें। भगवान बुद्ध ने कहा धनपति आज का तो निमंत्रण आ चुका है। इस प्रेमी ने आज अपने घर बुलाया हे। उस अमीर ने उस आदमी की तरफ देखा और कहां, इस का निमंत्रण, शायद इस के पास तो अपने खाने के लिए भी कुछ नहीं होगा। इसके तो खुद कई-कई फाँकें पड़े होते है। तब उसने उसकी तरफ देख कर उससे पूछा क्‍या में कुछ गलत कहा रहा हूं। उस व्‍यक्‍ति ने गर्दन हिला कर हामी भर दी। इस के पास कुछ तो खिलाने के लिए होगा तभी तो यह इतनी दुर से मुझे निमंत्रण देने के लिए आया है। जो भी हो इसके पास जो भी होगा अब निमंत्रण तो इसी का स्‍वीकार कर चूका हूं। और इसी के घर भोजन करूंगा। जाओ ग्रह पति आप भोजन की तैयारी करो आज का भोजन आपके यहाँ है।

भगवान बुद्ध गये। उस आदमी को भरोसा भी न था कि भगवान उसके घर पर भी कभी भोजन ग्रहण करेने के लिए आएँगे। उसके पास कुछ भी न था खिलाने को वस्‍तुत:। वह अमीर ठीक कह रहा था। रूखी रोटिया थीं। सब्‍जी के नाम पर बिहार में गरीब किसान वह जो बरसात के दिनों में कुकुरमुत्‍ते पैदा हो जाते है—लकड़ियों पर, गंदी जगह में—उस कुकुरमुत्‍ते को इकट्ठा कर लेते है। सुखाकर रख लेते है। और उसी की सब्‍जी बनाकर खाते हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि कुकुरमुत्‍ते पायजनस हो जाता है। जहरीला हो जाता है। सांप वगैरा के गुजरने के कारण। वह ऐसी जगह पैदा हो गये हो जहां जहर मिल गया। तो कुकुरमुत्‍तों में जहर था।

बुद्ध के लिए उसने कुकुरमुत्‍ते की सब्‍जी बनाई। वह एक दम कड़वे जहर थे। मुंह में रखना मुश्‍किल था। लेकिन उसके पास एक ही सब्‍जी थी। तो भगवान बुद्ध ने यह सोच कर कि अगर मैं कहूं कि यह सब्‍जी कड़वी हे। तो यह कठिनाई में पड़ेगा; उसके पास कोई दूसरी सब्‍जी नहीं है। वह उस ज़हरीली सब्‍जी को खा गये। उसे मुंह में भी रखना कठिन था। पूरी को मांग कर की बहुत सुस्‍वाद बनी है। कह कर खा गये ताकि इसे बाद में भी पता न चले कि यह ज़हरीली सब्‍जी थी। खूब आनंद ले कर खाते रहे।

जैसे ही भगवान बुद्ध वहां से निकले, उस आदमी ने जब सब्‍जी को चखा तो वह तो हैरान हो गया। यह क्‍या यह तो कड़वी जहर सब्‍जी है। वह भागा हुआ आया और उसने कहा कि आप क्‍या करते रहे? वह तो जहर है। वह छाती पीटकर कर रोने लगा। लेकिन बुद्ध भगवान ने कहा, तू जरा भी चिंता मत कर। क्‍योंकि जहर मेरा अब कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेगा। क्‍योंकि मैं उसे जानता हूं जो अमृत है। तू जरा भी चिंता मत कर घर जा।

लेकिन फिर भी उस आदमी की चिंता तो हम समझ सकते है। कि उससे अनजाने में क्‍या हो गया उसे अंदरूनी तोर पर कितनी गिलानि पीड़ा पश्‍चाताप हो रहा होगा कि उसने ये कर दिया। पर उस आदमी को भगवान ने कहां तू धन्‍य भागी है। तुझे पता नहीं, तू खुश हो, तू सौभाग्‍यशाली है। क्‍योंकि कभी हजारों वर्षों में बुद्ध जैसा व्‍यक्‍ति पैदा होता है। दो ही व्‍यक्‍तियों को उसका सौभाग्‍य मिलता हे। पहला भोजन कराने का अवसर उसकी मां को मिलता है और अंतिम भोजन कराने का अवसर तुझे मिला है। तू सौभाग्‍यशाली है; तू आनंदित हो। ऐसा फिर सैकड़ों हजारों वर्षों में कभी कोई बुद्ध पैदा होगा और ऐसा अवसर फिर किसी को मिलेगा। उस आदमी को किसी तरह समझा-बूझकर लौटा दिया।

बुद्ध के शिष्‍यों ने जीवन वैद्य को बुला कर जब पता कराया की भगवान की तबीयत क्‍यों खराब रहती है। तब उसने बताया कि इन्‍हें जहर दिया गया है। तब भगवान के अन्‍य भिक्षुओं के साथ आनंद रोने लगा। की वह आदमी तो हत्‍यारा है, उसने आपको जहर दिया है। भगवान ने कहा: ऐसी बात भूल कर भी मत कहना। अन्‍यथा उस आदमी को कोई जीवित नहीं रहने देगा। आनंद तुम गांव में लोगों को भेज कर यह डोंडी पिटवां दो ये खबर करवा दो की दो ही आदमी परम सौभाग्‍यशाली होते है, जिसने पहला भोजन बुद्ध को कराया और जिसने अंतिम भोजन बुद्ध को कराया।

मरने के वक्‍त तक सब लोग यही कहते रहे की आप एक बार तो कहा देते की यह सब्‍जी कड़वी है विषाक्‍त है। तब हम पर यह वज्रपात अकस्‍मात न गिरता। आपने भी यह क्‍या किया। और भगवान केवल मुस्कुराए और कहने लगे जानते है। यह तो निमित है कैसे जाना कोई तो बहाना होना ही था। यह वज्रपात गिरना तो था ही, इससे क्‍या फर्क पड़ता है कैसे गिरा। जहां तक मेरा संबंध है मुझ पर कोई वज्रपात नहीं गिरा क्‍योंकि मैने उसे जान लिया है जो अमृत हे। जिसकी कोई मृत्‍यु नहीं होती।

ओशो

गीता दर्शन भाग-3,

अध्‍याय-6, प्रवचन—11

http://oshosatsang.org/2010/07/17/%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AE-%E0%A4%AD%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8/

बुद्ध ने कहा है: मैं वैद्य हूं, चिकित्‍सक हूं, मैं शिक्षक नहीं है, मैं तुम्‍हें कोई सिद्धांत सिखाने नहीं आया हूं…….तंत्र–सूत्र–(भाग–3)–प्रवचन–40

buddha1234बुद्ध ने कहा है: मैं वैद्य हूं, चिकित्‍सक हूं, मैं शिक्षक नहीं है, मैं तुम्‍हें कोई सिद्धांत सिखाने नहीं आया हूं…….

औषधि तुम्हें स्वास्थ्य नहीं दे सकती, केवल तुम्हारे रोगों को मिटा सकती है। और जब रोग नहीं रहे तो स्वास्थ्य घटित होता है, तुम स्वास्थ्य के लिए उपलब्ध हो जाते हो। लेकिन रोगों के रहते स्वास्थ्य नहीं हो सकता है। यही कारण है कि चिकित्सा विज्ञान, चाहे पूर्वी हो चाहे पश्चिमी, अब तक स्वास्थ्य की परिभाषा नहीं कर सका है। वह एक—एक रोग की सही परिभाषा कर सकता है। उसने हजारों रोगों की खोज की है और उनकी परिभाषा की है; लेकिन वह यह नहीं बता सकता कि स्वास्थ्य क्या है। ज्यादा से ज्यादा चिकित्सा विज्ञान यही कह सकता है कि जब रोग नहीं होते हैं तब तुम स्वस्थ होते हो। लेकिन स्वास्थ्य क्या है?

