एक तरफ जनसँख्या का लगभग 10% सेठों पूंजीपतियों,देश की समस्त धन,धरती और संसाधन के कब्जेदारों, जुल्मियों, कट्टरवादियों और उनके वफादारों का गठजोड़ और दूसरी तरफ है 90% भारतवासी मजलूम जनता, और इन दोनों के बीच खड़ा है भारत का अम्बेडकर संविधान,90% जनता के लिए न्याय की एकमात्र उम्मीद, आओ ऐसा संविधान लागू होने वाला दिन गणतंत्र दिवस मनाएं क्योंकि यहीं है हमारा सबसे बड़ा त्यौहार|आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

ambedkar-samvidhan sadhyeएक तरफ जनसँख्या का लगभग 10% सेठों पूंजीपतियोंब्राह्मणवादी विचारधारा के ताकतवर संगठन,देश की समस्त धन,धरती और संसाधन के कब्जेदारों, जुल्मियों, कट्टरवादियों और उनके पक्ष में लड़ने को तैयार लडाकी कौमों और वफादारों का गठजोड़ और दूसरी तरफ है 90% भारतवासी मजलूम जनता, और इन दोनों के बीच खड़ा है भारत का अम्बेडकर संविधान,90% जनता के लिए न्याय की एकमात्र उम्मीद, आओ ऐसा संविधान लागू होने वाला दिन गड्तंत्र दिवस मनाएं क्योंकि यहीं है हमारा सबसे बड़ा त्यौहार|आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

 

25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में गणतंत्र दिवस पर डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर द्वारा दिए वक्तव्य के संपादित अंश 

26 जनवरी 1950 को भारत एक गणतंत्र होगा यानि इस दिन से देश जनता के लिए जनता से जनता के द्वारा संचालित होगा. लेकिन यहाँ भी मेरे मन में वहीँ विचार आता है कि देश के जनतंत्र का क्या होगा? क्या हमारा देश गणतंत्र को संभाल पायेगा या वह इसे खो देगा? यह दूसरा विचार भी मुझे पहले की ही तरह बेचैन कर देता है.

ऐसा नहीं है कि भारत यह नहीं जानता कि गणतंत्र क्या है? एक समय था जब भारत में बहुत से गणतंत्र हुआ करते थे, यहाँ तक कि राजतंत्र में राजा का पद भी चुनाव से ही निर्धारित होता था. ऐसा भी नहीं कि भारत संसद और संसदीय कार्यप्रणाली से अनभिज्ञ था.

यदि हम बौद्ध भिक्खु संघ का अध्ययन करें तो पाते हैं कि संघ गणतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप ठीक वैसे ही कार्य करते थे जैसे आधुनिक गणतंत्र. उनके बैठने, प्रस्ताव पारित करने, कोरम, व्हिप, वोटों की गिनती, निंदा प्रस्ताव और अन्य नियम बुद्ध ने संघ के लिए निर्धारित किये थे, शायद उन्होंने ये सारे नियम प्रचलित गणतंत्रो से ही लिए होंगे.

भारत में एक समय बाद यह जनतांत्रिक व्यवस्था लुप्त हो गयी. क्या अब यह दूसरी बार भी लुप्त हो जायेगी? मैं नहीं जानता, लेकिन भारत जैसे देश जहाँ हजारों साल तक जनतंत्र नष्ट रहा वहाँ दोबारा जनतंत्र का आगमन एक नई घटना है. लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि गणतंत्र को जिस बात से खतरा है वह तानाशाही है.

भारत जहाँ गणतंत्र अपने शैशव अवस्था में है वहाँ यह संभावना है कि देश में उपरी तौर पर तो लोकतंत्र रहे पर असल में तानाशाही स्थापित हो जाए. इस बात कि काफी हद तक सम्भावना है.

republic gadtantra

यदि हम चाहते हैं कि भारत में गणतंत्र केवल नाम के वास्ते न हो बल्कि असलियत में हो, तो हमें क्या करना होगा?

मेरे हिसाब से इसके लिए सबसे पहले यह ज़रूरी होगा कि हम अपने सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों को ही अपनाए. इसका मतलब हुआ कि यह ज़रूरी है कि हमें क्रांति के लिए खूनी संघर्ष के रास्ते को त्यागना होगा. यानि अब हमें सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रहों को भी त्यागना होगा.

जब आर्थिक और सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीके नहीं बचते तब किसी रूप में असंवैधानिक तरीकों को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है. लेकिन इन तरीकों को हमें अराजकता फ़ैलाने वाला समझ कर इन्हें अपना लक्ष्य हासिल करने के बाद तुरंत ही छोड़ दिया जाना चाहिए. हमारे लिए यही बेहतर होगा.

दूसरी बात भारत हमेशा से ही भक्ति और श्रद्धा कि मानसिकता का पालन करता रहा है, जिससे नायक पूजा का मार्ग प्रशस्त होता है. नायक पूजा अंततः तानाशाही को ही जन्म देती है.

तीसरी बात कि हम सिर्फ राजनीतिक गणतंत्र के बारे में ही नहीं सोचे बल्कि हमें अपने राजनीतिक गणतंत्र को सामाजिक गणतंत्र भी बनाना होगा. राजनीतिक गणतंत्र तब तक कायम नहीं रह सकता जब तक कि उसका आधार सामाजिक गणतंत्र न हो. प्रश्न उठता है कि सामाजिक गणतंत्र आखिर क्या होता है?

