विश्व रत्न परमपूज्य बोधिसत्व बाबासाहेव डा.भीमराव आंम्बेडकर जी महान के 59वें महापरिनिर्वाण दिवस (6दिसम्बर2015) पर कोटि-कोटि नमन….  इन्जी.चन्द्रसैन  बौद्ध 


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🎯विश्व रत्न परमपूज्य बोधिसत्व बाबासाहेव डा.भीमराव आंम्बेडकर जी के    59वें महापरिनिर्वाण दिवस (6दिसम्बर2015)  पर कोटि-कोटि  नमन ! 🎯
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न पुप्फगन्धो पटिवातमेति न चन्दनं तगर मल्लिका वा।
सतञ्च गन्धो पटिवातमेति सब्बा दिसासप्पुरिसो पवाति।।……       धम्मपद-10

अर्थ:  संसार में जितने भी फूल हैं, पुष्प, चन्दन, तगर,चमेली आदि किसी की भी सुगन्ध उल्टी-हवा नहीं बहती,किन्तु सज्जनों की सुगन्ध  उल्टी-हवा भी जाती है अर्थात सज्जनों  के शीलों(कार्यों) की सुगन्ध सभी दिशाओं में बहती है।

🎯डा. भीमराव  आंम्बेडकर जी का जन्म मध्य प्रदेश में इन्दौर (महु छावनी) में 14अप्रैल 1891 को हुआ था। उनके पिता का नाम रामजी सकपाल  और माता जी का नाम भीमाबाई था। वे अपने माता पिता की चौदहवीं सन्तान थे। रामजी सकपाल बम्बई विभाग के कोकण क्षेत्र के महार समुदाय के रहने वाले थे।इनके दादा जी मालोजी सकपाल सेना में फौजी अफसर बने, जिन्होंने कई लडाईयों में अपनी वीरता का प्रदर्शन करने के कारण उन्होंने 19 पदक प्राप्त किये।रामजी सकपाल ने अपने पिता का अनुशरण करते हुए 14 साल तक सूबेदार मेजर की श्रेणी में हैडमास्टर के रूप में कार्य किया।
🎯बाबासाहेब डा.भीमराव     अम्बेडकर की असीम
देश भक्ति:
“लोग कहते हैं में पहले भारतीय हूं और बाद में कुछ और लेकिन बाबासाहेब कहते हैं “मैं पहले भी भारतीय हूं और बाद में भी भारतीय हूं।”

🎯“गोलमेज सम्मेलन में आजादी मुझे भी प्यारी है मैं भी चाहता हूं मुझे भी यह कहने की आज्ञा दिजिए कि लंदन की गोलमेज सभा में आजादी के लिए   जितना मैं लड़ा और झगड़ा हूं और अंग्रेजी हुकुमत की मैंने जितनी नुकताचीनी (फजीहत) की है वैसी किसी ने नहीं की लेकिन मैं देश की आजादी से जरूरी अपने अछूत भाईयों की आजादी समझता हूं।”

“भले ही भारत में करोड़ो लोग  ऐसे हैं जिन्हें समाज ने कुचला हुआ है, उन्हें मानव भी नहीं समझा जाता परन्तु हम सभी अन्यायों और मनुष्यता से घिरी कुछ बातों के बाबजूद भारत को अंग्रेजी साम्राज्य से स्वतंत्रता मिलनी ही चाहिए”
पूर्वजों द्वारा सदियों से घोर  अपमान को सहन करने पर भी बाबा साहब ने देश की आजादी के लिए डटे रहे। अन्त में अंग्रेजों को भारत स्वतंत्र करना ही पड़ा।

🎯फरवरी 1942 को बम्बई विधान सभा की एक बहस में पाकिस्तान के सम्बन्ध में बोलते हुए कहा-
” मैं शपथ लेता हूं कि में अपने देश की रक्षा केलिए अपना जीवन निछावर (कुर्बान) कर दूंगा।”