स्वास्थ्य कुछ ऐसी बात है जो मन से परे है। यह कुछ ऐसा है जो होता तो है, उसे तुम अनुभव भी कर सकते हो; लेकिन तुम उसकी परिभाषा नहीं कर सकते। तुमने स्वास्थ्य जाना है, लेकिन क्या तुम परिभाषा कर सकते हो कि वह क्या है? जैसे ही तुम उसकी परिभाषा करने की चेष्टा करोगे, तुम्हें रोग को बीच में लाना पड़ेगा, तुम्हें रोग के संबंध में कुछ बताना पड़ेगा, कि रोग की अनुपस्थिति स्वास्थ्य है।

लेकिन यह तो बडे मजे की बात है कि स्वास्थ्य की परिभाषा के लिए तुम्हें रोग को बीच में लाने की जरूरत पड़ती है। और रोग के निश्चित गुण हैं।

स्वास्थ्य के भी अपने गुण हैं, लेकिन वे उतने निश्चित नहीं हैं, क्योंकि वे असीम हैं। तुम उन्हें अनुभव कर सकते हो; जब तुम स्वस्थ होते हो तो जानते भी हो कि मैं स्वस्थ हूं। लेकिन स्वास्थ्य क्या है? रोगों का इलाज हो सकता है, उन्हें मिटाया जा सकता है। और जब अवरोध हट जाते हैं, स्वास्थ्य का प्रकाश भीतर आ जाता है।

ज्ञान—की घटना भी ऐसी ही है। ज्ञान आध्यात्मिक स्वास्थ्य है। मन आध्यात्मिक रोग है और ध्‍यान एक औषधि है।

बुद्ध ने कहा है: मैं वैद्य हूं, चिकित्‍सक हूं, मैं शिक्षक नहीं है, मैं तुम्‍हें कोई सिद्धांत सिखाने नहीं आया हूं। मैं कुछ औषधि जानता हूं जो तुम्हारे रोगों का इलाज कर सकती है। औषधि लो, रोगों को मिटाओ; और तुम्हें स्वास्थ्य उपलब्ध हो जाएगा। स्वास्थ्य के संबंध में पूछो मत। बुद्ध कहते हैं. मैं दार्शनिक नहीं हूं; मैं सैद्धांतिक नहीं हूं। मेरी रुचि इसमें नहीं है कि ईश्वर क्या है; कैवल्य, मोक्ष और निर्वाण क्या है। मुझे जरा भी रुचि नहीं है। मैं तो सिर्फ इसमें उत्सुक हूं कि रोग क्या है और उसका उपचार क्या है। मैं वैद्य हूं।

बुद्ध की दृष्टि बिलकुल वैज्ञानिक है। उन्होंने मनुष्य की समस्या का, उसकी बीमारी का ठीक निदान किया। उनकी दृष्टि सर्वथा सम्यक है – ओशो

तंत्र–सूत्र–(भाग–3)–प्रवचन–40

डॉ . प्रभात टंडन अपने अनुभव और बौद्ध धम्म मार्ग के चनात्मक अध्ययन के बात कहते हैं की

इसमें कोई संदेह नही कि बुद्ध का मार्ग दूसरे रहस्यदर्शियों के मार्ग से बिल्कुल अलग था । एक चिकित्सक की भूमिका मे बुद्ध अधिक फ़िट बैठते हैं ।
जिस प्रकार एक चिकित्सक को रोगी को स्वस्थ करने के लिये चार तथ्यों की आवशयकता पडती है

१. रोग
२. रोग का कारण
३. रोग का उपचार (आरोग्य )
४. भैषज्य ( रोग दूर करने की दवा )

उसी प्रकार बुद्ध दु:ख रुपी रोग का चिकित्सा पद्द्ति द्वारा इलाज करते हैं । बुद्ध ने संसार मे दुख देखा । वह जानते थे कि इस दुख को कोई भी आध्यात्मिक उपदेश ठीक नही कर सकता बल्कि उसे एक विशेष सिस्टम द्वारा ठीक किया जा सकता है ।

बुद्ध के अनुसार

१.अगर दुख है तो
२. दुख के कारण भी होगे ( समुदय )
३. कारण है तो उसे दूर भी किया जा सक्लता है ( निदान )
४. दूर करने के लिये उपाय यानि दवा भी होगी । ( अष्टांगिक मार्ग )

हमें बौद्ध धम्म परंपरा और संस्कृति क्रियाएँ विकसित और प्रचारित करनी ही होंगी खासकर जन्म,शादी,उद्घाटन,मृत्यु,त्यौहार आदि में| ऐसे समय हमारे लोग दो भागों में बट जाते हैं एक पक्ष एक विपक्ष, केवल विरोधियों के कर्मकांडों की बुराई भर से बात बनने वाली नहीं|समझो ये समाज की मांग है ऐसे समय पर लोग अपने दरवाजे पर कुछ क्रियाएँ चाहते है हम नहीं बताएँगे तो वो वर्तमान परम्पराएँ ढोते चले जायेंगे तब चाहकर भी मुक्त नहीं हो पाएंगे, ध्यान रहे परंपरा किसी भी पंथ को जीवित रखती है, किताबों को आम पब्लिक नहीं पढ़ती न कभी पढ़ेगी| संस्कृति का मुकाबला संस्कृति से ही हो सकता है| अगर ये बात समझ गए तो इस दिशा में भी संगर्ष शुरू करो….समयबुद्धा

हमें बौद्ध धम्म परंपरा और संस्कृति क्रियाएँ विकसित और प्रचारित करनी ही होंगी खासकर जन्म,शादी,उद्घाटन,मृत्यु,त्यौहार आदि में| ऐसे समय हमारे लोग दो भागों में बट जाते हैं एक पक्ष एक विपक्ष, केवल विरोधियों के कर्मकांडों की बुराई भर से बात बनने वाली नहीं|समझो ये समाज की मांग है ऐसे समय पर लोग अपने दरवाजे पर कुछ क्रियाएँ चाहते है हम नहीं बताएँगे तो वो वर्तमान परम्पराएँ ढोते चले जायेंगे तब चाहकर भी मुक्त नहीं हो पाएंगे, ध्यान रहे परंपरा किसी भी पंथ को जीवित रखती है, किताबों को आम पब्लिक नहीं पढ़ती न कभी पढ़ेगी| संस्कृति का मुकाबला संस्कृति से ही हो सकता है| अगर ये बात समझ गए तो इस दिशा में भी संगर्ष शुरू करो….समयबुद्धा

baudh sanskriti

बाबा साहब डॉ अम्बेडकर महान द्वारा रचित महाग्रंथ ‘भगवान बुद्ध और उनका धम्म’ खंड-1, भाग-163 (राजकुमार सिद्धार्थ गौतम की जीवन कथा )