यह जीवन की वह शैली है जिसमें जीवन का सिद्धांत समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व हो. इन तीनों तत्वों को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता. भारतीय सन्दर्भ में समता का कोई नामो-निशान नहीं हैं सामजिक रूप से यहाँ वर्गीकृत असमानता है, मतलब एक जाति दूसरी से ऊँची या नीची है. आर्थिक आधार पर देखे तो यहाँ कुछ लोग अपार धन-दौलत वाले हैं तो कुछ भीषण गरीबी से जूझ रहे हैं.

26 जनवरी 1950  को हम ऐसे विरोधाभास में प्रवेश कर रहे हैं. राजनीति में हम समता मिलेगी पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में हमें विषमता मिलेगी. राजनीति में हम एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को अपनाएंगे लेकिन अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में विषमता पायेंगे क्योंकि वहाँ हमारी सामाजिक संरचना के अनुरूप हम एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को खारिज करते हैं.

आखिर हम कब तक सामाजिक-आर्थिक जीवन में समता को खारिज करते रहेंगे?

यदि हम लंबे समय तक समता को नहीं स्वीकारेंगे तो हमारा राजनीतिक गणतंत्र भी लंबे समय तक कायम नहीं रह पायेगा. हमें इस विरोधाभास को जितना जल्द हो दूर करना होगा नहीं तो वे लोग जो विषमता का शिकार हो रहे हैं इस राजनीतिक गणतंत्र की संरचना को उखाड फेकेंगे जिसे इस देश की संसद ने बड़ी मेहनत से तैयार किया है.

~~~

25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में डॉ बाबासाहेब आम्बेडकर द्वारा दिए वक्तव्य के संपादित अंश. अंग्रेज़ी भाषा में मूल आलेख डॉ बाबा साहेब आम्बेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेस वोल 13, के पृ. 1213-1218 पर उपलब्ध है.                                                                                  हिंदी अनुवाद:रत्नेश कुमार,

Source: http://www.neelkranti.com/2013/01/25/dr-ambedkar-on-republic-day-26-january-1950/

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भारत का संविधान लागू होने वाला दिन गणतंत्र दिवस (26 January) और बाबा साहब डाँ. आंबेडकर… यतिन जाधव

ambedkar and rajendra samvidhan-:¤>>गणतंत्र दिवस और डाँ. आंबेडकर <<¤:-

आज गणतंत्र दिवस है, हमारे देश के सभी सरकारी गौर सरकारी विभागों, स्कूलों कालेजोँ में यह दिवस 26 जनवरी “गणतंत्र दिवस” बड़े धूमधाम से तैयारियों के साथ बड़ी – बड़ी झाँकिया, रैलीयाँ निकालकर मनाया जाता है। लेकिन क्यों मनाया जाता है? जानने पर एक ही जवाब मिलता है की, इस दिन हमारे देश का संविधान लागू हुआ था। लेकिन उस संविधान के रचियता का नाम दूर – दूर तक कोई नही लेता।

जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था, तब मुझे इस दिवस को लेकर बड़ी उत्सुकता थी, और इसके बारे में गहनता से जानना चाहता था। उस समय मैंने भारतीय इतिहास को पढ़ना जरूरी समझा, मेरे सामने एक नाम डाँ. आंबेडकर बार – बार आ रहा था।

दोस्तों
15 अगस्त सन् 1947 को हमारा देश विदेशी हुकुमत से आजाद हुआ, हमारे देश ने भले ही ब्रिटिश राज से स्वतंत्रता पाली थी, लेकिन दूसरे देशों की तरह भारत का उस समय तक कोई संविधान नहीं था। हमारे देश का दर्जा एक ब्रिटिश उपनिवेश का ही था। यहाँ अंग्रजों का आधिपत्य समाप्त नहीं हुआ था। सारे कानून अंग्रेजों के थे और लॉर्ड माउंटबेटन देश के गवर्नर जनरल थे। यह वह समय था जब हमारे देश को संविधान, कानून की अत्यंत आवश्यकता थी, आजादी के बाद स्वतंत्र राष्ट्र होने पर डां राजेन्द प्रसाद को सबसे पहले भारत का राष्ट्रपति बनाया गया। साथ पंडित जवाहर लाल नेहरू को प्रधानमंत्री पद कि शपथ दिलाई गयी। आजादी के समय बाबा साहेब डां अम्बेडकर विपक्ष के नेता थे, बावजूद इसके उनकी काबिलयत के बल पर उन्हें स्वतंत्र भारत का प्रथम कानून मंत्री बनाया गया, राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद का कहना था की हम आजाद तो हो गए, लेकिन आजाद राष्ट्र को चलाने के लिए हमें स्वंय के संविधान की आवश्यकता होगी, जिसका पालन करके राष्ट्र पर शासन किया जा सके।

दोस्तों