🎯 अंग्रेजी शासन काल में बाबासाहेब की शिक्षा और योग्यता को महत्व देते  हुए वायसराय कार्यकारणी समिति ने सन 1942 में उन्हें अपनी काउन्सिल में ‘श्रम मंत्री’ बनाया । उसी कार्यकाल में दामोदर नदी की वर्षा काल में तबाही से बचने एवं बिहार से कलकत्ता जाने के लिए 300 से 400 मील का चक्कर लगाकर जाना पड़ता था, इस  आपत्ती से बचने के लिए वायसराय लार्ड बेवल ने नदी पर बांध  बनाने के लिए डा.अम्बेड़कर को कहा- वह चाहते थे कि इस कार्य के लिए इंग्लैंड से इन्जीनियर आये। बाबा साहब ने देश हित को ध्यान में रखते हुए निम्न तर्क देकर  मना किया कि “इंग्लैंड छोटा देश छोटी नदियां की वजय से वहां का इन्जीनियर कामयाब नहीं है।” यह तर्क बाबा साहब ने अपने देश के इन्जीनियर के द्वारा इस कार्य को करने के लिए दिया। इस कार्य के लिए बाबासाहेब ने अपने ही देश के इन्जीनियर खोसला (पंजाब) को आमंत्रित किया। तब बाबा साहेब ने उससे कहा- “मैं राष्ट्र भक्त हूं और भारत भूमि से मुझे प्यार है। भारत की सुरक्षा को ध्यान में रखकर ही मैंने आपको चुना है।”

🎯 जम्मू-कश्मीर धारा 370 पर बाबासाहेब डा.अम्बेडकर की देश भक्ति:
कश्मीरियों को सम्पूर्ण भारत में बराबरी के अधिकार मिले लेकिन  उसी भारत  और भारतीयों को कश्मीर में बराबरी का कोई अधिकार नहीं है।
जब नेहरू ने उक्त धारा के complant के लिए कश्मीर नेता शेख अब्दुल्ला को बाबासाहेब के कार्यालय भेजा। तव बाबा साहेब ने उसे यह कहते हुए आफिस से भगा दिया-
“मैं भारत का कानून मंत्री हूं और  इस भारत विरोधी धारा-370 को मंजूरी देकर कम से कम मैं तो अपने देश से गद्दारी नहीं कर सकता।”
यह कहकर शेख अब्दुला को अपने आफिस से निकाल दिया। अलोकतांत्रिक तरीके से नेहरू ने गोपाल स्वामी अय्यगंर से इस भारत विरोधी धारा को भारत के संविधान में डलवाया जिसका खामियाजा देश  आज तक भुगत रहा है।