buddha dhamm अतीत में देखने पर हमें ज्ञात होता है कि र्इसा पूर्व छठी शताब्दी में, उत्तर भारत कोर्इ समूचा प्रभुता-संपन्न राज्य नहीं था।
2. देश अनेक छोटे-बड़े राज्यों में बंटा हुआ था। इनमें से कुछ राज्यों में प्रत्येक पर जहां एक अकेले राजा का अधिकार था, वहीं कुछ पर किसी अकेले राजा का अधिकार नहीं था।
3. जो राज्य राजाओं के अध्ीन थे उनकी कुल संख्या सोलह थी। उनके नाम थे- अंग, मगध्, कासी, कोसल, वज्जी, मल्ल, चेति, वत्स, कुरू, प×चाल, मच्छ, सूरसेन, अस्सं, अवंति, गंधर तथा कंबोज।
4. जिन राज्यों में किसी एक राजा का आधिपत्य नहीं था, वे थे-कपिलवस्तु के शाक्य, पावा तथा कुसीनारा के मल्ल, वेसाली के लिच्छवि, मिथिला के विदेह, रामगाम के कोलिय, अल्लकम्प्प के बुलि, केसपुत्त के कालाम, रेसपुत्त् के कलिंग, पिप्पलवन के मौर्य तथा भग्ग ;भर्गद्ध, जिनकी राजधनी सिंसुमारगिरि थी।
5. जिन राज्यों पर किसी एक राजा का अधिकार थावे जनपद कहलाते थे औ जिन राज्यों पर किसी एक राजा का अधिकार नहीं था वे संघ या गण कहलाते थे।
6. कपिलवस्तु के शाक्यों की राज्य-व्यवस्था के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है कि वहां गणतंत्र था अथवा कुछ लोगों का कुलतंत्रा था।
7. वैसे इतनी जानकारी तो स्पष्ट रूप से है ही कि शाक्यों के गणतंत्रा में कर्इ शासक-परिवार थे और वे एक के बाद एक क्रमश: शासन करते थे।
8. शासक-परिवार का जो मुखिया होता था, वह राजा कहलाता था।
9. सिद्धार्थ गौतम के जन्म के समय राजा बनने की बारी शुद्धोदन की थी।
10. शाक्य-राज्य भारत के उत्तर-पूर्वी कोने में सिथत था। यह एक स्वतंत्र राज्य था। लेकिन आगे चलकर कोसल राज इस पर अपना आधिपत्य जमाने में सपफल हो गया।
11. इसका परिणाम यह हुआ कि कोसलराज की स्वीकृति के बिना शाक्य-राज्य के लिए अपने कुछ राजकीय अधिकारों का उपयोग असंभव हो गया।
12. उस समय के राज्यों में कोसल एक शकितशाली राज्य था। मगध्-राज्य भी ऐसा ही था। कोसलराज पसेनदि ;प्रसेनजितद्ध और मगध्राज बिमिबसार दोनों सिद्धार्थ गौतम के समकालीन थे।
सिद्धार्थ के पूर्वज
1. शाक्यों की राजधनी का नाम कपिलवस्तु ;पालि-कपिलवत्थुद्ध था। संभव है यह नाम महान बुद्धिवादी मुनि कपिल के ही नाम पर पड़ा हो।
2. कपिलवस्तु में जयसेन नाम का एक शाक्य रहता था। सिनाहनु उसका पुत्रा था। सिनाहतु का विवाह कच्चाना से हुआ था। उसके पांच पुत्रा थे- शुद्धोदन, धैतोदन, शक्लोदन, शुक्लोदन तथा अमितोदन। पांच पुत्राों के अतिरिक्त सिनाहनु की दो पुत्रियां भी थीं-अमिता और पमिता।
3. परिवार का गोत्रा आदित्य ;आदिच्चद्ध था।
4. शुुद्धोदन का विवाह महामाया से हुआ था जिसके पिता का नाम अ×जन और मां का नाम सुलक्षणा था। अ×जन कोलिय था और देवदह नाम के गांव में रहता था।
5. शुद्धोदन एक महान योद्धा था। जब शुद्धोदन ने अपने सैन्य-पराक्रम का परिचय दिया तो उसे एक और विवाह करने की भी अनुमति मिल गर्इ। उसने महा प्रजापति को चुना। महाप्रजापति, महामाया की ही बड़ी बहन थी।
6. शुद्धोदन एक ध्नी आदमी था। उसके पास बहुत बड़े-बड़े खेत और बहुत सारे नौकर-चाकर थे। कहा जात है कि अपने खेतों को जोतने के लिए वह एक हजार हल चलवाता था।
7. उसका जीवन बहुत ऐश्वर्यपूर्ण था और उसके अनेक महल थे।
के घर जन्मे थे। उनके जन्म की कथा इस प्रकार है।
2. शाक्यों की यह प्रथा थी कि वे प्रति वर्ष आषाढ़ के महीने में एक मèय-ग्रीष्मकालीन महोत्सव मनाया करते थे। यह उत्सव संपूर्ण राज्य में मनाया जाता था जिसमें शासक परिवार के सदस्य भी समिमलित होते थे।
3. सामान्यतया यह महोत्सव सात दिन तक मनाया जाता था।
4. एक बार महामाया ने उस उत्सव को बहुत ही उल्लास, भव्यता तथा पफूलों एवं सुगंधियों के साथ मनाने का निश्चय किया। किन्तु, उसमें मादक पेय पदार्थों को सर्वथा वर्जित ही रखा गया।
5. सातवें दिन वह प्रात: काल जल्दी उठी, सुगंधित जल से स्नान किया, चार लाख कार्षापणोंं का दान दिया, सभी मूल्यवान गहनों से स्वयं को सुशोभित किया, मनपसंद भोजन किया, व्रत का संकल्प किया, और तदन्तर वह भव्यता के साथ सजाए गए राजकीया शयनागार में सोने के लिए चली गयी।
6. उस रात शुद्धोदन और महामाया का संपर्क हुआ और महामाया ने गर्भ धरण किया। राजकीय शयया पर पड़े-पड़े उसे नींद आ गर्इ। निद्रा में महामाया ने एक स्वप्न देखा।
7. उसने स्वप्न में देखा कि वह अपनी शयया पर सो रही है और चतुर्दिक महाराजिक देवता उसकी शयया को उठाकर ले गए हैं उन्होंने उसे ले जाकर हिमालय क्षेत्रा में एक विशाल शाल-वृक्ष के नीचे रख दिया है। वे देवता ;श्रेष्ठ पुरूषद्ध पास ही खड़े हैं।
8. तब चतुर्दिक महाराजिक देवताओं की देवियां वहां आर्इ और उन्हें उठाकर मानसरोवर ले गर्इ।
9. उन्होंने उन्हें स्नान कराया, स्वच्छ वस्त्रा पहनाए, स्वच्छ वस्त्रा पहनाए, सुगंधियों का लेप किया और पफूलों से इस प्रकार सजाया-संवारा कि वे किसी दिव्य पुरूष के समिमलन योग्य बन जाए।
10. तब सुमेध् नाम का एक बोधिसत्व उसके सामने प्रकट हुआ और बोला, ”मैनें अपना अंतिम जन्म पृथ्वी पर धरण करने का निश्चय किया है, क्या आप मेरी माता बनना स्वीकार करोगी? उसने उत्तर दिया, ”हां, बड़ी प्रसन्नता से। उसी समय महामाया की नींद खुल गर्इ।
11. दूसरे दिन सुबह महामाया ने शुद्धोदन को अपने स्वप्न के बारे में बताया। स्वप्न की व्याख्या करने में असमर्ाि राजा ने शकुन-विधा में प्रसिद्ध आठ ब्राह्राणों को बुलवाया।
12. उनके नाम थे राम, ध्ज, लक्खन, मंती, कोण्ड××ा, सुयाम, सुभोग और सुदत्त। राजा ने उनके योग्य स्वागत की तैयारी की।
13. उन्होंने भूमि पर सुन्दर पुष्प विबवाए और उनके लिए ऊंचे आसन बिछवाये।
14. उन्होंने ब्राह्राणों के पात्रा सोने-चांदी से भर दिए ओर उन्हें घी, मध्ु, शक्कर, बढि़या चावल तथा दूध् से पके पकवान खिलाए। उन्होंने उन्हें नए-नए वस्त्रा और कपिल गाएं आदि उपहार भी दिए।
15. जब ब्राह्राण संतुष्ट तथा प्रसन्न हो गए तो शुद्धोदन ने उन्हें महामाया का स्वप्न कह सुनाया और पूछा, ” मुझे बताइए इसका क्या अर्थ है?
16. ब्राह्राणों का उत्तर था, ” महाराज! चिंतित न हों। आपके यहां एक पुत्रा होगा। यदि वह गृहस्थी में रहेगा तो चक्रवर्ती राजा होगा, और यदि गृहत्याग कर संन्यासी हो गया तो वह संसार की भ्रांति तथा अंध्कार का नाश करने वाला बुद्ध होगा।
17. बोधिसत्व को, पात्रा में रखे तेल की तरह, महामाया दस चन्द्र मास तक अपने गर्भ में धरण किए रही। प्रसव का समय समीप आया तो उसने अपने मायके में जाकर शिशु को जन्म देने की इच्छा व्यक्त की। अपने पति से उसने कहा, ”मैं अपने पिता के घर देवदह जाना चाहती हूं।
18. शुद्धोदन ने उत्तर दिया, ”तुम जानती ही हो कि तुम्हारी इच्छा पूरी की जायेगी। कहारों द्वारा उठार्इ गयी स्वर्ण पालकी में बिठवा कर शुद्धोदन ने अपने अनेक सेवक-सेविकाओं के साथ महामाया को उसके पिता के घर भिजवा दिया।
19. देवदह के मार्ग में महामाया को शाल-वृक्षों तथा अन्य पुषिपत एवं अपुषिपत वृक्षों के एक उधान-वन में से गुजरना था। यह लुंबिनी-वन कहलाता था।
20. जिस समय पालकी गुजर रही थी, उस समय लुंबिनी-वन दिव्य चित्रा-लता उपवन अथवा किसी प्रतापी राजा के लिए सुसजिजत भोज-मंडप जैसा लग रहा था।
