उत्तराखंड में डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा प्रशासन ने हटाई,पूरी खबर निम्न लिंक से पढ़ें

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आरक्षण का इतिहास ➡ जरूर पढ़े और समझे…एडवोकेट कुशाल चन्द्र

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🔷आरक्षण का इतिहास ➡ जरूर पढ़े और समझे
🔷भारत देश में आरक्षण शब्द का गलत उपयोग हो रहा है क्योकि सविधान में आरक्षण शब्द ही नही है इसका असली वास्तविक शब्द प्रतिनिधित्व है।

🔷1858 में ज्योतिबा फुले ने हन्टर कमीशन के सामने जनसंख्या के अनुपात में पिछडो को प्रतिनिधित्व देने की मांग की।

🔷1902 में कोलाहपुर के छत्रपति शाहू जी महाराजा ने अपने राज्य में 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व व्यवस्था लागू किया।

🔷1930 1931 1932 में डॉ अम्बेडकर ने प्रतिनिधित्व की मांग गोलमेज सम्मेलन में की।

जिस पर अग्रेजो ने अछूतों को कम्युनल अवार्ड के अंतगर्त पृथक निर्वाचन का अधिकार दिया। जो हजारो सालो में मिला पहली अधिकार था।  जिस पर गांधी ने आमरण अनशन (मरते दम तक अनशन ) किया। जिस पर गांधी व् अम्बेडकर के बिच समझोता “पूना पेक्ट ” हुआ। जिससे अछूतों को हर स्तर पर आरक्षण की व्यवस्था की गयी।

🔷अथार्त् यह 1932 से लागू है।

🔷भारत में आरक्षण शब्द सविधान में नही है

🚸सविधान में प्रतिनिधित्व शब्द है। देश में लोकतन्त्र है या यदि लोकतन्त्र स्थापित करना है तो प्रतिनिधित्व देना होगा।

🚸सविधान सभा ने तय किया था की देश के विकास में सबकी भागीदारी होनी चाहिये इसलिये

” सामाजिक व् आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गो “को प्रतिनिधित्व दिया गया है।

सामाजिक पिछड़ापन अथार्त् वह शोषित वर्ग या जातिया जो हजारो सालो से शोषण का शिकार रही है उन्हें यह प्रतिनिधित्व का अधिकार दिया गया है।

🔷भारत में आरक्षण शब्द राजनेतिक मुद्दों के कारण नेगेटिव सोच के रूप में बदल दिया गया है।

जबकि यह वास्तविक रूप से ” प्रतिनिधित्व शब्द” होना चाहिए।

🔷हमें यह समझना चाहिए की आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नही है यह प्रतिनिधित्व का मामला है।

🚸आज देश में 85 प्रतिशत जनसख्या को 49.5 प्रतिशत प्रतिनिधित्व दिया गया है जो हजारो सालो से  पिछड़े रहे है।

🚸आज देश में 3 प्रकार का आरक्षण अथार्त् प्रतिनिधित्व व्यवस्था है।

1. शिक्षा में आरक्षण  ,
2. सरकारी नोकरी में आरक्षण  उक्त दोनों में कोई समय सीमा नही है।
3. राजनेतिक आरक्षण जिसकी समय सीमा सविधान में 10 वर्ष थी लेकिन यह हर बार बिना बहस के बढ़ाई जाती है जबकि इसकी कभी भी मांग नही की जाती है यह राजनेतिक आरक्षण है।

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ध्यान रहे

दुनिया में भारत ही एक मात्र देश है जहा वर्ण व्यवस्था और उसमे निर्मित 6743 जातिया तथा इसमे भी प्रत्येक जाति में 12 उपजातिया है

जो व्यक्ति को सामाजिक रूप से उचा – निचा और गैर बराबरी का समाज बनाती है जो सबसे ज्यादा शर्मनाक है। जो व्यक्ति – व्यक्ति और लिंग आधारित भेद करती है जो हमारे धर्म शास्त्रो से भरे पड़े  है।जिसके कारण वे पिछले हजारो वर्षो से शोषण का शिकार हुए ,

🌠आज आरक्षण शोषित वर्ग को बराबरी तक लाने का अचूक शस्त्र है।

🌠जिसे सविधान सभा के 300 सदस्यों ने सर्वसम्मति से लागू किया और यह माना की जब तक समाज में गैर बराबरी है तब तक यह लागू रहेगा।

👍वेसे इसमें समय -समय पर समीक्षा होनी चाहिए बशर्ते बैकलॉग पूर्ण हो ताकि देश व् समाज के विकास में सबकी हिस्सेदारी हो। लेकिन वोट बैंक की राजनीती के कारण यह सम्भव नही हो पाया है।

🔲आरक्षण को खत्म किया जा सकता है
आरक्षण का आधार जातिया है  यदि जातियो को खत्म किया जाए तो आरक्षण स्वतः ही खत्म जाएगा।

🔵डॉ अम्बेडकर सविधान में जातिवाद खत्म करने का प्रावधान करना चाहते थे लेकिन कट्टर जातिवादी समर्थको ने यह प्रावधान नही बनाने दिया।

🔵लेकिन फिर  भी सविधान में समता स्वतन्त्रता बन्धुता के कानून के कारण छुआछूत कम हुआ है लेकिन आज भी देश के 60 प्रतिशत भागो में यह गन्दगी हमारे ही कुछ बदमाश लोगो को वजह से विधमान है। जो शर्मनाक है।arakshan justice equality

🔷🔷इसमे कुछ अपवाद हो सकते है।

🔷आज देश के लोकतन्त्र के 4 पिलर है।

1 विधायका
2 कार्यपालिका
3 न्यायपालिका
4 मिडिया

🚸विधायका व् कार्यपालिका में आरक्षण है जिसमे वजह से देश में अधिकतर वर्गो का प्रतिनिधित्व है । जो लोकतन्त्र को कायम करता है।

🚸लेकिन उच्च न्यायपालिका व् मिडिया में आरक्षण नही होने के कारण आज देश के 90 प्रतिशत जनसंख्या का केवल 5 प्रतिशत भी प्रतिनिधित्व नही है। जो एक गम्भीर चिंता का विषय है अथार्त् यहा लोकतन्त्र नही है।

🚸🚸देश एक परिवार की तरह होता है जिसमे कमजोर व् पिछड़े तथा सभी वर्गो को विकास के समान अवसर होने के साथ साथ विकास में सबकी हिस्सेदारी बराबर  होना चाहिए इसलिये प्रतिनिधित्व अथार्त् आरक्षण जरूरी है।
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🚸🚸🚸यह आरक्षण की व्यवस्था  दुनिया के अधिकतर देश में है और  अमेरिका में भी available है जिसका परिणाम बराक हुसेन ओबामा राष्टपति बन पाया है।

कुशालचंद्र एडवोकेट मोबाइल 94142 44616
M.A., M.COM., LL.M., D.C.L.L., I.D.C.A., C.A. Inter.
पाली राजस्थान इंडिया।।।।

 

डॉ अम्बेडकर द्वारा जलाये गए मनुस्मृति कानून की हिंदी पुस्तक को फ्री डाउनलोड के लिए लिंक

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गौतम बुद्ध वास्तव में कौन हैं, उनकी शिक्षा क्या है, उनका मकसद और उपलब्धि क्या है अदि समझने के लिए उनके बारे में ओशो द्वारा बताई प्रस्तुत सात प्रमुख बातें जरूर पढ़ें या विडियो सुने |मूल लेख “भगवान् बुद्ध मेरी दृस्टि में – ओशो” …SBMT टीम

बौद्ध धम्म को आस्था से मानने कि जरूरत नहीं पहले खुद जानो तब ही मानो 

बुद्ध कहते हैं,

“तुम सिर्फ मेरा निमंत्रण स्वीकार करो मानना या न मानना बाद की बात है। इस भवन में दीया जला है, तुम भीतर आओ। और यह भवन तुम्हारा ही है, यह तुम्हारी ही अंतर्मन का भवन है।”

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पहली, गौतम बुद्ध दार्शनिक नहीं, द्रष्टा हैं।:   

दार्शनिक वह, जो सोचे। द्रष्टा वह, जो देखे। सोचने से दृष्टि नहीं मिलती। सोचना अज्ञात का हो भी नहीं सकता। जो ज्ञात नहीं है, उसे हम सोचेंगे भी कैसे? सोचना तो ज्ञात के भीतर ही परिभ्रमण है। सोचना तो ज्ञात की ही धूल में ही लोटना है। सत्य अज्ञात है। ऐसे ही अज्ञात है जैसे अंधे को प्रकाश अज्ञात है। अंधा लाख सोचे, लाख सिर मारे, तो भी प्रकाश के संबंध में सोचकर क्या जान पाएगा! आंख की चिकित्सा होनी चाहिए। आंख खुली होनी चाहिए। अंधा जब तक द्रष्टा न बनें, तब तक सार हाथ नहीं लगेगा।

तो पहली बात बुद्ध के संबंध में स्मरण रखना, उनका जोर द्रष्टा बनने पर है। वे स्वयं द्रष्टा हैं। और वे नहीं चाहते कि लोग दर्शन के ऊहापोह में उलझें।
दार्शनिक ऊहापोह के कारण ही करोड़ों लोग दृष्टि को उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। प्रकाश की मुफ्त धारणाएं मिल जाएं, तो आंख का महंगा इलाज कौन करे! सस्ते में सिद्धान्त मिल जाएं, तो सत्य को कौन खोजे! मुफ्त, उधार सब उपलब्ध हो, तो आंख की चिकित्सा की पीड़ा से कौन गुजरे! और चिकित्सा कठिन है। और चिकित्सा में पीड़ा भी है।बुद्ध ने बार-बार कहा है कि मैं चिकित्सक हूं। उनके सूत्रों को समझने में इसे याद रखना। बुद्ध किसी सिद्धांत का प्रतिपादन नहीं कर रहे हैं।