🎯 अपने प्रतिनिधित्व की वलि देकर देश भक्ति का परिचय:
बाबासाहेब ने अपने सम्पर्ण जीवन के संघर्षो के परिणाम स्वरूप गोलमेज सम्मेलन लंदन से 17 अगस्त 1932 को प्राप्त होने वाले दोहरे वोट के अधिकार की वलि देकर गांधी की जान बचाकर देश को टूटने से बचाया। 24 सितम्बर 1932 को पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर करके अपने प्रतिनिधियों के स्वयं चुनने का अधिकार छोड़ने पर संयुक्त प्रणाली को स्वीकार किया, जिसका खामियाजा अछूत वर्ग आज तक भुगत रहा है।बाबा साहेब भी इस संयुक्त मतदान की वजय से लोक सभा के दोनों चुनाव हार गये। तभी से सुरक्षित सीटों पर गुलाम लोग जीतकर  आने लगे।
🎯 संविधान
रचनाकार:
किसी देश की शासन-सत्ता को चलाने के लिए एक संविधान की आवश्यता होती है। जिसके नियमोंऔर कानूनों का पालन करना नितांत  आवश्यक होता है। जिससे देश में अमन  और शान्ति व्यवस्था कायम होती है। ऐसी ही इस देश की कानून की किताब ” भारतीय संविधान” है। जिसके रचनाकार बाबासाहेब डा.भीमराव आंम्बेडकर रहे है़ं। बाबासाहेब ने संविधान को चार स्तम्भों- समता, स्वतंत्रता,बन्धुत्व और न्याय  पर टिकाया है। “भारत  और भारत से बाहर डा.आंम्बेडकर संविधान-संरचना के मर्मज्ञ  एवं विशेषज्ञ के रूप में प्रख्यात हैं। उन्हें भारतीय संविधान का जनक होने का सर्वथा उचित  एवं अपेक्षित गौरव प्राप्त है।
15 जुलाई 1947 को ब्रिटिश पार्लियामेंट ने भारतीय स्वाधीन  एक्ट पास कर दिया। भारत की स्वतंत्र कैबिनेट में डा.आंम्बेडकर को कानून मंत्री बनाया गया।
15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हो चुका था। सबसे गंभीर समस्या यह थी कि देश के लिए संविधान की रचना किसके द्वारा कराई जाए। कांग्रेस के शीर्ष नेतागण इस सम्बन्ध में विचार-विमर्श में व्यस्थ हो गये। उन्हें चिन्ता सताने लगी आखिर संविधान विशेषज्ञ कहां से लाएं। अन्त में उन्होंने ऐशिया के अनेकों देशों के संविधान लिखने वाले आवर जैनिंग को आमंत्रित करने का निर्णय लिया।यह संदेशा विजय लक्ष्मी पंडित के जरिए दिया, जो उस समय यू.एन. ओ. की जनरल  असेम्बली की अध्यक्ष थीं। लेकिन जैनिंग ने कहा कि आपके देश में डा.आंम्बेडकर जैसा कानून का पंडित कोई नहीं है, उनको संविधान लिखने के लिए बुलाओ।
गांधी जी ने नेहरू को बताया हमारे ही देश में संविधान विशेषज्ञ हैं। वह व्यक्ति डा.आंम्बेडकर हैं। उनहोंने संविधान के सम्बन्ध में गोलमेज सम्मेलन में भी काम किया था,” गांधी जी ने इसकी जानकारी दी। सभी कांग्रेस के नेता डा.आंम्बेडकर के ज्ञान से पहले से ही परिचित थे।
तव बाबासाहेव को मजबूरी में संविधान लिखने के लिए नेहरू और गांधी ने कहा।
🎯 29 अगस्त 1946 को  संविधान प्रारूप समिति का गठन:
बाबासाहेव को  इस समिति का अध्यक्ष (चैयरमैन) बनाया गया। सविधान सभा के 296 सदस्यों में से  समिति में 6 अन्य सदस्य भी नियुक्त किये गये।
उनके नाम निम्न प्रकार थे-
1: अल्लादि कृष्णा स्वामी अय्यर
2: एन.गोपाला स्वामी अय्यर
3: के. एम. मुन्शी
4: सैय्मद मुहम्मद
सादुल्ला
5: बी.एल. मित्तर
6: डी.पी: खेतान
ये छ: सदस्य नाम मात्र के थे। संविधान का सारा कार्य बाबासाहेब ने ही किया।
🎯 ड्राफटिंग कमेटी की प्रथम बैठक 30 अगस्त 1946 को हुई तब से 141 दिन की बैठकें हुई जिसके दौरान 315  अनुच्छेदों और 8  अनुसूचियों वाली संविधान ड्राफ्ट किया गया। बाद में इसकी संख्या 386 हो गई और संविधान लागू होते-2 अनुच्छेदों की संख्या बढकर 395 धाराएं और 8 अनुसूचियां हो गई।
बाबा साहेब ने 21 फरवरी 1948 संविधान का मसौदा संविधान- सभा के अध्यक्ष के पास भेजा। संविधान का मसौदा 04 नवम्बर 1948 को मसौदा को संविधानसभा  के पास 8 महा सुझाव एवं संशोधन के लिए भेजा जिससे मसौदे पर चर्चा हुई। जिसे संविधान का प्रथम वाचन  (First Reading of Draft Constitution) कहा जाता है।
संविधान का  दूसरा वाचन (2nd Reading of Draft constitution) 15 नवम्बर 1948 को शुरू हुआ। जिस पर विस्तार से चर्चा हुई।
14 नवम्बर1949 संविधानसभा तीसरे वाचन (3rd&Last Reading of Draft  Constitution) के  लिए बैठी। जो 26 नवम्बर 1949 को समाप्त हुई। इसी दिन संविधान को संविधानसभा ने पास कर दिया। संविधान के इस  अंतिम रूप में 395 अनुच्छेद   और 8  अनुसूचियां थीं। संविधान निर्माण में (09.12.1946 से 26.11.1949) तक 2 साल 11 माह  18 दिन का समय लगा। उस समय संविधान का वजन 15÷2 (साढे सात ) शेर था। इस संम्पूर्ण  अवधि में बाबा साहेब ने अपने स्वास्थ्य की परवाह न करते हुए रात-दिन जागकर बडी ही मेहनत से संविधान निर्माण के कार्य को पूरा किया।इसलिए उनको संविधान का शिल्पकार कहा जाता है।
25 नवम्बर 1949 को संविधान के तीसरे वाचन में बाबा साहेब ने संविधानसभा में अपने आने का कारण स्पस्ट करते हुए कहा-

