बाबा साहब डॉ अम्बेडकर महान द्वारा रचित महाग्रंथ ‘भगवान बुद्ध और उनका धम्म’ खंड-1, भाग-163 (राजकुमार सिद्धार्थ गौतम की जीवन कथा )


buddha dhamm अतीत में देखने पर हमें ज्ञात होता है कि र्इसा पूर्व छठी शताब्दी में, उत्तर भारत कोर्इ समूचा प्रभुता-संपन्न राज्य नहीं था।
2. देश अनेक छोटे-बड़े राज्यों में बंटा हुआ था। इनमें से कुछ राज्यों में प्रत्येक पर जहां एक अकेले राजा का अधिकार था, वहीं कुछ पर किसी अकेले राजा का अधिकार नहीं था।
3. जो राज्य राजाओं के अध्ीन थे उनकी कुल संख्या सोलह थी। उनके नाम थे- अंग, मगध्, कासी, कोसल, वज्जी, मल्ल, चेति, वत्स, कुरू, प×चाल, मच्छ, सूरसेन, अस्सं, अवंति, गंधर तथा कंबोज।
4. जिन राज्यों में किसी एक राजा का आधिपत्य नहीं था, वे थे-कपिलवस्तु के शाक्य, पावा तथा कुसीनारा के मल्ल, वेसाली के लिच्छवि, मिथिला के विदेह, रामगाम के कोलिय, अल्लकम्प्प के बुलि, केसपुत्त के कालाम, रेसपुत्त् के कलिंग, पिप्पलवन के मौर्य तथा भग्ग ;भर्गद्ध, जिनकी राजधनी सिंसुमारगिरि थी।
5. जिन राज्यों पर किसी एक राजा का अधिकार थावे जनपद कहलाते थे औ जिन राज्यों पर किसी एक राजा का अधिकार नहीं था वे संघ या गण कहलाते थे।
6. कपिलवस्तु के शाक्यों की राज्य-व्यवस्था के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है कि वहां गणतंत्र था अथवा कुछ लोगों का कुलतंत्रा था।
7. वैसे इतनी जानकारी तो स्पष्ट रूप से है ही कि शाक्यों के गणतंत्रा में कर्इ शासक-परिवार थे और वे एक के बाद एक क्रमश: शासन करते थे।
8. शासक-परिवार का जो मुखिया होता था, वह राजा कहलाता था।
9. सिद्धार्थ गौतम के जन्म के समय राजा बनने की बारी शुद्धोदन की थी।
10. शाक्य-राज्य भारत के उत्तर-पूर्वी कोने में सिथत था। यह एक स्वतंत्र राज्य था। लेकिन आगे चलकर कोसल राज इस पर अपना आधिपत्य जमाने में सपफल हो गया।
11. इसका परिणाम यह हुआ कि कोसलराज की स्वीकृति के बिना शाक्य-राज्य के लिए अपने कुछ राजकीय अधिकारों का उपयोग असंभव हो गया।
12. उस समय के राज्यों में कोसल एक शकितशाली राज्य था। मगध्-राज्य भी ऐसा ही था। कोसलराज पसेनदि ;प्रसेनजितद्ध और मगध्राज बिमिबसार दोनों सिद्धार्थ गौतम के समकालीन थे।
सिद्धार्थ के पूर्वज
1. शाक्यों की राजधनी का नाम कपिलवस्तु ;पालि-कपिलवत्थुद्ध था। संभव है यह नाम महान बुद्धिवादी मुनि कपिल के ही नाम पर पड़ा हो।
2. कपिलवस्तु में जयसेन नाम का एक शाक्य रहता था। सिनाहनु उसका पुत्रा था। सिनाहतु का विवाह कच्चाना से हुआ था। उसके पांच पुत्रा थे- शुद्धोदन, धैतोदन, शक्लोदन, शुक्लोदन तथा अमितोदन। पांच पुत्राों के अतिरिक्त सिनाहनु की दो पुत्रियां भी थीं-अमिता और पमिता।
3. परिवार का गोत्रा आदित्य ;आदिच्चद्ध था।
4. शुुद्धोदन का विवाह महामाया से हुआ था जिसके पिता का नाम अ×जन और मां का नाम सुलक्षणा था। अ×जन कोलिय था और देवदह नाम के गांव में रहता था।
5. शुद्धोदन एक महान योद्धा था। जब शुद्धोदन ने अपने सैन्य-पराक्रम का परिचय दिया तो उसे एक और विवाह करने की भी अनुमति मिल गर्इ। उसने महा प्रजापति को चुना। महाप्रजापति, महामाया की ही बड़ी बहन थी।