वे किसी दर्शन का सूत्रपात नहीं कर रहे हैं। वे केवल उन लोगों को बुला रहे हैं जो अंधे हैं और जिनके भीतर प्रकाश को देखने की प्यास है। और जब लोग बुद्ध के पास गए, तो बुद्ध ने उन्हें कुछ शब्द पकड़ाए, बुद्ध ने उन्हें ध्यान की तरफ इंगित और इशारा किया। क्योंकि ध्यान से है खुलती आंख, ध्यान से खुलती है भीतर की आंख।विचारों से तो पर्त की पर्त तुम इकट्ठी कर लो, आंख खुली भी हो तो बंद हो जाएगी। विचारों के बोझ से आदमी की दृष्टि खो जाती है। जितने विचार के पक्षपात गहन हो जाते हैं, उतना ही देखना असंभव हो जाता है। फिर तुम वही देखने लगते हो जो तुम्हारी दृष्टियां होती है। फिर तुम वह नहीं देखते, जो है। जो है, उसे देखना हो तो सब दृष्टियों से मुक्त हो जाना जरूरी है।इस विरोधाभास को खयाल में लेना, दृष्टि पाने के लिए सब दृष्टियांे से मुक्त हो जाना जरूरी है। जिसकी कोई भी दृष्टि नहीं, जिसका कोई दर्शनशास्त्र नहीं, वही सत्य को देखने में समर्थ हो पाता है।

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=> दूसरी बात, गौतम बुद्ध पारंपरिक नही, मौलिक हैं।: 

गौतम बुद्ध किसी परंपरा, किसी लीक को नहीं पीटते हैं। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि अतीत के ऋषियों ने ऐसा कहा था, इसलिए मान लो। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि वेद में ऐसा लिखा है, इसलिए मान लो। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि मैं कहता हूं, इसलिए मान लो। वे कहते हैं, जब तक तुम न जान लो, मानना मत। उधार श्रद्धा दो कौड़ी की है। विश्वास मत करना, खोजना। अपने जीवन को खोज में लगाना, मानने में जरा भी शक्ति व्यय मत करना। अन्यथा मानने में ही फांसी लग जाएगी। मान-मानकार ही लोग भटक गए हैं।

तो बुद्ध न तो परंपरा की दुहाई देते, न वेद की। न वे कहते हैं कि हम जो कहते हैं, वह ठीक होना ही चाहिए। वे इतना ही कहते हैं, ऐसा मैंने देखा। इसे मानने की जरूरत नहीं है। इसको अगर परिकल्पना की तरह ही स्वीकार कर लो, तो काफी है।परिकल्पना का अर्थ होता है, हाइपोथीसिस। जैसे कि मैंने कहा कि भीतर आओ, भवन में दीया जल रहा है। तो मैं तुमसे कहता हूं कि यह मानने की जरूरत नहीं है कि भवन में दीया जल रहा है। इसको विश्वास करने की जरूरत नहीं। इस पर किसी तरह की श्रद्धा लाने की जरूरत नहीं है। तुम मेरे साथ आओ और दीए को जलता देख लो। दीया जल रहा है तो तुम मानो या न मानो, दीया जल रहा है। और दीया जल रहा है तो तुम मानते हुए आओ कि न मानते हुए आओ, दीया जलता ही रहेगा। तुम्हारे न मानने से दीया बुझेगा नहीं, तुम्हारे मानने से जलेगा नहीं।

इसलिए बुद्ध कहते हैं, तुम सिर्फ मेरा निमंत्रण स्वीकार करो। इस भवन में दीया जला है, तुम भीतर आओ। और यह भवन तुम्हारा ही है, यही तुम्हारी ही अंतरात्मा का भवन है। तुम भीतर आओ और दीए को जलता देख लो। देख लो, फिर मानना।
और खयाल रहे जब देख ही लिया तो मानने की कोई जरूरत नहीं रह जाती है। हम जो देख लेते हैं, उसे थोड़े ही मानते हैं। हम तो जो नहीं देखते, उसी को मानते हैं। तुम पत्थर-पहाड़ को तो नहीं मानते, परमात्मा को मानते हो। तुम सूरज-चांद-तारों को तो नहीं मानते, वे तो हैं। तुम स्वर्गलोक, मोक्ष, नर्क को मानते हो। जो नहीं दिखाई पड़ता, उसको हम मानते हैं। जो दिखायी पड़ता है, उसको तो मानने की जरूरत ही नहीं रह जाती है, उसका यथार्थ तो प्रगट है।
तो बुद्ध कहते हैं, मेरी बात पर भरोसा लाने की जरूरत नहीं, इतना ही काफी है कि तुम मेरा निमंत्रण स्वीकार कर लो। इतना पर्याप्त है। इसको वैज्ञानिक कहते हैं, हाइपोथीसिस, परिकल्पना। एक वैज्ञानिक कहता है, सौ डिग्री तक पानी गर्म करने से पानी भाप बन जाता है। मानने की कोई जरूरत नहीं, चूल्हा तुम्हारे घर में है, जल उपलब्ध है, आग उपलब्ध है, चढ़ा दो चूल्हे पर जल को, परीक्षण कर लो। परीक्षण करने के लिए जो बात मानी गयी है, वह परिकल्पना। अभी स्वीकार नहीं कर ली है कि यह सत्य है, लेकिन एक आदमी कहता है, शायद सत्य हो, शायद असत्य हो, प्रयोग करके देख लें, प्रयोग ही सिद्ध करेगा-सत्य है या नहीं?
तो बुद्ध पारंपरिक नहीं हैं, मौलिक हैं। विचार की परंपरा होती है, दृष्टि की मौलिकता होती है। विचार अतीत के होते हैं, दृष्टि वर्तमान में होती है। विचार दूसरों के होते हैं, दृष्टि अपनी होती है।

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=> तीसरी बात, गौतम बुद्ध शास्त्रीय नहीं हैं। पंडित नहीं हैं, वैज्ञानिक हैं। :

बुद्ध ने धर्म को पहली दफे वैज्ञानिक प्रतिष्ठा दी। बुद्ध ने धर्म को पहली दफे विज्ञान के सिंहासन पर विराजमान किया। इसके पहले तक धर्म अंधविश्वास था। बुद्ध ने उसे बड़ी गरिमा दी। बुद्ध ने कहा, अंधविश्वास की जरूरत ही नहीं है। धर्म तो जीवन का परम सत्य है। एस धम्मो सनंतनो। यह धर्म तो शाश्वत और सनातन है। तुम जब आंख खोलोगे तब इसे देख लोगे।
इसलिए बुद्ध ने यह नहीं कहा कि नरक के भय के कारण मानो, और यह भी नहीं कहा कि स्वर्ग के लोभ के कारण मानो। और इसलिए यह भी नहीं कहा कि परमात्मा सताएगा अगर न माना, और परमात्मा पुरस्कार देगा अगर माना। नही, ये सब व्यर्थ की बातें बुद्ध ने नहीं कहीं।
बुद्ध ने तो सारसूत्र कहा। बुद्ध ने तो कहा, यह धर्म तुम्हारा स्वभाव है। यह तुम्हारे भीतर बह रहा है, अहर्निश बह रहा है। इसे खोजने के लिए आकाश में आंखें उठाने की जरूरत नहीं है, इसे खोजने के लिए भीतर जरा सी तलाश करने की जरूरत है। यह तुम हो, तुम्हारी नियति है, यह तुम्हारा स्वभाव है। एक क्षण को भी तुमने इसे खोया नहीं, सिर्फ विस्मरण हुआ है।

तो बुद्ध ने चैतन्य की सीढ़ियां कैसे पार की जाएं, मूर्छा से कैसे आदमी अमूर्छा में जाए, बेहोशी कैसे टूटे और होश कैसे जगे, इसका विज्ञान थिर किया। और जो उनके साथ भीतर गए, उन्हें निरपवाद रूप से मान लेना पड़ा कि बुद्ध जो कहते हैं, ठीक कहते हैं।
यह अपूर्व क्रांति थी। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। बुद्ध मील के पत्थर हैं मनुष्य-जाति के इतिहास में। संत तो बहुत हुए, मील के पत्थर बहुत थोड़े लोग होते हैं। महावीर भी मील के पत्थर नहीं हैं। क्योंकि महावीर ने जो कहा, वह तेईस तीर्थंकर पहले कह चुके थे। कृष्ण भी मील के पत्थर नहीं हैं। क्योंकि कृष्ण ने जो कहा, वह उपनिषद और वेद सदा से कहते रहे थे। बुद्ध मील के पत्थर हैं, जैसे लाओत्सू मील का पत्थर है। कभी-कभार, करोड़ों लोगों में एकाध संत होता है, करोड़ों संतों में एकाध मील का पत्थर होता है। मील के पत्थर का अर्थ होता है, उसके बाद फिर मनुष्य-जाति वही नहीं रह जाती। सब बदल जाता है, सब रूपांतरित हो जाता है। एक नयी दृष्टि और एक नया आयाम और एक नया आकाश बुद्ध ने खोल दिया।