इस मुद्दे पर विभिन्न नेताओं के अलग – अलग विचार थे, पंडीत नेहरू जो प्रधान मंत्री थे, वे चाहते थे किसी अंग्रेज (विदेशी) से संविधान निर्माण कराया जाए जो अनूठा और श्रेष्ठ हो, तब नेहरू ने इस विषय पर गाँधी से विचार विमर्श किया, तब गाँधीने कहा – तुम्हारे पास देश में सबसे बड़ा कानून एंव संविधान का विशेषज्ञ डाँ. भीमराव आंबेडकर है तब इधर-उधर जाने की क्या जरूरत? उनके बाद नेहरू ने राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद से बात की तो उन्होंने बताया कि ‘‘डाँ. आंबेडकर को देश विदेश के सभी संविधानों की जानकारी बहुत अच्छी तरह से है, इसलिए मैं चाहता हूँ कि भारत का नया संविधान डाँ. आंबेडकर ही बनायें, क्योंकि इन्होंने हर देश में रहकर कानून को अच्छी तरह देखा परखा है, इनसे अच्छा दूसरा व्यक्ति और कोई नहीं, जो कानून का निर्माण कर सके’’

सभी नेताओं के विचार विमर्श के बाद डाँ. आंबेडकर को संविधान ड्राफ्टिँग कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया। साथ ही डाँ. आंबेडकर को कहा गया की संविधान सरल और शक्तिशाली हो।

संविधान निर्माण समिति में सात सदस्य थे। उनमें से अचानक एक की मृत्यु हो गई। एक सदस्य अमेरिका में जाकर रहने लगे और एक सदस्य ऐसे जिनको सरकारी काम काज से ही अवकाश नहीं मिल पाया था। इनके अतिरिक्त दो सदस्य ऐसे थे जो अपना स्वास्थय ठीक न रहने के कारण वे सदा दिल्ली से बाहर रहते थे। इस प्रकार संविधान निर्माण समिति के पाँच ऐसे थे जो समिति के कार्यों में सहयोग नहीं दे पाये थे। डाँ. आंबेडकर ही एक ऐसे सदस्य थे, जिन्होंने अपने कंधों पर ही संविधान निर्माण का कार्यभार संभाला था। जब संविधान बन गया तब एक – एक प्रति डाँ. राजेन्द्र प्रसाद एवं पंडित जवाहरलाल नेहरू को दी । उन्हें संविधान, सरल और सर्वश्रेष्ठ लगा। सभी लोग डॉ. भीमराव आंबेडकर की तारीफ करने लगे व बधाईयाँ दी गई।

दोस्तों
तभी एक सभा का आयोजन किया गया। जिसमें डाँ. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा- ”डाँ. आंबेडकर अस्वस्थ थे, फिर भी बड़ी लगन, मन व मेहनत से काम किया। वे सचमुच बधाई के पात्र हैं। ऐसा संविधान शायद दूसरा कोई नहीं बना पाता, हम इनके आभारी रहेंगे”

दोस्तों
बाबासाहेब डाँ. आंबेडकर एक अत्यंत प्रखर देशभक्त, कानूनविद्ध, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, वाक्ता, दार्शनिक और प्रबल राष्ट्रवादी विचारक थे।

जिंदगी के आखिरी पलोँ तक बाबासाहेब मनुष्य के मध्य समता – समानता और भाईचारे का सूत्रपात करने लहर प्रवाहित करने में लगे रहे। प्रजातंत्र और समानता उनके लिए पर्यायवाची शब्द बिल्कुल नहीं रहे। उनके अनुसार पूँजीवादी व्यवस्था के तहत मताधिकार का अधिकार उत्पीड़कों में से एक को चुन लेने का अधिकार मात्र है।

वास्तविक आवश्यकता एक ऐसे समाजकी संरचना करने की है, जिसके अंतर्गत शोषक और शोषित, उत्पीड़क और उत्पीड़ित वर्ग का फर्क स्वतः समाप्त हो जाए। ऐसे आर्थिक सामाजिक समत्व से परिपूर्ण समाज में प्रजातंत्र अपने वास्तविक रंग – रुप में प्रकट होगा।

धम्म प्रचारक / प्रसारक : – यतिन जाधव

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सामाजिक बहिष्कार या असहिषुणता (जिसे पहले छुआछूत कहते थे) उसका एक और मामला – विज्ञापनों को तरसता एक मूलनिवासी चैनल —-अशोक कुमार BBC

विज्ञापनों को तरसता एक मूलनिवासी  चैनल

  • 26 मार्च 2014

दलित टीवी चैनल

नागुपर में रहने वाले राजू मून और सचिन मून दोनों भाई हैं और केबल ऑपरेटर हैं. लेकिन साथ ही वो एक सैटेलाइट चैनल के मालिक भी हैं.

इस चैनल का नाम है ‘लॉर्ड बुद्धा टीवी’ जो राजू मून के अनुसार भारत का पहला ऐसा चैनल है, जो गौतम बुद्ध और दलितों के मसीहा कहे जाने वाले डॉ. अंबेडकर के विचारों और संस्कारों का प्रसार करता है.

ख़ुद दलित समुदाय से संबंध रखने वाले राजू मून इस चैनल के पीछे अपनी प्रेरणा के बारे में बताते हैं, “हम तो बहुत छोटे लोग हैं. हमारी हैसियत भी नहीं थी कि हम अपना चैनल शुरू कर सकें. लेकिन हमारा एक लक्ष्य था कि हमारा भी एक मीडिया होना चाहिए क्योंकि दलितों को मुख्यधारा के मीडिया में उचित जगह नहीं मिलती है.”

राजू मून के मुताबिक़ नागपुर में जहां अंबेडकर ने 14 अक्तूबर 1956 में बौद्ध धर्म स्वीकार किया, उसकी स्मृति और उनकी जयंती 14 अप्रैल के दिन शहर में दीक्षा भूमि पर हर साल लाखों लोग जुटते हैं. लेकिन उसे कभी मीडिया में स्थान नहीं दिया जाता.

