सद्धर्म का लोप होने के कारण स्वयं भगवान् बुद्ध के अनुसार…डॉ० जयवंत खंडारे


सद्धर्म का लोप होने के कारण स्वयं भगवान् बुद्ध के अनुसार  ……डॉ० जयवंत खंडारे

प्राचीन भारत एवं मध्य एशिया के इतिहास में सर्वाधिक गौरवशाली समय बौद्ध काल का था। इस के बाद का इतिहास अन्धकार मय और बौद्ध धर्म की आवश्यता दर्शाता रहा है। बौद्ध धर्म के बिना क्या क्या होता है, यह  दर्शाता रहा है। भारत और उसके पड़ोसी देश यथा- पाकिस्तान, अफगानीस्तान, नेपाल की स्थिति देख कर यही कहा जा सकता है कि यहाँ से बौद्ध धर्म का लोप होना ही इनके दुर्भाग्य का प्रमुख कारण है। यही कारण इरान, इराक, तुर्किस्थान, सीरिया, मालदीव इन्डोनेशिया एवं मलेशिया पर लागू होता है।  बौद्ध धर्म के लोप के अनेक विद्वानों ने अनेक कारण बताए हैं। जिनमें प्रमुखता से बुद्ध, धम्म और संघ को ही कारण बताया गया है, इन्हीं की कमियाँ गिनाई जाती है। केवल डॉ० अम्बेडकर जी ने इस बाबत  सही कारण गिनाए है। यथा वैष्णव, शैव आदि भक्ति पंथों के माध्यम से, सूफीमत के माध्यम से बौद्ध लोगों को धर्मांतरित किया गया, बचे हुए बौद्धों पर इन्हीं धर्मांतरितों के माध्यम से आक्रमण करा कर खत्म करने की कोशिश की गई, जो अन्त तक लडते रहे उन्हें अछूत घोषित किया गया।

लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि स्वयं भगवान् बुद्ध का अपने धम्म के भविष्य के बारे में क्या अनुमान था? उन्होंने लोप के बारे में क्या चेतावनी दी थी?यहाँ इसी मुद्दे पर विचार किया गया है।

एक दिन आयुष्मान महाकाश्यप भगवान् से बोले- भन्ते! क्या हेतु है, क्या कारण है कि पहले अल्प ही शिक्षापद थे और (उन पर भी) बहुतों ने अर्हत् पद पा लिया था? भन्ते! क्या हेतु है, क्या कारण है कि इस समय बहुत शिक्षापद हैं और कम लोग अर्हत्-पद पर प्रतिष्ठित हैं?

‘‘एवञ्‍चेतं, कस्सप, होति सत्तेसु हायमानेसु सद्धम्मे अन्तरधायमाने, बहुतरानि चेव सिक्खापदानि होन्ति अप्पतरा च भिक्खू अञ्‍ञाय सण्ठहन्ति।

उन्हें उत्तर देते हुए भगवान् बोले–

न ताव, कस्सप, सद्धम्मस्स अन्तरधानं होति याव न सद्धम्मप्पतिरूपकं लोके उप्पज्‍जति। यतो च खो, कस्सप, सद्धम्मप्पतिरूपकं लोके उप्पज्‍जति,अथ सद्धम्मस्स अन्तरधानं होति’’[1]

काश्यप! ऐसा ही होता है- सत्त्वों के हीन होने, और सद्धर्म के क्षय होने पर बहुत शिक्षापद होते हैं, और अल्प भिक्षु अर्हत्-पद पर प्रतिष्ठित होते हैं। काश्यप! तब तक सद्धर्म का लोप नहीं होता है जब तक कोई दूसरा नकली धर्म उठ खड़ा नहीं होता। जब कोई नकली धर्म उठ खड़ा होता है तो सद्धर्म का लोप हो जाता है।… काश्यप! जैसे, तब तक सच्चे सोने का लोप नहीं होता जब तक नकली तैयार होने नहीं लगता…. वैसे ही। काश्यप! पृथ्वीधातु, सद्धर्म को लुप्त नहीं करता; न आपोधातु, न तेजोधातु, और न वायुधातु। किंतु, यहीं वे मूर्ख लोग उत्पन्न होते हैं जो सद्धर्म को लुप्त कर देते हैं। काश्यप! जैसे अधिक भार से नाव डूब जाती है वैसे धर्म डूब नहीं जाता।