इस प्रवचन में ओशो भगवान बुद्ध की विशेषताओं पर प्रकाश डालते है,इस प्रवचन को सुनने के बाद यही प्रतीत होता है की , बुद्ध को अगर कोई ठीक से समझ पाया है तो वोह एक मात्र ओशो है|बुद्ध के साथ धर्म अंधविश्वास न रहा, अंतर्खोज बना। बुद्ध के साथ धर्म ने बड़ी छलांग लगा ली। आस्तिक को ही धर्म में जाने की सुविधा न रही, नास्तिक को भी सुविधा हो गयी। ईश्वर को नहीं मानते, कोई हर्ज नहीं, बुद्ध कहते ही नहीं कि मानना जरूरी है। कुछ भी नहीं मानते, बुद्ध कहते हैं, तो भी कोई चिंता की बात नहीं। कुछ मानने की जरूरत ही नहीं है। बिना कुछ माने अपने भीतर तो जा सकते हो। भीतर जाने के लिए मानने की आवश्यकता क्या है! न तो ईश्वर को मानना है, न आत्मा को मानना है, न स्वर्ग-नर्क को मानना है। इसे तो नास्तिक भी इनकार न कर सकेगा कि मेरा भीतर है। इसे तो नास्तिकों ने भी नहीं कहा है कि भीतर नहीं है। भीतर तो है ही। नास्तिक कहते हैं, यह भीतर शाश्वत नहीं है। बुद्ध कहते हैं, फिकर छोड़ो, पहले यह जितना है उसे जान लो, उसी जानने से अगर शाश्वत का दर्शन हो जाए तो फिर मानने की जरूरत न होगी; तुम मान ही लोगे।
बुद्ध ने नास्तिकों को धार्मिक बनाने का महत कार्य पूरा किया। इसलिए बुद्ध के पास जो लोग आकर्षित हुए, बड़े बुद्धिमान लोग थे। आमतौर से धार्मिक साधु-संतों के पास बुद्धिहीन लोग इकट्ठे होते हैं। जड़, मूर्छित, मुर्दा। बुद्ध ने मनुष्य-जाति की जो श्रेष्ठतम संभावनाएं हैं, उनको आकर्षित किया। बुद्ध के पास नवनीत इकट्ठा हुआ चैतन्य का। ऐसे लोग इकट्ठे हुए जो और किसी तरह तो धर्म को मान ही नहीं सकते थे, उनके पास प्रज्वलित तर्क था। इसलिए बुद्ध दार्शनिक हैं, लेकिन बुद्ध के पास इस देश के सबसे बड़े से बड़े दार्शनिक इकट्ठे हो गए। बुद्ध अकेले एक व्यक्ति के पीछे इतना दर्शनशास्त्र पैदा हुआ, जितना मनुष्य-जाति के इतिहास में किसी दूसरे व्यक्ति के पीछे नहीं हुआ। और बुद्ध के पीछे इतने महत्वपूर्ण विचारक हुए कि जिनकी तुलना सारी पृथ्वी पर कहीं भी खोजनी मुश्किल है।
कैसे यह घटित हुआ? बुद्ध ने महानास्तिकों को आकर्षित किया। आस्तिक को बुला लेना मंदिर में तो कोई खास बात नहीं, नास्तिक को बुला लेने में कुछ खास बात है। बुद्ध वैज्ञानिक हैं, इसलिए नास्तिक भी उत्सुक हुआ। विज्ञान को तो नास्तिक ठुकरा न सकेगा। बुद्ध ने कहा, संदेह है, चलो, संदेह की ही सीढ़ी बनाएंगे। संदेह से और शुभ क्या हो सकता है! संदेह के पत्थर को लेंगेी बना लेंगेे। संदेह से ही तो खोज होती है। इसलिए संदेह को फेंको मत।
इस बात को समझना। जिसके पास जितनी विराट दृष्टि होती है, उतना ही वह हर चीज का उपयोग कर लेना चाहता है। सिर्फ क्षुद्र दृष्टि के लोग काटते हैं। क्षुद्र दृष्टि का आदमी कहेगा, संदेह नहीं चाहिए, श्रद्धा चाहिए। काटो संदेह को। लेकिन संदेह तुम्हारा जीवंत अंग है, काटोगे तो तुम अपंग हो जाओगे। संदेह का रूपांतरण होना चाहिए, खंडन नहीं। संदेह ही श्रद्धा बन जाए, ऐसी कोई प्रक्रिया होनी चाहिए।
कोई कहता है, काटो कामवासना को। लेकिन काटने से तो तुम अपंग हो जाओगे। कुछ ऐसा होना चाहिए कि कामवासना राम की वासना बन जाए। ऊर्जा का अधोगमन ऊर्ध्वगमन बन जाए। तुम ऊर्ध्वरेतस बन जाओ। कुछ ऐसा होना चाहिए कि तुम्हारे कंकड़-पत्थर भी हीरों में रूपांतरित हो जाएं। कुछ ऐसा होना चाहिए कि तुम्हारे जीवन की कीचड़ कमल बन सके।बुद्ध ने वह कीमिया दी।

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= > चौथी बात, गौतम बुद्ध वायवी, एब्सट्रेक्ट नहीं, अत्यंत व्यावहारिक हैं।

ऊंचे से ऊंची छलांग ली है उन्होंने, लेकिन पृथ्वी को कभी नहीं छोड़ा। जड़ें जमीन में जमाए रखीं। वह सिर्फ हवा में ही पंख नहीं मारते रहे।
एक बहुत प्राचीन कथा है कि ब्रह्मा ने जब सृष्टि बनायी और सब चीजें बनायीं, तभी उसने यथार्थ और स्वप्न भी बनाया। बनते ही झगड़ा शुरू हो गया। यथार्थ और स्वप्न का झगड़ा तो प्राचीन है। पहले दिन ही झगड़ा शुरू हो गया। यथार्थ ने कहा, मैं श्रेष्ठ हूं; स्वप्न ने कहा, मैं श्रेष्ठ हूं, तुझमे रखा क्या है! झगड़ा यहां तक बढ़ गया कि कौन महत्वपूर्ण है दोनों में कि दोनों झगड़ते हुए ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा हंसे और उन्होंने कहा, ऐसा करो, सिद्ध हो जाएगा प्रयोग से। तुममें से जो भी जमीन पर पैर गड़ाए रहे और आकाश को छूने में समर्थ हो जाए, वही श्रेष्ठ है।
दोनों लग गये। स्वप्न ने तो तत्क्षण आकाश छू लिया, देर न लगी, लेकिन पैर उसके जमीन तक न पहुंच सके। टंग गया आकाश में। हाथ तो लग गए आकाश से, लेकिन पैर जमीन से न लगे-स्वप्न के पैर होते ही नहीं। यथार्थ जमीन में पैर गड़ाकर खड़ा हो गया, जैसे कि कोई वृक्ष हो, लेकिन ठूंठ की तरह, आकाश तक उसके हाथ न पहुंचे।
ब्रह्मा ने कहा, समझे कुछ? स्वप्न अकेला आकाश में अटक जाता है, यथार्थ अकेला जमीन पर भटक जाता है। कुछ ऐसा चाहिए कि स्वप्न और यथार्थ का मेल हो जाए।
तो बुद्ध वायवी नहीं हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि उन्होंनें आकाश नहीं छुआ। उन्होंने आकाश छुआ, लेकिन यथार्थ के आधार पर छुआ।
इस फर्क को समझना।
बुद्ध ने अपने पैर तो जमीन पर रोके, बुद्ध ने यथार्थ को तो जरा भी नहीं भुलाया, यथार्थ में बुनियाद रखी; भवन उठा, मंदिर ऊंचा उठा, मंदिर पर स्वर्णकलश चढ़े। लेकिन मंदिर के स्वर्णकलश टिकते तो जमीन में छिपे हुए पत्थरों पर हैं, भूमि के भीतर छिपे हुए बुनियाद के पत्थरों पर टिकते हैं। बुद्ध ने एक मंदिर बनाया, जिसमें बुनियाद भी है और शिखर भी।
बहुत लोग हैं, जिनको हम नास्तिक कहते हैं, वे जमीन पर अटके रह जाते हैं। वे ठूंठ की तरह हैं। यथार्थ का ठूंठ। मार्क्सवादी हैं या चार्वाकवादी हैं, वे यथार्थ का ठूंठ। वे जमीन में तो पैर गड़ा लेते हैं, लेकिन उनके भीतर आकाश तक उठने की कोई अभीप्सा नहीं है, आकाश तक उठने की कोई क्षमता नहीं है। और चूंकि वे सपने को काट डालते हैं बिलकुल और कह देते हैं, आदर्श है ही नहीं जगत में। बस यही सब कुछ है, मिट्टी ही सब कुछ है। उनके जीवन में कमल नहीं फूलता, कमल नहीं उठता। कमल का उपाय ही नहीं रह जाता। जिसको इनकार कर दिया आग्रहपूर्वक, उसका जन्म नहीं होता।
और फिर दूसरी तरफ सिद्धांतवादी हैं: एब्सट्रेक्ट, वायवी विचारक है; वे आकाश में ही पर मारते रहते हैं, वे कभी जमीन पर पैर नहीं रोकते हैं। वे आदर्श में जीते हैं, यथार्थ से उनका कभी कोई मिलन ही नहीं होता। उनकी आंखों में आकाश-कुसुम खिलते हैं, असली कुसुम नहीं।
बुद्ध स्वप्नवादी नहीं हैं, परम व्यावहारिक हैं। लेकिन चार्वाक जैसे व्यवहारवादी भी नहीं हैं। उनका व्यवहारवाद अपने भीतर आदर्श की संभावना छिपाए हुए है। लेकिन वे कहते हैं, शुरू तो करना होगा जमीन पर पैर टेकने से। जिसके पैर जमीन में जितनी मजबूती से टिके हैं, वह उतनी ही आसानी से आकाश को छूने में समर्थ हो पाएगा। मगर यात्रा तो शुरू करनी पड़ेगी जमीन में पैर टेकने से।
इसलिए जब कोई बुद्ध के पास आता है और ईश्वर की बात पूछता है, वे कहते हैं, व्यर्थ की बातें मत पूछो। अनेकों को तो लगा कि बुद्ध अनीश्वरवादी हैं, इसलिए ईश्वर के बाबत जवाब नहीं देते। यह बात सच नहीं है। बुद्ध कहते हैं, पहले जमीन में तो पैर गड़ा लो, पहले ध्यान में तो उतरो, पहले अंतस चेतना में तो जड़ें फैला लो, पहले तुम जो हो उसको तो पहचान लो, फिर यह पीछे हो लेगा। यह अपने से हो लेगा। यह एक दिन अचानक हो जाता है। जब जमीन में वृक्ष की जड़े खूब मजबूती से रुक जाती हैं, तो वृक्ष अपने आप आकाश की तरफ उठने लगता है। एक दिन आकाश में उठे वृक्ष में फूल भी खिलते हैं, वसंत भी आता है। मगर वह अपने से होता है। असली बात जड़ की है।
तो बुद्ध बहुत गहरे में यथार्थवादी हैं, लेकिन उनका यथार्थ आदर्श को समाहित किए हुए है। वह आदर्श समन्वित है यथार्थ में।

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=>पांचवी बात, गौतम बुद्ध विधिवादी नहीं, मानवीय हैं।:

