बहुजनो के लिए दशहरा जैसा या उससे भी बड़ा त्यौहार मनुस्मृति दहन दिवस 25 दिसंबर को होता है | मनुस्मृति दहन दिवस की हार्दिक शुभकामनायें


डॉ अम्बेडकर द्वारा जलाये गए मनुस्मृति कानून की हिंदी पुस्तक को फ्री डाउनलोड के लिए लिंक

https://drive.google.com/file/d/0BxcTXJRxuCcVc2Q0SDNfY2J0cEE/view?pref=2&pli=1

 

manusmriti-dahan-divas85 साल पहले, डा. आम्बेडकर ने रात्रि के 9 बजे हिन्दू भारत का तानाबाना बुनने वाली मनुस्मृति-मनु के कानून के दहन संस्कार का नेतृत्व किया था। वह क्रिसमस का दिन था। 25 दिसंबर, 1927। लपटों ने अंधेरे आकाश में उजाला फैला दिया था। कुछ लोगों कहना है की आम्बेडकर ने ब्राहमणों की इस पुस्तक को सार्वजनिक रूप से नष्ट करने का निर्णय आखिरी क्षणों में लिया था, यह जल्दी में किया गया दहन था। कुछ लोग इसे आम्बेडकर के जीवन की गैर-महत्वपूर्ण घटना भी बताते हैं। इन बातों में कोई दम नहीं है। यह कार्यकर्म एक से नए साल की पूर्व संध्या पर जलाई जाने वाली बॉनफायर था, जिसमें एक बूढ़े व्यक्ति का पुतला जलाया जाता है। यह बूढ़ा व्यक्ति प्रतीत होता है पुराने साल का जो नए साल को जगह दे रहा है।
सन् 1938 में डॉ. आम्बेडकर ने टीवी परवटे को दिए गए एक साक्षात्कार में कहा था मनुस्मृति दहन हमने जानते-बुझते किया था। हमने यह इसलिए किया था क्योंकी हम मनुस्मृति को उस अन्याय का प्रतीक मानते हैं जो सदियों से हमारे साथ हो रहा है। उसकी शिक्षाओं के कारण हमें घोर गरीबी में जीना पड़ रहा है। इसलिए हमने अपना सब कुछ दांव पर लगाकर, अपनी जान हथेली पर रखकर यह काम किया (राइटिंग एंड स्पीचिज ऑफ डॉ. बाबा साहब इतिहास दिसंबर, २०१२) उस इतिहास निर्मात्री क्रिसमस की रात सभी कार्यकर्ताओं ने पांच पवित्र संकल्प लिए।
1. मैं जन्म-आधारित चतुर्वर्ण में विश्वास नहीं रखता।
2. मैं जातिगत भेदभाव में विश्वास नहीं रखता।
3. मैं विश्वास करता हूं की अछूत प्रथा, हिन्दू धर्म का कलंक है और मैं अपनी पूरी ईमानदारी और क्षमता से उसे समूल नष्ट करने की कोशिश करूँगा l
4. यह मानते हुए की कोई छोटा-बड़ा नहीं है, मैं खानपान के मामले में, कम से कम हिन्दुओं के बीच, किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करूँगा l
5. मैं विश्वास करता हूँ की मंदिरों, पानी के स़्त्रोतों, स्कूलों और अन्य सुविधाओं पर बराबर का अधिकार है।
छ:ह लोगों ने दो दिन की मेहनत से सभा के लिए पंडाल बनाया था। पंडाल के नीचे गडढा खोदा गया था, जिसकी गहराई छह इंच थी और लम्बाई व चौड़ाई डेढ़-डेढ़ फीट। इसमें चंदन की लकड़ी के टुकड़े भरे हुए थे। गड्ढे के चारों कोनों पर खंभे गाड़े गए थे। तीन ओर बैनर टंगे थे। क्रिसमस कार्ड की तरह झूल रहे इन बैनरों पर लिखा था – मनुस्मृति दहन भूमि। – ब्राहम्णवाद को दफनाओ। – छुआछूत को नष्ट करो । वे क्या सोच रहे थे ? उस समय डा. आम्बेडकर के दिमाग में क्या चल रहा था ? सन् 1927 का वह क्रिसमस भारत के लिए आज भी क्यों महत्वपूर्ण है ?आम्बेडकर के लिए स्मृति साहित्य और विशेषकर मनुस्मृति…जन्म न की योग्यता को व्यक्ति की समाज में भूमिका का निर्धारक बनाता था, शूद्रों को गुलामों का दर्जा देता था और महिलाओं को गुमनामी की जिंदगी देता था। (रॉड्रिग्स, इसेन्शियल राइटिंग्स ऑफ बीआर आम्बेडकर, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2002, 24)। इस संबंध में उनके लेखन से लिए गए डा. आम्बेडकर के प्रासंगिक विचार निम्नानुसार हैं: 1. मनुस्मृति : जला डालो * ऐसा लग सकता है की मैं भारत को कानून देने वाले मनु की अनावश्यक रूप से कटु आलोचना कर रहा हूं। परंतु मैं जानता हूं की मैं अपनी पूरी ताकत लगा दूं तब भी मैं उनके भूत को नहीं मार सक ता। वे बिना शरीर की आत्मा की तरह जीवित हैं और आज भी उनकी बात सुनी जाती है और मुझे भय है की वे बहुत लंबे समय तक जीवित रहेंगे।

