भारत देश की पहली शिक्षीका तथा मुख्याध्यापिका और सार्वजनिक जीवनचर्या को अंगीकार करनेवाली 19 वी सदी की पहली भारतीय महिला,राष्ट्रमाता सावित्रीमाई फुले इनकी ३ जनवरी २०१५ के १८४ वी जयंती के शुभ अवसर पर सभी मुलनिवासी समाज को हार्दीक शुभकामनाऐं तथा उनके विचारों को कोटी-कोटी प्रणाम!!! ….Team SBMT


सावित्रीबाई फुले (3 जनवरी 1831 – 10 मार्च 1897)phule foole

भारत देश की पहली शिक्षीका तथा मुख्याध्यापिका और सार्वजनिक जीवनचर्या को अंगीकार करनेवाली 19 वी सदी की पहली भारतीय महिला,राष्ट्रमाता सावित्रीमाई फुले इनकी ३ जनवरी २०१५ के १८४ वी जयंती के शुभ अवसर पर सभी मुलनिवासी समाज को हार्दीक शुभकामनाऐं तथा उनके विचारों को कोटी-कोटी प्रणाम!!!

स्वयं राष्ट्रपिता फुलेजी ने उनके योगदान के संबंध में कहा है|-“अपने जीवन में जो कुछ भी कर सका उसमे मेरी पत्नी का बहुत बडा योगदान है|”
भारत की एक समाज सुधारिका एवं मराठी कवयित्री थीं। उन्होने अपने पतिमहात्मा ज्योतिराव फुलेके साथ मिलकर स्त्रियों के अधिकारों एवं शिक्षा के लिए बहुत से कार्य किए। सावित्रीबाई भारत के प्रथम कन्या विद्यालय में प्रथम महिला शिक्षिका थीं। उन्हें आधुनिक मराठी काव्य की अग्रदूत माना जाता है। १८५२ में उन्होनेअछूत बालिकाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की।
परिचय
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ था। इनके पिता का नाम खन्दोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मी था। सावित्रीबाई फुले का विवाह 1840 में ज्योतिबा फुले से हुआ था।सावित्रीबाई फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल और पहले किसान स्कूल की संस्थापक थीं। महात्मा ज्योतिबा को महाराष्ट्र और भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन में एक सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में माना जाता है। उनको महिलाओं और दलित जातियों को शिक्षित करने के प्रयासों के लिए जाना जाता है। ज्योतिराव, जो बाद में ज्योतिबा के नाम से जाने गए सावित्रीबाई के संरक्षक, गुरु और समर्थक थे। सावित्रीबाई ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछात मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना। वे एक कवियत्री भी थीं उन्हें मराठी की आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता था।’सामाजिक मुश्किलें में स्कूल जाती थीं, तो लोग पत्थर मारते थे। उन परगंदगी फेंक देते थे। आज से 160 साल पहले बालिकाओं के लिये जब स्कूल खोलना पाप का काम मानाजाता था कितनी सामाजिक मुश्किलों से खोला गया होगा देश में एक अकेला बालिका विद्यालय।महानायिका सावित्री बाई फुले देश की महानायिका हैं। हर बिरादरी और धर्म के लिये उन्होंने काम किया। जब सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर, विष्ठा तक फैंका करते थे। सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं। अपने पथ पर चलते रहने की प्रेरणा बहुत अच्छे से देती हैं।विद्यालय की स्थापना1848 मेंपुणेमें अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की नौ छात्राओं के साथ उन्होंने एक विद्यालय की स्थापना की। एक वर्ष में सावित्रीबाई और महात्मा फुले पाँच नये विद्यालय खोलने में सफल हुए। तत्कालीन सरकार ने इन्हे सम्मानित भी किया। एक महिला प्रिंसिपल के लिये सन् 1848 में बालिका विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना शायद आज भी नहीं की जा सकती। लड़कियों की शिक्षा पर उस समय सामाजिक पाबंदी थी। सावित्रीबाई फुले उस दौर में न सिर्फ खुद पढ़ीं, बल्कि दूसरी लड़कियों के पढ़ने का भी बंदोबस्त किया, वह भी पुणे जैसे शहर में।