उनके मुताबिक़, “इन आयोजनों के दौरान सभी चैनलों की दिलचस्पी सिर्फ़ तब पैदा होती है जब वहां कोई विवाद होता है.”

सीमित संसाधन

एक जगह खड़े होकर एक तरफ़ मैंने नज़र घुमाई तो स्टूडियो था, दूसरी तरफ देखा तो एक रसोई का दरवाज़ा खुलता है और उससे सटे हुए छोटे से कमरे में चार-पांच कुर्सियां पड़ी थीं. पूछा तो पता चला कि वह न्यूज़रूम है.

राजू मून बताते हैं कि 18 मई 2012 से उनका चैनल सैटेलाइट पर है जबकि इससे पहले एक साल तक वो लोकल केबल नेटवर्क के माध्यम से लोगों तक पहुंचा.

मुख्य तौर पर गौतम बुद्ध और डॉ. अंबेडकर समेत दलित आंदोलन से जुड़े नेताओं के विचारों और शिक्षाओं को समर्पित इस चैनल पर करियर, सेहत, संगीत और समाचारों से जुड़े कार्यक्रम भी आते हैं.

दिलचस्प बात यह है कि लॉर्ड बुद्धा टीवी की टीम में सिर्फ़ दलित समुदाय के लोग ही नहीं, बल्कि कई ब्राह्मण भी काम करते हैं. इन्हीं में एक हैं नेहा, जो सेहत और समाचारों से जुड़े कार्यक्रम की एंकर और प्रोड्यूसर हैं.

वो बताती हैं कि शुरू में उनके घर वालों और दोस्तों ने उनके लॉर्ड बुद्धा टीवी में काम करने पर ऐतराज़ जताया. वो बताती हैं, “शुरू में मेरे दोस्त कहते थे कि अरे ये तो ‘जय भीम’ (नवबौद्धों में नमस्ते के लिए इस्तेमाल होने वाला संबोधन) वाली हो गई है. शुरू में काफ़ी मुश्किलें हुई. पापा ने कहा चैनल बदलो. लेकिन आज मेरे पापा गर्व से बताते हैं कि मेरी बेटी एक सैटेलाइट बुद्धिस्ट चैनल में काम करती है.”

‘विज्ञापन नहीं’

नेहा का मानना है कि ये चैनल सामाजिक बदलाव की दिशा में एक क़दम है और केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार और महाराष्ट्र के आरआर पाटिल तक जैसे लोगों ने इसे देखा है.

लेकिन टीवी पर विज्ञापन देने वाली कंपनियों की इस पर नज़र नहीं है. राजू मून कहते हैं, “हमने कई कॉरपोरेट कंपनियों से विज्ञापन के लिए आवेदन किया, लेकिन उनसे कोई ख़ास जवाब नहीं मिला.”

फिर चैनल चलता कैसे है, इस पर राजू मून कहते है कि कुछ संस्थाओं से उन्हें मदद मिल रही है और साथ ही वो लोगों के जन्मदिन की शुभकामनाओं वाले विज्ञापन चलाते हैं.

दलित चैनल
Image captionचैनल का स्टूडियो दिखाते हुए राजू मून

वो बताते हैं कि जब भी उन्होंने विज्ञापनों के लिए प्रयास किया तो उनसे यही कहा जाता है कि उनके चैनल के दर्शक सिर्फ़ एक सीमित वर्ग के लोग ही होंगे.

लेकिन राजू मून का दावा है कि अब भारत के 17 राज्यों में उनके चैनल को देखा जा रहा है, साथ ही उनकी वेबसाइट पर इसे लाइव देखा जा सकता है. अभी तक ये चैनल किसी ‘डायरेक्ट टू होम’ सेवा का हिस्सा नहीं है लेकिन कई इलाक़ों में स्थानीय केबल नेटवर्क कंपनियों ने इसे अपने चैनल के बुके में शामिल किया है.

दिल्ली में रहने वाले राहुल मौर्य भी इस चैनल के दर्शकों में शामिल हैं. वो कहते हैं, “ये चैनल सिर्फ़ बौद्ध लोगों के लिए नहीं है, बल्कि इसमें बताई जाने वाली बातों को कोई भी अपने जीवन में अपना सकता है.”

वो कहते हैं कि इस चैनल पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रम बेशक एक धर्म से प्रेरित हैं लेकिन वो टीवी पर आने वाले उन कार्यक्रमों से कहीं बेहतर हैं, जिनके ज़रिए ज्योतिष और तंत्र मंत्र को बढ़ावा दिया जाता है.

नाटकीयता

एड गुरु प्रहलाद कक्कड़ का कहना है कि विज्ञापन मिलने या न मिलने का इससे कोई मतलब नहीं है कि चैनल दलित का या किसी और का, बल्कि ये इस बात पर निर्भर होता है कि उसे देखते कितने लोग हैं.

भारतीय मीडिया
Image captionभारतीय मीडिया में दलितों के उचित प्रतिनिधित्व का सवाल अकसर उठाया जाता है

वो कहते हैं, “आज टीवी कार्यक्रमों में जितनी नाटकीयता होगी, उतने ही ज़्यादा लोग उन्हें देखते हैं. जहां तक बात किसी धार्मिक चैनल की है तो अगर आप उस ख़ास धर्म के नहीं हैं तो आपको उसके कार्यक्रम बहुत बोरिंग लगेंगे. प्रस्तुति प्रभावी नहीं होगी तो लोगों में इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं होगी कि किस धर्म का कौन भगवान है और उन्हें कैसे देवत्व मिला”