https://incrediblecivilization.wordpress.com/2014/01/23/manusmriti-dahan/#more-442

 

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मनुस्मृति और अन्य बहुजन विरोधी दमन साहित्य के उदाहरण:

डॉ. भदंत आनन्द कौशल्यायन की एक पुस्तक है ” मनुस्मृति जलाई क्यों गई” उसमें से कुछ उदाहरण भारत के डरावने इतिहास के लिए बिलकुल उपयुक्त है| बहुजन साहित्य की एक पुस्तक है  “धर्म एक अफीम” प्रकाशक स्वाभिमान जाग्रति मिशन, दिल्ली,जहाँ मुझे सभी तरह के धार्मिक ग्रंथों में फैले धार्मिक आतंक के कानून एक ही जगह मिल गए| मैं सुक्रगुज़र हूँ इस पुस्तक के लेखक  शकील प्रेम का जिनहोने इस पुस्तक की सामग्री इस्तेमाल करने की कॉपी राईट परमिशन दी |इस पुस्तक में जिसमें सभी धर्मों का तुलनात्मक अध्यान किया गया है और धर्म व उसके ठेकेदारों को सारी अव्यवस्था और दुखों के लिए परोक्ष या अपरोक्ष रूप से  कारण पाया है|ये पुस्तक बहुजन साहित्य का नगीना है मैं  इसे पढने की सलाह अवस्य  देना चाहूँगा|  मनुस्मृति अर्थात उस समय का संविधान में लिखे कुछ कानूनों को देखिये जिनका कड़ाई से पालन होता था :

 

–          संसार में जो कुछ भी है सब ब्राह्मणों  के लिए ही है क्यूंकी वो जन्म से ही श्रेष्ठ है(मनुस्मृति 1/100)

–          राजा का ये कर्त्तव्य है की वह ब्राह्मणों की जीविकी निश्चित करे|जिस तरह पिता अपने पुत्र की रक्षा करता है उसी प्रकार राजा को भी ब्रह्मण की आजीविका के साधन का ध्यान रखना चाहिए (मनुस्मृति 7/135)

–          किसी भी आयु का ब्राह्मण पिता तुल्ये होता है , सौ वर्ष का वृद्ध क्षत्रीय भी १० वर्ष के बालक ब्रह्मण को पिता के बराबर ही समझे (मनुस्मृति 2/138)

–          धार्मिक मनुष्या इन नीच जाती वालों के साथ बातचीत ना करें उन्हें ना देखें (मनुस्मृति 10/52)

–          यदि कोई नीची जाती का व्यक्ति ऊंची जाती का कर्म करके धन कमाने लगे तो राजा को यह अधिकार है की उसका सब धन छीन कर उसे देश से निकल दे (मनुस्मृति 10/95)

–          बिल्ली नेवला चिड़िया मेंडक उल्लू और कौवे की हत्या में जितना पाप लगता है उतना ही पाप शूद्र यानि SC/ST/OBC की हत्या में है (मनुस्मृति 11/131 )