भगवान् का साफ-साफ संकेत उन विरोधी पंथों की ओर था जो मानवतावादी धम्म को नष्ट करना चाहते थे ताकि उनके धर्म टिके रहे। वे इस काम में सफल भी हुए हैं। ऐसा लगता है कि बुद्ध के वचनों को आम जनता लम्बे समय तक सम्भाल नहीं पायी। इसका भी कारण स्वयं बताके गए हैं, यह कारण बुद्ध वचनों को लम्बे समय तक ठीक ठीक नहीं समझा पाए। बुद्ध इसे भी एक कारण गिनाते हुए बोले- ‘‘पञ्‍च खोमे, कस्सप, ओक्‍कमनिया ……. इमे खो, कस्सप,पञ्‍च ओक्‍कमनिया धम्मा सद्धम्मस्स सम्मोसाय अन्तरधानाय संवत्तन्ति।

काश्यप! ऐसे पाँच कारण हैं जिससे सद्धर्म नष्ट होकर लुप्त हो जाता है। कौन से पाँच? 1. काश्यप! भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक, उपासिकायें बुद्ध के प्रति गौरव नहीं करतीं, उनका ख्याल नहीं करती हैं। धर्म के प्रति….. पूर्ववत्……। 3. संघ के प्रति….. । 4. शिक्षा के प्रति……..। 5. समाधि के प्रति……।

‘‘पञ्‍च खोमे, कस्सप, धम्मा सद्धम्मस्स ……. इमे खो, कस्सप, पञ्‍च धम्मा सद्धम्मस्स ठितिया असम्मोसाय अनन्तरधानाय संवत्तन्ती’’ति।

… काश्यप! यही पाँच कारण है, जिनसे सद्धर्म नष्ट हो लुप्त हो जाता है। काश्यप! ऐसे पाँच कारण हैं, जिनसे सद्धर्म ठहरा रहता है, क्षीण और लुप्त नहीं होता।1. ….बुद्ध के प्रति गौरव…। 2. धर्म के प्रति….। 3. संघ के प्रति… । 4. शिक्षा के प्रति…। 5. समाधि के प्रति…। काश्यप! यही पाँच कारण है, जिनसे सद्धर्म ठहरा रहता है, क्षीण और लुप्त नहीं होता।

श्रावस्ती….।भिक्षुओ! पूर्वकाल में दसारह नामक लोगों के पास आनक नाम का एक मृदंग था। उस आनक मृदंग में जब-जब कोई छेद हो जाता था तब-तब दसारह लोग उसमें एक खूँटी ठोंक देते थे। धीरे-धीरे, एक ऐसा समय आया कि सारे मृदंग की अपनी पुरानी कड़ी कुछ भी नहीं रही; वह  सारा खूटियों का एक ढच्चर बन गया। [2]

बुद्ध वचनों में इसी प्रकार से परिवर्तन परिवर्धन करने से मूल बुद्धवचन खो जाएंगे, यह चेतावनी बाद में सही सिद्ध हुई है। वे कहते है– भिक्षुओ! भविष्यकाल में भिक्षु ऐसे ही बन जायेंगे। बुद्ध ने जो गम्भीर, गम्भीर अर्थ वाले, लोकोत्तर, शून्यता आदि पर संयुक्त सूत्र कहे हैं उनपर ध्यान न देंगे, सुनने की इच्छा न करेंगे, समझने की कोशिश नहीं करेंगे। धर्म को वे सीखने और अभ्यास करने के योग्य नहीं समझेंगे।