21. जड़ से शाखाओं के छोर तक, पेड़ पफल-पफूलों से लदे थे और विचित्रा èवनि कर रही सुन्दर रंगों वाली अनगिनत मध्ुमकिखयों और अनेक प्रकार के पक्षियों के झुंड मध्ुर तान छेड़ रहे थे।
22. यह मनोरम दृश्य देखकर महामाया के मन में इच्छा उत्पन्न हुर्इ कि वह कुछ समय वहां रूके और मनोविनोद करे। अत: उन्होंने पालकी उठाने वालों को आज्ञा दी कि वे उसकी पालकी को शाल-उधान में ले चलें और वहां प्रतीक्षा करें।
23. महामाया पालकी से उतरी और चलकर एक सुन्दर शालवृक्ष के नीचे पहुंची। मंद-मंद बह रही सुखद पवन वृक्षों की शाखाओं को छेड़ रही थी जिससे वे ऊपर-नीचे हो रही थी। महामाया का मन हुआ कि उनमें से एक शाख को पकड़ ले।
24. संयोगवश एक शाखा इतनी नीचे झुक गयी कि वह उसे पकड़ सके। महामाया पंजों के बल खड़ी हो गर्इ और उन्होंने वह शाखा पकड़ ली। तुरन्त ही शाखा हिली और उसके साथ वह भी ऊपर की ओर उठ गर्इ और उसके झटके से महामाया को प्रसव-वेदना होने लगी। उस शाल-वृक्ष की शाखा पकड़े हुए खड़े-खड़े ही महामाया ने एक पुत्रा को जन्म दिया।
25. र्इसा पूर्व 563 वैशाख पूर्णिमा के दिन बालक ने जन्म ग्रहण किया।
26. शुद्धोदन ओर महामाया का विह हुए बहुत समय बीत गया था। लेकिन उनकी कोर्इ संतान नहीं हुर्इ थी। अंत में उन्हें जब पुत्रा-लाभ हुआ तो शुद्धोदन, उसके परिवार तथा शाक्यों द्वारा भी बहुत हर्ष, ध्ूमधम तथा समारोहपूर्वक पुत्रा का जन्मोत्सव मनाया गया।
27. बालक के जन्म के समय कपिलवस्तु पर शासन करने की बारी शुद्धोदन की थी। वे राज की उपाधि से गौरवानिवत हो रहे थे। स्वभाविक तोर पर बालक भी राजकुमार ही कहलाया।
असित का आगमन
1. जिस समय बालक का जन्म हुआ, उस समय हिमालय में असित नाम के एक बड़े मुनि रहते थे।
2. असित मुनि ने सुना कि देवतागण ”बुद्ध शब्द के उच्चार से आकाश को गुंजायमान कर रहे थे। वह सोचने लगे गकि क्यों न मैं वहां जाऊ और उस स्थान का पता लगाऊं जहां बुद्ध ने जन्म ग्रहण किया है।
3. असित मुनि ने समस्त जंबुद्वीप पर अपनी दिव्यदृषिट डालते हुए देखा कि शुद्धोदन के घर में उस दिव्य बालक ने जन्म ग्रहण किया था और वह अपनी प्रभा से प्रकाशमान हो रहा था। उसके ही जन्म पर देवतागण रोमांचित हो रहे थे।
4. इसलिए वह महान मुनि असित अपने भानजे नरदत्त के साथ उठ खड़े हुए औ चलकर राज शुद्धोदन के घर आए और उसके महल के द्वार पर आकर खड़े हो गए।
5. अब असित मुनि ने देखा कि शुद्धोदन के द्वार पर लाखों आदमी एकत्रा हुए हैं। वह द्वारपाल के पास गए और बोले, ”हे पुरूष! जाओ और राजा को सूचना दो कि द्वार पर एक मुनि खड़े है।
6. तब द्वारपाल राजा के पास गया और हाथ जोड़कर बोला, ”राजन! द्वार पर बहुत आयु के एक वृद्ध मुनि खड़े हैऔर आप से भेंट करने के इच्छुक हैं।?
7. राजा ने असित मुनि के बैठने के लिए उचित आसन की व्यवस्था की और द्वारपाल से कहा, ” मुनि को अन्दर आने दो। महल के बाहर आकर द्वारपाल ने असित से कहा, ”कृपया अंदर पदाध्रिए।
8. असित मुनि तब राजा के पास आए और उनके सामने खड़े हो गए। वह बोले, ”राजन! आपकी जय हो। आप चिरकाल तक जीवित रहें और अपने राज्य पर ध्र्मानुसार शासन करें।
9. तब शुद्धोदन ने आदरपूर्वक असित मुनि के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और उन्हें बैठने के लिए आसन दिया। जब उसने देखा कि असित मुनि सुखपूर्वक आसीन हो गए हैं तो शुद्धोदन ने पूछा, ”मुनिवर! मुझे स्मरण नहीं है कि इसके पूर्व भी मुझे आपके दर्शन हुए हैं। आपके यहां आगमन का क्या उददेश्य है? क्या कारण हैं?
10. इस पर असित मुनि ने राज शुद्धोदन से कहा, राजन! तुम्हें पुत्रा लाभ हुआ है। मैं उसे देखने की इच्छा से ही यहां आया हूं।
11. शुद्धोदन बोले, ” मुनिवर! बालक इस समय सोया हुआ है। क्या आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करेंगे? मुनि बोले, ”राजन!इस तरह के दिव्य प्राणी देर तक नहीं सोते हैं। वे तो स्वभाव से ही जागरूक होते हैं।
12. तब बालक ने महान मककुनि पर अनुकंपा करते हुए अपने जागने का संकेत किया।
13. यह देखकर कि बालक जाग उठा है, शुद्धोदन ने उसे दृढता पूर्वक अपने दोनों हाथों में लिया और असिन मुनि के सामने ले आया।
14. असित ने देखा कि बालक बत्तीस महापुरूष-लक्षणों तथा अस्सी अनव्य×जनों से युक्त है। उसका शरीर शुक्र और ब्रह्राा के शरीर से भी अधिक दीप्त है और उसका तेजोमंडल उनके तेजोमंडल से लाख गुणा अधिक प्रदीप्त है। उसके मुंह से तुरन्त यह रहस्यमय वाक्य निकला ”निस्संदेह जगत में यह अदभूत पुरूष उत्पन्न हुआ है। वह अपने आसन से उठे, दोनों हाथ जोड़े और उसके पैरों पर गिर पड़े। उन्होंने बालक की परिक्रमा की और उसे अपने हाथों में लेकर विचार-मग्न हो गए।
15. असित मुुनि पुरानी भविष्यवाणी से भली-भांति परिचित थे कि जिसके शरीर पर गौतम की ही तरह के बत्तीस महापुरूष-लक्षण होंगे, वह इन दो गतियों में से किसी एक को निशिचत रूप से प्राप्त होगा, तीसरी को नहीं। ”यदि वह गृहस्थ रहेगा तो वह चक्रवर्ती सम्राट बनेगा। लेकिन यदि वह गृहत्याग कर प्रव्रजित हो जाएगा तो सम्यक सम्बुद्ध बनेगा।
16. असित मुनि को निश्चय था कि यह बालक गृहस्थ नहीं रहेगा।
17. बालक की ओर देखकर, असित मुनि रो पड़े और आंसू बहाते हुए उन्होंने गहरी सांस भरी।
18. शुद्धोदन ने असित मुनि को आंसू बहाते और गहरी सांस लेते देखा।
19. उन्हें इस प्रकार रोता देखकर, शुद्धोदन के रोंगटे खड़े हो गए। व्यथित होकर उसने असित मुनि से निवेदन किया, ” हे मुनिवर! आप इस प्रकार क्यों रो रहे हैं, आंसू बहा रहे हैं और ठंडी सांस ले रहे हैं? मैं समझता हूं कि अवश्य ही बालक के लिए भविष्य में कोर्इ विपत्ति नहीं होगी।
20. असित मुनि ने राजा को उत्तर दिया, ”राजन! मैं बच्चे के लिए नहीं रो रहा हूं। उसका भविष्य तो बिलकुल निर्विघ्न है। मैं तो अपने लिए रो रहा हूं।
21. ”ऐसा क्यों? शुद्धोदन ने पूछा। असित मुनि ने उत्तर दिया, ”मैं जरा-जीर्ण हूं, वय-प्राप्त हूं और यह बालक सम्यकसम्बुद्ध होगा और इसके बाद वह अपने सिद्धान्तों का उत्कृष्ट ध्म्म-चक्र चलाएगा, जैसा उससे पहले संसार में किसी भी प्राणी ने नहीं चलाया। संसार के कल्याण और प्रसननता के लिए वह अपने ध्म्म सिद्धान्तों की देशना करेगा।
22. ”जिस धर्मिक जीवन की, जिस सद्धम्म् सिद्धांत की वह घोषणा करेगा वह आदि में कल्याणकारक होगा, मèय में कल्याणकारक होगा और अंत में कल्याणकारक होगा। वह अर्थ तथा व्य×जन की दृषिट से निर्दोष होगा। वह परिशुद्ध एवं परिपूर्ण होगा।
23. ”जिस प्रकार इस संसार में कभी-कभार कहीं उदुंबर ;गुलरद्ध का पफूल पुषिपत होता है, उसी प्रकार अनन्त युगों के बाद इस संसार में कभी-कभार और कहीं-कहीं बुद्धों का प्रादुर्भार्व होता है। राजन! इसी प्रकार निस्सन्देह यह बालक श्रेष्ठतम, सम्यक बोधिलाभ करेगा और ऐसा करने के बाद असंख्य प्राणियों को इस दुखमय सागर के पार सुख की अवस्था में पहुंचाएगा।
24. ”लेकिन मैं उन बुद्ध को नहीं देख सकूंगा। इसलिए राजन! मैं रो रहा हूं और दुख के कारण ठंडी सांस भर रहा हूं। मैं अपने जीवन में उन बुद्ध की पूजा नहीं कर पाऊंगा।
25. तब राजा ने उस महान असित मुनि और उसके भानजे नरदत्त ;नाळकद्ध को समुचित उत्तम भोजन से संतर्पित किया और उन्हें वस्त्रा दान देकर उनकी परिक्रमा की।