6. शुद्धोदन एक ध्नी आदमी था। उसके पास बहुत बड़े-बड़े खेत और बहुत सारे नौकर-चाकर थे। कहा जात है कि अपने खेतों को जोतने के लिए वह एक हजार हल चलवाता था।
7. उसका जीवन बहुत ऐश्वर्यपूर्ण था और उसके अनेक महल थे।
के घर जन्मे थे। उनके जन्म की कथा इस प्रकार है।
2. शाक्यों की यह प्रथा थी कि वे प्रति वर्ष आषाढ़ के महीने में एक मèय-ग्रीष्मकालीन महोत्सव मनाया करते थे। यह उत्सव संपूर्ण राज्य में मनाया जाता था जिसमें शासक परिवार के सदस्य भी समिमलित होते थे।
3. सामान्यतया यह महोत्सव सात दिन तक मनाया जाता था।
4. एक बार महामाया ने उस उत्सव को बहुत ही उल्लास, भव्यता तथा पफूलों एवं सुगंधियों के साथ मनाने का निश्चय किया। किन्तु, उसमें मादक पेय पदार्थों को सर्वथा वर्जित ही रखा गया।
5. सातवें दिन वह प्रात: काल जल्दी उठी, सुगंधित जल से स्नान किया, चार लाख कार्षापणोंं का दान दिया, सभी मूल्यवान गहनों से स्वयं को सुशोभित किया, मनपसंद भोजन किया, व्रत का संकल्प किया, और तदन्तर वह भव्यता के साथ सजाए गए राजकीया शयनागार में सोने के लिए चली गयी।
6. उस रात शुद्धोदन और महामाया का संपर्क हुआ और महामाया ने गर्भ धरण किया। राजकीय शयया पर पड़े-पड़े उसे नींद आ गर्इ। निद्रा में महामाया ने एक स्वप्न देखा।
7. उसने स्वप्न में देखा कि वह अपनी शयया पर सो रही है और चतुर्दिक महाराजिक देवता उसकी शयया को उठाकर ले गए हैं उन्होंने उसे ले जाकर हिमालय क्षेत्रा में एक विशाल शाल-वृक्ष के नीचे रख दिया है। वे देवता ;श्रेष्ठ पुरूषद्ध पास ही खड़े हैं।
8. तब चतुर्दिक महाराजिक देवताओं की देवियां वहां आर्इ और उन्हें उठाकर मानसरोवर ले गर्इ।
9. उन्होंने उन्हें स्नान कराया, स्वच्छ वस्त्रा पहनाए, स्वच्छ वस्त्रा पहनाए, सुगंधियों का लेप किया और पफूलों से इस प्रकार सजाया-संवारा कि वे किसी दिव्य पुरूष के समिमलन योग्य बन जाए।
10. तब सुमेध् नाम का एक बोधिसत्व उसके सामने प्रकट हुआ और बोला, ”मैनें अपना अंतिम जन्म पृथ्वी पर धरण करने का निश्चय किया है, क्या आप मेरी माता बनना स्वीकार करोगी? उसने उत्तर दिया, ”हां, बड़ी प्रसन्नता से। उसी समय महामाया की नींद खुल गर्इ।
11. दूसरे दिन सुबह महामाया ने शुद्धोदन को अपने स्वप्न के बारे में बताया। स्वप्न की व्याख्या करने में असमर्ाि राजा ने शकुन-विधा में प्रसिद्ध आठ ब्राह्राणों को बुलवाया।
12. उनके नाम थे राम, ध्ज, लक्खन, मंती, कोण्ड××ा, सुयाम, सुभोग और सुदत्त। राजा ने उनके योग्य स्वागत की तैयारी की।
13. उन्होंने भूमि पर सुन्दर पुष्प विबवाए और उनके लिए ऊंचे आसन बिछवाये।
14. उन्होंने ब्राह्राणों के पात्रा सोने-चांदी से भर दिए ओर उन्हें घी, मध्ु, शक्कर, बढि़या चावल तथा दूध् से पके पकवान खिलाए। उन्होंने उन्हें नए-नए वस्त्रा और कपिल गाएं आदि उपहार भी दिए।
15. जब ब्राह्राण संतुष्ट तथा प्रसन्न हो गए तो शुद्धोदन ने उन्हें महामाया का स्वप्न कह सुनाया और पूछा, ” मुझे बताइए इसका क्या अर्थ है?