–          शूद्र यानि SC/ST/OBC  द्वारा अर्जित किया हुआ धन ब्रह्मण उससे जबरदस्ती छीन सकता है क्यूंकि उसे धन जमा करने का कोई अधिकार ही नहीं है (मनुस्मृति 8/416 )

–          स्वामी के द्वारा छोड़ा गया शूद्र भी दासत्व से मुक्त नही क्यूंकी यह उसका कर्म है जिससे उसे कोई नही छुड़ा सकता (मनुस्मृति 8/413)

–          चाहे वो खरीदा गया हो या नहीं लेकिन शूद्रों से सेवा ही करनी चाहिए क्योंकि शूद्रों की उत्पत्ति ब्रहमा  ने  ब्राह्मणों की  सेवा के उद्देश्य से ही की है (मनुस्मृति 8/412)

–          इन शूद्रों को शमशान,पहाड़ और उपवनों  में ही अपनी जीविका के कर्म करते हुए निवास करना चाहिए (मनुस्मृति 10/49)

–          इन नीच जाती वालों के लिए कफ़न ही इनका वस्त्र है, फूटे बर्तनों में ये भोजन करें,इनके आभूषण लोहे के हों और वे सदा भ्रमन की करते रहे तथा एक स्थान पर बहुत दिनों तक न रहें  (मनुस्मृति 10/52)

आधुनिक संविधान के निर्माता अंबेडकर ने सबसे पहले 25 दिसंबर 1927 को हज़ारों लोगों के सामने इस ”मनुस्मृति” नामक संविधान को जला दिया ,क्यूंकी ऐसे अन्यायी  संविधान की कोई आवश्यकता नही थी| भारतीय संविधान में आरक्षण का प्रावधान इसलिए दिया गया क्यूंकी इस देश की 85 प्रतिशत शूद्र जनसंख्या को कोई भी मौलिक अधिकार तक प्राप्त नही था,सार्वजनिक जगहों पर ये नही जा सकते थे मंदिर में इनका प्रवेश निषिध था सरकारी नौकरियाँ इनके लिए नहीं थी , ये कोई व्यापार नही कर सकते थे , पढ़ नहीं सकते थे , किसी पर मुक़दमा नही कर सकते थे , धन जमा करना इनके लिए अपराध था , ये लोग टूटी फूटी झोपड़ियों में, बदबूदार जगहों पर, किसी तरह अपनी जिंदगिओं को घसीटते हुए काट रहे थे|और यह सब ”मनुस्मृति” जैसे अन्य कई हिंदू/ब्राह्मण धर्मशास्त्रों के कारण ही हो रहा था कुछ उदाहरण देखिए-

 –          अगर कोई शूद्र वेद मंत्र सुन ले तो उसके कान में धातु पिघला कर डाल देना चाहिए- गौतम धर्म सूत्र 2/3/4….

–          सब वर्णों की सेवा करना ही शूड्रों का स्वाभाविक कर्तव्य है (गीता,18/44)

–          जो अच्छे कर्म करतें हैं वे ब्राह्मण ,क्षत्रिय वश्य, इन तीन  अच्छी जातियों को प्राप्त होते हैं जो बुरे कर्म करते हैं वो कुत्ते, सूअर, या शूद्र जाती को प्राप्त होते हैं (छान्दोन्ग्य उपनिषद् ,5/10/7)

 –          पूजिए विप्र ग्यान गुण हीना, शूद्र ना पूजिए ग्यान प्रवीना,(रामचरित मानस)

–          ब्राह्मण दुश्चरित्र भी पूज्यहनीए है और शूद्र जितेन्द्रीए होने पर भी तरास्कार योग्य है (पराशर स्मृति 8/33)

–          धोबी , नई बधाई कुम्हार, नट, चंडाल, दास चामर, भाट, भील, इन पर नज़र पद जाए तो सूर्य की ओर देखना चाहिए इनसे बातचीत हो जाए तो स्नान करना चाहिए (व्यास स्मृति 1/11-13)

–          निर्माण,चित्रकारी,कारीगरी,कृषी तथा पशुपालन यह सब नीच कर्म है(अनुशासन पर्व अ० २३श्लोक १४और२४—) (अनुशासन पर्व अ०90श्लोक६/८/9) (अनुशासन पर्व अ०135श्लोक 11)