वो कहते हैं कि विज्ञापन दाताओं को आकर्षित करने के लिए कार्यक्रम अच्छे होने चाहिए और दूसरा उन्हें देखने वाले दर्शक होने चाहिए.

लेकिन लॉर्ड बुद्धा टीवी के निदेशकों में से एक भैयाजी खैरकर कहते हैं कि ये चैनल मीडिया में दलित और नवबौद्धों की जगह बनाने की दिशा में एक क़दम है क्योंकि भारत की जातिवादी व्यवस्था में मीडिया भी निष्पक्ष नहीं रहा है.

इसके लिए वो एक मिसाल देते हैं, “जब प्रकाश झा की ‘आरक्षण’ फ़िल्म को लेकर विवाद हुआ तो तमाम टीवी चैनलों पर बहसें हुई, लेकिन उन बहसों में कहीं डॉ. अंबेडकर का नाम कभी सुनने को नहीं मिला. क्या आरक्षण पर बहस में उस व्यक्ति का नाम एक बार भी नहीं आएगा जिसकी वजह से वो व्यवस्था अस्तित्व में आई.”

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक औरट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

http://www.bbc.com/hindi/india/2014/03/140325_dalit_series_channel_election2014spl_aa?SThisFB

रोहित वेमुला के बारे में फैलाए जा रहे झूठ …पढ़िए वे 7 तथ्य…जो आपको भ्रम से निकालेंगे…

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रोहित वेमुला के बारे में फैलाए जा रहे झूठ के पांव काटने जरूरी हैं…
पढ़िए वे 7 तथ्य…जो आपको भ्रम से निकालेंगे…
रोहित वेमुला नहीं रहा, मगर आपके सवाल जारी हैं. आपके सवालों का जवाब इसलिए दे रहा हूं ताकि कुछ लोग भ्रमजाल में न फसें. बांकी जो लोग गुंडों को बचाने के लिए भ्रम फैला रहे हैं, उनका कोई इलाज नहीं…
……………………………
1. वह आतंकवाद का समर्थक नहीं, फांसी की सजा का विरोधी था. उसने याकूब मेनन का समर्थन नहीं किया था, उसका कहना था फांसी की सजा देना अमानवीय है.
2. हां, उसने बीफ पार्टी आयोजित की. क्योंकि बीफ खाना अपराध नहीं. गोहत्या पर प्रतिबंध है. बीफ का मतलब गाय नहीं होता. भैंस और बैल का मांस भी बीफ होता है और वृषभ और भैंसों की बलि हिंदू आज भी देते हैं. दलित इनका मांस आज भी खाते हैं.
3. उसने कैंपस में हिंसा नहीं की थी. एबीवीपी के नेता ने झूठ बोलकर उसे फंसाया था. बाद में उस नेता सुशील कुमार ने कुबूल किया कि वह अस्पताल का जो फोटो दिखा रहा था, वह दरअसल उस वक्त एपेंडिक्स का आपरेशन करवा रहा था.
4. उस पर कोई मुकदमा नहीं चल रहा है. एबीवीपी ने विवि पर सजा लागू करने के लिए मुकदमा किया था. जिसके दबाव में विवि को सजा लागू कराना पड़ा.
5. यह उसकी सदाशयता है कि वह सुसाइड नोट में किसी को जिम्मेदार नहीं बता रहा. वह एबीवीपी नेता सुशील कुमार जैसा नहीं है जो एपेंडिक्स के ऑपरेशन के फोटो के जरिये पांच दलित छात्रों का कैरियर बरबाद करने की साजिश रचे.
6. और हां कुछ लोग बता रहे हैं कि 2013 से पहले वह राष्ट्रवादी था, उसके बाद दिग्भ्रमित हो गया. तो उन्हें बताना चाहिये दलित उनके राष्ट्रवाद से क्यों दिग्भ्रमित हो जाते हैं. राष्ट्रवाद दलितों-आदिवासियों को समेट कर क्यों नहीं रख पाता. अपनापन देने में विफल क्यों हो रहा.
7. लोग यह भी कह रहे हैं कि रोहित दलित नहीं था, पिछड़ा था. तो, मेरी निगाह में तो वह अगड़ा था, क्योंकि जेनरल केटोगरी का टॉपर था, सोच में ज्यादातर अगड़ों से आगे था. संवेदनशीलता में भी. हां, तकनीकी तौर पर उसकी मां दलित थी और पिता पिछड़े. वह नेता दलितों का था…
…………………….
Pushya Mitra जी के यहाँ से Copy Paste

https://www.facebook.com/om.sudha.7/posts/912509515512714

for more: 

http://khabar.ndtv.com/news/india/in-rohith-vemulas-suicide-note-a-scratched-paragraph-raises-questions-1268697

http://www.bbc.com/hindi/india/2016/01/160122_rss_rohith_vemula_reacton_ra.shtml?ocid=socialflow_facebook

रोहित वेमुळे की दबाव में हुई मौत पर सारा देश सड़कों पर उतर आया, दलित वर्ग को जिंतना कमजोर करके आंका वो अब उतने कमजोर नहीं निकले| परिणाम सरकार को सफाई देनी पड़ी, आप क्या समझते हैं ये आपके अपने विवेक पर है| आज सरकार से सारा देश ये चाहता है की ऐसी घटनाओं से सबक लेकर सरकार को सिस्टम दुरुस्त करना चाहिए ,गुनहगारों को सजा देनी चाहिए ताकि ऐसी नाइंसाफी दोबारा न हो, देश आपकी सफाई का क्या करेगा, वहां बैठे हैं तो आप न्याय कीजिये …बुद्धकथाएँ

बुद्धकथाएँ