16. ब्राह्राणों का उत्तर था, ” महाराज! चिंतित न हों। आपके यहां एक पुत्रा होगा। यदि वह गृहस्थी में रहेगा तो चक्रवर्ती राजा होगा, और यदि गृहत्याग कर संन्यासी हो गया तो वह संसार की भ्रांति तथा अंध्कार का नाश करने वाला बुद्ध होगा।
17. बोधिसत्व को, पात्रा में रखे तेल की तरह, महामाया दस चन्द्र मास तक अपने गर्भ में धरण किए रही। प्रसव का समय समीप आया तो उसने अपने मायके में जाकर शिशु को जन्म देने की इच्छा व्यक्त की। अपने पति से उसने कहा, ”मैं अपने पिता के घर देवदह जाना चाहती हूं।
18. शुद्धोदन ने उत्तर दिया, ”तुम जानती ही हो कि तुम्हारी इच्छा पूरी की जायेगी। कहारों द्वारा उठार्इ गयी स्वर्ण पालकी में बिठवा कर शुद्धोदन ने अपने अनेक सेवक-सेविकाओं के साथ महामाया को उसके पिता के घर भिजवा दिया।
19. देवदह के मार्ग में महामाया को शाल-वृक्षों तथा अन्य पुषिपत एवं अपुषिपत वृक्षों के एक उधान-वन में से गुजरना था। यह लुंबिनी-वन कहलाता था।
20. जिस समय पालकी गुजर रही थी, उस समय लुंबिनी-वन दिव्य चित्रा-लता उपवन अथवा किसी प्रतापी राजा के लिए सुसजिजत भोज-मंडप जैसा लग रहा था।
21. जड़ से शाखाओं के छोर तक, पेड़ पफल-पफूलों से लदे थे और विचित्रा èवनि कर रही सुन्दर रंगों वाली अनगिनत मध्ुमकिखयों और अनेक प्रकार के पक्षियों के झुंड मध्ुर तान छेड़ रहे थे।
22. यह मनोरम दृश्य देखकर महामाया के मन में इच्छा उत्पन्न हुर्इ कि वह कुछ समय वहां रूके और मनोविनोद करे। अत: उन्होंने पालकी उठाने वालों को आज्ञा दी कि वे उसकी पालकी को शाल-उधान में ले चलें और वहां प्रतीक्षा करें।
23. महामाया पालकी से उतरी और चलकर एक सुन्दर शालवृक्ष के नीचे पहुंची। मंद-मंद बह रही सुखद पवन वृक्षों की शाखाओं को छेड़ रही थी जिससे वे ऊपर-नीचे हो रही थी। महामाया का मन हुआ कि उनमें से एक शाख को पकड़ ले।
24. संयोगवश एक शाखा इतनी नीचे झुक गयी कि वह उसे पकड़ सके। महामाया पंजों के बल खड़ी हो गर्इ और उन्होंने वह शाखा पकड़ ली। तुरन्त ही शाखा हिली और उसके साथ वह भी ऊपर की ओर उठ गर्इ और उसके झटके से महामाया को प्रसव-वेदना होने लगी। उस शाल-वृक्ष की शाखा पकड़े हुए खड़े-खड़े ही महामाया ने एक पुत्रा को जन्म दिया।
25. र्इसा पूर्व 563 वैशाख पूर्णिमा के दिन बालक ने जन्म ग्रहण किया।
26. शुद्धोदन ओर महामाया का विह हुए बहुत समय बीत गया था। लेकिन उनकी कोर्इ संतान नहीं हुर्इ थी। अंत में उन्हें जब पुत्रा-लाभ हुआ तो शुद्धोदन, उसके परिवार तथा शाक्यों द्वारा भी बहुत हर्ष, ध्ूमधम तथा समारोहपूर्वक पुत्रा का जन्मोत्सव मनाया गया।
27. बालक के जन्म के समय कपिलवस्तु पर शासन करने की बारी शुद्धोदन की थी। वे राज की उपाधि से गौरवानिवत हो रहे थे। स्वभाविक तोर पर बालक भी राजकुमार ही कहलाया।
असित का आगमन
1. जिस समय बालक का जन्म हुआ, उस समय हिमालय में असित नाम के एक बड़े मुनि रहते थे।
2. असित मुनि ने सुना कि देवतागण ”बुद्ध शब्द के उच्चार से आकाश को गुंजायमान कर रहे थे। वह सोचने लगे गकि क्यों न मैं वहां जाऊ और उस स्थान का पता लगाऊं जहां बुद्ध ने जन्म ग्रहण किया है।
3. असित मुनि ने समस्त जंबुद्वीप पर अपनी दिव्यदृषिट डालते हुए देखा कि शुद्धोदन के घर में उस दिव्य बालक ने जन्म ग्रहण किया था और वह अपनी प्रभा से प्रकाशमान हो रहा था। उसके ही जन्म पर देवतागण रोमांचित हो रहे थे।
4. इसलिए वह महान मुनि असित अपने भानजे नरदत्त के साथ उठ खड़े हुए औ चलकर राज शुद्धोदन के घर आए और उसके महल के द्वार पर आकर खड़े हो गए।
5. अब असित मुनि ने देखा कि शुद्धोदन के द्वार पर लाखों आदमी एकत्रा हुए हैं। वह द्वारपाल के पास गए और बोले, ”हे पुरूष! जाओ और राजा को सूचना दो कि द्वार पर एक मुनि खड़े है।
6. तब द्वारपाल राजा के पास गया और हाथ जोड़कर बोला, ”राजन! द्वार पर बहुत आयु के एक वृद्ध मुनि खड़े हैऔर आप से भेंट करने के इच्छुक हैं।?
7. राजा ने असित मुनि के बैठने के लिए उचित आसन की व्यवस्था की और द्वारपाल से कहा, ” मुनि को अन्दर आने दो। महल के बाहर आकर द्वारपाल ने असित से कहा, ”कृपया अंदर पदाध्रिए।
8. असित मुनि तब राजा के पास आए और उनके सामने खड़े हो गए। वह बोले, ”राजन! आपकी जय हो। आप चिरकाल तक जीवित रहें और अपने राज्य पर ध्र्मानुसार शासन करें।
9. तब शुद्धोदन ने आदरपूर्वक असित मुनि के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और उन्हें बैठने के लिए आसन दिया। जब उसने देखा कि असित मुनि सुखपूर्वक आसीन हो गए हैं तो शुद्धोदन ने पूछा, ”मुनिवर! मुझे स्मरण नहीं है कि इसके पूर्व भी मुझे आपके दर्शन हुए हैं। आपके यहां आगमन का क्या उददेश्य है? क्या कारण हैं?