26. तब असित ने अपने भानजे नरदत्त से कहा, ”नरदत्त! जब कभी तुम्हें यह सुनने को मिले कि यह बालक सम्यकसम्बुद्ध हो गया है तो उनके पास जाकर उनकी शिक्षाओं में शरण लेना। यह तेरे सुख, कल्याण और प्रसन्नता के लिए होगा। इतना कहकर असित ने राजा से विदा ली और अपने आश्रम की ओर चले गये।
5. महामाया का परिनिर्वाण
1. पांचवे दिन नामकरण संस्कार किया गया। बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया। उसके गोत्रा का नाम गौतम ;पालि-गोतमद्ध था। इसलिए वह सिद्धार्थ गोतम के नाम से लोकप्रिय हुआ।
2. बालक के जन्म और उसके नामकरण के हर्षोल्लास के बीच में ही महामाया अचानक बीमार पड़ गर्इ और उसके रोग ने गंभीर रूप धरण कर लिया।
3. जब उन्हें लगा कि उनका अंत समय निकट आ पहुंचा है तो उन्होंने शुद्धोदन और प्रजापति को अपनी शयया के समीप बुलाया और कहा, ”मुझे विश्वास है कि असित ने मेरे बच्चे के बारे में जो भविष्यवाणी की थी वह सच होगी। मुझे यही दुख है कि मैं उसे पूरा हुआ न देख सकूंगी।
4. मेरा बालक शीघ्र ही मातृहीन हो जाएगा। लेकिन मुझे इसकी तनिक भी चिंता नहीं है कि मेरे बाद उका लालन-पालन ठीक प्रकार से नहीं होगा और भविष्य के अनुरूप उसकी समुचित देखभाल नहीं होगी।
5. ”प्रजापति! मैं तुम्हें अपना बच्चा सौंपती हूं। मुझे लेशमात्रा भी संदेह नहीं है कि तुम उसके लिए उसकी मां से भी बढ़कर होओगी।
6. ”अब दुखी न हों। मुझे मरने की अनुमति दें। र्इश्वर का बुलावा आ गया है और उसके दुत मुझे ले जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इतना कहकर महामाया ने अंतिम सांस ली। शुद्धोदन और प्रजापति ;पालि-पजापतिद्ध दोनों को ही बहुत दुख हुआ और वे पफूट-पफूट कर रोने लगे।
7. जब सिद्धार्थ की माता का देहांत हुआ तो उसकी आयु केवल सात दिन की थी।
8. सिद्धार्थ का एक छोटा भार्इ भी था जिसका नाम नंद था। वह शुद्धोदन का महाप्रजापति से उत्पन्न पुत्रा था।
9. उसके कर्इ चचेरे भार्इ थे जिनके नाम महानाम और अनुरूद्ध थे, वे उसके चाचा शुक्लोदन के पुत्रा थे, आनंद उसके चाचा अमितोदन का और देवदत्त उसकी बुआ अमिता का पुत्रा था। महानाम तो सिद्धार्थ से बड़ा था और आनंद छोटा।
10. सिद्धार्थ उन्हीं की संगति में बड़ा हुआ।
सिद्धार्थ का बचपन तथा शिक्षा
1. जब सिद्धार्थ थोड़ा चलने-पिफरने के योग्य हो गया और बातचीत करने लगा तो शाक्य जनपद के मुखिया इकटठे हुए। उन्होंने शुद्धोदन से कहा कि बालक को ग्राम-देवी अभया के मंदिर में ले जाना चाहिए।
2. शुद्धोदन ने स्वीकार किया और महाप्रजापति से बालक को कपड़े पहनाने के लिए कहा।
3. जब वह उसे वस्त्रा पहना रही थी तब बालक सिद्धार्थ ने अति मध्ुर वाणी में अपनी मौसी से पूछा कि उसे कहां ले जाया जा रहा है। जब उसे पता चला कि उसे मंदिर ले जा रहे हैं तो वह मुस्कुराया। लेकिन शाक्यों के रति-रिवाज के अनुरूप वह चला गया।
4. आठ वर्ष का होने पर सिद्धार्थ ने अपनी शिक्षा आरम्भ की।
5. जिन आठ ब्राह्राणों को शुद्धोदन ने महामाया के स्वप्न की व्याख्या करने के लिए बुलाया था और जिन्होंने सिद्धार्थ के बारे में भविष्यवाणी की थी, वे ही उसके प्रथम आचार्य हुए।
6. जो कुछ वे जानते थे जब वे सब सिखा चुके तब शुद्धोदन ने उदिक्क देश के उच्च कुलोत्पन्न प्रथम कोटि के भाषा-विद तथा व्याकरण, दर्शन, वेद-वेदांग तथा उपनिषदों के ख्याति प्राप्त विद्वान सब्बमित्त को बुलावा भेजा। उनके हाथ पर सोने के पात्रा से समर्पण का जल सिंचन करके शुद्धोद ने सब्बमित्त को ही शिक्षण के निमित्त सिद्धार्थ को सौंप दिया। वह उसका दूसरा आचार्य था।
7. उसके शिक्षण में सिद्धार्थ ने तब के सभी दार्शनिक सिद्धान्तों में प्रवीणता प्राप्त कर ली।
8. इसके अतिरिक्त उसने आलार कालाम के शिष्य भारद्वाज से चित्त की एकाग्रता तथा समाधि का ज्ञान सीख लिया था। उसका आश्रम कपिलवस्तु में ही था।
सिद्धार्थ के प्रारंभिक लक्षण
1. जब कभी वह अपने पिता के खेतों में जाता और वहां कोर्इ काम नहं होता तो किसी एकांत स्थान में जाकर èयान ;आनापान-विपस्सनाद्ध का अभ्यास करने लगता।
2. उसके मानसिक विकास के लिए सभी प्रकार की शिक्षाएं तो दी ही जा रही थीं, किन्तु उसे एक क्षत्रिय के योग्य सैनिक प्रशिक्षण प्रदान करने में भी कोर्इ कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही थी।
3. शुद्धोदन को इस बात का पूरा èयान था कि कहीं ऐसी गलती न होने पाए कि सिद्धार्थ में मानसिक गुणों का ही विकास हो और वह पौरूष ;पुरूषत्वद्ध में पिछड़ जाए।
4. सिद्धार्थ स्वभाव से कारूणिक था। वह यह पसंद नहीं करता था कि एक आदमी दूसरी आदमी का शोषण करे।
5. एक बार वह अपने कुछ मित्राों सहित अपने पिता के खेत पर गया। वहां उसने देखा कि मजदूर खेत जोत रहे हैं, बांध्, बांध् रहे हैं और पेड़ काट रहे हैं। किन्तु तपती ध्ूप में उनके तन पर पूरे कपड़े भी नहीं है।
6. वह उस दृश्य से द्रवित हो उठा।
7. उसने अपने मित्राों से कहा- क्या यह उचित है कि एक आदमी दूसरे आदमी का शोषण करे? यह कैसे ठीक हो सकता है कि मजदूर मेहनत करे और मालिक उसकी मजदूरी के पफल से गुलछर्रे उड़ाए?
8. उसके मित्राों के पास उसके इस प्रश्न का कार्इ उत्तर न था, क्योंकि वे जीवन के उस पुराने दर्शन में विश्वास रखने वाले थे जिसमें मजदूर सेवा करने के लिए पैदा हुआ है और अपने स्वामी की इस प्रकार सेवा करने में वह अपने प्रारब्ध् को ही भोग रहा होता है।
9. शाक्य लोग वप्रमंगल नाम का एक उत्सव मनाया करते थे। धन बोने के प्रथम दिन मनाया जाने वाला यह एक ग्रामीण पर्व था। प्रथा के अनुसार उस दिन हर शाक्य को स्वयं अपने हाथों से हल जोतना होता था।
10. सिद्धार्थ ने हमेशा इस प्रथा का पालन किया और अपने हाथों से हल चलाया।
11. यधपि वह विद्वान था, पिफर भी उसे शारीरिक श्रम से तनिक भी घृणा न थी।
12. वह योद्ध ;सैनिकद्ध वर्ग से सम्बोधित था और उसे ध्नुष चलाने तथा अन्य शास्त्राों का प्रयोग करने की शिक्षा मिली थी। लेकिन वह किसी भी प्राणी को अनावश्यक चोट नहीं पहुंचाना चाहता था।
13. वह शिकारियों के दल के साथ जाने से मना कर देता था। उसके मित्रा कहा करते थे, ”क्या तुम्हें शेरों से डर लगता है? वह प्रत्युत्तर देता था, ”मैं जानता हूं कि तुम शेरों को मारने नहीं जा रहे हो, तुम हिरन तथा खरगोश जैसे निर्दोष जानवरों को ही मारने जा रहे हो।
14. ”कशिकार के लिए न सही कम से कम यह देखने के लिए जाओं कि तुम्हारे मित्राों का निशाना कितना अचूक है वे कहते। सिद्धार्थ इस तरह के निमंत्राणों को भी यह कह कर अस्वीकार कर देता था कि ”मैं निर्दोष पशुओं का वध् होते देखना भी पसंद नहीं करता।
15. सिद्धार्थ की इस प्रवृत्ति से प्रजापति गौतमी बहुत चिंतित रहती थी।
16. वह उसके साथ तर्क करते हुए कहती, ”तुम भूल गए हो कि तुम एक क्षत्रिय हो और लड़ना ही तुम्हारा कर्तव्य है। युद्ध कौशल तो शिकार के ही माèयम से सिखा जा सकता है, क्योंकि शिकार करके ही तुम सिख सकते हो कि किस प्रकार ठीक-ठीक निशाना लगाया जा सकता है। योद्धा के लिए शिकार ही प्रशिक्षण-भूमि है।
17. सिद्धार्थ बहुध गौतमी से पूछा करता था, ”लेकिन मां! एक क्षत्रिय को क्यों लड़ना चाहिए? और गौतमी उत्तर दिया करती थी, ”क्योंकि यह उसका कर्तव्य है।
18. सिद्धार्थ उसके उत्तर से कभी भी संतुष्ट नहीं होता था। वह गौतमी से पूछा करता था, ”मां! यह बताओ कि एक आदमी का यह कर्तव्य कैसे हो सकता है कि वह दूसरे आदमी को मारे? गौतमी तर्क देती, ”यह मनोवृत्ति एक संन्यासी के लिए ही ठीक हो सकती है। लेकिन क्षत्रिय को तो अवश्य ही लड़ना चाहिए। यदि क्षत्रिय नहीं लड़ेगा तो राज्य की सुरक्षा कौन करेगा?
