बुद्ध ने कहा है: मैं वैद्य हूं, चिकित्‍सक हूं, मैं शिक्षक नहीं है, मैं तुम्‍हें कोई सिद्धांत सिखाने नहीं आया हूं…….तंत्र–सूत्र–(भाग–3)–प्रवचन–40


buddha1234बुद्ध ने कहा है: मैं वैद्य हूं, चिकित्‍सक हूं, मैं शिक्षक नहीं है, मैं तुम्‍हें कोई सिद्धांत सिखाने नहीं आया हूं…….

औषधि तुम्हें स्वास्थ्य नहीं दे सकती, केवल तुम्हारे रोगों को मिटा सकती है। और जब रोग नहीं रहे तो स्वास्थ्य घटित होता है, तुम स्वास्थ्य के लिए उपलब्ध हो जाते हो। लेकिन रोगों के रहते स्वास्थ्य नहीं हो सकता है। यही कारण है कि चिकित्सा विज्ञान, चाहे पूर्वी हो चाहे पश्चिमी, अब तक स्वास्थ्य की परिभाषा नहीं कर सका है। वह एक—एक रोग की सही परिभाषा कर सकता है। उसने हजारों रोगों की खोज की है और उनकी परिभाषा की है; लेकिन वह यह नहीं बता सकता कि स्वास्थ्य क्या है। ज्यादा से ज्यादा चिकित्सा विज्ञान यही कह सकता है कि जब रोग नहीं होते हैं तब तुम स्वस्थ होते हो। लेकिन स्वास्थ्य क्या है?

स्वास्थ्य कुछ ऐसी बात है जो मन से परे है। यह कुछ ऐसा है जो होता तो है, उसे तुम अनुभव भी कर सकते हो; लेकिन तुम उसकी परिभाषा नहीं कर सकते। तुमने स्वास्थ्य जाना है, लेकिन क्या तुम परिभाषा कर सकते हो कि वह क्या है? जैसे ही तुम उसकी परिभाषा करने की चेष्टा करोगे, तुम्हें रोग को बीच में लाना पड़ेगा, तुम्हें रोग के संबंध में कुछ बताना पड़ेगा, कि रोग की अनुपस्थिति स्वास्थ्य है।

लेकिन यह तो बडे मजे की बात है कि स्वास्थ्य की परिभाषा के लिए तुम्हें रोग को बीच में लाने की जरूरत पड़ती है। और रोग के निश्चित गुण हैं।

स्वास्थ्य के भी अपने गुण हैं, लेकिन वे उतने निश्चित नहीं हैं, क्योंकि वे असीम हैं। तुम उन्हें अनुभव कर सकते हो; जब तुम स्वस्थ होते हो तो जानते भी हो कि मैं स्वस्थ हूं। लेकिन स्वास्थ्य क्या है? रोगों का इलाज हो सकता है, उन्हें मिटाया जा सकता है। और जब अवरोध हट जाते हैं, स्वास्थ्य का प्रकाश भीतर आ जाता है।

ज्ञान—की घटना भी ऐसी ही है। ज्ञान आध्यात्मिक स्वास्थ्य है। मन आध्यात्मिक रोग है और ध्‍यान एक औषधि है।

बुद्ध ने कहा है: मैं वैद्य हूं, चिकित्‍सक हूं, मैं शिक्षक नहीं है, मैं तुम्‍हें कोई सिद्धांत सिखाने नहीं आया हूं। मैं कुछ औषधि जानता हूं जो तुम्हारे रोगों का इलाज कर सकती है। औषधि लो, रोगों को मिटाओ; और तुम्हें स्वास्थ्य उपलब्ध हो जाएगा। स्वास्थ्य के संबंध में पूछो मत। बुद्ध कहते हैं. मैं दार्शनिक नहीं हूं; मैं सैद्धांतिक नहीं हूं। मेरी रुचि इसमें नहीं है कि ईश्वर क्या है; कैवल्य, मोक्ष और निर्वाण क्या है। मुझे जरा भी रुचि नहीं है। मैं तो सिर्फ इसमें उत्सुक हूं कि रोग क्या है और उसका उपचार क्या है। मैं वैद्य हूं।

बुद्ध की दृष्टि बिलकुल वैज्ञानिक है। उन्होंने मनुष्य की समस्या का, उसकी बीमारी का ठीक निदान किया। उनकी दृष्टि सर्वथा सम्यक है – ओशो

तंत्र–सूत्र–(भाग–3)–प्रवचन–40

डॉ . प्रभात टंडन अपने अनुभव और बौद्ध धम्म मार्ग के चनात्मक अध्ययन के बात कहते हैं की

इसमें कोई संदेह नही कि बुद्ध का मार्ग दूसरे रहस्यदर्शियों के मार्ग से बिल्कुल अलग था । एक चिकित्सक की भूमिका मे बुद्ध अधिक फ़िट बैठते हैं ।
जिस प्रकार एक चिकित्सक को रोगी को स्वस्थ करने के लिये चार तथ्यों की आवशयकता पडती है

१. रोग
२. रोग का कारण
३. रोग का उपचार (आरोग्य )
४. भैषज्य ( रोग दूर करने की दवा )

उसी प्रकार बुद्ध दु:ख रुपी रोग का चिकित्सा पद्द्ति द्वारा इलाज करते हैं । बुद्ध ने संसार मे दुख देखा । वह जानते थे कि इस दुख को कोई भी आध्यात्मिक उपदेश ठीक नही कर सकता बल्कि उसे एक विशेष सिस्टम द्वारा ठीक किया जा सकता है ।

बुद्ध के अनुसार

१.अगर दुख है तो
२. दुख के कारण भी होगे ( समुदय )
३. कारण है तो उसे दूर भी किया जा सक्लता है ( निदान )
४. दूर करने के लिये उपाय यानि दवा भी होगी । ( अष्टांगिक मार्ग )

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