10. इस पर असित मुनि ने राज शुद्धोदन से कहा, राजन! तुम्हें पुत्रा लाभ हुआ है। मैं उसे देखने की इच्छा से ही यहां आया हूं।
11. शुद्धोदन बोले, ” मुनिवर! बालक इस समय सोया हुआ है। क्या आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करेंगे? मुनि बोले, ”राजन!इस तरह के दिव्य प्राणी देर तक नहीं सोते हैं। वे तो स्वभाव से ही जागरूक होते हैं।
12. तब बालक ने महान मककुनि पर अनुकंपा करते हुए अपने जागने का संकेत किया।
13. यह देखकर कि बालक जाग उठा है, शुद्धोदन ने उसे दृढता पूर्वक अपने दोनों हाथों में लिया और असिन मुनि के सामने ले आया।
14. असित ने देखा कि बालक बत्तीस महापुरूष-लक्षणों तथा अस्सी अनव्य×जनों से युक्त है। उसका शरीर शुक्र और ब्रह्राा के शरीर से भी अधिक दीप्त है और उसका तेजोमंडल उनके तेजोमंडल से लाख गुणा अधिक प्रदीप्त है। उसके मुंह से तुरन्त यह रहस्यमय वाक्य निकला ”निस्संदेह जगत में यह अदभूत पुरूष उत्पन्न हुआ है। वह अपने आसन से उठे, दोनों हाथ जोड़े और उसके पैरों पर गिर पड़े। उन्होंने बालक की परिक्रमा की और उसे अपने हाथों में लेकर विचार-मग्न हो गए।
15. असित मुुनि पुरानी भविष्यवाणी से भली-भांति परिचित थे कि जिसके शरीर पर गौतम की ही तरह के बत्तीस महापुरूष-लक्षण होंगे, वह इन दो गतियों में से किसी एक को निशिचत रूप से प्राप्त होगा, तीसरी को नहीं। ”यदि वह गृहस्थ रहेगा तो वह चक्रवर्ती सम्राट बनेगा। लेकिन यदि वह गृहत्याग कर प्रव्रजित हो जाएगा तो सम्यक सम्बुद्ध बनेगा।
16. असित मुनि को निश्चय था कि यह बालक गृहस्थ नहीं रहेगा।
17. बालक की ओर देखकर, असित मुनि रो पड़े और आंसू बहाते हुए उन्होंने गहरी सांस भरी।
18. शुद्धोदन ने असित मुनि को आंसू बहाते और गहरी सांस लेते देखा।
19. उन्हें इस प्रकार रोता देखकर, शुद्धोदन के रोंगटे खड़े हो गए। व्यथित होकर उसने असित मुनि से निवेदन किया, ” हे मुनिवर! आप इस प्रकार क्यों रो रहे हैं, आंसू बहा रहे हैं और ठंडी सांस ले रहे हैं? मैं समझता हूं कि अवश्य ही बालक के लिए भविष्य में कोर्इ विपत्ति नहीं होगी।
20. असित मुनि ने राजा को उत्तर दिया, ”राजन! मैं बच्चे के लिए नहीं रो रहा हूं। उसका भविष्य तो बिलकुल निर्विघ्न है। मैं तो अपने लिए रो रहा हूं।
21. ”ऐसा क्यों? शुद्धोदन ने पूछा। असित मुनि ने उत्तर दिया, ”मैं जरा-जीर्ण हूं, वय-प्राप्त हूं और यह बालक सम्यकसम्बुद्ध होगा और इसके बाद वह अपने सिद्धान्तों का उत्कृष्ट ध्म्म-चक्र चलाएगा, जैसा उससे पहले संसार में किसी भी प्राणी ने नहीं चलाया। संसार के कल्याण और प्रसननता के लिए वह अपने ध्म्म सिद्धान्तों की देशना करेगा।
22. ”जिस धर्मिक जीवन की, जिस सद्धम्म् सिद्धांत की वह घोषणा करेगा वह आदि में कल्याणकारक होगा, मèय में कल्याणकारक होगा और अंत में कल्याणकारक होगा। वह अर्थ तथा व्य×जन की दृषिट से निर्दोष होगा। वह परिशुद्ध एवं परिपूर्ण होगा।
23. ”जिस प्रकार इस संसार में कभी-कभार कहीं उदुंबर ;गुलरद्ध का पफूल पुषिपत होता है, उसी प्रकार अनन्त युगों के बाद इस संसार में कभी-कभार और कहीं-कहीं बुद्धों का प्रादुर्भार्व होता है। राजन! इसी प्रकार निस्सन्देह यह बालक श्रेष्ठतम, सम्यक बोधिलाभ करेगा और ऐसा करने के बाद असंख्य प्राणियों को इस दुखमय सागर के पार सुख की अवस्था में पहुंचाएगा।
24. ”लेकिन मैं उन बुद्ध को नहीं देख सकूंगा। इसलिए राजन! मैं रो रहा हूं और दुख के कारण ठंडी सांस भर रहा हूं। मैं अपने जीवन में उन बुद्ध की पूजा नहीं कर पाऊंगा।
25. तब राजा ने उस महान असित मुनि और उसके भानजे नरदत्त ;नाळकद्ध को समुचित उत्तम भोजन से संतर्पित किया और उन्हें वस्त्रा दान देकर उनकी परिक्रमा की।