19. ”लेकिन मां! यदि सब क्षत्रिय परस्पर एक दूसरे से प्रेम करें तो क्या बिना किसी को मारे वे राज्य की सुरक्षा नहीं कर पाएंगे? इस पर गौतमी उसे उसके ही निर्णय पर छोड़ देती।
20. वह साथियों को अपने साथ बैठकर èयान करने हेतु प्रेरित करने का प्रयास करता। वह उन्हें बैठने का ठीक तरीका सिखाता थावह उन्हें एक विषय पर अपना चित्त एकाग्र करना सिखाता था। वह उन्हें ऐसे विचारों को चुनने के लिए कहता जैसे, ”मैं प्रमुदित होऊं, मेरे सम्बध्ी प्रमुदित हों, समस्त पशु पक्षी प्रमुदित हों।
21. लेकिन उसके मित्रा इन बातों को गंभीरता से नहीं लेते थें। वे उसकी हंसी उड़ाते थे।
22. वे आंखें बंद करने पर èयान के विषय पर चित्त एकाग्र नहीें कर पाते थे। इसके विपरीत, वे अपनी आंखों के सामने शिकार के लिए हिरन को पाते अथवा खाने के लिए मिठाइयां देखते।
23. उनके माता-पिता को उसका इस प्रकार एक पक्षीय èयान अच्छा नहीं लगता था। उन्हें लगता था कि यह क्षत्रिय जीवन के सर्वथा विपरीत है।
24. सिद्धार्थ का विश्वास था कि ठीक विषयों पर चित्त की एकाग्रता, विश्वव्यापी मैत्राी भावना को विकसित करती है। वह स्वयं को सही सिद्ध करते हुए कहता, ”जब भी हम प्राणियों के बारे में विचार करते हैं, तो हमारा आरंभिक-चिंतन भेदभाव के साथ होता है। हम मित्राों और पालतू पशुओं से प्रेम करते हैं और अपने शत्राुओं और जंगली पशुओं से घृणा करते हैं।
25. ”इस विभाजक रेखा से हमें ऊपर उठना चाहिए और हम ऐसा तभी कर सकते हैं जब हम अपने चिंतन में व्यवहारिक जीवन की सीमाओं से ऊपर उठ जाएं। ऐसी थी उनकी तार्किक प्रवृत्ति।
26. उत्कृष्ट कारूणिक भावना उसकी बचपन की विशेषता थी।
27. एक बार वह अपने पिता के खेतों पर गया। विश्राम के समय वह एक वृक्ष के नीचे बैठा हुआ आराम कर रहा था और प्राकृतिक शांति और सौन्दर्य का आनन्द ले रहा था। जब वह इस प्रकार बैठा था, तभी आकाश से एक पक्षी ठीक उस के सामने आकर गिरा।
28. पक्षी को एक तीर मारा गया था, जो उसके शरीर में घुस गया था और इस कारण वह पक्षी पफड़पफड़ा रहा था।
29. सिद्धार्थ पक्षी की सहायता के लिए दौड़ पड़ा। उसने पक्षी का तीर निकाला, घाव पर पटटी बांध्ी और उसे पीने के लिए पानी दिया। उसने पक्षी को गोद में उठा लिया और उसी स्थान पर आया जहां वह पहले बैठा था। उसने अपने ऊपरी वस्त्राों में पक्षी को लपेट लिया और उसे गर्मी देने के लिए अपनी छाती से लगा लिया।
30. सिद्धार्थ को आश्चर्य हो रहा था कि इस निर्दोष पक्षी को किसने मारा होगा। थोड़ी ही देर में, उसका पफुपफेरा भार्इ देवदत्त वहां आ पहुंचा। उसके पास शिकार के सभी हथियार थे। उसने सिद्धार्थ से कहा कि उसने एक उड़ते हुए पक्षी पर तीर चलाया था, पक्षी घायल हो गया था किन्तु कुछ दुर उड़कर वह वहीं कहीं गिर गया। उसने सिद्धार्थ से पूछा, ”क्या तुमने उसे देखा है?
31. सिद्धार्थ ने ‘हां कहकर उत्तर दिया और उसे वह पक्षी दिखाया जो अब पूरी तरह से स्वस्थ हो चला था।
32. देवदत्त ने मांग की कि पक्षी उसे दे दिया जाए। सिद्धार्थ ने पक्षी देने से इनकार कर दिया। दोनों में घोर विवाद होने लगा।
33. देवदत्त ने तर्क दिया कि वही पक्षी का मालिक है क्योंकि शिकार के नियमों के अनुसार जो पक्षी को मारता है, पक्षी उसी का होता है।
34. सिद्धार्थ ने नियम की वैध्ता को अस्वीकार कर दिया। उसने तर्क दिया कि जो किसी की रक्षा करता है, वहीं उसका स्वामी होने का दावा कर सकता है। भला मारने वाला किसी का स्वामी कैसे हो सकता है?
35. दोनों में से एक भी पक्ष झुकने के लिए तैयान न था। मामला मèयस्थ निर्णय के लिए न्यायालय तक पहुंचा। न्यायालय ने सिद्धार्थ के पक्ष में निर्णय दिया।
36. देवदत्त तभी से सिद्धार्थ का स्थार्इ वैरी बन गया। लेकिन सिद्धार्थ की करूणा की भावना इतनी महान थी कि उसने पफुपफेरे भार्इ की सदभावना प्राप्त करने की अपेक्षा एक निर्दोष पक्षी की जान बचाने को ही प्राथमिकता दी।
37. सिद्धार्थ गौतम के आरंभिक जीवन के आचरण में ऐसी ही विशेषताएं थीं।
सिद्धाथ का विवाह
1. दंडपाणि नाम का एक शाक्य था। यशोध्रा उसकी पुत्राी थी। अपने सौंदर्य और शील के लिए वह प्रसिद्ध थी।
2. यशोध्रा अपने सोलहवें साल में पहुंच गर्इ थी और दंडपाणि उसके विह के बारे में विचार कर रहा था।
3. प्रथा के अनुसार दंडपाणि ने अपने सभी पड़ोसी देशों तरूणों को अपनी लड़की के स्वयंवर में समिमलित होने का आमंत्राण भेजा।
4. सिद्धार्थ गौतम के पास भी एक आमंत्राण भेजा गया।
5. सिद्धार्थ गौतम का सोलहवां वर्ष पूरा हो चुका था। उसके माता-पिता भी उसकी शादी के लिए उतने ही इच्छुक थे।
6. उन्होंने सिद्धार्थ को स्वयंवर में जाने और यशोध्रा का पाणि-ग्रहण करने को कहा। उसने अपने माता-पिता की इच्दा पूरी करना स्वीकार कर लिया।
7. स्वयंवर में पधरे तरूणों में से यशोध्रा ने सिद्धार्थ को ही चुना।
8. दंडपाणि अधिक प्रसन्न नहीं था। उसे उन दोनों के दांपत्य जीवन की सपफलता में संदेह था।
9. उसे लगा कि सिद्धार्थ की तो साध्ु-संतों की संगति की लत लगी हुर्इ है। वह एकांत को प्राथमिकता देता था। वह कैसे एक सपफल सदगृहस्थ बन सकेगा?
10. यशोध्रा ने निश्चय कर लिया था कि वह सिद्धार्थ गौतम से ही विवाह करेगी। उसने अपने पिता से पूछा कि क्या साध्ु-संतों की संगति में रहना कोर्इ अपराध् था। यशोध्रा ऐसा नहीं समझती थी।
11. जब यशोध्रा की माता को अपनी पुत्राी के इस संकल्प का पता चला कि वह गौतम को छोड़ किसी और से विवाह नहीं करेगी, तो उसने दंडपाणि से कहा कि वह विवाह हेतु स्वीकृति दे दें। दंडपाणि ने स्वीकृति दे दी।
12. गौतम के प्रतिद्वंद्वी केवल निराश ही नहीं हुए, वरन उन्हें लगा कि उनका अपमान किया गया है।
13. वे चाहते थे कि उनके प्रति न्याय करने के लिए ही यशोध्रा को वर चुनाव करने से पहले किसी न किसी प्रकार की परीक्षा लेनी चाहिए थी। किन्तु उसने ऐसा नहीं किया।
14. कुछ समय वे चुप रहे। उनका विश्वास था कि दंडपाणि तो यशोध्रा को गौतम का चुनाव करने की अनुमति देगा नहीं और तब उनका उददेश्य यूं ही पूरा हो जाएगा।
15. लेकिन जब दंडपाणि असपफल रहा तो उन्होंने साहस जुटाया और मांग की कि लक्ष्यबेध् की एक परीक्षा होनी ही चाहिए। दंडपाणि को यह प्रस्ताव स्वीकार करना पड़ा।
16. पहले तो सिद्धार्थ इसके लिए तैयान न था। लेकिन, उसके सारथी, दंदक ने उसे बताया कि यदि वह अस्वीकार करेगा तो यह उसके पिता, उसके परिवार तथा यशोध्रा के लिए भी कितने अपमान की बात होगी।
17. सिद्धार्थ गौतम उसके तर्क से बहुत प्रभावित हुआ और उसने उस प्रतियोगिता में समिमलित होना स्वीकार कर लिया।
18. प्रतियोगिता आरंभ हुर्इ। प्रत्येक प्रतिद्वंद्वी ने बारी-बारी से अपना-अपना कौशल दिखाया।
19. सबके अंत में गौतम की बारी आर्इ। किन्तु उसी का लक्ष्यबेध् सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुआ।
20. इसके बाद विवाह सम्पन्न हुआ। शुद्धोदन और दंडपाणि दोनों को प्रसन्नता हुर्इ। इसी प्रकार यशोध्रा और महाप्रजापति भी बहुत प्रसन्न थे।
21. वैवाहिक जीवन के लंबे समय के बाद यशोध्रा ने एक पुत्रा को जन्म दिया। उसका नाम राहुल रखा गया। खंड-1, भाग-163

