बाबा साहब डॉ अम्बेडकर महान और आज भारत के तीन तरह के लोग …राहुल विमल


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अम्बेडकर जिन्हें आज बहुत से युवा बाबा साहेब के नाम से जानते है। एक ऐसा शख्स जिन्होंने भारतीय समाज में युवाओं को उनकी प्रतिभाओ के अनुसार एक नयी उडान भरने का रास्ता दिखलाया। अम्बेडकर की ही बदोलत युवाओं का हौसला बढ़ा है। समाज में सिर्फ़ आम ज़िंदगी जीना ही नहीं बल्कि यह भी समझाया की असल ज़िंदगी का मक़सद क्या है तुम्हारी निजी ज़िंदगी में। बाबा साहेब को आज भी बहुत सारे लोग एक तरफ़ें नज़रिए से देखते है- संविधान निर्माता और दलितों के मसीहा, मगर यह सच नहीं है।
Dr. Ambedkar with his associates of ‘Independent Labour Party’, A political party founded by Dr. Babasaheb Ambedkar in 1937. Photo Courtesy:www.navayan.com

आप जब भी अम्बेडकर की बात करते है या करेंगे तो उन्हें इन दो पैमानों को हट कर करने की कोशिश करीयेगा वरना ज़रूरत एवं अज्ञानता आपके साथ ही रह जाएगी। वजह इनके द्वारा किए गए असम्भव कार्य जिनमे से कुछ इस प्रकार है – नारी शशक्तिकारण (हिंदू कोड बिल),

मज़दूर क़ानून (बतौर पहले मज़दूर मंत्री के पद पर रहते), पैसे की परेशानी जिसकी वजह से रिज़र्व बैंक औफ इंडिया (आरबीआई) का गठन हुआ, काम करने की समय सीमा (आठ घंटे का काम), और यही नहीं पीपीएफ़, GPF,  प्रसव के दौरान औरतों को चिकित्सा अवकाश मिलना सब अम्बेडकर की ही देन है ।

जैसा कि भारत को हम और आप कई तरह से देखते है ठीक उसी तरह हमें यहाँ पर बात को स्पष्ट करने के लिए भारत में रह रहे समाज को तीन हिस्सों में बाँट कर समझने की कोशिश करेंगे।
तीन तरह का समाज…..
पहला – तार्किक बुद्धि,
दूसरा– उभरता हुआ युवा वर्ग और दूसरी भाषा में कहे तो कन्धकिया* समाज, जो की पढ़ा लिखा हुआ तो है मगर समाज के बहाव में बहना ज़्यादा पसंद करता है, और
तीसरा – अनपढ़, ज़मीनी बात को समझता है, साफ़ दिल का है, किसी की भी बातों में आसानी से आने वाला समाज।