26. तब असित ने अपने भानजे नरदत्त से कहा, ”नरदत्त! जब कभी तुम्हें यह सुनने को मिले कि यह बालक सम्यकसम्बुद्ध हो गया है तो उनके पास जाकर उनकी शिक्षाओं में शरण लेना। यह तेरे सुख, कल्याण और प्रसन्नता के लिए होगा। इतना कहकर असित ने राजा से विदा ली और अपने आश्रम की ओर चले गये।
5. महामाया का परिनिर्वाण
1. पांचवे दिन नामकरण संस्कार किया गया। बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया। उसके गोत्रा का नाम गौतम ;पालि-गोतमद्ध था। इसलिए वह सिद्धार्थ गोतम के नाम से लोकप्रिय हुआ।
2. बालक के जन्म और उसके नामकरण के हर्षोल्लास के बीच में ही महामाया अचानक बीमार पड़ गर्इ और उसके रोग ने गंभीर रूप धरण कर लिया।
3. जब उन्हें लगा कि उनका अंत समय निकट आ पहुंचा है तो उन्होंने शुद्धोदन और प्रजापति को अपनी शयया के समीप बुलाया और कहा, ”मुझे विश्वास है कि असित ने मेरे बच्चे के बारे में जो भविष्यवाणी की थी वह सच होगी। मुझे यही दुख है कि मैं उसे पूरा हुआ न देख सकूंगी।
4. मेरा बालक शीघ्र ही मातृहीन हो जाएगा। लेकिन मुझे इसकी तनिक भी चिंता नहीं है कि मेरे बाद उका लालन-पालन ठीक प्रकार से नहीं होगा और भविष्य के अनुरूप उसकी समुचित देखभाल नहीं होगी।
5. ”प्रजापति! मैं तुम्हें अपना बच्चा सौंपती हूं। मुझे लेशमात्रा भी संदेह नहीं है कि तुम उसके लिए उसकी मां से भी बढ़कर होओगी।
6. ”अब दुखी न हों। मुझे मरने की अनुमति दें। र्इश्वर का बुलावा आ गया है और उसके दुत मुझे ले जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इतना कहकर महामाया ने अंतिम सांस ली। शुद्धोदन और प्रजापति ;पालि-पजापतिद्ध दोनों को ही बहुत दुख हुआ और वे पफूट-पफूट कर रोने लगे।
7. जब सिद्धार्थ की माता का देहांत हुआ तो उसकी आयु केवल सात दिन की थी।
8. सिद्धार्थ का एक छोटा भार्इ भी था जिसका नाम नंद था। वह शुद्धोदन का महाप्रजापति से उत्पन्न पुत्रा था।
9. उसके कर्इ चचेरे भार्इ थे जिनके नाम महानाम और अनुरूद्ध थे, वे उसके चाचा शुक्लोदन के पुत्रा थे, आनंद उसके चाचा अमितोदन का और देवदत्त उसकी बुआ अमिता का पुत्रा था। महानाम तो सिद्धार्थ से बड़ा था और आनंद छोटा।
10. सिद्धार्थ उन्हीं की संगति में बड़ा हुआ।
सिद्धार्थ का बचपन तथा शिक्षा
1. जब सिद्धार्थ थोड़ा चलने-पिफरने के योग्य हो गया और बातचीत करने लगा तो शाक्य जनपद के मुखिया इकटठे हुए। उन्होंने शुद्धोदन से कहा कि बालक को ग्राम-देवी अभया के मंदिर में ले जाना चाहिए।
2. शुद्धोदन ने स्वीकार किया और महाप्रजापति से बालक को कपड़े पहनाने के लिए कहा।
3. जब वह उसे वस्त्रा पहना रही थी तब बालक सिद्धार्थ ने अति मध्ुर वाणी में अपनी मौसी से पूछा कि उसे कहां ले जाया जा रहा है। जब उसे पता चला कि उसे मंदिर ले जा रहे हैं तो वह मुस्कुराया। लेकिन शाक्यों के रति-रिवाज के अनुरूप वह चला गया।
4. आठ वर्ष का होने पर सिद्धार्थ ने अपनी शिक्षा आरम्भ की।
5. जिन आठ ब्राह्राणों को शुद्धोदन ने महामाया के स्वप्न की व्याख्या करने के लिए बुलाया था और जिन्होंने सिद्धार्थ के बारे में भविष्यवाणी की थी, वे ही उसके प्रथम आचार्य हुए।
6. जो कुछ वे जानते थे जब वे सब सिखा चुके तब शुद्धोदन ने उदिक्क देश के उच्च कुलोत्पन्न प्रथम कोटि के भाषा-विद तथा व्याकरण, दर्शन, वेद-वेदांग तथा उपनिषदों के ख्याति प्राप्त विद्वान सब्बमित्त को बुलावा भेजा। उनके हाथ पर सोने के पात्रा से समर्पण का जल सिंचन करके शुद्धोद ने सब्बमित्त को ही शिक्षण के निमित्त सिद्धार्थ को सौंप दिया। वह उसका दूसरा आचार्य था।
7. उसके शिक्षण में सिद्धार्थ ने तब के सभी दार्शनिक सिद्धान्तों में प्रवीणता प्राप्त कर ली।
8. इसके अतिरिक्त उसने आलार कालाम के शिष्य भारद्वाज से चित्त की एकाग्रता तथा समाधि का ज्ञान सीख लिया था। उसका आश्रम कपिलवस्तु में ही था।