बौद्ध धम्म के शुरुआती तीन गहने- बुद्ध, धम्म और संघ (वर्तमान में अम्बेडकरवाद और राजनीतिवाद भी जुड़ गया है )…http://www.dhammaprachar.org

इस लेख का विषय सही है पर इस में बहुत सी गलतियां है अगर कोई धम्म बंधू उनको सुधार कर हमें ये लेख  jileraj@gmail.com   पर ईमेल करे तो ये धम्म पर उसका महान योगदान होगा |इसके लिए  आप  http://www.easyhindityping.com/ का इस्तेमाल कर सकते हैं 
3 jwels of buddhism

=============================बुद्ध==============================

बुद्ध ‘Samma बोधि’ प्राप्त कर ली जो व्यक्ति है (राइट प्रबुद्धता). यह है, इसलिए, Samma बोधि क्या है पता करने के लिए आवश्यक है और यह कैसे प्राप्त किया था.

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में, Kapilvastu के Sakya राज्य राजा Suddhodana का शासन था. सिद्धार्थ गौतम राजा Suddhodana का पुत्र था. वर्ष में सिद्धार्थ अट्ठाईस था जब, शाक्य के नौकर और Koliyas के सेवकों के बीच नदी रोहिणी के पानी के ऊपर एक प्रमुख झड़प हुई. सभी के लिए एक बार मामले में समझौता करने की दृष्टि से, Sakya संघ Koliyas के खिलाफ युद्ध की घोषणा करने के लिए प्रस्ताव पारित, जो करने के लिए, सिद्धार्थ का विरोध. विपक्ष का एक परिणाम के रूप में, वह Parivrajaka बन गया है और देश छोड़ने के लिए सजा को स्वीकार करने के लिए किया था. देश छोड़ने के बाद सिद्धार्थ ने एक बार सोचा, ‘देशों के बीच संघर्ष सामयिक है, लेकिन वर्गों के बीच संघर्ष निरंतर और सतत है, जो सब दुख की जड़ है और दुनिया में पीड़ित. ‘सामाजिक संघर्ष की इस समस्या के लिए एक समाधान खोजने के, वह तो स्थापित दर्शन की जांच करने का फैसला किया.

सिद्धार्थ सांख्य दर्शन का अध्ययन, छह साल के लिए गंभीर प्रकार की तपस्या और वैराग्य समाधि मार्ग की तकनीक में महारत हासिल है और अभ्यास, लेकिन वह दुनिया में दुख की समस्या का हल करने के लिए कोई नजदीक था. इन सभी रास्तों की विफलता के बावजूद, वह अभी भी उम्मीद थी और आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए निर्धारित.