महानायिका
सावित्रीबाई फूले देश की महानायिका हैं। हर बिरादरी और धर्म के लिये उन्होंने काम किया। जब सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर, विष्ठा तक फैंका करते थे। सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं। अपने पथ पर चलते रहने की प्रेरणा बहुत अच्छे से देती हैं।
निधन10 मार्च 1897 को प्लेग के कारण सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया। प्लेग महामारी में सावित्रीबाई प्लेग के मरीज़ों की सेवा करती थीं। एक प्लेग के छूत से प्रभावित बच्चे की सेवा करने के कारण इनको भी छूत लग गया। और इसी कारण सेउनकी मृत्यु हुई।

आज राष्ट्र माता सावित्री बाई फुले के जन्मदिवस पर उनको शत शत नमन !

सावित्री बाई फुले उस महान क्रांतिकारी स्त्री का नाम है जिसने भारतीय समाज के शताब्दियों के बनाये उन परम्पराओ को तोड़ने का साहस किया जिसके द्वारा हजारों वर्षों से आधी आबादी को उसके सभी अधिकारों को छीन कर उसे मर्दवादी ब्राह्मणवादी संस्कृति का गुलाम बनाया गया था !

स्त्री और शुद्र को शिक्षा वंचित रखने के साथ उन्हें धार्मिकता का धीमा जहर पिलाया जाता रहा जिसके द्वारा वह अपनी गुलामी के असली कारको को न समझते हुए उसे भगवान् और भाग्य से जोड़कर बिना किसी प्रतिकार और शिकायत के गुलाम बना रह सके !

स्त्री के लिए यह गुलामी दोहरी थी एक तो वह संस्कारों और परमपराओं के रूप में धार्मिक गुलामी की अंतहीन व्यथा को सहने की अभिशप्त थी दुसरे पुरुषवादी मानसिकता की भयंकर शिकार , वह शुद्र के रूप में भी या एक ब्राह्मणी के रूप में भी कलंकिनी ही थी किसी भी वर्ण अथवा जाती में जन्मने से उसके दुखों में कोई विशेष अंतर नहीं आता था वह केवल गुलाम थी मर्द की और धर्म की दोनों की एक साथ !

इस गुलामी का मूल कारण था उसका शिक्षा वंचित होना ! यही मूल कारण था जिसे ज्योतिबा फुले सर्वप्रथम समझे और उन्होंने सभी पारिवारिक और सामजिक अंतर्विरोधों को सहन करते हुए अपनी स्त्री को शिक्षित करने का साहसिक कदम उठाया और 17 सितम्बर 1851 को रास्तापेठ में और 15 मार्च को वेताल में कन्यापाठशालाए खोली और लड़कियों को शिक्षित करने का महान कार्य अपनी जीवनसंगिनी सावित्री बाई फुले को दिया , एक स्त्री को दूसरी बालिकाओं को शिक्षित करता देख समाज के ठेकेदारों की नींदे हराम हो गई वर्षों की बनाई उनकी तथाकथित महान भारतीय संस्कृति की चूलें हिलने लगी , उन्हें सावित्री बाई फुले को प्रतिदिन लड़कियों को शिक्षित करने जाते देखा नहीं गया तो उन्होंने उस वीरांगना को हतोत्साहित करने का प्रयास आरंभ करते हुए उनपर गोबर और कूड़ा करकट फैंकना शुरू कर दिया यहाँ तक की कई बार उन पर थूका भी !

सावित्री बाई फुले ने इन असहनीय स्थिति से घबराकर इस महान कार्य को छोड़ा नहीं अपितु वे इन सब से और मजबूत हुई , उनकी महानता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है की उनके पास तीन साड़ियाँ थी एक को वह स्कूल जाते समय पहनती थी स्कूल पहुँचते-पहुचते उनकी यह साड़ी गंदगी से मैली कर दी जाती थी तब वह उसको बदल कर दूसरी पहनती थी और वापस घर पहुचने में दूसरी गन्दी कर दी जाती तब वह तीसरी बदलतीं !

ऐसी महान वीरांगना को कोई भारत रतन के लायक न समझे हम जानते हैं उनलोगों की मानसिकता को , इनकी विधा की देवी सरस्वती से हमारी विधा की महान नारी सावित्री बाई करोड़ों गुणा श्रेष्ठ और सक्षम साबित हुई है !

हम सदा उस वीरांगना के ऋणी रहेंगे

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