सिद्धार्थ के प्रारंभिक लक्षण
1. जब कभी वह अपने पिता के खेतों में जाता और वहां कोर्इ काम नहं होता तो किसी एकांत स्थान में जाकर èयान ;आनापान-विपस्सनाद्ध का अभ्यास करने लगता।
2. उसके मानसिक विकास के लिए सभी प्रकार की शिक्षाएं तो दी ही जा रही थीं, किन्तु उसे एक क्षत्रिय के योग्य सैनिक प्रशिक्षण प्रदान करने में भी कोर्इ कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही थी।
3. शुद्धोदन को इस बात का पूरा èयान था कि कहीं ऐसी गलती न होने पाए कि सिद्धार्थ में मानसिक गुणों का ही विकास हो और वह पौरूष ;पुरूषत्वद्ध में पिछड़ जाए।
4. सिद्धार्थ स्वभाव से कारूणिक था। वह यह पसंद नहीं करता था कि एक आदमी दूसरी आदमी का शोषण करे।
5. एक बार वह अपने कुछ मित्राों सहित अपने पिता के खेत पर गया। वहां उसने देखा कि मजदूर खेत जोत रहे हैं, बांध्, बांध् रहे हैं और पेड़ काट रहे हैं। किन्तु तपती ध्ूप में उनके तन पर पूरे कपड़े भी नहीं है।
6. वह उस दृश्य से द्रवित हो उठा।
7. उसने अपने मित्राों से कहा- क्या यह उचित है कि एक आदमी दूसरे आदमी का शोषण करे? यह कैसे ठीक हो सकता है कि मजदूर मेहनत करे और मालिक उसकी मजदूरी के पफल से गुलछर्रे उड़ाए?
8. उसके मित्राों के पास उसके इस प्रश्न का कार्इ उत्तर न था, क्योंकि वे जीवन के उस पुराने दर्शन में विश्वास रखने वाले थे जिसमें मजदूर सेवा करने के लिए पैदा हुआ है और अपने स्वामी की इस प्रकार सेवा करने में वह अपने प्रारब्ध् को ही भोग रहा होता है।
9. शाक्य लोग वप्रमंगल नाम का एक उत्सव मनाया करते थे। धन बोने के प्रथम दिन मनाया जाने वाला यह एक ग्रामीण पर्व था। प्रथा के अनुसार उस दिन हर शाक्य को स्वयं अपने हाथों से हल जोतना होता था।
10. सिद्धार्थ ने हमेशा इस प्रथा का पालन किया और अपने हाथों से हल चलाया।
11. यधपि वह विद्वान था, पिफर भी उसे शारीरिक श्रम से तनिक भी घृणा न थी।
12. वह योद्ध ;सैनिकद्ध वर्ग से सम्बोधित था और उसे ध्नुष चलाने तथा अन्य शास्त्राों का प्रयोग करने की शिक्षा मिली थी। लेकिन वह किसी भी प्राणी को अनावश्यक चोट नहीं पहुंचाना चाहता था।
13. वह शिकारियों के दल के साथ जाने से मना कर देता था। उसके मित्रा कहा करते थे, ”क्या तुम्हें शेरों से डर लगता है? वह प्रत्युत्तर देता था, ”मैं जानता हूं कि तुम शेरों को मारने नहीं जा रहे हो, तुम हिरन तथा खरगोश जैसे निर्दोष जानवरों को ही मारने जा रहे हो।
14. ”कशिकार के लिए न सही कम से कम यह देखने के लिए जाओं कि तुम्हारे मित्राों का निशाना कितना अचूक है वे कहते। सिद्धार्थ इस तरह के निमंत्राणों को भी यह कह कर अस्वीकार कर देता था कि ”मैं निर्दोष पशुओं का वध् होते देखना भी पसंद नहीं करता।
15. सिद्धार्थ की इस प्रवृत्ति से प्रजापति गौतमी बहुत चिंतित रहती थी।
16. वह उसके साथ तर्क करते हुए कहती, ”तुम भूल गए हो कि तुम एक क्षत्रिय हो और लड़ना ही तुम्हारा कर्तव्य है। युद्ध कौशल तो शिकार के ही माèयम से सिखा जा सकता है, क्योंकि शिकार करके ही तुम सिख सकते हो कि किस प्रकार ठीक-ठीक निशाना लगाया जा सकता है। योद्धा के लिए शिकार ही प्रशिक्षण-भूमि है।
17. सिद्धार्थ बहुध गौतमी से पूछा करता था, ”लेकिन मां! एक क्षत्रिय को क्यों लड़ना चाहिए? और गौतमी उत्तर दिया करती थी, ”क्योंकि यह उसका कर्तव्य है।
18. सिद्धार्थ उसके उत्तर से कभी भी संतुष्ट नहीं होता था। वह गौतमी से पूछा करता था, ”मां! यह बताओ कि एक आदमी का यह कर्तव्य कैसे हो सकता है कि वह दूसरे आदमी को मारे? गौतमी तर्क देती, ”यह मनोवृत्ति एक संन्यासी के लिए ही ठीक हो सकती है। लेकिन क्षत्रिय को तो अवश्य ही लड़ना चाहिए। यदि क्षत्रिय नहीं लड़ेगा तो राज्य की सुरक्षा कौन करेगा?
