सामाजिक बहिष्कार या असहिषुणता (जिसे पहले छुआछूत कहते थे) उसका एक और मामला – विज्ञापनों को तरसता एक मूलनिवासी चैनल —-अशोक कुमार BBC


विज्ञापनों को तरसता एक मूलनिवासी  चैनल

  • 26 मार्च 2014

दलित टीवी चैनल

नागुपर में रहने वाले राजू मून और सचिन मून दोनों भाई हैं और केबल ऑपरेटर हैं. लेकिन साथ ही वो एक सैटेलाइट चैनल के मालिक भी हैं.

इस चैनल का नाम है ‘लॉर्ड बुद्धा टीवी’ जो राजू मून के अनुसार भारत का पहला ऐसा चैनल है, जो गौतम बुद्ध और दलितों के मसीहा कहे जाने वाले डॉ. अंबेडकर के विचारों और संस्कारों का प्रसार करता है.

ख़ुद दलित समुदाय से संबंध रखने वाले राजू मून इस चैनल के पीछे अपनी प्रेरणा के बारे में बताते हैं, “हम तो बहुत छोटे लोग हैं. हमारी हैसियत भी नहीं थी कि हम अपना चैनल शुरू कर सकें. लेकिन हमारा एक लक्ष्य था कि हमारा भी एक मीडिया होना चाहिए क्योंकि दलितों को मुख्यधारा के मीडिया में उचित जगह नहीं मिलती है.”

राजू मून के मुताबिक़ नागपुर में जहां अंबेडकर ने 14 अक्तूबर 1956 में बौद्ध धर्म स्वीकार किया, उसकी स्मृति और उनकी जयंती 14 अप्रैल के दिन शहर में दीक्षा भूमि पर हर साल लाखों लोग जुटते हैं. लेकिन उसे कभी मीडिया में स्थान नहीं दिया जाता.

उनके मुताबिक़, “इन आयोजनों के दौरान सभी चैनलों की दिलचस्पी सिर्फ़ तब पैदा होती है जब वहां कोई विवाद होता है.”

सीमित संसाधन

एक जगह खड़े होकर एक तरफ़ मैंने नज़र घुमाई तो स्टूडियो था, दूसरी तरफ देखा तो एक रसोई का दरवाज़ा खुलता है और उससे सटे हुए छोटे से कमरे में चार-पांच कुर्सियां पड़ी थीं. पूछा तो पता चला कि वह न्यूज़रूम है.

राजू मून बताते हैं कि 18 मई 2012 से उनका चैनल सैटेलाइट पर है जबकि इससे पहले एक साल तक वो लोकल केबल नेटवर्क के माध्यम से लोगों तक पहुंचा.

मुख्य तौर पर गौतम बुद्ध और डॉ. अंबेडकर समेत दलित आंदोलन से जुड़े नेताओं के विचारों और शिक्षाओं को समर्पित इस चैनल पर करियर, सेहत, संगीत और समाचारों से जुड़े कार्यक्रम भी आते हैं.

दिलचस्प बात यह है कि लॉर्ड बुद्धा टीवी की टीम में सिर्फ़ दलित समुदाय के लोग ही नहीं, बल्कि कई ब्राह्मण भी काम करते हैं. इन्हीं में एक हैं नेहा, जो सेहत और समाचारों से जुड़े कार्यक्रम की एंकर और प्रोड्यूसर हैं.

वो बताती हैं कि शुरू में उनके घर वालों और दोस्तों ने उनके लॉर्ड बुद्धा टीवी में काम करने पर ऐतराज़ जताया. वो बताती हैं, “शुरू में मेरे दोस्त कहते थे कि अरे ये तो ‘जय भीम’ (नवबौद्धों में नमस्ते के लिए इस्तेमाल होने वाला संबोधन) वाली हो गई है. शुरू में काफ़ी मुश्किलें हुई. पापा ने कहा चैनल बदलो. लेकिन आज मेरे पापा गर्व से बताते हैं कि मेरी बेटी एक सैटेलाइट बुद्धिस्ट चैनल में काम करती है.”

‘विज्ञापन नहीं’

नेहा का मानना है कि ये चैनल सामाजिक बदलाव की दिशा में एक क़दम है और केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार और महाराष्ट्र के आरआर पाटिल तक जैसे लोगों ने इसे देखा है.