ये उन असंख्य नियम क़ानूनों के उदाहरण मात्र थे, जो आज़ाद भारत से पहले देश में लागू थे| ये अँग्रेज़ों के बनाए क़ानून नहीं थे ये हिंदू धर्म द्वारा बनाए क़ानून थे जिसका सभी हिंदू राजा पालन करते थे| इन्ही नियमों के फलस्वरूप भारत में यहाँ की विशाल जनसमूह के लिए उन्नति के सभी दरवाजे बंद कर दिए गये या इनके कारण बंद हो गये, सभी अधिकार, या विशेष-अधिकार, संसाधन, एवं सुविधायें कुछ लोगों के हाथ में ही सिमट कर रह गईं, भारत के जनता में आपसी फूट इतनी बहुतायत में हो गई की विदेशी आक्रमण जैसे महा संगठन कारक के आगे भी  लोग संगठित होने को तयार नहीं हुए जिसके परिणाम स्वरूप भारत गुलाम हुआ| हाय! विशुद्ध भारतीय मौर्य साम्राज्य की हार के साथ ही भारत का भाग्य फूट गया|

चंद  बुद्धिमान मनुवदिओ ने जिन्दगी का नियम “अगर आपकी संख्या कम है तो बहुसंख्य लोगों में फूट डालो शाशन करो”  पर चलकर केवल अपने निजी फायदे के लिए भारत में वर्ण व्यस्था फैलाई अर्थात देश को जातिओं में बाँट दिया| ये समाज का  एक ऐसा बटवारा था जिसकी वजह से भारत वर्ष में चाहे कहीं से कोई भी विदेशी आ जाये शाशन करने और हराने में कामयाब रहा, और ये मनुवादी उनके राजदरबार में उनके सहयोगी रहे | केवल  सौ-दौसो  घुडसवार लुटेरों का जत्था अता था और भारतवर्ष को लूट कर चला जाता था,टैक्स लेने वाले राजा सुरक्षा तक प्रदान नहीं कर पाते थे|इनके डर से लोगों ने अपना धन मंदिरों में रखना शुरू किया  तो विदेशी लुटेरों ने मंदिरों को लूटना शुरू कर दिया |इनमे से कुछ लुटेरों ने ये भांप लिए था की इस देश को हराना कितना आसान है फलस्वरूप भारत पर कई बड़े आक्रमण हुए और विदेशिओं के गुलाम रहे, ये तो शायद हम सभी जानते और मानते है| ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि वर्ण व्यस्था की वजग से भारत की आबादी का तीन चौथाई हिस्सा (ब्रह्मण,वैश्य  और शूद्र) को तो पहले ही न लड़ने का धर्म आदेश था बाकि बचे एक चौथाई क्षत्रिये वे आपस में ही लड़ कर इतने कमजोर  हो चुके थे की उनमे विदेशी आक्रमण का सामना करने की क्षमता नहीं थी | आज जब हमारी सेना में सभी धर्म जाती वर्ग प्रदेश के लोग हैं तो क्या ये लड़ने योग्य सेना नहीं है? भारत का इतिहास विदेशी आक्रमणों की हार और लूटपाट से भरा पड़ा है, ऐसे डरावने इतिहास की वजह  महास्वार्थी मनुवादी लोग और उनके  धर्म शास्त्र हैं यही भारत की गुलामी का मूल कारन है | मनुवदिओ का सारा धर्म शास्त्र केवल उनके खुद के भले के लिए है उससे किसी का कभी कोई भला नहीं हुआ न ही कभी होगा | शकील प्रेम ने कहा है

“हमारी शिक्षा व्यवस्था हमें यह तो बताती है की हम दो हजार वर्षो से गुलाम थे परन्तु इस बात पर मौन हो जाती है की गुलाम क्यूँ थे ,हमारी गुलामी का कारन विदेशी आक्रमण नहीं थे बल्कि इसका कारण था हमारा धर्म और हमारी धर्मभीरुता ,जब जब हमारे ऊपर संकट आये तब तब हमने उनका सामूहिक हल ढूंढने के बजाये किसी अवतार के आने की प्रतीक्षा में भजन गाते रहे|”

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