जो बाहर के श्रावकों से कहे कविता, सुन्दर अक्षर और सुन्दर व्यञ्जन वाले जो सूत्र बनेंगे उन्हीं के कहे जाने पर कान देंगे, सुनने की इच्छा करेंगे, समझने की कोशिश करेंगे। उन्हीं धर्मों को वे सीखने और अभ्यास करने के योग्य समझेंगे। भिक्षुओ! इस तरह, बुद्ध ने जिन गम्भीर… सूत्रों को कहा है उनका लोप हो जायेगा। भिक्षुओ! इसलीये, तुम्हें ऐसा सीखना चाहिये- बुद्ध ने जो गम्भीर…. सूत्र कहे हैं, उनके कहे जाने पर कान दूँगा, सुनने की इच्छा करूँगा, समझने की कोशिश करूँगा। उसी धर्म को सीखने और अभ्यास करने के योग्य समझूँगा। [3]

सद्धर्म के लोप एवं स्थिरता पर संघ के चारों सदस्यों यथा भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक एवं उपासिकओं को मार्गदर्शन करते हुए वे कुछ कारण बताते है–

सद्धर्मलोप में कारण :  “भिक्षुओ! ये दो धर्म सद्धर्म के लोप एवं अन्तर्धान के साधक हैं। एक, शब्द  या वाक्य के पद या वर्ण अशुद्ध लिखे जायँ या पढ़े जायँ, तथा दो उनका वास्तविक अर्थ, दुरूहता या भ्रामकता के कारण कठिनता से समझ में आवे । ऐसे अशुद्ध लिखे गये पद एवं वर्णों का वास्तविक अर्थ भी कठिनता से समझ में आता है। अत: मेरा मानना है कि ये दो धर्म सद्धर्म के लोप एवं अन्तर्धान के लिये उत्तरदायी हैं”।

सद्धर्मस्थिति (स्थिरता) में कारण :   “भिक्षुओ! ये दो धर्म सद्धर्म की स्थिति (स्थिरता), सत्ता एवं निरन्तरता में सहायक हैं। कौन से दो? एक, शुद्ध लिखे या  बोले गये पद एवं वर्ण तथा दो, उन पदों का अर्थ भी सुबोध, सरल एवं अनायास समझ में आनेवाला हो। भिक्षुओ! इस प्रकार शुद्ध लिखे गये पद एवं वर्णों का वास्तविक अर्थ भी सरल एवं अनायास समझ में आनेवाला होता है। इस तरह, भिक्षुओ! ये दो धर्म सद्धर्म की स्थिति सत्ता एवं, निरन्तरता में सहायक हैं”।

“भिक्षुओ! जो भिक्षु अधर्म को धर्म कहकर उपदेश करते हैं, वे भिक्षु ऐसा करके बहुत लोगों का अहित करने में, बहुत लोगों को दु:ख पहुँचाने में ही लगे हुए हैं, वे नहीं समझते कि ऐसा करके वे कितने ही देवताओं और मनुष्यों को अनर्थ, अहित एवं दु:ख की ओर ढकेल रहे हैं, भिक्षुओ, ऐसे भिक्षु अपने लिये तो अपुण्य का सञ्चय करते ही हैं, साथ ही वे अपने इस अपुण्य कार्य से धर्म का लोप भी निश्चित रूप से करेंगे”। [4]

सद्धर्म के लोप एवं स्थिरता भिक्षु, भिक्षुणियों के मार्गदर्शन पद्धति एवं नैतिकता पर भी निर्भर होती है, इस संन्दर्भ में मार्गदर्शन करते हुए वे कहते हैं–

“भिक्षुओ! ये चार धर्म  सद्धर्म के नाश एवं लोप के कारक  होते हैं। कौन से चार? यहाँ, भिक्षुओ! कुछ भिक्षु उनके द्वारा उपदिष्ट सूत्रान्त के अर्थ एवं व्यञ्जन को मिथ्यारूप से ग्रहण करते हैं। तब इस प्रकार मिथ्यारूप से गृहीत सूत्र का अर्थ भी दुर्गृहीत ही होगा। इस प्रकार यह प्रथम धर्म  सद्धर्म के नाश एवं लोप का कारक होता है।