” मैं विधान परिषद में क्यों आया ? केवल अछूत वर्ग की रक्षा करने के लिए। इससे अधिक मुझे कोई आकांक्षा नहीं थी। यहां आने पर मुझे इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जायेगी, इसकी मुझे कल्पना तक नहीं थी। विधान परिषद ने जब मुझे मसविदा -समिति में नियुक्त किया, तब तो मुझे आश्चर्य हुआ ही, परन्तु जब मसविदा -समिति ने मुझे अपना अध्यक्ष चुना, तो मुझे आश्चर्य का धक्का सा लगा। विधान परिषद  और मसविदा-समिति ने मुझ पर  इतना विशावास करके मझसे यह काम करवा लिया और देश की सेवा करने का अवसर मुझे दिया, इसके लिए मैं उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करता हूं।”

🎯 संविधान
दिवस:
26नवम्बर 1949 को संविधान विधिवत संविधानसभा के अध्यक्ष डा. राजेन्द्र प्रसाद को सौंप दिया था। जिस पर संविधानसभा के अध्यक्ष ने हस्ताक्षर कर किए।
इसीलिए इस दिन को “संविधान दिवस” के नाम से जानते हैं।
वैसे तो उस दिन से ही देश में भारतीय कानून लागू होना चाहिए था, लेकिन कांग्रेस ने अपने देश के लिए ‘पूर्ण स्वराज्य’ की मांग रावी नदी के तट पर 26 जनवरी 1929 को दृढता से की थी।उस समय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। कांग्रेस ने उस  26 तारीख और जनवरी महीना को
ऐतिहासिक बनाये रखने के लिए ही भारतीय संविधान को स्वीकारने के  2 महीना बाद 26 जनवरी 1950 से लागू किया था।
🎯संविधानसभा में उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा था-
” संविधान कितना भी बेहतर हो, यदि उस पर  अमल करने वाले निकम्मे हो, तो वह बुरा हो सकता है। यदि इसे अमल करने वाले अच्छे हैं, तो बुरा संविधान भी अच्छा हो सकता है।”
🎯 भारतीयों को   कठोर शब्दों में सावधान करते हुए डा.आंम्बेडकर:
“26 जनवरी 1950 को हम राजनीतिक रूप में समान  और  सामाजिक  एवं आर्थिक रूप में असमान होंगे। जितना शीघ्र हो सके हमें यह भेदभाव   और पृथकता दूर करनी चाहिए यदि ऐसा न किया गया तो वह लोग जो इस भेदभाव का शिकार हैं राजनीतिक लोकतंत्र का धज्जियां उड़ा देंगे जो इस संविधान सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है।”

🎯 बाबा साहेब ने देश की आजादी की चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा-
“26 जनवरी 1950 को देश स्वतंत्र हो जायेगा, परन्तु उसकी स्वतंत्रता का क्या होगा ? क्या वह  अपनी स्वतंत्रता कायम रखेगा या पुन: खो देगा ? उनका इशारा था कि अतीत में आन्तरिक गड़बड़ियों, गद्दारियों और विश्वासघात के कारण देश  एक बार अपनी आजादी खो चुका है, यदि हमने सबक नहीं लिए तो देश को पुन: गुलाम होने से कोई नहीं बचा पाएगा।”
उन्होंने आगे कहा-“अत: अपनी स्वतंत्रता को खून की अन्तिम बूंद तक हमें रक्षा करने हेतु दृढ संकल्प लेना चाहिए।”

🎯 गणतंत्र
दिवस:
26 जनवरी 1950 के दिन को कहते हैं। आज से देश का शासन भारतीय संविधान के कानून से चलना शुरू हुआ।

🎯सर्वोत्तम संविधान निर्माता:
5 जून 1952 को संसार के सर्वोत्तम संविधान निर्माता के रूप में डा. भीमराव   आंम्बेडकर को अमेरिका कोलंबिया विश्वविद्यालय ने
( डाक्टर आफ लाज  एंड लिटलेचर (एल. एल. डी.) उपाधि से सम्मानित किया।

