भगवान बुद्ध के अवशेष दूसरे देशो में कैसे पहुंचे… बुद्धकथाएँ


Indonesia-Borobudur5भगवान बुद्ध के अवशेष दूसरे देशो में कैसे पहुंचे

जव तथागत का शरीर अग्नि द्वारा भस्म में परिणित कर दिया गया कुशीनारा के मल्लो ने समस्त राख और अस्थिया इककठी कर ली और अपने संथागार में रखकर उन्हे भलो से घेर दिया और उन पर धनुर्थारियों का पहरा बैठा दिया ताकि कोई उनका एक हिस्सा भी चुरा के न ले जा सके
सात दिन तक मल्लो ने नृत्य, गीत. वाद्य. माला तथा सुगन्धियो द्वारा उनके प्रति आदर, सत्कार तथा गौरव प्रदर्शित किया और उनकी पूजा की I. अब मगध- नरेश अजातशत्रु ने समाचार सुना कि कुशीनारा में तथागत परिनिर्वाण को प्राप्त हो गये इसलिये उन्होंने मल्लो के पास अपना दूत भेजा ताकि वे उसे अवशेषों में से एक हिस्सा दें Iइसी प्रकार वैशाली के लिच्छवियो ने दूत भेजा ,कपिलवस्तु के शाक्यो ने भेजा , अहकप्य के वल्लियों ने भेजा , रामग्राम के कोलियो ने भेजा तथा पावा के मल्लो ने भेजा अस्थियो का एक हिस्सा मांगने वालो मैं वेठ द्वीप का एक ब्राह्मण था।
जब के कुशीनारा मल्लो ने इतनी मांगो की बात सुनी तो वे बोले:- “हमारी सीमा मे तथागत का परिनिर्वाण हुआ है हम किसी को कोई हिस्सा न देंगे । इस पर केवलं हमारा अधिकार है I”
परिस्तिथियों को बिगाड़ता देख ब्राह्मण द्रोण ने मध्यस्ता की वह बोला “मेरे ,दो शब्द सुन ले ,”द्रोण बोला “तथागत ने शांति और सहन शीलता की शिक्षा दी है ,यह उचित नहीं है उन तथागत की अस्थियो के लिए ,जो प्राणियों में सर्वश्रेष्ठत थे -झगड़ा हो, लड़ाई हो, कलह हो हम सब सहमत हो कर अस्थियो को आठ बराबर हिस्सों में बाटे और हर जनपद में उन पर स्तूप बनाये ताकि हर जनपद में उनकी पूजा हो सके कुशीनारा के मल्ल सहमत हो गए ,और बोले आचा तू ही इन अस्थियो को आठ बराबर हिस्सों में बाट दे ,बहुत अच्छा ब्राह्मण द्रोण ने कहा ,और कहा बटवारे के बाद जो बर्तन बचेंगे वह मुझे दे दिए जाये उस पर में स्तूप बनाऊगा ,सब ने स्वीकार किया ,और तथागत की अस्थियो को आठ हिस्सों में बाटा गया और बर्तन ब्राह्मण द्रोण को दिए गए इस प्रकार तथागत के अस्थियो के लिए जो युद्ध की संभावना थी वह शांति के साथ समाप्त हो गए

बुद्ध के अवशेषों पर इन जगह स्तूप बनाये गए थे

1,अजातशत्रु (मगध का राजा)

मगध-दक्षिण बिहार में अवस्थित। शतपथ ब्राह्मण में इसे ‘कीकट’ कहा गया है। आधुनिक पटना तथा गया जिले और आसपास के क्षेत्र।

2. वैशाली के लिच्छवियो को
वज्जि या वृजि’ – यह आठ गणतांत्रिक कुलों का संघ था जो उत्तर बिहार में गंगा के उत्तर में अवस्थित था तथा जिसकी राजधानी वैशाली थी। इसमें आज के बिहार राज्य के दरभंगा, मधुबनी व मुजफ्फरपुर जिले सम्मिलित थे।

3. कपिलवस्तु के शक्यो को ,बुद्ध के पिता का राज्य
कपिलवस्तु, शाक्य गण की राजधानी था,और नेपाल के तराई के क्षेत्र में मौजूद है

4. अहकप्य के वल्लियों

अहकप्य वास्तव में कहा था इस के बारे में नहीं पता चल सका है लेकीन कुछ लोग कहते है यह मगध के बाजु में थी ,और कुछ लोग कहते है यह चंपारण बिहार में थी ,लेकीन ऐसा लगता है की कही विदेह (आज का मिथला ) के आस पास और कोलियों के नगर जो रोहिणी नदी जो नेपाल में है उस के बाज़ू में कही था , कोलियों और कपिलवत्थु के युद्ध का उललेख बौद्ध ग्रंथो में भी आता है ,
शायद यह नेपाल की तराई में कही था।