एक तो विधिवादी होता है, जैसे मनु। सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं, मनुष्य महत्वपूर्ण नहीं है। ऐसा लगता है मनु में, जैसे मनुष्य सिद्धांत के लिए बना है। मनुष्य की आहुति चढ़ायी जा सकती है सिद्धांत के लिए, लेकिन सिद्धांत में फेर-बदल नहीं की जा सकती।
बुद्ध अति मानवीय हैं, ह्ययूमनिस्ट। मानववादी हैं। वे कहते हैं, सिद्धांत का उपयोग है मनुष्य की सेवा में तत्पर हो जाना। सिद्धांत मनुष्य के लिए है, मनुष्य सिद्धांत के लिए नहीं। इसलिए बुद्ध के वक्तव्यों में बड़े विरोधाभास हैं। क्योंकि बुद्ध एक-एक व्यक्ति की मनुष्यता को इतना मूल्य देते, इतना चरम मूल्य देते हैं कि अगर उन्हें लगता है इस आदमी को इस सिद्धांत से ठीक नहीं पड़ेगा, तो वे सिद्धांत बदल देते हैं। अगर उन्हें लगता है कि थोड़े से सिद्धांत में फर्क करने से इस आदमी को लाभ होगा, तो उन्हें फर्क करने में जरा भी झिझक नहीं होती। लेकिन मौलिक रूप से ध्यान उनका व्यक्ति पर है, मनुष्य पर है। मनुष्य परम है। मनुष्य मापदंड है। सब चीजें मनुष्य पर कसी जानीं चाहिए।

इसलिए बुद्ध वर्ण-व्यवस्था को न मान सके। इसलिए बुद्ध आश्रम-व्यवस्था को भी न मान सके। क्योंकि ये जड़ सिद्धांत हैं। बुद्ध ने कहा, ब्राह्मण वही जो ब्रह्म को जाने। ब्राह्मण-घर में पैदा होने से कोई ब्राह्मण नहीं होता। और शूद्र वही जो ब्रह्म न जाने। शूद्र-घर में पैदा होने से कोई शूद्र नहीं होता। तो अनेक ब्राह्मण शूद्र हो गए, बुद्ध के हिसाब से, और अनेक शूद्र बाह्मण हो गए। सब अस्तव्यस्त हो गया। मनु के पूरे शास्त्र को बुद्ध ने उखाड़ फेंका।
हिंदू अब तक भी बुद्ध से नाराजगी भूले नहीं हैं। वर्ण-व्यवस्था को इस बुरी तरह बुद्ध ने तोड़ा। यह कुछ आकस्मिक बात नहीं थी कि डाक्टर अंबेडकर ने ढाई हजार साल बाद फिर शूद्रों को बौद्ध होने को निमंत्रण दिया। इसके पीछे कारण है। अंबेडकर ने बहुत बातें सोची थीं। पहले उसने सोचा कि ईसाई हो जाएं, क्योंकि हिंदुओ ने तो सता डाला है, तो ईसाई हो जाएं। फिर सोचा कि मुसलमान हो जाएं। लेकिन यह कोई बात जमीं नही, क्योंकि मुसलमानों में भी वही उपद्रव है। वर्ण के नाम से न होगा तो शिया-सुन्नी का है।
अंततः अंबेडकर की दृष्टि बुद्ध पर पड़ी और तब बात जंच गयी अंबेडकर को कि शूद्र को सिवाय बुद्ध के साथ और कोई उपाय नहीं है। क्योंकि शूद्र के लिए भी अपने सिद्धांत बदलने को अगर कोई आदमी राजी हो सकता है तो वह गौतम बुद्ध हैं-और कोई राजी नहीं हो सकता-जिसके जीवन में सिद्धांत का मूल्य ही नहीं, मनुष्य का चरम मूल्य है।
यह आकस्मिक नहीं है कि अंबेडकर बौद्ध हुए। पच्चीस सौ साल के बाद शूद्रों का फिर बौद्धत्व की तरफ जाना, या बौद्धत्व के मार्ग की तरफ जाना, बौद्ध होने की आकांक्षा, बड़ी सूचक है। इससे बुद्ध के संबंध में खबर मिलती है।
बुद्ध ने वर्ण की व्यवस्था तोड़ दी और आश्रम की व्यवस्था भी तोड़ दी। जवान, युवकों को संन्यास दे दिया। हिंदू नाराज हुए। संन्यस्त तो आदमी होता है आखिरी अवस्था में, मरने के करीब। अगर बचा रहा, पचहत्तर साल के बाद उसे संन्यस्त होना चाहिए। तो पहले तो पचहत्तर साल तक लोग बचते नहीं। अगर बच गए, तो पचहत्तर साल के बाद ऊर्जा नहीं बचती जीवन में। तो हिंदुओं का संन्यास एक तरह का मुर्दा संन्यास है, जो आखिरी घड़ी में कर लेना है। मगर इसका जीवन से कोई बहुत गहरा संबंध नहीं है।
बुद्ध ने युवकों को संन्यास दे दिया, बच्चों को संन्यास दे दिया और कहा कि यह बात मूल्यवान नहीं है, लकीर के फकीर होकर चलने से कुछ भी न चलेगा। अगर किसी व्यक्ति को युवावस्था में भी परमात्मा को खोजने की, सत्य को खोजने की, जीवन के यथार्थ को खोजने की प्रबल आकांक्षा जगी है, तो मनु महाराज का नियम मानकर रुकने की कोई जरूरत नहीं है। वह अपनी आकांक्षा को सुने, वह अपनी आकांक्षा से जाए। प्रत्येक व्यक्ति अपनी आंकाक्षा को सुने। प्रत्येक व्यक्ति अपनी आकांक्षा से जीए। उन्होंनें सब सिद्धांत एक अर्थ में गौण कर दिए, मनुष्य प्रमुख हो गया।
तो वे सैद्धांतिक नहीं हैं, विधिवादी नहीं हैं। लीगल नहीं है उनकी पकड़, उनकी पकड़ मानवीय है। कानून इतना मूल्यवान नहीं है, जितना मनुष्य मूल्यवान है। और हम कानून बनाते ही इसीलिए हैं कि मनुष्य के काम आए। मनुष्य कानून के काम आने के लिए नहीं है। इसलिए जब जरूरत हो, कानून बदला जा सकता है। जब मनुष्य के हित में हो, ठीक है, जब अहित में हो जाए तोड़ा जा सकता है। जो-जो मनुष्य के अहित में हो जाए, तोड़ देना है। कोई कानून शाश्वत नहीं है, सब कानून उपयोग के लिए हैं।

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=> और छठवीं बात, गौतम बुद्ध नियमवादी नहीं है, बोधवादी हैं।

अगर बुद्ध से पूछो, क्या अच्छा है, क्या बुरा है, तो बुद्ध उत्तर नहीं देते। बुद्ध यह नहीं कहते कि यह काम बुरा है और यह काम अच्छा है। बुद्ध कहते हैं, जो बोधपूर्वक किया जाए, वह अच्छा; जो बोधहीनता से किया जाए, बुरा।
इस फर्क को खयाल में लेना। बुद्ध यह नहीं कहते कि हर काम हर स्थिति में भला हो सकता है। या कोई काम हर स्थिति में बुरा हो सकता है। कभी कोई बात पुण्य हो सकती है, और कभी कोई बात पाप हो सकती है-वही बात पाप हो सकती है, भिन्न परिस्थति में वही बात पाप हो सकती है। इसलिए पाप और पुण्य कर्मो के ऊपर लगे हुए लेबिल नहीं हैं। अभी जो तुमने किया, पुण्य है; और सांझ को दोहराओ तो शायद पाप हो जाए। भिन्न परिस्थिति।
तो फिर हमारे पास शाश्वत आधार क्या होगा निर्णय का? बुद्ध ने एक नया आधार दिया। बुद्ध ने आधार दिया-बोध, जागरूकता। इसे खयाल में लेना। जो मनुष्य जागरूकतापूर्वक कर पाए, जो भी जागरूकता में ही किया जा सके, वही पुण्य है। और जो बात केवल मूर्छा में ही की जा सके, वही पाप है। जैसे, तुम पूछो, क्रोध पाप है या पुण्य? तो बुद्ध कहते हैं, अगर तुम क्रोध जागरूकतापूर्वक कर सको, तो पुण्य है। अगर क्रोध तुम मूर्छित होकर ही कर सको, तो पाप है।
अब फर्क समझना। इसका मतलब यह हुआ कि हर क्रोध पाप नहीं होता और हर क्रोध पुण्य नहीं होता। कभी मां जब अपने बेटे पर क्रोध करती है, तो जरूरी नहीं है कि पाप हो। शायद पुण्य भी हो, पुण्य हो सकता है। शायद बिना क्रोध के बेटा भटक जाता। लेकिन इतना ही बुद्ध का कहना है, होशपूर्वक किया जाए।
मैंने एक झेन कहानी सुनी है। एक समुराई, एक क्षत्रिय के गुरु को किसी ने मार दिया। और जापान में ऐसी व्यवस्था है, अगर किसी का गुरु मार डाला जाए, तो शिष्य का कर्तव्य है कि बदला ले। और जब तक वह मारने वाले को न मार दे, तब तक चैन न ले। ये समुराई तो बड़े भयानक योद्धा होते हैं। गुरु को किसी ने मार डाला, तो उसका जो शिष्य था, वह तो सब कुछ छोड़कर बस इसी में लग गया।

दो साल बाद उसका पीछा करते-करते एक जंगल में, एक गुफा में उसको पकड़ लिया। बस उसकी छाती में छुरा भोंकने को था ही कि उस आदमी ने उस समुराई के ऊपर थूक दिया। जैसे ही उसने थूका, उसने छुरा वापस रख लिया अपनी म्यान में और वापस गुफा के बाहर निकल आया।
उस आदमी ने कहा, क्यों भाई, क्या हो गया? दो साल से मेरे पीछे पड़े हो, बमुश्किल तुम मुझे खोज पाए, मैं जंगल-जंगल भागता रहा, आज तुम्हें मिल गया, आज क्या बात हो गयी कि छुरा निकाला हुआ वापस रख लिया?