🎯 बौद्ध धम्म
अंगीकार:
बाबा साहेब ने नागपुर की पवित्र भूमि पर 14 अक्टूबर 1956 में पूर्वजों का ‘बौद्ध धम्म’ स्वीकार किया। जो  भारत की मिट्टी में जन्मा और बढा हुआ। जिससे इस देश पर किसी भी प्रकार का कोई दबाब नहीं आया। बाबा साहेब ने अपना और अपने देश वासियों का सिर दूसरे देशों की तरफ नहीं झुकाया बल्कि संसार के दूसरे देशों का सिर भारत की तरफ झुका । भारत को बौद्ध धम्म की वजय से ही “विश्व गुरू” की ख्याति प्राप्त हुई।

🎯 चन्द्रपुर की बौद्ध  धम्मदीक्षा:
16 अक्टूबर 1956 को लगभग ढाई लाख लोगों को बौद्ध धम्म की दीक्षा देकर भगवान बुद्ध की मंगलकारी शरण प्रदान करायी।

🎯बाबा साहेब ड़ा. भीमराव  अम्बेड़कर का देश पर भारी एहसान:
यदि बाबा साहेब का मुंख मक्का-मदीना की तरफ हो जाता तो इस देश में हिन्दू और मुस्लिमों में ईंट से  ईंट बज जाती। यदि उनका मुंह यूरेशलम की तरफ हो जाता तो अंग्रेज आज तक भी देश से नहीं जाते। यह देश  आज तक भी गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ होता। बाबा साहेब ने यह कार्य  इसलिए नहीं किया क्योंकि वह महान देश भक्त थे।
🎯बाबासाहेव की प्रतिमा का अनावरण:
10 सितम्बर 2015 को बाबासाहेव की 125 वीं जयन्ती वर्ष में ‘कोयसाना विश्वविद्यालय वाकाम प्रान्त जापान’ में उनकी ब्रांज से बनी पूर्णाकृति प्रतिमा का अनावरण महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री देवेन्द्र फडणवीस  एवं वाकायामा प्रान्त के गवर्नर शिनाबु निसाका द्वारा प्रतिमा का लोकार्पण किया गया।
🎯 बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर के दर्शन:
नेपाल से आते हुए 30 नवम्बर1956 को बाबा साहेब ने बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली के दर्शन करके उसी दिन 4 बजे सफदरजंग हवाई अडडे दिल्ली पहुंचे। वे काफी थके नजर आ रहे थे।
🎯 कला प्रदर्शनी मथुरा रोड़ दिल्ली का अवलोकन:
1दिसम्बर 1956 शनिवार को बाबासाहेव ने भगवान बुद्ध की प्रतिमा के समक्ष नमन किया। बुद्ध की 2500वीं जयन्ती के उपलक्ष्य में भारत सरकार के द्वारा वर्तमान प्रगति मैदान, मथुरा रोड़ वाले स्थान पर  अर्थात सर्वोच्च न्यायालय के पीछे लगी प्रदर्शनी देखने गये। यह प्रदर्शनी बहुत कलापूर्ण तरीके से लगाई गई थी। मेरे बुद्ध महान हैं, मेरे बुद्ध महान हैं।इस वाक्य को दोहराते हुए वे वहां से चल दिए।
थोड़ी देर बाद वे कनाट प्लेस जा पहुंचे, वहां से अपनी मन पसंद पुस्तकें खरीदीं और वापिस अपने घर आ गए। घर  आकर  उन्होंने रत्तू जी को टाईप का कुछ काम सौंपा और स्वंय  अध्ययन करने में व्यस्त हो गये।