फिर, भिक्षुओ! कुछ भिक्षु दुर्वच होते हैं, तथा दौर्वचस्यकारक धर्मों से सम्पन्न होकर धर्मानुशासन से बाहर चले जाते हैं। इस प्रकार यह द्वितीय धर्म  सद्धर्म के नाश एवं लोप का कारक होता है।

फिर, भिक्षुओ! कुछ भिक्षु बहुश्रुत, आगमज्ञ, धर्मधर, विनयधर एवं मातृकाधर होते हैं, वे सावधानतया सूत्रान्तों का वाचन नहीं करते। उनके मरने के बाद ये सूत्रान्त छिन्नमूल एवं असहाय हो जाते हैं। इस प्रकार यह तृतीय धर्म सद्धर्म के नाश एवं लोप का कारक होता है।

फिर, भिक्षुओ! कुछ भिक्षु स्थविर भिक्षु परिगृही, कर्तव्य में शिथिल, लाभार्थ कहीं भी प्रवेश में आगे रहने वाले, एकान्तवास की उपेक्षा करने वाले अप्राप्त की प्राप्ति हेतु या अज्ञात के ज्ञान हेतु या असाक्षात्कार के साक्षात्कार हेतु प्रयास न करने वाले होते हैं। उनके पीछे आनेवाली जनता भी उनका  ही अनुगमन करती है तथा वह इन उपर्युक्त दुर्गुणों से युक्त हो जाती है। भिक्षुओ! चतुर्थ धर्म सद्धर्म के नाश एवं लोप का कारक होता है।

“भिक्षुओ! ये चार धर्म  सद्धर्म के लोपक एवं नाशक होते हैं।

“भिक्षुओ! ये चार धर्म  सद्धर्म की स्थिति, सत्ता एवं विद्यमानता के लिये कार्यकर होते हैं। कौन से चार? यहाँ, भिक्षुओ! कुछ भिक्षु सुगृहीत सूत्रान्तों का,  सुव्यवस्थित पदों एवं व्यञ्जनों के साथ, प्रवचन करते हैं। किये गये इस प्रवचन से इन सूत्रान्तों का अर्थ भी सुगृहीत होता है। यह, भिक्षुओ! प्रथम धर्म  सद्धर्म की स्थिति, सत्ता एवं विद्यमानता के लिये कार्यकर होता हैं।

फिर, भिक्षुओ! कुछ भिक्षु सौवचस्यकारक धर्मों से युक्त कर्णमधुर शब्दों से धर्म प्रवचन करते हैं। इस प्रकार वे धर्मानुशासन को भी दृढता प्रदान करतें हैं।भिक्षुओ! यह द्वितीय धर्म  सद्धर्म की स्थिति, सत्ता एवं विद्यमानता के लिये कार्यकर होता हैं।

फिर, भिक्षुओ! कुछ भिक्षु बहुश्रुत, आगमज्ञ, धर्मधर, विनयधर एवं मातृकाधर होते हैं, वे सावधानी से सूत्रान्तों का प्रवचन करते हैं। इस कारण, उनभिक्षुओ के देहपात के बाद भी इस सद्धर्म का मूल उछिन्न नहीं होता तथा इसको आधार मिला रहता हैं। इस प्रकार यह तृतीय धर्म  भी सद्धर्म की स्थिति, सत्ता एवं विद्यमानता के लिये कार्यकर होता हैं।

फिर, भिक्षुओ! कुछ भिक्षु स्थविर भिक्षु अपरिगृही, कर्तव्य में सावधान, कहीं भी लौकिक लाभार्थ में प्रवेश न करने वाले, एकान्तवास में उत्साही, अप्राप्त की प्राप्ति हेतु, अज्ञात के ज्ञान हेतु, तथा असाक्षात्कार के साक्षात्कार हेतु सतत प्रयास करने वाले होते हैं। उनके पीछे आनेवाली जनता भी उनका  ही अनुगमन करती है तथा वह इन उपर्युक्त सद्गुणों से युक्त रहती है। भिक्षुओ! यह चतुर्थ धर्म भी सद्धर्म की स्थिति, सत्ता एवं विद्यमानता के लिये कार्यकर होता हैं। “भिक्षुओ! ये चार धर्म  सद्धर्म की स्थिति, सत्ता एवं विद्यमानता के लिये अति आवश्यक हैं।[5]