उसने कहा कि मुझे क्रोध आ गया। तुमने थूक दिया, मुझे क्रोध आ गया। मेरे गुरु का उपदेश था, मारो भी अगर किसी को, तो मूर्छा में मत मारना। तो मारने में भी कोई पाप नहीं है। लेकिन तुमने जो थूक दिया, दो साल तक मैंने होश रखा-यह तो सिर्फ एक व्यवस्था की बात थी कि गुरु को मेरे तुमने मारा तो मैं तुम्हें मार रहा था, मेरा इसमें कुछ वैयक्तिक लेना-देना नहीं था-लेकिन तुमने थूक क्या दिया मुझ पर, मैं भूल ही गया गुरु को और मेरे मन में भाव उठा कि मार डालूं इस आदमी को, इसने मेरे ऊपर थूका! मैं बीच में आ गया, मूर्छा आ गयी। अहंकार बीच में आ गया, मूर्छा आ गयी। इसलिए अब जाता हूं। अब फिर जब यह मूर्छा हट जाएगी तब सोचूंगा। लेकिन मूर्छा में कुछ किया नहीं जा सकता।
बुद्ध ने कहा है, जो तुम मूर्छा में करो, वही पाप; जो जागरूकता में करों, वही पुण्य है। यह पाप और पुण्य की बड़ी नयी व्यवस्था थी। और इसमें व्यक्ति को परम स्वतंत्रता है। कोई दूसरा तय नहीं कर सकता कि क्या पाप है, क्या पुण्य है। तुमको ही तय करना है। बुद्ध ने व्यक्ति को परम गरिमा दी।

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और सातवीं बात, गौतम बुद्ध असहज के पक्षपाती नहीं, सहज के उपदेष्टा हैं।

गौतम बुद्ध कहते हैं, कठिन के ही कारण आकर्षित मत होओ। क्योंकि कठिन में अहंकार का लगाव है।

इसे तुमने देखा कभी? जितनी कठिन बात हो, लोग करने को उसमें उतने ही उत्सुक होते हैं। क्योंकि कठिन बात में अहंकार को रस आता है, मजा आता है-करके दिखा दूं। अब जैसे पूना की पहाड़ी पर कोई चढ़ जाए, तो इसमें कुछ मजा नहीं है, एवरेस्ट पर चढ़ जाऊं तो कुछ बात है। पूना की पहाड़ी पर चढ़कर कौन तुम्हारी फिकर करेगा, तुम वहां लगाए रहो झंडा, खड़े रहो चढ़कर! न अखबार खबर छापेंगे, न कोई वहां तुम्हारा चित्र लेने आएगा। तुम बड़े हैरान होओगे कि फिर यह हिलेरी पर और तेनसिंग पर इतना शोरगुल क्यों मचाया गया! आखिर इन ने भी कौन सी बड़ी बात की थी, जाकर हिमालय पर झंडा गाड़ दिया था, मैंने भी झंडा गाड़ दिया! लेकिन तुम्हारी पहाड़ी छोटी है। इस पर कोई भी चढ़ सकता है। जिस पहाड़ी पर कोई भी चढ़ सकता है, उसमें अहंकार को तृप्ति का उपाय नहीं है।
तो बुद्ध ने कहा कि अहंकार अक्सर ही कठिन में और दुर्गम में उत्सुक होता है। इसलिए कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि जो सहज और सुगम है, जो हाथ के पास है, वह चूक जाता है और दूर के तारों पर हम चलते जाते हैं।
देखते हैं, आदमी चांद पर पहुंच गया। अभी अपने पर नहीं पहुंचा! तुमने कभी देखा, सोचा इस पर? चांद पर पहुंचना तकनीक की अदभुत विजय है। गणित की अदभुत विजय है। विज्ञान की अदभुत विजय है। जो आदमी चांद पर पहुँच गया, यह अभी छोटी-छोटी चीजें करने में सफल नहीं हो पाया है। अभी एक ऐसा फाउंटेनपेन भी नहीं बना पाया जो लीकता न हो। और चांद पर पहुँच गए! छोटी-सी बात भी, अभी सर्दी-जुखाम का इलाज नहीं खोज पाए, चांद पर पहुंच गए! अब ऐसे फाउंटेनपेन को बनाने में उत्सुक भी कौन है जो लीके न! छोटी-मोटी बात है, इसमें रखा क्या है!
फाउंटेनपेन सदा लीकेंगे। कोई आशा नहीं दिखती कि कभी ऐसे फाउंटेनपेन बनेंगे जो लीकें न। और सर्दी-जुखाम सदा रहेगी, इससे छुटकारे का उपाय नहीं है। क्योंकि चिकित्सक कैंसर में उत्सुक हैं, सर्दी-जुखाम में नहीं। बड़ी चीज अहंकार की चुनौती बनती है। आदमी अपने भीतर नहीं पहुंचा जो निकटतम है और चांद पर पहुंच गया। मंगल पर भी पहुंचेगा, किसी दिन और तारों पर भी पहुंचेगा, बस, अपने को छोड़कर और सब जगह पहुंचेगा।
तो बुद्ध असहजवादी नहीं हैं। बुद्ध कहते है, सहज पर ध्यान दो। जो सरल है, सुगम है, उसको जीओ। जो सुगम है, वही साधना है। इसको खयाल में लेना। तो बुद्ध ने जीवनचर्या को अत्यंत सुगम बनाने के लिए उपदेश दिया है। छोटे बच्चे की भांति सरल जीओ। साधु होने का अर्थ बहुत कठिन और जटिल हो जाना नहीं, कि सिर के बल खड़े हैं, कि खड़े हैं तो खड़े ही हैं, बैठते नहीं, कि भूखों मर रहे हैं, कि लंबे उपवास कर रहे हैं, कि कांटों की शय्या बिछाकर उस पर लेट गए हैं, कि धूप में खड़े हैं, कि शीत में खड़े हैं, कि नग्न खड़े हैं। बुद्ध ने इन सारी बातों पर कहा कि ये सब अहंकार की ही दौड़ हैं। जीवन तो सुगम है, सरल है। सत्य सुगम और सरल ही होगा। तुम नैसर्गिक बनो और अहंकार के आकर्षणों में मत उलझो।

-ओशो

रहस्यदर्शियों पर ओशो
एस धम्मो सनंतनो, भाग 9
(प्रवचन नं. 82 से संकलित)

वाकई बाबा साहब आंबेडकर को छोड़कर अब तक के सभी भारतीय विद्वानों में बुद्धा को ओशो ने ही सही से समझा पाया है|

ये लेख डॉ प्रभात टनडन जी के ब्लॉग http://preachingsofbuddha.blogspot.in/2013/01/blog-post_27.html से लिया गया है| हम उनके आभारी हैं——————————–

बुद्ध ने कहा है : मेरे पास आना, लेकिन मुझसे बँध मत जाना। तुम मुझे सम्मान देना, सिर्फ इसलिए कि मैं तुम्हारा भविष्य हूँ, तुम भी मेरे जैसे हो सकते हो, मैं इसकी सूचना हूँ।…बुद्ध के संबंध में ओशो के विचार

buddha123गौतम बुद्ध ऐसे हैं जैसे हिमाच्छादित हिमालय। पर्वत तो और भी हैं। हिमाच्छादित पर्वत और भी हैं, पर हिमालय अतुलनीय है। उसकी कोई उपमा नहीं है। हिमालय बस हिमालय जैसा है। गौतम बुद्ध बस गौतम बुद्ध जैसे हैं।

पूरी मनुष्य जाति के इतिहास में वैसा महिमापूर्ण नाम दूसरा नहीं। गौतम बुद्ध ने जितने हृदयों की वीणा को बजाया है उतना किसी और ने नहीं। गौतम बुद्ध के माध्यम से जितने लोग जागे और जितने लोग परम भगवत्ता को उपलब्ध हुए उतने किसी और के माध्यम से नहीं।

गौतम बुद्ध की वाणी अनूठी है और विशेषकर उन्हें, जो सोच-विचार, चिंतन-मनन, विमर्श के आदी हैं। हृदय से भरे हुए लोग सुगमता से परमात्मा की तरफ चले जाते हैं, लेकिन हृदय से भरे हुए लोग कहाँ हैं? और हृदय से भरने का कोई उपाय भी तो नहीं है। हो तो हो न हो तो न हो। ऐसे आकस्मिक नैसर्गिक बात पर निर्भर नहीं रहा जा सकता।

बुद्ध ने उनको चेताया जिनको चेताना सर्वाधिक कठिन है- विचार से भरे लोग, बुद्धिवादी, चिंतन, मननशील। प्रेम और भाव से भरे लोग तो परमात्मा की तरफ सरलता से झुक जाते है, उन्हें झुकना नहीं पड़ता। उनसे कोई न भी कहे, तो भी वे पहुँच जाते हैं, उन्हें पहुँचाना नहीं पड़ता, लेकिन वे तो बहुत थोड़े हैं और उनकी संख्या रोज थोड़ी होती गई है। अँगुलियों पर गिने जा सकें, ऐसे लोग हैं। मनुष्य का विकास मस्तिष्क की तरफ हुआ है। मनुष्य मस्तिष्क से भरा है। इसलिए जहाँ जिसस हार जाए, जहाँ कृष्ण की पकड़ न बैठे, वहाँ भी बुद्ध नहीं हारते।

वहाँ भी बुद्ध प्राणों के अंतरतम में पहुँच जाते है। बुद्ध का धर्म बुद्धि का धर्म कहा गया है। बुद्धि या उसका आदि तो है, अंत नहीं। शुरुआत बुद्धि से है, प्रारम्भ बुद्धि से है, क्योंकि मनुष्य वहाँ खड़ा है, लेकिन अंत, अंत उसका बुद्धि में नहीं। अंत तो परम अतिक्रमण है, जहाँ सब विचार खो जाते हैं। सब बुद्धिमत्ता विसर्जित हो जाती है। जहाँ केवल साक्षी, मात्र साक्षी शेष रह जाता है।

लेकिन बुद्ध का प्रभाव उन लोगों में तत्क्षण अनुभव होता है, जो सोच-विचार में कुशल है। बुद्ध के साथ मनुष्य जाति का एक नया अध्याय शुरू हुआ। पच्चीस सौ वर्ष पहले बुद्ध ने वह कहा जो आज भी सार्थक मालूम पड़ेगा और जो आने वाली सदियों तक सार्थक रहेगा।
बुद्ध ने काफी कह दिया, जरूरत से ज्यादा कह दिया। जितना समझना जरूरी हो, उससे ज्यादा कह दिया। जितने से पूरी यात्रा हो सकती है, उतना कह दिया। पूरा सेतु निर्मित कर दिया, रास्ता पूरा साफ कर दिया।… काश! सुनने वालों में थोड़ी भी समझ होती, तो वहीं देखते जिस तरफ बुद्ध देख रहे हैं।