🎯अशोका मिशन बुद्ध विहार  महरौली नई दिल्ली समारोह में पदार्पण:
2 दिसम्बर 1956 को अशोका मिशन बुद्ध विहार महरौली में परमपावन दलाईलामा जी पधारने वाले थे।बाबा साहेब का स्वास्थय खराब होने पर समारोह में उपस्थित होने में असमर्थता व्यक्त की परन्तु आयोजकों के बार-बार विशेष  आग्रह पर सहमति दे दी। जैसे ही बाबासाहेव की कार  अशोका मिशन के परिसर में पहुची, लोगों  की भारी ने खड़े होकर जोरदार नारों से स्वागत किया।
🎯 बीमार नौकर का हालचाल जानने गये:
अगले दिन 3 दिसम्बर 1956 सोमवार को बाबा साहेव अपनी छड़ी के सहारे बंगले  के पीछे बने हुए सर्वेन्ट क्वाटर में  अपने बीमार सेवक रामचन्द्र को देखने गये और  उसका हाल सुनकर भावुक हो गए। उसके लिए नानक चन्द रत्तू के हाथों दवाई भिजवाई।
🎯कांग्रेस सरकार के विपक्ष के नेताओं के नाम पत्र:
अगले दिन 4 दिसम्बर 1956मंगलवार को महराष्ट्र में कांग्रेस सरकार के विपक्ष के नेता मा. पी. के. अत्रे और मा. एस. एम. जोशी के नाम दो पत्र लिखवाए।
🎯 जैन मुनियों के प्रतिनिधिमंडल से
मुलाकात:
अगले दिन  5 दिसम्बर 1956 बुद्धवार
को कडाके की सर्दी में मुंह हाथ धोकर  बुद्ध की मूर्ति के सम्मुख नमन करके बरामदे में व्यायाम करने आ गए। दोपहर को आराम किया। उसी समय  घर के बाहर उनके समर्थक, उनके अनुयायी दर्शन करने  आये, नानकचन्द रत्तु जी के रोकने पर  बाबासाहेव ने उन्हें आने देने के लिए कहा।
उसी दिन सांयकाल दो जैन मुनियों का प्रतिनिधिमंडल  उनके निवास पर उनसे मिलने आया।वे बाबासाहेव की वार्तालाप से प्रभावित हुए। उनके चले जाने पर बाबासाहेव ने ‘भगवान बुद्ध और  उनकाधम्म नामक पुस्तक पुर्ण होने पर  उसकी भूमिका लिख कर पूर्ण किया।
5 दिसम्बर 1956 की रात या 6दिसम्बर वीरवार की सुबह के प्रारम्भिक घंटों में अथवा कहिए कि 5 और6 दिसम्बर के बीच की रात में उनका परिनिर्वाण हुआ। कैसा विचित्र सत्य है कि कुशीनगर में आकर तथागत सम्यकसंम्बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ था। जबकि कुशीनगर से लौटकर बोधिसत्व बाबासाहेब डां. आंम्बेडकर परिनिर्वाण को प्राप्त हुए थे।
🎯 7 दिसम्बर 1956 को बोद्ध के अनुसार  उनका अन्तिम संस्कार हुआ। पांच लाख से अधिक लोगों ने शवयात्रा मेंभाग लिया। मुम्बई शहर की यह  अब तक की सबसे बड़ी शवयात्रा थी। उनके निवास स्थान राजगृह (दादर) से चैत्यभूमि (शिवाजी पार्क) तक का 3.5 किलोमीटर का सफर चार घंटे से भी अधिक समय में तय हो पाया था।
दादर चौपाटी स्थित शमशान भूमि में, जहां बाबासाहेब का दाह संस्कार सम्पन्न हुआ था, उनके श्रद्धा सम्पन्न  अनुयायि यों ने एक विशाल स्मारक स्तूप का निर्माण कर दिया।जिसे श्रद्धा और सम्मान के साथ चैत्यभूमि के नाम से जानते हैं। प्रत्येक वर्ष 6 दिसम्बर के पावन  अवसर पर  उनके लाखों अनुयायी का मेला उनकी पवित्र शरीर धातुओं के दर्शन करने के लिए उमड़ पडता है। बाबा साहेब के विशाल  अनुयायियों की संख्या देखकर मुम्बई का जल सागर भी शर्मा जाता है। बाबा साहेब के शरीर धातुओं के दर्शन का सिलसिला कई दिनों तक चलता रहता है।
सन्दर्भ:
1: दीक्षा भूमि, शांति स्वरूप बौद्ध

2:कोटिश:नमन के अधिकारी
बोधिसत्व        बाबासाहेब डा.बी.आर.  आंम्बेडकर,
इंजी. चन्द्रसैन
बौद्ध

३: बाबासाहेब डा.आंम्बेडकर कैसे पहुंचे संविधानसभा में पहुंचे,  जुगल किशोर बौद्ध
4: डा.अम्बेडकर जीवन  और मिशन,
एल. आर. बाली

“भवतु
सब्बमंगलं”

आपकी धम्म सेवा में
इन्जी. चन्द्रसैन बौद्ध
4 दिसम्बर 2015

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