WP_20160121_002 rohith-vermulaस्मृति ईरानी के बयान के खिलाफ हैदराबाद यूनिवर्सिटी के SC/STके 10 प्राफेसर्स ने प्रशासनिक पदों से इस्तीफा दे दिया है। साथ ही हैदराबाद यूनिवर्सिटी के SC/ST संघ ने मानव संसाधन मंत्री
पर तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश करने का आरोप लगाया हैं और कहा है प्रोक्टोरियल बोर्ड की जांच कमिटी में कोई दलित शिक्षक नहीं था ,हॉस्टल वार्डर्न का दलित होना मात्र एक सयोग है उस के पास
दलित छात्रों को निष्कासित करने का कोई अधिकार नहीं है ?
आखरी “जय भीम” कह कर “रोहित वेमुला” आंबेडकर के मिशन के लिए
शहीद हो गए
क्या है पूरा मामला ?
हैदराबाद यूनिवर्सिटी के 26 वर्षीय दलित छात्र रोहित वेमुला रिसर्च स्कॉलर थे और सोशियोलॉजी में पीएचडी कर रहे थे । वे आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के सदस्य भी थे ,
अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के छात्र नकुल सिंह साहनी की फिल्म ‘मुजफ्फरनगर बाकी है’ के दिखाए जाने का समर्थन कर रहे थे। यह फिल्म दिल्ली विश्वविद्यालय में दिखाई जानी थी, जहां एबीवीपी
ने विरोध किया था। फिल्म दिखाने के समर्थन में अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के छात्रों ने हैदराबाद यूनिवर्सिटी में विरोध प्रदर्शन किया। इस कारण एबीवीपी के नेता ने ‘फेसबुक’ पर इन छात्रों को गुंडा
लिख दिया। बाद में एबीवीपी के नेता ने विश्वविद्यालय के सुरक्षा अधिकारियों के सामने लिखित माफी मांग ली। मगर अगले ही दिन एबीवीपी के नेता सुशील कुमार ने आरोप लगाया कि अंबेडकर स्टूडेंट्स
एसोसिएशन के तीस छात्रों ने उन्हें मारा-पीटा है और वे अस्पताल में भर्ती हैं। यह मामला अगस्त 2015 का है।
इन आरोपों की जांच के लिए प्रोक्टोरियल बोर्ड बैठा जिसने पाया कि सुशील कुमार को पीटे जाने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। मौके पर पहुंचने वाले सुरक्षा गार्ड ने भी कहा कि मारपीट की कोई घटना
नहीं हुई है, लेकिन वहां पर उन्होंने भीड़ देखी थी। सबूत नहीं मिला फिर भी अंतिम रिपोर्ट में बोर्ड ने पांच दलित छात्रों को एक सेमेस्टर के लिए निलंबित करने का फैसला किया। उसके बाद इन छात्रों ने
विरोध किया तो पूर्व वाइस चांसलर ने बुलाकर बात की और सजा को नए सिरे से जांच होने तक के लिए वापस ले लिया। 12 सितंबर 2015 को सजा वापस लेने के बाद पूर्व वीसी ने कहा कि नई कमेटी
जांच करेगी। इस बीच 21 सितंबर 2015 को नए वाइस चांसलर प्रो अप्पा राव आ गए, पुराने वाले बदल गए। नए वीसी ने कोई जांच कमेटी नहीं बनाई। विश्वविद्यालय की सर्वोच्च कार्यकारी समिति ने
अपने स्तर पर फैसला दे दिया और यह पांच छात्र हास्टल से निलंबित कर दिए गए। उनकी फैलोशिप रोक दी गई।
लेकीन मामला तब पलट गया जब कथित तौर पर भाजपा के सांसद और केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी को चिट्ठी लिखी थी, 17 अगस्त को लिखे लेटर में, दत्तात्रेय ने आरोप
लगाया था कि विश्वविद्यालय एक छात्र पर हमले को ‘खामोशी से देखता रहा’। लेटर में यूनिवर्सिटी को ‘अतिवादियों, जातिवादियों और राष्ट्रविरोधी राजनीति’ का गढ़ तक कहा गया।तब यूनिवर्सिटी ने अपना
फैसला पलट लिया था और21 दिसंबर को इन दलित छात्रों को हैदराबाद यूनिवर्सिटी ने छात्रावास से निष्‍कासित कर दिया गया था।यहां तक कि विश्‍वविद्याालय के हॉस्‍टल, मैस, प्रशासनिक भवन और
कॉमन एरिया में भी इनके घुसने पर रोक लगा दी गई थी। इन स्टूडेंट्स ने आरोप लगाया है कि उनका बाकायदा सामाजिक बहिष्कार किया गया।दलित छात्रों के इस ‘बहिष्‍कार’ के खिलाफ कई छात्र
संगठन विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे और इस मुद्दे पर विश्‍वविद्यालय में काफी दिनों से विवाद चल रहा था। रोहित समेत पांचों छात्र अपने निष्‍कासन के खिलाफ कई दिनों से कैंपस में खुले आसमान के नीचे
सो रहे थे।रोहित चुपके से यूनिवर्सिटी के एनआरएस हॉस्‍टल गए और खुद को एक कमरे में बंद कर खुदकुशी कर ली। बताया जाता है कि इससे पहले रोहित की विरोधी गुट के छात्रों के साथ तीखी बहस
हुई थी। पुलिस के मुताबिक, रोहित के पास से पांच पन्‍नों का एक सुसाइड नोट बरामद हुआ है। रोहित की खुदकुशी के लिए अंबेडकर स्‍टूडेंट्स एसोसिएशन ने विश्‍वविद्यालय प्रशासन के रवैये को