बुद्ध क्या कहते हैं, यह समझना जरूरी नहीं है। बुद्ध कहाँ देखते हैं, वहाँ देखना जरूरी है। बुद्ध क्या बोलते हैं, यह व्यर्थ है। बुद्ध कैसे हैं, वही सार्थक है। बुद्ध की आँखों में क्या झलक रहा है, वह हमें खोजना चाहिए, बुद्ध के शब्दों में क्या झलक आ रही है, वह तो बहुत दूर की है। बुद्ध की आँखें बिलकुल खजाने के पास हैं।

बुद्ध ने कहा है : मेरे पास आना, लेकिन मुझसे बँध मत जाना। तुम मुझे सम्मान देना, सिर्फ इसलिए कि मैं तुम्हारा भविष्य हूँ, तुम भी मेरे जैसे हो सकते हो, मैं इसकी सूचना हूँ। तुम मुझे सम्मान दो, तो यह तुम्हारा बुद्धत्व को ही दिया गया सम्मान है, लेकिन तुम मेरा अंधानुकरण मत करना। क्योंकि तुम अंधे होकर मेरे पीछे चले तो बुद्ध कैसे हो पाओगे? बुद्धत्व तो खुली आँखों से उपलब्ध होता है, बंद आँखों से नहीं। और बुद्धत्व तो तभी उपलब्ध होता है, जब तुम किसी के पीछे नहीं चलते, खुद के भीतर जाते हो।

कल्याण मित्र बुद्ध का शब्द है, गुरु के लिए। बुद्ध गुरु के शब्द के पक्षपाती नहीं, थोड़े विरोधी हैं। बुद्ध अनूठे मनुष्य हैं। वे कहते हैं कि गुरु शब्द विकृत हो गया है। हो भी गया है, उस दिन भी हो गया था। गुरुओं के नाम पर इतना व्यवसाय चला है-गुरुओं ने लोगों को कहीं पहुँचाया ऐसा तो मालूम नहीं होता है। कभी सौ गुरुओं में कोई एक गुरु होता होगा, निन्यानवे तो गुरु नहीं होते-सिर्फ गुरु-अभ्यास! इसलिए बुद्ध ने नया शब्द चुन लियाः कल्याण मित्र। बुद्ध ने अपने शिष्यों को कहा है कि मैं तुम्हारा कल्याण मित्र हूँ।

बुरे मित्रों की संगति न करें, न अधम पुरुषों की संगति करें। कल्याण मित्रों की संगति करें और उत्तम पुरुषों की संगति करें। …

कल्याण मित्र का अर्थ है : जो पहुँच गया, जिसने शिखर पर घर बना लिया। उत्तम पुरुष का अर्थ है, जो मार्ग पर है, लेकिन तुमसे आगे है, तुमसे श्रेष्ठतर है। तुमसे सुंदरतम है। उत्तम पुरुष का अर्थ है, साधु। उत्तम परुष का अर्थ है थोड़ा तुमसे आगे। कम से कम उतना तो तुम्हें ले जा सकता है, कम से कम उतना तो तुम्हें खींच ले सकता है।

कल्याण मित्र वही है, जो तुम्हारे भीतर की मनःस्थिति को बदलने में सहयोगी हो जाता है। और यह तभी संभव है, जब वह तुमसे उपर हो, उत्तम पुरुष हो। यह तभी संभव है जब वह तुमसे आगे गया हो। जो तुमसे आगे नहीं गया है, वह तुम्हें कहीं ले जा न सकेगा। आगे ले जाने की बातें भी करे तो भी तुम्हें नीचे ले जाएगा।

मैं तुम्हें बुद्ध की बात संक्षिप्त में कह दूँ। बुद्ध कहते हैं: न कोई गुरु है, न कोई शिष्य है। और मैं तुम्हारा गुरु और तुम मेरे शिष्य! मेरे पास सिखाने को कुछ भी नहीं हैं, और आओ, मैं तुम्हें सिखाऊँ । गुरु की कोई जरूरत नहीं है, और आओ, मेरा सहारा ले लो। यह सर्वांगीण सत्य है, क्योंकि दोनों बातें इसमें आ गईं। इसमें गरु-शिष्य भी आ गए, और गुरुता भी नहीं आई और शिष्य का अपूर्व नाता भी आ गया और नाता मोह भी नहीं बना। वह अंतरंग संबंध भी निर्मित हो गया, लेकिन उस अंतरंग संबंध में कोई गाँठ नहीं पड़ी, कारागृह नहीं बना….

बुद्धम्‌ शरणम्‌ गच्छामि – आज इतना ही

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साभार : एस धम्मो सनंतनो तथा आशो की अन्य पुस्तकों से संकलित अंशः
सौजन्य : ओशो इंटरनेशनल फाऊंडेशन

http://hindi.webdunia.com/%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%A0%E0%A5%87-%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%A4%E0%A4%AE-%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7/%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%A0%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%A4%E0%A4%AE-%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7-1100524067_1.htm

बहुजनो के लिए दशहरा जैसा या उससे भी बड़ा त्यौहार मनुस्मृति दहन दिवस 25 दिसंबर को होता है | मनुस्मृति दहन दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

डॉ अम्बेडकर द्वारा जलाये गए मनुस्मृति कानून की हिंदी पुस्तक को फ्री डाउनलोड के लिए लिंक

https://drive.google.com/file/d/0BxcTXJRxuCcVc2Q0SDNfY2J0cEE/view?pref=2&pli=1

 

manusmriti-dahan-divas85 साल पहले, डा. आम्बेडकर ने रात्रि के 9 बजे हिन्दू भारत का तानाबाना बुनने वाली मनुस्मृति-मनु के कानून के दहन संस्कार का नेतृत्व किया था। वह क्रिसमस का दिन था। 25 दिसंबर, 1927। लपटों ने अंधेरे आकाश में उजाला फैला दिया था। कुछ लोगों कहना है की आम्बेडकर ने ब्राहमणों की इस पुस्तक को सार्वजनिक रूप से नष्ट करने का निर्णय आखिरी क्षणों में लिया था, यह जल्दी में किया गया दहन था। कुछ लोग इसे आम्बेडकर के जीवन की गैर-महत्वपूर्ण घटना भी बताते हैं। इन बातों में कोई दम नहीं है। यह कार्यकर्म एक से नए साल की पूर्व संध्या पर जलाई जाने वाली बॉनफायर था, जिसमें एक बूढ़े व्यक्ति का पुतला जलाया जाता है। यह बूढ़ा व्यक्ति प्रतीत होता है पुराने साल का जो नए साल को जगह दे रहा है।
सन् 1938 में डॉ. आम्बेडकर ने टीवी परवटे को दिए गए एक साक्षात्कार में कहा था मनुस्मृति दहन हमने जानते-बुझते किया था। हमने यह इसलिए किया था क्योंकी हम मनुस्मृति को उस अन्याय का प्रतीक मानते हैं जो सदियों से हमारे साथ हो रहा है। उसकी शिक्षाओं के कारण हमें घोर गरीबी में जीना पड़ रहा है। इसलिए हमने अपना सब कुछ दांव पर लगाकर, अपनी जान हथेली पर रखकर यह काम किया (राइटिंग एंड स्पीचिज ऑफ डॉ. बाबा साहब इतिहास दिसंबर, २०१२) उस इतिहास निर्मात्री क्रिसमस की रात सभी कार्यकर्ताओं ने पांच पवित्र संकल्प लिए।
1. मैं जन्म-आधारित चतुर्वर्ण में विश्वास नहीं रखता।
2. मैं जातिगत भेदभाव में विश्वास नहीं रखता।
3. मैं विश्वास करता हूं की अछूत प्रथा, हिन्दू धर्म का कलंक है और मैं अपनी पूरी ईमानदारी और क्षमता से उसे समूल नष्ट करने की कोशिश करूँगा l
4. यह मानते हुए की कोई छोटा-बड़ा नहीं है, मैं खानपान के मामले में, कम से कम हिन्दुओं के बीच, किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करूँगा l
5. मैं विश्वास करता हूँ की मंदिरों, पानी के स़्त्रोतों, स्कूलों और अन्य सुविधाओं पर बराबर का अधिकार है।
छ:ह लोगों ने दो दिन की मेहनत से सभा के लिए पंडाल बनाया था। पंडाल के नीचे गडढा खोदा गया था, जिसकी गहराई छह इंच थी और लम्बाई व चौड़ाई डेढ़-डेढ़ फीट। इसमें चंदन की लकड़ी के टुकड़े भरे हुए थे। गड्ढे के चारों कोनों पर खंभे गाड़े गए थे। तीन ओर बैनर टंगे थे। क्रिसमस कार्ड की तरह झूल रहे इन बैनरों पर लिखा था – मनुस्मृति दहन भूमि। – ब्राहम्णवाद को दफनाओ। – छुआछूत को नष्ट करो । वे क्या सोच रहे थे ? उस समय डा. आम्बेडकर के दिमाग में क्या चल रहा था ? सन् 1927 का वह क्रिसमस भारत के लिए आज भी क्यों महत्वपूर्ण है ?आम्बेडकर के लिए स्मृति साहित्य और विशेषकर मनुस्मृति…जन्म न की योग्यता को व्यक्ति की समाज में भूमिका का निर्धारक बनाता था, शूद्रों को गुलामों का दर्जा देता था और महिलाओं को गुमनामी की जिंदगी देता था। (रॉड्रिग्स, इसेन्शियल राइटिंग्स ऑफ बीआर आम्बेडकर, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2002, 24)। इस संबंध में उनके लेखन से लिए गए डा. आम्बेडकर के प्रासंगिक विचार निम्नानुसार हैं: 1. मनुस्मृति : जला डालो * ऐसा लग सकता है की मैं भारत को कानून देने वाले मनु की अनावश्यक रूप से कटु आलोचना कर रहा हूं। परंतु मैं जानता हूं की मैं अपनी पूरी ताकत लगा दूं तब भी मैं उनके भूत को नहीं मार सक ता। वे बिना शरीर की आत्मा की तरह जीवित हैं और आज भी उनकी बात सुनी जाती है और मुझे भय है की वे बहुत लंबे समय तक जीवित रहेंगे।

https://incrediblecivilization.wordpress.com/2014/01/23/manusmriti-dahan/#more-442