सिद्धार्थ चार सप्ताह के लिए बरगद के पेड़ के नीचे ध्यान के लिए बैठ गया और इन चार चरणों में अंतिम प्रबुद्धता पर पहुंच गया – 1.Reason और जांच 2.Concentration 3.Equanimity और mindfulness 4. Mindfulness के लिए धैर्य और धैर्य के लिए पवित्रता जोड़ा गया. इस प्रकार, उसके मन केंद्रित था, शुद्ध, बेदाग, कलंक चले गए साथ, कोमल, निपुण, फर्म और impassionate. मन की इस सर्वोच्च राज्य को प्राप्त करते हुए, वह दुनिया में दुख से उसकी समस्या को भूल जाते हैं और उस पर ध्यान केंद्रित नहीं किया. अंतिम दिन की रात, वह दो समस्याओं का एहसास – 1.There दुनिया में पीड़ित था 2. इस पीड़ा को दूर करने और मानव जाति को खुश करने के लिए कैसे. उन्होंने कहा कि दुनिया में दुख और दुख एक मुंहतोड़ तथ्य यह था कि सोचा. तो वह दूसरी समस्या पर अपने मन केंद्रित- पीड़ा और दुख को दूर करने के लिए कैसे. इस समस्या को हल करने के लिए, वह खुद को पीड़ा और दुख जो एक व्यक्ति आए के कारण होते हैं -1.What दो सवाल पूछा? 2, दुख दूर करने के लिए कैसे? उन्होंने कहा कि इन दोनों सवालों का एक सही जवाब मिल गया. इस सवाल का जवाब ‘Samma बोधि’ कहा जाता है (राइट प्रबुद्धता). इस प्रकार, सिद्धार्थ गौतम बुद्ध बन गए.

बुद्ध सिखाया – न्याय, प्यार, स्वतंत्रता, समानता, बिरादरी

बुद्ध के सिद्धांत धर्म का सिद्धांत है और उसका उद्देश्य पृथ्वी पर धर्म का राज्य स्थापित करने के लिए किया गया था. उनका सिद्धांत सत्य है, सच तो यह है, लेकिन पूरा सच और कुछ नहीं. उनका सिद्धांत इस प्रकार है जो एक, वह खुश हो जाएगा. वह मार्ग डाटा था (मार्ग खोजक) और न मोक्ष डाटा (मुक्ति का दाता).

कुछ लोगों को वहाँ सत्ताईस बुद्ध थे लेकिन उनके होने का इतिहास उपलब्ध नहीं है का कहना है कि, उपरोक्त के अलावा. उनका अस्तित्व साबित नहीं किया जा सका. बुद्ध खुद अटकलों पर आधारित बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए कि कहा.

=======================धम्म====================================

धम्म बीच का रास्ता है (Madhyama मार्ग), जो खुशी का मार्ग है और न ही स्वयं वैराग्य के पथ जाता है.

धम्म की नींव और आधार – अस्तित्व दुख की और पीड़ा को दूर करने के लिए रास्ता दिखाने की मान्यता.

धम्म का उद्देश्य – दुनिया पीड़ा से भरा है और कैसे दुनिया से इस पीड़ा को दूर करने के लिए कि.

धम्म का केंद्र – आदमी और आदमी के संबंध पृथ्वी पर अपने जीवन में आदमी के लिए.

भगवान और आत्मा – धम्म के साथ कुछ नहीं करना है, मृत्यु के बाद जीवन, रस्में और समारोहों.

धम्म पीड़ा को हटा, अगर इसके बाद – 1. पवित्रता का पथ (पंचशील), 2. धर्म के मार्ग (Astanga Marga) और 3, Vertue का पथ (Paramitas).

पवित्रता का पथ (पंचशील) –

1. घायल या मारने के लिए नहीं
2. अपने आप को अन्य के अंतर्गत आता है जो कुछ भी चोरी या उचित नहीं करने का.
3. नहीं असत्य बोलने के लिए.
4. नहीं वासना में लिप्त.
5. पेय नशीला में लिप्त नहीं.

धर्म के मार्ग –

1. सही विचार (समान Ditti) (Astanga Marga)

2. सही लक्ष्य (परावर्तन Sankappo)
3. सही भाषण (समान Vacca)
4. सही व्यवहार (परावर्तन Kamanto)
5. सही कमाई (परावर्तन Ajivo)
6. राइट एंडेवर (समान Vyayamo)
7. सही Mindfulness (समान सत्ती)
8. सही एकाग्रता (Samma समाधि)

सदाचार के पथ (Paramitas) –

1. वे (गलत कर का डर)
2. दाना(एक संपत्ति के कराती)
3. Uppekha(टुकड़ी)
4. Nekkhama(सुखों का त्याग)
5. Virya(एंडेवर)
6. Khanti(धैर्य)
7.Succa(सत्य)
8. Adhithana(दृढ़ दृढ़ संकल्प)
9. करुणा (इंसान को प्यार दया)
10.मैत्री (सभी प्राणियों के लिए फैलो भावना)

धम्म अनिवार्य रूप से और मौलिक सामाजिक है. धम्म नैतिकता और नैतिकता धम्म है.

——————————————————————————————————————————————————————–

===================================संघ====================================

 

संघ Bhikkhus का संगठन है, अनुशासन के नियमों और आदर्शों होने को आगे बढ़ाने और महसूस करने के लिए.

धर्म के आधार पर एक आदर्श समाज बनाने के उद्देश्य से बुद्ध. एक आदर्श व्यावहारिक होना चाहिए और साध्य होना दिखाया जाना चाहिए. तब और उसके बाद ही लोगों को यह बाद का प्रयास करते हैं और यह पता करने की कोशिश. इस प्रयास को बनाने के लिए, यह समाज आदर्श के आधार पर काम कर रहे हैं और इस तरह आदर्श असंभव नहीं था कि आम आदमी को साबित लेकिन वसूली दूसरी तरफ की एक तस्वीर के लिए आवश्यक है. संघ बुद्ध द्वारा प्रचार धम्म साकार एक समाज का एक मॉडल है.

वह एक भिक्खु बनने से पहले बुद्ध एक शिष्य से आया होने के लिए दो चरणों में निर्धारित. सबसे पहले एक शिष्य एक Parivrajaka बन गया है और एक भिक्खु से जुड़ी साल की एक निश्चित संख्या के लिए एक Parivrajaka बने रहे और उसके तहत प्रशिक्षण में शेष. वह Upasampada.The संघ के अनुदान के लिए संघ द्वारा जांच की गई थी पर उसके प्रशिक्षण अवधि था के बाद वह इसके लिए फिट था कि संतुष्ट होना चाहिए. यह तो केवल यह है कि वह एक भिक्खु और संघ के एक सदस्य बनने के लिए अनुमति दी गई थी जाता है.

हर भिक्खु संघ का सदस्य होना ही था. उन्होंने कहा कि वह नहीं तोड़ चाहिए जो प्रतिज्ञा के रूप में दस उपदेशों लेना पड़ा. उन्होंने कहा कि अनुशासन के नियमों का पालन करने के लिए बाध्य किया गया था (विनय). नियमों के उल्लंघन के लिए, दंड प्रदान किया गया. लेकिन, कोई भिक्खु एक नियमित रूप से गठित न्यायालय ने एक परीक्षण के बिना दंडित किया जा सकता है. अदालत एक अपराध हुआ था जहां जगह पर Bhikkus निवासी द्वारा गठित किया जाना था. पूरा अवसर खुद का बचाव करने का आरोप लगाया करने के लिए दिया गया था.

Bhikkhus की कार्य –

1. एक भिक्खु स्वयं संस्कृति के लिए खुद को समर्पित करना होगा. वह खुद को एक आदर्श होना चाहिए, सबसे अच्छा आदमी, धर्मी आदमी और एक प्रबुद्ध आदमी. आत्म संस्कृति के बिना वह मार्गदर्शन करने के लिए फिट नहीं है.

2. एक भिक्खु लोगों की सेवा और them.He उसके घर छोड़ देता है, लेकिन दुनिया से रिटायर नहीं करता मार्गदर्शन करने के लिए है. वह जिसका जीवन दु: ख से भरा है स्वतंत्रता और अपने घरों से जुड़े होते हैं, जो उन लोगों की सेवा करने का अवसर है, लेकिन हो सकता है कि तो वह घर छोड़ देता है, दुख और दुख और खुद को मदद नहीं कर सकता है जो. मानव जाति के संकट के प्रति उदासीन है, जो एक भिक्खु, स्वयं संस्कृति में हालांकि सही, सभी एक भिक्खु में नहीं है.