जिम्‍मेदार ठहराया है।
इस मामले में प्रदर्शन कर रहे छात्र संगठन के अनुसार हैदराबाद यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर अप्पा राउ भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पुराने सदस्य है जिस से फल स्वरूप उन को यह पद प्रपात हुआ है
और इस इलाके की ऊची जाति कुम्हा से तालुक रखते है और दलित छात्रों को हैं हीन भावना से देखते है
दलित छात्र की खुदकुशी के खिलाफ एसएफआई, डीएसयू, एआईएसएफ समेत कई छात्र संगठनों ने राज्‍य व्‍यापी बंद का आह्वान किया है पर इस में भाजपा का छात्र सगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी
परिषद (ABVP‌) शामिल नहीं हुआ है ,इस बीच केंद्रीय मंत्री दत्तात्रेय के अलावा हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कुलपति और कुछ अन्य लोगों के ख़िलाफ़ भी एससी-एसटी एक्ट और अन्य धाराओं के
तहत मामला दर्ज किया गया है.
अनुसूचित जाति और जनजाति (एससीएसटी) आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया ने कहा, “हमने प्रशासन से रिपोर्ट मांगी थी लेकिन वो अभी तक नहीं आई है. हमने आज दोबारा रिपोर्ट मांगी है. मै ख़ुद
हैदराबाद जा रहा हूँ और देखूँगा कि किस के ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी है.”
कांग्रेस नेता सीपीएन सिंह ने मीडिया से कहा कि देश के कई हिस्सों में दलितों के ख़िलाफ़ गतिविधियों की ख़बरें आ रही हैं.
कांग्रेस नेता अश्विनी कुमार ने कहा कि यदि ये एबीवीपी का विरोध करने के कारण हुआ है तो ये बहुत ही गंभीर मामला है और लोकतांत्रिक परंपराओं के ख़िलाफ़ है.
जो सवाल छूट गए ?
स्मृति ईरानी जी कहती है यह दलित और गैर दलित झगड़ा नहीं था तो फिर करवाई दलित छात्रों पर ही क्यों ?
हैदराबाद यूनिवर्सिटी में शोध छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी मामले में SC/STके 10 प्राफेसर्स ने प्रशासनिक पदों से इस्तीफा दे दिया है। उनका कहना है कि मानव संसाधन मंत्रालय इस मामले में
तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश कर रहा है। ऐसा क्यों ?
स्मृति ईरानी ने बुधवार को कहा कि प्रोटोकॉल कमिटी से लेकर एग्जिक्युटिव काउंसिल और उसकी सब कमिटी तक, कई स्तरों पर यूनिवर्सिटी के दलित प्रफेसर स्टूडेंट्स के निष्कासन संबंधी निर्णय में
शामिल रहे। यूनिवर्सिटी के दलित प्रफेसरों ने स्मृति ईरानी के इस बयान पर कड़ा ऐतराज जताया है। ऐसा क्यों ?
जय भीम

https://www.facebook.com/permalink.php?
story_fbid=1009614419096792&id=642452055813032&substory_index=0
http://www.bbc.com/hindi/indepth/rohith_vemula_dalit_student_ml?ocid=socialflow_facebook

देश में फिर किसी मूलनिवासी छात्र पर अन्याय न हो इसके लिए क्या आप 10 मिनट और दस रूपए खर्च कर सकेंगे, शायद इतना तो कर ही सकते हैं…दिलीप C मंडल FB पोस्ट

sangarsh dhyan vs ignoreक्या आपके पास 10 रुपये हैं?

अगर हैं तो उससे 10 रुपये का पोस्टल ऑर्डर खरीदिए. पोस्ट ऑफिस में मिलेगा. अब एक सादे कागज पर वह लिखिए, जो मैं लिख रहा हूं.

लोक सूचना अधिकारी/पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर,
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय,
शास्त्री भवन, नई दिल्ली – 110001

विषय – आरटीआई कानून के तहत सूचना के लिए आवेदन.

महोदया/महोदया,

कृपया मुझे ये सूचनाएं उपलब्ध कराएं. 10 रुपये का पोस्टल ऑर्डर संख्या…….. साथ में लगा दिया है.

1. देश के तमाम केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कितने वाइस चांसलर SC, ST, OBC के हैं. तमाम वाइस चांसलरों के नाम और उनकी कैटेगरी बताएं. उनके पद पर आने का वर्ष भी बताएं.

2. हर केंद्रीय विश्वविद्यालय की कैटेगरी वाइज यानी SC, ST, OBC वाइज जानकारी प्रो वाइस चांसलर, रजिस्ट्रार, प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के बारे में भी दें.

3. IIT के बारे में भी ये जानकारियां दें. हर IIT की अलग अलग और SC, ST, OBC कैटेगरी की अलग अलग जानकारी.

3. क्या यह सत्य है कि देश के 46 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में SC, ST, OBC के मिलाकर सिर्फ 2 वाइस चांसलर हैं और उनमें भी एक अनरिजर्व कैटेगरी से नियुक्त हुआ है?