पहला समाज – अम्बेडकर को समाज में सकारात्मक बदलाव होने की उम्मीद से देखता है। यह समाज हर सम्भव प्रयास करता है उन सकारात्मक बदलावों को हक़ीकत में बदलने के लिए। यह समाज अपने अस्तित्व को पहचानता है, समझता है की उसका जीवन का असल मक़सद क्या है। यह समाज बहुत दयालु है उन लोगों के लिए भी जो बदलाव लाने की सोच को अपने ज़हन में रखते है।
दूसरा समाज – अम्बेडकर को यह समाज एक सामाजिक अभिनेता के तौर पर देखते है। प्यार, आज़ाद ख़याल, अधिकार होने के मायने आदि यह सब बातें इस समाज को अम्बेडकर की याद दिलाते है। सिनेमा, हर दिन आने वाले कार्यक्रमों  से प्रभावित, अपनी तस्वीर को एक ख़ाब में संजोय कर जीवन को जीना इस समाज की पहचान बनता चला जा रहा है। यह समाज ख़ाब, व हक़ीक़त में चाह कर भी अंतर नहीं कर पता। अपने बनाए गए उसूल और आदर्श इस समाज में भरपूर मिलते है। इस समाज को मैं कन्धकिया समाज भी कहता हूँ । इस समाज की सबसे बड़ी पहचान – यह मौसम की तरह बदलना बहुत पसंद करता है। संघर्ष, अधिकार माँगने के लिए धरने फ़ैशन के एवज़ में करना ज़्यादा पसंद करता है। यह समाज भी बहुत कुछ करने की इच्छा रखता है मगर साफ़ समझ ना होने के कारण भटकाव जमकर रखता है।
तीसरा समाज – अम्बेडकर के नाम को भगवान की तरह जपने वाला यह समाज पहले व आज की सामाजिक व सरकारी अ-व्यवस्था के कारण आज भी अशाक्षर है। बहुत साफ़ और सरल भाषा में बात करना इस समाज को अच्छा लगता है। यह बहुत घुमावदार बात करने में अशक्षम है। मिशन, राजनीति इस समाज के लिए ज़िंदगी का एक मक़सद के बराबर है। यह अपनी ज़िंदगी की असलियत को समझता है एवं उस स्थिति को बदलने के लिए हर भरसक प्रयास भी करता है।
ऊपर बताई गयी सभी बातों को एक तरफ़ करके अम्बेडकर द्वारा बनाए गए संविधान को एक नज़र देखते है। भारत जैसे विशाल, विभिन्न जातियों, जनजातियो से भरपूर, अलग-२ भाषा, २९ राज्य होने के बावजूद पूरा भारत एक गति में आगे की और भड़ता चला जा रहा है, दुनिया में जिस तरह की परेशानी आजकल चल रही है उसे देख कर यह बात समझ में आती है की, इतना जटिल समाज होने के बाद भी भारत आज भी शांति से आगे भड रहा है। और यह सिर्फ़ और सिर्फ़ डॉ अम्बेडकर द्वारा बनाए गए संविधान की वजह से ही है?
बहुत बार सोच में पड़ जाता हूँ यह सोचकर कि, बाबा साहेब जैसे व्यक्ति जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में सिर्फ और सिर्फ पिताड़नाये, यातनाये, व सामाजिक बेदखली जैसी परेशानियों को ही देखा है फिर भी वो कैसे उस समाज का उत्थान कर गए जिस समाज को दिन में चलने भी नहीं दिया जाता था। आज के समय में अगर कोई व्यक्ति काम पर जा रहा हो ओर उसे मेट्रो ट्रेन के लिए ५ मिनट से ज़्यादा खड़ा होना पड़ जाए तो वो अपना आपा खोने के क़रीब पहुँच जाता है, और पटरी को इस तरह से निहारने लगता है जैसे ट्रेन उसकी नज़रों से जल्दी आ जाएगी। मगर उस समय काल में अम्बेडकर को तो ना पानी पीने की आज़ादी थी, ना नाई के पास बाल कटवाने की अनुमति, ना ही मटके से पानी पीने की, न क्लास में बैठके पढ़ने की अनुमति, ना घोड़ा बग्गी पर सवारी करनी आज़ादी और ना भी ऐसे बंदिशे जो आज के समय में किसी एक इंसासन पर लागू कर दी जाए तो वो कुछ ही दिनों में अपना दम तोड़ देगा या दिमाग़ी रूप से कमज़ोर। फिर भी अम्बेडकर उन सभी पिताड़नायो से लड़कर उनसे डटके मुक़ाबला किया वो दूसरा का हौसला भड़ाया।

अम्बेडकर ने अपनी ज़िन्दगी के सबसे दिल दहलाने वाले लम्हों से गुजर कर समाज व सभी भारतीयों के लिए वो कर दिखाया जो आज तक दुनिया में कोई कर नहीं पाया।

आज मैं जब भी अम्बेडकर का नाम लेता हूँ तो अपने अंदर एक ताक़त व कभी न ख़त्म होने वाली ऊर्जा को महसूस करता हूँ।
यक़ीन होना मुश्किल हो जाता है मेरे लिए कि, आज कैसे यह शक्श भारत में उठ रहे युवा समाज के नव्ज में बसा हुआ है? ऐसा नहीं है कि इनके अलवा कोई और नहीं आया कभी भारत में समाज के उत्थान के लिए। इनसे पहले बहुत आये थे जिन्होंने अपने स्तर पर बदलाव लाने की कोशिश को जारी रखा था। – ज्योतिभा राव फुले, शाहूजी महाराज, पेरियार, सावित्री बाई फुले, उद्धम सिंह, और कहे जाने के तौर पर गाँधी जी ने भी इस समाज के उत्थान  के लिए काम किया था।

Modern Manu. Photo Courtesy: DrAmbedkarBooks.com
अंत में एक ही बात बची है कहने को- “अगर अम्बेडकर ना होता तो मैं आज यहाँ नहीं लिख रहा होता”
बाबा साहेब के बारे ज़्यादा जानने के लिए…. कॉंट्रिब्यूशन औफ डा अम्बेडकर

राहुल विमल 

http://puranisoch.blogspot.in/2015/12/ambedkar.html?m=1

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