 

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मनुस्मृति और अन्य बहुजन विरोधी दमन साहित्य के उदाहरण:

डॉ. भदंत आनन्द कौशल्यायन की एक पुस्तक है ” मनुस्मृति जलाई क्यों गई” उसमें से कुछ उदाहरण भारत के डरावने इतिहास के लिए बिलकुल उपयुक्त है| बहुजन साहित्य की एक पुस्तक है  “धर्म एक अफीम” प्रकाशक स्वाभिमान जाग्रति मिशन, दिल्ली,जहाँ मुझे सभी तरह के धार्मिक ग्रंथों में फैले धार्मिक आतंक के कानून एक ही जगह मिल गए| मैं सुक्रगुज़र हूँ इस पुस्तक के लेखक  शकील प्रेम का जिनहोने इस पुस्तक की सामग्री इस्तेमाल करने की कॉपी राईट परमिशन दी |इस पुस्तक में जिसमें सभी धर्मों का तुलनात्मक अध्यान किया गया है और धर्म व उसके ठेकेदारों को सारी अव्यवस्था और दुखों के लिए परोक्ष या अपरोक्ष रूप से  कारण पाया है|ये पुस्तक बहुजन साहित्य का नगीना है मैं  इसे पढने की सलाह अवस्य  देना चाहूँगा|  मनुस्मृति अर्थात उस समय का संविधान में लिखे कुछ कानूनों को देखिये जिनका कड़ाई से पालन होता था :

 

–          संसार में जो कुछ भी है सब ब्राह्मणों  के लिए ही है क्यूंकी वो जन्म से ही श्रेष्ठ है(मनुस्मृति 1/100)

–          राजा का ये कर्त्तव्य है की वह ब्राह्मणों की जीविकी निश्चित करे|जिस तरह पिता अपने पुत्र की रक्षा करता है उसी प्रकार राजा को भी ब्रह्मण की आजीविका के साधन का ध्यान रखना चाहिए (मनुस्मृति 7/135)

–          किसी भी आयु का ब्राह्मण पिता तुल्ये होता है , सौ वर्ष का वृद्ध क्षत्रीय भी १० वर्ष के बालक ब्रह्मण को पिता के बराबर ही समझे (मनुस्मृति 2/138)

–          धार्मिक मनुष्या इन नीच जाती वालों के साथ बातचीत ना करें उन्हें ना देखें (मनुस्मृति 10/52)

–          यदि कोई नीची जाती का व्यक्ति ऊंची जाती का कर्म करके धन कमाने लगे तो राजा को यह अधिकार है की उसका सब धन छीन कर उसे देश से निकल दे (मनुस्मृति 10/95)

–          बिल्ली नेवला चिड़िया मेंडक उल्लू और कौवे की हत्या में जितना पाप लगता है उतना ही पाप शूद्र यानि SC/ST/OBC की हत्या में है (मनुस्मृति 11/131 )

–          शूद्र यानि SC/ST/OBC  द्वारा अर्जित किया हुआ धन ब्रह्मण उससे जबरदस्ती छीन सकता है क्यूंकि उसे धन जमा करने का कोई अधिकार ही नहीं है (मनुस्मृति 8/416 )

–          स्वामी के द्वारा छोड़ा गया शूद्र भी दासत्व से मुक्त नही क्यूंकी यह उसका कर्म है जिससे उसे कोई नही छुड़ा सकता (मनुस्मृति 8/413)

–          चाहे वो खरीदा गया हो या नहीं लेकिन शूद्रों से सेवा ही करनी चाहिए क्योंकि शूद्रों की उत्पत्ति ब्रहमा  ने  ब्राह्मणों की  सेवा के उद्देश्य से ही की है (मनुस्मृति 8/412)

–          इन शूद्रों को शमशान,पहाड़ और उपवनों  में ही अपनी जीविका के कर्म करते हुए निवास करना चाहिए (मनुस्मृति 10/49)

–          इन नीच जाती वालों के लिए कफ़न ही इनका वस्त्र है, फूटे बर्तनों में ये भोजन करें,इनके आभूषण लोहे के हों और वे सदा भ्रमन की करते रहे तथा एक स्थान पर बहुत दिनों तक न रहें  (मनुस्मृति 10/52)

आधुनिक संविधान के निर्माता अंबेडकर ने सबसे पहले 25 दिसंबर 1927 को हज़ारों लोगों के सामने इस ”मनुस्मृति” नामक संविधान को जला दिया ,क्यूंकी ऐसे अन्यायी  संविधान की कोई आवश्यकता नही थी| भारतीय संविधान में आरक्षण का प्रावधान इसलिए दिया गया क्यूंकी इस देश की 85 प्रतिशत शूद्र जनसंख्या को कोई भी मौलिक अधिकार तक प्राप्त नही था,सार्वजनिक जगहों पर ये नही जा सकते थे मंदिर में इनका प्रवेश निषिध था सरकारी नौकरियाँ इनके लिए नहीं थी , ये कोई व्यापार नही कर सकते थे , पढ़ नहीं सकते थे , किसी पर मुक़दमा नही कर सकते थे , धन जमा करना इनके लिए अपराध था , ये लोग टूटी फूटी झोपड़ियों में, बदबूदार जगहों पर, किसी तरह अपनी जिंदगिओं को घसीटते हुए काट रहे थे|और यह सब ”मनुस्मृति” जैसे अन्य कई हिंदू/ब्राह्मण धर्मशास्त्रों के कारण ही हो रहा था कुछ उदाहरण देखिए-

 –          अगर कोई शूद्र वेद मंत्र सुन ले तो उसके कान में धातु पिघला कर डाल देना चाहिए- गौतम धर्म सूत्र 2/3/4….

–          सब वर्णों की सेवा करना ही शूड्रों का स्वाभाविक कर्तव्य है (गीता,18/44)

–          जो अच्छे कर्म करतें हैं वे ब्राह्मण ,क्षत्रिय वश्य, इन तीन  अच्छी जातियों को प्राप्त होते हैं जो बुरे कर्म करते हैं वो कुत्ते, सूअर, या शूद्र जाती को प्राप्त होते हैं (छान्दोन्ग्य उपनिषद् ,5/10/7)

 –          पूजिए विप्र ग्यान गुण हीना, शूद्र ना पूजिए ग्यान प्रवीना,(रामचरित मानस)

–          ब्राह्मण दुश्चरित्र भी पूज्यहनीए है और शूद्र जितेन्द्रीए होने पर भी तरास्कार योग्य है (पराशर स्मृति 8/33)

–          धोबी , नई बधाई कुम्हार, नट, चंडाल, दास चामर, भाट, भील, इन पर नज़र पद जाए तो सूर्य की ओर देखना चाहिए इनसे बातचीत हो जाए तो स्नान करना चाहिए (व्यास स्मृति 1/11-13)

–          निर्माण,चित्रकारी,कारीगरी,कृषी तथा पशुपालन यह सब नीच कर्म है(अनुशासन पर्व अ० २३श्लोक १४और२४—) (अनुशासन पर्व अ०90श्लोक६/८/9) (अनुशासन पर्व अ०135श्लोक 11)

ये उन असंख्य नियम क़ानूनों के उदाहरण मात्र थे, जो आज़ाद भारत से पहले देश में लागू थे| ये अँग्रेज़ों के बनाए क़ानून नहीं थे ये हिंदू धर्म द्वारा बनाए क़ानून थे जिसका सभी हिंदू राजा पालन करते थे| इन्ही नियमों के फलस्वरूप भारत में यहाँ की विशाल जनसमूह के लिए उन्नति के सभी दरवाजे बंद कर दिए गये या इनके कारण बंद हो गये, सभी अधिकार, या विशेष-अधिकार, संसाधन, एवं सुविधायें कुछ लोगों के हाथ में ही सिमट कर रह गईं, भारत के जनता में आपसी फूट इतनी बहुतायत में हो गई की विदेशी आक्रमण जैसे महा संगठन कारक के आगे भी  लोग संगठित होने को तयार नहीं हुए जिसके परिणाम स्वरूप भारत गुलाम हुआ| हाय! विशुद्ध भारतीय मौर्य साम्राज्य की हार के साथ ही भारत का भाग्य फूट गया|

चंद  बुद्धिमान मनुवदिओ ने जिन्दगी का नियम “अगर आपकी संख्या कम है तो बहुसंख्य लोगों में फूट डालो शाशन करो”  पर चलकर केवल अपने निजी फायदे के लिए भारत में वर्ण व्यस्था फैलाई अर्थात देश को जातिओं में बाँट दिया| ये समाज का  एक ऐसा बटवारा था जिसकी वजह से भारत वर्ष में चाहे कहीं से कोई भी विदेशी आ जाये शाशन करने और हराने में कामयाब रहा, और ये मनुवादी उनके राजदरबार में उनके सहयोगी रहे | केवल  सौ-दौसो  घुडसवार लुटेरों का जत्था अता था और भारतवर्ष को लूट कर चला जाता था,टैक्स लेने वाले राजा सुरक्षा तक प्रदान नहीं कर पाते थे|इनके डर से लोगों ने अपना धन मंदिरों में रखना शुरू किया  तो विदेशी लुटेरों ने मंदिरों को लूटना शुरू कर दिया |इनमे से कुछ लुटेरों ने ये भांप लिए था की इस देश को हराना कितना आसान है फलस्वरूप भारत पर कई बड़े आक्रमण हुए और विदेशिओं के गुलाम रहे, ये तो शायद हम सभी जानते और मानते है| ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि वर्ण व्यस्था की वजग से भारत की आबादी का तीन चौथाई हिस्सा (ब्रह्मण,वैश्य  और शूद्र) को तो पहले ही न लड़ने का धर्म आदेश था बाकि बचे एक चौथाई क्षत्रिये वे आपस में ही लड़ कर इतने कमजोर  हो चुके थे की उनमे विदेशी आक्रमण का सामना करने की क्षमता नहीं थी | आज जब हमारी सेना में सभी धर्म जाती वर्ग प्रदेश के लोग हैं तो क्या ये लड़ने योग्य सेना नहीं है? भारत का इतिहास विदेशी आक्रमणों की हार और लूटपाट से भरा पड़ा है, ऐसे डरावने इतिहास की वजह  महास्वार्थी मनुवादी लोग और उनके  धर्म शास्त्र हैं यही भारत की गुलामी का मूल कारन है | मनुवदिओ का सारा धर्म शास्त्र केवल उनके खुद के भले के लिए है उससे किसी का कभी कोई भला नहीं हुआ न ही कभी होगा | शकील प्रेम ने कहा है