धन्यवाद,

अपना पूरा नाम और पता. फोन नंबर भी दे सकते हैं. जवाब इसी पते पर आएगा.

……………

यह कागज एक लिफाफे में डालें. लिफाफे पर ऊपर दिया गया लोक सूचना अधिकारी का पता लिखे. बाईं ओर अपना नाम और पता लिखें. लिफाफे के ऊपर लिखें – RTI के लिए आवेदन.

इस लिफाफे को स्पीड पोस्ट या रजिस्टर्ड डाक से भेज दे. 30 दिन के अंदर आपको पता चल जाएगा कि भारतीय विश्वविद्यालयों में रोहित वेमुलाओं काrohith-vermula कत्ल क्यों होता है.

अगली RTI में इन्हीं जगहों पर महिलाओं की संख्या के बारे में पूछिए. धीरे धीरे आपको RTI डालने में मजा आने लगेगा. उसके बाद मेरी दी गई ट्रेनिंग की फीस आप अदा कर सकते है. smile emoticon

………….

 

आखरी “जय भीम” कह कर “रोहित वेमुला” आंबेडकर के मिशन के लिए शहीद हो गए| एक्लव्य ये देश शर्मिन्दा हैं दोणाचार्य अभी जिंदा है…..हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के रिसर्च स्कॉलर रोहित वेमुला हमें अफसोस है कि अपनी बात बहरों को सुनाने के लिए आपको मरना पड़ा. आपकी मौत ने इस देश की अंतरात्मा को, जो किसी कोने में दुबकी पड़ी थी, झकझोरने का काम किया है….आपको भी जय भीम ….

rahulएक्लव्य ये देश शर्मिन्दा हैं दोणाचार्य अभी जिंदा है

हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के रिसर्च स्कॉलर रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या का जिन्हें दुख या नाराजगी नहीं है, अगर कोई व्यक्ति ऐसे शोक के क्षणों में भी जाति, धर्म और संस्कृति या नस्ल के बंधनों से ऊपर उठकर सबके साथ मिलकर दुखी नहीं हो सकता, तो मान लीजिए कि वह देश का नागरिक नहीं, किसी कबीले का सदस्य मात्र है. उनका इंसान होना भी शक के दायरे मे है.
क्या आपको अपने आस पास ऐसे लोग नजर आते हैं?

अगर रोहित वेमुला पर शोक मनाने के लिए और नाराजगी जताने सिर्फ दलित बहुजन आगे आते हैं, हाशिमपुरा और भागलपुर दंगों या अखलाक के लिए अगर सिर्फ मुसलमान रोता है, लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार के लिए सिर्फ OBC या दलित दुखी होते हैं, भगाना या खैरलांजी अगर सिर्फ दलित महिलाओं का मुद्दा है, कंधमाल को लेकर शोक मनाने का दायित्व अगर सिर्फ ईसाइयों का है, दांतेवाड़ा का दर्द अगर सिर्फ आदिवासियों को होता है……. तो लोगों का नागरिक बनना तो छोड़िए, इंसान बनना भी पूरा नहीं हुआ है. वे अपने अपने कबीलों के सदस्य हैं, जिन्हें इतिहास ने एक नक्शे के अंदर रहने को मजबूर कर दिया है…..Dilip C Mandal
हमें अफसोस है रोहित वेमुला, कि अपनी बात बहरों को सुनाने के लिए आपको मरना पड़ा. आपकी मौत ने इस देश की अंतरात्मा को, जो किसी कोने में दुबकी पड़ी थी, झकझोरने का काम किया है. लोग धर्म, जाति, भाषा, प्रांत, लिंग जैसे तमाम बंधनों से ऊपर उठकर दुखी हैं, नाराज हैं. पूरे देश में सामूहिक शोक का माहौल है. यहां से कोई अच्छी बात की शुरुआत हो तो बात है. आदमी का इंसान बनना शुरू हो तो बात है. शिक्षा संस्थानों के कत्लगाह बंद हों, तो बात है. द्रोणचार्यों का अंत हो, तो बात है….Dilip C Mandal


आत्महत्या की चिट्ठी लिखते हुए भी अपनी फ़ेलोशिप का हक़ और दोस्त का कर्ज, दोनों याद रखने वाला आदमी आपको कायर लगता है तो आप बहुत बीमार हैं। मौत के वक़्त दोस्तों को ही नहीं दुश्मनों को भी न सताने की बात कहने वाला आदमी आपको कायर लगता है तो आप निरे जातिवादी दोपाया, जिसका कोई इलाज नहीं है। Om Sudha https://www.facebook.com/om.sudha.7?fref=t

 

 

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आखरी “जय भीम” कह कर “रोहित वेमुला” आंबेडकर के मिशन के लिए
शहीद हो गए, रोहित के क्रिमेशन की प्रतीकात्मक तस्वीर.rahul1

rohit vemula

http://navbharattimes.indiatimes.com/state/other-states/hyderabad/expelled-dalit-scholar-rohith-vemula-commits-suicide-in-university-of-hyderabad/articleshow/50626090.cms

 

http://navbharattimes.indiatimes.com/india/politics-protests-over-hyderabad-students-death/articleshow/50633936.cms

http://www.bbc.com/hindi/india/2016/01/160119_rahulgandhi_rohit_ia?ocid=socialflow_facebook

cartoon in the hindu