19. ”लेकिन मां! यदि सब क्षत्रिय परस्पर एक दूसरे से प्रेम करें तो क्या बिना किसी को मारे वे राज्य की सुरक्षा नहीं कर पाएंगे? इस पर गौतमी उसे उसके ही निर्णय पर छोड़ देती।
20. वह साथियों को अपने साथ बैठकर èयान करने हेतु प्रेरित करने का प्रयास करता। वह उन्हें बैठने का ठीक तरीका सिखाता थावह उन्हें एक विषय पर अपना चित्त एकाग्र करना सिखाता था। वह उन्हें ऐसे विचारों को चुनने के लिए कहता जैसे, ”मैं प्रमुदित होऊं, मेरे सम्बध्ी प्रमुदित हों, समस्त पशु पक्षी प्रमुदित हों।
21. लेकिन उसके मित्रा इन बातों को गंभीरता से नहीं लेते थें। वे उसकी हंसी उड़ाते थे।
22. वे आंखें बंद करने पर èयान के विषय पर चित्त एकाग्र नहीें कर पाते थे। इसके विपरीत, वे अपनी आंखों के सामने शिकार के लिए हिरन को पाते अथवा खाने के लिए मिठाइयां देखते।
23. उनके माता-पिता को उसका इस प्रकार एक पक्षीय èयान अच्छा नहीं लगता था। उन्हें लगता था कि यह क्षत्रिय जीवन के सर्वथा विपरीत है।
24. सिद्धार्थ का विश्वास था कि ठीक विषयों पर चित्त की एकाग्रता, विश्वव्यापी मैत्राी भावना को विकसित करती है। वह स्वयं को सही सिद्ध करते हुए कहता, ”जब भी हम प्राणियों के बारे में विचार करते हैं, तो हमारा आरंभिक-चिंतन भेदभाव के साथ होता है। हम मित्राों और पालतू पशुओं से प्रेम करते हैं और अपने शत्राुओं और जंगली पशुओं से घृणा करते हैं।
25. ”इस विभाजक रेखा से हमें ऊपर उठना चाहिए और हम ऐसा तभी कर सकते हैं जब हम अपने चिंतन में व्यवहारिक जीवन की सीमाओं से ऊपर उठ जाएं। ऐसी थी उनकी तार्किक प्रवृत्ति।
26. उत्कृष्ट कारूणिक भावना उसकी बचपन की विशेषता थी।
27. एक बार वह अपने पिता के खेतों पर गया। विश्राम के समय वह एक वृक्ष के नीचे बैठा हुआ आराम कर रहा था और प्राकृतिक शांति और सौन्दर्य का आनन्द ले रहा था। जब वह इस प्रकार बैठा था, तभी आकाश से एक पक्षी ठीक उस के सामने आकर गिरा।
28. पक्षी को एक तीर मारा गया था, जो उसके शरीर में घुस गया था और इस कारण वह पक्षी पफड़पफड़ा रहा था।
29. सिद्धार्थ पक्षी की सहायता के लिए दौड़ पड़ा। उसने पक्षी का तीर निकाला, घाव पर पटटी बांध्ी और उसे पीने के लिए पानी दिया। उसने पक्षी को गोद में उठा लिया और उसी स्थान पर आया जहां वह पहले बैठा था। उसने अपने ऊपरी वस्त्राों में पक्षी को लपेट लिया और उसे गर्मी देने के लिए अपनी छाती से लगा लिया।
30. सिद्धार्थ को आश्चर्य हो रहा था कि इस निर्दोष पक्षी को किसने मारा होगा। थोड़ी ही देर में, उसका पफुपफेरा भार्इ देवदत्त वहां आ पहुंचा। उसके पास शिकार के सभी हथियार थे। उसने सिद्धार्थ से कहा कि उसने एक उड़ते हुए पक्षी पर तीर चलाया था, पक्षी घायल हो गया था किन्तु कुछ दुर उड़कर वह वहीं कहीं गिर गया। उसने सिद्धार्थ से पूछा, ”क्या तुमने उसे देखा है?
31. सिद्धार्थ ने ‘हां कहकर उत्तर दिया और उसे वह पक्षी दिखाया जो अब पूरी तरह से स्वस्थ हो चला था।
32. देवदत्त ने मांग की कि पक्षी उसे दे दिया जाए। सिद्धार्थ ने पक्षी देने से इनकार कर दिया। दोनों में घोर विवाद होने लगा।
33. देवदत्त ने तर्क दिया कि वही पक्षी का मालिक है क्योंकि शिकार के नियमों के अनुसार जो पक्षी को मारता है, पक्षी उसी का होता है।
34. सिद्धार्थ ने नियम की वैध्ता को अस्वीकार कर दिया। उसने तर्क दिया कि जो किसी की रक्षा करता है, वहीं उसका स्वामी होने का दावा कर सकता है। भला मारने वाला किसी का स्वामी कैसे हो सकता है?