5. रामग्राम के कोलियो

रामग्राम कोलिय क्षत्रियों का प्रमुख नगर था। यह कपिलवस्तु से पूर्व की ओर स्थित था। जो कपिलवत्थु के बाजू में था कुणाल जातक के भूमिका-भाग से सूचित होता है कि ‘रोहिणी’ या राप्ती नदी कपिलवस्तु और रामग्राम जनपदों के बीच की सीमा रेखा बनाती थी। इस नदी पर एक ही बांध द्वारा दानों जनपदों को सिंचाई के लिए जल प्राप्त होता था।रामग्राम की ठीक-ठीक स्थिति का सूचक कोई स्थान शायद इस समय नहीं है, किंतु यह निश्चित है कि कपिलवस्तु के पूर्व की और यह स्थान रहा होगा।

6. यह हिस्सा किसी वेठद्वीप के ब्राह्मण को दिया गया

वेठद्वीप नामक एक प्राचीन नगर का उल्लेख बौद्ध साहित्य में है। कुछ विद्धानों ने इसका अभिज्ञान बेतिया (ज़िला चंपारन) से किया है।

इतिहासकार मजुमदार शास्त्री[1] के अनुसार यह कसिया का नाम है।

‘धम्मपदटीका में वेठदीपक नामक एक राजा का उल्लेख है, जिसका सम्बंध अल्लकप्प के राजा के साथ बताया जाता है।

7. पावा के मल्लो

राजगीर और बोधगया के समीप पावा नगर है ,यह बिहार में है ,और यह जैन धर्म का महत्वपूर्ण तीर्थ है क्योकि यहा माना जाता है कि भगवान महावीर को यहीं परिनिर्वाण की प्राप्ति हुई थी।

8. कुशीनारा के मल्लो को

कोशल – उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिला, गोंडा और बहराइच के क्षेत्र शामिल थे। इसकी राजधानी श्रावस्ती थी।

9. कई जगह ऐसा मोरिया के पिप्पलिवनयो को भी एक हिस्सा मिला एस कहा गया है ( यह स्थान नेपाल के रूम्मिनदे (लुम्बनी ) और कुशीनगर के बीच कही है

10. एक हिस्सा ब्राह्मण द्रोण को मिला जिस पर अज्ञात जगह स्तूप बना

बुद्ध के परिनिर्वाण के 236 वर्ष बाद सम्राट अशोक मौर्य महान के संरक्षण में तृतीय बौद्ध संगति जो 249 ई.पू. में पाटलीपुत्र में हुई थी। इसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध बौद्ध ग्रन्थ ‘कथावत्थु’ के रचयिता तिस्स मोग्गलीपुत्र ने की थी। इस बौद्ध संगती में निर्णय लिया गया की भगवान बुद्ध की अस्थियो को उनके परिनिर्वाण के समय रखे स्तुपो से निकल कर इस पर सम्राट अशोक के साम्राज्य में स्तुपो का निर्माण किया जाये और उस समय तक सभी अवशेष ऊपर दिए गए स्तुपो में मौजूद थे और करीब 84 हज़ार स्तुपो का निर्माण किया गया ,जिस में कई स्तूप बौद्ध भिक्षु के अवशेषों पर भी बने ,और कालांतर में कई स्तूप तबाह हुए और लुटे गए ,लेकिन गुप्त साम्राज्य के समय तक ज्यादा तर स्तूप सुरक्षित रहे लेकीन अब गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद देश में बड़ा अस्थिरता का दौर रहा और हूणो ने भारत पर आक्रमण किया ,यह लुटेरी जति थी ,और इसे अपने रस्ते में जो मिला उस ने उसे लूटा और तबाह कर दिया ,बौद्ध विहार ,स्तूप ,चैत्य ,संघाराम सब कुछ ,इस समय सम्राट अशोक मौर्य महान के शासन काल को 700 वर्ष का समय बीत गया था , अब जब चीनी यात्री ह्वेन त्सांग हर्षवर्द्धन के शासन काल में भारत आया औरभारत में सत्रह वर्षों (629 -645 ) रहा ,और इस समय काल में उस ने अनेक बौद्ध स्तुपो ,बौद्ध विहार ,स्तूप ,चैत्य ,संघाराम को देखा और लिखा की कई स्तूप पूरी तरह तबाह हो गए है ,और इन में बुद्ध की मुर्तिया ,बुद्ध के अवशेष आदि को इकट्ठा कर श्रीलंका ,और अन्य दक्षिण एशिया देशो से होते हुए चीन गया , और उस के साथ कई जगह यह बुद्ध के अवशेष पहुंचे ,कई और कारणों से भी यह दूसरे देशो में पहुंचे।

 

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