सद्धर्म के लोप एवं स्थिरता के लिए केवल भिक्षु, भिक्षुणियाँ ही जिम्मेदार नहीं होते अपितु उपासक  उपासिकाएँ भी होते है,  इस संन्दर्भ में आयुष्मान् किमिल को मार्गदर्शन करते है–

एक समय भगवान् बुद्ध को आयुष्मान् किमिल ने प्रश्न पूछा कि- “भन्ते! क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है कि तथागत के परिनिर्वाण प्राप्त करने पर सद्धर्म स्थिर नहीं हो पाता है?”

“क्योंकि, किमिल, तथागत के परिनिर्वृत होने पर भिक्षु भिक्षुणियाँ, उपासक उपासिकाएँ शास्ता के प्रति, धर्म के प्रति, संघ के प्रति, धर्मशिक्षा के प्रति, यहाँ तक कि परस्पर भी गौरवपूर्ण सम्मानजनक व्यवहार नहीं करते, उनके प्रति विद्रोह कर देते हैं। किमिल, यही कारण एवं यही प्रत्यय है कि तथागत के परिनिर्वृत होने पर सद्धर्म स्थिर नहीं हो पाता है”।

“पुन:, भन्ते! कौन हेतु या कौन प्रत्यय है कि तथागत के परिनिर्वृत होने पर सद्धर्म स्थिर रह सके?” “यहाँ किमिल, शास्ता के परिनिर्वृत होने पर भी भिक्षु भिक्षुणी, उपासक उपासिकाएँ शास्ता के प्रति, धर्म के प्रति, संघ के प्रति, धर्मशिक्षा के प्रति, यहाँ तक कि परस्पर भी गौरवपूर्ण व्यवहार करते हैं, उनके प्रति विद्रोह नहीं करते। किमिल, यही हेतु तथा प्रत्यय है कि शास्ता के परिनिर्वृत होने पर सद्धर्म बहुत काल तक स्थिर रह सकता है”। [6]

इन सूत्रों को यदि हम एकमात्र चेतावनी जान कर ध्यान दें तो न तो सद्धर्म का लोप होगा, अपितु वह स्थिरता रहेगा और उसके साये में भिक्षु, भिक्षुणियाँ, उपासक  एवं उपासिकायें भी सुख शांति से जियेंगें साथ बुद्ध का बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का उद्देश्य भी सिद्ध होगा। jaywant khandare

 

सन्दर्भ

[1] (16.कस्सपसंयुत्तं 13. सद्धम्मप्पतिरूपकसुत्तं)

[2] (20. ओपम्मसंयुत्तं. 7. आणिसुत्तं)

[3] (अं. नि. दुकनिपात, 2. अधिकरणवर्ग, करणीय अकरणीय धर्म, पृ.85, स्वामी द्वारिकादासशास्त्री)

[4] (अं. नि. 1. एककनिपात 10. द्वितीय प्रमादादिवर्ग, पृ.29, स्वामी द्वारिकादासशास्त्री)

[5] (अं.नि. 2., 4.चतुक्कनिपात  16. इन्द्रियवग्गो, 10. सुगतविनयसुत्तं, पृ. 203, स्वामी द्वारिकादासशास्त्री)

[6] (अं.नि. 2., 5. पञ्चक्कनिपात 21. किमिलवग्गो, 1. किमिलसुत्तं, पृ. 619, स्वामी द्वारिकादासशास्त्री)

(डॉ० जयवंत खंडारे) SRF, पालि,

रा० सं० सं०,  लखनऊ परिसर।

dhamm vs dharm

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for indepth reading please refer boks:

http://www.brill.com/buddhism-shadow-brahmanism

 

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