“हमारी शिक्षा व्यवस्था हमें यह तो बताती है की हम दो हजार वर्षो से गुलाम थे परन्तु इस बात पर मौन हो जाती है की गुलाम क्यूँ थे ,हमारी गुलामी का कारन विदेशी आक्रमण नहीं थे बल्कि इसका कारण था हमारा धर्म और हमारी धर्मभीरुता ,जब जब हमारे ऊपर संकट आये तब तब हमने उनका सामूहिक हल ढूंढने के बजाये किसी अवतार के आने की प्रतीक्षा में भजन गाते रहे|”

बाबा साहब डॉ अम्बेडकर महान और आज भारत के तीन तरह के लोग …राहुल विमल

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अम्बेडकर जिन्हें आज बहुत से युवा बाबा साहेब के नाम से जानते है। एक ऐसा शख्स जिन्होंने भारतीय समाज में युवाओं को उनकी प्रतिभाओ के अनुसार एक नयी उडान भरने का रास्ता दिखलाया। अम्बेडकर की ही बदोलत युवाओं का हौसला बढ़ा है। समाज में सिर्फ़ आम ज़िंदगी जीना ही नहीं बल्कि यह भी समझाया की असल ज़िंदगी का मक़सद क्या है तुम्हारी निजी ज़िंदगी में। बाबा साहेब को आज भी बहुत सारे लोग एक तरफ़ें नज़रिए से देखते है- संविधान निर्माता और दलितों के मसीहा, मगर यह सच नहीं है।
Dr. Ambedkar with his associates of ‘Independent Labour Party’, A political party founded by Dr. Babasaheb Ambedkar in 1937. Photo Courtesy:www.navayan.com

आप जब भी अम्बेडकर की बात करते है या करेंगे तो उन्हें इन दो पैमानों को हट कर करने की कोशिश करीयेगा वरना ज़रूरत एवं अज्ञानता आपके साथ ही रह जाएगी। वजह इनके द्वारा किए गए असम्भव कार्य जिनमे से कुछ इस प्रकार है – नारी शशक्तिकारण (हिंदू कोड बिल),

मज़दूर क़ानून (बतौर पहले मज़दूर मंत्री के पद पर रहते), पैसे की परेशानी जिसकी वजह से रिज़र्व बैंक औफ इंडिया (आरबीआई) का गठन हुआ, काम करने की समय सीमा (आठ घंटे का काम), और यही नहीं पीपीएफ़, GPF,  प्रसव के दौरान औरतों को चिकित्सा अवकाश मिलना सब अम्बेडकर की ही देन है ।

जैसा कि भारत को हम और आप कई तरह से देखते है ठीक उसी तरह हमें यहाँ पर बात को स्पष्ट करने के लिए भारत में रह रहे समाज को तीन हिस्सों में बाँट कर समझने की कोशिश करेंगे।
तीन तरह का समाज…..
पहला – तार्किक बुद्धि,
दूसरा– उभरता हुआ युवा वर्ग और दूसरी भाषा में कहे तो कन्धकिया* समाज, जो की पढ़ा लिखा हुआ तो है मगर समाज के बहाव में बहना ज़्यादा पसंद करता है, और
तीसरा – अनपढ़, ज़मीनी बात को समझता है, साफ़ दिल का है, किसी की भी बातों में आसानी से आने वाला समाज।

पहला समाज – अम्बेडकर को समाज में सकारात्मक बदलाव होने की उम्मीद से देखता है। यह समाज हर सम्भव प्रयास करता है उन सकारात्मक बदलावों को हक़ीकत में बदलने के लिए। यह समाज अपने अस्तित्व को पहचानता है, समझता है की उसका जीवन का असल मक़सद क्या है। यह समाज बहुत दयालु है उन लोगों के लिए भी जो बदलाव लाने की सोच को अपने ज़हन में रखते है।
दूसरा समाज – अम्बेडकर को यह समाज एक सामाजिक अभिनेता के तौर पर देखते है। प्यार, आज़ाद ख़याल, अधिकार होने के मायने आदि यह सब बातें इस समाज को अम्बेडकर की याद दिलाते है। सिनेमा, हर दिन आने वाले कार्यक्रमों  से प्रभावित, अपनी तस्वीर को एक ख़ाब में संजोय कर जीवन को जीना इस समाज की पहचान बनता चला जा रहा है। यह समाज ख़ाब, व हक़ीक़त में चाह कर भी अंतर नहीं कर पता। अपने बनाए गए उसूल और आदर्श इस समाज में भरपूर मिलते है। इस समाज को मैं कन्धकिया समाज भी कहता हूँ । इस समाज की सबसे बड़ी पहचान – यह मौसम की तरह बदलना बहुत पसंद करता है। संघर्ष, अधिकार माँगने के लिए धरने फ़ैशन के एवज़ में करना ज़्यादा पसंद करता है। यह समाज भी बहुत कुछ करने की इच्छा रखता है मगर साफ़ समझ ना होने के कारण भटकाव जमकर रखता है।
तीसरा समाज – अम्बेडकर के नाम को भगवान की तरह जपने वाला यह समाज पहले व आज की सामाजिक व सरकारी अ-व्यवस्था के कारण आज भी अशाक्षर है। बहुत साफ़ और सरल भाषा में बात करना इस समाज को अच्छा लगता है। यह बहुत घुमावदार बात करने में अशक्षम है। मिशन, राजनीति इस समाज के लिए ज़िंदगी का एक मक़सद के बराबर है। यह अपनी ज़िंदगी की असलियत को समझता है एवं उस स्थिति को बदलने के लिए हर भरसक प्रयास भी करता है।
ऊपर बताई गयी सभी बातों को एक तरफ़ करके अम्बेडकर द्वारा बनाए गए संविधान को एक नज़र देखते है। भारत जैसे विशाल, विभिन्न जातियों, जनजातियो से भरपूर, अलग-२ भाषा, २९ राज्य होने के बावजूद पूरा भारत एक गति में आगे की और भड़ता चला जा रहा है, दुनिया में जिस तरह की परेशानी आजकल चल रही है उसे देख कर यह बात समझ में आती है की, इतना जटिल समाज होने के बाद भी भारत आज भी शांति से आगे भड रहा है। और यह सिर्फ़ और सिर्फ़ डॉ अम्बेडकर द्वारा बनाए गए संविधान की वजह से ही है?
बहुत बार सोच में पड़ जाता हूँ यह सोचकर कि, बाबा साहेब जैसे व्यक्ति जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में सिर्फ और सिर्फ पिताड़नाये, यातनाये, व सामाजिक बेदखली जैसी परेशानियों को ही देखा है फिर भी वो कैसे उस समाज का उत्थान कर गए जिस समाज को दिन में चलने भी नहीं दिया जाता था। आज के समय में अगर कोई व्यक्ति काम पर जा रहा हो ओर उसे मेट्रो ट्रेन के लिए ५ मिनट से ज़्यादा खड़ा होना पड़ जाए तो वो अपना आपा खोने के क़रीब पहुँच जाता है, और पटरी को इस तरह से निहारने लगता है जैसे ट्रेन उसकी नज़रों से जल्दी आ जाएगी। मगर उस समय काल में अम्बेडकर को तो ना पानी पीने की आज़ादी थी, ना नाई के पास बाल कटवाने की अनुमति, ना ही मटके से पानी पीने की, न क्लास में बैठके पढ़ने की अनुमति, ना घोड़ा बग्गी पर सवारी करनी आज़ादी और ना भी ऐसे बंदिशे जो आज के समय में किसी एक इंसासन पर लागू कर दी जाए तो वो कुछ ही दिनों में अपना दम तोड़ देगा या दिमाग़ी रूप से कमज़ोर। फिर भी अम्बेडकर उन सभी पिताड़नायो से लड़कर उनसे डटके मुक़ाबला किया वो दूसरा का हौसला भड़ाया।

अम्बेडकर ने अपनी ज़िन्दगी के सबसे दिल दहलाने वाले लम्हों से गुजर कर समाज व सभी भारतीयों के लिए वो कर दिखाया जो आज तक दुनिया में कोई कर नहीं पाया।

आज मैं जब भी अम्बेडकर का नाम लेता हूँ तो अपने अंदर एक ताक़त व कभी न ख़त्म होने वाली ऊर्जा को महसूस करता हूँ।
यक़ीन होना मुश्किल हो जाता है मेरे लिए कि, आज कैसे यह शक्श भारत में उठ रहे युवा समाज के नव्ज में बसा हुआ है? ऐसा नहीं है कि इनके अलवा कोई और नहीं आया कभी भारत में समाज के उत्थान के लिए। इनसे पहले बहुत आये थे जिन्होंने अपने स्तर पर बदलाव लाने की कोशिश को जारी रखा था। – ज्योतिभा राव फुले, शाहूजी महाराज, पेरियार, सावित्री बाई फुले, उद्धम सिंह, और कहे जाने के तौर पर गाँधी जी ने भी इस समाज के उत्थान  के लिए काम किया था।

Modern Manu. Photo Courtesy: DrAmbedkarBooks.com
अंत में एक ही बात बची है कहने को- “अगर अम्बेडकर ना होता तो मैं आज यहाँ नहीं लिख रहा होता”
बाबा साहेब के बारे ज़्यादा जानने के लिए…. कॉंट्रिब्यूशन औफ डा अम्बेडकर

राहुल विमल 

http://puranisoch.blogspot.in/2015/12/ambedkar.html?m=1