लेकिन टीवी पर विज्ञापन देने वाली कंपनियों की इस पर नज़र नहीं है. राजू मून कहते हैं, “हमने कई कॉरपोरेट कंपनियों से विज्ञापन के लिए आवेदन किया, लेकिन उनसे कोई ख़ास जवाब नहीं मिला.”

फिर चैनल चलता कैसे है, इस पर राजू मून कहते है कि कुछ संस्थाओं से उन्हें मदद मिल रही है और साथ ही वो लोगों के जन्मदिन की शुभकामनाओं वाले विज्ञापन चलाते हैं.

दलित चैनल
Image captionचैनल का स्टूडियो दिखाते हुए राजू मून

वो बताते हैं कि जब भी उन्होंने विज्ञापनों के लिए प्रयास किया तो उनसे यही कहा जाता है कि उनके चैनल के दर्शक सिर्फ़ एक सीमित वर्ग के लोग ही होंगे.

लेकिन राजू मून का दावा है कि अब भारत के 17 राज्यों में उनके चैनल को देखा जा रहा है, साथ ही उनकी वेबसाइट पर इसे लाइव देखा जा सकता है. अभी तक ये चैनल किसी ‘डायरेक्ट टू होम’ सेवा का हिस्सा नहीं है लेकिन कई इलाक़ों में स्थानीय केबल नेटवर्क कंपनियों ने इसे अपने चैनल के बुके में शामिल किया है.

दिल्ली में रहने वाले राहुल मौर्य भी इस चैनल के दर्शकों में शामिल हैं. वो कहते हैं, “ये चैनल सिर्फ़ बौद्ध लोगों के लिए नहीं है, बल्कि इसमें बताई जाने वाली बातों को कोई भी अपने जीवन में अपना सकता है.”

वो कहते हैं कि इस चैनल पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रम बेशक एक धर्म से प्रेरित हैं लेकिन वो टीवी पर आने वाले उन कार्यक्रमों से कहीं बेहतर हैं, जिनके ज़रिए ज्योतिष और तंत्र मंत्र को बढ़ावा दिया जाता है.

नाटकीयता

एड गुरु प्रहलाद कक्कड़ का कहना है कि विज्ञापन मिलने या न मिलने का इससे कोई मतलब नहीं है कि चैनल दलित का या किसी और का, बल्कि ये इस बात पर निर्भर होता है कि उसे देखते कितने लोग हैं.

भारतीय मीडिया
Image captionभारतीय मीडिया में दलितों के उचित प्रतिनिधित्व का सवाल अकसर उठाया जाता है

वो कहते हैं, “आज टीवी कार्यक्रमों में जितनी नाटकीयता होगी, उतने ही ज़्यादा लोग उन्हें देखते हैं. जहां तक बात किसी धार्मिक चैनल की है तो अगर आप उस ख़ास धर्म के नहीं हैं तो आपको उसके कार्यक्रम बहुत बोरिंग लगेंगे. प्रस्तुति प्रभावी नहीं होगी तो लोगों में इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं होगी कि किस धर्म का कौन भगवान है और उन्हें कैसे देवत्व मिला”

वो कहते हैं कि विज्ञापन दाताओं को आकर्षित करने के लिए कार्यक्रम अच्छे होने चाहिए और दूसरा उन्हें देखने वाले दर्शक होने चाहिए.

लेकिन लॉर्ड बुद्धा टीवी के निदेशकों में से एक भैयाजी खैरकर कहते हैं कि ये चैनल मीडिया में दलित और नवबौद्धों की जगह बनाने की दिशा में एक क़दम है क्योंकि भारत की जातिवादी व्यवस्था में मीडिया भी निष्पक्ष नहीं रहा है.

इसके लिए वो एक मिसाल देते हैं, “जब प्रकाश झा की ‘आरक्षण’ फ़िल्म को लेकर विवाद हुआ तो तमाम टीवी चैनलों पर बहसें हुई, लेकिन उन बहसों में कहीं डॉ. अंबेडकर का नाम कभी सुनने को नहीं मिला. क्या आरक्षण पर बहस में उस व्यक्ति का नाम एक बार भी नहीं आएगा जिसकी वजह से वो व्यवस्था अस्तित्व में आई.”

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक औरट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

http://www.bbc.com/hindi/india/2014/03/140325_dalit_series_channel_election2014spl_aa?SThisFB

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