35. दोनों में से एक भी पक्ष झुकने के लिए तैयान न था। मामला मèयस्थ निर्णय के लिए न्यायालय तक पहुंचा। न्यायालय ने सिद्धार्थ के पक्ष में निर्णय दिया।
36. देवदत्त तभी से सिद्धार्थ का स्थार्इ वैरी बन गया। लेकिन सिद्धार्थ की करूणा की भावना इतनी महान थी कि उसने पफुपफेरे भार्इ की सदभावना प्राप्त करने की अपेक्षा एक निर्दोष पक्षी की जान बचाने को ही प्राथमिकता दी।
37. सिद्धार्थ गौतम के आरंभिक जीवन के आचरण में ऐसी ही विशेषताएं थीं।
सिद्धाथ का विवाह
1. दंडपाणि नाम का एक शाक्य था। यशोध्रा उसकी पुत्राी थी। अपने सौंदर्य और शील के लिए वह प्रसिद्ध थी।
2. यशोध्रा अपने सोलहवें साल में पहुंच गर्इ थी और दंडपाणि उसके विह के बारे में विचार कर रहा था।
3. प्रथा के अनुसार दंडपाणि ने अपने सभी पड़ोसी देशों तरूणों को अपनी लड़की के स्वयंवर में समिमलित होने का आमंत्राण भेजा।
4. सिद्धार्थ गौतम के पास भी एक आमंत्राण भेजा गया।
5. सिद्धार्थ गौतम का सोलहवां वर्ष पूरा हो चुका था। उसके माता-पिता भी उसकी शादी के लिए उतने ही इच्छुक थे।
6. उन्होंने सिद्धार्थ को स्वयंवर में जाने और यशोध्रा का पाणि-ग्रहण करने को कहा। उसने अपने माता-पिता की इच्दा पूरी करना स्वीकार कर लिया।
7. स्वयंवर में पधरे तरूणों में से यशोध्रा ने सिद्धार्थ को ही चुना।
8. दंडपाणि अधिक प्रसन्न नहीं था। उसे उन दोनों के दांपत्य जीवन की सपफलता में संदेह था।
9. उसे लगा कि सिद्धार्थ की तो साध्ु-संतों की संगति की लत लगी हुर्इ है। वह एकांत को प्राथमिकता देता था। वह कैसे एक सपफल सदगृहस्थ बन सकेगा?
10. यशोध्रा ने निश्चय कर लिया था कि वह सिद्धार्थ गौतम से ही विवाह करेगी। उसने अपने पिता से पूछा कि क्या साध्ु-संतों की संगति में रहना कोर्इ अपराध् था। यशोध्रा ऐसा नहीं समझती थी।
11. जब यशोध्रा की माता को अपनी पुत्राी के इस संकल्प का पता चला कि वह गौतम को छोड़ किसी और से विवाह नहीं करेगी, तो उसने दंडपाणि से कहा कि वह विवाह हेतु स्वीकृति दे दें। दंडपाणि ने स्वीकृति दे दी।
12. गौतम के प्रतिद्वंद्वी केवल निराश ही नहीं हुए, वरन उन्हें लगा कि उनका अपमान किया गया है।
13. वे चाहते थे कि उनके प्रति न्याय करने के लिए ही यशोध्रा को वर चुनाव करने से पहले किसी न किसी प्रकार की परीक्षा लेनी चाहिए थी। किन्तु उसने ऐसा नहीं किया।
14. कुछ समय वे चुप रहे। उनका विश्वास था कि दंडपाणि तो यशोध्रा को गौतम का चुनाव करने की अनुमति देगा नहीं और तब उनका उददेश्य यूं ही पूरा हो जाएगा।
15. लेकिन जब दंडपाणि असपफल रहा तो उन्होंने साहस जुटाया और मांग की कि लक्ष्यबेध् की एक परीक्षा होनी ही चाहिए। दंडपाणि को यह प्रस्ताव स्वीकार करना पड़ा।
16. पहले तो सिद्धार्थ इसके लिए तैयान न था। लेकिन, उसके सारथी, दंदक ने उसे बताया कि यदि वह अस्वीकार करेगा तो यह उसके पिता, उसके परिवार तथा यशोध्रा के लिए भी कितने अपमान की बात होगी।
17. सिद्धार्थ गौतम उसके तर्क से बहुत प्रभावित हुआ और उसने उस प्रतियोगिता में समिमलित होना स्वीकार कर लिया।
18. प्रतियोगिता आरंभ हुर्इ। प्रत्येक प्रतिद्वंद्वी ने बारी-बारी से अपना-अपना कौशल दिखाया।
19. सबके अंत में गौतम की बारी आर्इ। किन्तु उसी का लक्ष्यबेध् सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुआ।
20. इसके बाद विवाह सम्पन्न हुआ। शुद्धोदन और दंडपाणि दोनों को प्रसन्नता हुर्इ। इसी प्रकार यशोध्रा और महाप्रजापति भी बहुत प्रसन्न थे।
21. वैवाहिक जीवन के लंबे समय के बाद यशोध्रा ने एक पुत्रा को जन्म दिया। उसका नाम राहुल रखा गया। खंड-1, भाग-163

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